मुन्नार का सफर part 8

“actually जब मैं पहलीबार ‘राजी’ से मिला तो ये बच्ची भी साथ आई थी| तो उस दिन मुझे एक साथ दो फ्रेंड मिल गए…इसलिए मैं मेरे dear friend को childhood friend कहता हूँ|” ये सुन कर सब हँस पड़े| इतनी देर में ‘राजी’ की दीदी पानी ले आईं| इन्होने गिलास ले लिया और मुझे भी पानी पीना ही पड़ा| हमारे गाँव में तो हम किसी दूसरी जात के यहाँ पानी नहीं पीते और ये दूसरे धर्म के हैं! यही हिचकिचाहट मुझ में भी भरी हुई थी…. पर ये ऐसा कतई नहीं सोचते थे| इन्होने उसे बच्ची से मेरा introduction कुछ इस तरह कराया; “angel…. she’s wife …. and since you’re my childhood friend so she’s your friend also.” ये सुनकर वो हँसने लगी| उस बच्ची की स्माइल बहुत प्यारी थी और उसे मुस्कुराता हुआ देख मैं खुद को उसे गोद लेने से रोक ना पाई और अपनी बाहें खोल कर उसे गोद में लेना चाहा| angel भी बिना नखरा किये मेरी गोद में आ गई और उस पल मुझे एहसास हुआ की छोटे बच्चों को देख कर हम कभी भी ये भेद-भाव नहीं करते की ये किस धर्म का है…जब वो बच्चा बड़ा हो जाता है तभी हमारे अंदर ये भेद-भाव की भावना पैदा होती है| वरना एक छोटे बच्चे की हँसी का तो कोई धर्म नहीं होता! उसे गोद में लेने के बाद मुझे ख़ुशी हुई…….. और खुद से घृणा भी| कहाँ तो मैं एक christian family के घर जाने से कतरा रही थी और कहाँ इस छोटी सी बच्ची के गोद में आते ही मैं वो सब भूल गई| सच में मित्रों मेरी तरह के orthodox लोग भी हैं इस दुनिया में!

अब की बार तो मैंने angel को इनसे भी ज्यादा दुलार किया! चाय पीने के बाद हम वहाँ से निकले…. राजी और उसका परिवार हमें नीचे तक छोड़ने आया……… अब मेरा मन प्रसन्न था| पर अगले ही पल याद आया की कहीं ये अपना कल रात का गुस्सा मुझ पर ना निकालें? पर ऐसा नहीं हुआ…गाडी में बैठने के बाद इन्होने कहा; “i’m sorry कल मैंने बिना तुमसे पूछे तुम्हारी नई वाली नाइटी राजी को पहनने के लिए दे दी|” इन्होने थोड़ा गंभीर होते हुए कहा| इनकी ये बात मुझे बहुत अच्छी लगती है (वैसे तो इनकी बहुत सी बातें अच्छी लगती हैं|) की ये अपनी छोटी से छोटी गलती को स्वीकार लेते हैं और सच्चे दिल से माफ़ी माँगते हैं|

“जानू… तो क्या हुआ? एक नाइटी ही तो थी! पर उस बेचारी ने भी सुबह-सुबह नाइटी धोकर वापस दी ये मुझे अच्छा नहीं लगा| मैं धो लेती… इसमें का बात थी|” आधी बात तो मैंने सिर्फ इनका दिल रखने के लिए कही थी|

“नहीं यार वो जानती है की आप पेट से हो ऐसे में वो भला आपको काम कैसे करने देती? वो भी उसके उतारे हुए कपडे धोना! मेरी बीवी के पास सिर्फ यही काम थोड़े ही है?” इन्होने बहुत हँसते हुए कहा और इनका जवाब सुनकर मुझे अछा लगा| लगा जैसे अभी भी इन्हें मेरी परवाह है… मतलब ऐसा नहीं है की इन्हें कभी मेरी परवाह नहीं होती…. पर उन दिनों में कुछ ऐसा ही सोच रही थी| इन्होने गाडी सरोजनी नगर मार्किट की तरफ मोड़ी…… वहाँ पहुँच के इन्होने मुझसे पूछा; “same नाइटी लगी या उससे भी अच्छी?” मैं ये सुनकर हैरान रह गई ………….और खुश भी!! मैंने ख़ुशी से झूम कर कहा; “नई!!!” ये भी हँसते हुए निकले और हमने जा कर मेरे लिए एक नई नाइटी खरीदी| और साथ ही एक नई साडी भी ली…. जो ‘इन्होने’ पसंद की थी| मैं खुश थी…. की कम से कम इनका गुस्सा ठंडा हो गया| अब बारी थी तो उस काम को पूरा करने की जो कल रात मेरी बेवकूफी की वजह से अधूरा रह गया था|आज तो मन बहुत ज्यादा उतावला हो अहा था…. बस रात होने का इन्तेजार कर रही थी| रात होने तक ये मुझसे अब भी हंस कर बात कर रहे थे …हाँ बस जैसे पहले ये मुझे अकेला पा कर छू लिया करते थे वो नहीं था…. पर मैंने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया| रात में सबके खाने के बाद मैं kitchen समेटने लगी और ये अपने कमरे में जा कर लेट गए| मैंने बच्चों का कमरा देखा और दरवाजा बंद कर दिया … माँ अभी भी बैठक में बैठीं टी.वी. देख रहीं थीं| मैं कमरे में आई और जल्दी से दरवाजा बंद किया…. इनको देखा तो ये माथे पर हाथ रख कर शायद सो चुके थे| मैंने जल्दी से कपडे बदले और इनके पास आ कर लेट गई| मैं जानती थी की अभी इनकी आँख नहीं लगी है …इसलिए मैंने इनके दाहिने हाथ को अपना तकिया बनाया और इनसे लिपट गई| इनहोने कुछ भी react नहीं किया… मैं फिर भी इनसे लिपटने लगी …. पर कोई reaction नहीं… आखिर मैंने इनके गाल को kiss किया तब जा कर इनके उन्ह से; “उम्म्म….” निकला|

अब मैं इनके और नदीक आ गई और इनके होठों को kiss करने की कोशिश की तभी….तभी इन्होने मुझे रोक दिया और मेरी आँखों में देखते हुए ना में गर्दन हिलाई| इनका ऐसा reaction देख मैं समझ गई की इनका गुस्सा शांत नहीं हुआ है?

