फ़ोन सेक्स – मोबाइल फ़ोन सेक्स part 16

पारुल : तुमने तो अपने हाथ को ढीला छोड़ रखा है…थोडा टाईट करो …तभी तो उसे भी मजा आएगा…

तभी कन्नू नींद में ही बडबडाने लगी…” ओह्ह्ह…..विशाल्ल्ल…….हां…..जोर से करो न…..म्मम्म ”

पारुल ने चेतन की तरफ मुस्कुरा कर देखा और कहा : ये विशाल ही है…इसका बॉय फ्रेंड…सोच रही है की नींद में वोही सब कर रहा है…तुम लगे रहो….

और ये कहते हुए पारुल वहीँ उसके सामने वाले सोफे पर बैठ गयी..

पारुल के कहने पर चेतन ने अपने हाथ की पकड़ उसकी चूत के ऊपर थोड़ी बड़ा दी..

पारुल : तुम्हारी कोई गर्ल फ्रेंड है क्या…चेतन…

चेतन : जी…जी नहीं…

पारुल (हेरानी से..) : और तुमने पहले कभी किया है किसी लड़की के साथ कुछ..

चेतन : जी…जी कभी नहीं..
पारुल : इसका मतलब..तुम अभी तक कुंवारे हो…
उसकी आँखों में अजीब सी चमक आ चुकी थी.

चेतन : जी हाँ ….

उसके लंड का उभार फिर से दिखाई देने लगा था अब.

उसकी बात सुनते ही ना जाने पारुल को क्या भूत चड़ा की वो बड़ी ही बेशर्मी से अपनी मोटी छाती को चेतन की आँखों में देखते -२ ही मसलने लगी…

उसकी टी शर्ट काफी टाईट थी, और मसलने की वजह से उसके निप्पल चमक कर बाहर की और निकलने लगे, मानो टी शर्ट को फाड़कर छेद कर देंगे…चेतन भी पारुल को देखकर अपने पर काबू न रख पाया और अपने दुसरे हाथ से लंड को पेंट के ऊपर से ही सहलाने लगा.

अब आलम ये था की चेतन का एक हाथ अपने लंड पर था और दूसरा कनिष्का की चूत के ऊपर…और आँखे थी पारुल की गोल मटोल गोलइयो पर..जिसे पारुल बड़ी ही तेजी से दबा रही थी.

नींद का बहाना कर रही कनिष्का की सिस्कारियां निकालनी शुरू हो चुकी थी….उसने एक झटके में अपनी जींस को नीचे किया..और चेतन के हाथ को अपनी नंगी चूत के ऊपर रख कर उसे घिसने लगी…

चेतन का ध्यान पारुल की तरफ था, इसलिए वो कन्नू को अपनी जींस नीचे करते नहीं देख पाया, पर जब उसका हाथ गीली चूत के ऊपर गया तो उसने देखा की जींस तो खिसक कर नीचे जा चुकी है और अब उसका हाथ कन्नू की नंगी चूत के ऊपर है…

वो गोर से उसकी चूत को देखने लगा..

पारुल : पहली बार देखि है क्या…तुमने किसी लड़की की चूत..

चेतन : हाँ…

उसके होंठ कांप रहे थे…ये कहते हुए.

पारुल : और एक साथ दो चूत देखि है कभी…

और ये कहते हुए उसने अपनी जांघे खोल डाली और अपना दूसरा हाथ सीधा अपनी चूत के ऊपर लेजाकर उसे मसलने लगी..

चेतन की तो हालत ही खराब हो गयी.

चेतन ने अपनी पेंट की जिप खोली और अपना लंड निकाल कर बाहर किया और उसे मसलने लगा…उसके काले लंड की झलक देखते ही पारुल का भूत सर चड़कर बोलने लगा…वो बडबडाने लगी “ओह्ह्ह……क्या कोरा लंड है तेरा…..म्मम्म….साले….इसे अपने तहखाने में क्यों रखा हुआ था …..लंड को निकाल कर ….मजे लिया कर इसके….और दुसरो को भी दिया कर….अह्ह्ह…”

पारुल ने अपना एक हाथ अपनी टी शर्ट के अन्दर डालकर अपनी लेस्ट ब्रेस्ट को बाहर खींचा और उसे दबाकर अपनी सिस्कारियो को और भी तेज कर दिया…

चेतन का लंड भी अच्छा ख़ासा मोटा और लम्बा था…और ख़ास बात थी की वो वर्जिन था…जैसा की मैं था कुछ दिनों पहले तक.

पारुल ने अपनी टी शर्ट उतार फेंकी और अब वो चेतन के सामने पूरी नंगी होकर खड़ी थी..वो अपनी जगह से उठी और चेतन के पास आकर उसकी गोद में बैठ गयी.

उसके हाथ सीधा पारुल की मस्त गोलइयो पर जा टिके और वो उन्हें जोर से दबाने लगा.

अब उसके हाथ कनिष्का के ऊपर से हट चुके थे.

कनिष्का ने आँख खोलकर देखा की पारुल ने मैदान मार लिया है…और अब चेतन का पूरा ध्यान पारुल की ही तरफ है…और हो भी क्यों न…उसकी गोद में नंगी जो बैठी थी वो..

वो भी उठ बैठी और अपनी टी शर्ट को उतार दिया.

जींस तो पहले से ही नीचे थी, उसे भी उसने अपनी टांगो से नीचे करके निकाल दिया.

अब वो भी नंगी थी…पारुल की ही तरह…उसने अपने हाथ आगे किये और चेतन को पीछे से उसकी पीठ से लिपट गयी.

चेतन ने जैसे ही अपनी पीठ पर दो और मुम्मे महसूस किये वो एकदम से पलटा और कनिष्का को नंगा पाकर वो हेरानी से उसे देखने लगा…

और फिर वो कभी कनिष्का को और कभी पारुल को देखने लगा….

पारुल : देख क्या रहे हो…मेरी फ्रेंड और मुझे दोनों को अपने कुंवारे लंड के मजे दो…चलो जल्दी करो.

और ये कहते-२ उसने चेतन के कपडे उतारने शुरू कर दिए.

तभी मेरा सेल बज उठा…वो अंशिका का फोन था.

मैंने दो रिंग में ही उठा लिया.

तब तक शायद चेतन ने सेल की आवाज सुन ली थी..वो बोला ” किसका फ़ोन है..कोई है क्या अन्दर…”

पारुल : अरे नहीं…वो मेरा ही फ़ोन है…अन्दर चार्जिंग पर लगा है…बाद में देखूंगी…अभी टाईम नहीं है…

और वो चेतन को नंगा करने में दोबारा से जुट गयी.

