हरामी फैमिली

यू तो मैने जवानी की दहलीज़ पर पहला कदम उमर के चौदह्वे पराव में ही रख दिया था. मेरी छातियों के उभर छोटे छोटे नींबू के आकर के निकल आए थे. घर में अभी भी फ्रॉक और चड्डी पहन कर घूमती थी. अम्मी अब्बू के अलावा एक बड़ा भाई था, जो उमर में मुझसे दो साल बड़ा था. यानी वो भी सोलह का हो चुका था और मूछों की हल्की हल्की रेखाएँ उसके चेहरे पर आ चुकी थी. मूछों की हल्की रेखाओ के साथ उसके नीचे की मुच्छे भी आ चुकी होगी ऐसा मेरा अंदाज़ है. मेरी भाई के जैसी मुच्छे तो नही आई थी मगर बगलो में और नीचे की सहेली के उपर हल्के हल्के रोए उगने शुरू हो गये थे.

15 साल की हुई और नींबू का आकर छोटे सेब के जैसा हो गया, तब अम्मी ने मुझे नक़ाब पहना दिया यानी बाहर जाने पर हर समय मुझे बुर्क़ा पहन कर घूमना परता था. घर में लड़के नहीं आते, सिर्फ़ रिश्तेदारों के सिवा . भाय्या के दोस्त भी अगर आए तो ड्रॉयिंग रूम से ही चले जाते. फ्रॉक अब कम ही पहनती थी. बाहर निकालने पर सलवार कमीज़ के अलावा बुर्क़ा पहन ना परता था. घर में अभी भी कभी कभी फ्रॉक और चड्डी पहन लेती थी.

जवानी की दहलीज़ पे कदम रखते ही, अपनी चूचियों और नीचे की सहेली यानी की चूत में एक अजीब सा खिचाओ महसूस करने लगी थी. जब सोलह की हुई तो यह खिचाव एक हल्की टीस और मीठी खुजली में बदल गई थी. बाथरूम में पेशाब करने के बाद जब पानी दल कर अपनी लालपरी को धोती तो मान करता कुछ देर तक यूँही रगर्ति रहूं. गोरी बुवर का उपरी हिस्सा झांटों से बिल्कुल धक गया था. नहाते वक्त जब कपड़े उतार कर अपनी चूचियों और चूत पर साबुन लगती तो बस मज़ा ही आजाता, हाथ में साबुन लेकर चूत में दल कर थोड़ी देर तक अंदर बाहर करती और दूसरे हाथ से चूचियों को रगर्ति…..अहह… ..

खुद को बात रूम में लगे बड़े आईने में देख कर बस मस्त हो जाती……बड़ा मज़ा आता था…लगता था बस अपनी चूत और चूचियों से खेलती रहूं. घर में खाली समय में लड़को के बारे में सोचते सोचते कई बार मेरी बुर पासीज जाती और मैं बाथरूम में जाकर अपनी गर्मी कम करने के लिए उनलीयों से अपनी लालपरी की उपर वाली चोंच को मसालती थी और नीचे वाले छेद में उंगली घुसने की कोशिश करती थी. शुरुआत थोड़ी तकलीफ़ से हुई मगर बाद में बड़ा मज़ा आने लगा था. रात में अपने बिस्तर पर अपनी उंगलियों से करती थी और कई बार इतनी गरम हो जाती की दिन में टीन-टीन दफ़ा बाथरूम में पेशाब करने के बहाने अपनी चूत की घुंडी रगड़ने चली जाती थी.

आप सोच रहे होंगे मैं इतनी छ्होटी उमर में इतनी गरम कैसे हो गई….मेरे अंदर लंड के लिए इतना दीवानापन… क्यों कर आ गया है…. तो जनाब ये सब मेरे घर के महॉल का असर है.

