ससुरजी का प्यार – कंचन part 4

एक दिन की बात है। कन्चन नहाने जा रही थी, लेकिन बाथरूम का बल्ब खराब हो गया था। कन्चन सिर्फ़ ब्लाउज और पेटिकोट में ही थी। कन्चन ने एक कुर्सी पे चढ़ कर बल्ब बदलने की कोशिश की लेकिन कुर्सी की टांगें हिल रही थी और कन्चन को गिरने का डर था। उसने सास को आवाज़ दी। दो तीन बार पुकारा लेकिन सासु मां शायद पूजा कर रही थी। उसे कन्चन की आवाज़ सुनाई नहीं दी। रामलाल आंगन में अखबार पढ़ रहा था। बहु की आवाज़ सुन कर वो बाथरूम में गया। वहां का नज़ारा देख के तो उसका कलेजा धक रह गया। बहु सिर्फ़ पेटीकोट और ब्लाउज में कुर्सी पे खड़ी हुई थी और उसके हाथ में बल्ब था। पेटिकोट नाभी से करीब आठ इन्च नीचे बन्धा हुआ था। बहु की गोरी कमर और मांसल पेट पूरा नज़र आ रहा था। कन्चन ससुर जी को सामने देख कर हड़बड़ा गयी और एक हाथ से अपनी छतियों को ढकने की नाकामयाब कोशिश करने लगी।

हकलाती हुई बोली, “पिताजी। आप….!”

“हां बेटी तुम सासु मां को आवाज़ें दे रही थी। वो तो पूजा कर रही है इसलिये मैं ही आ गया। बोलो क्या काम है?” रामलाल कन्चन की जवानी को ललचायी नज़रों से देखता हुआ बोला।

“जी बल्ब खराब हो गया है। लगाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन कुर्सी हिल रही है। सासु मां को बुला रही थी की अगर वो मुझे पकड़ लें तो मैं बल्ब बदल सकूं।” कन्चन का एक हाथ अब भी अपनी छातिओं को छुपाने की कोशिश कर रहा था।

“कोई बात नहीं बहु मैं तुम्हें पकड़ लेता हूं।”

“जी आप?”

“घबराओ नहीं गिराऊंगा नहीं।” ये कहते हुए रामलाल ने कुर्सी के ऊपर खड़ी कन्चन की जांघों को पीछे से अपनी बाहों में जकड़ लिया। कन्चन के भारी नितम्ब रामलाल के मुंह से सिर्फ़ दो इन्च ही दूर थे। रामलाल को पेटिकोट में से कन्चन की गुलाबी रंग की पैंटी की झलक मिल रही थी। उफ! ८० % चूतड़ तो पैंटी के बाहर थे। कन्चन के विशाल चूतड़ रामलाल के मुंह के इतने नज़दीक थे कि उसका दिल कर रहा था, कि उन विशाल चूतड़ों के बीच में मुंह डाल दे।

कन्चन बुरी तरह से शर्मा गयी लेकिन क्या करती? जल्दी से बल्ब लगाने की कोशिश करने लगी। बल्ब लगाने के लिये उसे हाथ छाती पर से हटाना पड़ा। रामलाल के दिल पे तो जैसे छुरी चल गयी। बहु की बड़ी बड़ी चूचिआं ब्लाउज से बाहर गिरने को हो रही थी। पेटिकोट इतना नीचे बंधा हुआ था की बहु के नितम्ब वहीं से शुरु हो जाते थे। कुर्सी अब भी हिल रहा थी। रामलाल ने इस सुनहरे मौके का पूरा फायदा उठाया। उसने अपने पैर से कुर्सी को और हिला दिया।

बहु गिरने को हुई तो रामलाल ने उसकी जांघों को अपनी ओर खींच कर और अच्छी तरह जकड़ लिया। जांघों को अपनी ओर खींचने से कन्चन के चूतड़ पीछे की ओर हो गये और रामलाल का मुंह बहु के विशाल चूतड़ों के बीच की दरार में घुस गया। ऊफ क्या मादक खुश्बू थी बहु के बदन की। करीब १० सेकंड तक रामलाल ने अपना मुंह बहु के चूतड़ों की दरार में दबा के रखा। पेटिकोट पैंटी समैत बहु के चूतड़ों के बीच फंस गया। कन्चन ने किसी तरह जल्दी से बल्ब लगाया।