मैंने फ़ोन उठाया और धीरे से उससे कहा : हेलो…क्या हाल है…

अंशिका : इतना धीरे क्यों बोल रहे हो….बीसी हो क्या..
मैं : हाँ बीबी तो हूँ…तुम्हारी बहन के साथ ही…

अंशिका (झेंपते हुए) : ठीक है फिर…बाद में बात करुँगी..

मैं : नहीं यार…कोई बात नहीं…

अंशिका : मैंने तो बस ऐसे ही फोन कर दिया..तुम्हारी याद आ रही थी…वैसे क्या कर रहे हो अभी..

मैं : तुम्हारी बहन की चूत चाटी थी मैंने अभी…बस अपने लंड को वहां डालने की तय्यारी कर रहा हु.

अंशिका की साँसे तेज होने लगी ये सब सुनकर.

अंशिका : तुम लोग करो….मैं रखती हु…

मैंने थोडा तेज आवाज में कहा : बोला न नहीं रखो अभी…बात करती रहो.

मैंने अपना लंड बाहर निकाल कर उसे रोंदना शुरू कर दिया.

अंशिका (तेज साँसों में) :क्या कर रहे हो अब..

मैं : लंड पर कन्नू की चूत का रस लगाकर उसे चिकना बना रहा हु..

अंशिका की हालत खराब हो गयी मेरी बात सुनकर…

इस बीच चेतन पूरा नंगा हो चूका था….अब बात थी की इस कुंवारे लंड को कोन अपनी चूत में लेगा पहले…पारुल बड़ी थी, इसलिए कन्नू ने उसकी तरफ देखा की वो ही फेसला करे की पहल कोन करेगा.

पारुल ने बड़े प्यार से कन्नू की आँखों में देखा और बोली : चल सकीना…चढ़ जा…इसके ऊपर…और मिटा ले अपनी चूत की खुजली..विशाल के नाम की…

कनिष्का तो फूली न समाई…वो जल्दी से आगे आई और सोफे पर बैठे हुए चेतन की टांगो के दोनों तरफ टाँगे करके उसकी गोद में आ बैठी…और पारुल ने पीछे से उसके लंड का निशाना उसकी चूत पर लगाया..और कन्नू की चूत में जैसे ही चेतन के लंड का सुपाड़ा गया, वो बहक उठी और अपना पूरा भार उसने चेतन के लंड के ऊपर छोड़ दिया….और उसकी चूत फुलझड़ी की तरह सुलगती हुई नीचे तक आती चली गयी.

अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह……..म्मम्म…..ओह्ह्हह्ह…..माय गोड……..साला….क्या लंड है तेरा…मम्म…ऊऊ विशाल्ल्ल्ल…..मम्म…

वो अभी तक अपना रोल प्ले कर रही थी…

और उसने आगे बढकर उसके चिकने चेहरे पर अपनी जीभ से लार की पुताई करनी शुरू कर दी.चेतन ने आँखे बंद कर ली…मैंने मौका देखा और जल्दी से भागकर बाहर आया और सोफे के पीछे जाकर छुप गया.

पारुल भी मुझे देखकर हेरान रह गयी…पर मैंने फ़ोन की तरफ इशारा किया और उसे चुप रहने को कहा.

कन्नू चेतन के लंड के ऊपर कूदने लगी और जोर से चिल्लाने लगी…अह्ह्ह्हह्ह विशाल्ल्ल…..म्मम्म….ओह्ह्ह्ह माय पुससीsssssssssssss …..अह्ह्ह्ह …..

और ये सब बाते बड़ी ही साफ़ आवाज में अंशिका सुन रही थी…और सोच रही थी की मैं उसकी छोटी बहन की चूत मार रहा हु…और ये सोचकर ही वो भी उत्तेजित होकर शायद अपनी चूत की मालिश कर रही थी.

और फिर एकदम से कनिष्का की चूत में एक तूफ़ान सा आ गया.

अह्ह्हह्ह्ह्ह……..ओह्ह्ह……..आई एम् कमिंग……..अह्ह्ह्हह्ह…….

और वो अपना रस का छत्ता चेतन के लंड के ऊपर फोड़कर उसके कंधे पर सर रखकर जोरो से हांफने लगी.

और यही हाल दूसरी तरफ फोने पर अंशिका का भी था…वो भी झड चुकी थी …अपनी बहन के साथ ही..

चेतन का पहली बार था..इसलिए उसका रस निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था….और ये अच्छा भी था…क्योंकि अपनी चूत के पर फेलाए दूसरी मोरनी यानी पारुल भी तो लाईन में थी.

मैंने तब तक अंशिका का फोन काट दिया…अगर उसने पारुल की आवाज सुन ली तो पता नहीं क्या सोचेगी.

और जैसे ही कन्नू चेतन के लंड से ऊपर उठी, पारुल आकर उसी जगह पर बैठ गयी.

और आते ही जोर से चीखना और कूदना शुरू कर दिया.

पारुल को ज्यादा एक्स्पेरिंस था…उसने उसके लंड की चटनी बनानी शुरू कर दी, अपनी ओखली नुमा चूत में…और अपनी मोटी ब्रेस्ट उसके मुंह में ठूस डाली.

अह्ह्ह्हह्ह…….वाह….क्या लंड है….

और फिर जल्दी ही चेतन ने भी उसकी ब्रेस्ट का दूध पीकर अपने लंड की शक्ति को बढाया और उसे चोदना शुरू कर दिया.

जल्दी ही ऊपर से रस निकलकर नीचे आने लगा और नीचे से रस निकलकर ऊपर की और जाने लगा.दोनों की आँखे बंद हो गयी…झड़ते हुए.

मैंने चेतन की बंद आँखों का फायेदा उठाया और भागकर वापिस ऊपर चला गया और वापिस छुप गया.

मैंने ऊपर जाकर अपने कपडे ठीक किये और नीचे देखने लगा, पारुल चेतन को समझा रही थी.

पारुल : आज रात को तो हम चले ही जायेंगे यहाँ से..और जो कुछ हमारे बीच हुआ है वो किसी और को पता नहीं चलना चाहिए…ओके..

चेतन : नहीं चलेगा…आप दोनों की वजह से मेरी वर्जिनिटी टूटी है…जिसका मुझे कई दिनों से इन्तजार था…मुझे तो आप दोनों का थेंक्स बोलना चाहिए…थेंक्स..और फ़िक्र मत करो…ये बात मैं किसी को नहीं बताऊंगा…ओके..

और फिर वो भी अपने कपडे पहन कर बाहर निकल गया…बेचारा जाते-२ अपने पैसे लेना भी भूल गया था.