वैसे अभी तो मेरा कमरा अम्मी अब्बू के बगल वाला है…. मगर जब में छ्होटी थी मैं अपने अम्मी अब्बू के साथ ही सोती थी. मुझे याद आता है…..मेरी उमर उस वक़्त 7 साल की होगी….मैं अम्मी के कमरे में ही सोती थी….अम्मी और अब्बू बड़े पलंग पर साथ सोते मैं बगल में सिंगल बेड पर सोती….कमरे में नाइट बल्ब जलता रहता था….कभी- कभी रातों को जब मेरी आँख खुलती तो अम्मी और अब्बू दोनो को नंगे एक दूसरे के साथ लिपटा छिपटि कर रहे होते …. कभी अम्मी अब्बू के उपर कभी अब्बा अम्मी के उपर चड़े होते…..कभी अब्बू को अम्मी के जाँघों के बीच पति….या अम्मी को अब्बू के पेट पर बैठे हुए पाती….

कभी अब्बू को अम्मी के उपर चढ़ कर धक्के मरते हुए देखती….दोनो की तेज़ साँसों की आवाज़ और फिर अम्मी की सिसकारियाँ…..उउउ…सस्स्स्स्स्सिईईई…..मेरे सरताज….और ज़ोर सी….सीईईईई….. कभी -कभी तो अम्मी इतनी बेकाबू हो जाती की ज़ोर ज़ोर से अब्बू को गलियाँ देती…भड़वे और ज़ोर से मार….आिइ…तेरी अम्मी को छोड़ू…रंडी की औलाद….गाँड का ज़ोर लगा….गाँड में ताक़त नही……चीखतीं… .बालों को पकड़ कर खींचती…. और दोनो एक दूसरे के साथ गली गलोज़ करते हुए चुदाई में मसरूफ़ रहते…. जबकि मैं थोड़ी सी डरी सहमी सी उनका ये खेल देखती रहती…. और सोचती की दिन में दोनो एक दम शरीफ और इज़्ज़तदार बन कर घूमते है….. फिर रात में दोनो को क्या हो जाता है.

सहेलियों ने समझदारी बढ़ने में मदद की और….इस मस्त खेल के बारे में मेरी जानकारी बढ़ने लगी. मेरी नीचे की सहेली में भी हल्की गुदगुदी होने लगी…..अब मैं अम्मी अब्बू का खेल देखने के लिए अपनी नींद हराम करने लगी… शायद उन दोनो शक़ हो गया या उन्हे लगा की मैं जवान हो रही हूँ….उन लोगो ने मेरा कमरा अलग कर दिया…हालाँकि मैने इस पर अपनी नाराज़गी जताई मगर अम्मी ने मेरे अरमानो को बेरहमी कुचल दिया और अपने बगल वाले कमरे में मेरा बिस्तर लगवा दिया. मैने इसके लिए उसे दिल से बाद-दुआ दी…. जा रंडी तुझे 15 दिन तक लंड नसीब नही होगा.

मेरा काम अब अम्मी-अब्बू की सिसकारियों को रात में दीवार से कान लगा कर सुन ना हो गया था…..अक्सर रातों को उनके कमरे से प्लांग के चरमरने की आवाज़….. अम्मी की तेज़ सिसकारियाँ…..और अब्बू की….ऊओन्ंह… ..ऊओं… की आवाज़ें….ऐसा लगता था की जवानी की मस्ती लूटी जा रही है….की आवाज़ो को कान लगा कर सुनती थी और अपने जाँघो के बीच की लालमूनिया को भीचती हुई…अपने नींबुओ को हल्के हाथो से मसालती हुई सोचती…. अम्मी को ज़यादा मज़ा आता होगा, शाई की चूचियाँ फूटबाल से थोड़ी सी ही छ्होटी होगी.

मेरी अम्मी बाला की खूबसूरत थी. अल्लाह ने उन्हे गजब का हुस्न आता फरमाया था. गोरी चित्ति मक्खन के जैसा रंग था. लंबी भी थी और मशाल्लाह क्या मोटी मोटी जांघें और चुटटर थे. गाँड मटका कर चलती तो सब गान्डुओन की छाती पर साँप लॉट जाता होगा ऐसा मेरे दिल में आता है. रिश्तेदारो में सभी कहते थे की मैं अपनी अम्मी के उपर गई हूँ….मुझे इस बात पर बरा फख्रा महसूस होता….मैं अपने आप को उन्ही के जैसा सज़ा सॉवॅर कर रखना चाहती थी.