“पिताजी बल्ब लग गया।”

“ठीक है बहु।” ये कहते हुए रामलाल ने एकदम से उसकी टांगें छोड़ दी। जैसे ही रामलाल ने कन्चन की टांगें छोड़ी कन्चन का बेलैन्स बिगड़ गया और वो आगे की ओर गिरने लगी। रामलाल ने एकदम पीछे से हाथ डाल कर उसे गिरने से बचा लिया। लेकिन उसका हाथ सीधा कन्चन की बड़ी बड़ी चूचिओं पे पड़ा। अब कन्चन की दोनों चूचिआं रामलाल के हाथों में थी। रामलाल ने उसे चूचिओं से पकड़ के अपनी ओर खींच लिया। अब सीन ये था की रामलाल पीछे से बहु से चिपका हुआ था। बहु के विशाल चूतड़ रामलाल के सख्त होते हुए लंड से सटे हुए थे और बहु की दोनों चूचिआं रामलाल के हाथों में दबी हुई थी। ये सब तीन सेकेन्ड में हो गया।

“अरे बहु मैं ना पकड़ता तो तुम तो गिर जाती। ना जाने कितनी चोट लगती। ऐसे काम तुम्हें खुद नहीं करने चाहिये। हमें कह दिया होता। आगे से ऐसा नहीं करना” रामलाल बहु की चूचिओं पर से हाथ हटाता हुआ बोला।

“जी पिताजी। आगे से ऐसा नहीं करुंगी।”

रामलाल जल्दी से बाहर चला गया क्युंकि अब उसका लंड तन गया था और बहु को नज़र आ जाता। लेकिन कन्चन भी अनाड़ी नहीं थी। उसे अच्छी तरह पता था की ससुर जी ने मौके का पूरा फायदा उठाया था। उसकी जांघों को जिस तरह से उन्होनें पकड़ा था वैसे एक ससुर अपनी बहु की टांगें नहीं पकड़ता। उसके चूतड़ों के बीच में मुंह देना, और फिर उसे गिरने से बचाने के बहाने दोनों चूचिआं दबा देना कोई इत्तेफ़ाक नहीं था। और फिर उसे गिरने से बचाने के बाद उसके चूतड़ों के साथ ऐसे चिपक के खड़े थे कि कन्चन को उनका लंड अपने चूतड़ों पर रगड़ता हुआ महसूस हो रहा था। ससुरजी जल्दी से बाहर तो चले गये लेकिन उनकी धोती का उठाव कन्चन से नहीं छुपा था। वो समझ गयी की ससुर जी का लंड तना हुआ था। कन्चन नहाने के लिये बाथरूम में चली गयी। लेकिन उसके चूतड़ों के बीच ससुरजी के मुंह का स्पर्श और उसकी चूचिओं पे उनके हाथ का स्पर्श उसे अभी तक महसूस हो रहा था। उसकी चूत गीली होने लगी और पहली बार उसने ससुर जी के नाम से अपनी चूत में उंगली डाल कर अपनी वासना की भूख को शान्त करने की कोशिश की।

अब तो कन्चन ने भी ससुर जी को रिझाने का प्लान बनना शुरु कर दिया। एक बार फिर सासु मां को ससुर जी के साथ शहर जाना था। इस बार रामलाल ने पहले ही किसी को गाड़ी के लिये बोल दिया था। उसने इस बार भी माया देवी को किसी के साथ गाड़ी में शहर भेज दिया। माया देवी के जाने के बाद वो कन्चन से बोला कि वो खेतों में जा रहा है और शाम तक आयेगा। रामलाल के जाने के बाद कन्चन ने घर का दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लिया और कपड़े धोने और नहाने की तैयारी करने लगी। उधर रामलाल थोड़ी दूर जा के वापस आ गया। उसका इरादा फिर पहले की तरह अपने कमरे में साईड के दरवाज़े से घुस कर बहु को देखने का था। वो सोच रहा था कि अगर किस्मत ने साथ दिया तो बहु को नंगी देख पायेगा। कन्चन किसी काम से छत पे गयी। अचानक जब उसने नीचे झांका तो उसकी नज़र चुपके से अपने कमरे का ताला खोलते हुए रामलाल पे पड़ गयी। कन्चन समझ गयी कि रामलाल चुपचाप अपने कमरे में क्यों घुस रहा है। अब तो कन्चन ने सोच लिया कि आज वो जी भर के ससुर जी को तड़पाएगी। मर्दों को तड़पाने में तो वो बचपन से माहिर थी। वो नीचे आ कर अपने कमरे में गयी लेकिन कमरे का दरवाज़ा खुला छोड़ दिया। उधर रामलाल अपने कमरे में से बहु के कमरे में झांक रहा था। कन्चन शीशे के सामने खड़ी हो कर अपनी साड़ी उतारने लगी। उसकी पीठ रामलाल की ओर थी। रामलाल सोच रहा था कि बहु कितनी अदा के साथ साड़ी उतार रही है जैसे कोई मर्द सामने बैठा हो और उसे रिझाने के लिये साड़ी उतार रही हो।