उसके जाते ही मैं नीचे आया, पारुल मुझे देखते ही मुझसे लिपट गयी…”थेंक्स विशाल…तुम्हारी वजह से ही आज ये सब हुआ है….मजे तो तुम भी बहुत देते हो..पर जैसे तुम लडको को अलग-२ लड़की की ललक होती है…वैसे ही हम लडकियों का भी मन दुसरे लंड देखकर मचल जाता है…पर जो भी था..मजा बहुत आया..है न..”

उसने कनिष्का की तरफ देखा…जो अपनी चूत के अन्दर ऊँगली डालकर अपना रस निकल कर चूस रही थी…

उसके बाद हम सबने खाना खाया..और एक आखिरी बार शाम को जाते-२ जमकर चुदाई की…

उन दोनों के जाने के बाद मैंने पुरे घर की सफाई की, बेडशीट बदली, रूम फ्रेशनर से घर को महकाया…

रात को मैंने अंशिका को फोन किया

अंशिका : हाय…फ्री हो गए..
मैं : हाँ..कनिष्का घर आ गयी क्या.
अंशिका : हाँ..अपने कमरे में सो रही है…थक गयी थी..
मैं : अच्छा जी…काम हमने किया और थक वो गयी..कमाल है.

अंशिका : चुप रहो तुम…तुम्हे क्या पता की लड़की की क्या हालत होती है..सेक्स करने के बाद..पूरा बदन टूट जाता है…और तुम तो पुरे जानवर की तरह करते हो..बेचारी को पता नहीं कितनी बार…फक किया होगा..
मैं : चार बार…
अंशिका : हे भगवान्….मेरी फूल सी बहन को तुमने चार बार किया…तभी उसकी ऐसी हालत हुई पड़ी है…बेचारी..

अभी तो मैंने चेतन वाली चुदाई नहीं गिनी थी ….

मैं : बड़ी फ़िक्र हो रही है तुम्हे अपनी बहन की…वैसे तुम्हे शायद याद नहीं है…पर जब तुमने पहली बार करवाया था तो हमने पांच बार किया था..याद है.

अंशिका : मैं बड़ी हु…पर वो तो अभी बच्ची है…
मैं : कोई बच्ची-वच्ची नहीं है वो…उसका बस चले तो एक साथ 3 -4 लंड ले डाले अपनी चूत में…

अंशिका को मेरी बात सुनकर इस बार सही में गुस्सा आ गया..

अंशिका : बकवास बंद करो तुम अपनी…कैसे तुम मेरी बहन के बारे में बोले जा रहे हो…तमीज से बात करो उसके बार में…समझे..

मैं समझ गया की मेरे मुंह से कुछ ज्यादा ही निकल गया है आज…अंशिका अपनी बहन को कुछ ज्यादा ही प्यार करती है..उसके सामने मुझे ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिए थी कन्नू के बारे में..

मैं : ओह….सॉरी यार….मैंने तो बस ऐसे ही कह दिया..ठीक है बाबा…मैं आगे से उसके बारे में कोई भी गलत बात नहीं बोलूँगा…अगर तुम कहोगी तो उसे चोदुंगा भी नहीं…खुश..

अंशिका : हम्म..

मैं : अच्छा तुम सुनाओ….आज का दिन कैसा बीता…

अंशिका (धीरे से) : क्या बताऊ विशाल…आज बड़ा ही अजीब लग रहा था पूरा दिन…मुझे पता था की कन्नू तुम्हारे साथ है..और क्या कर रही है..पर फिर भी मुझे बड़ी ही बेचनी थी..तभी मैंने तुम्हे फोन भी किया था…और सच कहू..तुमने मुझे फ़ोन नहीं रखने दिया, मुझे अच्छा लगा…आज कई दिनों के बाद मुझे ऐसा ओर्गास्म हुआ, फोन पर…मन तो कर रहा था की मैं तुम दोनों को वो सब करते हुए देखती…पर ये मुमकिन नहीं था..

मैं : अगर ऐसी बात है तो अगली बार तुम सामने बैठ जाना…और हम दोनों करेंगे..
अंशिका : और अभी तो तुम कह रहे थे की तुम उसे दोबारा नहीं…सेक्स

मैं : यार, तुम कभी कुछ कहती हो और कभी कुछ…चलो छोड़ो ये सब बाते…तुम्हारा टूर कब जा रहा है.

अंशिका : अगले वीक बुधवार को…

मैं : हम्म…आज फ्राईडे है…संडे को मम्मी – पापा आ जायेंगे…मैं उनसे कह दूंगा फिर..

अंशिका : और वहां जाकर तुम इधर – उधर मुंह मत मारना…समझे..
मैं : मैं तुम्हे ऐसा लगता हु क्या….

अंशिका : मैं जानती हु..की तुम कैसे हो…समझे..

मैं (हँसते हुए ) : ओके बाबा…तुम जीती मैं हारा….ओके…अब मुझे नींद आ रही है…बाय

अंशिका : हाँ हाँ….अब तो नींद आएगी ही…पुरे दिन में चार बार जो किया है तुमने…चलो सो जाओ अब…मैं कल बात करुँगी.

मैं : बाय…गुड नाईट…

और फिर हमने फोन रख दिया.

अगले दिन जब अंशिका का फोन आया तो मैंने उसे शाम को घर आने को कहा, पर उसने कहा की घर पर किसी का डिनर है, इसलिए नहीं आ पाएगी..तय्यारी करनी है.

और संडे को तो वैसे भी वो घर से निकलती ही नहीं थी..शाम तक मम्मी-पापा भी आ गए.

मुझे काफी अच्छा लगा, इतने दिनों के बाद मम्मी के हाथो का खाना खाने को मिला, मम्मी पूरा दिन शादी की बाते बताती रही, ये हुआ, वो हुआ…कुल मिलकर वो अब पापा के रिश्तेदारों से नाराज नहीं थी. मैंने उन्हें अपने फ्रेंड्स के साथ टूर पर जाने के बारे में बताया, उन्होंने इजाजत दे दी…

रात को मेरी अंशिका से फिर से बात हुई…वो भी मुझसे मिलने को कुलबुला रही थी…पिछले चार दिनों से मैंने उसे देखा भी नहीं था.

मैंने सोच लिया की मंडे को किसी भी हालत में उससे मिलके रहूँगा..उसका फोन आया 11 बजे, पर मैंने उसे कुछ नहीं बताया, और फिर सीधा उसकी छुट्टी के समय मैं उसके कॉलेज के सामने पहुँच गया, अपनी बाईक लेकर.