मैं अपनी अम्मी को छुप छुप कर देखती थी. पता नही क्या था, मगर मुझे अम्मी की हरकतों की जासूसी करने में एक अलग ही मज़ा आता था और इस बहाने से मुझे जिस्मानी ताल्लुक़ात बनाने के सारे तरीके मालूम हो गये थे. वक़्त के साथ-साथ मुझे यह अंदाज़ा हो गया की अम्मी – अब्बू का खेल क्या था….जवानी की प्यास क्या होती है….और इस प्यास को कैसे बुझाया जाता है. मर्द – औरत अपनी जिस्म की भूक मिटाने के लिए घर की इज़्ज़त का भी शिकार कर लेते है….अम्मी की जासूसी करते करते मुझे ये बात पता चली…..अम्मी ने अपने भाई को ही अपना शिकार बना लिया था….मुझे इस बात से बरा ताजुउब हुआ और मैने मेरी एक सहेली आयशा से पुछा की क्या वाक़ई ऐसा होता है …या फिर मेरी अम्मी ही एक अलबेली रंडी है…..उसने बताया की ऐसा होता है और….वो खुद अपनी अम्मी के साथ भाई और उसके दोस्तूँ की चुदाई का मज़ा लेती है….
उसकी किस्मत पर मुझे बड़ा जलन हुआ…. मैं इतनी खुश किस्मत नहीं थी…..हुस्न और जवानी खुदा ने तो दी थी …लेकिन इस हसीन जवानी का मज़ा लूटने वाला अब तक नहीं मिला था….मेरी जवानी ज़ंज़ीरों में जकड़ दी गई है….अम्मी का कड़ा पहरा था मेरी जवानी पर….खुद तो उसने अपने भाई तक को नहीं छोड़ा था….लेकिन मुझ पर इतनी बंदिश के अगर चूचियों पर से दुपट्टा सरक जाए तो फ़ौरन डांट लगती…..राबिया अब तू बच्ची नहीं…..ढंग से रहा कर….जवानी में अपने भाई से भी लिहाज़ करना चाहिए….कभी- कभी तो मुझे चिढ़ आ जाता….मन करता कह डू…साली भोंसड़ी….. रंडी… खुद तो ना जाने कितनी लंड निगल चुकी है…..

अपने भाई तक को नहीं छोड़ा ….और मेरी चूत पर पहरे लगती है….खुद तो अपने शौहर से मज़े लेते समय कहती है खुदा ने जवानी दी है इसीलिए की इसका भरपूर मज़ा लूटना चाहिए और मुझ पर पाबंदी लगती है….मगर मैं ऐसा कह नही पाई कभी….घर की इसी बंदिश भरे माहौल में अपनी उफनती गरम जवानी को सहेजे जी रही थी…..घुटन भी होती थी…दिल करता था…इन ज़ंज़ीरो को तोड़ डू….अपने नक़ाब को नोच डालु…

अपने खूबसूरत गदराए मांसल चूतरों को जीन्स में कस कर…अपनी छाती के कबूतरो को टी – शर्ट में डाल कर उसके चोंच को बरछा (भाला ) बना कर लड़कों को घायल करू…. लड़कों को ललचाओ…. और उनकी घूरती निगाहों के सामने से गाँड मटकती हुई गुज़रु…पर अम्मी साली घर से निकालने ही नही देती थी….कभी मार्केट जाना भी होता था….तो नक़ाब पहना कर अपने साथ ले जाती थी. एक बार एक सहेली के घर उसकी सालगिरह के दिन जाना था….मैने खूब सज-धज कर जीन्स और टी – शर्ट पहना फिर उसके उपर से नक़ाब डाल कर उसके घर चली गई…वहा पार्टी में अम्मी की कोई सहेली आई थी उसने देख लिया….अम्मी को मेरे जीन्स पहन ने का पता चला तो मुझे बहुत डांटा …इतनी घुटन हुई की क्या बताए.