उसे क्या पता था कि बहु उसी को रिझाने के लिये इतने नखरों के साथ साड़ी उतार रही थी। धीरे धीरे बहु ने साड़ी उतार दी। अब वो सिर्फ़ पेटिकोट और ब्लाउज में ही थी। कन्चन पेटिकोट और ब्लाउज में ही आंगन में आ गयी। उसे मालूम था की ससुर जी की नज़रें उस पर लगी हुई हैं। सफ़ेद पेटिकोट के महीन कपड़े में से बहु की काली रंग की कच्छी साफ़ नज़र आ रही थी। खास कर जब बहु चलती तो बारी बारी से उसके मटकते हुए चूतड़ों पे पेटिकोट टाईट हो जाता और कच्छी की झलक भी और ज़्यादा साफ़ हो जाती। रामलाल का लौड़ा हरकत करने लगा था। बहु आंगन में बैठ के कपड़े धोने लगी। पानी से उसका ब्लाउज गीला हो गया था और रामलाल को अन्दर से झांकती हुई ब्रा भी नज़र आ रही थी। थोड़ी देर बाद बहु अपने कमरे में गयी और फिर शीशे के सामने खड़े हो के अपनी जवानी को निहारने लगी। अचानक बहु ने अपना ब्लाउज उतार दिया। वो अब भी शीशे के सामने खड़ी थी और उसकी पीठ रामलाल की ओर थी। फिर धीरे से बहु का हाथ पेटिकोट के नाड़े पे गया। रामलाल का तो कलेजा ही मुंह को आ गया। वो मनाने लगा – हे भगवान बहु पेटिकोट भी उतार दे। भगवान ने मानो उसकी सुन ली। बहु ने पेटिकोट का नाड़ा खींच दिया और अगले ही पल पेटिकोट बहु के पैरों में पड़ा हुआ था। अब बहु सिर्फ़ कच्छी और ब्रा में खड़ी अपने आप को शीशे में निहार रही थी। क्या तराशा हुआ बदन था।

भगवान ने बहु को बड़ी फुर्सत से बनया था। बहु की ब्रा बड़ी मुश्किल से उसकी चूचिओं को सम्भाले हुए थी और उसके विशाल चूतड़! छोटी सी काली कच्छी बहु के उन विशाल चूतड़ों को सम्भालने में बिल्कुल भी कामयाब नहीं थी। ८०% चूतड़ कच्छी के बाहर थे। शीशे में अपने को निहारते हुए बहु ने दोनों हाथ सिर के ऊपर उठा दिये और बाहों के नीचे बगलों में उगे हुए बालों का निरीक्षण करने लगी। बाल बहुत ही घने और काले थे। रामलाल सोच रहा था की शायद बहु को बगलों में से बाल साफ़ करने का टाईम नहीं मिला था वर्ना शहर की लड़कियां तो बगलों के बाल साफ़ करती हैं। अगर बगलों में इतने घने बाल थे तो चूत पे कितने घने बाल होंगे। इतने में बहु ने झाड़ू उठा ली और कमरे में झाड़ू लगाने लगी। उसकी पीठ अब भी रामलाल की ओर थी। कन्चन अच्छी तरह जानती थी इस वक्त रामलाल पे क्या बीत रही होगी।

