ससुरजी का प्यार – कंचन part 5

फिर भी वो यकीन करना चाहता था की बहु गहरी नींद में सो रही है।

उसने कन्चन को धीरे से पुकारा, “बहु! बहु! सो गयी क्या?”

कोई जबाब नहीं। अब रामलाल ने धीरे से कन्चन को हिलाया। अब भी बहु ने कोई हरकत नहीं की। रामलाल को यकीन हो गया कि नींद की गोली ने अपना काम कर दिया है। कन्चन आंखें बन्द किये पड़ी हुई थी। अब रामलाल की हिम्मत बढ़ गयी। वो बहु की कच्छी को उठा के सूघने लगा। बहु की कच्छी की गन्ध ने उसे मदहोश कर दिया। सारा दिन पहनी हुई कच्छी में चूत, पेशाब और शायद बहु की चूत के रस की मिली जुली खुश्बू थी। लौड़ा बुरी तरह से फनफनया हुआ था। रामलाल ने बहु की कच्छी को जी भर के चूमा और उसकी मादक गन्ध का आनंद लिया। अब रामलाल पेट के बल पड़ी हुई बहु के पैरों की तरफ़ आ गया। बहु की अल्हड़ जवानी अब उसके सामने थी। रामलाल ने धीरे धीरे बहु के पेटिकोट को ऊपर की ओर सरकना शुरु कर दिया। थोड़ी ही देर में पेटिकोट बहु की कमर तक ऊपर उठ चुका था। सामने का नज़ारा देख के रामलाल की आंखें फटी रह गयी। बहु कमर से नीचे बिल्कुल नंगी थी। आज तक उसने इतना खूबसूरत नज़ारा नहीं देखा था।

बहु के गोरे गोरे मोटे मोटे फैले हुए चूतड़ बाहर से आती हुई हल्की रोशनी में बहुत ही जान लेवा लग रहे थे। रामलाल अपनी ज़िन्दगी में कई औरतों को चोद चुका था लेकिन आज तक इतने सैक्सी नितम्ब किसी भी औरत के नहीं थे। रामलाल मन ही मन सोचने लगा की अगर ऐसी औरत उसे मिल जाए तो वो ज़िन्दगी भर उसकी गांड ही मारता रहे। लेकिन ऐसी किस्मत उसकी कहां? आज तक उसने किसी औरत की गांड नहीं मारी थी। मारने की तो बहुत कोशिश की थी लेकिन उसके गधे जैसे लंड को देख कर किसी औरत की हिम्मत ही नहीं हुई। पता नहीं बेटा बहु की गांड मारता है कि नहीं। उधर कन्चन का भी बुरा हाल था। उसने खेल तो शुरु कर दिया लेकिन अब उसे बहुत शरम आ रही थी और थोड़ा डर भी लग रहा था॥ हालांकि एक बार पहले वो ससुर जी को अपने नंगे बदन के दर्शन करा चुकी थी लेकिन उस वक्त ससुर जी बहुत दूर थे। आज तो ससुर जी अपने हाथों से उसे नंगी कर रहे थे। फैली हुई टांगों के बीच से चूत के घने बालों की झलक मिल रही थी। रामलाल ने बहुत ही हल्के से बहु के नंगे चूतड़ों पे हाथ फेरना शुरु कर दिया। कन्चन के दिल की धड़कन तेज़ होने लगी। रामलाल ने हल्के से एक उंगली कन्चन के चूतड़ों की दरार में फेर दी। लेकिन कन्चन जिस मुद्रा में लेटी हुई थी उस मुद्रा में उसकी गांड का छेद दोनों चूतड़ों के बीच बन्द था। आखिर कन्चन एक औरत थी।

एक मर्द का हाथ उसके नंगे चूतड़ों को सहला रहा था। अब उसकी चूत भी गीली होने लगी। अभी तक कन्चन अपनी दोनों टांगें सीधी लेकिन थोड़ी चौड़ी करके पेट के बल लेटी हुई थी॥ ससुर जी को अपनी चूत की झलक और अच्छी तरह देने के लिये अब उसने एक टांग मोड़ के ऊपर कर ली। ऐसा करने से अब कन्चन की चूत उसकी टांगों के बीच में से साफ़ नज़र आने लगी। बिल्कुल साफ़ तो नहीं कहेंगे, लेकिन जितनी साफ़ उस भीनी भीनी रोशनी में नज़र आ सकती थी उतनी साफ़ नज़र आ रही थी। गोरी गोरी मांसल जांघों के बीच घनी और लम्बी लम्बी झांटों से ढकी बहु की खूब फूली हुई चूत देख के रामलाल की लार टपकने लगी। हालांकि गांड का छेद अब भी नज़र नहीं आ रहा था। रामलाल ने नीचे झुक के अपना मुंह बहु की जांघों के बीच डाल दिया। बहु की झांटों के बाल उसकी नाक और होंठों को छू रहे थे। अब कुत्ते की तरह वो बहु की चूत सूघंने लगा। कन्चन की चूत काफ़ी गीली हो चुकी थी और अब उसमें से बहुत मादक खुश्बू आ रही थी। आज तक तो रामलाल बहु की पैंटी सूंघ कर ही काम चला रहा था लेकिन आज उसे पता चला की बहु की चूत की गन्ध में क्या जादू है। रामलाल को ये भी अच्छी तरह समझ आ गया कोई कुत्ता कुतिआ को चोदने से पहले उसकी चूत क्यों सूंघता है।

