यादों के झरोखे से part 4

“हाय हाय इसका मतलब तूने उस कच्ची कली को आज ढंग से चोद दिया उसकी नाज़ुक सी चूत का कबाड़ा कर दिया,पता नहीं क्या हाल होगा उस बेचारी का,चल नीचे तेरे भी दवा लगातीं हूँ और उसकी चूत को भी देखती हूँ और खबरदार जो दोबारा कभी उसकी चूत की तरफ निगाह उठा कर भी देखा” दीदी ने बड़े चिंतित होकर कहा

दीदी मुझे लेकर नीचे आ गयीं और आयशा को इशारे से बुला कर हम दोनों को कमरे में ले गयीं।
आयशा के चेहरे से ही पता चल रहा था कि डर से उसकी गांड फट रही है , वह डरते डरते आ कर चुपचाप कमरे में खड़ी हो गयी।
“सुन मुन्ना,तू यहीं कमरे में रह कर ज़रा आँगन की तरफ निगाह रखना। कोई अगर इधर आता दिखे तो मुझे इशारा कर देना और तू आयशा की बच्ची,तू मेरे साथ बाथरूम में चल” दीदी के चेहरे पर बराबर गुस्सा था।
उन्होंने बाथरूम में आयशा की स्कर्ट ऊपर करके चड्डी उतार दी और नहाने के स्टूल पर बैठा कर उसकी टाँगे फैला दीं। “हाय हाय,कैसी बेदर्दी से चुदी है सूज़ के पकोड़ा हो गयी तेरी चूत। कुतिया अभी तुझे जुम्मा जुम्मा चार दिन हुए M C शुरू हुए और तेरी चूत लंड पिलवाने को मचलने लगी। हरामजादी बता कब से चूत में उंगली कर रही थी। वो तो अल्लाह का शुकर था की लंड इस नासपीटे का था तो तू अपने पैरों पे चल के आ भी गयी ,कहीं किसी भरे पूरे जवान से चुदती तो मर भी चुकी होती और जब तुझे उंगली की लत लग ही चुकी थी तो बजाय उंगली के लंड क्यूं पिलवाया। बोल चुप क्यूं है,बोलती क्यूं नहीं देख कितना खून निकल रहा है अभी तक” दीदी उसकी चूत सेवलोन से साफ़ करके ऑइंटमेंट लगातीं गुर्राई।

“वो दीदी मैंने तो इससे उंगली के लिए ही कहा था लेकिन इसने मेरी चूचियां मसलते मसलते एकदम से अपना लंड मेरी चूत में घुसेड़ दिया,मैंने लंड से चोदने को बहुत मना किया लेकिन इसने मुझे कस के दबोच लिया था और पूरा चोद के ही इसने मुझे छोड़ा।” आयशा ने धीरे धीरे सारी बात बताई

“नहीं दीदी,सच्ची मुझे तो कुछ पता भी नहीं था,वो इसी ने मुझे सब समझाया था की चूत वाले छेद में लंड को घुसेड़ कर आगे पीछे करने को चोदना कहते है और इसमे बड़ा मज़ा आता है। इसी ने मेरे लंड की खाल अपनी मुठ्ठी में आगे पीछे करके मुझे पहली बार उस दिन मज़ा दिलाया था।” मैंने बेधड़क अपनी सफाई दी

“मैं सब समझ रही हूँ,मैंने इस कुतिया को कई बार भाभीयों और अब्बू के कमरे की रात में ताक झाँक करते देखा है। तब तो मैं ना समझ पाई लेकिन अब सब समझ गयी कि ये क्या देखती थी,पता नहीं चुदासी ही पैदा हुई थी क्या ? अम्मी के पेट से ही अपनी चूत के लिए एक लंड क्यों ना साथ लेती आयी” दीदी अभी भी आयशा पर गुर्रा रहीं थीं

