मुन्नार का सफर part 7

सुबह के नौ बजे थे, डॉक्टर सरिता भी आ चुकी थीं और सारे लोग कमरे में ही बैठे थे| डॉक्टर सरिता सब को क्या-क्या एहतियात बरतनी है उसके बारे में सब बता रही थी| उनके अनुसार तो अब कोई घबराने की बात नहीं थी| पर सब के दिलों को चैन तब मिलता जब वे इन्हें होश में देखते! जब इन्हें होश आया तो सब के सब फिर से हमें घेर कर खड़े हो गए! सबको अपने पास देख के इनके (मेरे पति के) चेहरे पर मुस्कान आई….हाय! क्या कातिल उस्काण थी वो! ऐसा लगा मानो एक अरसे बाद उनकी मुस्कान देख रही हूँ! इन्हें मुस्कुराता हुआ देख सबके दिल को इत्मीनान हुआ और मेरी माँ और सासु माँ ने इनकी नजर उतारी और भगवान को शुक्रिया अदा किया| नेहा तो बेड पर चढ़ गई और आके अपने पापा के गले लग गई और रोने लगी| रोते-रोते बोली; “i love you पापा” उसकी ये बात सुन कर ये अपने हमेशा वाले अंदाज में बोले; “awwwwwwww मेरा बच्चा!” ये सुनने के बाद ही नेहा के चेहरे पर मस्कान आई! हॉस्पिटल का बेड थोड़ा ऊँचा था तो आयुष उस पर चढ़ नहीं पा अहा था| वो भरसक प्रयास कर रहा था पर फिर ही छाड़ नहीं पा रहा था| अंत में उसे अपनने दादा जी को ही इशारा किया और बोला; “दादा जी…मुझे पापा ….” बस इसके आगे कुछ बोलने से पहले ही पिताजी ने उसे गोद में उठाया और उसके पापा की पास छोड़ दिया| वो घुटनों के बल छलके आया और नेहा के साथ साथ उसने भी अपने पापा को झप्पी डाल दी, पर वो रोया नहीं! बच्चों के गले लगने से इनका ध्यान उनपर चला गया और मेरा हाथ छूट गया| मैं उठ के डॉक्टर सरिता के पास चली गई जो ये सब देख कर काफी emotional हो गईं, चूँकि सबका ध्यान इनपर था तो किसी को उनके आँसूं नहीं दिखे| मैंने उन्हें दिल से थैंक्स बोला तो वो बस मुस्कुरा दीं|

आखिरकार जब सब ने हम दोनों को आशीर्वाद दे दिया तब सबसे पहला सवाल आयुष ने पूछा; आंटी हम पापा को घर कब ले जा सकते हैं?” उसक सवाल सं सब हँस पड़े थे| इतने दिनों बाद सबको हँसता देख मेरे दिल को थोड़ा सुकून आया| डॉक्टर सरिता ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया; “बेटा…दो-तीनं दिन अभी आपके पापा को यहाँ observation के लिए रुकना होगा| उसके बाद आप उन्हें ले जा सकते हो|” ये सुन के आयुष खुश हो गया और इधर-उधर नाचने लगा| उसका dance देख सब खुश हो गए और हँस पड़े| ख़ुशी का मौहाल बन चूका था ….. ये (मेरे पति) यही ज्यादा बात नहीं कर रहे थे| शरीर काफी कमजोर हो चूका था| बहत धीरे-धीरे बात कर रहे थे….. तभी माँ उठ के मेरे पास आईं और बोलीं; “बेटी अब तो घर चल… थोड़ा आराम कर ले… जब से मानु हॉस्पिटल आया है तो तब से घर नहीं गई|” ये सु कर इनके चेहरे पर परेशानी की शिकन पड़ने लगी और मैं इन्हें कतई परेशान नहीं करना चाहती थी तो मैं ने माँ की बात ये कह कर ताल दी; “माँ अब तो मैं इन्ही की साथ गृह-प्रवेश करुँगी|” ये सुन कर माँ हँस पड़ी और इनके हेहरे पर भी मुसस्काण आ गई| आयुष जो हमारे पास बेड पर बैठा था उसने मेरी बात को थोड़ा और मजाक में बदल दिया ये कह के; “दादी तो इस्सका मतलब की इस बार पापा चावल वाले लोटे को लात मार कर घर के नदर आयेगे?” उसके इस अचकन मजाक को सुन सभी जोर से हँस पड़े और कमरे में हंसी गूंजने लगी| एक परिवार जो तकरीबन बीस दिन से, मेरे कारन दुःख भोग रहा था वो आज… finally हँस रहा था अब भला मुझे इससे ज्यादा क्या चाहिए था!

अब आगे…….

नेहा और आयुष इनके पास बैठे थे और सारे लोग भी वहीँ बैठे थे… तो मुझे इनसे बात करने का समय नहीं मिल रहा था| इधर नहा जिद्द करने लगी की वो तीन दिन तक स्कूल नहीं जायेगी और अपने पापा के पास ही रहेगी| सबने उसे प्यार से समझाया अपर वो नहीं मान रही थी….. इन्होने भी कोशिश की पर नेहा जिद्द पर अड़ गई! पिताजी (नेहा के नाना जी) को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने उसे डाँट दिया| उनकी डाँट से वो सहम गई और अपने पापा के पास आके उनके गले लग गई और अपना मुँह उनके सीने में छुपा लिया| आखिर मुझे ही उसका पक्ष लेना पड़ा; “रहने दो ना पिताजी…. मेरी बेटी बहुत होशियार है! वो तीन दिन की पढ़ाई को बर्बाद नहीं जाने देगी! है ना नेहा?” तब जा कर नेहा ने मेरी तरफ देखा और हाँ में सर हिला के जवाब दिया| पर पिताजी के गुस्से का सामना मुझे करना पड़ा; “तू बहुत तरफदारी करने लगी है इसकी? सर पर चढ़ाती जा रही है इसे? मानु बेटा बीमार क्या पड़ा तुम दोनों ने अपनी मनमानी शुरू कर दी?” मेरी क्लास लगती देख इन्हें (मेरे पति) को भी बीच में आना पड़ा; “पिताजी…….. ये मेरी लाड़ली है! ” बस इतना सुन्ना था की पिताजी चुप हो गए और मैं भी हैरान उन्हें देखती रही की मेरी इतनी बड़ी दलील सुन्न के भी उन्हें संतोष नहीं मिला और इनके कहे सिर्फ पांच शब्द और पिताजी को तसल्ली हो गई? ऐसा प्रभाव था इनका पिताजी पर!

सबको इन पर बहुत प्यार आ रहा था… और ये सब देख के मुझे एक अजीब से सुख का आनंद मिल रहा था| अगले तीन दिन तक सब ने हमें एक पल का समय भी नहीं दिया की हम अकेले में कुछ बात कर सकें| अब तो रात को माँ (सासु माँ), मेरी माँ या बड़की अम्मा वहीँ रूकती| दिन में कभी पिताजी (ससुर जी) तो कभी मेरे पिताजी तो कभी अजय होता| अगले दिन तो अनिल भी आ गया था और उसेन आते ही इनके (मेरे पति के) पाँव छुए! हम दोनों (मैं और मेरे पति) अस एक दूसरे को देख के ही आहें भरते रहते थे… जब माँ (सासु माँ) होती तो मैं जा कर इनके सिराहने बैठ जाती और ये मेरा आठ पकड़ लेते और हम बिना कुछ बोले बस एक दूसरे की तरफ देखते रहते| जैसे मन ही मन एक दूसरे का हाल पूछ रहे हों! हम दोनों के मन ही मैं बहुत सी बातें थीं जो हम एक दूसरे से करना चाहते थे …. ओ मेरे मन में जो सबसे अदा सवाल था वो था की आखिर इन्होने मुझे “Sorry” क्यों बोला?

घर में ये सब से बात कर रहे थे …. जैसे सबसे बात करने के लिए इनके पास कोई न कोई topic हो! मेरे पिताजी (ससुर जी) से अपने काम के बारे में पूछते, माँ (सासु माँ) से उनके favorite serial C.I.D के बारे में पूछते, मेरे पिताजी से खेती-बाड़ी के बारे में पूछते, और मेरी माँ….. उन्हें तो इन्होने एक नै hobby की आदत डाल दी थी! वो थी “experimental cooking” ही..ही…ही… आय दिन माँ कुछ न कुछ अलग बनती रहती थी….!!! बड़की अम्मा और अजय से सबका हाल-चाल लेते रहते थे….. पर मुझसे ये सिर्फ और सिर्फ इशारों में ही बात करते थे|

अगले दिन की बात है नर्स राजी इन्हें चेक करे आईं थी तब उन्हें देख कर इनके मुख पर मुस्कान फ़ैल गई| दोनों ने बड़े अच्छे से “Hi” “Hello” की….. हाँ जब ये हंस कर उनसे बात करते तो मुझे बड़ा अजीब सा लगता था| अचानक मेरी नजर पिताजी (मेरे ससुर जी) पर पड़ी तो देखा वो इन्हें घूर के देख रहे थे| थोड़ा बहुत गुस्सा और जलन तो मुझे भी हो रही थी…. पर मैंने अपने भावों को किसी तरह छुपा लिया था| उस समय वहां केवल माँ (सासु माँ) और पिताजी (ससुर जी) थे, नर्स के जाने के बाद पिताजी ने इन्हें टोका| “तू बड़ा हँस-हँस के बात कर रहा था? बहु सामने है फिर भी?” उन्होंने गुस्सा नहीं किया था बस टोका भर था!
ये सुन कर इन्हें (मेरे पति को) हंसी आ गई! और तब माँ इनके बचाव में आ गेन और उन्होंने सारी confusion दूर की! माँ नर्स राजी को जानती थीं …. और मैंने कभी ध्यान नहं दिया पर जब भी नर्स माँ के सामने आती तो माँ उनसे बात करती| उस वक़्त मेरा ध्यान तो केवल इन पर था इसलिए मैंने कभी ध्यान नहीं दिया| दरअसल राजी इन्हीं की दोस्त थी! शादी से कुछ महीने पहले पिताजी को कुछ काम से शहर जाना पड़ा था| उन दिनों माँ की तबियत ठीक न होने के कारन नर्स राजी ने माँ की देखभाल की थी| पिताजी को ये बात पता नहीं थी क्योंकि लड़कियों के मामले में पिताजी ने इन पर (मेरे पति पर) हमेशा से लगाम राखी थी| उन्हें ये सब जरा भी पसंद नहीं था और वैसे में मेरे पति इतने सीधे थे की आजतक मेरे आलावा कभी किसी लड़की के चक्कर में पड़े ही नहीं| वैसे ये सब उस समय तो मैं हजम कर गई थी….. क्योंकि मेरी चिंता बस इन्हें घर ले जाने की थी! शाम तक अनिल भी आ गया था और आते ही उसने इनके पाँव छुए और फिर ये दोनों भी बातों में लग गए|

इधर इनकी आवाज सुनने के लिए मैं मरी जा रही थी| बस इनके मुंह से “जानू” ही तो सुन्ना चाहती थी! खेर discharge होने से पहले डॉक्टर इ सभी को हिदायत दी की इन्हें कोई भी mental shock नही दिया जाए| घर में ख़ुशी का माहोल हो और कोई भी टेंशन ना दी जाए| दवाइयों के बारे में मुझे और नेहा को सब कुछ समझा दिया गया था| शाम को सात बजे हम सब घर पहुंचे| घर पहुँच के माँ ने इनकी आरती उतारी और सब ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की| इनका शरीर अब भी कमजोर था तो मैं इन्हें अपने कमरे में ले आई और ये bedpost का सहारा ले कर बैठ गए| सब ने इन्हें घेर लिया और आस पड़ोस के लोग भी मिलने आये| मेरे पास टी चैन से बैठ कर इनके पास बातें करने का जरा भी मौका नहीं था| रात को खाना खाने के बाद सब अपने कमरे में चले गए| मेरे माँ-पिताजी आयुष और नेहा के कमरे में सोये थे और आयुष उन्ही के पास सोने वाला था| सोने में इन्हें कोई तकलीफ ना हो इसलिए नेहा आज माँ-पिताजी (सास-ससुर जी) के पास सोई थी| बड़की अम्मा और जय घर नहीं ठहरे थे वो हमारे किसी रिश्तेदार के यहाँ सोये थे| कारन ये था की दरअसल वो इसी बहाने से यहाँ आये थे की किसी रिश्तेदार से मिलने जा रहे हैं|
सब को अपने कमरे में जाते-जाते रात के दस बज गए थे| जब मैं कमरे में आई और मैंने लाइट जलाई तो देखा ये अभी भी जाग रहे थे| मेरे कुछ कहने से पहले ही ये बोल पड़े; “Sorry !!!” इनका Sorry सुन कर मन में जो सवाल था वो बाहर आ ही गया; “जब से आप को होश आया है तब से कई बार आप दबे होठों से मुझे Sorry बोल रहे हो? आखिर क्यों? गलती…..” मेरे आगे कुछ बोलने से पहले ही ये बोल पड़े; “जान….Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की उस दिन मैं उस कमीने बदजात की जान नहीं ले पाया! Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की तुम्हारी वो दर्द भरी लेखनी पढ़ कर तुम्हारे दर्द को महसूस तो किया पर उस दर्द को कम करने के लिए कुछ नहीं कर पाया! Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की इतने दिन तुमसे कोई बात नहीं की और तुम्हें तड़पाता रहा, वो भी ये जानते हुए की तुम माँ बनने वाली हो! Sorry इसलिए ………….” उनके आगे बोलने से पहले मैंने उनकी बात काट दी! “पर आप की कोई गलती नहीं थी…. आप तो जी तोड़ कोशिश कर रहे थे की मैं हँसूँ-बोलूं पर एक मैं थी जो आपसे ….आपसे अपना दर्द छुपा रही थी| उनसे जो बिना किसी के बोले उसके दिल के दर्द को भांप जाते हैं….. आपने कुछ भी गलत नहीं किया| सब मेरी गलती है….. ना मैं आपको इस बच्चे के लिए force करती और ना……….” इतना सुन कर ही इन्हें बहुत गुस्सा आया और ये बड़े जोर से मुझ पर चिल्लाये; “For God sake stop blaming yourself for everything!” उनका गुस्सा देख कर तो मैं दहल गई और मुझे डर लगने लगा की कहीं इनकी तबियत फिर ख़राब न हो जाए! तभी नेहा जो की दरवाजे के पास कड़ी थी बोल पड़ी; “मम्मी….फिर से?” बस इतना कह कर वो अपने पापा के पास आई और उनसे लिपट गई और रोने लगी| इन्होने बहुत प्यार से उसे चुप कराया और फिर दोनों बाप-बेटी लेट गए| मैंने दरवाजा बंद किया, बत्ती बुझाई और मैं भी आ कर लेट गई| मैंने भी नेहा की कमर पर हाथ रखा पर कुछ देर बाद उसने मेरा हाथ हटा दिया….दुःख हुआ… पर चुप रही बस एक इत्मीनान था की कम से कम ये घर आ चुके हैं …. एक उम्मीद थी की ये अब जल्द से जल्द ठीक हो जायेंगे! इसी उम्मीद के साथ कब आँखें बंद हुई पता ही नहीं चला!