रामलाल ने हिम्मत करके हल्के से बहु की चूत को चूम लिया। कन्चन इस के लिये तैयार नहीं थी। जैसे ही रामलाल के होंठ उसकी चूत पे लगे वो हड़बड़ा गयी। रामलाल झट से चारपायी के नीचे छुप गया। कन्चन अब सीधी हो कर पीठ के बल लेट गयी लेकिन अपना पेटिकोट जो कि कमर तक उठ चुका था नीचे करने की कोई कोशिश नहीं की। रामलाल को लगा की बहु फिर सो गयी है तो वो फिर चारपायी के नीचे से बाहर निकला। बाहर निकल के जो नज़ारा उसके सामने था उसे देख के वो दंग रह गया। बहु अब पीठ के बल पड़ी हुई थी। पेटिकोट पेट तक ऊपर था ओर उसकी चूत बिल्कुल नंगी थी। रामलाल बहु की चूत देखता ही रहा गया। घने काले लम्बे लम्बे बालों से बहु की चूत पूरी तरह ढकी हुई थी। बाल उसकी नाभी से करीब तीन इन्च नीचे से ही शुरु हो जाते थे। रामलाल ने आज तक किसी औरत की चूत पे इतने लम्बे और घने बाल नहीं देखे थे। पूरा जंगल उगा रखा था बहु ने। ऐसा लग रहा था मानो ये घने बाल बुरी नज़रों से बहु की चूत की रक्षा कर रहे हों। अब रामलाल की हिम्मत नहीं हुई की वो बहु की चूत को सहला सके क्युंकि बहु पीठ के बल पड़ी हुई थी और अब अगर उसकी आंख खुली तो वो रामलाल को देख लेगी। बहु के होंठ थोड़े थोड़े खुले हुए थे। रामलाल बहु के उन गुलाबी होंठों को चूसना चाहता था लेकिन ऐसा कर पाना मुश्किल था। फिर अचानक रामलाल के दिमाग में एक प्लान आया। उसने बहु का पेटिकोट धीरे से नीचे करके उसकी नंगी चूत को ढक दिया। अब उसने अपना फनफनाता हुआ लौड़ा अपनी धोती से बाहर निकाला और धीरे से बहु के खुले हुए गुलाबी होंठों के बीच टिका दिया।

कन्चन को एक सेकेन्ड के लिये समझ नहीं आया की उसकी होंठों के बीच ये गरम गरम ससुर जी ने क्या रख दिया लेकिन अगले ही पल वो समझ गयी की उसके होंठों के बीच ससुर जी का तना हुआ लौड़ा है। मर्द के लंड का टेस्ट वो अच्छी तरह पहचानती थी। अपने देवर का लंड वो ना जाने कितनी बार चूस चुकी थी। वो एक बार फिर हड़बड़ा गयी लेकिन इस बार बहुत कोशिश करके वो बिना हिले आंखें बन्द किये पड़ी रही। ससुर जी के लंड के सुपाड़े से निकले हुए रस ने कन्चन के होंठों को गीला कर दिया। कन्चन के होंठ थोड़े और खुल गये। रामलाल ने देखा की बहु अब भी गहरी नींद में है तो उसकी हिम्मत और बढ़ गयी। बहु के होंठों की गर्मी से उसका लंड बहु के मुंह में घुसने को उतावला हो रहा था। रामलाल ने बहुत धीरे से बहु के होंठों पे अपने लंड का दबाव बढ़ाना शुरु किया। लेकिन लंड तो बहुत मोटा था। मुंह में लेने के लिये कन्चन को पूरा मुंह खोलना पड़ता। रामलाल ने अब अपना लंड बहु के होंठों पे रगड़ना शुरु कर दिया और साथ में उसके मुंह में भी घुसेड़ने की कोशिश करने लगा। रामलाल के लंड का सुपाड़ा बहु के थूक से गीला हो चुका था। कन्चन की चूत बुरी तरह गीली हो गयी थी। उसका अपने ऊपर कन्ट्रोल टूट रहा था। उसका दिल कर रहा था की मुंह खोल के ससुर जी के लंड का सुपाड़ा मुंह में लेले। अब नाटक खत्म करने का वक्त आ गया था।

कन्चन ने ऐसा नाटक किया जैसे उसकी नींद खुल रही हो। रामलाल तो इस के लिये तैयार था ही। उसने झट से लंड धोती में कर लिया। बहु का पेटिकोट तो पहले ही ठीक कर दिया था। कन्चन ने धीरे धीरे आंखें खोली और ससुर जी को देख कर हड़बड़ा के उठ के बैठने का नाटक किया। वो घबराते हुए अपने अस्त व्यस्त कपड़े ठीक करते हुए बोली, “पिताजी…अआप? यहां क्या कर रहे हैं?”

