मेरी पहली मांग भराई

एक-एक चुदाई जिस्म में आग लगा देती है, चूत की प्यास बढ़ने लगती है, दिल करता है जल्दी से सलवार का नाड़ा खोल लूँ और पास पड़ी कोई चीज़ घुसा दूँ या ऊँगली घुसा दूँ, अपने किसी आशिक को बुला कर रंगरलियाँ मना लूँ ! मेरी उम्र बीस साल की है, मैं बी.ए प्रथम वर्ष की छात्रा हूँ। वैसे तो मेरे इस वक़्त कई बॉयफ्रेंड हैं और मैं सबको एक साथ सम्भालना भी जानती हूँ। हर किसी को उसकी जगह पर रखना मुझे खूब आता है। क्या करूँ बचपन भी एक चालू से माहौल में बीता, फिर स्कूल में ही चालू लड़कियों से मेरी दोस्ती हो गई। वो लड़कियाँ कहती होंगी कि उनकी मेरे जैसी चालू लड़की से दोस्ती हो गई। ऐसे ही चलती है जिंदगी ! खूब मजे करने चाहिएँ, यह हुस्न, यह मदमस्त जवानी, ये नशीली आंखें ! अब ही मौका है कि इनके नशे में किसी भी मर्द को हलाल कर दो, यह वक़्त होता है छाती से चुन्नी सरका कर किसी मर्द के सोये नाग को उठाने का, यही उम्र है जब अपनी चूचियों से किसी का शिकार कर डालो, पतली कमर लचका कर मर्दों को अपने पर फ़िदा करवाने का और फिर बंद कमरे में हुस्न का खेल, जवानी का खेल, जिस्मों का मेल-जोल सब कुछ जवानी में ही होता है। यह सब मेरा अपना ख़याल है और मैं इस पर चलती भी हूँ। जैसे जैसे जवानी ने दस्तक देनी शुरु किया, तैसे-तैसे मेरा ध्यान लड़कों में लगने लगा, मेरी दिलचस्पी अपनी तरफ देख उनकी हिम्मत बढ़ने लगी। पहले तो आते-जाते कोई कुछ बोल देता, कोई कहता- देख कितनी छोटी है अभी साली फिर भी नैन-मटक्का करने से बाज नहीं आती ! देख साली कैसे बल खा-खा कर चलने लगी है ! कोई कहता देख तो यार, आग निकलेगी आग! ऐसे करते-करते सोलहवां, सतरहवां, अठरहवां पूरा किया, मुझ पर जवानी कहर की चढ़ी है भी, उम्र से पहले मेरी छाती कहर बनने के लिए तैयार हो चुकी थी, लड़कों की बातें सुन-सुन कर अब कुछ-कुछ होने लगता, मैं मुस्कुरा देती, उनके हौंसले बढ़ने लगे और फिर: एक दोपहर कड़ी गर्मी थी, उस दिन स्कूल से जल्दी छुट्टी हो गई, उस दिनों हम गाँव में रहते थे, मेरी जवानी उफान पर थी। बहुत गर्मी थी, कुरता पसीने से भीग मेरी जवानी से चिपका हुआ था। स्कूल जाने के दो रास्ते थे। एक था आम पक्की सड़क से दो मिलोमीटर की दूरी थी, पर मैं अपनी सहेलियों के साथ पैदल चली जाती थी क्यूंकि उनको अपने मनचले आशिकों से यारी को परवान चढ़वाने का मौका भी मिल जाता था। दूसरा रास्ता कच्चा ज़रूर था, बारिश के मौसम में बिलकुल बेकार था, खेतों से होकर निकलता था जिससे स्कूल एक किलोमोटर ही पड़ता था। जिस दिन किसी सहेली को ज्यादा परवान चढ़ना होता, उस दिन वो उस रास्ते चली जाती। मेरे पीछे आने वाले