झाड़ू लगाने के बहाने वो आगे को झुकी और अपने विशाल चूतड़ों को बहुत ही मादक तरीके से पीछे की ओर उठा दिया। कन्चन जानती थी की उसके चूतड़ मर्दों पे किस तरह कहर ढाते हैं। रामलाल का कलेजा मुंह में आ गया। उसकी आखें तो मानो बाहर गिरने को हो रही थी। जिस तरह से कन्चन आगे झुकी हुई थी और उसके चूतड़ पीछे की ओर उठे हुए होने के कारण दोनों चूतड़ ऐसे फैल गये थे कि उनके बीच में कम से कम तीन इंच का फासला हो गया था। ऐसा लग रहा था जैसे दोनों चूतड़ बहु की छोटी सी कच्छी को निगलने के लिये तैयार हो। रामलाल को कोई शक नहीं था कि जैसे ही बहु सीधी होगी उसके विशाल चूतड़ उस बेचारी छोटी सी कच्छी को निगल जाएंगे। कन्चन भी जानती थी कि जब वो सीधी होगी तो उसकी पैंटी का क्या हाल होगा। वही हुआ। बहु झाड़ू लगाते लगाते सीधी हुई और उसके विशाल चूतड़ों ने भूखे शेरों की तरह उसकी कच्छी को दबोच लिया। अब कच्छी उसके दोनों चूतड़ों के बीच में फंसी हुई थी। रामलाल का लंड फनफनाने लगा। कन्चन ये झाड़ू लगाने का खेल थोड़ी देर तक खेलती रही। बार बार सीधी हो जाती। धीरे धीरे उसकी पैंटी चूतड़ों पे से सिमट के उनके बीच की दरार में फंस गयी।

कन्चन जानती थी की इस वक्त ससुर जी पे क्या बीत रही होगी। लेकिन अभी तो खेल शुरु ही हुआ था। कन्चन फिर से शीशे के सामने खड़ी हो गयी। शीशे में अपने खूबसूरत बदन को निहारते हुए बड़ी अदा के साथ उसने चूतड़ों के बीच फंसी पैंटी को निकाल के ठीक से स्थापित किया। फिर उसने धुला हुआ पेटिकोट और ब्लाउज निकाला। अब कन्चन शीशे के सामने खड़ी हो गयी और अपनी ब्रा उतार दी। उसकी पीठ रामलाल की ओर थी। ब्रा उतारने के बाद उसने बड़ी अदा के साथ अपनी पैंटी भी उतार दी। अब वो शीशे के सामने बिल्कुल नंगी खड़ी थी। रामलाल के तो पसीने ही छूट गये। बहु को इस तरह नंगी देख कर उसके मुंह में पानी आ रहा था। क्या जानलेवा बदन था बहु का। रामलाल मना रहा था कि बहु घूम जाए तो उसकी चूचिओं और चूत के भी दर्शन हो जाएं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अब बहु अचानक आगे की ओर झुकी मानो ज़मीन पे पड़ी हुई किसी चीज़ को उठाने की कोशिश कर रही हो। ऐसा करने से उसके चूतड़ पीछे की ओर उठ गये और बहु की गोरी गोरी जांघों और चूतड़ों के बीच से झांटों के काले काले बाल झांकने लगे। कन्चन फिर से सीधी हुई और रामलाल की ओर पीठ करे हुए ही ब्लाउज पहना और फिर पेटीकोट पहन लिया। रामलाल जानता था कि बहु ने ब्लाउज के नीचे ब्रा और पेटिकोट के नीचे कच्छी नहीं पहनी है। अब कन्चन उतारे हुए कपड़े ले कर आंगन में धोने आ गयी। बिना कच्छी के बहु के चूतड़ चलते वक्त ज़्यादा हिल रहे थे। कपड़े धोते हुए उसका ब्लाउज गीला हो गया। अन्दर से ब्रा ना पहना होने के कारण रामलाल को बहु की बड़ी बड़ी चूचिआं और निप्पल साफ़ नज़र आ रहे थे।