“घबराओ नहीं बेटी, हम तो देखने आए थे कि कहीं तुम्हारी तबियत और ज़्यादा तो खराब नहीं हो गयी। कैसा लग रहा है?” रामलाल बहु के माथे पे हाथ रखता हुआ बोला जैसे सचमुच बहु का बुखार चैक कर रहा हो।

कन्चन के ब्लाउज के तीन हुक खुले हुए थे। वो अपनी चूचिओं को ढकते हुए बोली,”जी। मैं अब बिल्कुल ठीक हूं। नींद की गोलिआं खा के अच्छी नींद आ गयी थी। लेकिन आप इतनी रात को…?”

“हां बेटी, बहु की तबियत खराब हो तो हमें नींद कैसे आती। सोचा देख लें तुम ठीक से सो तो रही हो।”

“सच पिता जी आप कितने अच्छे हैं। हम तो बहुत भाग्यशाली हैं जिसे इतने अच्छे सास और ससुर मिले।”

“ऐसा ना कहो बहु। तुम रोज़ हमारी इतनी सेवा करती हो तो क्या हम एक दिन भी तुम्हारी सेवा नहीं कर सकते? हमारी अपनी बेटी होती तो क्या हम ये सब नहीं करते” रामलाल प्यार से बहु की पीठ सहलाते हुए बोला। कन्चन मन ही मन हंसते हुए सोचने लगी, अपनी बेटी को भी आधी रात को नंगी करके उसके मुंह में लंड पेल देते?

“पिताजी हम बिल्कुल ठीक हैं। आप सो जाइये।”

“अच्छा बहु हम चलते हैं। आज तो तुमने कपड़े भी नहीं बदले। बहुत थक गयी होगी।”

“जी सिर में बहुत दर्द हो रहा था।”

“हम समझते हैं बहु। अरे ये क्या? तुम्हारी कच्छी और ब्रा नीचे ज़मीन पे पड़ी हुई है।” रामलाल ऐसे बोला जैसे उसकी नज़र बहु की कच्छी और ब्रा पर अभी पड़ी हो। रामलाल ने बहु की कच्छी और ब्रा उठा ली।

“जी हमें दे दीजिये।” कन्चन शर्माते हुए बोली।

“तुम आराम करो हम धोने डाल देंगे। लेकिन ऐसे अपनी कच्छी मत फ़ेंका करो। वो काला नाग सूंघता हुआ आ जाएगा तो क्या होगा? उस दिन तो तुम बच गयी नहीं तो टांगों के बीच में ज़रूर काट लेता।”

कन्चन ने मन ही मन कहा वो काला नाग काटे या ना काटे लेकिन ससुर जी की टांगों के बीच का काला नाग ज़रूर किसी दिन काट लेगा। रामलाल बहु की कच्छी और ब्रा ले के चला गया। कन्चन अच्छी तरह जानती थी कि उसकी कच्छी का क्या हाल होने वाला है। रामलाल बहु की कच्छी अपने कमरे में ले गया और उसकी मादक खुश्बू सूंघ के अपने लंड के सुपाड़े पे रख के रगड़ने लगा। हमेशा की तरह ढेर सारा वीर्य बहु की कच्छी में उड़ेल दिया और लंड कच्छी से पोंछ के उसे धोने में डाल दिया। कच्छी की दास्तान कन्चन को अगले दिन कपड़े धोते समय पता लग गयी।

कन्चन का प्लान तो सफ़ल हो गया और ससुर जी के इरादे भी बिल्कुल साफ़ हो गये थे लेकिन कन्चन अभी तक ससुर जी के लंड के दर्शन नहीं कर पायी थी।

एक दिन फिर से सासु मां को शहर जाना था। इस बार रामलाल ने फिर उन्हें अकेला ही भेज दिया। बीवी के जाने के बाद वो कन्चन से बोला, “बहु आज बदन में बहुत दर्द हो रहा है ज़रा कमला को बुला दो। बहुत अच्छी मालिश करती है। बदन का दर्द दूर कर देगी।”

ये सुन के कन्चन को जलन होने लगी। वो जानती थी कमला कैसी मालिश करेगी। कन्चन ने सोचा आज अच्छा मौका है। सासु मां भी नहीं है।

वो बोली, “क्यों पिताजी? घर में बहु के रहते आप किसी और को क्यों मालिश के लिये बुलाना चाहते हैं? आपने हमारी मालिश कहां देखी है? एक बार करवा के देखिये, कमला की मालिश भूल जाएंगे।”

“अरे नहीं बेटी, हम अपनी बहु से कैसे मालिश करवा सकते हैं?” रामलाल के मन में लड्डू फूटने लगे। वो सोच रहा था की ये तो सुनहरा मौका है। हाथ से नहीं जाने देना चाहिये।