सब को अपने कमरे में जाते-जाते रात के दस बज गए थे| जब मैं कमरे में आई और मैंने लाइट जलाई तो देखा ये अभी भी जाग रहे थे| मेरे कुछ कहने से पहले ही ये बोल पड़े; “Sorry !!!” इनका Sorry सुन कर मन में जो सवाल था वो बाहर आ ही गया; “जब से आप को होश आया है तब से कई बार आप दबे होठों से मुझे Sorry बोल रहे हो? आखिर क्यों? गलती…..” मेरे आगे कुछ बोलने से पहले ही ये बोल पड़े; “जान….Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की उस दिन मैं उस कमीने बदजात की जान नहीं ले पाया! Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की तुम्हारी वो दर्द भरी लेखनी पढ़ कर तुम्हारे दर्द को महसूस तो किया पर उस दर्द को कम करने के लिए कुछ नहीं कर पाया! Sorry इसलिए बोल रहा हूँ की इतने दिन तुमसे कोई बात नहीं की और तुम्हें तड़पाता रहा, वो भी ये जानते हुए की तुम माँ बनने वाली हो! Sorry इसलिए ………….” उनके आगे बोलने से पहले मैंने उनकी बात काट दी! “पर आप की कोई गलती नहीं थी…. आप तो जी तोड़ कोशिश कर रहे थे की मैं हँसूँ-बोलूं पर एक मैं थी जो आपसे ….आपसे अपना दर्द छुपा रही थी| उनसे जो बिना किसी के बोले उसके दिल के दर्द को भांप जाते हैं….. आपने कुछ भी गलत नहीं किया| सब मेरी गलती है….. ना मैं आपको इस बच्चे के लिए force करती और ना……….” इतना सुन कर ही इन्हें बहुत गुस्सा आया और ये बड़े जोर से मुझ पर चिल्लाये; “For God sake stop blaming yourself for everything!” उनका गुस्सा देख कर तो मैं दहल गई और मुझे डर लगने लगा की कहीं इनकी तबियत फिर ख़राब न हो जाए! तभी नेहा जो की दरवाजे के पास कड़ी थी बोल पड़ी; “मम्मी….फिर से?” बस इतना कह कर वो अपने पापा के पास आई और उनसे लिपट गई और रोने लगी| इन्होने बहुत प्यार से उसे चुप कराया और फिर दोनों बाप-बेटी लेट गए| मैंने दरवाजा बंद किया, बत्ती बुझाई और मैं भी आ कर लेट गई| मैंने भी नेहा की कमर पर हाथ रखा पर कुछ देर बाद उसने मेरा हाथ हटा दिया….दुःख हुआ… पर चुप रही बस एक इत्मीनान था की कम से कम ये घर आ चुके हैं …. एक उम्मीद थी की ये अब जल्द से जल्द ठीक हो जायेंगे! इसी उम्मीद के साथ कब आँखें बंद हुई पता ही नहीं चला!

अब आगे ……..

सुबह पाँच बजे मेरी आँख खुली तो महसूस किया की ये (मेरे पति) Bedpost का सहारा ले कर बैठे हैं, नेहा का सर इनकी गोद में है और ये मेरे सर पर हाथ फेर रहे थे| क्या सुखद एहसास था वो मेरे लिए….. मैं उठी तो इन्होने मुझे लेटे रहने के लिए बोला पर मैं नहीं मानी| मेरा मन किया की आज इन्हें सुबह वाली Good Morning Kiss दूँ पर मेरी ‘माँ’ नेहा जो वहाँ थी, वो भी एकदम से उठ गई, आखिर उसके स्कूल जाने का टाइम जो हो रहा था|
“Good Morning बेटा!” इन्होने उसके माथे को चूमते हुए कहा| जवाब में नेहा ने इनके गाल को चूमते हुए Good Morning कहा! पर जब इन्होने नेहा को तैयार होने के लिए कहा तो वो ना नुकुर करने लगी| मैं उसकी इस न-नुकुर का कारन जानती थी …. दरअसल उसे मुझपर भरोसा नहीं था| उसे लग रहा था की मैं कुछ न कुछ ऐसा करुँगी की इनकी तबियत फिर से ख़राब हो जाएगी|
पर इनका भी अपना स्टाइल है! जिसके आगे बच्चों और मेरी कतई नही चलती! इन्होने बहुत लाड-दुलार के बाद नेहा को स्कूल जाने के लिए मना लिया| पर उसने एक शर्त राखी; “Promise me पापा की आप किसी को गुस्सा नही करोगे फिर चाहे कोई आप को कितना भी provoke करे (ये उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा|), आप टाइम से खाना खाओगे और टाइम से दवाई लोगे और हाँ proper rest करोगे|” ये सब सुनने के बाद मेरे और इनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई और इन्होने हँसते हुए जवाब दिया; “मेरी माँ! आप बस स्कूल जा रहे हो…. दूसरे continent नही जो इतनी साड़ी हिदायतें देकर जा रहे हो| और फिर यहाँ आपकी मम्मी हैं …. आपके दादा-दादी हैं…नाना-नानी हैं … सब तो हैं यहाँ फिर आपको किस बात की चिंता? यहन कौन है जो मझे PROVOKE करेगा?” अब मुझे किसी भी हालत पर ये टॉपिक शुरू होने से बचाना था वरना मुझे पता था की नेहा की डाँट जर्रूर पड़ेगी तो मैंने कहा; “नेहा बीटा…. जल्दी से तैयार हो जाओ …लेट हो रहा है|” जबकि उस समय सिर्फ साढ़े पाँच ही बजे थे!| बच्चे तो तैयार हो कर स्कूल चले गए इधर इन्होने मुझे बुला कर ‘सभा’ का फरमान दिया| जब बड़की अम्मा और अजय आ गए तो सबजने अपनी-अपनी चाय का कप थामे हमारे कमरे में आ गए और सब घेर कर बैठ गए| कमरे में हीटर की गर्माहट ने माहोल आरामदायक बना दिया था| ऐसा लग रहा था जैसे President of America Parliament को Address कर रहे हों| सब बड़ी उत्सुकता से इन्हें देख रहे थे| मैं भी हैरान थी की आखिर इन्हें कौन सी बात करनी है|

(आगे इन्होने जो बोला उसका एक-एक शब्द मैं जैसा का तैसा लिख रही हूँ!)

“मुझे आप सभी से कुछ कहना है……………. मैं आप सभी से हाथ जोड़ कर क्षमा चाहता हूँ की मेरे कारन आप सभी को ये तकलीफ उठानी पड़ी!”

ये सुन कर सभी एक साथ बोल पड़े; “नहीं…नहीं… बेटा….ये तू क्या बोला रहा है …..” पर इन्होने ने अपनी बात जारी रखी ……

“मैं जानता हूँ की मेरी इस हालत का जिम्मेदार इन्होने (मेरी तरफ इशारा करते हुए) खुद को ही ठहराया होगा! ये इनकी आदत है…मेरी हर गलती का जिमेदार ये खुद को मानती हैं और मेरे सारे गम अपने सर लाद लेती हैं| जानता हूँ की ये हर जीवन साथी का ये फ़र्ज़ पर मैं नहीं चाहता की मेरी वजह से आप संगीता से नफरत करें….और उसे मेरी गलतियों की सजा दें! उस हादसे के बारे में सोच-सोच कर मेरा खून खौल ने लगा था…. दिल में आग लगी हुई थी…. बहुत गुस्सा आ रहा था मुझे| अपनी गुस्से की आग में मैं खुद ही जल रहा था| पता नहीं क्या ऊल-जुलूल हरकतें कर रहा था …. कभी दुबै जाने के बारे में सोच रहा था तो कभी कुछ… ऐसा लगा जैसे दिमाग ने सोचने समझने की ताकत ही खो दी थी| दवाइयाँ खाना बंद कर दिया और अपनी ये हालत बना ली! इसलिए मैं आप सभी से हाथ जोड़ के माफ़ी माँगता हूँ| और पिताजी (मेरे पिताजी) इन्होने मुझसे आपकी या किसी की भी शिकायत नहीं की! मैं जानता हूँ की सबसे ज्यादा आप मुझे प्यार करते हो तो सबसे ज्यादा डाँटा भी आपने ही होगा!”
ये सुन कर पिताजी कुछ नहीं बोले बस मुस्कुरा दिए| तभी इन्होने (मेरे पति) मुझे उनके (मेरे पिताजी) के पाँव छूने को कहा| मैंने उनके पाँव छुए और उन्होंने मुझे माफ़ करते हुए कहा; “खुश रहो बेटी!” मैं ने आगे बढ़ कर माँ (अपनी माँ) के पाँव छुए तो उन्होंने भी मुझे प्यार से आशीर्वाद दिया| जब मैं बड़की अम्मा के पास पहुंची और उनके पाँव छूने लगी तब ये बोले; “अम्मा….मैं जानता हूँ आपने संगीता को कुछ नहीं बोला होगा है ना?” अम्मा ने मुस्कुराते हुए मुझे आशीर्वाद दिया और कहा; “बेटा तू तो जानता ही है सब….मैं इसे कुछ कहती भी तो किस हक़ से!”

“क्यों अम्मा… आप मेरी बड़ी माँ हो आपका पूरा हक़ बनता है की आप हमें डांटें चाहे तो मार भी लो!” मैंने कहा|

“नहीं बेटी….. मेरे अपने खून की गलतियों के आगे मैं कुछ नहीं कह सकती|” अम्मा कहते हुए रो पड़ी तो माइन आगे बढ़ के उन्हें संभाला और कान में खुस-फुसा के कहा; “आप अगर रोओगे तो ये भी रो पड़ेंगे|” अम्मा ने अपने आँसूं पोछे और खुद को संभाला| मैं जानती थी की अम्मा की बात इन्हें कहीं न कहीं लगी अवश्य होगी…. आर मुझे कैसे भी अभी सब कुछ सम्भालना था|

“और माँ-पिताजी….. आप ने तो संगीता को नहीं कोसा ना?” इन्होने पूछा|
इसपर माँ (सासु माँ) बोली; “भई गलती तेरी….. तो भला हम अपनी बेटी को क्यों कोसेंगे? मुझे पता था की ये तेरी ही करतूत है और इल्जाम हमारी बेटी अपने सर ले रही है|” इस पर मेरे पिताजी ने इनका पक्ष लेते हुए मुस्कुरा कर कहा; “समधन जी ये आपने सही कही! हमारे ही लड़के में खोट है?” ये सुन कर सब हँसने लगे…..!!!

नाश्ते का समय हुआ तो सब बाहर बैठक में आ रहे थे तभी मेरे पिताजी आकर इनके पास बैठ गए और इनके कंधे पर हाथ रख कर बोले; “संगीता….तू सच में बहुत नसीब वाली है की तुझे ऐसा पति मिला जो तेरी साड़ी गलतियां अपने सर ले लेता है!”

“पर पिताजी…ऐसा कुछ नहीं है…गलती मेरी ही थी!” इन्होने फिर से अपनी बात दोहराई और तब तक मेरी माँ भी वहीँ आ कर कड़ी हो गईं|

“बेटा मेरे एक सवाल का जवाब दे, ऐसी कौन सी पत्नी होती है जो अपना दुःख-दर्द अपने ही पति से छुपाये?” पिताजी का सवाल सुनकर मुझे पता था की इनके पास कोई जवाब नहीं होगा पर हुआ इसका ठीक उल्टा ही! इन्होने बड़े तपाक से जवाब दिया; “वही पत्नी जो ये जानती है की उसका दुःख-दर्द सुन उसके पति की तबियत ख़राब हो जायेगी!” और ये कहते हुए उन्होंने मेरी माँ की तरफ देखा जैसे कह रहे हों की माँ आपने पिताजी से अनिल के हर्निया की बात छुपा कर कोई पाप नही किया| इस बार इनका जवाब सुन पिताजी चुप हो गए… और मुस्कुरा दिए और बोले; “बेटा तुझसे बातों में कोई नही जीत सकता! तेरे पास हर बात का जवाब है|” इतना कह कर पिताजी ने इनको आशीर्वाद दिया और बाहर बैठक में आ गए| आजतक ऐसे नहीं हुआ…कम से कम मेरे सामने तो कतई नही हुआ की कोई पिताजी को इस तरह चुप करा दे| पर मैं जानती थी की इनका प्रभाव पिताजी पर बहुत ज्यादा है! शायद ये इन्हीं का प्रभाव था की अब दोनों घरों में औरतें यानी मेरी माँ और सासु माँ बोलने लगीं थी!

ये सब देख मेरा दिल भर आया था … मन तो किया की इनके सीने से लग कर रो पडूँ पर किसी तरह खुद को संभाला| इतने में अनिल आ गया और बोला; “दी… वो नाश्ते के लिए आपको बाहर बुला रहे हैं|” इतना कह कर वो बाहर चला गया| उसने आज भी मुझे दीदी की जगह ‘दी….’ कह के बुलाया था| मुझे बुरा तो लगा था पर मैं चुप यही पर इन्हें कुह शक हो गया| इन्होने मुझसे पूछा; “जब से अनिल आया है….तब से ये ‘दी…’ कह रहा है? ये का आजकल का trend है?” मैंने मुस्कुराते हुए कहा; “हाँ जी…. अब नई पीढ़ी है… शुक्र है दीदी का इसने ‘दी…’ कर दिया वरना मुझे तो लगा था की ये उसका कहीं ‘DUDE’ न बना दे…ही..ही..ही..ही..”

“अच्छा जी…ज़माना इतना बदल गया है? हम तो जैसे बूढ़े हो गए हैं!” इन्होने शिकायत की…शायद इन्हें शक हो गया था की मैं कुह बात छुपा रही हूँ| मैं बाहर आ कर नाश्ता बनाने में लग गई…. मैंने और इन्होने नाश्ता कमरे में ही किया क्योंकि वो कमरा काफी गर्म था और इनको exposure से खतरा था वरना जरा सी ठंडी हवा इन्हें लगी और हो गया इनका Sinus शुरू! घडी में करीब सवा बारह बजे होंगे, ससुर जी, अजय और पिताजी बाहर गए थे टहलने और माँ, सासु माँ और बड़की अम्मा अंदर कमरे में बैठीं बातें कर रहीं थी, की इन्होने मुझे कहा की अनिल को बुला दो| मैंने भी बिना कुछ सोचे उसे बुला दिया और मैं अपना काम करने लगी| तभी मेरे दिमाग में बिजली कौंधी और मैं भाग कर कमरे के पास आई और दरवाजे में कान लगा कर सुनने लगी|

“अनिल…. यार या तो तू थोड़ा मोडररन हो गया है या फिर बात कुछ और है?”

“मैं समझा नहीं जीजा जी?” अनिल ने असमंजस में पूछा|

“मैंने notice किया की तू आजकल अपनी दीदी को ‘दी…’ कह कर बुलाने लगा है! उसे तेरे मुंह से ‘दीदी’ सुन्ना अच्छा लगता है ना की ‘दी…’ उसके लिए ना सही कम से कम मेरे लिए ही उसे दीदी कह दिया कर?” इन्होने अनिल से request की वो भी सिर्फ मेरी ख़ुशी के लिए| अनिल चुप हो गया ….और मुझे पता था की ये उसकी चुप्पी जर्रूर पकड़ लेंगे|

“मतलब बात कुछ और है?” इन्होने उसके मन की बात भांप ली थी| आखिर अनिल ने शुरू से ले कर अंत तक की सारी बातें बता दी| मेरा दिल जोर से धड़कनें लगा था क्योंकि मुझे दर लगने लगा थी की कहीं इनकी तबियत फिर से ख़राब न हो जाए! पर इन्होने अनिल को समझाना शुरू किया; “यार ऐसा कुछ नहीं है…. तुझे लगता है की तेरी दीदी तुझे भूल गई? तुझे पता भी है की वो तेरे लिए रोज दुआ करती है, माँ-पिताजी की लम्बी आयु के लिए प्रार्थना करती है! शादी के बाद उसके ऊपर इस घर की भी जिम्मेदारी बढ़ गई है| तू तो जानता ही है की कितनी मुश्किल से ये सब संभला था…फिर स दिन वो सब…..She was emotionally broken … तू सोच नहीं सकता की उस पर क्या बीती थी! वो बेचारी टूट गई थी…. बहुत घबरा गई थी… आयुष के लिए … .उसे लगा था की हम आयुष को खो देंगे! घबरा चुकी थी ….. ऐसे में मैं भी उस पर दबाव बना रहा था की हँसो-बोलो ….तो वो और क्या करती? हम दोनों के बीच काफी तनाव आ चूका था…. देख मैं उसकी तरफ से माफ़ी माँगता हुँ!”