मैं उसका इन्तजार कर ही रहा था की मुझे पीछे से किट्टी में की आवाज आई…: अरे विशाल…कहाँ रहते हो तुम आजकल हूँ…

मैंने उनकी तरफ देखा, वो अपनी प्यासी नजरो से मुझे घूरने में लगी हुई थी.

मैं : अरे मेम…कैसी है आप….

किट्टी मेम : चुप रहो तुम…तुमने तो आजकल दिखाई देना ही बंद कर दिया है…ज्यादा ही बीसी हो आजकल…कब से तुम्हारा इन्तजार कर रही हूँ मैं…

वो अपनी चूत वाले हिस्से तक अपने हाथ ले गयी…और वहां खुजा कर वापिस ऊपर ले आई.

किट्टी मेम : चलो कोई बात नहीं…अब तो तुम चार दिनों तक मेरे साथ ही रहोगे…अपनी कजन बहन अंशिका से थोडा दूर ही रहना…ताकि मेरे साथ ज्यादा टाईम निकाल सको..समझे..

मैं समझ गया की इस पिकनिक वाले टूर में ये आंटी मेरे लंड का कचूमर बनाकर रहेगी…और दूसरी तरफ इसकी हॉट बेटी स्नेहा भी तो है…

मैं : ओके मेडम…जैसा आप चाहोगी, मैं वैसा ही करूँगा….वैसे आपकी फेमिली में से कोन जा रहा है…

किट्टी मेम : सीधा पूछो न की स्नेहा जा रही है या नहीं…

मैं झेंप गया..

किटी मेम : नहीं…स्नेहा नहीं जा रही, उसके एग्साम है, चार दिन की छुट्टी लेकर वो नहीं चल सकती…मेरा बेटा सचिन चल रहा है..

मैं : ओहो…कोई बात नहीं…आप तो होंगी ही न वहां…अपनी बेटी के बदले के मजे आप ले लेना…

मेम : बदमाश…

वो कुछ और बोलती, पर तभी अंशिका आती हुई दिखाई दी…वो मुझे देखकर हेरान रह गयी.

अंशिका : अरे विशाल…तुम यहाँ…

मैं : मैं इधर से ही जा रहा था, सोचा तुम्हे घर छोड़ता चलू…

अंशिका वैसे ही मुझे देखकर काफी खुश थी, मेरी बात सुनकर और उसका मतलब समझकर, उसके चेहरे का रंग लाल हो गया.

किटी मेम : ओके जी…तुम दोनों भाई बहन जाओ…मैं चलती हु..और विशाल…कल मिलते हैं…

मैंने और अंशिका ने उन्हें बाय कहा और वो चली गयी..

उनके जाते ही अंशिका मेरे बिलकुल पास आकर खड़ी हो गयी, उसने आज पिंक कलर की साडी और स्लीवलेस ब्लाउस पहना हुआ था, जिसमे वो बड़ी ही सेक्सी लग रही थी.

उसकी जांघे मेरी टांगो से टच कर रही थी.

अंशिका : मुझे तुम्हारा ये सर्प्राईस अच्छा लगा…

मैं : मैं अगर तुमसे आज नहीं मिलता तो मैं खुद मरने के कगार पर पहुँच जाता…

अंशिका ने अपनी कोमल उंगलिया एक झटके से मेरे होंठो पर रख दी….और बोली : खबरदार…ऐसी बात अगर मुंह से निकाली तो..

और फिर जब उसे एहसास हुआ की वो कॉलेज के बाहर खड़ी है तो उसने अपना हाथ पीछे खींच लिया.

और घूमकर मेरे पीछे आई और बाईक पर बैठ गयी.

अंशिका : चलो यहाँ से…

मैं : कहाँ चलू…तुम्हारे घर क्या..

अंशिका : नहीं..घर नहीं..कही भी चलो…

मैं समझ गया की आज इसकी चूत में कुछ ज्यादा ही कुलबुलाहट हो रही है…मैं बाईक सहलाते हुए सोचने लगा की मैं अंशिका को कहाँ लेकर जाऊ …पर उसके पीठ पर चुभ रहे मुम्मे मुझे सोचने ही नहीं दे रहे थे.

मैंने बाईक चलाते -२ उससे बात की : तुमने तेयारी कर ली कल जाने की..

अंशिका : हाँ…कर ली है…तुमने नहीं की क्या

मैं : मैंने क्या करना है, एक-दो जींस और टी शर्ट ही तो लेनी है…
अंशिका : और नाईट ड्रेस ?

मैं : नाईट में तो मैं नंगा ही सोता हु…
अंशिका ने मेरी पीठ पर मुक्का मारा
मैं : अरे सच में…तुम देख लेना..

अंशिका : देख लेना तो ऐसे कह रहे हो जैसे मैं तुम्हारे साथ ही सौउंगी

मैं : तुम सारा टूर मेनेज कर रही हो…तुम ही डिसाईड करना की कोन किसके पास सोयेगा..

अंशिका : तुम अपना दिमाग ज्यादा तेज मत चलाओ…तुम हमारे कॉलेज के टूर में जा रहे हो .यही बहुत नहीं है क्या तुम्हारे लिए..
मैं : ये दिल बड़ा ही लालची है….जितना मिलता है, उससे ज्यादा की आस करता है…

अंशिका ने अपना सीना मेरी पीठ पर और तेजी से गाड़ दिया और धीरे से बोली : मेरा भी तो येही हाल है विशाल…आज तक तुमने जो भी मुझे दिया है, मेरा दिल हमेशा उससे ज्यादा की आस लगाये रहता है तुमसे…

उसका एक हाथ फिसलकर मेरे लंड के ऊपर आ गया, बाईक चलाते हुए अंशिका ने पहली बार मेरा लंड पकड़ा था वो भी बिना किसी डर के..वो तो अपना चेहरा मेरे कंधे पर झुकाकर अपना चेहरा छुपा रही थी, पर मुझे डर लग रहा था की किसी ने मुझे अंशिका के साथ देख लिया और वो भी इतनी बुरी तरह से चिपटे हुए, तो क्या होगा…

मैंने अपनी बाईक गुडगाँव हाईवे की तरफ मोड़ दी…जयपुर जाते हुए मैंने एक-दो बार नोट किया था की रास्ते में जंगल जैसा इलाका आता है, मैंने सोचा की आज अंशिका को वहीँ ले चलता हु.

लगभग आधे घंटे बाद मैंने अपनी बाईक हाईवे से उतार कर एक घने जंगल में उतार दी…थोड़ी आगे जाने पर बाईक के जाने का रास्ता भी बंद हो गया, उसके आगे किसी खेत की बोंडरी शुरू हो चुकी थी, इसलिए आगे जाना संभव नहीं था.