लड़कों की गिनती कम नहीं थी, हाँ कम नहीं थी। मैं भी उनकी बाँहों में झूलना चाहती थी लेकिन काफी देर से खुद को बांध रखा था, मेरे सबसे ज्यादा पीछे आने वालों में से जो युवक था उसका नाम था लल्लन ! वो गाँव के मुखिया का बेटा था। मैंने शुरु से ही किसी लड़के की किसी भी बात को काटा ना था, इसलिए उनकी हिम्मत बढ़ चुकी थी। उस दिन में कड़ी दोपहर स्कूल से जल्दी निकली, अकेली थी, बाकी सब मौके का फायदा उठा अपने यारों से मिलने गई। मैंने छोटे वाले रास्ते से घर आने की सोची, बहुत गर्मी थी तेज़-तेज़ चल रही थी पसीने से कुर्ती भीग गई, आधे रास्ते आई कि किसी ने मेरी कलाई पकड़ मुझे खेत में खींच लिया। इससे पहले में कुछ देखती, सम्भलती, मैं लल्लन की बाँहों में थी, उसने मेरे होंठों पर अपना हाथ रख मुझे चुप करवा दिया, बोला-बहुत प्यार करता हूँ तुझे!, तू है कि कुछ न कहकर भी सब कुछ कह देती है, मुस्कुरा देती है लेकिन उसके बाद सब ठन्डे बस्ते में डाल देती है। आज अपने को नहीं रोक पाया। उसने मेरी गाल की चुम्मी ले डाली। मुझे अजीब सा लगा, उसका हाथ मेरी भीग चुकी कुर्ती पर रेंगने लगा, मुझे लगा जैसे मेरी छाती में कसाव सा आने लगा, उसने होंठों से हाथ हटाया और अपने होंठ रख दिए। मैं चुप थी, कुछ नहीं बोल पाई। उसके जोश में बढ़ावा आया, खुल कर होंठ चूसने लगा और साथ मेरी कुर्ती में हाथ घुसा दिया। उसने मेरा हाथ पकड़ा और खेत के और अन्दर ले जाने लगा। प्लीज़ लल्लन छोड़ दो ! मुझे घर जाने दो! प्लीज़ आरती, आज मुझे मत रोको ! क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करती? क्या तू जिंदगी भर मेरी होकर नहीं रहना चाहती? करती हूँ लल्लन ! लेकिन ऐसे हमें किसी ने देख लिया तो? इतनी दोपहर कौन साला घर से निकलेगा? यह तो हम जैसे आशिक ही ऐसे मौकों का फायदा उठातें हैं मेरी जान! वो मुझे खेत के काफी अंदर ले गया, वहाँ फ़सल काटने के बाद उसकी बची हुई घास की ढ़ेरी लगी हुई थी, मुझे बाँहों में लेकर उसने मुझे वहीं लिटा दिया और मेरे ऊपर लेट मेरे होंठ चूसने लगा। उसने मेरी कुर्ती मेरे बदन से अलग कर दी, आराम से एक तरफ़ रख दी ताकि गंदी ना हो! यह क्यों उतारी? चुप मेरी जान! उसने मेरी ब्रा खोल दी और मेरे मम्मे दबाने लगा। हाय! यह मुझे क्या हो रहा है? मैं खुद को आराम से उसको सौंप रही थी! उसने अपनी टीशर्ट उतार दी। जब मेरी नंगी छाती उसकी मरदाना छाती से घिसी तो मेरे अंदर आग भड़क उठी, मैं वासना से तपने लगी। उसने मेरा एक चुचूक मुँह में लिया तो मैं उछल पड़ी- हाय! मत करो ना! मुझे अब जाने दो! यह सब बाद में भी हो सकता है। उसने मुझे बाँहों से आज़ाद किया, बोला- ठीक है!