“जीजा जी आप माफ़ी क्यों माँग रहे हो…. उन्होंने मुझे नहीं पूछा कोई बात नहीं…वो Loan के बारे में भूल गईं कोई बात नही….. पर उनके कारन आपकी ये हालत हुई ये मुझसे बर्दाश्त नहीं होता! वो जानती हैं की आप उन से कितना प्यार करते हो और फिर भी आपसे ऐसा सलूक किया? मैं पूछता हूँ की गलती क्या थी आपकी? अगर आप दीदी की जगह होते और वो आपको हँसने-बोलने को कहतीं तो क्या आप उन्हीं पर बिगड़ जाते?” अनिल ने बड़े तर्क से उनसे बात की थी|

“नहीं…बिलकुल नहीं| पर अगर मुझे ये पता चलता की वो मुझे मेरे ही परिवार से अलग कर रही है वो भी सिर्फ मेरी तस्सल्ली भर के लिए तो हाँ मैं जर्रूर नाराज होता| उन्हें गुस्सा आया क्योंकि मैंने उन्हें इस परिवार से अलग करने की कोशिश की| मैं चाहता था की हम सब दुबई settle हो जाएं पर माँ-पिताजी ने जाने से मन कर दिया| हारकर मुझे ये तय करना पड़ा की मैं, आयुष, नेहा और संगीता ही दुबई जायेंगे| नौकरी तक ढूंढ ली थी| तो ऐसी बात पर किसी गुस्सा नहीं आएगा?”

“आपने ये सब उनके लिए किया था ना? अपने लिए तो नहीं? फिर?”

“देख भाई…अब या तो तू इस मुद्दे पर बहस कर ले या फिर लड़ाई कर ले….मेरे लिए She is always right!”

“देखा जीजा जी….. आपके लिए वो हमेशा सही हैं और उनके लिए आप गलत? क्या combination है! खेर आपके लिए मैं उन्हें माफ़ कर देता हूँ| पर मेरी एक शर्त है?”

“क्या?”

“आप मुझे बेटा कह कर बुलाओगे? जब दीदी मुझे बेटा कहती हैं तो मुझे अच्छा लगता है आखिर बड़ी बहन माँ सामान ही तो होती है और फिर इस हिसाब से आप तो पिता समा हुए|”

“ठीक है बेटा पर…तुझे अपनी दीदी को दिल से माफ़ करना होगा|” और उन्होंने मुझे आवाज दी और मैं एक दम से अंदर आ गई| मुझे देख के दोनों समझ गए की मैं उनकी सारी बातें सुन रही थी|मुझे देख कर अनिल खड़ा हुआ और बोला; “Sorry दीदी… मेरे बुरे बर्ताब के लिए मुझे माफ़ कर दो| मैं जीजा जी…..” बस आगे बोलने से पहले वो रो पड़ा| मैंने उसे गले लगाया और सर पर हाथ फेरा| पर उसका रोना अभी कम नही हुआ था तो इन्होने मजाक में बोला; “बेटा जब माँ के गले लग कर रो लो तो इधर भी आ जाना, इधर भी खेती गीली कर देना|” उनकी बात सुन कर हम दोनों हंस पड़े और अनिल जा कर उनके गले लग गया| कूकर की सीटी बजी तो मं दौड़ी-दौड़ी बाहर आई और गैस बंद की| खाना लघभग बन चूका था और अनिल बच्चों को लेने जा चूका था| स्कूल से आते ही नेहा और आयुष भागे-भागे कमरे में आये और बस्ता पहने हुए ही दोनों आ कर अपने पापा के गले लग गए और उनका हाल-चाल पूछने लगे| काफी लाड-दुलार के बाद बच्चों ने उन्हें छोड़ा| ऐसा लगा जैसे बच्चों ने एक अरसे बाद अपने पापा को देखा हो| खेर अब खाने का समय हो चूका था तो बच्चे जिद्द करने लगे की हमें पापा के साथ खाना खाना है| पर मैंने इन्हें कमरे के अंदर रहने की सलाह दी थी, कारन दो; पहला की इस तरह हम दोनों को साथ रहने का थोड़ा समय मिलता था और दूसरा बाहर का कमरा बहुत ठंडा था और अंदर का कमरा गर्म! अब आप इसे मेरा selfish नेचर कहो या इनके लिए मेरी care!
मैं चाहती थी की पहले ये खाना खा लें पर इन्होने जिद्द की, कि पहले बड़ों को खिलाओ फिर हम दोनों साथ खाएंगे| शायद ये कुछ private पल इन्हें भी पसंद थे! खेर सब को खिलने के बाद मैं हम दोनों का खाना ले कर कमरे में आ गई| उस समय नेहा और आयुष अपने कमरे में पढ़ रहे थे| डॉक्टर साहिबा कि हिदायत थी कि इन्हें खाने के लिए खाना ऐसा दिया जाए जिसे शरीर आसानी से digest कर सके| अब ऐसा खाना स्वाद तो कतई नहीं होता| उस दिन घर पर राजमा बने थे जो इन्हें बहुत पसंद हैं| मुझे पता था कि इन्हें वो बेस्वाद खाना खाने में कितनी दिक्कत हो रही है, इलिये मैं एक कटोरी में उनके लिए राजमा ले आई| अभी मैंने उन्हें एक चम्मच खिलाया ही था कि नेहा कमरे में आ गई और मुझसे कटोरी छीन ली और बड़ी जोर से मुझ पर चिल्लाई; “मम्मी! फिर से पापा को बीमार करना चाहते हो? डॉक्टर आंटी ने मना किया है ना?” मुझे उस समय अपनी बेवकूफी याद आई और शर्म भी आई| शोर सुन आयुष भी अंदर आ गया और नेहा के हाथ से कटोरी छीन के कमरे में इधर-उधर भागने लगा| नेहा भी उसके पीछे भागने लगी…. मैं अपना मन मसोस कर रह गई! मुझे पता था कि इन्हें बहुत गुस्सा आ रहा होगा इसलिए मैंने बात संभाली; “आयुष…बेटा चोट लग जाएगी! नेहा आयुष से कटोरी ले कर किचन में रख आओ|” पता नहीं कैसे पर ये अपना गुस्सा control कर गए! खाना तो इन्होने खा लिया और कुछ देर बाद बोले; “नेहा को बुलाओ…. नहीं रुको… नेहा……..|” इनकी एक ही आवाज में नेहा अंदर दौड़ी-दौड़ी आई| मुझे पता था कि आज उसकी क्लास लगने वाली है इसलिए मैं हूप-छाप बाहर जाने लगी वरना नेहा सोचती कि मैंने ही उसकी शिकायत की है| पर इन्होने मुझे रोक लिया और वहीँ बैठ जाने को कहा|

“नेहा…बेटा क्या बात है? आप अपनी मम्मी से बहुत बदतमीजी से पेश आ रहे हो आज कल? वो तो बस मेरे मुँह का टास्ते बदलना चाहती थी इसलिए उन्होंने मुझे राजमा खिलाये! आप तो उन पर ऐसे चिल्लाये जैसे उन्होंने मुझे जहर खिला दिया हो? क्या यही सब सिखाया है मैंने आपको? ” ये सुन कर नेहा ने अपना सर झुका लिया और खामोश हो गई|

“इतना सब होने के बाद भी आप ने मम्मी को इतनी जल्दी माफ़ कर दिया?” नेहा ने सवाल पूछा|

“बेटा आपकी मम्मी की कोई गलती नहीं थी…. गलती मेरी थी|” ये सुन कर आखिर नेहा के अंदर दबा हुआ ज्वालामुखी फुट पड़ा और उसने अपने sorry से ले कर मेरे साथ हुई उसकी बात सब उन्हें सुना डाली| ये सब सुन कर इनका दिल भर आया पर फिर भी अपने आपको बहुत अच्छे से संभाल कर बोले; “बेटा आपकी मम्मी गलत नहीं हैं…उन्होंने कुछ नहीं किया? वो मुझसे बहुत प्यार करती हैं! आपसे भी ज्यादा …. मेरे अच्छे future के लिए उन्होंने मुझे खुद से दूर किया था, ताकि मैं अपनी जिंदगी में कुछ बन जाऊँ…… अपनी जिंदगी संवार सकूँ|”

“तो क्या वो बस एक बार आपसे पूछ नहीं सकती थीं? बिना आपसे कुछ पूछे ही उन्होंने अपना फैसला आपको सुना दिया? बिना किसी गलती के आपको सजा दे डाली| मैं जानती हूँ आप बाकियों की तरह नहीं जो अपनी जिम्मेदारियों को नहीं उठाते| मुझे पूरा विश्वास है की आप माँ और अपना career दोनों एक साथ संभाल लेते| क्यों उन्होंने ने मुझे आपसे दूर किया? क्या उन्हें पता नहीं था की आपके आलावा मुझे वहां पर प्यार करने वाला कोई नहीं था?” नेहा ने एक-एक शब्द वही बोला था जो इन्होने मुझसे उस दिन कहा था, इसलिए ये थोड़ा हैरान थे| इन्हें लगा की मैंने नेहा को सब बताया है पर तभी नेहा बोल पड़ी; “उस दिन जब मेरे लिए फ्रॉक लाये थे तब उस gift pack में सबसे ऊपर आपने चिप्स का पैकेट रखा था| मेरी इस पसंद के बारे में आपके इलावा कोई नहीं जानता इसलिए मजबूरन मैं आपसे पूछना चाहते थी की इतने साल आप मुझसे मिलने गाँव क्यों नहीं आये? पर तभी मैंने आपकी और माँ की बातें सुन ली|”

इन्होने बड़े इत्मीनान से नेहा से सवाल किया; “बेटा मेरा भी आपके लिए एक सवाल है? अगर आपको सर्दी-खाँसी हो जाए और डॉक्टर आपको हिदायत दे की आपको आयुष से दूर रहना है ताकि उसे ये infection ना हो जाए तो क्या आप तब भी उसके साथ खेलोगे?”

“बिलकुल नहीं|” नेहा ने जवाब दिया|

“पर क्यों? आपको तो मामूली सा सर्दी-जुखाम है! भला आयुष को सर्दी खाँसी के अलावा क्या होगा? दो-तीन दिन दवाई खायेगा और फिर ठीक हो जायेगा!”

“पर पापा इस बिमारी से उसे थोड़ा बहुत कष्ट तो होगा ही और वो दो-तीन दिन स्कूल नहीं जा पायेगा और उसकी पढ़ाई का नुक्सान होगा! और मैं उसकी बहन हूँ उसका बुरा कैसा चाहूँगी?”

ये थोड़ा सा मुस्कुराये और बोले; “बेटा आपने तो सर्दी-खाँसी जैसी मामूली बिमारी के चलते आयुष को खुद से दूर कर दिया और मेरे तो CBSE Boards के exam थे वो भी आयुष के पैदा होने के ठीक एक महीने बाद! अब बताओ इसमें आपकी मम्मी की क्या गलती? अगर आप मम्मी की जगह होते तो क्या आप अपने स्वार्थ के लिए मेरा एक साल बर्बाद होने देते?” ये सुन कर नेहा एक दम चुप हो गई|

“हाँ एक गलती आपकी मम्मी से हुई, वो ये की उन्हें मुझसे एक बार बात करनी चाहिए थी| मेरे exams मार्च में थे और मैं आप से मिलने अक्टूबर holidays में आ सकता था| और एक गलती मुझसे भी हुई… की मुझे आपकी मम्मी की बात का इतना बुरा नहीं मन्ना चाहिए था की मैं आपसे भी नाराज हो जाऊँ? इसलिए मैं आज आपको SORRY बोलता हूँ की मैंने आपसे भी इतना rude behave किया|

जिस माँ को आप नफरत करते हो आपको पता है की मेरे लिए उन्होंने कितनी कुर्बानी दी हैं? आपके नाना-नानी तक को छोड़ दिया सिर्फ मेरे लिए? आप बोलो क्या कभी आप ऐसा करोगे?” नेहा ने ना में सर हिलाया| उस की आँखें भर आईं थी पर वो सर झुकाये सब सुन रही थी|

“मैंने और आपकी मम्मी ने प्लान किया था की जब उनकी डिलीवरी होगी तब मैं उनके साथ रहूँगा पर मेरी पढ़ाई के लिए उन्होंने ये सब कुर्बान कर दिया और मुझे खुद से अलग कर दिया| पर आयुष के जीवन के वो ‘*” साल जो मैं नहीं देख पाया….जिन्हें मैं महसूस नहीं कर पाया…उसे गोद में नहीं खिला पाया …. उसका मेरी गोद में सुसु करना…ये सब मैंने miss कर दिया क्योंकि आपकी मम्मी की उस एक बात को मैंने अपने दिल से इस कदर लगा लिया था! उसी कारन आपकी मम्मी को ये बच्चा चाहिए था ताकि मैं उस सुख को भोग सकूँ! सिर्फ मेरे लिए …वो ये बच्चा चाहती थीं! इससे ज्यादा कोई किसी के लिए क्या कर सकता है?” ये सब सुन नेहा खामोश हो गई थी उस की आँखें छलक आईं थीं…. “बेटा I guess you owe your mummy an apology?” बस ये सुन कर नेहा उठी और मेरे पाँव छुए और बोली; “sorry मम्मी… मैंने आपको बहुत गलत समझा| मुझे माफ़ कर दो प्लीज!” माने उस के सर पर हाथ फेरा और कहा; “its okay बेटा…. कोई बात नहीं!” फिर वो जा कर अपने पापा के गले लगी और रो पड़ी…. बहुत जोर से रोइ… इन्होने उसे बहुत प्यार किया और तब जा कर वो चुप हुई|

“अच्छा बेटा आप है ना … छुप-छुप कर बातें मत सुना करो! bad manners! मैं आपसे कोई बात नहीं छुपाता ना?” इन्होने कहा|

“sorry पापा! आगे से ऐसा कुछ नहीं करुँगी|”

“और आप देवी जी (अर्थात मैं) आप भी जरा कम कान लगाया करो!” वो कुछ देर पहले मैंने इनकी और अनिल की बातें सुनी थी ये उसी के लिए था ही..ही..ही…
सब कुछ सामान्य हो गया था….पर अभी भी कुछ था जो छूट गया था….. रात को खाना खाने के बाद सभी हमारे कमरे में बैठे थे और हँसी-मजाक चल रहा था| तभी मेरे पिताजी ने अपने जाने की बात कही| उस समय इनके आठ में लैपटॉप था| जैसे ही पिताजी ने जाने की बात कही ये मुस्कुराये और बोले; “इतनी जल्दी जा रहे हो आप?”

तभी बीच में अनिल बोल पड़ा; “सारे जा रहे हैं जीजू!” दरअसल उसका भी मन नहीं था जाने का|

“हम्म्म….. ठीक है…. बेटा अपना मोबाइल चेक कर!” इन्होने अनिल से कहा| अनिल ने अपना मोबाइल चेक किया तो देख कर दंग रह गया और जोर से चिल्लाया; “पिताजी!!! जीजू ने फ्लाइट की टिकट्स बुक करा दी हैं!” ये सुन कर तो मैं भी चौंक गई… उस कमरे में बैठा हर कोई चौंक गया सिवाय इनके जो मंद-मंद मुस्कुराये जा रहे थे! बड़की अम्मा बोलीं; “मुन्ना ये क्या?”

