यादों के झरोखे से part 2

दीदी की चूचियां बड़े संतरे के साइज़ की बिलकुल ठोस रक्खीं थी व उनके निप्पल छोटे छोटे बिलकुल मेरे लंड की तरह तने खड़े थे। मैं सोने का नाटक करते हुए बीच बीच में उनकी मस्त मस्त चूचियों को हल्के हल्के मसलते हुए पूरा मज़ा ले रहा था। लेकिन मेरा लंड बिलकुल भी शांत होने को तैयार नहीं था। मेरी इच्छा हो रही थी कि मै दीदी के पास से उठ कर आयशा के पास चला जाऊ क्योंकि आयशा के साथ मुझे बहुत मज़ा आया था,वैसे मज़ा दीदी की चूचियों को सहलाने में भी बहुत आ रहा था लेकिन मुझे अपने खड़े लंड से बहुत दिक्कत हो रही थी परन्तु मै उस वक़्त कुछ भी कर पाने की पोजीशन में नहीं था सो मैं अपने लंड को बहुत ही धीरे से दीदी की गांड में सेट करने लगा तभी दीदी हल्के से कुनमुना कर पीछे को खिसक गयी। मैंने ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया क्योंकि अब मेरा लंड पूरी तरह से दीदी के चूतडों में सेट हो गया था। उनके दोनों चूतडों में मेरा लंड बुरी तरह से फंस गया था। अब मुझे ज़न्नत का मज़ा आ रहा था। मैंने सोच लिया कि अब जो होगा देखा जायेगा सो मै दीदी की गांड में उनकी सलवार के ऊपर से ही अपना लंड आगे पीछे करने लगा। बीच बीच में मै खुदा का शुक्रिया भी अदा करता जा रहा था कि इतनी धक्का मुक्की के बाद भी दीदी जागी नहीं थीं शायद अब वह गहरी नींद में सो चुकीं थीं। मेरा एक हाथ दीदी की चूचियों को मसल रहा था और कमर धकाधक आगे पीछे होती हुयी लंड को दीदी के चूतडों में रगड़ रही थी। मज़े से मेरी आँखे तक बंद हो चुकीं थीं। मै मन ही मन आयशा की चूत का ध्यान करते हुए धक्के लगा रहा था व उसका शुक्रिया भी अदा करता जा रहा था जो उसने मुझे इस नायाब मज़े से वाकिफ कराया था। अचानक मेरे शरीर में एक मीठी सी सिहरन सी दौड़ती लगी और मुझे अपने लंड से कुछ गाढी गाढ़ी बूंदे निकलतीं सी महसूस हुईं। अब मुझे कुछ अजीब तरह की शांती के साथ साथ थोड़ी सी थकान भी महसूस हो रही थी। मै उसी कंडीशन में दीदी के चूतडों में अपना लंड फंसाये ही सो गया।सुबह आयशा के जगाने पर जैसे ही मेरी आँख खुली,रात का सीन मेरी आँखों के आगे घूम गया और मेरा हाथ तुरंत अपने लंड पर चला गया लेकिन मै तुरंत ही चौंक गया क्योंकि मेरा लंड नेकर के अन्दर था और बटन भी ठीक तरह से बंद थे। मैंने आयशा से पुछा,”क्या तूने मेरी सुस्सू को छुआ था”
“अरे मै तो ऐसे ही इसे खडा देख के सिर्फ सहला रही थी,रात को मज़ा आया था ना” आयशा ने मेरे लंड को फिर से पकड़ते हुए पूछा
“बहुत मज़ा आया,मुझे तो इन सारी बातों का पता ही नहीं था” मैंने भी आयशा के निम्बुओं जैसी चूचियों को दबाते हुए कहा