“मुझे माफ़ कर दो…. मुझसे गलती हो गई| कल…..वो…..” मैं इनसे झूठ नहीं बोल सकती थी…. इसलिए चुप हो गई|

“कल क्या? तुम्हें पता है कल मुझे कैसा लगा जब तुम ने मुझे इस तरह झिद्दिक दिया था? इसकी उम्मीद मैंने कभी नहीं की थी! मुझे लगा जैसे मैं तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती कर रहा हूँ! …… तुम्हारा शोषण कर रहा हूँ……खुद से नफरत करने लगा था| ……………….शायद तुम भूल गई की तुमने कभी मुझसे कुछ वादा किया था?” ‘इनकी’ बातों ने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया था|

“पता नहीं मुझे कल क्या होगया था? प्लीज…. मुझे माफ़ कर दो!” मैं रो पड़ी और गिड़गिड़ाने लगी|

“तुम्हें पता है….पर तुम बताना नहीं चाहती| ठीक है…. मैं नहीं पूछूँगा!” ‘इन्होने’ मेरे आँसूं पोछे और मुझे चुप कराया|मुझे लगा की इन्होने मुझे माफ़ कर दिया पर ये दूसरी तरफ मुँह कर के सोने लगे| मैंने इनसे पूछा; “आपने मुझे माफ़ कर दिया?” जवाब में इन्होने बस; “हम्म्म्म….” का जवाब दिया| पर मेरे अंदर तूफ़ान सा खड़ा हो गया था…. मन कह रहा था की तूने इनका प्यार खो दिया…. और मैं चाह कर भी इनसे ये पूछने को नहीं रोक पाई; “तो क्या आप मुझे कभी हाथ नहीं लगाओगे?”

इन्होने कुछ जवाब नहीं दिया…… पर मैंने मन ही मन सोच लिया की मैं इन्हें मना कर ही रहूंगी और इनके दिल में अपना प्यार वापस जगा के रहूँगी|

रात के करीब बारह बजे दरवाजे पर दस्तक हुई| मैं उस समय बाथरूम से निकल रही थी…. मैंने दरवाजा खोला तो नेहा थी और रो रही थी|”आजा बेटा…फिर से बुरा सपना देखा?” ‘इन्होने’ इशारे से उसे अपने पास बुलाया| ये थोड़ा पीछे की तरफ सरक गए और नेहा आकर इनके दाहिने तरफ लेट गई| इन्होने उसे अपनी छाती से लगा लिया और से चुप करने लगे| “बस…बस…बास…मेरा बेटा तो बहुत बहादुर है ना? बस…. अच्छा कहानी सुनोगे?” नेहा ने सर हाँ में हिलाया| इन्होने कहानी शुरू की पर नेहा को अपनी छाती से अलग नहीं किया|मैं भी इंनके पीछे आ कर लेट गई और इनकी कमर पर हाथ रख दिया| इन्होने मेरा हाथ पकड़ के आगे की तरफ खींचा और नेहा की पीठ पर रख दिया| इनकी कहानी सुनते-सुनते कब मुझे और नेहा को नींद आ गई पता ही नहीं चला|

सारी रात नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए निकली| एक पल के लिए भी उसे खुद से जुदा नहीं होने दिया| अब उसका यूँ रात में चौंक कर उठ जाना मुझे गंवारा ना था| मैं जानता था की मेरी बेटी को कोई दिमागी बिमारी नहीं है पर मुझे कैसे भी कर के उसे उसके डर से बाहर निकलना था| अपने बचपन में मैंने भी डरावने सपने देखे थे, जिन्हें देख कर मैं जाग जाया करता था| जब में तकरीबन नेहा की उम्र का था तब मैंने पडोसी दोस्त के घर ‘आहात’ नाम का नाटक देखा था और तब से तो मुझे अकेले रहने में बहुत डर लगने लगा था| उस समय हमारे घर में बाथरूम पहली मंजिल पर था, तो अँधेरे में मैं बाथरूम तक नहीं जाया करता था| जब मैंने ये डरने वाली बात अपने माता-पिता को बताई तो माँ ने तो ये कह दिया की तू इतना बड़ा हो गया है और ऐसी चीजों से डरता है? पिताजी ने तो एक दिन मेरी दडे से सुताई कर दी थी, वो भी इस बात पर की मैं रात में अकेले सोने में डरता था| उस दिन उन्होंने मुझे भगा-भगा के मारा था| मेरे दोस्त लोग मेरा मजाक उड़ाया करते थे की ये देखो भूत-प्रेत से डरता है,, मर्द बन मर्द और अपने डर का सामना कर| हुँह कहना बहुत आसान होता है पर करना उतना ही मुश्किल| पर किस्मत से मेरा ये डर उम्र बढ़ने के साथ निकल गया| मैंने अपना मन पूजा-पाठ में लगाया और भगवान पर भरोसा आने लगा की जब तक वो हैं मेरे साथ कुछ भी गलत नहीं होगा| पर अपनी बेटी नेहा के लिए में बेसब्रा हुआ जा रहा था| मुझे जल्द से जल्द उसकी इस परेशानी का जवाब ढूँढना था| पर कैसे? ये सवाल ही मेरी चिंता का कारण था| मैं ने एक नजर नेहा को देखा, वो अब भी सो रही थी और संगीता भी नींद में थी| मैं उठा और नह धो कर भगवान का नाम लेने लगा, अपनी बेटी के लिए दुआ करने लगा की मेरी बेटी को ये डरावने सपने आने बंद हो जाएँ| जब भी मुझे कुछ सुझाई नहीं देता तो मैं भगवान का नाम लेता हूँ, ये सोच कर की वो मुझे कोई न कोई रास्ता अवश्य ही सुझाएंगे|

शायद रास्ता मिल भी गया| उस वक़्त घडी में पाँच बज रहे थे और मेरी बैचनी बढ़ने लगी थी इसीलिए मैंने डॉक्टर सरिता जी को फ़ोन किया:

मैं: हेलो? डॉक्टर सरिता?

डॉक्टर सरिता: हेलो

मैं: माफ़ कीजिये सरिता जी मैंने आपको इतनी सुबह तंग किया?

डॉक्टर सरिता: अरे कोई बात नहीं मानु| सब ठीक तो है ना?

मैं: जी नहीं| नेहा को हर तीसरे दिन बुरे सपने आते हैं और वो डर के मारे रोने लगती है और आधी-आधी रात को उठ कर मेरे पास आ जाती है| जब-जब मैं उसके साथ सोता हूँ तो वो ठीक रहती है और आराम से सोती है| प्लीज सरिता जी मदद कीजिये!

डॉक्टर सरिता: घबराओ मत सब ठीक हो जायेगा| मैं तुम्हें डॉक्टर अंजलि का नंबर देती हूँ वो बच्चों की मनौवैज्ञानिक हैं| तुम, संगीता और नेहा उनसे जा कर मिलो वो तुम्हारी जर्रूर मदद करेंगी|

मैं: जी ठीक है| आपका बहुत-बहुत शुक्रिया!