लेकिन पता नहीं क्या बात थी वह बराबर मेरा बचाव करते हुए सारी गलती आयशा की ही बता रहीं थी। जबकि आयशा बिलकुल सही कह रही थी कि वो तो मुझसे सिर्फ उंगली करवा कर ही मज़ा लेना चाह रही थी,वो तो मेरे ऊपर ही चुदाई का इतना नशा सवार था की बिना उसे कोई मौका दिए मैंने उसकी कच्ची चूत में अपना लंड ठांस दिया था और बिना उसके रोने चिल्लाने की परवाह किये पूरा चोदने के बाद ही छोड़ा था।

“दीदी,शमां दीदी इधर ही आ रहीं हैं” मैंने दीदी को आगाह करते बताया। दीदी आयशा को चड्डी थमाते हुए तुरंत बाथरूम से बाहर आ गयीं और आँगन की तरफ चल दीं।
तभी शमां दीदी ने आकर कहा,”दीदी,ज़रा मेरे साथ बाज़ार चलो ना,कुछ सामान लेना है ”
“तू इस मुन्ना को लेजा,मुन्ना!ज़रा शमां के साथ बाज़ार चला जा तब तक मैं यहां के काम निपटा लेती हूँ ” दीदी मुझसे इशारा करते हुए बोलीं

“ठीक है दीदी” मैं कपडे बदल कर शमां दीदी के साथ बाज़ार की तरफ चल दिया। रास्ते में शमां दीदी मुझसे बोलीं,”मैं तो तुझे अभी बच्चा ही समझ रही थी लेकिन तू तो अब लगता है जवान हो गया है”

“क्या मतलब” मैंने चौंकते हुए कहा,मैंने सोचा कि क्या आयशा को चुदते इन्होने भी देख लिया।

“अहा,अब तुझे मतलब भी बताना पड़ेगा ? रात को मैं दीदी के बाज़ू वाली चारपाई पर ही सो रही थी ” शमां दीदी अपने होठों पर बड़ी रहस्यमयी मुस्कान लाते बोलीं,” अच्छा ये बता,किस किस के संग और कितने बार अब तक कर चुका है”

“आप क्या बात कर रहीं हैं मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा” मैंने सब कुछ जानते हुए भी अनजान बन कर कहा। उस वक़्त मेरी हालत बड़ी पतली हो रही थी।

“आय हाय,कैसा भोला बन रहा है जैसे कुछ जानता ही नहीं है,रात को तू और दीदी जो कर रहे थे ना,मैं सब समझ रही थी। भले ही कमरे में अँधेरा था लेकिन मुझे सब पता चल रहा था” शमां दीदी वैसे ही मुस्कराते बोलीं

“वो तो कल दिन में दीदी बहुत थक गयीं थीं ना सो मैं उनके हाथ पैर दबा रहा था” मैंने सिटपिटाते बहाना बनाया

“वाह वाह,हाथ पैर या कुछ और दबा रहे थे और कमरे में जो चुकर चुकर चूसने जैसी आवाजें आ रहीं थी वो क्या थीं,रात के अँधेरे में तुम दोनों लोलीपॉप चूस रहे थे क्या ? और फिर भच्च भच्च की आवाजें कैसी थीं,मुझे बेबकूफ समझ रखा है क्या? ”

मैं चुप रहा क्योंकि उनकी इस बात का मेरे पास कोई ज़बाब नहीं था। तभी दुकान आ गयी और मैंने अल्लाह का शुक्रिया अदा किया कि चलो जान बची।
दुकान में अन्दर एक 55 – 60 साल के लगभग का दुबला पतला सा आदमी काउंटर के पीछे चश्मा लगाये बैठा था। उसने हम लोगों को दुकान में चढ़ते देख अपना चश्मा ठीक करते हुएकहा,”आइये आइये,क्या दिखाऊ बहन जी”

अपनी पोती की उमर की लड़की को बहन बुलाते देख मुझे बड़ा अजीब लगा परन्तु दीदी ने कोई नोटिस नहीं लिया। वो बोली,”ज़रा चौंतीस नंबर की ब्रा दिखाइए चचा”
“चौंतीस ? नहीं नहीं बहनजी मेरी मानों तो आप बत्तीस नंबर की ब्रा लो” बुड्ढे ने अपना चश्मा ठीक करके दीदी की चुचियों का कुर्ते के ऊपर से ही जायजा लेते हुए कहा