बहु पैर मोड़ के बैठी थी। पेटिकोट उसकी मुड़ी हुई टांगों के बीच में फंसा हुआ था। रामलाल मना रहा था कि किसी तरह पेटिकोट का निचला हिस्सा बहु की टांगों से निकल जाए। रामलाल को बहुत इन्तज़ार नहीं करना पड़ा। कन्चन का भी वही इरादा था। इस कला में तो वो बहुत माहिर थी। एक बार पहले भी अपने देवर के साथ ऐसा ही कुछ कर चुकी थी। कपड़े धोते धोते उसने पेटिकोट का निचला हिस्सा अपनी मुड़ी हुई टांगों से छूट के गिरने दिया। कन्चन उसी प्रकार कपड़े धोने बैठी हुई थी जैसे औरतें पेशाब करने बैठती हैं। कन्चन को मालूम था की अब उसकी नंगी चूत पूरी तरह फैली हुई थी। क्युंकि कमला ने उसकी चूत के छेद के आस पास के बाल काट दिये थे, इसलिये अब तो उसकी फूली हुई चूत की दोनों फांकें, उनके बीच का कटाव और कटाव के बीच में से चूत के बड़े बड़े होंठ साफ़ नज़र आ रहे थे। रामलाल को तो मानो लकवा मार गया। उसे डर था की कहीं उसके दिल की धड़कन रुक ना जाए। लेकिन अगले ही पल कन्चन ने पेटिकोट फिर से ठीक कर लिया। रामलाल को उसकी चूत के दर्शन मुश्किल से तीन सेकेन्ड के लिये ही हुए। गोरी गोरी मांसल जांघों के बीच में घना जंगल और उस जंगल में से झांकती फूली हुई वो चूत ! क्या गज़ब का नज़ारा था। बहु की चूत के होंठ ऐसे खुले हुए थे मानो बरसों से प्यासे हों। ऊफ क्या लम्बी घनी झांटें थी बहु की। कपड़े धोने का नाटक करते हुए कन्चन ने ब्लाउज और पेटिकोट खूब गीला कर लिया था। भीगा हुए ब्लाउज और पेटिकोट कन्चन के बदन से चिपका जा रहा था। कन्चन काफ़ी देर तक ससुरजी को इसी तरह तड़पाती रही।

इस घटना के बाद ना जाने रामलाल ने बहु की चूत की याद में कितनी बार मुठ मारी। सिर्फ़ एक बार बहु की चूत लेने के लिये तो वो जान भी देने को तैयार था। लेकिन क्या करता बेचारा। रिश्ता ही कुछ ऐसा था। रामलाल की दीवानगी बढ़ती जा रही थी। कन्चन रामलाल के दिल की हालत अच्छी तरह जानती थी। आखिर मर्दों को तड़पाने का खेल तो वो बचपन से खेल रही थी। एक रात की बात है। सासु मां अपने कमरे में सो रही थी और रामलाल भी अपने कमरे में लाईट बन्द करके सोने की कोशिश कर रहा था। इतने में उसे कुछ आवाज़ आई। कमरे से बाहर झांका तो देखा कि बहु बाथरूम की ओर जा रही थी। बहु ने नाईटी पहन रखी थी और नाईटी के बारीक कपड़े में से उसकी मांसल टांगों की झलक मिल रही थी। रामलाल समझ गया कि बहु पेशाब करने जा रही थी। बहु की चूत से निकलते पेशाब के मादक संगीत की कल्पना से ही रामलाल का लंड खड़ा होने लगा। कन्चन बाथरूम में गयी लेकिन सबको सोया समझ कर उसने बाथरूम का दरवाज़ा अन्दर से बन्द नहीं किया। थोड़ी देर में ’प्स्स्स्स्स्स्स………..’ का मधुर संगीत रामलाल के कानों में पड़ने लगा।

अचानक ज़ोर से बहु के चिल्लाने की आवाज़ आई। “आअआ आआअआ आआअआ इइइइई इइइइइइइइइई इइइइइइइइइइइइ” रामलाल घबड़ा के बाथरुम में भागा। उसने देखा बहु बुरी तरह घबड़ायी हुई थी। उसके चेहरे पे हवाईयां उड़ रही थी। बहुत ही अच्छा मौका था। रामलाल ने मौके का पूरा फायदा उठाते हुए बहु को खींच के सीने से लगा लिया। कन्चन तो बुरी तरह घबड़ायी हुई थी। वो भी रामलाल के बदन से चिपक गयी।

रामलाल कन्चन की पीठ सहलता हुआ बोला, “क्या हुआ बहु?”