“अम्मा…. माँ-पिताजी को तो हवाई यात्रा करा दी, अब बारी थी मेरी बड़ी माँ की और सास-ससुर की| अब ऐसा मौका दुबारा कहाँ मिलेगा?” इन्होने मुस्कुराते हुए कहा| अम्मा ने पिताजी (मेरे ससुर जी) की तरफ देखा ओ पिताजी बोले; “हभी…. आप ही का लड़का है … अब मैं कैसे इसे मना करूँ! जो काम बाप ना कर सका वो बेटे ने कर दिया! शाबाश!”

“अरे समधी जी, हवाई जहाज की टिकट तो बहुत महंगी होती है!” मेरे पिताजी ने कहा|

“पर पिताजी आप सबसे महंगी तो नहीं?” इन्होने अपना तर्क दिया| सब ने बहुत कोशिश की पर ये टस से मस नहीं हुए| आखिर कर सब को फ्लाइट से ही जाना पड़ा| सब बहुत खुश थे …. बहुत-बहुत खुश| शायद ही मैंने कभी ऐसी ख़ुशी एक साथ सब के चेहरे पर देखि हो!

आज रात बड़की अम्मा और अजय यहीं ठहरने वाले थे…. सब के सोने का प्रबंध किसी तरह हो गया था| आयुष और नेहा आज सब के साथ सोये थे और finally हम दोनों आज रात अकेले थे| मैंने झट से दवाजा लॉक किया| आखिर वो पल आ ही गया जिसका मुझे बेसब्री से इन्तेजार था!

अनिल ने अपना मोबाइल चेक किया तो देख कर दंग रह गया और जोर से चिल्लाया; “पिताजी!!! जीजू ने फ्लाइट की टिकट्स बुक करा दी हैं!” ये सुन कर तो मैं भी चौंक गई… उस कमरे में बैठा हर कोई चौंक गया सिवाय इनके जो मंद-मंद मुस्कुराये जा रहे थे! बड़की अम्मा बोलीं; “मुन्ना ये क्या?”

“अम्मा…. माँ-पिताजी को तो हवाई यात्रा करा दी, अब बारी थी मेरी बड़ी माँ की और सास-ससुर की| अब ऐसा मौका दुबारा कहाँ मिलेगा?” इन्होने मुस्कुराते हुए कहा| अम्मा ने पिताजी (मेरे ससुर जी) की तरफ देखा ओ पिताजी बोले; “हभी…. आप ही का लड़का है … अब मैं कैसे इसे मना करूँ! जो काम बाप ना कर सका वो बेटे ने कर दिया! शाबाश!”

“अरे समधी जी, हवाई जहाज की टिकट तो बहुत महंगी होती है!” मेरे पिताजी ने कहा|

“पर पिताजी आप सबसे महंगी तो नहीं?” इन्होने अपना तर्क दिया| सब ने बहुत कोशिश की पर ये टस से मस नहीं हुए| आखिर कर सब को फ्लाइट से ही जाना पड़ा| सब बहुत खुश थे …. बहुत-बहुत खुश| शायद ही मैंने कभी ऐसी ख़ुशी एक साथ सब के चेहरे पर देखि हो!

आज रात बड़की अम्मा और अजय यहीं ठहरने वाले थे…. सब के सोने का प्रबंध किसी तरह हो गया था| आयुष और नेहा आज सब के साथ सोये थे और finally हम दोनों आज रात अकेले थे| मैंने झट से दवाजा लॉक किया| आखिर वो पल आ ही गया जिसका मुझे बेसब्री से इन्तेजार था!

अब आगे……

जैसे ही मैं दरवाजा लॉक कर के पलटी तो ये बाथरूम से निकल रहे थे| पता नहीं मुझे क्या हुआ मैं इनकी तरफ बढ़ी और जा कर इनके गले लग गई| वो प्यास जो मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी मुझ पर हावी हो चुकी थी|इन्होने मुझे कस के गले लगा लिया … वो इनके बाजुओं की ताकत वो एहसास….. इनके जिस्म की वो तपिश जो मुझे जला के राख कर देना चाहती थी…..और मैं खुद इस अग्नि के लिए मरी जा रही थी….

“finally ….. ” बस इतना ही कह पाई| कुछ देर के लिए मैं सब भूल चुकी थी… बस उनकी बाहों में ही सिमटी रहना चाहती थी! जब एहसास हुआ की ये अभी तक पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं तो मैंने इनसे अलग होना चाहा पर इन्होने मुझे अपनी गिरफ्त से आजाद नहीं किया बल्कि और जोर से भींच लिया! अगले पल इन्होने मुझे अपनी गोद में उठा लिया और पलंग पर ला कर लिटा दिया| मैं जानती थी की इनका शरीर अभी भी कमजोर है पता नहीं कैसे इनमें इतनी ताकत आ गई थी! मेरे चेहरे पर चिंता की रेखाएं इन्होने देख ली और मुस्कुराते हुए बोले; “जान मुझे कुछ नहीं हुआ|” इतना कह कर ये bedpost का सहारा ले कर बैठ गए और मैं इनके कंधे पर सर रख कर बैठ गई|

“तुम्हें पता है, जब मुझे होश आया तो ये आँखें खुल ही नहीं रहीं थीं… लग रहा था की मैं तुम्हें कभी देख ही नहीं पाउँगा! बस तुम्हारे हाथ का वो स्पर्श मुझे महसूस हुआ…. फिर तुम्हारी आवाज सुनाई दी…. दिल को थोड़ा सकूँ मिला की कम से कम तुम मेरे पास तो हो! अपनी जिस्म की पूरी ताकत झोंक कर मैंने आँखें खोलीं और तुम्हें देख कर लगा जैसे सालों बाद तुम्हें देख रहा हूँ! वो तड़प….. मैं बयान नहीं कर सकता!”

“श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श….” मैंने उनके होंठों पर ऊँगली रख कर न्हें खामोश कर दिया| मैं उनके वो दुःख भरे लम्हे उन्हें फिर से याद नहीं दिलाना चाहती थी|

“मुझे आपको thank you कहना था!”

“thank you? किस लिए?” उन्होंने पूछा|

“आपने मुझे मेरी खोई हुई इज्जत…मान-सम्मान वापस दिलाया| आज मेरे पिताजी मुझे जब देख रहे थे तो उन्हें वही गर्व महसूस हो रहा था, जो पहले होता था| माँ ने मुझे आशीर्वाद दिया तो उसी प्यार के साथ जैसे पहले दिया करती थी| अनिल मुझे फिर से ‘दीदी’ कहने लगा और नेहा की आँखों मुझे वही माँ वाला प्यार नजर आता है! सब आपकी वजह से…..”

“मैंने कुछ भी नहीं किया! गलती तुम्हारी थी जो तुमने मेरी गलतियाँ छुपाने के लिए खुद को ढाल बना दिया| यार आपने मुझे जो मेल भेजा था उसे मैंने पढ़ा … सच कहूँ मुझे उस दिन आपके असली जज्बात का अंदाजा हुआ…. इसके बारे में आपसे बात करनी चाही पर आप नाराज थे….फिर उस दिन सुबह आपके दुःख और तकलीफ को महसूस कर मैं खुद को कोसता रहा की मन अपनी पत्नी की रक्षा नहीं कर सका….अपने बच्चों की देख-रेख नहीं कर सकता…… काश मैंने उसे उस दिन जान से मार दिया होता तो ये दिन नहीं देखना पड़ता!”

“अगर आप उसके गंदे खून से अपने हाथ गंदे कर लेते तो मेरा क्या होता? बच्चों का क्या होता? आप तो हम से दूर हो जाते… कैसे जीते हम सब आपके बिना? मैं जानती हूँ की आप मुझसे इतना प्यार करते हो की मेरी गलती कभी नहीं मानोगे…. देखा जाए तो सब मेरी गलती थी….” मेरे आगे बोलने से पहले इन्होने मेरी बात काटी; “बिलकुल नहीं….” पर इस बार मैंने इनकी एक नहीं चलने दी| मुझे इन्हें एहसास कराना था की गलती मेरी थी ना की इनकी| इन्होने तो मेरे लिए कितना कुछ किया…..
“आज आपको मेरी बात सुन्नी ही होगी…. आप को लगता है की गलती आपकी है पर ऐसा कतई नहीं है| मेरी सबसे बड़ी गलती की मैंने आपसे अपना गम छुपाया …आपसे …. अपने पति परमेश्वर से! जिसे मैं इतना प्यार करती हूँ…. जो मेरे लिए अपनी जान देने से भी नहीं चुकेगा उससे मैंने अपने दिल का हाल छुपाया| अगर मैं गलत नहीं तो …. आपको मेरे दिल की हालत का अंदाजा था| आप जानते थे की मैं अंदर से कैसा महसूस कर रही हूँ पर फिर भी आपने हार नहीं मानी…मुझे हँसाने-बुलाने की कोशिश करते रहे| पर एक मैं ही थी जो खुद को आपसे अलग कर बैठी थी वो भी सिर्फ इसलिए की ये सब मेरी गलती थी| जो की सच है…. मेरी ख़ुशी के लिए आप ये देश छोड़ के बाहर सेटल होना चाहते थे … सिर्फ मेरे लिए! अपने माँ-पिताजी से भी अलग होने को तैयार हो गए…सिर्फ मेरे लिए! इससे बड़ी क़ुरबानी की मैं आपसे उम्मीद नहीं कर सकती| मुझे बिना बताये आप मेरे परिवार की मदद करते रहे … आपको पता है पिताजी आपको अपने सभी बच्चों से ज्यादा प्यार करते हैं और ये मेरे लिए कितनी गर्व की बात है| जहाँ कुछ महीने पहले उन्हें इस रिश्ते से चिड़ थी वहीँ आज वो आपको इतना मान-सम्मान देते हैं| फिर भी धिक्कार है मुझ पर जो मैंने आपसे इस तरह बोलना-चालना बंद कर दिया| नेहा ने सही कहा था… I don’t deserve you! ………… im sorry…. ना मैं वो सब लिखती और ना ही आपकी ये हालत होती|” मेरे मन में अभी तक जो बात दबी हुई थी वो आज सब फुट कर बाहर आ गई थी और साथ ही मेरे आँसूं भी बह निकले थे| उन्होंने कुछ कहा नहीं बस मुझे कस कर अपने सीने से लगा लिया और मैं उनके सीने में सर रखे बैठी रही| मेरे आँसूं थम चुके थे… अंदर जितनी भी ग्लानि थी वो अब नहीं थी| कुछ देर बाद वो बोले; “जानू…. I LOVE YOU!” इतने समय बाद इनके मुँह से ये सुन कर अच्छा लगा … मन प्रसन्न हो गया| “गलती दोनों की थी… okay? matter finish!” कितनी आसानी से उन्होंने मेरे साड़ी गलतियाँ अपने साथ बाँट ली थीं| सच! मुझे लगता है की मैं कभी इन्हें समझ ही नहीं पाऊँगी! अब नींद दोनों को ही आ रही थी…. पर मैं आज का मौका गँवाना नहीं चाहती थी| ये पीठ के बल लेते थे, मैंने इनके दहीं हाथ को सीधा किया और उसे अपना तकिया बनाते हुए इनसे लिपट गई| इन्होने दोनों के ऊपर रजाई डाली और फिर मेरी तरफ करवट ले कर लेट गए| इनके होंठ मेरे मस्तक को छू रहे थे और मैं वो तपिश अपने मस्तक पर महसूस कर पा रही थी| सच एक अरसे बाद हम इस तरह सो रहे थे! रात को करीब तीन बजे मैंने एक भयानक सपना देखा…जिसके बारे में लिखने में भी मुझे दर लगा रहा है और मैं बुरी तरह घबरा गई और चौंक कर उठ गई| मेरे साथ-साथ इनकी भी आँख खुल गई और इन्हें पता चला गया की मैंने कोई भयानक सपना देखा है| ये बोले; “hey … मैं यहीं हूँ… !” और मैं फिर से इनके सीने से आ लगी और आँख से आँसूं बह निकले| इन्होने मेरे आँसूं पोछे और मुझे इतना कस के अपने सीने से लगाया की मुझे इनकी और इन्हें मेरे दिल की जोरदार धड़कन सुनाई देने लगी थी| हम फिर से लेट गए पर नींद नहीं आ रही थी…. ना मुझे और ना इन्हें ….

करीब एक घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई….. पहले तो हम दोनों डर गए क्योंकि इतनी देर रात दस्तक होना किसी अच्छी चीज की निशानी तो नहीं थी| मैं उठने लगी तो इन्होने मुझे रोक दिया और खुद दरवाजा खोला| दरवाजा खोलते ही नेहा आकर इनके पैरों में लिपट गई और रोने लगी| उसे रोता देख मैं भी झट से उठ गई और तब तक इन्होने उसे गोद में उठा लिया था और उसे पुचकारने लगे| “awwwwww मेरा बच्चा क्या हुआ? फिर से बुरा सपना देखा?…. बस…बस… रोते नहीं… बस…. पापा हैं ना यहाँ|” ये उसे गोद में ले कर घूमने लगे जैसे किसी नन्हें बच्चे को चुप कराया जाता है| मेरी नजर दुबारा दरवाजे पर गई तो देखा मेरी माँ कड़ी थीं और इन्हें इस तरह नेहा को पुचकारता हुआ देख हँस रही थीं| “अब समझ आया की नेहा मानु बेटे से इतना प्यार क्यों करती है! खेर माफ़ करना बेटा पर अचानक से नेहा चौंक कर उठ गई और पापा का कर रोने लगी| तुमने अभी तक किसिस डॉक्टर को इसे नहीं दिखाया?”