“आप हमें बेटी बोल रहे हैं लेकिन शायद अपनी बेटी की तरह नहीं मानते? आपकी सेवा करके हमें बहुत खुशी मिलती है।”

“ऐसा ना कहो बहु। तुम बेटी के समान नहीं हमारी बेटी ही हो। तुम सचमुच बहुत अच्छी हो। लेकिन तुम्हारी सासु मां को पता चल गया तो वो मुझे मार डालेगी।”

“कैसे पता चलेगा पिताजी वो तो शाम तक आएगी। चलिये अब हम आपकी मालिश कर देते हैं। आपको भी तो पता चले की आपकी बहु कैसी मालिश करती है।”

“ठीक है बहु। लेकिन अपनी सासु मां को बताना नहीं।”

“नहीं बताएंगे पिताजी, आप बेफिक्र रहिये।”
रामलाल ने जल्दी से ज़मीन पे चटाई बिछा दी और धोती को छोड़ के सब कपड़े उतार के लेट गया। उसका दिल धक धक कर रहा था। कन्चन रामलाल के गठे हुए बदन को देखती ही रह गयी। वाकई में सच्चा मर्द था। चौड़ी छाती और उसपे घने काले बाल देख कर तो कन्चन के दिल पे छुरिआं चलने लगी। कन्चन ने रामलाल की टांगों की मालिश शुरु कर दी। साड़ी के पल्लु से उसने घूंघट भी कर रखा था। बहु के मुलायम हाथों का स्पर्श रामलाल को बहुत अच्छा लग रहा था। कन्चन ने पहले से ही प्लान बना रखा था। अचानक तेल की बोतल कन्चन की साड़ी पे गिर गयी।

“ऊफ हमारी साड़ी खराब हो गयी।”

“बहु साड़ी पहन के कोई मालिश करता है क्या। खराब कर ली ना अपनी साड़ी? चलो साड़ी उतार लो, फिर मालिश करना।”

“जी, मैं सलवार कमीज़ पहन के आती हूं।”

“अरे उसकी क्या ज़रूरत है? साड़ी उतार लो बस। सलवार पे तेल गिर गया तो सलवार उतारनी पड़ जाएगी। अगर सलवार उतारना मंज़ूर है तो ठीक है सलवार कमीज़ पहन आओ।”

“हाय सलवार कैसे उतारेंगे। सलवार उतारने से तो अच्छा है कि साड़ी ही उतार दूं, लेकिन आपके सामने साड़ी कैसे उतारुं? हमें तो शरम आती है।’

“शरम कैसी बहु? तुम तो हमारी बेटी के समान हो। और फिर हम तो तुम्हें पेटिकोट ब्लाउज में कई बार देख चुके हैं। अपने ससुर से कोई शर्माता है क्या?”

“ठीक है पिताजी। उतार देती हूं।” कन्चन ने बड़ी अदा के साथ अपनी साड़ी उतार दी। अब वो केवल पेटिकोट और ब्लाउज में थी। पेटिकोट उसने बहुत नीचा बांध रखा था। ब्लाउज भी सामने से लो-कट था। अचानक कन्चन कमरे से बाहर भागी.

“अरे क्या हुआ बहु कहां जा रही हो?” रामलाल ने पूछा।

“जी बस अभी आई। अपनी चुन्नी तो ले आऊं।” रामलाल तो बहु के ऊपर नीचे होते हुए नितम्बों को देख कर निहाल हो गया।

कन्चन थोड़ी देर में वापस आ गयी। अब उसने चुन्नी से घूंघट निकाल रखा था। लेकिन कमर पे बहुत नीचे बंधे पेटिकोट और लो-कट ब्लाउज में से उसकी जवानी बाहर निकल रही थी। कन्चन रामलाल के पास बैठ गयी और उसने फिर से रामलाल की टांगों की मालिश शुरु कर दी। इस वक्त कन्चन का सिर रामलाल के सिर की ओर था। मालिश करते हुए बहु इस प्रकार से झुकी हुई थी की लो-कट ब्लाउज में से उसकी बड़ी बड़ी झूलती हुई चूचिआं रामलाल को साफ़ दिखाई दे रही थी। मालिश करते हुए दोनों इधर उधर की बातें कर रहे थे। कन्चन को अच्छी तरह मालूम था की ससुर जी की नज़रें उसके ब्लाउज के अन्दर झांक रही हैं। आज तो कन्चन ने ठान लिया था कि ससुर जी को पूरी तरह तड़पा के ही छोड़ेगी। मर्दों को तड़पाने की कला में तो वो माहिर थी ही।

इतने में रामलाल ने बहु से पूछा, “बहु तुमने वो गाना सुना हई, चुन्री के नीचे क्या है? चोली के पीछे क्या है?”