“नहीं नहीं चचा,चौंतीस ही दिखाओ बत्तीस नंबर थोडा टाइट होता है” दीदी बोलीं
उस बुड्ढे से दीदी को पूरी तरह खुल के बात करते देख मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा था परन्तु मैं चुपचाप खड़ा सिर्फ सुनता रहा।

“अरे बहन जी,मेरी बात मानों बत्तीस ही लो। ज़ब तक बच्चे पैदा ना हो जायें लेडीज को एक नंबर कम ही पहनना चाहिए नहीं तो उनका सीना लटक के ढीला ढाला बेडोल हो जाता है।तुम अगर चाहो तो उधर अन्दर ट्राई करके देख लो,अगर ज्यादा टाइट लगे तो मत लेना वैसे मेरी नज़र धोखा नहीं खा सकती,तुम्हारे इस खूबसूरत सीने के लिए बत्तीस बिलकुल फिट रहेगी” बुड्ढा अपने पान से सने लाल लाल दांत निकालते बोला

“ठीक है,लाओ एक बत्तीस नंबर की ब्रा दो। मैं अन्दर ट्राई करती हूँ।” दीदी बिलकुल बेपरवाह होकर बात करते बोलीं

बुड्ढे ने एक बत्तीस नंबर की ब्रा निकाल कर दीदी को पकड़ा दी। दीदी अन्दर वाले छोटे से कमरे कम गोदाम में चेक करने घुस गयीं। आज मुझे पता चला था कि लेडीज स्टोर में ज्यादातर मर्द ही क्यूं होते हैं। साले बिना चोदे ही हर लौंडिया का पूरा मज़ा लेते रहते हैं। तभी अन्दर से दीदी की आवाज आयी,”कैसी ब्रा दे दी,इसका हुक ही नहीं लग रहा है”

“नहीं नहीं बहन जी,ब्रा तो बिलकुल आपके सामने ही नई निकाल के दी थी,शायद अभी नया होने की वजह से हुक टाइट होगा। मैं देखता हूँ” कह कर बुड्ढा अन्दर को बड़ी फुर्ती से लपका। मैं भी बुड्ढे के पीछे लपकता बोला,”लाओ मैं देखता हूँ ”

“नहीं नहीं बेटा! ये बच्चों का काम नहीं है। मुझी को देखना होगा,तुम ज़रा मेरे काउंटर पर निगाह रखना,अन्दर मैं सब संभाल लूँगा” बुड्ढा मुझे पीछे धकेलता हुआ बोला।

लेकिन मैं बुड्ढे के पीछे पीछे दरवाजे में जाकर खड़ा हो गया। अन्दर का सीन देख कर मेरा लंड अपना सिर उठाने लगा। अन्दर दीदी कुरता उतारे एक बड़े से शीशे के सामने अपनी ब्रा का हुक लगाने की कोशिश कर रहीं थी,उनकी पीठ दरवाजे की तरफ थी लेकिन शीशे में उनके फ्रंट का सीन बिलकुल क्लियर नज़र आ रहा था। ब्लैक कलर की ब्रा में उनकी दूधिया बड़ी बड़ी चूचियां बाहर को निकलीं पड़ रहीं थी और वह अपने दोनों हाथो को पीछे किये हुक लगाने की नाकाम कोशिश कर रहीं थीं और इसी चक्कर में उनकी चूचियां कुछ और बाहर को उठ गईं थीं।

“अरे बहन जी! ब्रा कोई ऐसे थोड़े ही पहनी जाती है,इसको बिना बांहों में डाले पहले हुक आगे करके लगाया जाता है फिर हुक पीछे करके इसकी स्ट्रेप्स को बांहों में चढ़ाया जाता है। अगर आप कहें तो मैं कुछ मदद करूं” बुड्ढा अपने होठों पर जीभ फिराते बोला।
वह ललचाई निगाहों से दीदी की चूचियों को निहार रहा था। यह सब देख कर मुझे उस बुड्ढे पर बहुत ताव आ रहा था।