डॉक्टर सरिता: मैं तुम्हें अभी नंबर मैसेज करती हूँ|

अगले पाँच मिनट में डॉक्टर सरिता का मैसेज आ गया| मन तो कर रहा था की अभी फ़ोन करूँ पर ये ठीक नहीं होता| इसलिए मैं घडी में दस बजने का इन्तेजार करने लगा| पर ये घडी कम्बखत बहत धीरे चल रही थी| माँ-पिताजी भी उठ चुके थे तो मैंने सोचा की चलो चाय ही बना लूँ|चाय बना कर जब मैं माँ-पिताजी को देने गया तो मेरे हाथ में चाय देख कर माँ-पिताजी परेशान हो गए|

माँ: बहु की तबियत ठीक है ना?

मैं: जी ठीक है|

पिताजी: फिर चाय तू क्यों ले कर आया?

मैं: वो मैं जल्दी उठ गए तो सोचा आज मैं ही चाय बना लूँ|

पिताजी: अच्छा अब जा कर बहु और बच्चों को भी उठा दे|

मैं अपनी और संगीता की चाय ले कर कम्मर में पहुँचा| संगीता बाथरूम से निकल रही थी और मेरे हाथ में चाय का कप देख वो सकपका गई|

संगीता: आप? चाय?

मैं: सारी रात सोया नहीं, लेटे-लेटे ऊब गया था तो उठ कर नहाया फिर पूजा की और फिर भी समय नहीं कटा तो सोचा चाय बना लूँ|

संगीता: नींद क्यों नहीं आई? अब भी नाराज हो मुझसे?

मैं: नहीं यार| मैं नेहा के लिए परेशान हूँ|

संगीता: उसके बुरे सपनों को ले कर? जैसे-जैसे उम्र बढ़ेगी ये बुरे सपने आना बंद हो जायेंगे|

मैं: अब और उसे रोते हुए नहीं देख सकता| तुम चाय पियो मैं बच्चों को उठाता हूँ|

बच्चों को उठा कर स्कूल के लिए तैयार किया और इतनी देर में संगीता ने उनका टिफ़िन भी बना दिया| बच्चों को स्कूल छोड़ कर घर आया तो सोचा की माँ-पिताजी से नेहा के बारे में बात कर लूँ|पिताजी अखबार पढ़ रहे थे और माँ साग चुन रही थी| संगीता भी माँ के साथ साग चुन रही थी|

मैं: माँ … पिताजी… आप लोगों से कुछ बात करनी है|

पिताजी ने अखबार मोड़ के रख दिया और माँ और संगीता भी रूक गए| सबका ध्यान मेरी तरफ था:

मैं: पिताजी मैंने डॉक्टर सरिता को फ़ोन किया था|

पिताजी: किस लिए?

मैं: कल रात को नेहा फिर से ….. (मैंने अपनी बात पूरी नहीं की और पिताजी भी समझ गए|)

पिताजी: बेटा तू क्यों चिंता करते है| बुरे सपने सब बच्चों को आते हैं और चूँकि वो छोटे होते हैं इसलिए दर जाते हैं| जब वो बड़े हो जाते हैं तो उनका ये दर खत्म हो जाता है| तू चिंता ना कर वरना फिर से बीमार पड़ जायेगा|

संगीता: पिताजी कल रात भर नहीं सोये| (संगीता ने मेरी चुगली की|)

माँ: बेटा एक बात बता तू फिर से बीमार पड़ना चाहता है?

मैं: नहीं माँ ऐसा नहीं है| आप एक बात बताओ, क्या आप लोग कभी मेरी आँखों में आँसूं देख पाते थे? फिर मैं अपनी बेटी को रोता हुआ कैसे देखूं? और चलो एक आध बार की बात होती तो ठीक था पर हर तीसरे दिन उसका इस कदर डर जाना?

संगीता(मेरी बात काटते हुए): ये सब मेरी…….

मैं (संगीता की बात काटते हुए): Shut up संगीता!

मैंने संगीता को झिड़कते हुए कहा| उसका कारन ये था की मैंने अपने माँ-पिताजी को संगीता और अपने बारे में सब कुछ नहीं बताया था| वरना उनके मन में शायद संगीता की वो छबि न बन पाती जो मैं चाहता था| अब आप लोग इसे सही कहें या गलत ये आपके ऊपर है|

मेरा इस कदर संगीता को झिड़कना पिताजी और माँ को पसंद नहीं आया क्योंकि वे मुझे घूर कर देख रहे थे| मेरी झिड़की से संगीता सहम गई और खामोश हो गई थी तथा अपना सर झुका कर बैठी थी| मैंने अपनी बात जारी रखी:

मैं: अगर ये सब प्राकर्तिक भी है तो भी मैं एक बार अपने मन की तसल्ली के लिए डॉक्टर से मिलना चाहता हूँ| डॉक्टर सरिता ने मुझे मुझे एक बाल मनोवैज्ञानिक डॉक्टर अंजलि का नंबर दिया है| मैं उन्हें फोन कर के कल की अपॉइंटमेंट ले लेता हूँ|

पिताजी: जैसा तुझे ठीक लगे, पर तू नेहा को क्या कहेगा?

मैं: यही की आगे चल कर उसे क्या करना है इसके लिए एक जानकार से परामर्श लेने जा रहे हैं| उसे ये सब बोल कर मैं मानसिक रोगी नहीं बनाना चाहता| उसके सामने हम ऐसे ही पेश आएंगे जैसे ये कोई आम बात है|