मैंने बाईक साईड में लगायी, यहाँ से मेन रोड काफी दूर था, और दूर-२ तक कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था, खेत में एक झोपडी बनी हुई थी, उसके अलावा दूर -२ तक कोई नजर नहीं आ रहा था.

अंशिका : ये कोनसी जगह है…
मैं : पता नहीं…
अंशिका : कोई आ गया तो..
मैं : डर लग रहा है..

अंशिका मेरी तरफ देखते हुए मुस्कुरायी और बोली : आज तो तुम मुझे कहीं भी ले जाते, मुझे डर नहीं लगता..

वो मुझे जिस तरह देख रही थी, उसकी गुलाबी आँखों में तेर रहे डोरे साफ़-२ दिखाई दे रहे थे…वो इधर -उधर देखने लगी, मानो तय कर रही हो की कोई हमें नहीं देख रहा है…और फिर वो मेरी तरफ घूमी और अपनी साडी का पल्लू उसने नीचे गिरा दिया.

अंशिका : ये तो काफी घना जंगल लगता है…बड़ी ही अजीब जगह ढूंढी है तुमने आज..प्यार करने की.

वो अपने होंठो में ऊँगली डाल कर बड़े ही कामुक तरीके से मेरे करीब आती जा रही थी.

उसके ब्लाउस में फंसे हुए मोटे-२ मुमे देखकर मेरे मुंह में पानी आ गया.

जैसे ही वो मेरे करीब आई, मैंने उसकी कमर में हाथ डालकर उसे अपनी तरफ खींच लिया.

अंशिका : उनहू….मिस्टर….आज मैं इतनी आसानी से नहीं मिलने वाली आपको…

मैं उसकी बात सुनकर थोडा रुक गया और उसके चेहरे को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगा..अभी तो वो इतनी तड़प रही थी…और अब नखरे दिखा रही है.

मैं : क्या मतलब…
अंशिका : आज तुम कुछ नहीं करोगे…मैं जैसा कहूँगी, वैसा करते जाओ तो तुम्हे आज जंगल में जंगलीपन देखने को मिलेगा मेरा…वर्ना कुछ नहीं मिलने वाला आज…

उसने मेरे हाथ को अपनी कमर के ऊपर लेजाकर बुरी तरह से दबा दिया…उसके गुदाज पेट का ठंडा मांस मेरे हाथ की रगड़ से लाल हो उठा.

मैं : देखो अंशिका…टाईम कम है…तुम्हे घर भी जाना है न…
अंशिका :तुम उसकी फिकर मत करो…

और ये कहकर उसने अपना सेल निकाला और फोन मिलाया

अंशिका : हेल्लो…कन्नू…अच्छा सुन, मेरा प्रोग्राम बना है आज विशाल के साथ मूवी देखने का…तू संभाल लेना मम्मी को प्लीस…मैं पांच बजे तक आ जाउंगी…ओके थेंक्स…लव यु…

और उसने फोन रख दिया…यानी अगले २-३ घंटो का इंतजाम कर लिया था उसने…

अंशिका ने फिर से अपने चारो तरफ देखा और बोली : कोई आएगा तो नहीं न यहाँ…

मैं : नहीं आएगा…तुम डरो मत..

अंशिका ने मुस्कुरा कर मुझे देखा और फिर अपनी साडी खोलने लगी, और उसे निकलकर मेरी बाईक पर रख दिया.

और फिर वो अपने ब्लाउस के हूक खोलने लगी, जैसे-२ उसकी पिंक ब्रा उजागर होती चली गयी, मेरा लंड खड़ा होकर उसकी तरफ देखने लगा.

मैंने हाथ आगे करके उसके मुम्मो को पकड़ना चाह, पर उसने मुझे रोक दिया और बोली : रुको वहीँ…जब तक मैं न कहूँ, कुछ मत करो..

मैंने उसकी बात मान ली.

उसने अपना ब्लाउस उतारा और फिर पेटीकोट भी, अब वो सिर्फ हाई हील में थी, और ऊपर उसने सिर्फ ब्रा और लेस वाली पेंटी पहनी हुई थी…

बड़ी ही सेक्सी लग रही थी..ब्रा में से झांकते हुए उसके काले निप्पल साफ़ दिखाई दे रहे थे…उसकी आँखों की मदहोशी भी बढ चुकी थी..और वो अब बिना डरे अपने हुस्न को मेरे सामने बेपर्दा करके पुरे मजे लेने के मूड में थी.

मुझे भी उसके खेल में मजा आने लगा था…मैंने अपना लंड अपनी जींस से बाहर निकाल लिया.

मेरे तने हुए लंड को देखते ही उसकी आँखे बंद होती चली गयी….और उसने अपनी बीच वाली ऊँगली अपने मुंह में डाली…और फिर वही ऊँगली अपने पेंटी में डालकर अपनी चूत के रस में डुबोयी और फिर वही गीली ऊँगली वो मेरे पास लेकर आई और मेरे लंड के ऊपर रगड़ डाली और सारा रस मेरे लंड के ऊपर मल दिया.

उसके ठन्डे हाथ अपने गर्म लंड पर पाकर मेरे लंड ने दो-चार जोरदार झटके खाए…मन तो कर रहा था की उसे अपने सामने बिठा कर अपना लंड उसके मुंह में ठूस दू…पर उसने कुछ भी करने को मना किया हुआ था अभी तक..

अंशिका ने अपनी पेंटी को अपनी टांगो से निकाल कर साईड में रख दिया और फिर अपनी ब्रा भी खोल डाली…

अब अंशिका पुरे जंगल में नंगी खड़ी थी…कभी भी कोई आ सकता था, इसके बावजूद वो अपने पुरे कपडे उतार कर खड़ी थी मेरे सामने, दिन की रौशनी में पूरा नंगा शरीर मैंने पहली बार देखा था…उसके शरीर पर एक भी बाल नहीं था, चूत वाला हिस्सा बिलकुल सफाचट था, टाँगे भी बिलकुल स्मूथ थी…और ऊपर उसकी बड़ी-२ ब्रेस्ट के ऊपर चमक रहे दो काले रंग के जामुन, जिन्हें ना जाने मैं कितनी बार खा चूका था, पर उसका रस हर बार मुझे अपनी तरफ खींचता था.

उसके होंठ बार-२ सूख रहे थे, जिन्हें वो अपनी जीभ से गीला कर रही थी.

अंशिका : क्या देख रहे हो…विशाल..
मैं : यु आर ब्यूटीफुल अंशिका….देखो मेरे लंड की क्या हालत हो गयी है तुम्हारे नंगे जिस्म को देखकर…

मैंने अपने लंड की तरफ इशारा किया..