“चल अब फ़टाफ़ट फ्रेश होले फिर हम लोग बातें करेंगे,अभी सारे लोग नाश्ते के लिए इकठ्ठे होने वाले है” यह कह कर वो मेरा लंड छोड़ कर बाहर चली गयी। मै उठ कर बाथरूम में चला गया।नाश्ता करने के बाद सभी मर्द लोग अपने अपने काम पर चले गए। अम्मी, चाचियाँ, भाभियाँ व बड़ी दीदियाँ बड़े वाले होंल में आकर हंसी मज़ाक करते हुए बतियाने लगे। मुझे आयशा ऊपर वाले कमरे में ले गयी। वो कमरा अक्सर बंद रहता था व उसमे एक तख्त और कुछ टूटी हुई कुर्सियां पडीं थी जिन पर ढेर सारी धूल ज़मीं थी। चाचा का मकान चूँकि बहुत बड़ा था और ढेर सारे कमरे ग्राउंड फ्लोर पर ही थे जिनमे दो कमरे सिर्फ मेहमानों के आने पर ही खुलते थे इसलिए ऊपर कभी कभार ही कोई आता था। ऊपर आकर आयशा ने सबसे पहले मेरी मदद से पूरे कमरे को झाड पोंछ कर साफ़ किया फिर अपने कपड़ों की तरफ देखा जो धूल में ख़राब हो गए थे। उसने अपना टॉप उतार कर अच्छी तरह झाड़ कर साफ़ करके एक कुर्सी पर लटका दिया फिर अपनी स्कर्ट उतारते हुए बोली,”तू भी अपने कपडे उतार कर साफ़ करले”
मै अपनी टी- शर्ट उतारते हुए उसकी निम्बू जैसी चूचियों को ललचाते हुए देख रहा था। टीशर्ट उतार कर मैंने बड़ी फुर्ती से अपना नेकर भी उतार दिया। मेरे कपड़ों को भी उसने ढंग से झाड कर कुर्सी पर लटका दिया। अब हम लोग सिर्फ अंडरवीयर बनियान में थे। आयशा भी बनियान ही पहनती थी।
मैंने आगे बढ़ कर उसकी बनियान में हाथ डाल कर चूचियों को मसलना शुरू कर दिया। मै कल से उठते बैठते चूत और चूचियों में ही खोया रहता था व किसी भी तरह से उन्हें देखने और छूने का मौका ढूँढता रहता था। तभी आयशा ने अपनी बनियान ऊपर करके मेरे अंडरवियर की इलास्टिक में हाथ डाल कर मेरे खड़े लंड को पकड़ कर उसकी खाल को आगे पीछे करना शुरू कर दिया। मुझे इस वक़्त कितना मज़ा आ रहा था यह मै शब्दों में बयां नहीं कर सकता।
तभी आयशा ने कहा,”तू भी तो मेरी चूत सहला ”
मैंने कहा “ठीक है,तू चड्डी उतार कर इधर तख़्त पर आ जा”
आयशा चड्डी उतार कर नंगी तख़्त पर सीधी लेट गयी,मैं भी अपने अंडरवियर को उतार कर नंगा होकर उसके बगल में लेट कर उसकी चूत को सहलाने लगा। आयशा अब मेरे लंड को मस्ती में कस कस के ऐठ रही थी क्योंकि उसे भी फुल मज़ा आ रहा था। तभी वह बोली,”छेद में अन्दर उंगली डाल ना”
मैंने गप्प से अपनी पहली उंगली उसकी चूत में घुसेड़ दी।
“हाय हाय …….. धीरे धीरे डाल बुद्धू” आयशा हलके से कराहते हुए बोली