पिताजी: ठीक है|

इतना कह कर पिताजी उठ कर चले गए|

नाश्ते के बाद पिताजी तो साइट पर निकल गए| पर मैं घर पर रूक कर डॉक्टर अंजलि को फ़ोन करने लगा| एक बार मिलाया, पर नंबर व्यस्त था| पंद्रह मिनट बाद मिलाया फ़ोन फिर से व्यस्त था| अब धीरे-धीरे मन व्याकुल होने लगा और इस बार भगवान का नाम ले कर फिर मिलाया| इस बार…. फ़ोन लग गया| फ़ोन उनकी सेक्रेटरी ने उठाया, मैं गुस्से में इस कदर जल रहा था की मैं उसी पर बरस पड़ा| मैंने उसे इतना डाँटा… इतना डाँटा की वो बेचारी मुझसे माफियाँ माँगने लगी| वो लड़की अपने बॉयफ्रेंड से लैंडलाइन पर बात करने में व्यस्त थी| उसने मुझे परसों की अप्पोइंमेंट दी पर जब मैंने उसे धमकाया तो उसने मुझे कल की अपॉइंटमेंट दे दी| चूँकि कुछ देर पहले मैं उस लड़की डाँट रहा था तो जाहिर था की मेरी ऊँची आवाज मेरी बेगम संगीता के कानों तक पहुँची थी| उन्होंने जब मेरी नाराजगी का कारण पूछा तो मैंने उन्हें सब बात बताई| मेरी बात सुन कर वो भी मेरी बात से सहमत थीं|
मैं: मुझे माफ़ कर दो, मैंने उस समय तुम्हें इस कदर झिड़क दिया| दरअसल मैं नहीं चाहता की तुम उन पुरानी बातों को माँ-पिताजी के सामने दोहराओ| मैंने कुछ सोच-समझ कर उन्हें ये बातें नहीं बताई| और जो कुछ भी हुआ उसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी| तुम्हारी जगह मैं होता तो मैं भी वही करता|
संगीता: नहीं…. आप नेहा के साथ ऐसा कभी नहीं करते| नेहा के साथ क्या आप किसी भी बच्चे की परवरिश के साथ ऐसी लापरवाही कभी नहीं करते| आप बच्चों से बहुत प्यार करते हो! मैंने जो किया वो बहुत गलत था…. बहुत-बहुत गलत|
मैं: पर अब तो ऐसा नहीं है| अब तो हम सब साथ हैं|
संगीता: शायद… सच पूछो तो अब मेरे अंदर आपके सिवा किसी और के लिए प्यार नहीं बचा| बच्चों के लिए भी नहीं! जानती हूँ की आप उनकी परवरिश बहुत अच्छे से कर सकते हो और करोगे भी|
आगे मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही फ़ोन की घंटी बज उठी| कुछ जर्रुरी काम की वजह से मुझे फटफट निकलना पड़ा| निकलने से पहले मैंने संगीता को एक प्यारी सी झप्पी दी और फिर मैं निकल गया| गाडी चलते हुए मेरे दिमाग में बस संगीता की बातें गूँज रही थीं| मैं जानता था की वो मुझसे कितना प्यार करती है और मुझे पाने के लिए कुछ भी कर सकती है| पर मैं चाहता था की वो बच्चों को भी उतना ही प्यार दे| कहीं मेरे कारन मेरे बच्चे अपनी माँ के प्यार से वंचित न रह जाएँ| मुझे ये बात संगीता को समझनी थी पर सही समय आने पर|
अपॉइंटमेंट वाले दिन मैं, नेहा और संगीता डॉक्टर अंजलि के चैम्बर पहुँच गए| नेहा को बाहर छोड़ कर हम दोनों अंदर डॉक्टर के केबिन में बैठ गए| हमने डॉक्टर साहिबा को सारी बात बता दी|हमारी सारी बात इत्मीनान से सुनने के बाद उन्होंने हमें बाहर बैठने को कहा और नेहा को अंदर बुलाया|नेहा से करीबन 20 मिनट तक बात करने के बाद उन्होंने हमें अंदर बुलाया और नेहा को फिर से बाहर बैठने को कहा| मैंने अपना मोबाइल नेहा को दे दिया ताकि वो उसमें कुह गेम आदि खेले और बोर न हो जाए|

cabin के अंदर जो हुआ वो मैं आज पहली बार experience कर रही थी| मुझे लगता था की माँ-बाप बच्चों की सिर्फ अच्छी परवरिश की जिम्मेदारी उठाते हैं| पर आज मुझे पता चला की एक अच्छी परवरिश ही नहीं बल्कि उन्हें एक अच्छा इंसान बनाने की भी जिमेदारी माँ-बाप के सर होती है|
डॉक्टर साहिबा जी को शक था की हमारी शादी से नेहा खुश नहीं है….. या फिर शादी के बाद हम बक्छों पर जरा भी ध्यान नहीं देते| पर ‘इन्होने’ उनका ये शक मिटा दिया| डॉक्टर साहिबा ने इनसे नेहा के बारे में बहुत से सवाल पूछे जिन्हें मैं आपके सामने उसी तरह पेश कर रही हूँ जैसे ‘ये’ लिखते हैं| (आशा करती हूँ आपको ये पसंद आएगा|)
अंजलि : मैंने नेहा से बात की…. और मुझे ये पता चला की वो आपसे बहुत प्यार करती है| आखिर लड़कियाँ होती हैं अपने पिता की सबसे लाड़ली|

मैं: पर आयुष भी ‘इनसे’ उतना ही प्यार करता है| बल्कि इनका जाड तो हर बच्चे के सर चढ़ कर बोलता है|

मैंने कुछ ज्यादा ही confidence में आ कर ये कह दिया……. ये सुन कर डॉक्टर अंजलि मेरी तरफ हैरानी से देखने लगीं तब मुझे एहसास हुआ की मैंने ये क्या कह दिया! पर तभी ‘इन्होने’ जैसे-कैसे बात संभाली|

“वो….. actually बच्चों के साथ मेरी अच्छी understanding है|”

अंजलि: ok …. तो आप दोनों सबसे ज्यादा किसे प्यार करते हैं?

मैं: दोनों बच्चों को …. (मेरा जवाब शायद satisfactory नहीं था…… इसलिए इन्होने फिर बात संभाली|)

“हमने आज तक बच्चों को ये महसूस नहीं होने दिया की हम उनके साथ किसी तरह का पक्षपात करते हैं| अगर नेहा रात को मेरे पास सोती है तो दिन में मैं और आयुष साथ-साथ computer पर game खेलते हैं| मैं दोनों को बराबर प्यार करता हूँ…. किसी को कम किसी को ज्यादा नहीं|

अंजलि: और आप संगीता?

मैं: जी ….मैं भी| (मैं झूठ नहीं बोल सकती थी ……पर अपने पति को भी झूठा नहीं बनाना चाहती थी| इसलिए मैंने बिना किसी confidence के जवाब दिया|)

उन्हें ये पता चल ही गया होगा की मैं ‘इनसे’ बहुत प्यार करती हूँ….. पर उन्होंने इस बात को उस समय ज्यादा कुरेदा नहीं|

(10-02-2016 03:48 AM)  Le Lee 0
अंजलि जी ने ‘इनसे’ नेहा से जुड़े कुछ सवाल पूछे… हैरानी की बात ये थी की उनका ध्यान केवल ‘इन्हीं’ पर था| ऐसा लग रहा था जैसे वहां कोई interview चल रहा हो!

अंजलि: नेहा का favorite subject क्या है?

“mathematics”

अंजलि: नेहा की favorite teacher?

“माथुर mam … और वो history पढ़ाती हैं!”