मैंने जवाब देने के लिए मुँह खोला ही था की ये बोल पड़े; “नहीं माँ…नेहा को कोई बीमारी नहीं है| वो बस मुझसे बहुत प्यार करती है ना की उसे मेरे बिना नींद नहीं आती|” पता नहीं कैसे पर एह की आँख लग गई थी या कम से कम हमें तो यही लगा था|

“पर बेटे…अभी तुम जवान हो…. और अगर इस तरह ये तुम दोनों से….मतलब…. तुम दोनों को नही तो कुछ समय मिलना चाहिए?” माँ ने कहा और मेरी तरह आप लोग भी उनकी बात समझ ही गए होंगे| हम दोनों के पास इसका कोई जवाब नहीं था और हम दोनों बस एक दूसरे की ओर देख रहे थे…. थोड़ा awkward moment था …. तभी माँ को भी हमारी दशा समझ आ गई और वो बोलीं; “अच्छा बेटा … नेहा तो सो गई … अब आप दोनों भी सो जाओ|” और इतना कह कर माँ चली गईं| मैंने दरवाजा बंद किया और देखा तो ये पीठ के बल सीधा लेटे हुए थे ओर नेहा इनकी छाती पर चिपकी हुई थी| मेरे लिए इन्होने अपनी दायीं बाह को खोल रखा था ताकि मैं उसे अपना तकिया बना के लेट जाऊँ| इसलिए मैं भी बिस्तर में घुसी और उनके biceps को अपना तकिया बना कर इनसे लिपट गई| मेरा डायन हाथ नेहा की पीठ पर था और मैं उसे सहला रही थी| करीब आधे घंटे बाद दोनों की आँख लग गई|

सुबह ग्यारह बजे सबकी फ्लाइट थी तो मैं करीब पाँच बजे उठ गई और नहा धो कर रसोई में पहुँच गई| आज ठण्ड ज्यादा थी और रात भर मेरी और नेहा की वजह से इनकी नींद पूरी नहीं हुई थी इसलिए सबब बैठक में बैठे थे और सब वहीँ चाय पी रहे थे| सात बजे करीब नेहा उठ कर बाहर आई तो मुझे लगा की अब ये भी उठ गए होंगे| इसलिए मैं अपनी और इनकी चाय ले कर कमरे में आ गई और मेरे पीछे-पीछे बड़की अम्मा भी आ गईं| उनके हाथ में एक झोला था और चेहरे पर मुस्कान| “बेटा…. तूने मेरी कोख से जनम क्यों नहीं लिया?” ये कहते हुए अम्मा ने इनके सर पर हाथ रख दिया|

“अम्मा…. सिर्फ जन्म लेने से कोई बेटा बन जाता है?” इन्होने जवाब दिया|

“हम्म…. मेरे बच्चे जिन्होंने मुझे कभी रेल से यात्रा नहीं कराई और तू मुझे हवाई जहाज से यात्रा करा रहा है! जुग-जुग जिओ … दूधो नहाओ पुतो फलों!” अम्मा ने इन्हें आशीर्वाद दिया|

“अच्छा अम्मा…एक बात थी! बुरा न मानो तो एक बात कहूँ?” इन्होने जिझकते हुए कहा|

“पूछ बेटा|”

“अम्मा जब आप आये थे उस इन आप आयुष से तो गले मिल लिए थे पर आपका ध्यान नेहा पर नहीं गया….वो बेचारी आपके पाँव छू कर ही रह गई| मैं जानता हूँ आप उसे भी प्यार करते हो पर…..” इन्होने बात पूरी नहीं की|

“नेहा….बेटी इधर तो आ|” अम्मा ने नेहा को आवाज लगाईं| नेहा सामने आ कर खड़ी हो गई| अम्मा ने अपना हाथ झोले में डाला और गुलाबी कागज में बंधा हुआ कुछ निकला और उसे खोलने लगी| जब उन्होंने उसे खोला तो उसमें चाँदी की पायल निकली| बहुत खूबसूरत थी….
उन्होंने वो पायल नेहा को दी और उसका माथा चूम कर बोलीं; “ये मेरी बेटी के लिए…. वैसे ये थी तो तेरी माँ के लिए पर उससे ज्यादा तेरे पाँव पर जचेगी! और मुझे माफ़ कर दे बेटी उस दिन मैं ने सच में तुझ पर ध्यान नहीं दिया| तेरे पापा की तबियत के बारे में सुन कर मैं बहुत परेशान थी… सॉरी (sorry)!”

नेहा ये सुनते ही अम्मा से लिपट गई और बोली; “सॉरी नहीं sorry … और अम्मा माँ ने मुझे समझा दिया था… its okay!” पता नहीं अम्मा को क्या समझ आया पर उन्होंने फिर से लड़खड़ाते हुए कहा; “टहंक ऊ” ये सं कर हम सब की हँसी छूट गई और नेहा ने उन्हें फिर से बताया की; “अम्मा thank you होता है!” ये सुन का र अम्मा के मुंह पर बी मुस्कान आ गई| खेर सब क जाने का समय नजदीक आ रहा था| पिताजी (ससुर जी) ने Innova taxi मँगवाई थी और वे खुद सबको छोड़ने T3 जा रहे थे| मेरे लाख मन करने पर भी ये उठ के बहार बैठक में आ गए और सभी के पाँव छुए और उन्हें विदा किया| सबने जाते हुए इन्हें बहुत-बहुत आशीर्वाद दिए| सबके जाने के बाद घर में बस मैं, माँ, नेहा और ये ही रह गए थे| जैसे ही ये अपने कमरे में आये इन्हें sinus का अटैक शुरू हो गया!

“नेहा….बेटी इधर तो आ|” अम्मा ने नेहा को आवाज लगाईं| नेहा सामने आ कर खड़ी हो गई| अम्मा ने अपना हाथ झोले में डाला और गुलाबी कागज में बंधा हुआ कुछ निकला और उसे खोलने लगी| जब उन्होंने उसे खोला तो उसमें चाँदी की पायल निकली| बहुत खूबसूरत थी….
उन्होंने वो पायल नेहा को दी और उसका माथा चूम कर बोलीं; “ये मेरी बेटी के लिए…. वैसे ये थी तो तेरी माँ के लिए पर उससे ज्यादा तेरे पाँव पर जचेगी! और मुझे माफ़ कर दे बेटी उस दिन मैं ने सच में तुझ पर ध्यान नहीं दिया| तेरे पापा की तबियत के बारे में सुन कर मैं बहुत परेशान थी… सॉरी (sorry)!”

नेहा ये सुनते ही अम्मा से लिपट गई और बोली; “सॉरी नहीं sorry … और अम्मा माँ ने मुझे समझा दिया था… its okay!” पता नहीं अम्मा को क्या समझ आया पर उन्होंने फिर से लड़खड़ाते हुए कहा; “टहंक ऊ” ये सं कर हम सब की हँसी छूट गई और नेहा ने उन्हें फिर से बताया की; “अम्मा thank you होता है!” ये सुन का र अम्मा के मुंह पर बी मुस्कान आ गई| खेर सब क जाने का समय नजदीक आ रहा था| पिताजी (ससुर जी) ने Innova taxi मँगवाई थी और वे खुद सबको छोड़ने T3 जा रहे थे| मेरे लाख मन करने पर भी ये उठ के बहार बैठक में आ गए और सभी के पाँव छुए और उन्हें विदा किया| सबने जाते हुए इन्हें बहुत-बहुत आशीर्वाद दिए| सबके जाने के बाद घर में बस मैं, माँ, नेहा और ये ही रह गए थे| जैसे ही ये अपने कमरे में आये इन्हें sinus का अटैक शुरू हो गया!

अब आगे…..

दरअसल इन्हें कभी-कभी ठंडी हवा से, ज्यादा मसालेदार खाना खाने से, कुछ ठंडी चीज खाने या पीने से, नींद पूरी न होने पर, थकावट से, धुल-मिटटी से और कभी कभी किसी अजीब सी महक से allergy है और तब इनकी छींकें शुरू हो जाती हैं| छीकें इस तरह आती हैं की इनका पूरा बदन झिंझोड़ कर रख देती हैं| पूरा शरीर पसीने से भीग जाता है और नाक से पानी आने लगता है| नाक से सांस लेना मुश्किल हो जाता है| ऐसा लगता है मानो नाक अंदर से छिल गई हो! पर ये कभी-कभी होता है… मुझे इसका पता था इसलिए मैंने इन्हें अंदर कमरे में रहने को कहा था| अब चूँकि बाहर का कमरा ठंडा था और इन्हें सब को see off करना था तो इन्होने बाहर आने की जिद्द की| अब जब इनका ये अटैक शुरू हुआ तो मैंने फ़ौरन पानी गर्म करने को रख दिया और इन्हें steam दी पर कोई रहत नहीं मिली| मैंने इन्हें किसी तरह लिटा दिया और सोचा की सब को फ़ोन कर दूँ… माँ ने तो कहा भी की पिताजी (ससुर जी) को फोन कर दे पर इन्होने मन कर दिया| छींक-छींक कर इनका बुरा हाल था, रुमाल पर रुमाल भीगते जा रहे थे, इनका बदन ठंडा होने लगा था जो की चिंता का विषय था| गर्दन से पेट तक पूरा जिस्म ठंडा पड़ने लगा था, जब की आमतौर पर इनका जिस्म गर्म रहता है| इन्होने नर्स राजी को बुलाने को कहा तो मैंने उन्हें जल्दी से फोन मिलाया और सारी बात बताई| उन्होंने कहा की मैं आ रही हूँ.. तब तक मैं माँ और नेहा इन्हीं के पास बैठे थे| नेहा की आँखों में आँसूं थे उससे इनकी ये पीड़ा देखि नहीं जा रही थी| हाल तो कुछ मेरा भी ऐसा ही था पर खुद को मजबूत कर के बैठी थी| आखिर छींकते-छेंकते इन्होने tissue paper के दो box खत्म कर दिए| करीब आधे घंटे के अंदर नर्स राजी आ गईं और उनके साथ nebullizer था| उन्होंने जल्दी से मशीन को बिजली के पॉइंट से plug किया और कुछ दवाई दाल कर इन्हें mask पहना दिया और मशीन के चलने पर भाप जैसा कुछ निकलने लगा और इन्होने उस भाप को सुंघा और तब धीरे-धीरे इनकी हालत में सुधार आया| bedpost का सहारा ले कर इन्होने सब inhale किया और फिर जब आराम मिल गया तो हम ने इन्हें वापस लिटा दिया और रजाई उढ़ा दी| इनकी हालत में सुधार देख हमारी जान में जान आई| नेहा भी अब normal लग रही थी… मैंने उसे चाय बनाने को कहा| माँ उठ के fresh होने के लिए कमरे में गई| अब कमरे में बस हम दोनों रह गए थे| दोनों ख़ामोशी से बैठे हुए थे… जब चाय बन गई तब माँ ने हम दोनों को बाहर बुलाया और हम सारे drawing room में बैठ कर चाय पी रहे थे|

नेहा ने T.V. चालु किया और CID के पुराने एपिसोड देखने लगे| मुझे जो बात अजीब लगी वो ये थी की राजी भी उतना ही interest ले रही थी जितना मैं और माँ ले रहे थे| शायद राजी मेरे घर के बारे में बहुत कुछ जानती थी! तभी नेहा अचानक से उठी और कमरे की तरफ भागी और बाहर आके बोली; “आंटी पापा उठ गए!” माँ ने मुझे इशारे से कहा की मैं भी साथ जाऊँ| माँ के पाँव में सूजन रहती है तो वो ज्यादा चलती फिरती नहीं| जब मैं और राजी कमरे में घुसे तो ये bedpost का सहारा ले कर बैठे हुए थे| इन्हें इस तरह बैठा हुआ देख, राजी बोली; “आप कैसे हो मिठ्ठू?” इन्होने मुस्कुरा कर जवाब दिया; “मैं…….(तीन सेकंड का cinematic pause ले कर) ठीक हूँ!” ये सुन कर दोनों खिल-खिला कर हँसने लगे| मुझे इनका ये बर्ताव बहुत अजीब लगा…क्योंकि ये cinematic pause तो इन्होने कभी मेरे साथ बात करते हुए भी नहीं लिया था! पर मैं चुपो रही क्योंकि मैं उस वक़्त कोई scene खड़ा नहीं करना चाहती थी और वैसे भी मेरे लिए जर्रुरी ये था की इनकी तबियत ठीक हो गई है| शायद मैं कुछ ज्यादा ही सोच रही थी…… शायद!!!
मैं नेहा को इन दोनों के पास छोड़ कर अदरक वाली चाय बनाने चली गई| पता नहीं मैंने नेहा को वहां क्यों छोड़ा? ऐसा तो नहीं था की मुझे इन पर शक था…पता नहीं क्यों…… मेरे चाय ले कर आते-आते माँ भी अंदर आ गईं थीं और फिर वहां बातों का माहोल शुरू हो चूका था| तभी ये बोले; “यार भूख लग रही है| ऐसा करो omlet बनाओ!” मैं थोड़ा हैरान थी क्योंकि अभी तक इन्हें खाने के लिए मसालेदार खाना नहीं दिया जा रहा था| मुझे तो कुछ समझ नहीं आया पर लगा की राजी जर्रूर मन कर देगी पर उसने तो आगे बढ़ कर कहा; “मैं बनाती हूँ!” हैरानी से मेरी भँवें तन गईं पर तभी नेहा बोली; “पर घर में eggs तो हैं ही नहीं?”
ये सुन कर इनका मुँह बन गया और मुझे ख़ुशी महसूस हुई क्योंकि मैं कतई नहीं चाहती थी की एक गैर हिन्दू लड़की मेरी रसोई में घुसे! पर नेहा से अपने पापा की ये सूरत नहीं देखि गई उसने बोला; “मैंdon’t worry पापा … मैं ले आती हूँ|” इन्होने उसे मना भी किया; “बेटा बाहर बहुत ठण्ड है|” पर नेहा जिद्द करने लगी आखिर इन पर जो गई है! हारकर इन्होने उसे जाने की इजाजत दी पर मोटी वाली जैकेट पहन के जाने के लिए बोला| अब ये सब सुन और देख मेरा मुँह उतर गया पर किसी तरह अपने भावों को छुपा कर मैं नार्मल रही|

राजी को रसोई के बारे में सब पता था … और ये देख मैं हैरान थी! मुझे लगा था की वो मुझसे पूछेगी की तेल कहाँ है, प्याज कहाँ है पर नहीं …उसने एक शब्द भी नहीं पूछा जैसे की उसे सब कुछ पता था| खेर मेरे ना चाहते हुए भी राजी ने ने अपने, नेहा और इनके लिए ऑमलेट बनाया| मैंने और माँ ने नहीं खाया…माँ तो वैसे भी नहीं खाती थीं पर मैं…मैं सिर्फ और सिर्फ इनके हाथ का बना हुआ ऑमलेट खाती थी| उस जलन को मैंने किस तरह छुपाया मैं ही जानती हूँ….. !

चलो यही सोच लिया की कम से कम इनकी तबियत तो ठीक है| पिताजी के आने पर उन्हें ये सब पता चला तो वो भी नाराज हुए की आखिर क्यों इन्होने कमरे से बाहर निकलने की जहमत उठाई और सब के लिए तकलीफें बढ़ाई| ये सब पिताजी के शब्द थे … ना की मेरे| तीन घंटे बाद मेरे पिताजी का फोन आया और जब मैंने उन्हें ये सब बताया तो वो भी घबरा गए और लगा की जैसे अगली फ्लाइट पकड़ के घर आ जायेंगे पर इन्होने बात संभाली और अपनी तबियत ठीक होने की खबर दे कर उन्हें संतुष्ट किया| दोपहर को बिना खाना खाए इन्होने राजी को जाने नहीं दिया| जाते-जाते वो कह गई; “take care मिठ्ठू!” और ये भी मुस्कुरा कर बोले; “i will”खेर मैंने ये भी बर्दाश्त कर लिया| रात सोने का समय आया तो नेहा और आयुष हम दोनों के बीच में आ कर सो गए| अगले दिन ये काफी देर से उठे, इनका पूरा बदन दर्द कर रहा था (ये उन छींकों का असर था|) … रात में पिताजी ने सख्त हिदायत दी थी की इन्हें कमरे से निकलने की मनाही है! नाश्ता करने के बाद जनाब बिस्तर पर बैठे फिल्म देख रहे थे| मुझे पता था की ये बहुत बोर हो रहे हैं तो मैंने इन्हें YouSexStories पर लोगिन करने को कहा| सोचा इसी बहाने ये आप लोगों से कुछ बात कर लेंगे … आगे कुछ लिखेंगे| पर हुआ कुछ अलग ही…. जैसे ही इन्होने थ्रेड पर अपने दुबारा दिखने की खबर दी, राजेश भाई का कमेंट आया| उनका कहने का मतलब था की इन्हें पहले आराम करना चाहिए उसके बाद ऑनलाइन आना चाहिए पर इन्होने उसका कुछ और ही मतलब निकला और फैसला कर लिया की ‘ मैं अब कभी नहीं लिखूँगा|” देखा जाए तो इनकी भी कोई गलती नहीं… दरअसल एक ही कमरे में बंद रहने से इंसान थोड़ा बहुत चीड़चिड़ा हो ही जाता है|