अब मेरा लंड बिल्कुल सीधा तना हुआ था। फिर आयशा मेरी तरफ करवट ले कर मेरे गले में बांहे डाल कर मुझसे चिपक गयी,उसकी आँखे इस वक़्त बिलकुल बंद थीं। उसने एक टांग उठा कर मेरी कमर पर चढ़ा ली। अब मेरे लंड का सुपाडा उसकी चूत की फांकों में था। अब हम दोनों ही अपनी अपनी कमर को आगे पीछे करके फुल मज़ा ले रहे थे। तभी आयशा मुझसे कस कर चिपक गयी और गहरी गहरी साँसे लेने लगी और कमर चलाना बंद कर दी लेकिन मुझे बहुत मज़ा आ रहा था सो मैं उसके चूतड पकड़ कर उसी पोजीशन में अपने से चिपकाते हुए कस कस के कमर चलाता रहा। थोड़ी देर बाद मुझे अपने लंड से कुछ निकलता सा लगा और वह वक़्त मेरे मज़े का क्लाइमेक्स था। अब मै उसके बगल में लेटा गहरी गहरी सांसे लेते हुए मज़े के समुन्दर में गोते लगा रहा था। तभी आयशा उठ कर मेरे ऊपर आकर मेरे होठों को चूमते हुए बोली,”मज़ा आया ना,अब बाकी का रात को”मैंने उसे बगल में लिटा कर उसकी चूत को सहलाया तो मुझे कुछ गीला गीला लगा,मेरे लंड के सुपाडे पर भी चिपचिपा सा कुछ लगा था। मैंने उसकी चूत में उँगली घुसाई तो वह बड़े आराम से गप्प से घुस गयी। मैंने उसकी चूत में उंगली करते हुए पूछा,”रात में क्या तुम मुझे अपने छेद में सुस्सू घुसाने दोगी?”
“नहीं रे,मुझे बहुत दर्द होता है” आयशा डरते हुए बोली,”चल जल्दी से कपडे पहन, हम दोनों बहुत देर से गायब है कहीं कोई ढूँढता हुआ ऊपर ही न आ जाये”

हम दोनों ने कपडे पहन कर कमरे को जैसे ही बंद किया सीढियों पर शब्बो दीदी दिखाई पडीं। मेरी तो उन्हें देख कर जान ही निकल गयी।
“कितनी देर से ढूंढ रही हूँ तुम दोनों को,क्या कर रहे थे यहाँ?” दीदी हडकाते हुए बोलीं
“कुछ नहीं दीदी!मैं इसे घर घुमा रही थी,ऊपर के इस कमरे में बहुत धूल ज़मा थी तो हम दोनों वही साफ़ कर रहे थे।” आयशा ने नॉर्मल होकर ज़बाब दिया तो मेरी कुछ जान में जान आयी।
“अभी क्या ज़रुरत थी साफ़ करने की,कौन सा कोई रहने आ रहा है इस कमरे में ….. सारे कपडे गंदे कर लिए,चलो नीचे चल कर हाथ पैर धोकर कपडे चेंज करो ” दीदी उसी तरह हिटलर अंदाज़ में बोली।
“अच्छा दीदी” कह कर हम दोनों नीचे की तरफ भाग लिए,पीछे पीछे दीदी भी नीचे आ गयीं। हम दोनों ने हाथ मुंह घोकर कपडे चेंज कर लिए तभी भाभी लोगों ने खाना लगा दिया जिसे हम सभी बच्चे बैठ कर खाने लगे। हम लोगों के खाना खाने के बाद भाभीयों ने सभी बड़ों के लिए खाना लगा दिया। हम बच्चे अलग अलग गेम्स खेलने लगे।

बाकी दिन में मुझे कुछ खास करने का मौका नहीं मिला,बस कभी कभी बीच में भाभियों के किसी काम से झुकने पर कुर्ते के गले से उनकी दूधिया चूचियों की झलक मिल जाती थी। मैं उन्ही को देख देख कर मज़े लेता रहा और रात का इंतजार करता रहा क्योंकि दोपहर में आयशा ने बाकी का मज़ा रात में देने को कहा था। आखिर रात भी हो गयी, हम सभी खा पीकर कमरे में चले गए। मैं और आयशा कल की तरह किनारे वाले बेड पर लेट गए तभी दीदी आ गयीं और बोली ,”ऐ मुन्ना!तू उठ वहाँ से …… तुम दोनों कचर कचर रात भर बातें करोगे,न सोओगे न किसी को सोने दोगे…… तू उधर मेरे बेड पर चल कर लेट,मैं अभी कपडे चेंज करके आती हूँ”