तभी मेरे सिर पर मानों बम फट गया। “नहीं नहीं,मैं करती हूँ ” कहकर दीदी ब्रा उतार कर बुड्ढे के बताये तरीके से पहनने लगीं। कहने को दीदी की पीठ हम लोगों की तरफ थी लेकिन जैसा कि मैंने बताया था,सामने के शीशे में दीदी की चूचियां पूरी तौर से साफ़ साफ़ नुमाया हो रहीं थीं। उनकी दूधिया चूचियो पर एक रुपये के नये सिक्के के बराबर गोल हलके नारंगी घेरे में उठे हुए निप्पलों को देख कर मेरा लंड गनगना उठा। मेरी इच्छा हो रही थी की बीच से इस बुड्ढे को हटा कर मैं दीदी की इन मस्त चूचियों को अपने हाथों में लेकर कस कस के मसलूं। बुड्ढा भी लुंगी के ऊपर से ही अपने लंड को मसलते हुए बड़े गौर से इस नज़ारे का मज़ा ले रहा था। तभी दीदी ब्रा पहन कर हमारी तरफ घूमीं और बोलीं,”ये देखिये थोड़ी टाइट होने के साथ साथ छोटी भी लग रही है,मेरे ये तो पूरे ढँक भी नहीं पा रहे हैं”

“माशाअल्लाह,वाह वाह क्या लग रहीं हैं आप बहन जी और फिर ब्रा से कहीं चूचियों को ढंका थोड़े ही जाता है। वह तो सिर्फ उनको सपोर्ट देने के लिए होती है” बुड्ढा अब पूरी बेशर्मी से दीदी से खुल कर बात कर रहा था साथ ही साथ अपने लंड को भी मसलता जा रहा था। दीदी शायद हम दोनों की इस हालत से वाकिफ़ हो गयीं थीं सो उन्होंने बुड्ढे से कहा,”चलिए ठीक है परन्तु बत्तीस की सी कप वाली ब्रा ज़रा जल्दी दिखा दीजिये,ये तो बी कप वाली है ”

“ठीक है बहन जी परन्तु आप इसको तो उतारिये” बुड्ढा शायद दीदी की चूचियों को एक बार फिर से नंगा देखना चाह रहा था

“आप तब तक ब्रा निकालिए,मैं चेंज करके बाहर आती हूँ” दीदी बुड्ढे को टरकाते हुए बोलीं

बुड्ढा मुंह बनाता काउंटर की तरफ चला गया लेकिन मैं अपनी जगह पर ही डटा बराबर दीदी को ही देख रहा था। दीदी ने ब्रा उतार कर एक तरफ रख दी और मेरी तरफ देख कर मुस्कराते हुए अपनी ब्रा उठा कर उसकी स्ट्रेप्स सीधीं करने लगीं। वो मेरे सामने अपनी चूचियों को खोले बड़े आराम से बिना किसी ज़ल्दबाजी के ब्रा पहन रहीं थीं । उनकी निगाह मेरी जींस के उठे हुए हिस्से पर ही टिकी थी। उन्होंने मंद मंद मुस्कराते हुए ब्रा और कुरता पहना और मेरे से हलके से रगड़ते हुए काउंटर पर आ गयीं।

मैं जैसे नींद से जागा और उनके पीछे पीछे मैं भी काउंटर पर आ गया। इस वक़्त मेरी हालत बहुत खराब हो रही थी,दिल कर रहा था कि दीदी को वहीं पीछे वाले कमरे में ले जाकर ढंग से उनकी चूचियों को मसलते हुए उनकी चूत में अपना लंड पेल दूं। लेकिन शायद यह संभव नहीं था सो मैं चुपचाप दीदी के पीछे खड़ा उनके बड़े बड़े खरबूजों जैसे चूतड़ों को देखता हुआ अपना लंड मसलता रहा।