“जी पिताजी सुना है। आपको अच्छा लगता है।?” कन्चन आगे झुकते हुए ससुर जी को अपनी गोरी गोरी चूचिओं के और भी ज़्यादा दर्शन कराती हुई बोली।

“हां बहु बहुत अच्छा लगता है।” कन्चन समझ रही थी की ससुर जी का इशारा किस ओर है। ससुर जी की जांघों तक मालिश करने के बाद कन्चन ने सोचा की अब ससुर जी को उसके नितम्बों के दर्शन कराने का वक्त आ गया है। कन्चन जानती थी की उसके नितम्ब मर्दों पर क्या असर करते हैं। उसने जांघों से नीचे की ओर मालिश करने के बहाने अब अपना मुंह ससुर जी के पैरों की ओर और अपने विशाल चूतड़ ससुर जी के मुंह की ओर कर दिये। मालिश करते हुए उसने अपने चूतड़ों बड़े ही मादक ढंग से पीछे की ओर उभार दिया। रामलाल के दिल पे तो मानो छुरी चल गयी। पेटिकोट के महीन कपड़े में से बहु की गुलाबी रंग की कच्छी झांक रही थी।

रामलाल बहु के विशाल चूतड़ों को ललचायी नज़रों से देखता हुआ बोला, “अरे बहु ऐसे मालिश करने में परेशानी होगी। हमारे ऊपर आ जाओ।”

“हाय राम आपके ऊपर कैसे आ सकते हैं?”

“अरे इसमें शर्माने की क्या बात है? अपनी एक टांग हमारे एक तरफ़ और दूसरी टांग दूसरी तरफ़ कर लो।”

“जी आपको परेशानी तो नहीं होगी?”

कन्चन रामलाल के ऊपर आ गयी। अब उसका एक घुटना ससुर जी के कमर के एक तरफ़ और दूसरा घुटना कमर के दूसरी तरफ़ था। पेटिकोट घुटनों तक ऊपर करना पड़ा। इस मुद्रा में कन्चन के विशाल चूतड़ रामलाल के मुंह के ठीक सामने थे। घुटनों से नीचे कन्चन के गोरे गोरे पैर नंगे थे। कन्चन रामलाल के पैरों की ओर मुंह करके उसकी जांघों से नीचे की ओर मालिश कर रही थी। रामलाल का मन कर रहा था की बहु के चूतड़ों के बीच मुंह दे दे। वो पेटिकोट के महीन कपड़े में से बहु के विशाल चूतड़ों पे सिमटती हुई कच्छी को देख रहा था।

“बहु तुम जितनी समझदार हो उतनी ही सुन्दर भी हो।”

“सच पिता जी? कहीं आप हमें खुश करने के लिये तो नहीं बोल रहे हैं।”

“तुम्हारी कसम बहु हम झूठ क्यों बोलेंगे? तभी तो हमनें तुम्हें एकदम राकेश के लिये पसन्द कर लिया था। शादी से पहले तुम्हारे पीछे बहुत लड़के चक्कर लगाते होंगे?”

“जी वो तो सभी लड़किओं के पीछे चक्कर लगाते हैं।”

“नहीं बहु सभी लड़किआं तुम्हारी तरह सेक्सी नहीं होती। बोलो, लड़कें बहुत तंग करते थे क्या?”

“हां पिता जी करते तो थे।”

“क्या करते थे बहु?”

“अब हम आपको वो सब कैसे बता सकते हैं?”

“अरे फिर से वही शर्माना। चलो बताओ। हमें ससुर नहीं, अपना दोस्त समझो।”

“जी सीटियां मारते थे। कभी कभी तो बहुत गन्दे गन्दे कमैन्ट भी देते थे। बहुत सी बातें तो हमें समझ ही नहीं आती थी।”

“क्या बोलते थे बहु?”

“उनकी गंदी बात हमें समझ नहीं आती थी। लेकिन इतना ज़रूर पता था की हमारी छातिओं और नितम्बों पे कमैन्ट देते थे। कैसे खराब होते हैं लड़के। घर में मां बहन नहीं होती क्या?”

“और क्या क्या करते थे?”

“जी, क्लास में भी लड़कें जान बूझ के अपनी पेन्सिल हमारे पैरों के पास फेंक देते थे और उसे उठाने के बहाने हमारी स्किर्ट के अन्दर टांगों के बीच में झान्कने की कोशिश करते थे। स्कूल की ड्रेस स्किर्ट थी नहीं तो हम सलवार कमीज़ ही पहन के स्कूल जाते। लड़कें लोग होते ही बहुत खराब हैं।”

“नहीं बहु लड़कें खराब नहीं होते। वो तो बेचारे तुम्हारी जवानी से परेशान रहते होंगे।”

“लेकिन किसी लड़की पे गंदे गंदे कमैन्ट देना और उसकी टांगों के बीच में झांकना तो बदतमीज़ी होती है ना पिताजी?”