एक बार अब्बू कही बाहर चले गये….15 दिनों की अब्बू की गैर मौजूदगी ने शायद अम्मी की जवानी को तड़पने को मजबूर कर दिया था…..जब वो नहाने के लिए गुसलखाने में घुसी तो मैने दरवाजे के छोटे छेद के पास अपनी आँखो को लगा दिया और अम्मी की जासूसी करने में मैं वैसे एक्सपर्ट हो चुकी थी. साली ने अपनी सारी उतरी फिर ब्लाउज के उपर से ही अपने को आईने में निहारते हुए दोनो हांथों को अपनी चूचियों पर रख कर धीरे-धीरे मसलने लगी…मेरे दिल की धरकन तेज हो गई….इतने लंड खा चूकने के बाद भी ये हाल….15 दिन में ही खुजली होने लगी…..यहाँ मैं 17 साल की हो गई और अभी तक….

खैर अम्मी ने चूचियों पर अपना दबाओ बढ़ाना शुरू कर दिया ….सस्सिईईईईई… ..अम्मी अपनी होंठों पर दाँत गाडते हुए सिसकारी ली……फिर ब्लाउस के बटन एक-एक कर खोलने लगी…..अम्मी की दो बड़ी- बड़ी हसीन चूंचीयाँ काले ब्रसियर में फाँसी बाहर नेकालने को बेताब हो गयी….. अम्मी ने एक झटके से दोनो चूचियों को आज़ाद कर दिया….. फिर पेटिकोट के रस्से (नारे) को भी खोल कर पेटिकोट नीचे गिरा दिया…. आईएनए में अपने नंगे हुस्न को निहार रही थी…..बड़ी-बड़ी गोरी सुडोल चूंचीयाँ… हाय !! मेरी चूंची कब इतनी बड़ी होगी….साली ने भाई और अब्बू से मसलवा मसलवा कर इतना बड़ा कर लिया है…..गठीला बदन…..ही कितनी मोटी जांघें है…..चिकनी….वैसे जांघें तो मेरी भी मोटी चिकनी और गोरी गोरी थी……तभी मेरी नज़र इस नंगे हुस्न को ….देखते हुए चूत पर गयी…..ही अल्लाह! कितनी हसीन चूत थी अम्मी की….बिल्कुल चिकनी….झांटों का नामोनिशान तक नहीं था उनकी बुर पर….

थोड़ी सी झांट छोड़ रखी थी अपनी चूत के उपरी हिस्से में पेडू के नीचे…..शायद रंडी ने डिज़ाइन बनाया हुआ था….अपने भाई को ललचाने के लिए….अब्बू तो कुत्ता था….अपना पेटिकोट भी सूँघा देती तो साला दुम हिलता चला आता उसके पास…. ही क्या गोरी चूत थी….वैसे चूत तो मेरी भी गोरी थी मगर अम्मी की चूत थोड़ी फूली हुई थी….मोटे मोटे लंड खा खा कर अपनी चूत को फूला लिया था चूत मरानी ने…..उनके नंगे हसीन जिस्म को देख कर मेरी चूत में भी जलन होने लगी…..मैं अपनी सलवार को चूतड़ से खिसका कर अपनी नंगी चूत को सहलाने लगी….और साथ ही अम्मी के मस्ताने खेल का नज़ारा भी देखती रही…..बड़ी मस्त औरत लग रही थी इस वक़्त मेरी अम्मी….थोड़ी देर तक अपने नंगे जिस्म पर हाथ फेरती रही…..

दोनो चूचियों को अपने हांथों से मसालते हुए दूसरा हाथ अपनी चूत पर ले गयी….चूत की होंठों को सहलाने लगी…और फिर सहलाते-सहलाते अपनी उँगलियों को चूत में घुसेड़ दिया….पहले तो धीरे धीरे उँगलियों को बुर के अंदर बहेर करती रही फिर उसकी रफ़्तार तेज़ होगआई….साथ ही साथ आमी अपनी गाँड को भी हिचकोले दे रही थी….बड़ा मस्त नज़ारा था….अम्मी थोड़ी देर तक अपने जिस्म से यह खेल खेलती रही फिर शावेर ओन किया और अपने जिस्म को भिगो कर साबुन लगाने लगी….खूब अच्छी तरह से उसने अपने पुर नंगे जिस्म पर साबुन लगाया…..अपनी दोनो चूचियों पर ….अपनी चिकनी चूत पर ….तो खूब झाग निकल कर उसने साबुन रग्रा….फिर अम्मी ने अपनी चूत में उंगलीयूं को घुसेड़ा …एक ….दो…तीन … और फिर पाँचों उंगलियाँ….चूत के अंदर दल दी…..धीरे धीरे अंदर बाहर करते हुए….