मैंने इन्हें समझने की बहुत कोशिश की पर ये हमेशा कहते; “यार प्लीज मुझसे इस बारे में बात मत करो|” इनका वो अकेलापन …वो तड़प मैं अच्छे से महसूस कर रही थी| मैंने सोच लिया की मैं किसी भी तरह से इन्हें फिर से लिखने के लिए मना लूँगी| एक वही तो जरिया था जिसके जरिये ये अपने मन की बात सब से share कर पा रहे थे| लिखना बंद करने के बाद तो इन्होने अपने आप को बच्चों के साथ बिजी कर लिया…. कभी आयुष के साथ games खेलने लगते तो कभी नेहा से बातें करने लगते| दोनों की बातें सुन कर ऐसा लगता की पिछले 12-15 साल की सारी बातें इन्हें सुननी है…वो हर एक दिन जो नेहा ने इनके बिना काटा वो सब इन्हें सुन्ना था| इन्हीं बातों में नेहा ने अपने डर को जाहिर किया!
उसकी बातें सुन कर जो मुझे समझ आया वो ये था;…….
जब नेहा पैदा हुई तो मुझे वो ख़ुशी नहीं हुई जो आयुष के पैदा होने पर हुई थी| कारन ये की आयुष मेरे और ‘इनके’ प्यार की निशानी था और नेहा…वो तो मेरे साथ हुए धोके की निशानी! उस का जो भी लालन-पालन मैंने किया वो सिर्फ एक कर्तव्य समझ के किया, माँ होने का एहसास तो मुझे कभी हुआ ही नहीं! इसी कारन मैंने नेहा पर कही ध्यान नहीं दिया… उस समय मैं बस अपने जीवन को ही कोसती रहती थी| दिन में वो मिटटी में खेल रही है या धुप में मैंने कभी ध्यान नहीं दिया और रात में …. रात में उसे खुद से अलग दूसरी चारपाई पर सुलाती थी| रात में उसे डरावने सपने आते … जैसे की हर बच्चे को आते हैं| सपने में किसी ऊँची जगह से गिरते हुए देखना, कभी सीधी से गिर जाना, कभी भूत-प्रेत देखना…ये ही सपने नेहा को परेशान किया करते| ऐसे में जब वो डर कर मुझे नींद से उठाने की कोशिश करती तो मैं उस पर चिल्ला कर उसे चुप करा दिया करती| वो मेरी डाँट से इतना डरती थी की उसने अब मुझे नींद से उठाना बंद कर दिया और चुप-चाप सहम के रह जाया करती| घर में उसे वैसे भी कोई प्यार दुलार करता नहीं था| जो कुछ प्यार उसे मिला वो अपने नानानानी से मिला… कुछ अनिल से मिला जब कभी वो वहाँ होता| मुझसे तो वो उम्मीद ही नहीं करती थी…… फिर जब मैं इनसे मिली…. दूसरी बार मिली…. …… इन दोनों दफा नेहा को इनसे कुछ प्यार मिला… या फिर वो भी मेरी तरह इनकी तरफ आकर्षित होने लगी थी| जब मैं ‘इनसे’ तीसरी बार मिली तो इन्होने नेहा के लिए अपना प्यार बस स्टैंड जाते समय जाहिर किया …. और जब ये गाँव आये तब तो इन्होने अपना प्यार नेहा पर लूटना शुरू कर दिया| वो एक महीना नेहा को इनसे जो प्यार मिला वो ….. उसकी अभी तक की जिंदगी का सारा रास था| जितने दिन ये गाँव रुके नेहा का रात में डर के उठ जाना कम हो गया| आमतौर पर उसका डर हफ्ते में 4-5 से बार होता था, और इनकी मौजूदगी में ये 1-2 बार ही हुआ होगा|
जब भी नेहा इनके साथ इनकी छाती से लिपट कर सोती तो उसे सुरक्षित होने का एहसास होता| “i feel safe.” ये उसका कहना था… अब इसे मैं उसका बचपना समझूँ या फिर अपने पापा के लिए प्यार? या फिर नेहा को भी उनके सीने से वही तपिश मिलती है जो मुझे मिलती है जब मैं इनके गले लगती हूँ| “मैं आपको खोना नहीं चाहती|” ये भी उसी के शब्द थे….. सच में मैं उसके लिए कभी अच्छी माँ साबित नहीं हो पाई और इस बात का गिला मुझे सारी उम्र रहेगा|
“I love you my baby! और अब मेरे बच्चे को किसी भी चीज से डरने की बात नहीं|” ये कह कर ‘इन्होने’ नेहा को अपने गले लगा लिया| पर नेहा के जीवन से अभी भी पूरी तरह पर्दा नहीं उठा है|अगले कुछ दिन इसी तरह बीते…. लघ-भाग रोज राजी का फ़ोन आता और ‘ये’ उससे घंटों बात करते रहते| मैं ये सोच कर चुप रही की कम से कम इनका टाइम पास हो जाता है| पर मुझे इनका उससे बात करना फूटी आँख नहीं भाता था! खाना-खाने के लिए इन्हें कहना पड़ता थकी; “पहले खाना खा लो फिर बात करना|” और तब ये मुस्कुराते हुए राजी से कहते; “वार्डन आ गई है! खाना खा के फोन करता हूँ|” पर मैं इन्हें खाना खाने के बाद जबरदस्ती सुला देती और जब ये नहीं मानते तो बच्चों को इन के पास भेज देती और नेहा और आयुष इन्हें सुला ही देते| दिन पर दिन इनकी सेहत अच्छी होने लगी थी…. इसलिए पिताजी ने जो इन पर कमरे से बाहर निकलने का बैन लगाया था वो भी उठा लिया और अब ये ड्राइंग रूम में बैठ जाया करते और टी.वी. भी देखा करते| पर जो बदलाव मैंने इनमें देखा वो ये था की इनका मन कुछ न कुछ लिखने को करता पर ये अपना मन दूसरे कामों में लगाने की कोशिश करते| कभी पिताजी से estimate पर discussion करते तो कभी बच्चों का होमवर्क ले कर बैठ जाते| हाँ होमवर्क करते समय ‘ये’ उनका mathematics का होमवर्क कभी नहीं करते, उससे इन्हें डर लगता था! (ही..ही…ही…)

पर मैंने भी ठान ली थी की इन्हें फिर से लिखने के लिए उकसा कर रहूँगी| इसलिए मैंने राजेश भाई से मदद माँगी| मैंने अपनी आप बीती लिखना शुरू किया और जीता भी लिखती उन्हें मेल कर दिया करती| मेरा प्लान था की मैं इस आप बीती के बारे में इन्हें तब बताउंगी जब मैं पूरा लिख लूंगी| तब उससे पढ़ने के बाद शायद इनका मन बदल जाए और ये फिर से लिखना शुरू कर दें| इसलिए मैं राजेश भाई से हुई सारी बातें इन से छुपाने लगी और इन्हें मुझ पर इतना भरोसा है की इन्हें जरा सा शक भी नहीं हुआ|

एक दिन की बात है … मैं ड्राइंग रूम में बैठी लैपटॉप पर अपनी आप बीती टाइप कर रही थी| मेरी पीठ कमरे की तरफ थी, क्योंकि डाइनिंग टेबल की मैं कुर्सियों पर सिर्फ ‘इनका’ और पिताजी (ससुरजी) का हक़ है| मुझे लगा की ये सो रहे होंगे क्योंकि मैंने नेहा और आयुष को ‘इनके’ पास सोने के लिए भेजा था| पता नहीं चला कब ये मेरे पीछे आ कर खड़े हो गए और पता नहीं इन्होने क्या-क्या पढ़ा होगा| मुझे तो तब पता चल जब इनका हाथ मेरे सर पर आया|मैंने एकदम पलट के देखा और हैरान रह गई. ऐसा लगा जैसे इन्होने मेरी कोई चोरी पकड़ ली हो| मुझे तो लगा शायद ये मुझ पर गुस्सा होंगे, पर ‘इन्होने’ कुछ नहीं कहा और सर पर हाथ फेर कर कमरे में जाने लगे और बोले; “keep it up”| मेरा सरप्राइज फुर्ररर हो गया था…. फ़रवरी का महीना शुरू हो चूका था और अब इनकी तबियत काफी ठीक हो चुकी थी और आयुष का जन्मदिन आ रहा था| पर मैं अब भी बहुत सावधानी बारात रही थी| घर से बाहर कहीं भी नहीं जाने देती थी| जानती थी की मैं इनके साथ जबरदस्ती कर रही हूँ पर क्या करूँ, प्यार भी तो इतना करती हूँ इनसे! इधर इन्होने आयुष के जन्मदिन की planing शुरू कर दी थी| मैंने इन्हें बहुत समझाया की हम इस बार जन्मदिन हर पर ही मनाएंगे पर ये नहीं माने| इन्होने तो आजतक का सबसे best birthday plan बनाया था! जैसे-जैसे दिन नजदीक आने लगा, आयुष ने अपने जन्मदिन का राग अलापना शुरू कर दिया| पर उसे जरा भी भनक नहीं थी की जन्मदिन पर उसे क्या मिलने वाला है| इधर मैंने ‘इनका’ कुछ ज्यादा ही ध्यान रखना शुरू कर दिया| दिन पर दिन इनकी तबियत ठीक होने लगी थी, जिसका श्रेय ये मुझे देते हैं पर मैं इसकी हक़दार नहीं| इनका घर पर रहने को जरा भी मन नहीं था और ये दिन पर दिन बेचैन होने लगा था| मैं चाह कर भी इन्हें घर पर रोक नहीं पा रही थी| मेरा दिल कह रहा था की ये अभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं, और मैं नहीं चाहती थी की बिना पूरी तरह ठीक हुए ये घर से बाहर कदम रखें|मैंने इन्हें बहुत समझाने की कोशिश की पर ये नहीं माने| इनका कहना था; “यार मेरी बीमारी की वजह से बहुत खर्च हो गया है| पिताजी ने नए projects उठाना भी बंद कर दिया है| अब मुझे काम सम्भालना पड़ेगा|” बात सही भी थी पर मन बहुत बेचैन था तो मैंने माँ से बात की| उन्होंने पिताजी से और फिर हम तीनों ने इनसे बात की पर ये अपनी जिद्द पर अड़े रहे| आखिर पिताजी ने इन्हें इजाजत दे दी पर एक शर्त के साथ, वो ये की working hours सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक रहेंगे| अब काफी बहस बाजी के बाद इन्होने हमारे आगे हार मान ही ली| रात में खाना खाने के बाद जब हम लेटे तो हमेशा की तरह नेहा इनकी छाती पर चढ़ कर सो गई और आयुष हम दोनों के बगल में सोया था| दोनों सो चुके थे तभी ये बोले; “मुझसे शादी कर के तुम्हें की मिला? B.P. की प्रॉब्लम……sinus की प्रॉब्लम…. हुँह…. तुमने पहले ही इतना सब…… और अब मेरी वजह से…..” बस कुछ कहते कहते ये रूक गए| मुझे ये सुन कर बहुत गुस्सा आया और मैं जोर से बोली; “आप मानोगे नहीं ना? आपने शादी से पहले मुझे सब बता दिया था ना? ये B.P. की प्रॉब्लम तो hereditary है… माँ को है.. पिताजी को है…इसमें आपकी क्या गलती? और आपकी sinus की प्रॉब्लम … अगर मैं गलत नहीं तो ये (sinus) और B.P. की प्रॉब्लम मुझसे दूर रहने के बाद ही शुरू हुई है तो इसकी कसूरवार तो मैं हूँ! और आप कहते हो की आपसे शादी कर के मुझे क्या मिला? तो आप बताओ की मुझसे शादी कर के आपको क्या मिला? you don’t want me to say anything right?” मेर आक्रोश सुन कर ये चुप हो गए और मुझे sorry बोला| इनका sorry सुन्न कर मेरा गुस्सा काफूर हो गया और मैंने इन्हें kiss किया और आयुष के साथ मैं भी इन्हें झप्पी डालकर सो गई|

अगली सुबह मैंने इन्हें एक छोटे बच्चे की तरह अच्छे से नाश्ता कराया और साइट पर जाने दिया| (मन तो नहीं था पर क्या करूँ|) हर एक घंटे बाद इन्हें फोन करती और फोन करते समय यही सोचती की इनकी तबियत कैसी होगी? जान निकल के रख दी थी इन्होने मेरी! एक बजे मैंने जब इन्हें फोन किया तो इन्होने फोन नहीं उठाया| दुबारा मिलाया …. फिर नहीं उठाया| अब मुझे बहुत चिंता होने लगी थी| मैंने तीसरी बार फोन मिलाया तो घंटी मुझे अपने नजदीक बजते हुए सुनाई दी| मेरे पीछे पलटने से पहले ही इन्होने मुझे पीछे से आ कर जकड लिया और कान में खुसफुसाते हुए बोले; “surprise मेरी जान!” ये सुन कर मेरी जान में जान आई पर मैंने थोड़ा नाराज होने का नाटक किया; “फोन क्यों नहीं उठाया? जानते हो मेरी जान निकलगई थी! मैं आपसे बात नहीं करुँगी!”

“यार ऐसा करोगे तो अबकी बार जान मेरी निकल जाएगी?” मैं ये सुनते ही इनसे लिपट गई| पर हमारा ये मिलान बहुत छोटा था| अचानक माँ आ गईं और मिअन छिटक कर इनसे अलग हो गई| (माँ ने हमारा ये प्रेम-मिलाप जर्रूर देखा होगा!) मैं ‘इनसे’ अलग तो हो गई… पर इनके जिस्म की तपिश ने मुझे जल के राख कर दिया था|मेरे लिए खुद पर काबू कर पाना मुश्किल हो रहा था| अगर उस समय माँ नहीं आई होती तो शायद वो सब……….हो जाता! खाना बनाने का समय हो रहा था…. तो जैसे-तैसे मैंने खुद को काबू करने की कोशिश की और खाना बना कर मैं फटाफट बाथरूम में घुस गई| नल खोला तो उसमें बर्फीला पानी आ रहा था| जब तक बाल्टी भर रही थी मैं खुद को फिर से काबू करने लगी| मैं जानती थी की मेरे जिस्म को इनके प्यार की जर्रूरत है, पर इनकी बिमारी के कारन मैं इन्हें खुद से दूर रख रही थी|मैं अच्छी तरह जानती थी की इन्हें भी मेरे प्यार की उतनी ही जर्रूरत है जितना मुझे थी| पर फिर भी इन्होने मेरे सामने ये बात कभी भी जाहिर नहीं की थी| बाल्टी भरते ही मैंने अपने ऊपर ठंडा पानी डालना शुरू कर दिया …. उस ठन्डे पानी का जैसे मेरे ऊपर कोई असर ही नहीं हो रहा था| जिस्म अंदर से भट्टी की तरह जल रहा था| आधे घंटे तक ठन्डे पानी की बौछारों ने जिस्म की इस आग को शांत किया| जब मैं बाहर आई तो ये लैपटॉप पर कुछ काम कर रहे थे| फिर ये उठ कर बाथरूम में चले गए और जब बाहर आये तो मुझे डाँटते हुए बोले; “ठन्डे पानी से क्यों नहाये?” ये सुनते ही मुझे लगा की मेरी चोरी पकड़ी गई है| मैं जवाब सोचने लगी; “वो….वो जल्दी-जल्दी में geyser चलाना भूल गई!”