“इसमें बदतमीज़ी की क्या बात है बहु। बचपन से ही हर मर्द के मन में औरत की टांगों के बीच में झान्कने की इच्छा होती है और जब वो बड़ा हो जाता है तब तो औरत की टांगों के बीच में पहुंचना ही उसका लक्ष्य बन जाता है।”

“हाय! ये भी क्या लक्ष्य हुआ? मर्द लोग तो होते ही ऐसे हैं।”

“लेकिन बहु लड़कियां भी तो कम नहीं होती। देखो ना आज कल तो शहर की ज्यादातर लड़कियां शादी से पहले ही अपना सब कुछ दे देती हैं। तुम भी तो शहर की हो बहु।”

“अच्छा पिता जी! क्या मतलब आपका? हम वैसे नहीं हैं। इतने लड़कें हमारे पीछे पड़े थे, यहां तक कि कई मास्टर जी लोग भी हमारे पीछे पड़े थे, लेकिन हमने तो शादी से पहले ऐसा वैसा कुछ नहीं किया।”

“सच बहु? यकीन नहीं होता की इतनी सेक्सी लड़की को लड़कों ने कुंवारा छोड़ दिया होगा।”

“हमने किसी लड़कें को आज तक हाथ भी नहीं लगाने दिया।”

“आज तक? बेचारा राकेश अभी तक कुन्वारा ही है। सुहाग रात को भी हाथ नहीं लगाने दिया?” रामलाल हंसता हुआ बोला।

“हां…पिता जी आप तो बहुत खराब हैं। सुहाग रात को तो पति का हक बनता है। उन्हें थोड़े ही हम मना कर सकते हैं।” कन्चन बड़े ही मादक ढंग से अपने चूतड़ों को रामलाल के मुंह की ओर उचकाती हुई बोली। रामलाल कन्चन के चूतड़ों से सिमट कर उनके बीच की दरार में जाती हुई कच्छी को देख देख कर पागल हो रहा था।

“बहु एक बात कहुं? तुम शादी के बाद से बहुत ही खूबसूरत हो गयी हो।”

“पिता जी आप तो ऐसे बोल रहे हैं जैसे शादी से पहले हम बद्सूरत थे।”

“अरे नहीं बहु शादी से पहले भी तुम बहुत सन्दर थी लेकिन शादी के बाद से तो तुम्हारी जवानी और भी निखर आई है। हर लड़की की जवानी में शादी के बाद एकदम निखार आ जाता है।”

“ऐसा क्यों पिताजी?” कन्चन ने भोलेपन से पूछ.

“बहु, शादी से पहले लड़की एक कच्ची कली होती है। कली को फूल बनाने का काम तो मर्द ही कर सकता है ना। सुहाग रात को लड़की एक कच्ची कली से फूल बन जाती है। जैसे कली में फूल बनके निखार आ जाता है वैसे ही लड़की की जवानी में शादी के बाद निखार आने लगता है।”

“ऐसा क्या निखार आया हमारी जवानी में? हम तो पहले भी ऐसे ही थे।”

“बहु तुम्हारी जवानी में क्या निखार आया वो हमसे पूछो। तुम्हारा बदन एकदम भर गया है। कपड़े भी टाईट होने लगे हैं। देखो ये नितम्ब कैसे फैल गये हैं।” रामलाल कन्चन के दोनों चूतड़ों पे हाथ फेरता हुआ बोला।

“तुम्हारी ये कच्छी भी कितनी छोटी हो गयी है। करीब करीब पूरे ही नितम्ब इस कच्छी के बाहर हैं। शादी से पहले तो ऐसा नहीं था ना?”

आखिर कन्चन का प्लान सफ़ल होने लगा था। रामलाल का हाथ उसके उचके हुए चूतड़ों को सहला रहा था। कभी कभी रामलाल उसकी पैंटी लाईन पे हाथ फेरता। कन्चन को बहुत मज़ा आ रहा था।

रामलाल फिर बोला, “बहु लगता है तुम्हें ये गुलाबी रंग की कच्छी बहुत पसन्द है?”

“हाय! पिताजी आपको कैसे पता हमने कौन से रंग की कच्छी पहनी है?”

“बहु तुम्हारे नितम्ब हैं ही इतने चौड़े की उनके ऊपर कसे हुए पेटिकोट में से कच्छी भी नज़र आ रही है।”

“हाय राम! पिताजी हमें सलवार कमीज़ पहनने दीजिये। हमें शरम आ रही है।”

“अरे बहु शरम कैसी तुम तो हमारी बेटी के समान हो।” रामलाल कन्चन की कच्छी पे हाथ फेरता हुआ बोला। कन्चन भी रामलाल की टांगों पे मालिश करने का नाटक कर रही थी। रामलाल बहु के विशाल नितम्बों को दबाता हुआ बोला, “बहु तुम राजेश का ख्याल तो रखती हो ना?”