ही…अल्लाह… .क्या बताऊँ चूत मरानी कितनी गरम हो गई थी….मुँह से गु गु की आवाज़ निकलते हुए चूत में उंगलियाँ पेल रही थी…..थोड़ी देर तक अम्मी यूँही अपने बुर की चुदाई करती रही….चूतरों का हिचकोला तेज़ होता गया …..आहह….ऊओ… .और फिर अम्मी का जिस्म एक झटके के साथ शांत हो गया……अम्मी मदहोशी की आलम में फर्श पर झरने के नीचे लेट गयी…..थोड़ी देर शांत नंगे पड़ी रहने के बाद उठ कर नहाना शुरू किया….खेल ख़तम हो चक्का था…..मेरी बुर ने भी पानी छोड़ दिया था…..मैं शलवार थामे अपने कमरे में आई…..थोड़ी देर तक चूत को सहलाती रही .. एक उंगली घुसेरी….चूत के अंदर थोड़ी देर तक उंगली घुसती गयी…फिर रुक गयी….मैं अक्सर अपनी बुर एक उंगली से ही चोदा करती थी….पर अम्मी को देख कर जोश में आ गई ….बुर फैला कर दो उंगली घुसने की कोशिश की ….थोड़ा दबाव डाला तो दर्द हुआ… में ने डर कर छोड़ दिया….ही निगोरी मेरी चूत कब चौड़ी होगी….मुझे बड़ा अफ़सोस हुआ…क्या मेरी चूत फाड़ने वाला कोई पैदा नही हुआ.

वक़्त गुज़रता गया….जिस्म की भूक भी बढ़ती गयी…..लेकिन है रे किस्मत …..17 साल की हो चुकी थी लेकिन कोई लंड नही नसीब हो सका था जो मेरी कुँवारी चूत के सील को तोड़ कर मुझे लड़की से औरत बना देता…कोई रगड़ कर मसल कर मज़ा देने वाला भी मुझे नही मिला था…..मेरी शादी भी नहीं हो रही थी… अम्मी और अब्बू मेरे लिए लड़के की खोज में थे……उनका ख्याल था की 18 की होते-होते वो मेरे लिए लड़का खोज़ लेंगे….पर 18 की होने में तो पूरा साल बाकी था….तब तक कैसे अपनी उफनती जवानी को संभालू….चूत के कीड़े जब रातो को मचलने लगते तो जी करता किसी भी राह चलते का लंड अपनी चूत में ले लूँ….पर फिर दिल नही मानता….इतने नाज़-नखरो से संभाली हुई….गोरी चित्ति अनचुदी बुर किसी ऐरे गैरे को देना ठीक नही होगा….इसलिए अपने दिल को समझती….

लेकिन बढ़ती उमर के साथ चूत की आग ने मुझे पागल कर दिया था और चुदाई की आग मुझे इस तरह सताने लगी थी की…..मेरे ख्वाबो ख़यालो में सिर्फ़ लंड ही घूमता रहता था….हाय रे किस्मत ….मेरी बहुत सारी सहेलियों ने उपर-उपर से सहलाने चुसवाने….चूसने का मज़ा ले लिया था और जब वो अपने किससे बताती तो मुझे अपनी किस्मत पर बहुत तरस आता…घर की पाबंदियों ने मुझे कही का नही छ्चोड़ा था….उपर-उपर से ही किसी से अपनी चूचियों को मसलवा लेती ऐसा भी मेरे नसीब में नही था….जबकि मेरी कई सहेलियों ने तो चूत की कुटाई तक करवा ली थी.