एक ही झटके में मेरे सारे मंसूबों पर पानी फिर गया। मैं मन ही मन दीदी को कोसते हुए उठा। तभी आयशा ने फुसफुसा कर कहा,”दिल छोटा मत कर मुन्ना!हम लोग आज की तरह कल मज़े करेंगे” मैं किसी तरह अपने मन को समझाता हुआ दीदी के बेड पर आ कर लेट गया। दीदी भी कपडे चेंज करके एक गाउन पहन कर आ गयीं और लाइट बंद करके मेरे पास लेट गयीं। मुझे अब उनसे बहुत चिढ हो रही थी।
तभी दीदी मुझसे धीरे से बोली ,”क्या हुआ रे मुन्ना!नींद नहीं आ रही है क्या”
“नहीं दीदी,आ रही है” मैंने ज़बाब दिया
“लेकिन तू तो कल कह रहा था कि तुझे बिना कुर्ती में हाथ डाले नींद नहीं आती,ओ हो लेकिन मैंने तो आज गाउन पहना है …. तू आज हाथ कैसे डालेगा ? चल एक काम करले मैं गाउन ऊपर खिसका देती हूँ,अब तू अपना हाथ डाल ले और जल्दी से सोजा” दीदी ने उसी तरह धीरे से कहा

मैंने सोचा कि आयशा न सही दीदी की चूचियां ही सही,आज रात इन्ही का मज़ा लेता हूँ। मैंने करवट बदल कर दीदी को टटोला,दीदी ने अपना गाउन कमर तक खींच दिया था। मैंने उसे थोडा और ऊपर खींचते हुए अपना हाथ घुसा कर चूचियों पर रख दिया। तभी मुझे झटका सा लगा क्योंकि दीदी ने आज ब्रा नहीं पहन रक्खी थी। उनकी चूचियां बिल्कुल ठोस और निप्पल बिलकुल सतर तने मेरी हथेली में गढ़ते से लग रहे थे। अब मैं आयशा को भूल कर दीदी की चूचियां सहलाने लगा। मेरा लंड भी मेरे नेकर में फडफडाने लगा था। दीदी चूंकि सीधी पीठ के बल लेटीं थी सो उनका एक हाथ भी मेरे लंड के नज़दीक ही था जिसके कारण मैं अपने लंड को उनकी जांघ या कमर के नजदीक भी नहीं ले जा पा रहा था। मैं किसी तरह थोड़ी दूरी बनाये उनकी चूचियों के मज़े लेता हुआ उनके सोने का इंतज़ार करने लगा। अचानक दीदी ने दोनों के बीच से हाथ निकाल कर अपनी कमर को खुजला कर फिर से उसी जगह हाथ रखने को बढाया जो गलती से शायद मेरे लंड से सट गया। मेरी हार्ट बीटिंग बढ़ गयी क्योंकि मेरा लंड रह रह कर झटके लेता हुआ अब उनके हाथ से टकरा रहा था। तभी दीदी ने मेरी तरफ पीठ करते हुए करवट लेली और मेरा हाथ पकड़ कर अपने से चिपकाते हुए मेरे हाथों में फिर से अपनी चूची थमा दी। मैं खुश होते हुए कस कर दीदी से चिपक गया , अब मेरा लंड कल की तरह उनकी गांड की दरार पर था

,मैंने धीरे से अपना हाथ दीदी की चूची से हटाते हुए उनकी बांह के नीचे से निकाला।
“क्या हुआ” दीदी ने पुछा
“कुछ नहीं दीदी,पेशाब जा रहा हूँ” मैंने ज़बाब दिया
“ठीक है पर लाइट मत जलाना,सब सो रहे हैं। धीरे धीरे जा कर जल्दी से आकर सो जा ,बहुत रात हो गयी है” दीदी बोली