अंजलि: favorite food?

“राजमा चावल…. और chips !!!”

अंजलि: best friend?

“……..” इनके पास कोई जवाब नहीं था……और मेरे पास तो ऊपर के किसी सवाल का जवाब नहीं था! सच में हमारा कभी इस बात पर ध्यान ही नहीं गया की नेहा का कोई दोस्त नहीं है| घर में वो हमेशा चिहुँकती रहती थी …… मुझे तो हमेशा लगता था की वो बहुत खुश है|

अंजलि: नेहा भी इसी तरह चुप थी| क्या आपने कभी नहीं सोचा की ………..

“जी नहीं….. तो क्या उसकी इस हालत का कारन दोस्त न होना है?” (‘इन्होने’ अंजलि की बात काटते हुए कहा|)
अंजलि: नहीं ये कारन तो नहीं है पर मैं जानना चाहती थी की आप अपनी बच्ची के बारे में कितना जानते हैं| please बुरा मत मानिये पर वो आपका अपना खून नहीं है ……. और आमतौर पर fathers उन्हें उतना प्यार नहीं देते!

मैं: ये आप क्या कह रहीं हैं? ऐसा कटाई नहीं है…. आपने नेहा से बात की ना? क्या आपको लगता है की ‘ये’ उसे प्यार नहीं करते? नेहा के बारे में मुझसे ज्यादा ‘ये’ जानते हैं और फिर भी आप ऐसा कह रहीं हैं!

अंजलि: आप माँ हैं…. और आप ही अपने बच्ची पर ध्यान नहीं देतीं? आपके रूखे बर्ताव के कारन वो इतना डर चुकी है की सपनों को सच मान लेती है| वो तो उसे अपने पापा के प्यार का सहारा है तो वो खुद को संभाल लेती है …. वरना कुछ गलत भी हो सकता था|

अंजलि की बातें सच थीं …. और बहुत कड़वी भी| पर मैं helpless थी…. चाहे कुछ भी करूँ मेरा ध्यान ‘इन’ पर से हटता ही नहीं था| मैंने अपने प्यार को इन्हें समर्पित कर दिया था….. ! “तो डॉक्टर अब हमें क्या करना चाहिए?”

अंजलि: i m sorry पर इसका इलाज दवाइयों से possible नहीं है| ये तो आपको खुद ही सम्भालना पड़ेगा … ख़ास तौर पर आप! आप उसके पापा हैं और सबसे ज्यादा प्यार भी वो आपसे करती है|

इन्होने कुछ जवाब नहीं दिया …….. बस हाँ में सर हिलाया और हम उठ कर बाहर आ गए| मैं जानती थी की इन्हें ये सब सुनकर कितनी तकलीफ हुई है….. और सच पूछो तो मैं ये सोच रही थी की हम यहाँ आये ही क्यों? क्या ये सब सुनने के लिए? ये कैसी counsellings थी? गलती मेरी थी और सुन्ना ‘इन्हें’ पड़ा|बाहर waiting hall में आने पर पता नहीं कैसे इन्होने अपने expression बदल लिए और हँसते हुए नेहा का हाथ पकड़ के बाहर आ गए| मैं जानती थी की ये नेहा से लाख छुपाएं पर मुझसे अपने जज़्बात नहीं छुपा सकते| गाडी में बैठे-बैठे मैं बेचैन होने लगी और मुझे एक तरह से गुस्सा आने लगा की ऐसा क्यों है? क्यों नेहा ने कोई दोस्त नहीं बनाया? इसलिए जब मैंने नेहा से पूछा; “नेहा…. क्या ये सच है की तुम्हारा…….” मेरे आगे कुछ कहने से पहले ही इन्होने मेरी बात काट दी; “lets not discuss it here ….. ” और इधर नेहा मेरा अधूरा सवाल सुन कर कुछ सोचे लगी तो इन्होने बात घुमा दी; “यार मुझे भूख लग रही है… anybody wants pizza?” ये सुनकर नेहा का ध्यान भटक गया और उसने खुश होते हुए अपना हाथ ऊपर उठा दिया| अपने गम को छुपाना कोई इनसे सीखे…. गाडी पार्क करे के बाद नेहा आगे-आगे रेस्टुरेंट की तरफ भाग रही थी जिससे ‘इन्हें’ मुझे समझने का समय मिल गया| “please अभी इस बात को एह से discuss मत करो| हम इस पर पहले खुद बात कर लें!” ये मुझे समझाना कम और डाँटना ज्यादा लगा|

“आप ये बताओ की क्यों पैसे फूंकें इतने? सिर्फ यही सुनने के लिए की ये ‘आपको’ खुद सम्भालना पड़ेगा! अभी भी तो ‘आप’ ही संभाल रहे हो?” मैंने थोड़ा चिड कर कहा|जवाब में ‘इन्होने’ कहा; “वहाँ जाने से ये तो पता चला की मेरी बेटी का कोई दोस्त नहीं है! and correct me if i m wrong …. ये बात हमें घर में रहते हुए आजतक पता नहीं चली!” ‘इनकी’ ये बात सच थी…

इन्होने cheese capsicum and onion वाला पिज़्ज़ा आर्डर किया| पिज़्ज़ा खाते-खाते इन्होने नेहा का ध्यान भटकाने के लिए random topic छेड़ दिया|पिज़्ज़ा खाने के बाद हम वहाँ से निकले और रास्ते भर ‘इन्होने’ नेहा का ध्यान जरा सी भी देर के लिए उन बातों पर जाने न यहीं दिया| घर पहुँच कर नेहा ने अपनी पढ़ाई शुरू कर दी….. और मैं, माँ और ‘ये’ बैठक में चाय पीने लगे| माँ ने इनसे डॉक्टर से जो बात हुई उसके बारे में पूछा और ‘इन्होने’ censored बात माँ को बता दी| (मेरी गलतियों का ‘इन्होने’ जिक्र नहीं किया|) बातें सुनने के बाद माँ ने भी कहा की क्या जर्रूरत थी पैसे फूंकने की….. पर ये चुप रहे| आखिर माँ उठ कर अपने कमरे में आराम करने चली गेन और ये किसी गहरी चिंता में मग्न हो गए| मैं ने ‘इनका’ ध्यान भटकने की सोची …. मैं उठी और ‘इनके’ बगल में आ कर बैठ गई…. अपनी दाहिनी बाह इनके कंधे पर धीरे से रखी की कहीं इनका ध्यान भांग ना हो जाए…. और फिर धीरे से अपने होंठ इनके गाल के पास ले आई और kiss करने लगी|