शुमैला ने तो अपने दोनो भाइयों को फसा लिया था…उसकी हर रात…सुहागरात होती थी और अपने दोनो भाइयों के बीच सोती थी….वो बता रही की एक अपना लंड उसकी चूत से सटा देता था और दूसरा उसकी गाँड से तब जा कर उसे नींद आती थी…..पर है रे मेरी किस्मत एक भाई भी था तो दूर दूर ही रहता था और अब तो शहर छोड़ कर बाहर MBA करने के लिए एक बड़े शहर में चला गया था.
मैने अब बारहवी की पढ़ाई पूरी कर ली थी. वैसे तो हम जिस शहर में रहते है वाहा भी कई कॉलेज और इन्स्टिट्यूशन थे जहा मैं आगे की पढ़ाई कर सकती थी मगर जब से मेरी सहेली रेहाना जो की मुझ से उमर में बड़ी है….. जिसकी शादी उसी शहर में हुई थी जिसमे भाई पढ़ने गये थे….के बारे में और वाहा के आज़ादी और खुलेपन के महॉल के बारे में बताया तो….मेरे अंदर भी वहा जाने और अपनी पढ़ाई को आगे बढाने की दिली तम्मना हो गई थी.

इसे शायद मेरी खुसकिस्मती कहे या फिर अल्लाह की मर्ज़ी, मेरा भाई 6 महीने पहले ही वही के एक मशहूर कॉलेज में MBA की पढ़ाई करने के लिए दाखिला लिया था. पैसे की परेशानी तो नही थी लेकिन अम्मी अब्बू राज़ी हो जाते तो मेरा काम बन जाता….. और मैं खुली हवा में साँस लेने का अपना ख्वाब पूरा कर लेती…..जो की इस छोटे से शहर में नामुमकिन था.

मैने अपनी ख्वाहिश अपनी अम्मी को बता दी…उसका जवाब तो मुझे पहले से पता था…कुतिया मुझे कही जाने नही देगी….मैने फिर ममुजान से सिफारिश लगवाई…मामू मुझे बहुत प्यार करते थे….शायद मैं उन्ही के लंड की पैदाइश थी…उन्होने अम्मी को समझाया की मुझे जाने दे….वैसे भी इसकी शादी अभी हो नही रही……पढ़ाई कर लेने में कोई हर्ज़ नही है….फिर भाई भी वही रह कर पढ़ाई कर रहा है….मामू की इस बात पर अम्मी मुस्कुराने लगी….मामू भी शायद समझ गये और मुस्कुराने लगे….. और मुझ से कहा जाओ बेटे अपने कपड़े जमा लो……मैं तुम्हारे भाई से बात करता हूँ…मैं बाहर जा कर रुक गई और कान लगा कर सुन ने लगी….

अम्मी कह रही थी… हाए !! नही !! वहा भाई के साथ अकेले रहेगी…कही कुछ …..मामू इस पर अम्मी की जाँघ पर हाथ मारते हुए बोले….आख़िर बच्चे तो हमाए ही है ना….अगर कुछ हो गया तो संभाल लेंगे फिर…..बाद में देखेंगे….मेरे पैर अब ज़मीन पर नही थे..अब मुझे खुली हवा में साँस लेने से कोई नही रोक सकता था….दौड़ती हुई अपने कमरे में आ कर अपने कपड़ो को जमाने लगी….अम्मी से छुपा कर खरीदे हुए जीन्स और T-शर्ट….स्कर्ट-ब्लाउस….लो-कट समीज़ सलवार….सभी को मैने अपने बैग में डाल लिया….उनके उपर अम्मी की पसंद के दो-चार सलवार कमीज़ और बुर्क़ा रख दिया….अम्मी साली को उपर से दिखा दूँगी….उसे क्या पता नीचे क्या माल भर रखा है मैने….फिर ख्याल आया की खाली चुदवाने के लिए तो बड़े शहर नही जाना है….