“ज्ज्ज्जी… स्स्सांप। सांप” कन्चन नाली की ओर इशारा करते हुए बोली।

“वहां तो कुछ नहीं है।” रामलाल बहु की पीठ सहलता हुआ बोला। बहु ने ब्रा नहीं पहनी हुई थी।

“नहीं पिता जी नाली में से काले रंग का एक लम्बा मोटा सांप निकला था। शायद नाग था।”

“कैसे निकला बहु? तुम क्या कर रही थी?” रामलाल का हाथ बहु की पीठ से फिसल कर उसके मोटे मोटे चूतड़ों पे आ गया।

“हम वहां नाली पे बैठ के पेशाब कर रहे थे कि अचानक वो मोटा काला नाग निकल आया। हे राम कितना डरावना था। हमारी तो जान ही निकल गयी।”

बहु को दिलासा देने के बहाने रामलाल उसके विशाल चूतड़ों को सहलाने लगा। अचानक उसे एहसास हुआ कि बहु ने कच्छी भी नहीं पहनी हुई थी। नाईटी के अन्दर से बहु की नंगी जवानी रामलाल के बदन को गरमा रही थी।

“अरे बहु तुमने आज अन्दर से ब्रा और कच्छी नहीं पहनी है?” कन्चन को भी अचानक एहसास हुआ कि वो ससुर जी से चिपकी हुई है और ससुर जी काफ़ी देर से उसकी पीठ और चूतड़ों को सहला रहे हैं।

वो शर्माती हुई बोली, “जी सारा दिन बदन कसा रहता है ना, इसलिये रात को सोने से पहले हम ब्रा और कच्छी को उतार के सोते हैं।”

“तुम ठीक करती हो बहु। सारा दिन तो तुम्हारी जवानी ब्रा और कच्छी में कसी रहती है। रात में तो उसे आज़ादी चाहिये।” नाली के पास ही एक बाल्टी में बहु की ब्रा और कच्छी धोने के लिये पड़ी हुई थी। रामलाल उनकी ओर इशारा करते हुए बोला, “वही हैं ना तुम्हारे कपड़े?”

“जी।”

“हुम…. अब समझा ये नाग यहां क्यों आया था।” रामलाल बहु की कच्छी उठता हुआ बोला।

“क्यों आया था पिताजी ?” कन्चन रामलाल के हाथ में अपनी उतारी हुई पैंटी देख के बुरी तरह शर्मा गयी। रामलाल बहु के सामने ही उसकी पैंटी को सूंघता हुआ बोला।

“अरे बहु इस कच्छी में से तुम्हारे बदन की खुश्बू आ रही है। उस काले नाग को तुम्हारे बदन की ये खुश्बू पसन्द आ गयी होगी। जब तुम पेशाब करने के लिये पैर फैला के बैठी तो वही खुश्बू नाग को फिर से आई। इसिलिये वो एकदम से बाहर निकल आया।” रामलाल बहु के मादक चूतड़ों को सहलाता हुआ बोला।

“ठीक है पिताजी आगे से हम अपने कपड़े बाथरूम में नहीं रखेंगे।”

“हां बहु ये तो शुक्र करो नाग ने तुम्हें टांगों के बीच में नहीं काट लिया, नहीं तो बेचारे राकेश का क्या होता?” रामलाल बहु के चूतड़ दबाता हुआ बोला।

“हाय! पिताजी आप तो बहुत खराब हैं। हम ऐसे ही थोड़े ही काटने देते।”

“तो फिर कैसे काटने देती बहु?”रामलाल को कच्छी में चिपके हुए बहु की झांटों के दो बाल नज़र आ गये।

“ये बाल तुम्हारे हैं बहु?”

कन्चन का चेहरा सुर्ख लाल हो गया। वो हकलाती हुई बोली, “ज्ज्ज्जी”

“बहुत लम्बे हैं। हम तो तुम्हारे सिर के बाल देख कर ही समझ गये थे कि बाकी जगह के बाल भी खूब लम्बे होंगे।” अब तो कन्चन का रामलाल से आंख मिला पाना मुश्किल हो रहा था। ससुर जी की बाहों से अपने आप को छुड़ा के बोली, “म्म्म्म। पिताजी हमें बहुत नींद आ रही है अब हम सोने जा रहे हैं।” कन्चन जल्दी से अपने कमरे में भाग गयी। वो सोच रही थी कि आज दूसरी बार ससुर जी ने मौके का पूरा फायदा उठाया और वो कुछ ना कर सकी।