“ऐसी भी क्या जल्दी थी? खाना तो बन चूका था, और पिताजी को आने में अभी समय है?” इनके सवाल के आगे मेरे पास कोई जवाब नहीं था| मैं सर झुकाये खड़ी थी| ये चल कर मेरे पास आये और मेरी ठुड्डी पकड़ के मेरे चेहरे को ऊपर उठाके बोले; “मन कर रहा था न?” ये सुन कर मेरे गाल शर्म से लाल हो गए| “यार इस तरह ठन्डे पानी से नहाओगे तो बीमार पड़ जाओगे!” मेरे अंदर तो हिम्मत ही नहीं थी की मैं इनसे नजरें मिलाऊँ इसलिए मैं सर झुकाये खड़ी रही और फिर इनकी छाती से लिपट गई| जिस आग को मैंने इतनी मुश्किल से शांत किया था, उसे मैंने फिर से भड़का दिया था| दिल एक अजीब सी हालत में फंस गया था, मुझे इनका प्यार भी चाहिए था पर डर लग रहा था की कहीं मेरे स्वार्थ के चलते ये फिर से बीमार न पड़ जाएँ क्योंकि इनकी body अब भी recover कर रही थी|

मेरा जिस्म मेरा साथ नहीं दे रहा था| टांगें कापने लगी थीं और लगा था जैसे मैं अभी लड़खड़ा जाऊँगी| ‘इन्होने’ मेरे दिल को जैसे पढ़ लिया और बहुत धीरे से बोले; “मेरे होते हुए मेरी बीवी ठन्डे पानी से नहीं नहाएगी!” फिर ‘इन्होने’ जा कर कमरे के दरवाजे की चिटकनी लगा दी| बच्चे स्कूल से लौटने वाले थे और माँ उन्हें लेने स्कूल के लिए निकल चुकी थीं|
दरवाजा बंद कर के ‘ये’ मेरे पास आये और मुझे गोद में उठा लिया और बिस्तर पर लिटा दिया| रजाई खोल दी और…………………. शुरू में मैंने ‘इन्हें’ रोकना चाहा ये कह कर की; “अभी आप पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो… और ऐसे में आप मेरी वजह से….” मैंने बात अधूरी छोड़ दी| ‘इन्होने’ मुस्कुराते हुए कहा; “कुछ नहीं होगा मुझे!” असल में मैं खुद इन्हें रोकना नहीं चाहती थी| मैं जानती थी की हमारे पास समय बहुत कम है इसलिए जो भी करना था वो इस थोड़े से समय में करना था| नजाने मुझ पर क्या वहशीपन सवार हुआ की मैंने इनकी नंगी पीठ को कुरेदना शुरू कर दिया| गर्दन पर जगह-जगह काट लिया और इनकी छाती तो मैंने काट-काट कर पूरी लाल कर दी| मुझे सच में उस समय कोई होश नहीं था! इन्होने भी मेरी इस प्रिक्रिया पर कोई ऐतराज नहीं जताया| पर समागम के बाद जब मैंने इन्हें देखा और वो सब निशानों पर मेरी नजर गई तो मुझे खुद पर कोफ़्त होने लगी! ये कैसा जंगलीपना आ गया था मुझ में? मैंने अपने ही प्यारको इस तरह नोच खाया था की…… मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी की मैं उनसे नजर मिलाऊँ| खुद से नफरत होने लगी थी!

“hey! क्या हुआ?” इन्होने पूछा|

“मैंने कुछ कहा नहीं बस ना में गर्दन हिला दी और दुबारा नहाने के लिए बाथरूम में घुस गई| जब नल खोला तो उसमें से गर्म पानी आ रहा था, मतलब ‘इन्हें’ सब पता था! मैं जल्दी से नहा कर बाहर आई और अपने बाल पोंछ रही थी की तभी ये मुस्कुराते हुए मेरे पास आये| इनके जिस्म पर मेरे दिए हुए जख्मों पर मेरी नजर गई तो मैं शर्म से पानी-पानी हो गई| पर ‘इनके’ चेहरा देख कर तो लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही नहीं| ‘ये’ बिलकुल नार्मल लग रहे थे…. खाना खाते समय मैंने खुद को सहेज कर रखा| पर एक डर था की कहीं ‘इनकी’ तबियत फिर से ख़राब न हो जाये| इसी डर के चलते मैंने सोचा की आज फिर बच्चों को ‘इनके’ पास भेज दूँगी, ताकि ये सो जाएं| पर बच्चों के exams नजदीक थे और ऊपर से आयुष का जन्मदिन भी नजदीक आ गया था| उस दिन जो भी ‘इनका’ प्लान था उसके चलते आयुष पढ़ने वाला तो था नहीं इसलिए मैंने नेहा को आयुष को पढ़ाने का काम दिया और हुड इनके पास कमरे में चली गई| पिताजी तो खाना खा कर site पर चले गए थे और माँ drawing room में बैठी CID देख रही थीं| मैं bedpost का सहारा ले कर बैठ गई और ‘इन्होने’ मेरी गोद में सर रख लिया| इनकी आँख लग गया और मैं सोच में डूब गई| समझ ही नहीं आ रहा था की मुझे क्या हो गया था? अपनी इस हरकत पर मुझे खुद शर्म आने लगी और मैं ने मन ही मन सोचा की मैं अब दुबारा ऐसा कभी नहीं करुँगी|

शाम को जब ये उठे तब भी इन्होने कुछ नहीं कहा| इन्होने मुझे पहले की ही तरह प्यार करना जारी रखा…. जब भी समय मिलता ये मुझे पीछे से जकड़ लेते और हंसी-ठिठोली करते रहते| मैं भी इसी तरह इनका जवाब देती…. पर दुबारा इन्हें प्यार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी| जब कभी इनके बदन का स्पर्श मुझे होता तो मुझे अपने द्वारा की हुई वो भयानक करतूत याद आने लगती| मुझे एक डर और सता रहा था…. की यदि हमारे प्रेम-मिलाप के दौरान इनकी तबियत ख़राब हो गई तो?

ऐसे करते-करते आयुष का जन्मदिन आ ही गया| इन्होने adventure park जाने का प्लान बनाया| मुझे चिंता होने लगी थी की इनकी तबियत अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं है ऐसे में इनका ये exertion खतरनाक साबित ना हो| मैंने इन्हें बहुत समझाया पर ये अपनी जिद्द पर अड़े रहे| इन्होने सारा प्लान बना रखा था| रात बारह बज ने से पहले इन्होने मुझे, माँ और पिताजी को सारा प्लान बता दिया| इनके प्लान के अनुसार हमने साड़ी तैयारी कर ली थी| जैसे ही बारह बजे ये आयुष के कमरे में घुसे, आयुष और नेह दोनों सो रहे थे| आयुष के सिरहाने जा कर इन्होने उसके माथे को चूमा और उसे प्यार से उठाने लगे| फिर उसे गोद में उठाया और उसके कान में बोले; “Happy Birthday बेटा!” आयुष कुनमुनान लगा और फिर इनसे लिपट गया| मैंने आगे बढ़ कर उसके सर पर हाथ फेरा और कहा; “Happy Birthday बेटा!” पर आयुष अब भी कुनमुना रहा था| इन्होने मेरी तरफ देखा और मुझे इनके चेहरे पर बेबसी साफ़ नजर आ रही थी| ये आयुष को नींद से जगाना नहीं चाहते थे| पर उसके जागे बिना सारी तैयारी ख़राब हो जाती| मैंने इनसे कहा; “कोई बात नहीं…आज उसका जन्मदिन है और अपनी इतनी तैयारी जो की है उसके लिए|” फिर इन्होने आयुष के कान में कुछ खुसफुसाया और वो एक दम से उठ गया और :”Thank You!!!” बोला| वो जल्दी से इनकी गोद से नीचे उतरा और जा कर अपने दादा-दादी के पाँव छूने लगा और उनसे अपने जन्मदिन की बधाई ली| फिर वो मेरे पास आया और मेरे पाँव छू कर आशीर्वाद लिया| आखिर में वो इनके पास गया और इनके पाँव छू कर आशीर्वाद लिया और इन्होने उसे गोद में उठा लिया और बहुत प्यार किया| अब तक नेहा भी जाग चुकी थी और उसने भी आयुष को बधाई दी और हैरानी की बात ये की आयुष ने उसके भी पाँव छुए| सभी ये देख कर हैरान रह गए और हँसने पड़े…क्योंकि आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था| आयुष हमेशा नेहा को तंग ही किया करता था| इतने संस्कार मैंने तो नहीं दिए थे! हाँ मैंने आयुष को बड़ों का आदर करना शिखाया था पर आज जो कुछ हुआ वो देख कर बहुत अच्छा लगा| खेर मुझे ज्यादा सोचने की जर्रूरत नहीं थी….जवाब मेरे सामने खड़ा था| अब तो मैं बस ये सोच रही थी की आज क्या surprise मिलने वाला है हम लोगों को? हमेशा की तरह, इन्होने सबकुछ प्लान कर रखा था| “आयुष बेटा अब सो जाओ कल सुबह दस बजे तक तैयार हो जाना|” इन्होने आयुष से कहा| आयुष ने आगे कुछ नहीं पूछा और सब को Thank You बोल कर एकदम से लेट गया| ये देख कर हम सब हंसने लगे… दोनों बच्चों को माथे पर Kiss कर के इन्होने कमरे की लाइट बंद की और हम सब बाहर बैठक में आ गए| बाहर आ कर पिताजी ने इनसे कल के प्रोग्राम के बारे में पूछा तो इन्होने सारा प्लान बता दिया| परन्तु एक बात नहीं बताई …..जो मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी!

अगली सुबह आयुष सब से पहले तैयार हो गया और सारे घर में हड़कंप मचा दिया| सारे घर में कूद रहा था…..आज पहली बार मैंने उसे ‘इतना’ खुश देखा था! साढ़े दस बजे तक हम सब तैयार हो कर घर से निकले|हमें पूरा डेढ़ घंटा लगा वहां पहुँचने में…. और पूरा रास्ता आयुष शैतानी करता रहा| कभी music high volume में चालता तो कभी इनके फ़ोन पर गेम खेलने लगता| बैठे-बैठे अपनी और हमारी अलग-अलग pictures खींचने लगता| इतनी साड़ी selfie खींचीं की पूछो मत| नेहा भी selfie खींचने में मग्न थी और वो तो Facebook पर पिक्चरें upload करती जा रही थी| मैं बस मन ही मन सोच रही थी की आखिर amusement park होता कैसा है? मैंने तो आजतक टी.वी. पर ad ही देखि थी| उस ad में लड़कियां swim wear पहन के water park में मजे कर रही होतीं थीं| ये ख़याल आते ही मैंने सोच लिया की मैं कभी भी वो छोटे-छोटे कपडे पहनने नहीं वाली!

जब हम park के बाहर पहुंचे तो बाहर से ही जो नजारा दिखा उसे देखते ही मैं और बच्चे हैरान रह गए! ‘ये’ हमें एक तरफ खड़ा कर के टिकट लेने चले गए| टिकट ले कर जब हम अंदर घुसे तो अंदर का नजारा देख कर हम तीनों के मुंह से निकला; “oh my god!” ये एक jurrasic theme amusement park था| जगह-जगह पर dinosaur के पुतले और तसवीरें थीं| ऐसा लगता था मानों हम jurassic park फिल्म के सेट पर आ गए हो| जानती हूँ दोस्तों आपको सुन कर ये बहुत ज्यादा लगेगा पर मैंने और बच्चों ने अपने जीवन में आजतक ऐसा amusement park नहीं देखा| amusement park के नाम पर हमने सिर्फ एक मेला देखा था वो भी जब कभी गाँव में कोई त्यौहार होता था तब| उस मेले में बस giant wheel झूला होता था या फिर वो छोटे बच्चों के लिए एक घूमने वाला झूला| इससे ज्यादा हमने कभी नहीं देखा था|

आयुष और नेहा बहुत खुश थे…उनकी ख़ुशी उनके चेहरे पर साफ़ दिख रही थी| अगले छः घंटे तक हम पार्क में एक झूले से दूसरे झूले में घूमते रहे| जब कभी भी मुझे डर लगता तो मैं इनसे चिपक जाती और इन्होने उस समय का भरपूर फायदा उठाया! जैसे ही मैं इनसे लिपट जाती ये मेरे कान में कहते; “i love you!” आयुष और नेहा ने बहुत साड़ी फोटो खींचीं और आखिर में जब हम खाना खाने बैठे तभी इनका फ़ोन बज उठा| ज्यादातर तो ये मेरे सामने ही बात कर लिया करते थे पर आज ये फोन ले कर दूसरी तरफ जा कर किसी से बात करने लगे| पाँच मिनट बाद जब ये वापस आये तो मैंने इनसे पूछा; “किसका फोन था?” तो इन्होने मुझे बस आँख मारी और सवाल बदल दिया; “बच्चों कुछ order किया या नहीं?” मुझे कुछ अजीब लगा क्योंकि मैं इनका इशारा समझी नहीं थी|

खाना खाने के बाद आयुष फिर से जिद्द करने लगा और इस बार तो नेहा भी उसी का साथ दे रही थी| हार कर हमें फिर से अंदर जाना पड़ा और सच पूछो तो बहुत मजा आया| इतना मजा की मैं ये फोन वाली बात भी भूल गई| हम water park के सामने थे और बच्चों का और ‘इनका’ मन भी था अंदर जाने का पर ‘इन्होने’ जैसे-तैसे बच्चों को समझा दिया| ये जानते थे की मैं अंदर नहीं जाऊँगी…. मैंने इनका हाथ पकड़ लिया और हथेली दबा कर इन्हें thank you कहा| अब शाम होने लगी थी और हमें फिर से डेढ़ घंटा ड्राइव कर के घर जाना था तो मेरे समझाने पर बच्चे मान ही गए| हम निकलने लगे तो इन्होने फिर से किसी को फोन मिलाया और एक तरफ जा कर बात करने लगे| इस बार इन्होने बस दो मिनट बात की और फिर वापस आ कर गाडी में बैठ गए| मेरा मुंह थोड़ा लटक गया था तो मुझे खुश करने के लिए इन्होने मेरा favorite गाना: roar – katty perry चला दिया| गाना सुनते ही मेरी सारी नाराजगी फुर्र्र हो गई! “I got the eye of the tiger, a fighter, dancing through the fire
cause I am a champion and you’re gonna hear me roar
louder, louder than a lion
cause I am a champion and you’re gonna hear me roar
oh oh oh oh oh oh oh
oh oh oh oh oh oh oh
oh oh oh oh oh oh oh
you’re gonna hear me roar” मेरे साथ बच्चे और ‘इन्होने’ भी गुनगुनाना शुरू कर दिया| ये पूरा गाना जैसे मेरे लिए ही बनाया गया था| lyrics का एक-एक शब्द मेरी जिंदगी के ऊपर based है| वैसे ये पहला अंग्रेजी गाना है जो इन्होने मुझे सुनाया था ये कह कर की; “ये गाना तुम्हारे लिए है!” तब से मैं इस गाने को बहुत दफा सुन चुकी हूँ| जब कभी भी मैं हारा हुआ महसूस करती हूँ ये गाना सुनती हूँ तो मुझे inspiration सी मिल जाती है| THANKS KATTY PERRY जी!