कुछ पढ़ाई की बाते भी सोच ली जाए….ये हाल था मेरी बहकति जवानी का पहले चुदाई के बारे में सोचती फिर पढ़ाई के बारे में…..अल्लाह ने ये चूत लंड का खेल ही क्यों बनाया…और बनाया भी तो इतना मजेदार क्यों बनाया….है. थोड़ी देर बाद अम्मी और मामू मेरे कमरे में आए और दोनो समझाने लगे…. की शहर में कैसे रहना है. भाई को उन्होने दो कमरो वाला फ्लॅट लेने के लिए कह दिया है….और ऐसे तो पता नही वो कहा ख़ाता-पिता होगा….मेरे रहने से उसके खाना बनाने की दुस्वरियों का भी ख़ात्मा हो जाएगा……दोनो लड़ाई नही करेंगे….और अपनी सहूलियत और सलाहियत के साथ एक दूसरे की मदद करेंगे….दो दिन बाद का ट्रेन का टिकेट बुक कर दिया गया…भाई मुझे स्टेशन पर आकर रिसीव कर लेगा ऐसा मामू ने बताया.

दो दिन बाद मैं जब नक़ाब पहन कर ट्रेन में बैठी तो लगा जैसे दिल पर परा सालो से जमा बोझ उतार गया…..आज इतने दिनों के बाद मुझे मेरी आज़ादी मिलने वाली थी….अम्मी की पाबंदियों से कोसों दूर मैं अपनी दुनिया बसाने जा रही थी….ट्रेन खुलते ही सबसे पहले गुसलखाने जा कर अपने नक़ाब से खुद को आज़ादी दी अंदर मैने गुलाबी रंग का खूबसूरत सा सलवार कमीज़ पहन रखा था जो थोड़ा सा लो कट था….दिल में आया की ट्रेन में बैठे बुढहो को अपने कबूतरो को दिखा कर थोड़ा लालचाऊं ….. मगर मैने उसके उपर दुपट्टा डाल लिया. चुस्त सलवार कमीज़ मेरे जिस्मानी उतार चढ़ाव को बखूबी बयान कर रहा थे…..पर इसकी फिकर किसे थी मैं तो यही चाहती थी….

बालो का एक लट मेरे चेहरे पर झूल रहा था…..जब अपने बर्थ पर जा कर बैठी तो लोगो की घूरती नज़रे बता रही थी की मैं कितनी खूबसूरत हूँ….सभी दम साढ़े मेरी खूबसूरती को अपनी आँखो से चोदने की कोशिश कर रहे थे….शायद मन ही मन आहे भर रहे थे….एक बुड्ढे की पेशानी पर पसीने की बूंदे चमक रही थी…..एसी कॉमपार्टमेंट में बुढहे को क्यों पसीना आ रहा था…..खैर जाने दे मैं तो अपनी मस्ती में डूबी हुई नई-नई मिली आज़ादी के लज़्ज़त बारे मज़े से उठा ती हुई …मस्तानी अल्ल्हड़ चाल से चलती…. कूल्हे मटकाती हुई आई और…..पूरी बर्थ पर पसार कर बैठ गई….हाथ में मेरे सिड्नी शेल्डन का नया नोवेल था….एक पैर को उपर उठा कर जब मैने अपनी सैंडल उतरी तो सब ऐसे देख रहे थे….जैसे मेरी सैंडल चाट लेंगे या खा जाएँगे….

अपने गोरे नाज़ुक पैरो से मैने सैंडल उतरी….पैर की पतली उंगलिया जिसके नाख़ून गुलाबी रंग से रंगे थे को थोड़ा सा चटकाया….हाथो को उपर उठा कर सीना फूला कर साँस लिया जैसे कितनी तक गई हूँ और फिर नोवेल में अपने आप को डूबा लिया.

सुबह सुबह जब ट्रेन स्टेशन पर पहुचने वाली थी तो मैं जल्दी से उठी और गुसलखाने में अपने आप को थोड़ा सा फ्रेश किया आँखो पर पानी के छींटे मारे….थोड़ा सा मेक-उप किया….काजल लगाया …फिर वापस आकर अपने बैग को बाहर निकल कर संभालने लगी. ट्रेन रुकी खिड़की से बाहर भाई नज़र आ गया.

loading...

Leave a Reply