उधर रामलाल अपने बिस्तर पे करवट बदल रहा था। वो बहु के सोने का इन्तज़ार कर रहा था ताकि बाथरूम में जा के उसकी कच्छी को सूंघ के उसकी मादक चूत की महक ले सके। जैसे ही कन्चन के कमरे की लाईट बन्द हुई रामलाल बाथरूम की ओर चल पड़ा। बाथरूम में घुस कर बहु की कच्छी को सूंघते सूंघते उसका लंड बुरी तरह खड़ा हो गया। रामलाल बहु की नाज़ुक कच्छी को अपने लंड के सुपाड़े पे रख के रगड़ने लगा। काफ़ी देर तक रगड़ने के बाद वो झड़ गया और उसके लंड ने ढेर सारा वीर्य बहु की कच्छी में उड़ेल दिया। रामलाल कच्छी को वहीं धोने के कपड़ों में डाल कर वापिस अपने कमरे में आ कर सो गया। अगले दिन जब कन्चन ने धोने के लिये अपनी पैंटी उठाई तो वीर्य के दाग लगे हुए देख कर समझ गयी कि ससुर जी ने रात को अपना लंड उसकी पैंटी पे रगड़ा है। अब तो कन्चन के मन में ससुर जी के इरादों के बारे में कोई शक नहीं रह गया था। लेकिन वो जानती थी की शायद ससुर जी पहल नहीं करेंगे। उन्हें बढ़ावा देना पड़ेगा। अब तो वो भी ससुर जी के लंड के दर्शन करने के लिये तड़प रही थी।

जब से रामलाल को पता लगा था की बहु रात को सोते वक्त ब्रा और पैंटी उतार के सोती है तब से वो इस चक्कर में रहता था की किसी तरह बहु के नंगे बदन के दर्शन हो जाएं। इसी चक्कर में रामलाल एक दिन सवेरे जल्दी उठ कर बहु को चाय देने के बहाने उसके कमरे में घुस गया। कन्चन बेखबर घोड़े बेच कर सो रही थी। वो पेट के बल पड़ी हुई थी और उसकी नाईटी जांघों तक उठी हुई थी। बहु की गोरी गोरी मोटी मांसल जांघें देख के रामलाल का लंड फनफनाने लगा। उसका दिल कर रहा था कि नाईटी को ऊपर खिस्का के बहु के विशाल मादक चूतड़ों के दर्शन कर ले, लेकिन इतनी हिम्मत नहीं जुटा पया।

रामलाल ने चाय टेबल पे रखी और फिर बहु के विशाल चूतड़ों को हिलाते हुए बोला, “बहु उठो, चाय पी लो।”

कन्चन हड़बड़ा के उठी। गहरी नींद से इस तरह हड़बड़ा के उठ कर बैठते हुए कन्चन की नाईटी बिल्कुल ही ऊपर तक सरक गयी और इससे पहले कि वो अपनी नाईटी ठीक करे, एक सेकेंड के लिये रामलाल को कन्चन की गोरी गोरी मांसल जांघों के बीच में से घने बालों से ढकी हुई चूत की एक झलक मिल गयी।

“अरे पिताजी आप?”

“हां बहु हमने सोचा रोज़ बहु हमें चाय पिलाती है तो आज क्यों ना हम बहु को चाय पिलाएं।”

“पिताजी आपने क्यों तकलीफ़ की। हम उठ के चाय बना लेते।” मन ही मन कन्चन जानती थी ससुर जी ने इतनी तकलीफ़ क्यों की। पता नहीं ससुर जी कितनी देर से उसकी जवानी का अपनी आंखों से रसपान कर रहे थे।

“अरे इसमें तकलीफ़ की क्या बात है। तुम चाय पी लो।” ये कह कर रामलाल चला गया।

कन्चन ने नोटिस किया की ससुर जी का लंड खड़ा हुआ था जिसको छुपाते हुए वो बाहर चले गये। कन्चन के दिमाग में एक प्लान आया। वो देखना चाहती थी की अगर ससुर जी को इस तरह का मौका मिल जाए तो वो किस हद तक जा सकते हैं। उस रात कन्चन ने सिर दर्द का बहाना किया और ससुर जी से सिर दर्द की दवा मांगी।

“पिता जी हमारे सिर में बहुत दर्द हो रहा है। सिर दर्द और नींद की गोली भी दे दीजिये।”