“जी आप बेफिकर रहिये हम उनका बहुत ख्याल रखते हैं। जब हम आपका इतना ख्याल कर सकते हैं तो क्या उनका नहीं करेंगे? उन्हें हमसे कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।”

“शाबाश बहु हमें तुमसे यही उम्मीद थी। लेकिन हमारा मतलब था की इस लाजवाब जवानी को बेकार तो नहीं कर रही हो। राजेश को खुश तो रखती हो। वो जो कुछ चाहता है उसे देती हो ना।”

“जी वो जो चाहते हैं हम उन्हें देते हैं। जैसा खाना पसन्द है वैसा ही बनाते हैं।” कन्चन रामलाल का मतलब अच्छी तरह समझ रही थी लेकिन अन्जान बनने का नाटक कर रही थी।

“बहु, तुम तो बहुत भोली हो। हम खाने पीने की बात नहीं कर रहे। खाने पीने के इलावा भी मर्द की ज़रूरतें होती हैं जिंहें अगर बीवी पूरा ना करे तो मर्द दूसरी औरतों के पास जाने लगता है। उसे अपनी जवानी रोज़ देती हो कि नहीं?”

कन्चन शर्माने का नाटक करती हुई बोली, “पिताजी आप ये कैसी बातें कर रहे हैं? हमें तो बहुत शरम आ रही है।”

“अपने ससुर से क्या शर्माना बहु? हमारी बहु खुश है या नहीं ये जानना हमारा फर्ज़ है। बोलो है या नहीं?”

“जी है।”

“तो फिर बताओ उसे रोज़ देती हो या नहीं?” रामलाल का हाथ अब फिसल कर कन्चन के चूतड़ों की दरार में आ गया था। वो उसके चूतड़ों की दरार में हाथ फेरता हुआ बोला “बोलो बहु शर्माओ नहीं।”

“ज्ज्ज…जी, वो जब चाहते हैं ले लेते हैं। हम कभी मना नहीं करते।”

“वो जब चाहता है तब लेता है। तुम अपने आप कभी नहीं देती हो?”

“हुम तो औरत हैं। पहल करना तो मर्द का काम होता है।” कन्चन ने मन ही मन सोचा की रामलाल ने कितने सफ़ाई से लेने देने की बातें शुरु कर दी थी और अब तो उसके चूतड़ों की दरार में भी हाथ फेर रहा था। सचमुच ससुर जी काफ़ी मंझे हुए खिलाड़ी थे।

रामलाल बोल रहा था,”बहु तुम इतनी सेक्सी हो। वो नालायक तो तुम्हारी रोज़ लेता होगा?”

“पिता जी प्लीज़…! आप ये सब क्यों पूछ रहे हैं? हुमें तो बहुत शरम आ रही है।”

“अभी हमनें कहा था की हमारा बेटा और बहु खुश हैं या नहीं ये जानना हमारा फ़र्ज़ है। जबाब दो। रोज़ लेता तो है ना तुम्हारी?”

“नहीं पिताजी ऐसी कोई बात नहीं है। उन्हें तो फुर्सत ही नहीं मिलती। ओफ़िस से थक के आते हैं और जल्दी ही सो जाते हैं। महीने में मुश्किल से एक दो बार ही…..हमें तो लगता है की शायद हम इतने सैक्सी हैं ही नहीं कि हम उन्हें रिझा सकें।”

“कैसी बातें करती हो बहु? तुम तो इतनी सन्दर ओर सेक्सी हो कि तुम्हें कपड़ों में देख कर भी किसी बाल ब्रह्मचारी का लंड खड़ा हो जाए और अगर नंगी हो जाओ तब तो भगवान भी अपने पे काबू नहीं कर सकते।” पहली बार रामलाल ने कन्चन के सामने लंड जैसे शब्द का इस्तेमाल किया। चूतड़ों की दरार में हाथ रगड़ने और रामलाल के मुंह से इस तरह की बातें सुन के कन्चन की चूत गीली होने लगी थी।

वो शर्माने का नाटक करते हुए बोली, “हाय! पिताजी आप अपनी बहु के सामने ये कैसे गन्दे शब्द बोल रहे हैं? हमें तो बहुत शरम आ रही है। प्लीज़ अब हमें जाने दीजिये ना।”

रामलाल दोनों हाथों से कन्चन के विशाल चूतड़ों को दबाता हुआ बोला, “अरे बहु इसमें शर्माने की क्या बात है। अब मर्द के लंड को लंड नहीं तो और क्या कहें? बोलो तुम्हारे पास लंड के लिये कोई और शब्द है तो बताओ।”

कन्चन शर्माने का नाटक करती हुई चुप रही।

“अरे बहु बोलो! चुप क्यों हो?”

“जी हमें नहीं पता। हमनें भी लड़कों के मुंह से ये ही शब्द सुना है।”

“तो फिर लंड को लंड कहने में शरम कैसी? लेकिन बहु महीने में सिर्फ़ एक दो बार से तुम्हारा काम चल जाता है? तुम्हारी इस जवानी को तो रोज़ मर्द की ज़रूरत है।”

“अब हम कर भी क्या सकते हैं?”

“उसे तुम्हारी पसन्द तो है न?”

“जी, हमें क्या पता?”

“ये बात तो हर औरत को पता होनी चाहिये। वैसे कुछ मर्दों को वो औरतें पसन्द होती हैं जिनकी बहुत फूली हुई होती है। तुम्हारी कैसी है बहु?” रामलाल मज़े लेता हुआ बोला।

“जी हमें क्या पता?”