अंशिका : हालत तो मेरी चूत की भी ऐसी ही है विशाल..पर आज कुछ अलग करने का विचार है मेरा…तुम अपने कपडे उतारो जल्दी से…

उसके कहने की देर थी, मैं एक मिनट में उसके सामने नंगा खड़ा था.

मेरा हाथ अपने लंड के ऊपर था.

अंशिका मेरे पास आई और मेरे हाथ को लंड से हटा दिया और बोली : जब तक मैं न कहूँ, तुम इसे हाथ मत लगाना अब..ओके…

मैं : ओके….पर जो भी करना है, जल्दी करो…मुझसे ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं होगा अब…

मैंने अपना हाथ हटा लिया लंड से…मेरा लंड हवा में ऊपर नीचे हो रहा था, बड़ा ही भारीपन आ गया था उसमे एक दम से…

वो खुद तो तड़प ही रही थी, मुझे भी तडपाने के मूड में थी शायद…

मैंने आगे हाथ करके उसकी ब्रेस्ट पकडनी चाही, पर उसने मेरा हाथ परे झटक दिया और बोली : वेट करो बेबी…..

उसकी सिडक्टिव स्माईल बड़ी ही कातिलाना लग रही थी…

वो मेरे पीछे आई और अपने हाथो से मेरी पीठ के ऊपर अपनी उंगलियों के नाखुनो से धीरे-२ मुझे गुदगुदाने लगी.

मैं : ओहो……अंशिका…क्या कर रही हो…क्यों तदपा रही हो अपने दीवाने को…

अंशिका ने पीछे से मेरा सर पकड़ा और मेरे कान में धीरे से बोली : तुम्हारी यही तड़प काफी दिनों से देखना चाहती थी मैं…पर हर बार जल्दबाजी में सिर्फ फकिंग के अलावा कुछ और न कर पायी…आज पूरा हिसाब लुंगी..

उसके दोनों निप्पल मेरी पीठ पर चुभ रहे थे, उसकी ब्रेस्ट का सोफ्ट्पन मुझे पीछे की तरफ साफ़ महसूस हो रहा था.

उसने अपनी गर्म जीभ से मेरे कानो को सहलाना शुरू किया..मुझे काफी गुदगुदी हो रही थी…

वो मुझे पकड़ कर अपनी बाईक तक ले गयी और उसपर बैठ गयी..मेरी पीठ अभी भी उसकी तरफ थी, उसने मुझे पीछे से कस कर पकड़ा, अपनी दोनों टाँगे मेरे चारो तरफ लपेटी, एक हाथ से मेरे बाल पकडे और मेरे चेहरे को अपनी तरफ किया, और मेरे गालो और कान को किसी कुतिया की तरह चाटने लगी…और अपने दुसरे हाथ से मेरे लंड को पकड़ा और उसे जोरो से हिलाने लगी….

सुनसान जंगल में मैं चीख सा पड़ा एकदम से…: अह्ह्हह्ह्ह्हह्ह अंशी…….काआअ……….अह्ह्ह्हह्ह……

मेरे कान को उसने एकदम से अपने कोमल से मुंह में लिया और उसे चूसने लगी…मेरी तो हालत ही खराब हो गयी, पुरे शरीर में ऐसा सेंसेशन होने लगा जो आजतक नहीं हुआ था…उसकी चूत का गीलापन मुझे अपने कुलहो पर साफ़ महसूस हो रहा था, वो अपनी चूत वाले हिसे को भी बड़ी ही लय के साथ मेरे कूल्हों पर रगड़ रही थी…पर इस पुरे खेल में वो मुझे हाथ भी नहीं लगाने दे रही थी, बड़ा ही अजीब सा एहसास था ये मेरे लिए, मुझे कण्ट्रोल करके वो मेरी सेक्स की भावनाओ को भड़का रही थी, और शायद बाद में उसे ज्यादा मजा मिले इसलिए ये सब कर रही थी वो..क्योंकि जब मेरे सब्र का बाँध टूटेगा तो वो ही डूबेगी उसके अन्दर..

वो मेरे लंड को तेजी से आगे पीछे कर रही थी…मेरे कंधे पर सर रखकर वो मेरे लंड को देखने लगी…मैं भी उसकी नजरो का पीछा करते हुए, अपने लंड को देखने लगा, पता नहीं वो क्या चाहती थी, पर अगर एक मिनट तक वो ऐसे ही करती रही तो शायद मेरा रस निकल जाएगा…मेरे लंड की नसे तन चुकी थी और अन्दर से आने वाली बाद का एलान कर चुकी थी, ये देखकर उसने अपनी गति और बड़ा दी, शायद वो भी यही चाहती थी.

और मेरे कुछ कहने से पहले ही मेरे लंड से पिचकारियाँ निकल-२ कर दूर तक गिरने लगी….उसने मेरे लंड को अपने हाथो में ले रखा था और उसे तोप की तरह से पकड़कर वो दूर तक निशाना लगा रही थी…

और अंत में जब सारा माल निकल कर नीचे जमीं पर बिखर गया तो हाँफते हुए मैंने उससे पूछा : ये…ये क्या किया तुमने….

अंशिका : अब अगली बार तुम जब करोगे तो ज्यादा देर तक मेरी चूत के अन्दर रहोगे…समझे..

समझता तो मैं भी था, पर पहली बार भी तो चूत के अन्दर किया जा सकता था न…खेर..आज का खेल वो खेल रही थी…मैंने कुछ भी बोलना उचित नहीं समझा.

मैं : एक बात समझ लो अंशिका…आज तो मैं वो सब कर रहा हु जो तुम कह रही हो…आज के दिन मैं तुम्हारा गुलाम हु…पर यही सब मैं तुम्हारे साथ भी करूँगा..नेनीताल में…और तुम भी बिना सवाल किये मेरा कहना मानोगी…ठीक है..

अंशिका ने मुस्कुरा कर कहा : ठीक है…पर अभी तुम वो करो जो मैं चाहती हु..