“हां बहु सिर दर्द के साथ तुम दो नींद की दो गोली ले लो ताकि रात में परेशानी ना हो।” कन्चन समझ गयी की ससुरजी नींद की दो गोली खाने के लिये क्यों कह रहे हैं। उसका प्लान सफ़ल होता नज़र आ रहा था। उसे पूरा विश्वास था की आज रात ससुर जी उसके कमरे में ज़रूर आएंगे। रात को सोने से पहले ससुर जी ने अपने हाथों से कन्चन को सिर दर्द और नींद की दो गोलिआं दी।

कन्चन गोलिआं ले कर अपने कमरे में आयी और गोलिओं को तो बाथरूम में फैंक दिया। ससुर जी को यह दिखाने के लिये कि वो सिर दर्द से बहुत परेशान और थकी हुई हई, कन्चन ने साड़ी उतार के पास पड़ी कुर्सी पे फैंक दी। फिर उसने अपनी पैंटी और ब्रा उतारी और बिस्तर के पास ज़मीन पर फैंक दी। ब्लाउज के सामने वाले तीन हुक्स में से दो हुक खोल दिये। अब तो उसकी बड़ी बड़ी चूचिआं ब्लाउज में सिर्फ़ एक ही हुक के कारण कैद थी। कन्चन का आज नाईटी के बजाये ब्लाउज और पेटिकोट में ही सोने का इरादा था ताकी ससुर जी को ऐसा लगे कि सिर दर्द और नींद के कारण उसने नाईटी भी नहीं पहनी। आज तो उसने अपने कमरे के बाहर की लाईट भी बन्द नहीं की ताकी थोड़ी रौशनी अन्दर आती रहे और ससुर जी उसकी जवानी को देख सकें। पूरी तयारी करके कन्चन ने अपने बाल भी खोल लिये और बिस्तर पर बहुत मादक ढंग से लेट गयी। वो पेट के बल लेटी हुई थी और उसने पेटिकोट इतना ऊपर चढ़ा लिया कि अब वो उसके चूतड़ों से दो इंच ही नीचे था। कन्चन की गोरी गोरी मांसल जांघें और टांगें पूरी तरह से नंगी थी।

ससुर जी के स्वागत की पूरी तैयारी हो चुकी थी। रात भी काफ़ी हो चुकी थी और कन्चन बड़ी बेसब्री से ससुर जी के आने का इन्त्ज़ार कर रही थी। वो सोच रही थी की ससुर जी उसको गहरी नींद में समझ कर क्या क्या करेंगे। रात को करीब एक बजे के आस पास कन्चन को अपने कमरे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। उसकी सांसें तेज़ हो गयी। थोड़ा थोड़ा डर भी लग रहा था।

ससुर जी दबे पाओं कमरे में घुसे और सामने का नज़ारा देख के उनका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा। बहु इतनी थकी हुई और नींद में थी कि उसने नाईटी तक नहीं पहनी। पेट के बल पड़ी हुई बहु के चूतड़ों का उभार बहुत ही जान लेवा था। बाहर से आती हुई भीनी भीनी रोशनी में जांघों तक उठा हुआ पेटिकोट बहु की नंगी टांगों को बहुत ही मादक बना रहा था। बहु ऐसे टांगें फैला के पड़ी हुई थी कि थोड़ा सा पेटिकोट और ऊपर सरक जाता तो बहु की लाजवाब चूत के दर्शन हो जाते जिसकी झलक रामलाल पहले भी देख चुका था। आज मौका था जी भर के बहु की चूत के दर्शन करने का। रामलाल मन ही मन मना रहा था कि कहीं बहु कच्छी पहन के ना सो गयी हो। तभी उसकी नज़र बिस्तर के पास ज़मीन पे पड़ी हुई कच्छी और ब्रा पे पड़ गयी। रामलाल का लंड बुरी तरह से खड़ा हो गया था। रामलाल सोच रहा था कि बेचारी बहु इतनी नींद में थी कि कच्छी और ब्रा भी ज़मीन पे ही फेंक दिये। अब तो उसे यकीन था कि बहु पेटिकोट और ब्लाउज के नीचे बिकुल नंगी थी। सारा दिन ब्रा और कच्छी में कसी हुई जवानी को बहु ने रात को आज़ाद कर दिया था। और आज रात रामलाल बहु की आज़ाद जवानी के दर्शन करने का इरादा कर के आया था। फिर भी वो यकीन करना चाहता था की बहु गहरी नींद में सो रही है।

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