जैसे कि मैंने बताया था कि किस तरह गाँव के मनचले मेरे और मेरी बिगड़ी हुई सहेलियों के आगे-पीछे मंडराते थे और हम भी उनका हौंसला बढ़ाने में कसर नहीं छोड़ती थी। यही कारण था कि सबका हौंसला हमारे प्रति बढ़ चुका था। खैर! उस दिन तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि लल्लन मुझे इस तरह दबोच लेगा, मैं तो अपनी मस्ती में खोई घर लौट रही थी अकेली! ऊपर से गर्मी थी, लेकिन लल्लन ने तो मानो उस दिन घर से निकलते वक़्त धार लिया था कि आज आरती की जवानी के रस में खुद को भिगोना ही भिगोना है। उसने मुझे बाँहों में लेकर खूब चूमा, मेरी कुर्ती उतार दी फिर उसने ब्रा खोल मेरे अनछुए चुचूकों को चूसा और फिर जमकर मेरे होंठों का रसपान किया। इस सब के बीच मैंने कई बार उसको अपने से अलग करने की नाकाम कोशिश भी की लेकिन अलग नहीं हो पाई और वो मेरे बदन के साथ मनमानी करता रहा। पहली बार किसी मर्द का स्पर्श पाकर मैं भी उत्तेजित हो गई थी और सब मर्यादा भूल उसको अपना जिस्म सौंपने तक चली गई थी। लेकिन आखिर मैंने उससे अलग होने को कहा तो ना जाने वो कैसे मान गया, मुझे खुद समझ नहीं आई कि इतना ज़बरदस्त मौका उसने कैसे छोड़ दिया। ना जाने कब उसने मेरा नाड़ा ढीला करके उसका एक सिरा पकड़ लिया था, बोला- ठीक है जाओ! मेरी जान जाओ! लेकिन कब तक और कहाँ तक भागोगी? आखिर तुम्हे लल्लन की होना पड़ेगा! हाँ! हाँ! पक्का! मैं जैसे ही उठी, मेरी सलवार खुल कर नीचे गिर गई और मेरे नाड़े का एक छोर लल्लन ने पकड़ रखा था। हाय! यह क्या हो गया राम जी? बोला- राम जी यहाँ नहीं हैं जान! यहाँ तेरे लल्लन जी हैं! मैंने दोनों हाथ अपनी नंगी जांघों पर रख दिए। करती तो क्या! सच में मैं तो पूरी तरह से उसके बुने जाल में फंस चुकी थी। जैसे ही ऊपर से नंगी हुई, बोला- क्या माल है तू आरती! उसको छुपाया तो बोला- कितनी मुलायम और गोरी जांघें हैं तेरी! उसने उन पर हाथ रख कर सहला दिया- हाय, प्लीज़ छोड़ो मुझे! उसने सलवार पकड़ पीछे रख दी और मुझे अपने ऊपर खींच लिया। उसने अपनी पैंट उतार दी, सिर्फ अंडरवीयर में था और उसका तंबू बन चुका था। हाय राम जी! आपने क्यूँ उतार दी? तेरे लिए आरती रानी! तेरे लिए! तूने मुझे अपना हुस्न दिखाया, अपनी जवानी दिखाई! तो मेरा फ़र्ज़ बनता है अपनी मर्दानगी दिखाने का! दोनों ही सिर्फ एक-एक वस्त्र में थे। उसने मुझे पकड़ अपने नीचे डाल लिया और वो मुझ पर हावी होने लगा। मैं भी पिघलने लगी। आखिर एक जवान लड़की एक जवान मर्द के साथ एकदम नंगी, वो भी ऐसी जगह पर! उसने जम कर मेरे मम्मे चूसे, मेरे चुचूक काटे, कभी-कभी मेरा पूरा अनार अपने मुँह में लेकर निचोड़ देता, उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपने कच्छे में घुसा दिया। जैसे ही मैंने उसको छुआ, मेरे तन-बदन में जवानी की आग भड़क उठी, उसने मेरी पैंटी भी उतार फेंकी। और जैसे ही उसका हाथ मेरी तपती चूत पर आया, हाथ लगते मैं भड़क उठी। हाय साईं! यह क्या कर रहे हो? तेरी जवानी लूटने की ओर पहला कदम बढ़ाया है! मत करो ना! मैं मर जाऊँगी! अगर ना छोड़ा तब भी, और अगर छोड़ भी दिया तब भी! वो कैसे? अगर मैंने तुझे चूत मारने दी तो मेरी सुहागरात तो कुंवारापन लेकर सेज पर जाने का सपना ख़त्म और अगर ना करने दिया तो अब मर जाऊँगी। छोड़ो ना जान! बस चुपचाप रहो! उसने लौड़ा निकाल लिया और पहले खुद सहलाया फिर मुझे दिखाते हुए बोला- देख मेरा लौड़ा! असली मर्द का संपूर्ण लौड़ा! मैंने पकड़ा तो वो फड़फड़ा उठा। हाय यह तो उछल रहा है? तेरी जवानी है ही ऐसी मेरी जान! उसने मेरी गर्दन पर हाथ रख नीचे की तरफ दबाव दिया- चूमो इसको मेरी जान! नहीं-नहीं! इसको चूसते नहीं हैं! जान सब चूसती हैं, अपनी सहेली से पूछना! बता देगी! चलो! जैसे मैंने मुँह खोला, उसने मुँह में घुसा दिया और आगे-पीछे करने लगा। मुझे उसका स्वाद अच्छा लगा तो आराम से चूसने लगी, मुझे उसका लौड़ा चूसने में बेहद मजा आ रहा था। फिर उसने मुझे लिटा मेरी टाँगें खोल बीच में बैठ कर अपनी जुबान मेरी चूत पर लगा दी और चाटने लगा, जीभ घुसा-घुसा कर छेड़ने लगा तो मैं पागल हो गई और गांड उठाने लगी। वो जान गया था कि मुझे किस चीज की ज़रूरत है। उसने तुरंत अपना लौड़ा मेरी गुफा के मुँह पर रख दिया और धीरे से धक्का लगाना चाहा पर लौड़ा फिसल गया। मैं पागल होने लगी- घुसा दो ना! हाँ! हाँ! अभी घुस जाएगा मेरी जान! लल्लन, मुझे कभी छोड़ना मत! कभी नहीं! अब तो तेरी जवानी आये दिन और निखरेगी। उसने थूक लगाया दुबारा टिकाया, मैंने हाथ नीचे ले जाकर पकड़ लिया। इस बार उसने जोर देकर धक्का मारा, मानो मेरे कंठ में हड्डी फंस गई हो! दर्द के मारे मेरी आवाज़ निकलनी बंद हो गई थी, मैं तड़फ रही थी, हाथ पैर चलाने की पूरी कोशिश की, उसने तो दूसरे धक्के में पूरा अन्दर घुसा दिया। मैं रोने लगी। बोला- नहीं जा रहा था तो जोर लगाना पड़ा! बस अभी देखना, मेरी आरती खुद कहेगी लल्लन चोद और चोद! बड़ी मुश्किल से बोली- मैं जिंदा बचूंगी तो तब ही कहूँगी ना! मुझे छोड़ दे! साली खेत में पहला मिलन हुआ, जब सब कुछ हो गया अब छोड़ कैसे दूँ? अब तो बस चोद दूंगा। फाड़ दी मेरी चूत तूने! हां फाड़ दी! रुकने के बाद आधा निकाल फिर घुसा दिया। उसे राहत मिली। देखते ही आराम से घिसने लगा मेरी चूत की दीवारों से घिस-घिस कर घुसने लगा। तस्वीर बदल चुकी थी, सच में मेरी गांड हिलने लगी, कमर खुद गोल-गोल हिलते हुए लौड़े का मजा लेने लगी। उसकी चुदाई में एकदम से तेज़ी आई