इससे पहले की मेरे होंठ इनके दाढ़ी वाले गालों से मिल पाते ये एक दम से उठ खड़े हुए|मुझे बहुत बुरा लगा …. बहुत ज्यादा! इन्होने कुछ नहीं कहा और बाहर चले गए…… मैं अपने कमरे में आई और सोचने लगी की आखिर ‘इन्होने’ ऐसा behave क्यों किया? क्या अंजलि ने जो कहा उसके कारन? या फिर ये उस दिन की बात के लिए ‘ये’ अब भी मुझसे नाराज थे? फिर मुझे लगा की ‘इन्हें’ उस दिन कैसा लगा होगा जब मैंने इनके साथ इसी तरह behave किया था? हाँ …. हो न हो… ये मुझे feel करवा रहे थे की ‘इन्हें’ उस दिन कैसे लगा था! मैंने सोचा इनके आने पर मैं इनसे माफ़ी माँग लूँगी…. मैं उठी और lunch की तैयारी में लग गई| खाने के समय तक पिताजी और ‘ये’ दोनों लौट आये थे| ‘ये’ सीधा हमारे कमरे में fresh होने चले गए… और मैं भी इनके पीछे-पीछे कमरे में पहुँच गई| उस समय ‘ये’ bathroom में थे… मैं सोचने लगी की बात शुरू कैसे करूँ?

जैसे ही ये bathroom से बाहर आये और तौलिये से अपना मुँह पोंछने लगे मैंने बात शुरू की; “आप ये दाढ़ी क्यों बढ़ा रहे हैं? आप clean shave कितने अच्छे लगते थे….. आपको पता है कितने time से मैंने आपके गालों को kiss नहीं किया| जब भी मैं आपको kiss आने आती हूँ तो ये दाढ़ी बीच में आ जाती है| मेरा भी मन करता है की मैं आपके गाल पर वो ‘love bites’ बनाऊँ… और फिर आपको भी तो पसंद हैं वो….!!! ” (मैंने इन्हें आँख मारते हुए कहा|)

“जानू मैं इसलिए दाढ़ी रखता हूँ ताकि mature लगूँ … clean shave में मैं बच्चा लगता हूँ! अब तो जल्दी ही तीन बच्चों का बाप बनने वाला हूँ कम से कम अब तो mature लगने दो!”

“तो क्या तीन बच्चों का बाप clean shave नहीं रह सकता?” मैंने सवाल किया|

“यार समझा करो… मुझे तुम्हारे compatible लगना है|”

“असल में तो मुझे आपके compatible लगना चाहिए…. “

“वो तुमसे होगा नहीं!” इन्होने मुझे टोंट मारा|
इसका टोंट का कारन ये है की मैंने अस बहु बनने का ही इरादा कर रखा था| जबकि इनका कहना था की बहु बनने के साथ थोड़ा fashionable भी दिखो| इसलिए शुरू-शुरू में ये मेरे लिए अलग-अलग तरह की साड़ियाँ लाते थे…वो करधनी जो हमने हमारे family holiday cum honeymoon पर ली थी वो भी ऐसी की ऐसी रखी है| इतनी सुन्दर-सुन्दर साड़ियाँ …wow …. पहनों तो लगे जैसे की कोई ‘महारानी’! और एक मैं पागल हूँ जो उन्हें पैक कर के रखती हूँ| designer झुमके … nail polish ….. पायल….. काजल … lipstick …. सब ला कर दिया इन्होने… और तो और इनकी पसंद की मैं कायल हूँ| सच में …… मैं इनकी पसंद की कुछ कदर ही नहीं करती| और ये हैं की इन्होने मुझे टोकना भी बंद कर दिया… हाँ वैसे भी इतनी बार प्यार से बोला … समझाया मुझे…पर मैं ने कभी इनकी बात नहीं मानी| आप लोग भी सोचेंगे की कैसी पत्नी है? अपनी पति की ख़ुशी के लिए इतना भी नहीं करती……. और ये हाल तो तब है जब पिताजी (ससुर जी) या माँ (सासु जी) को मेरे सजने सँवारने पर कोई ऐतराज नहीं है| पर इनकी ई एक खासियत है…. ये अभी तक यहीं बदले… जरा भी नहीं… मैं जैसी थी इन्होने मुझे वैसा ही accept किया… वही गाँव की गंवार जैसी बीवी… और इन्हें अब भी मुझ पर फक्र है! कभी मुझे बदलने के लिए यहीं कहा…. अभी तक जो भी मैं खुद को बदल सकी वो इसलिए ताकि हमारे बच्चों को हमारे कारन कोई embarrassment न झेलनी पड़े| खेर उस दिन मुझे एक बात समझ आई…. वो ये की दुनिया की नजर में मेरी उम्र और ‘इनकी’ उम्र में अंतर साफ़ झलकता था| उस अंतर को छुपाने के लिए ‘इन्होने’ दाढ़ी उगाने का सहारा लिया| ‘ये’ मुझसे इतना प्यार करते हैं की इन्होने ये बात मुझसे छुपाई……..कारन ये की ‘ये’ मुझे दुखी नहीं करना चाहते थे….. इतना प्यार करते हैं ये मुझसे!

उस दिन शाम को पिताजी को ‘इन्होने’ नेहा की सारी रिपोर्ट दी और अब हमें क्या करना है उसके बारे में भी बताया| इनकी बात सुन कर मैं थोड़ा हैरान रह गई…. पता नहीं ये क्या-क्या सोचते रहते हैं| ‘इन्होने’ अपने प्लान पर काम करना शुरू कर दिया……….

रात को खाना खाने के बाद मैंने आयुष को सुला दिया …. इधर ‘इन्होने’ नेहा से कह दिया की; “बेटा… मुझे आपसे दो मिनट बात करनी है| आप फ्री हो कर आ जाना|” नेहा तुरंत ही अपना बैग पैक कर के हमारे कमरे में आ गई और हम दोनों के बीच में बैठ गई| ‘इन्होने’ पहले उसका माथा चूमा … उसे अपने सीने से लगाया और फिर बात शुरू की;

“नेहा… बेटा क्या सच में आपका कोई best friend नहीं है?”

“नहीं पापा… मुझे किसी best friend की जर्रूरत नहीं, आप जो हो मेरे पास!”

“पर बेटा एक friend तो हर एक को चाहिए होता है|” मैंने कहा|

“पर किस लिए मम्मी?”