मैं टॉयलेट जाकर बिना लंड को नेकर में अन्दर किये दीदी के पास उसी पोजीशन में लेट गया। दीदी फिर से मेरा हाथ पकड़ कर अपनी चूची पर रखते हुए बोलीं,”चल अब सो जा फ़टाफ़ट”
मैंने धीरे से अपने फनफनाते खड़े लंड को उनकी गांड में सेट करने के लिए कमर धीरे से आगे बढाई और अपने लंड को उनकी दरार में जैसे ही फंसाया मुझे दुबारा से एक और झटका लगा। दीदी ने चड्डी भी नहीं पहनी थी। अब मेरा लंड उनकी गांड पर झटके खा रहा था। मैं मस्ती में मदहोश हो रहा था। अचानक उसी मस्ती में दो गलत कामकाम अनजाने में ही हो गए,एक तो मेरी कमर ने कस के दीदी की गांड पर धक्का लगा दिया दूसरा मेरे हाथ ने उनकी चूची को कस के मसल दिया। मैं घबरा के उसी पोजीशन में दीदी के रिएक्शन का इंतज़ार करने लगा परन्तु बजाय नाराज़ होने के दीदी ने गांड को थोड़ा सा ऊपर करके मेरे लंड का डायरेक्शन सही करते हुए अपने चूतडों को थोड़ा फैला दिया। अब मेरे होसले बुलंद हो गए। मेरा लंड अब दीदी की गांड के ठीक छेद पर उनके दोनों चूतड़ों के बीच टिका था। मैंने हल्का सा लंड को पीछे खींच कर एक ज़ोरदार धक्का दीदी की गांड पे मारा परन्तु मेरा लंड दीदी की गांड के छेद पर जाकर अटक गया। मैंने खीज कर दीदी की चूची छोड़ कर आगे उनकी चूत पर हाथ लगा कर फिर एक ज़ोरदार धक्का मारा परन्तु नतीजा वही ढाक के तीन पात।

अचानक दीदी करवट लेकर पीठ के बल सीधी लेट गयीं व उन्होंने अपने गाउन को उतार कर एक तरफ रख दिया फिर मेरी तरफ करवट लेकर उन्होंने मुझे पूरा नंगा करके मुझे अपने ऊपर खींच लिया और मेरे होठों को चूसते हुए अपनी जीभ मेरे मुंह में घुसा दी। मुझे उनकी नमकीन नमकीन जीभ चूसने में बहुत अच्छा लग रहा था। मैंने दोनों हाथों से उनकी चूचियों को मसलते हुए अपनी कमर को थोड़ा सा उठा कर एक झटका सा दिया,जिससे मेरा लंड अब उनकी चूत की दोनों फांकों के बीच में था। दीदी ने भी दोनों टाँगे सिकोड़ कर पूरी तरह फैला कर मेरे कान में कहा,”अपने पैर मेरे मुंह की तरफ करके मेरी चूत चूस ना मुन्ना ”
मैं फटाक से जैसा दीदी ने कहा वैसा करते हुए उनकी दोनों जाँघों को कस के पकड़ कर पूरा फैला कर कभी उनकी फांकों को तो कभी उनकी फडफडाती सी टाइट फुद्दी को चूसने लगा,उधर दीदी भी मेरे लंड को सटासट चूस रहीं थी। मुझे यहाँ वह शब्द ही नहीं मिल पा रहे जिनसे मैं उस वक़्त के मज़े को बयाँ कर सकूं। अब दीदी की चूत से खारा खारा सा पानी निकलने लगा था जिसे मैं अपनी जीभ से चाट चाट कर तुरंत साफ़ करता जा रहा था। उस वक़्त मैं झड़ने के बारे में कुछ नहीं जानता था बस इतना ही दो दिनों में समझा था कि जब बहुत मज़ा आता है तो लंड से कुछ गाढ़ा गाढ़ा चिपचिपा सा निकलता है। वही शायद दीदी के भी निकल रहा था। अब दीदी के चूसने के साथ साथ मैं भी कमर हिला हिला कर उनके मुंह में अपने लंड को पेल रहा था तभी मुझे एक कंपकंपी सी हुई और अपने लंड से कुछ निकलता सा लगा। मैं निढाल सा उनकी चूत में ही अपना मुंह छिपा कर लेट गया।