और लल्लन मुझे जोर-जोर से चोदने लगा और फिर आखिर उसने मेरी कुंवारी चूत को मरदाना रस से भिगो दिया। सारा दर्द मिट गया था, हम दोनों हांफने लगे थे। मजा आया ना आरती? हाँ बहुत आया! बहुत दिनों से तुझे अपनी बनाने की ताक में था, आज मौका मिल गया। उठो भी अब! चलो लेट हो जाऊँगी! हाँ-हाँ बस! दोनों खड़े हुए, अपने-अपने कपडे पहने, कुर्ती डालते वक़्त उसने दुबारा मुझे दबोच लिया और मेरे मम्मे पीने लगा।बोला- एक बार और चोदने दे ना! अरे बाबा नहीं! अब तो मैं तेरी हूँ। उसने छोड़ दिया, वो पिछले रास्ते निकल गया। मैंने सलवार का नाड़ा कस कर बांधा और किताबें उठा घर आ गई। मैं अब कुंवारी नहीं थी, लल्लन ने मुझे चुदाई का स्वाद चखा दिया। अब तो मौका मिलते में खेत चली जाती और वहाँ लल्लन मुझे मन मर्ज़ी से रौंदता। इन दिनों ही मेरी नज़रें पास के गाँव के सरपंच के लड़के लाखन से दो से चार होने लगीं और आखिर एक दिन उसने पारो के ज़रिये, पारो मेरी पक्की सहेली, हमराज़ थी, मुझे संदेशा भेज दिया। वैसे भी मुझे महसूस हुआ कि लल्लन कुछ बदला सा था, तो मैंने भी बेवफा बनने में वक़्त नहीं लगाया और लल्लन के रहते ही लाखन का न्योता स्वीकार कर लिया।

मैं अब कुंवारी नहीं थी, लल्लन ने मुझे चुदाई का स्वाद चखा दिया। अब तो मौका मिलते में खेत चली जाती और वहाँ लल्लन मुझे मन मर्ज़ी से रौंदता। इन दिनों ही मेरी नज़रें पास के गाँव के सरपंच के लड़के लाखन से दो से चार होने लगीं और आखिर एक दिन उसने पारो के ज़रिये, पारो मेरी पक्की सहेली, हमराज़ थी, मुझे संदेशा भेज दिया। वैसे भी मुझे महसूस हुआ कि लल्लन कुछ बदला सा था, तो मुझे इस बात का इल्म होने लगा था कि वो मुझ से शादी-वादी नहीं करने वाला, बस उसको मेरे जिस्म से प्यार था, मुझे भी अब उससे शादी-वादी नहीं करनी थी लेकिन उसका जोश और मर्दानगी अपनी जगह कायम थी। मुझे उसने चुदाई की लत लगा दी थी तो मैंने भी बेवफा बनने में वक़्त नहीं लगाया और लल्लन के रहते ही लाखन का न्योता स्वीकार कर लिया। लेकिन मैंने लल्लन से अपने जिस्मानी संबंद नहीं तोड़े, मौका मिलते ही हम दोनों खेत में घुस जाते और वहा एक दूसरे के जिस्म को निचोड़ने के बाद निकलते थे। वो जिप बंद करता हुआ निकलता तो मैं सलवार का नाड़ा बांधते हुए! अब तो मुझ पर जवानी और निखर आई थी, सिर्फ अठरह की थी लेकिन खेल बड़े-बड़े सीख चुकी थी। यही कारण था कि लल्लन मुझे छोड़ना नहीं चाहता था और मैं अब लाखन को भी नाराज़ नहीं करना चाहती थी। वैसे भी लल्लन ने मुझे कभी बंदिश में रहने के लिए नहीं कहा। लाखन ने मुझसे अकेले मिलने की इच्छा ज़हर की, मैं भी उसको मना करने के मूड में नहीं थी, लेकिन लाखन के पास पैसा था, वो एक अमीर बाप का बेटा था उसने