“बेटा… आप उससे अपने दिल की हर बात कर सकते हो|” इन्होने मेरी बात को आगे बढ़ाया|

“वो तो मैं करती हूँ…. आप से|”

“आप उससे हंसी मजाक करते हो…. उसके साथ घूमने जाते हो…. उससे homework में मदद लेते हो… खाते-पीते हो… enjoy करते हो|” इन्होने नेहा को और विवरण दिया|

“पापा…. मैं आपके साथ हँसी-मजाक करती हूँ… आपके साथ घूमने जाती हूँ… आप अलग-अलग तरह का खाना खिलते हो…. इतना enjoy आर्वाटे हो….और रही बात homework में मदद लेने की तो उसकी मुझे कोई जर्रूरत ही नहीं| मैं पहले से ही पढ़ाई में बहुत sharp हूँ… और ये बात मुझे दादाजी कहते हैं| फिर ऐसे में मुझे एक friend की क्या जर्रूरत? आप हो ना उसकी कमी पूरी करने के लिए?” “पर मैं हमेशा तो नहीं रहूँगा ना?” ‘इन्होने’ काफी गंभीर होते हुए कहा| ये सुन कर नेहा की आँखें भर आईं…….उसने रोते-रोते कहा; “आप ऐसा क्यों बोल रहे हो पापा?”

“बेटा… मैं सच कह रहा हूँ| एक न एक दिन तो सब को…….” मैंने ‘इनके’ कुछ कहने से पहले ‘इनके’ होंठों पर हाथ रख ‘इन्हें’ आगे कुछ बोलने से रोक दिया| “आप प्लीज ऐसा मत बोलो|” मैंने इन्हें मना किया क्योंकि नेहा बहुत दुखी हो गई थी| इन्होने नेहा के आँसुं पोछे और उसे अपने सीने से लगा लिया| कमरे में सन्नाटा छा गया….. दस मिनट तक हम सब चुप रहे|
“नेहा…. बस बेटा अब रोना नहीं….. अब बताओ क्या बात है? क्यों आपके friends नहीं हैं?” इन्होने नेहा को पुचकारते हुए पूछा| पर नेहा ने जवाब में अपना सर झुका लिया… नजरें नीचे कर जैसे इस सवाल से बचना चाह रही थी|

“बोलो बेटा…” मैंने भी थोड़ा जोर दिया|

“आप दोनों भी यही सवाल पूछ रहे हो? उधर वो आंटी जी भी यही अवाल पूछ रही थीं| मेरे दोस्त ना होने का बुरे सपने देखने से क्या लेना-देना है?” नेहा की बात सुन कर मैं चौंक गई और ‘इनकी’ तरफ हैरानी से देखने लगी| पर इनके चेहरे पर मुझे जरा भी हैरानी नहीं दिखी…. जैसे की ये सब जानते हों| फिर ‘इन्होने’ मेरी तरफ देखा और बुद-बढ़ाते हुए कहा; “जैसी माँ … वैसी बेटी!” …. मतलब मेरी ही तरह नेहा भी छुप-छुप कर बातें सुना करती थी| एक बात साफ़ हो गई थी…. की कुछ तो था जो नेहा हम से छुपा रही थी|”नेहा…” इन्होने नेहा का हाथ पकड़ा और अपने सर पर रख दिया और उसे अपनी कसम दे डाली; “आपको मेरी कसम… बोलो क्या बात है?”

नेहा की आँखें फिर छलक आईं और उसने रोते-रोते सब बोला; “मेरी क्लास में एक लड़का है…. वो और उसके दोस्त मुझे बहुत चिढ़ाते हैं!”

“क्यों? मेरी बेटी ना तो मोती है… ना पतली है…. ना उसे चस्मा लगा है…. तो फिर वो तुम्हें क्यों चिढ़ाते हैं?” मैंने कारन पूछा| नेहा फिर से चुप हो गई…..

“नेहा … अपने पापा से बातें छुपाओगे|” इनका कहना था की नेहा फिर से इनके सीने से लग गई और फफक-फफ़क के रोने लगी…..

“वो मुझे आप दोनों के……… शादी…..करने से……” नेहा ने बहुत मुश्किल से ये सब बोला| इन्होने नेहा को अपने सीने से लगाए रखा और उसकी पीठ सहलाने लगे|

बात हमें समझ आ गई थी….. हमारी शादी ……. इस समाज के लिए चर्चा का बहुत बड़ा topic है…. लोगों को हमारा प्यार नजर नहीं आता….. बल्कि हमें और हमारे परिवार को वो उंच-नीच के बंधनों से बाँध कर रखना चाहते हैं! मैं इनसे प्यार करती हूँ… ‘ये’ मुझसे प्यार करते हैं… तो दुनिया को प्रॉब्लम क्या है? क्यों हमें हैं से नहीं जीने देती? बाकायदा शादी की है ‘इन्होने’ मुझसे फिर भी दुनिया को बस हमारी उम्र के अंतर में ज्यादा रूचि है! क्यों हमारे इस प्यार की सजा हमारे बच्चों को दी जाती है?

पर अभी नेहा की बात पूरी नहीं हुई थी…….. ‘इन्होने’ थोड़ा प्यार से जोर दे कर उससे पूछा; “बेटा… उस लड़के का नाम क्या है जो आपको तंग करता है?” नेहा ने सुबकते हुए अपनी बात पूरी की; “अक्षय….यादव….. वो हमारी….. ही ….. गली में……. रहता है…… हमेशा मुझे tease करता है……. कहता है…. तेरे पापा ने …… अपने से ……….. बड़ी………… लड़की से………. ” बस आगे बोलते-बोलते नेहा फिर से रो पड़ी| इन्होने उसे चुप कराना चाह…. “बस मेरी बच्ची….. बस…..”

“वो….. किसी को …… मेरा …..दोस्त नहीं …….. बनने देता| जब भी. कोई मुझसे…….. बात करता… है तो ये……उसे भी चिढ़ाने लगता है…….. इसलिए कोई…… मुझसे बात ..नहीं करता|” नेहा ने रोते-रोते कहा …. और फिर उसे खाँसी आ गई| मैंने जल्दी से उठ कर उसे पानी ला कर दिया और इन्होने उसे अपनी गोद में बिठाया हुए पानी पिलाया और उसकी पीठ को सहला कर उसे शांत किया| “बस बेटा…. अब मेरी बच्ची को कोई तंग नहीं करेगा|” नेहा की बातें मेरे दिलों-दिमाग में घर कर गईं…. मुझे खुद से नफरत होने लगी| मेरे एक गलत फैसले ने मेरी बच्ची को इतना दुःख दिया…. सच में मैं बहुत स्वार्थी हूँ…… अपने बच्चों के भविष्य के बारे में जरा भी नहीं सोचा| अपने प्यार को पाने के लिए मैंने बच्चों का भविष्य दाँव पर लगा दिया! कैसी माँ हूँ मैं? यही सोच-सोच कर मैं अंदर ही अंदर कुढ़ने लगी थी….. मुझे पता ही नहीं चला कब इन्होने नेहा को गोद में ले कर सुला दिया और उसे आयुष वाले कमरे में लिटा कर आ गए| “संगीता….संगीता…..hey ……” इनकी आवाज सुनकर मैं अपने ख्यालों से वापस आई|”क्या हुआ? क्या सोच यही हो?” ‘इन्होने सवाल पूछा… और जो मेरे दिमाग में चल रहा था मैंने वो सब बोल दिया|”