मेरा लंड पिघल कर लटक चूका था..अंशिका ने उसे छोड़ दिया और अपने हाथो पर लगी हुई रस की एक-दो बूंदे चाटने लगी…

फिर अंशिका ने अपने सेंडिल उतार दिए, और मेरे कंधो को पकड़ कर वो बाईक की सीट पर खड़ी हो गयी. और मेरा चेहरा पकड़ कर मुझे अपनी तरफ घुमा लिया…

अंशिका की जूस से भीगी हुई चूत मेरी आँखों के बिलकुल सामने थी, उसने अपने एक पैर उसने बाईक की टंकी के ऊपर रखा और दूसरा सीट पर…उसकी गीली चूत से रस की एक बूँद निकल कर गिरने को तैयार थी…मुझसे ये देखा न गया और मैंने अपनी जीभ लगा कर उसे अपने मुंह में समेत लिया…

अह्ह्हह्ह्ह्हह्ह विशाआआआआआल……….मेरी जान लेकर रहोगे एक दिन तुम तो,,,,,,

वो ये बात इसलिए कह रही थी क्योंकि मैंने उसकी चूत के लिप्स को अपने मुंह से ऐसे चुसना शुरू कर दिया था जैसे वो चूत के नहीं, उसके मुंह वाली लिप्स हो….उनपर मेरे दांतों और जीभ ग़दर मचा रही थी…

और वो बीच जंगल में नंगी खड़ी होकर मुझसे अपनी चूत की ऐसी चटवाई करवा रही थी मानो इस दुनिया में हमारे अलावा कोई और है ही नहीं…और वो इतनी जोर से चीख रही थी की मुझे डर लगने लगा की दूर खेत में जो झोपड़ा है, उसमे से कोई निकल कर यहाँ न आ जाए, ये देखने की ऐसी आवाज कहाँ से आ रही है…पर लगता था की उस वक़्त उस झोपड़े में कोई नहीं था, मैंने अपना काम जारी रखा…चूत चूसने का..

आज अंशिका की चूत में बड़ी मिठास थी और कुछ ज्यादा गीलापन भी..मैंने अपनी एक ऊँगली अंशिका की गांड में डाल दी…ऊँगली अन्दर जाते ही वो बाईक की सीट पर पंजो के बल उचक गयी…और अपने दोनों हाथो से मेरे सर के ऊपर अपना भार डाल दिया…

अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह्ह एक जगह तो पूरी तरह करो पहले…..पीछे के छेद का लालच भी कर रहे हो…..हम्म्म्म…..

मैंने उसकी तरफ हँसते हुए देखा….और चूत का चुप्पा लेना जारी रखा..

तभी अंशिका बोली : बस…..बस करो…विशाल…..अब रुक जाओ…

मैं रुक गया…वो ऊपर खड़ी होकर साँसे ले रही थी..मानो मिलों तक दौड़कर आई हो ..

वो नीचे हुई और बाईक की सीट पर बैठ गयी..

उसकी चूत से निकल रहे रस की वजह से सीट गीली हो गयी.

अंशिका ने अपना एक पैर मेरे लंड के ऊपर रखा और मुझे थोडा पीछे किया..उसके और मेरे बीच अब एक पैर का फांसला था..

उसके नर्म – मुलायम पैरो की थिरकन से मेरे लंड में फिर से जान आने लगी…उसने अपने पैर के अंगूठे और ऊँगली के बीच मेरे लंड को किसी तरह से फंसा लिया…और उसे आगे पीछे करने लगी..दुसरे पैर के अंगूठे से वो मेरी बाल्स को मसाज देने लगी.

अंशिका : मजा आ रहा है…बोलो…

मैं : तुम तो ये सब ऐसे कर रही हो जैसे सब कुछ प्लानिंग कर रखी हो तुमने आज की…..की क्या-२ करोगी मेरे साथ…पर तुम्हे तो पता भी नहीं था की मैं आने वाला हु आज..

अंशिका : सच कहा तुमने…मैंने सोच तो रखा था की तुम्हारे साथ ये सब करुँगी…पर आज करुँगी ये नहीं सोचा था..आज मौका भी है..दस्तूर भी…तुम भी हो…और हम भी…

नशे में डूबी हुई सी आवाज में उसके मुंह से कविता निकल रही थी…मैंने उसकी मांसल पिंडलिया पकड़ रखी थी..और अपने लंड के ऊपर घिसाई कर रहे उसके पैरो को सपोर्ट दे रखी थी..

और जब उसने देखा की मेरा लंड फिर से तैयार है तो उसने अपने पैर मेरे लंड से हटा लिए…और मेरी कमर में हाथ डालकर मुझे अपनी तरफ खींचा…

मेरा तना हुआ लंड सीधा जाकर उसके पेट से टकराया…मैंने अपना हाथ बीच में डालकर अपने लंड को उसकी चूत में डालना चाहा , पर उसने रोक दिया…

अंशिका : उनहू……इतनी जल्दी नहीं….अपने आप जाने दो इसे…बिना किसी सहारे के…

यार…ये तो मेरी जान लेकर रहेगी आज…पर कोई बात नहीं…मेरा भी टाईम आएगा…

मैं थोडा झुका और अपने लंड को नीचे किया, और जैसे ही उसकी चूत सामने आई, मैं ऊपर उठ गया…पर लंड के टोपे पर लगी चिकनाई और चूत से निकल रहा रसीला पानी उसे अन्दर जाने से पहले ही फिसला कर इधर उधर कर रहा था….

अंशिका मेरी हालत देखकर हँसे जा रही थी…मैं बड़े ही डेस्परेट तरीके से हर कोशिश कर रहा था…

और अंत में अंशिका ने मेरा चेहरा अपने हाथो में पकड़ा और बोली : अभी तक नहीं सीखे तुम…कोई बात नहीं…चलो मुझे उठाओ अपनी गोद में…

मैंने वैसा ही किया.

अंशिका ने अपनी बाहों से मेरी गर्दन लपेट डाली और आज के दिन की पहली किस की उसने मेरे होंठो पर…

उसके नम से हो चुके होंठो को चूसने में बड़ा मजा आ रहा था…मेरे हाथो में उसके भरे हुए कुल्हे थे…पर उसकी चूत अभी भी मेरे लंड से काफी ऊपर थी..

मेरा लंड ऊपर मुंह किये उसका नीचे आने का इन्तजार कर रहा था…और फिर अंशिका का जिस्म मेरे शरीर की घिसाई करता हुआ नीचे आने लगा…और न मैंने हाथ लगाया और न उसने, मेरा लंड सीधा उसकी चूत में जा फंसा…

और जब ये हुआ तो उसके साथ -२ मेरी साँसे भी अटक गयी…उसके चेहरे पर ऐसे एक्सप्रेशन आ रहे थे मानो मेरा लंड पहली बार जा रहा है उसकी चूत में…

उसकी आँखों में अजीब सा नशा था…मैंने उसकी आँखों में देखते-२ उसके होंठो का रस पीना जारी रखा और अपने हाथो का दबाव उसकी गांड पर कम कर दिया, जिसकी वजह से मेरे लंड के ऊपर उसकी चूत लिपटती चली गयी….और वो सी-सी करती हुई मेरे लंड को अन्दर लेने लगी…

अह्ह्हह्ह्ह्हह्ह सीईई ……….सीईई………म्मम्मम…विशाल……….आई वास डाईंग ….तो टेक युर कोक……..अह्ह्हह्ह..