“बहु तुम्हें कुछ पता भी है? चलो हम ही पता कर लेते हैं हमारी बहु रानी की कैसी है।” ये कहते हुए रामलाल ने कन्चन के चूतड़ों के बीच हाथ डाल कर पेटिकोट के ऊपर से ही उसकी फूली हुई चूत को अपनी मुट्टी में भर लिया। बाप रे क्या फूली हुई चूत थी बहु की।

ये कहते हुए रामलाल ने कन्चन के चूतड़ों के बीच हाथ डाल कर पेटिकोट के ऊपर से ही उसकी फूली हुई चूत को अपनी मुट्टी में भर लिया। बाप रे क्या फूली हुई चूत थी बहु की।

“ऊइइइइइइइइई…….इइस्स्स…। पिता जी !आआआह……. प्लीज़! ये आप क्या कर रहे हैं? छोड़िये ना….। हम आपकी बहु हैं।” लेकिन कन्चन ने अपनी चूत छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की। बल्कि अपनी टांगें इस प्रकार से चौड़ी कर ली और चूतड़ ऊपर की ओर उचका दिये कि उसकी चूत रामलाल के हाथ में ठीक तरह से समा जाए। कन्चन के पूरे बदन में वासना की लहर दौड़ रही थी।

“क्या छोड़ू बहु?”

“वही जो आपने पकड़ रखी है। प्लीईइइइइज……छोड़िये ना आह आह……”

“हमनें क्या पकड़ रखी है? बता दो तो छोड़ देंगे।”

“वही जो औरतों की टांगों के बीच में होती है।”

“क्या होती है बहु?”

“ऊफ! पिताजी आप तो बड़े वो हैं! छोड़िये ना हमारी…प्लीज़…आह”

“जब तक बताओगी नहीं कि क्या छोड़ें तब तक हमें कैसे पता चलेगा की क्या छोड़ना है?”

“हाय राम! हमें सचमुच नहीं पता उसे क्या कहते हैं। आप ही बता दीजिये।”

“बहु तुम इतनी भी भोली नहीं हो। चलो हम ही बता देते हैं। इसे चूत कहते हैं।”

“ठीक है हमारी….हमारी..च..चूत छोड़ दीजिये प्लीज़…हम आपकी बहु हैं।”

“हां, अब हुई ना बात बहु। ’चूत’ बोलने में इतना शर्माती हो, कहीं चूत देने में भी तो इतना नहीं शर्माती? तभी बेचारा राकेश तुम्हारी ले नहीं पाता होगा।” रामलाल कन्चन की चूत मुट्ठी में मसलता हुआ बोला।

“इस्स्स्स्स्स……… क्या कर रहे हैं? प्लीज़ छोड़िये ना हमारी…”

“पहले बताओ, चूत देने में भी इतना शर्माती हो?”

“नहीं, पहले आप हमारी छोड़िये। फिर बताऊंगी।”

“फिर वही बात। हमारी छोड़िये, हमारी छोड़िये कर रही हो। आखिर क्या छोड़ें?”

“ऊफ पिता जी आप तो बहुत ही खराब हैं। प्लीज़ हमारी चूत छोड़ दिजिये। हम तो आपकी बेटी के समान हैं।”

“ठीक है बहु ये लो छोड़ देते हैं।” जैसे ही रामलाल ने कन्चन की चूत को आज़ाद किया वो रामलाल के ऊपर से उठ कर साईड में बैठ गयी।

“पिताजी आप तो बड़े खराब हैं। अपनी बहु के साथ ऐसा करता है कोई? अब हम आपकी मालिश साईड में बैठ कर ही करेंगे।”

“अरे बहु की चूत पकड़ना मना है क्या? ठीक है साईड में बैठ के मालिश कर दो। लेकिन बहु तुम्हारी चूत तो बहुत फूली हुई है। मर्द तो ऐसी ही चूत के लिये तरसते हैं। अब बताओ, अपनी इस प्यारी चूत को देने में तो शरम नहीं करती हो।”

“जी, देने में किस बात की शरम? वैसे भी जब वो लेते हैं तो लाईट बन्द होती है। उन्हें कैसे पता चलेगा की हमारी कैसी है?”

“शबाश बहु चूत देने में कोई शरम नहीं करनी चाहिये। लेकिन वो नालायक लाईट बन्द करके चोदता है तुम्हें? तुम जैसी सन्दर और सेक्सी औरत को तो नंगी देखने के लिये भगवान भी तड़प जाए। औरत को चोदने का मज़ा तो उसे पूरी तरह नंगी करके ही आता है। और उसकी नंगी जवानी का रस पान करने के लिये लाईट जला के चोदना तो ज़रूरी है।” कन्चन ने नोटिस किया की रामलाल ने अब ‘लेने देने’ की जगह ‘चोदने’ जैसा शब्द बोलना शुरु कर दिया था।

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