“हमारी एक गलती ने बच्चों की ये हालत कर दी|” मेरे इस पूरे वाक्य में ‘इन्हें’ “गलती” शब्द बहुत बुरा लगा … और ये मुझपर बरस पड़े|

“गलती….. मेरे प्यार को तुम गलती का नाम देती हो? आयुष मेरी गलती है? या फिर ये बच्चा जो तुम्हारी कोख में है वो एक गलती है? how could you say this? i don’t give a danm what this society thinks of me and you …. what really matters is YOU! और तुम्हें ये प्यार गलती लगता है तो सच में मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई|” इसके आगे इन्होने कुछ नहीं कहा और ये कम्बल ओढ़ कर दूसरी तरफ मुँह कर के लेट गए| मुझे एहसास हुआ की मैंने इनका दिल दुखाया है….. हमारे ‘पाक़’ प्यार को मैंने ‘गलती’ कह कर इनके प्यार को गाली दी है| जो इंसान मेरे साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताने के लिए अपने परिवार से लड़ पड़ा हो … उसके प्यार को ‘गलती’ कहना उसके दिल को चोट पहुँचाना हुआ| मैं ‘इनकी’ बगल में लेट गई और इन्हें sorry बोलने लगी….. “sorry जानू…. प्लीज मुझे माफ़ कर दो! मेरा ये मतलब नहीं था…. प्लीज…. प्लीज….” पर ‘इन्होने’ कोई जवाब नहीं दिया और दूसरी तरफ करवट किये हुए लेटे रहे| मैंने जोर लगा कर ‘इन्हें’ अपनी तरफ घुमाया और फिर ‘इनके’ दाहिने हाथ को अपना तकिया बनाया और अपना दाहिना हाथ ‘इनकी’ छाती पर रख सो गई| सच में …. चाहे कितनी भी tension हो… गम हो… तकलीफ हो… इनके हाथों को तकिया बनाके कर लेटते ही सब भूल जाती हूँ|इनका दिल इतना बड़ा है की मेरी हर गलती माफ़ कर देते हैं…. रात तीन बजे फिर से दरवाजे पर दस्तक हुई… मैं जानती थी की नेहा होगी… इसलिए मैं जल्दी से उठी और उसे गोद में उठा कर लाइ … उसके माथे को चूमा और फिर इनकी बगल में लिटा दिया| फिर मैं बाहर गई और आयुष को भी गोद में उठा लाइ और उसे भी नेहा के बगल में लिटा दिया|

सुबह मैं ‘इनके’ जागने से पहले उठ गई…. माँ-पिताजी को चाय दी और बच्चों को बारी-बारी तैयार कर दिया| जब ‘इनकी’ चाय ले कर आई तो देखा ‘ये’ अब भी सो रहे थे| ‘इन्हें’ सोता हुआ तो मैंने कई बार देखा था…. पर आज कुछ ज्यादा ही प्यार आ रहा था ‘इन’ पर! जैसे एक छोटा बच्चा सोते समय cute लगता है… वैसे ही आज ‘ये’ भी सोते हुए बहुत cute लग रहे थे| मुझसे खुद पर काबू नहीं रहा …. मैंने चाय ‘इनके’ सिरहाने राखी और इनके पास बैठ गई और ‘इन्हें’ प्यार निहारने लगी….. आँखें जैसे तृप्त ही नहीं हो रही थीं…. क़ाश सारी जिंदगी ‘इनको’ निहारती रहूँ! इनके अधरों को देख … मेरा मन मचलने लगा था….. और जब खुद पर काबू ना रहा तो मैंने झुक कर उन अधरों को चूम लिया| मेरे दोनों हाथ इनके गालों पर थे …. दिल नहीं कर रहा था की इनके अधरों को अपने होठों की गिरफ्त से आजाद करूँ…. शुरू-शुरू में इनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही थी….. क्योंकि ये अभी भी नींद में थे| फिर धीरे-धीरे इनके अधरों ने भी जवाब देना शुरू कर दिया| मेरा दिल नहीं चाहता था की वो परमसुख जो मुझे आज इतने दिनों के बाद मिल रहा है वो ख़त्म हो…. (आयुष के जन्मदिन से ले कर आजतक इन्होने मुझे छुआ नहीं था|) पर किसी न सच ही कहा है… हर अच्छी चीज कभी न कभी ख़त्म हो ही जाती है| वही मेरे साथ उस दिन हुआ…. आयुष एक दम से कमरे में आ गया और उसकी हहलकदमी ने हमारा वो ‘चुम्बन’ disturb कर दिया| मैं शर्म के मारे बाथरूम में घुस गई… और ये भी उठ बैठे|

मैं बाथरूम में खड़ी दोनों की बातें सुनने लगी….

“पापा कल रात को एक जादू हुआ|”

“अच्छा… क्या जादू हुआ?”

“मैं कल अपने कमरे में सोया था… और सुबह उठा तो आपके बेड पर था|” ये सुन कर ‘ये’ हँस पड़े…. और तभी मैं भी बाहर आ गई| मुझे देख इन्होने कहा; “बेटा … ये जादू आपकी माँ का है| आज सुबह मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ…. मैं तो सपना देख रहा था की मैं. आप और नेहा hide and seek खेल रहे हैं…. आप दोनों छुपे हुए हो और मैं आप दोनों को ढूँढ रहा हूँ….. की नजाने कहाँ से एक परी आ गई… और मुझसे बात कर रही है| फिर अचानक से….” इनकी बात पूरी होने से पहले आयुष बोल उठा; “और मम्मी ने आपको kiss किया| ही…ही…ही…ही…” उसकी बातें सुन कर मेरे गाल शर्म से लाल हो गए| तभी नेहा भी आ गई और आयुष को गुस्सा करने लगी; “शैतान….. बहुत बदमाश हो गया है तू! मम्मी….. सब लड़के एक जैसे होते हैं|” ये कहते हुए नेहा ने मेरा पक्ष लिया….. ये मेरे लिए पहलीबार था! ‘ये’ मेरी तरफ देख मुस्कुरा रहे थे और मेरे गाल लाल हो रहे थे……!

loading...

Leave a Reply