मैं चिल्लाया…..: साली….इसलिए इतनी देर से ड्रामा कर रही थी….मेरे लंड को कितना तरसाया तुने आज….अब देख…मैं तेरी चूत का कैसे बेन्ड बजाता हु…भेन चोद…एक घंटा हो गया …पर चूत में लंड अब गया है…..अह्ह्ह्ह…..ले साली…..ले मेरा लंड……कुतिया….

मेरे मुंह से गलियों की बोछार सी निकलने लगी…..और वो भी तेज आवाज में…..उसके कानो के बिलकुल पास….

अपनी चूत में मेरे लंड को लेकर और मेरे मुंह से गन्दी गलियां और बाते सुनकर उसका ओर्गास्म अपने चरम पर पहुँच गया और वो मेरी गोद में उछलती कूदती हुई झड़ने लगी….

अह्ह्ह्हह्ह ओह्ह विशाल्ल्ल्ल …. ……आई एम् कमिंग……..अह्ह्हह्ह्ह्ह……

और उसकी चूत से गर्म रस निकल कर मेरे लंड और फिर नीचे की तरफ गिरने लगा….

मेरे लंड ने थोड़ी देर पहले ही पानी छोड़ा था, इसलिए दोबारा झड़ने में टाईम लगा रहा था.

पूरी तरह से निचुड़ने के बाद वो मेरे लंड से नीचे उतर गयी…मेरा लंड अभी भी खड़ा हुआ था..

मैंने उसे बाईक की तरफ घुमाया, और उसके दोनों हाथ बाईक पर टिका दिए, और उसे थोडा नीचे झुका दिया, और फिर मैंने अपना लंड उसकी चूत में पीछे से डाल दिया…और मैंने हाथ आगे करके उसके लटकते हुए मोटे-ताजे मुम्मे पकड़ लिए…उसके लटकते हुए मुम्मे पकड़ने से मुझे आज उसके साईज और गुदाज्पन का पूरा एहसास हुआ…

मैंने चूत में झटके और ब्रेस्ट में स्ट्रोक मारने शुरू कर दिए….और लगभग पांच मिनट के बाद मेरे लंड से भी रस निकलने को तैयार हो गया….

मैंने आखिरी मौके पर उसे बाहर निकाला और सारा माल अंशिका की गोरी पीठ के ऊपर छोड़ दिया… उसकी पीठ पर जगह -२ मेरे रस की चट्टानें बन गयी…और फिर लकीरे बनकर नीचे की तरफ लुड़कने लगी…

मैंने अपनी जींस से रुमाल निकाल कर उसकी पीठ और चूत और फिर अपना लैंड साफ़ किया और उसे वहीँ फेंक दिया.

मैं : अब क्या इरादा है…और रुकना है या चले अब..

अंशिका : मन तो नहीं कर रहा …पर जाना भी है..चलो अभी चलते हैं..बाकी अब नेनीताल में करेंगे..

मैं : नेनीताल में जो होगा…मेरी मर्जी से…भूल गयी क्या..

अंशिका : ओके…बाबा…अपनी मर्जी से कर लेना…अभी तो चलो यहाँ से..

मैं वापिस जाते हुए नेनीताल में क्या-२ करूँगा ये सोचता रहा.

जिस दिन नेनीताल जाना था मैं टाईम से स्टेशन पर पहुँच गया, रात की ट्रेन थी, काठगोदाम एक्सप्रेस, अंशिका ने मुझे स्टेशन के बाहर मिलने को कहा था, ताकि सभी को ये लगे की हम एक साथ ही आये हैं, कनिष्का को मालुम था की की मैं भी साथ जा रहा हु, वो अंशिका को ऑटो पर छोड़ने आई थी, अपनी बहन को गले मिलकर विदा करने के बाद वो मेरे पास आई और धीरे से बोली : दीदी का ध्यान रखना…और ज्यादा इधर – उधर मुंह मारने की जरुरत नहीं है…वापिस आकर मेरा भी तो हिसाब – किताब करना है..

मैं उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दिया, और फिर वो मेरे गले से लग कर अपने गुदाज जिस्म की गर्मी से मेरे लंड महाराज को बीच सड़क पर खड़ा करने लगी..

मैंने जल्दी से उसे अलग किया और उसे बाय बोलकर हम दोनों अन्दर की तरफ चल दिए.

जल्दी ही हमें एक कोने में अंशिका के कॉलेज का ग्रुप दिखाई दिया, अंशिका के कॉलेज की लडकियों ने अंशिका को विश किया और अंशिका ने मुझे सबसे अपना कजिन कहकर मिलवाया, मैंने नोट किया की उनमे से दो-तीन लड़कियां काफी मस्त थी और एक-दो लडकिया तो मुझे ऐसे देख रही थी मानो मैं उनकी चुदाई के लिए है लाया गया हु..

थोड़ी ही देर में किट्टी मेम भी आ गयी…सभी ने उन्हें विश किया..

मैं : हेल्लो मेडम..आप अकेली आई है…आपका बेटा सचिन कहाँ है…

किट्टी में मुझे देखकर रहस्यमयी हंसी हंसी और बोली : अपने पीछे देखो…

और पीछे देखकर मैं चोंक गया, मेरे पीछे स्नेहा खड़ी थी..टी शर्ट और केप्री में..मुझे देखकर वो चहक कर बोली : हाय….केसे हो…

मैं कभी स्नेहा को और कभी किट्टी में को देखने लगा…

मैं : अरे स्नेहा तुम…तुम्हारा तो एग्साम था न…फिर तुम कैसे आ गयी..मेडम ने तो कहा था की सचिन जाएगा..

स्नेहा : मैंने ही मम्मी को मना किया था..तुम्हे बताने के लिए..बस तुम्हारा चेहरा देखना चाहती थी , कैसा लगा ये सरप्रायीस …

मैं : बहुत खूब….मतलब…अच्छा लगा..

मैंने अंशिका की तरफ देखा, वो भी मंद-२ मुस्कुरा रही थी मुझे देखकर..उसे शायद अंदाजा हो गया था मेरा स्नेहा के साथ क्या चक्कर है…

रात को ग्यारह बजे ट्रेन चली और हम सभी आराम से अपनी सीटों पर बैठकर गप्पे मारने लगे..

स्नेहा खासतोर पर मुझे घेर कर बैठी थी, मानो मैं उसकी पर्सनल प्रोपर्टी हूँ…अंशिका की नजर भी थी मुझपर..

loading...

Leave a Reply