एक दिन सुबह मुझे स्कूल जाते वक़्त रास्ते से अपनी कार में बिठा लिया। लल्लन स्कूल के बाद मिलता था इसलिए मैंने लाखन को मिलने के लिए सुबह का समय तय किया, चाहे उसके लिए एक दिन स्कूल भी छोड़ना पड़े। लाखन ने मुझे लेकर शहर वाली सड़क पकड़ ली और कुछ देर में हम शहर पहुँच गए। मैं ज्यादा शहर नहीं आई थी, वहाँ की दुनिया अलग थी। मुझे लेकर पहले उसने कॉफी पिलाई और वहाँ नाश्ता भी किया, उसके बाद मुझे वो एक बहुत बड़े मॉल में ले गया और हम एक कपड़ों के शोरूम गए। मेरे लिए जींस खरीदी, टॉप खरीदा। मैंने यह सब कभी नहीं पहना था, अजीब सी लग रही थी, उसके लिए मैंने पहन भी लिए। वहाँ उसी मॉल से उसने मुझे मोबाइल लेकर दिया। मैं बहुत खुश थी। मुझे लेकर होटल की तरफ जाने से पहले उसने कार एक पुरानी सी इमारत के पास रोकी, मुझे लेकर अन्दर गया। वहाँ उसने जेब से सिन्दूर निकाला और एक मंगलसूत्र, लिपस्टिक, लाल चूड़ियाँ भी! उसने मेरी मांग भरी, मंगलसूत्र पहनाया, चूडियाँ चढ़ाई और हम सीधा एक आलीशान होटल में चले गए। ऐसी चकाचौंध मैंने कभी नहीं देखी थी, मैं मानो गाँव से स्वर्ग पहुँच गई थी। दरबान ने सेल्यूट मारा, स्वागत हुआ। वहाँ से एक लड़की ने चाबी थमाई और एक लड़का हमें कमरे तक ले गया। उसने कमरा खोला और हमारा स्वागत किया। बहुत खूबसूरत था कमरा! बिस्तर पर गुलाब के फूल थे, खुशबू से मन मोहा जा रहा था।
कैसा लगा मेरी जान? बहुत खूबसूरत! उसने दरवाज़ा लॉक किया, मेरे पास आया, मेरे होंठ चूमे। मेरा कौन-सा पहला स्पर्श था, मैं गर्म होने लगी। उसने मेरा टॉप उतारा, मैं चुपचाप उसकी नज़रों से नज़रें मिला नशीली आँखों से उस पर वार करने लगी। उसने मेरी गर्दन चूमी तो मैं सिहर उठी। बदन कांप सा गया, जिस्म सुलगने लगा! उसने अपनी शर्ट उतार दी। क्या छाती थी! उसने मेरे बाल खोल दिए और मुझे बिस्तर पर धक्का दिया। जैसे ही मैं गिरी, वो मेरे ऊपर गिर गया और होंठों से चूमता हुआ गर्दन पर फिर मेरे ब्रा को सरका मेरे चुचूक पर! मैं मचल उठी! फिर मेरी नाभि पर, फिर उसने मेरा बटन खोला, जिप खोली, घुटनों तक सरकाई, पैंटी के ऊपर से उसने मेरी चूत का चुम्मा लिया। मैं तड़फ उठी! मेरी जांघों पर चुम्बन लिया, जींस नीचे सरकाता गया, चूमता गया! पूरी जींस मेरी गोरी टांगो से अलग की, अब मैं सिर्फ पैंटी में थी। उसने परदे करके लाईट बंद की और छोटी लाईट जला दी। गुलाब की पंखुड़ियों के ऊपर वो मुझे बेपर्दा करता गया, मैं होती गई। उठा, वाशरूम गया, वापस आते ही उसने अपनी जींस उतारी। मैं नशीली आँखों से बिस्तर पर लेटी देखने लगी। उसने वहीं खड़े रह मुझे आँख मारी और अपने लौड़े को कच्छे के ऊपर से सहलाता हुआ चिड़ाने लगा। मेरी आग भड़कने लगी, मैं मचलने लगी। उसने