तभी अचानक से dashboard पर रखा इनका फोन विबरते करने लगा| मैंने फ़ौरन इनका फोन उठा लिया और ये किसी और का नहीं बल्कि ‘राजी’ का ही फोन था| उसका नाम देखते ही जैसे मेरा खून खौल उठा और मैं disconnect करने ही वाली थी की इन्होने इशारे से मुझे कॉल उठाने को कहा| इन्होने bluetooth लगा रखा था तो मेरे कॉल उठाते ही ये पता नहीं क्या बात करने लगे उससे| आवाज बहुत धीमी थी इसलिए मैं कुछ सुन नहीं पाई| मुझे सच में बहुत गुस्सा आ रहा था और मैंने ये सब कैसे control किया था मैं ही जानती हूँ| मैंने इनके फ़ोन में पुरानी call list चेक की तो पता चला पिछले दो कॉल भी ‘राजी’ के ही थे| पर असली धमाकेदार सरप्राइज तो घर पर मिलने वाला था! जैसे ही हम घर पहुँचे, इन्होने गाडी पार्क की और हम घर पहुँच गए| इन्होने फिर से किसी से फ़ोन पर बात करनी शुरू कर दी… किसी और से क्या ‘राजी’ से और किससे! इन्होने आयुष को doorbell बजने को कहा और दरवाजा खुलते ही ये पीछे से जोर से चिल्लाये; “SURPRISE आयुष बेटे!!! Happy Bday!!!” अनदर से ‘राजी’ माँ और पिताजी भी happy bday वाला गाना गाने लगे| देखा देखि मैंने और नेहा ने भी happy bday गाना शुरू कर दिया| आवाज सुन कर आस-पडोसी भी आ गए और सबने मिलकर आयुष का birthday celebrate किया और केक काटा| पार्टी का सारा अरेंजमेंट ‘राजी’ ने किया था! जहाँ एक तरफ मुझे ख़ुशी थी की आयुष का जन्मदिन इतनी धूम-धाम से मनाया जा रहा है वहाँ इस बात का गुस्सा भी की ये सब ‘राजी’ मैनेज कर रही है! पर ऐसा नहीं था की ‘राजी’ सिर्फ ‘इनके’ लिए ऐसा कर रही हो| वो जब कभी भी घर आती थी तो वो बच्चों से बहुत प्यार जताती थी| हमेशा उनके लिए चॉकलेट ले कर आती थी, बल्कि आती ही ऐसे समय पर थी जब बच्चे घर पर हों| बच्चे भी उससे बहुत घुल-मिल गए थे| हमेशा उसे ‘आंटी’ कह कर बुलाते थे| यही कारन था की मैं उस दिन चुप रही और मैं भी पार्टी के रंग में रंग गई……

आज सब बहुत खुश थे….. ऐसा लगा जैसे बरसों बाद खुशियाँ घर आई हों| सबसे बड़ा सरप्राइज तो अनिल ने दिया| या फिर ये कहें की ‘इन्होने’ ही ये सरप्राइज प्लान किया था| ऑइल को देख कर तो मेरी और आयुष की ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था| आखिर वो मेरा पहला बेटा जो है! पार्टी में आयुष के स्कूल के सारे दोस्त और उनके परिवार वाले आये थे| नेहा का कोई भी दोस्त नहीं आया था… शायद किसी को invite नहीं किया गया या फिर ‘ये’ भूल गए होंगे! ‘इनके’ और पिताजी के बिज़नेस से जुड़े लोग जो आये थे वो गिफ्टों के बड़े-बड़े बॉक्स ले कर आये थे| कुल-मिलकर करीब 50 लोग आये होंगे| हमारा घर खचाखच भर चूका था…. सारे बच्चे तो आयुष और नेहा के कमरे में बैठे थे, पिताजी के जानने वाले लोग उनके कमरे में बैठे थे| सारी औरतें और माँ हमारे कमरे में और आयुष के दोस्तों के पापा और आस-पडोसी सब बैठक में बैठे थे|

रात दस बजे तक पार्टी चलती रही और साढ़े दस बजे करीब सब लोग चले गए| सब के जाने के बाद तो आयुष गिफ्ट्स खोलने लगा| तभी माँ ने ‘इन्हें’ याद दिलाया; “राजी …बेटा रात बहुत हो गई है| तू आज यहीं सो जा|”

“नहीं माँ मैं घर चली जाऊँगी|” ‘राजी’ ने कहा|

“नहीं बेटा…. बहुत देर हो गई है| तुम अपनी बहन को फोन कर दो और चाहे तो बहु से या फिर मानु की माँ से बात करा दो| वो कह देंगी की आज आप यहीं रुक रहे हो|” पिताजी ने जोर दिया तो वो ना नहीं कह पाई और आखिर उसने अपने घर फोन करके सारी बात बता दी| मैं खामोश रही क्योंकि बात सही भी थी…. इतनी रात गए उसे अकेले कैसे जाने दें| हाँ एक रास्ता और था की ‘ये’ उसे छोड़ आएं पर मैं जानबूझ कर चुप रही….. क्योंकि मैं नहीं चाहती थी की ये उसे घर छोड़ने जाएँ| खेर जो हो गया सो हो गया, कम से कम इस बात की ख़ुशी थी की मेरे बेटे का ये पहला जन्मदिन जो उसके पापा ने मनाया वो बहुत शानदार था!!!

अब रात में सोने का समय हो चूका था| तो सोने का अरेंजमेंट कुछ इस प्रकार किया गया: ‘राजी’ और नेहा बच्चों के कमरों में सोये थे….. माँ-पिताजी और आयुष एक साथ सोये…. मैं और ‘ये’ अपने कमरे में और मेरा बेचारा भाई फिर से सोफे पर| बिचारे को हरबार सोफे ही नसीब होता है! अगर ‘राजी’ नहीं होती तो अनिल आज बच्चों के कमरे में सोया होता| खेर सब अपने कमरों में चले गए ….. पर आज तो ये बहुत ज्यादा रोमांटिक मूड में थे! मैं dressing table के सामने कड़ी हो कर अपनी बालियाँ उतार रही थी की तभी इन्होने पीछे से आकर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया| इनका हाथ मेरी कमर से होकर मेरी नाभि के सामने lock हो चूका था| इनके होंठ मेरी गर्दन पर स्पर्श कर रहे थे…..

“क्या बात है? आज जनाब बहुत रोमांटि हो रहे हैं?” मैंने मुस्कुराते हुए पूछा|

“भई आज ही तो एरी पत्नी ने मुझे एक लड़के का बाप बनाया था….तो थोड़ा romance तो बनता है! आज तो मैं तुम्हें जी पर के thank you कहना चाहता हूँ|”

इनके होठों ने मेरी गर्दन पर आना जादू चलना शुरू कर दिया था| इनके जिस्म की महक मुझे दीवाना बना रही थी…. हम दोनों ही जैसे झूमने लगे थे….

‘उम्म्म…रुको ना…..आप बहुत थक गए होगे….” मैंने किसी तरह इनके मन्त्र से मुक्त होने की कोशिश की|

“ना…कुछ नहीं होगा मुझे….”

मैं जानती थी की इन्हें कुछ नहीं होगा पर मैं तो बस बहाना बना रही थी की किसी तरह ये मुझे छोड़ दें पर ना…आज तो इन पर romance का भूत सवार था…. वैसे चाहती तो मैं भी नहीं थी की ये मुझे छोड़ें ही..ही..ही….!!!

“उम्म्म….नहीं… प्लीज…. अनिल है और वो भी तो….” मैंने ‘राजी’ का नाम नहीं लिया….. बस उसका नाम याद आते ही मुझे फिर से गुस्सा चढ़ने लगा|

“वो? वो कौन?” इन्होने अनजान बनते हुए पूछा| मन तो किया की पलट के उखड़ते हुए जवाब दे दूँ पर चुप रही| पर इनके इस सवाल ने मेरा गुस्सा भड़का तो दिया ही था|

“प्लीज… छोड़ दो मुझे! मेरा मन नहीं है!” मैंने थोड़ा नाराजगी दिखाते उए कहा|

मेरी इस बात का इन्हें बहुत बुरा लगा| इन्होने तुरंत मुझे छोड़ दिया और कहा; “sorry ….!” इससे ज्यादा ये कुछ नहीं बोले और दरवाजे की तरफ जाने लगे| मैंने इन्हें रोकना चाहा; “सुनिए ना…प्लीज….” पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी और ये बाहर जा चुके थे और दरवाजा बंद हो चूका था| मुझे राजी पर और गुस्सा आने लगा की उसकी वजह से ये सब हुआ| मेरे पति जिन्हें मैंने आजतक कभी भी खुद को प्यार करने से नहीं रोका आज मैंने उन्हें इस कदर जवाब दिया की उनका दिल तोड़ दिया| वो भी आज के दिन!!! मुझे वो रात याद आने लगी जब मैंने इन्हें वादा किया था की मैं आपको कभी भी खुद को प्यार करने से मना नहीं करुँगी!

मैंने जल्दी से कपडे बदले और बाहर आई तो देखा ये अनिल के साथ बैठे गप्पें लगा रहे थे| मुझे दरवाजे पर खड़ा देख इन्होने हँसते हुए मुझसे कहा; “सुनो… तुम आज राजी वाले कमरे में सो जाओ ताकि मैं नेहा और अनिल bedroom में सो जाएं| बेचारा जब भी आता है इसे सोफे पर ही सोना पड़ता है|” मैं हैरान थी की इतनी जल्दी इनका गुस्सा कहाँ काफूर हो गया? फिर मन ने कहा अच्छा है… शायद घर पर मेहमान हैं और ये सबका मूड ख़राब नहीं करना चाहते इसलिए नाराज नहीं हैं| मैंने मन ही मन सोचा की ठीक है अनिल के जाने के बाद मैं इन्हें कैसे ना कैसे कर के मना लूँगी| पर अभी की समस्या ये थी की मुझे राजी वाले कमरे में रात गुजारनी थी| अब जाहिर सी बात है की वो कुछ ना कुछ तो बात अवश्य करेगी और अगर मैंने जवाब ना दिया तो उसे बुरा लगेगा और फिर ये नाराज हो जायेंगे… और अगर अकड़ के जवाब दिया तो भी उसे बुरा लगेगा और ये नाराज हो जायेंगे| तो मैंने सोचा की बात बिगड़ने से अच्छा है की थोड़ा बहुत ड्रामा ही कर लिया जाए| वैसे भी थकावट इतनी है की मुझे जल्दी नींद आ जाएगी ……. इस बीच अगर उसने कोई बात की तो हंस के जवाब दे दूंगी और क्या!”

मैंने नेहा को बैठक में भेजा और मैं खुद उसकी जगह लेट गई| कुछ देर बाद बैठक से आने वाली आवाजें बंद हुईं मतलब की ये, नेहा और अनिल तीनों कमरे में जा चुके थे| राजी की शायद आँख लग चुकी थी इसलिए हमारी कोई बात नहीं हुई और मुझे भी बहुत नींद आ रही थी सो मैं भी सो गई|

अगली सुबह जब मैं उठी तो देखा की ‘राजी’ मुझसे पहले जाग चुकी थी और उसी ने सब के लिए चाय बनाई थी| माँ-पिताजी dining table पर बैठे चाय पी रहे थे और ‘ये’ बच्चों को स्कूल के लिए ready कर रही थे| मैंने घडी पर नजर डाली तो सात बज रहे थे! ये देख कर मैं फ़ौरन बाथरूम में घुस गई और जब बाहर आई तो ‘राजी’ किचन से निकल रही थी और उसके हाथ में चाय थी| अब मुझे मजबूरन उससे बात करनी पड़ी; “अरे आपने क्यों तकलीफ की? ……मुझे जगा दिया होता?”

“no problem … मिट्ठू ने आपको …..जग….जगाने से….. मना किया ता!” उस ने हँसते हुए जवाब दिया| अब ये सुनते ही मेरी नस-नस में आग लग गई| पर ‘इनके’ दर से चुप हो गई की कहीं ‘इन्हें’ बुरा ना लग जाए… already कल रात मैंने इनका mood ख़राब कर दिया था| मैं जल्दी से नाश्ते की तैयारी करने लगी की तभी मदद करनी की इच्छा जताई …. पर मैंने झूठ में मुस्कुरा कर कह दिया; “अरे नहीं…आप बातें करो… मैं कर लूँगी|” इतने में ‘ये’ भी बाहर आ गए और बैठक में राजी के बगल वाली कुर्सी पर बैठ गए| (वैसे वो उनकी पसंदीदा कुर्सी है|) अनिल और राजी बात कर रहे थे पर as usual उसे हिंदी थोड़ा समझने में दिक्कत हो रही थी| तो मेरे ‘ये’ translator का काम करने लगे और उसे शब्दों का मतलब example दे कर समझने लगे| तीनों बड़ा हँस-हँस के बातें कर रहे थे और इधर मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था| तो मैंने अपना गुस्सा आँटा गूंदने पर निकालना शुरू कर दिया| किसी punching bag की तरह उसे मारने लगी! नाश्ते में मैंने आलो के परांठे बनाये…. बच्चों का टिफ़िन पैक किया और उन्हें स्कूल भेजा| स्कूल जाते-जाते बच्चे ‘इनके’ पास आये इन्हें kiss किया और फिर दादा-दादी के पैर हाथ लगाये और चले गए| बाकी सब dining table पर बैठ गए और नाश्ता करने लगे| आलू के परांठे सबसे ज्यादा अगर किसी को पसंद आये तो वो थी ‘राजी’| वो तो मुझसे उनकी recipe पूछने लगी! …..खेर मैंने उसे recipe बता दी|

नाश्ते के बाद पिताजी इन्हें बोल गए की; “बेटा राजी को तुम दोनों घर छोड़ आना|” और जवाब में इन्होने “जी पिताजी” कहा| पिताजी तो निकल गए पर राजी मना करने लगी…. तब माँ ने उसे समझाया की ऐसे ठीक नहीं होता…. बहु और मानु तुम्हें खुद घर छोड़ आएंगे| मैं जा कर तैयार होने लगी तो देखा की मेरी नई नाइटी गायब है? मैंने उसे एक बार भी नहीं पहना था!!!! मुझे पक्का यक़ीन था की वो नाइटी ‘राजी’ ने ही पहनी होगी| पर ‘इनके’ डर की वजह से मैं चुप रही और तैयार होकर बाहर आई| तब देखा की ‘राजी’ बाथरूम से वही नाइटी ले कर निकल रही है…. वो भी धुली-धुलाई| इससे पहले मैं उससे कुछ कह पाती ‘ये’ आ गए और बोले; “रात में इनके पास सोने के लिए कुछ कपडे नहीं थे इसलिए मैंने तुम्हारी नई वाली नाइटी दी थी पहनने के लिए|” अब डर के मारे मुझे तो समझ नहीं आया की क्या कहूँ; “अरे पर आपने इसे धोया क्यों? मैं धो देती|” मैंने मुस्कुराते हुए कहा…. जबकि मेरा दुःख सिर्फ मैं ही जानती थी|

“नहीं…मैं पहना न ये…तो आपसे कैसे wash करने को कहते?” उसने फिर से अपनी टूटी-फूटी हिंदी में जवाब दिया| उसे wash की हिंदी नहीं आती थी! ही..ही..ही..ही…. खेर हम उसे छोड़ने कार से निकले और रास्ते भर दोनों बातें करते रहे और मैं साथ में हाँ-हुनकर करती रही| मैंने दोनों को जरा भी भनक नहीं लगने दी की मुझे इन दोनों की इस नजदीक से कितनी तकलीफ है| जब हम राजी के घर पहुंचे तो मुझे लगा की उसे सिर्फ नीचे छोड़ कर हम चले जायेंगे.. पर ये तो ऊपर चलने के लिए आतुर हो गए थे और ये मुझे भी जबरदस्ती ले गए| इन्होने डिक्की में कुछ गिफ्ट्स रखे थे जिन्हें देख कर मैं भी हैरान थी की ये कब आये? आज पहलीबार मैं एक “christian” घर में कदम रखने जा रही थी| थोड़ा अजीब लग रहा था… पर क्या करूँ? ‘राजी’ के घर में उसकी बड़ी बहन और उसका जीजा और एक छोटी बच्ची ही थे| हैरानी की बात तो ये थी की वो सब ‘इन्हें’ जानते थे| हमारा बहुत अच्छा स्वागत हुआ… सबसे ज्यादा हैरानी तो मुझे तब हुई जब वो छोटी बच्ची अंदर से आई और भागती हुई इनकी गोद में आ गई| और ये भी उस बच्ची को गोद में ले कर दुलार करने लगे| “मेरा childhood फ्रेंड कैसा है?” ये सुनकर तो मैं हैरान पढ़ गई और मेरी ये हैरानी मेरे चेहरे पर झलकने लगी|

“मिट्ठू कहते…की ये बच्ची है means child और मिट्ठू का friend है… इसलिए childhood friend …. ही..ही…ही…ही…” राजी की ये बात सुनकर तो मुझे भी हँसी आ गई|

loading...

Leave a Reply