“ये कैसी जालीदार ब्रा दिखा रहे हो,होज़री में नहीं है क्या ?” दीदी ने बुड्ढे से कहा

“बहनजी! ये आपको मैं बिलकुल लेटेस्ट फैशन की दिखा रहा हूँ। आपकी नाज़ुक चूचियों के लिए नेट से बढ़िया और कुछ नहीं होगा” बुड्ढा बराबर अपना लंड सहलाता बोला

“नहीं नहीं,मुझे आप हौज़री में ही दिखाइए ” दीदी ने नेट वाली ब्रा एक तरफ हटाते हुए कहा

“ठीक है,जैसी आपकी मर्ज़ी” कह कर बुड्ढे ने होज़री की ब्रा दिखानी शुरू कर दीं। दीदी ने उसमे से दो ब्लैक कलर की ब्रा लेकर पेमेंट कर दिया और फिर हम दोनों दुकान से निकल कर घर की तरफ चल दिए। रस्ते में दीदी ने मुस्कराते पूछा,”कैसी लग रही थी मैं ?”

“बड़ी मस्त लग रहीं थीं आप” अनजाने में ही मेरे मुंह से निकल गया

“वो तो मैं तेरी इस फूली जींस को देख के ही समझ गयी थी” कहकर दीदी खिलखिला कर हंस दीं।
मैं झेंप कर अपनी जींस की जेब में हाथ डाल कर पूरे रास्ते अपने टाइट लंड को छुपाने की कोशिश करता रहा लेकिन मेरी आँखों के आगे दीदी की नंगी चूचियों के नाचते नज़ारे के कारण मैं कामयाब नहीं हो पा रहा था। उसके बाद हम दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला और हम लोग घर आ गए लेकिन दीदी की आँखों से बराबर एक शरारत सी झलक रही थी,शायद उन्हें मेरी इस हालत पर बहुत मज़ा आ रहा था।

घर पहुँच कर शबनम दीदी ने मुझे बताया की आयशा की चूत की बहुत बुरी हालत है लेकिन उन्होंने उसे फिलहाल एक कप दूध में हल्दी डाल के पिला दी है जिससे उसे जल्दी ही आराम मिल जायेगा साथ ही मुझे सख्त हिदायत दी कि मैं आयशा की तरफ आँख उठा कर भी न देखूं। अगर ज्यादा ही चुदाई की तबियत हो तो सीधा उन्ही से बात करूं। कोई देसी दवाई उन्होंने मेरे लंड पर भी लगा दी थी जिससे उसकी भी जलन बिल्कुल शांत हो चुकी थी। मैं उनकी हर बात में हामी भरता रहा लेकिन मुझे आयशा की चूत में जो मजा आया था उसका दस परसेंट भी दीदी की चूत में नहीं आया था क्योंकि अगर आयशा अभी बहुत छोटी थी तो मैं भी तो अभी बच्चों में ही शामिल था वो एक अलग बात थी कि मेरा लंड अपने ऐज ग्रुप के लड़कों से कहीं ज्यादा लंबा व मोटा था। सेविन्थ क्लास पास करके आठवीं क्लास में आने वाला स्टूडेंट बच्चा ही होता है लेकिन चूंकि मेरा शरीर जल्दी ग्रो कर गया था इसलिए मैं दसवीं या ग्यारहवीं का स्टूडेंट लगता था।

मैंने महसूस किया था कि तीन दिन से चूतरस पी पी कर मेरा लंड काफी हद तक फूल गया था लेकिन फिर भी मैंने सोच लिया था की न कुछ से दीदी की चूत में लंड पेलना बुरा नहीं था यही कारण था कि मैं उन्हें भी नाराज़ नहीं करना चाह रहा था क्योंकि चाचा के यहाँ आकर मुझे चूत की बुरी तरह से लत लग गयी थी। मुझे हर समय चूत में अपना लंड पेलने की तबियत चलती रहती थी जिससे कोई भी लड़की या औरत देखते ही मेरा लंड अपना सिर उठाने लगता था,चाहे वह किसी भी उमर की क्यों न हो।

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