दीदी मेरे लंड को अभी भी चाट चाट के साफ़ कर रहीं थी। उस वक़्त मैं अपने आप को परिस्तान में किसी परी की गोद में पडा महसूस कर रहा था। मेरे लंड को पूरी तरह चाट कर साफ़ करने के बाद दीदी ने मुझे सीधा करके अपने से चिपका लिया। अब मैं पूरी तौर से दीदी का गुलाम हो चुका था,वो जैसा करने का इशारा करतीं मैं वैसा ही कर रहा था। तभी दीदी ने मेरे मुंह में अपनी निप्पल घुसेड दी। मैंने भी छोटे से बच्चे की तरह उसे चूसना शुरू कर दिया। अब मुझे अपना लंड फिर से झटके खाता सा महसूस होने लगा। अब मुझे दीदी से किसी भी तरह का डर नहीं लग रहा था।मैं उचक कर दीदी के ऊपर चढ़ गया और एक हाथ की उंगली से दबा दबा कर उनकी चूत के छेद को टटोलने लगा। थोड़ा सा नीचे एक जगह गप्प से मेरी उंगली एक गरमा गरम भकभकाते छेद में घुस गयी, दीदी ने भी उंगली घुसते ही फटाक से अपनी टाँगे पूरी तरह से चौड़ा दीं। अब तो छेद मिलते ही मैं और मेरा लंड दोनों ही जैसे पागल हो गए। मैंने बिना कोई देर किये तड से अपने लंड का सुपाडा दीदी की चूत के छेद पर टिका कर कस के धक्का मारते हुए एक ही झटके में पूरा का पूरा लंड दीदी की चूत में ठांस दिया। मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा लंड किसी गरमागरम मांसल सी ठोस चीज़ में घुस गया हो। मैंने कमर उचका कर एक बार फिर कस के ठोकर मारी।
“पूरा घुसा दिया क्या” दीदी ने हलके से सिसकारी लेते हुए पूछा

“हाँ दीदी” मैं उनकी चूचियों को कसके मसलता हुआ ठोकरे लगाते हुए बोला।मैं अपने से पूरे साढ़े सात साल बड़ी दीदी को पूरी ताक़त से जम के चोद रहा था। दीदी ने अपनी टाँगे पूरी तरह से फैला कर मुझे अपने से कस कर चिपका रक्खा था। मैं दीदी की चूत में भकाभक अपने लंड को अन्दर बाहर कर रहा था। मुझे इस वक़्त हाथों के बजाय दीदी की टाइट चूत में ज्यादा मज़ा आ रहा था। काफी देर दीदी को चोदने के बाद मेरे लंड से पानी निकला लेकिन मुझे इतना ज्यादा मज़ा आया था की न तो मैं दीदी को छोड़ने को तैयार था और न ही सोने को,बड़ी मुश्किल से दीदी ने समझा बुझा कर मुझे कपडे पहनाये और खुद भी गाउन पहन कर मेरे बगल में लेट गयीं।
हालाँकि इस वक़्त तकरीबन रात का दो बज गया था परन्तु मुझ पर तो जैसे चूत का नशा सा सवार था। मैंने उनका गाउन उठा कर गले तक खींच कर उन्हें फिर से नंगा कर दिया।
“मुन्ना!अब सो जा ना,तू कल कर लेना जो चाहे पर अभी सो जा” दीदी ने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा

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