थोड़ा नीचे सरका दिया अपना कच्छा और अपना लौड़ा पकड़ कर हिलाने लगा। मैं पागल हो गई, दिल कर रहा था अभी मुँह में ले लूँ! बहुत मस्त लौड़ा था उसका! बड़ा! मोटा! पूरा खड़ा हो चुका था। मुझे चिड़ाने लगा, मैंने सोचा, पहली बार आई हूँ, क्या सोचेगा। मुझे शैतानी सूझी! मैंने वहीं अपनी ब्रा उतार दी और उसको दिखाने लगी। वैसे भी मेरे मम्मे देख सबके खड़े होते हैं, उसके मुँह में भी पानी आने लगा। मैंने अपना एक हाथ पैंटी पर रख लिया और दूसरे से मम्मे सहलाने लगी। वो उसी वक़्त बिस्तर पर कूद गया और पागलों की तरह मेरे मम्मे चूसने लगा, कभी चुचूक चूसता, काट देता! मैं भी अपने को नहीं रोक पाई और उसके अंडरवीयर को उतार फेंका और उसके लौड़े को पकड़ जोर-जोर से मुठ मारने लगी। उसने चूत में ऊँगली घुसा दी तो मैंने उसी वक़्त उसके लौड़े को मुँह में लेकर चूसना शुरु कर दिया। वो भी यही चाहता था और मैं भी! उसका लौड़ा सच में सबसे बड़ा था अब तक जितने पकड़े थे, लिए थे। बहुत स्वाद था उसका नमकीन लौड़ा! और चूस रानी! खाजा इसको! और तुम भी ऊँगली हिलाओ न जोर से! हाँ-हाँ! वो मेरे दाने पर उंगली रगड़ने लगा। मैं चूस रही थी, उसने उंगली तेज़ की तो इधर मेरा मुँह तेज़ी से चल पड़ा। मैं तो झड़ने के करीब आ चुकी थी, तुरंत उसको धकेला और लौड़ा घुसाने को कह दिया। उसने उसी वक़्त टाँगें खुलवा कर कन्धों पर रखवा ली और……वाह! कितना मस्त था उसका लौड़ा! मेरी चूत की दीवारों से घिसता हुआ वो मेरे अन्दर हलचल मचाने लगा, उसकी एक-एक मारी चोट मुझे स्वर्ग दिखा रही थी। करीब दस मिनट वैसे ठोकने के बाद उसने मुझे घोड़ी बनवा दिया और घुसा दिया। फिर साथ-साथ मेरे चूतड़ मसल-मसल मेरी ले रहा था, मैं उसका लौड़ा ले रही थी! वो तेज़ हुआ और करीब सात-आठ मिनट में उसने मेरी चूत को अपने रस से भिगो दिया। मैं तो इस बीच दो बार झड़ चुकी थी, वो सच में असली मर्द था, उसने मेरा ढांचा हिला कर रख दिया था। पूरा दिन उसके साथ रही और उसने दो बार और अपने रस से मेरी चूत और एक बार गांड को पानी पिलाया। जब हम होटल से निकले तो मेरी हालत खस्ता थी। लेकिन आज एक नया लौड़ा ले चुकी थी। घर आकर मैं सो गई, शाम को आंख खुली तो माँ बोली- हमारे साथ शादी पर चल! पापा के एक पक्के दोस्त के लड़के की शादी थी, हमें बारात के साथ जाने का ख़ास न्यौता था। मैंने पढ़ाई का बहाना बना कर मना कर दिया। माँ बोली- चल खाना वगैरा बना कर खा लेना, दादी माँ को खिला देना! दरवाज़े बंद कर लेना! रात को वहाँ से निकलते वक़्त फ़ोन कर देंगे। दरवाज़ा खोल देना। ठीक है! अब भी मेरा बदन टूट रहा था, फिर सो गई। कुछ देर बाद दरवाज़े पर घण्टी बजी! मैं उठी

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