प्रवेश परीक्षा part 2

जहाँ से दरार शुरू हो रही थी उसके ठीक नीचे मटर के फूल जैसी एक संरचना थी। मुझे प्रेम गुरू की कहानियाँ पढ़ने के बाद पता चला कि उसे भगनासा कहते हैं।

मैंने अपनी जुबान उस मटर के फूल से सटा दी। सुगन्धा चिहुँक पड़ी। उसने मेरे बालों को और कस कर जकड़ लिया। मैंने अपनी जुबान उस फूल पर फिरानी शुरू की तो सुगन्धा के शरीर का कंपन बढ़ने लगा।
इस अवस्था में अब और ज्यादा कुछ कर पाना संभव नहीं था तो मैं खड़ा हुआ और उसे अपनी गोद में उठाकर बिस्तर पर ले गया। बिस्तर क्या था, दो फ़ोल्डिंग चारपाइयाँ एक दूसरे से सटाकर उन पर दो सिंगल बेड वाले गद्दे बिछा दिए गए थे।

दूसरा फोल्डिंग बेड मैं तभी बिछाता था जब गाँव से कोई दोस्त या पिताजी आते थे वरना उसको मोड़कर पहले वाले फोल्डिंग बेड के नीचे डाल देता था। इस बार गाँव जाने से पहले मैं दोनों फ़ोल्डिंग बेड बिछा कर गया था।

उसके ऊपर चादर बिछी हुई थी। मैंने सुगन्धा को लिटा दिया। पैंटी और सलवार अभी भी उसके पैरों से लिपटे हुए थे। मैंने उन्हें भी उतारकर बेड से नीचे फेंक दिया।अब वो बिल्कुल निर्वस्त्र मेरे सामने पड़ी हुई थी और मैं खिड़की से छनकर आती रोशनी में उसका शानदार जिस्म देख रहा था।

थोड़ी देर उसका जिस्म निहारने के बाद मैंने उसके घुटने मोड़ कर खड़े कर दिये और टाँगें चौड़ी कर दीं। फिर मैं अपना मुँह उसकी टाँगों के बीच करके लेट गया। उँगलियों से उसकी योनि की फाँको को इतना फैलाया कि उसकी सुरंग का छोटा सा मुहाना दिखाई पड़ने लगा। मैंने सोचा कि इतने छोटे से मुहाने से मेरा इतना मोटा लिंग एक झटके में कैसे अंदर जा पाता। मस्तराम वाकई हवाई लेखन करता है। मैंने अपनी जीभ उस छेद से सटा दी। मेरी जुबान पर स्याही जैसा स्वाद महसूस हुआ। मैंने जुबान अंदर घुसाने की कोशिश की तो सुगन्धा ने अपने नितंब ऊपर उठा दिये। अब उसकी योनि का छेद थोड़ा और खुल गया और मुझे जुबान का अगला हिस्सा अंदर घुसाने में आसानी हुई।

फिर मैंने अपनी जुबान बाहर निकाली और फिर से अंदर डाल दी। उसके शरीर को झटका लगा। उसने अभी भी नितंब ऊपर की तरफ उठा रखा था। मैंने बगल से तकिया उठाया और उसके नितंबों के नीचे लगा दिया

फिर मैंने अपनी तरजनी उँगली उसके छेद में घुसाने की कोशिश की। मेरी जुबान ने पहले ही गुफा को काफी चिकना बना रखा था। तरजनी धीरे धीरे अंदर घुसने लगी। जब उँगली अंदर चली गई तो मैं उसे अंदर ही मोड़कर उसकी योनि के आंतरिक हिस्सों को छूने लगा। मुझे अपनी उँगली पर गीली रुई जैसा अहसास हो रहा था। कुछ हिस्से थोड़ा खुरदुरे भी थे। उनको उँगली से सहलाने पर सुगन्धा काँप उठती थी।

मैंने सोचा अब दो उँगलियाँ डाल कर देखी जाए। मैं तरजनी और उसके बगल की उँगली एक साथ धीरे धीरे उसकी गुफा में घुसेड़ने लगा। थोड़ी सी रुकावट और सुगन्धा के मुँह से एक कराह निकलने के बाद दोनों उँगलियाँ भीतर प्रवेश कर गईं। अब सुगन्धा की गुफा से पानी का रिसाव काफी तेजी से हो रहा था। मैंने तकिया हटाया और उसकी जाँघें अपनी जाँघों पर चढ़ा लीं। फिर मैं अपना लिंग मुंड उसकी योनि पर रगड़ने लगा और वो अपनी कमर उठा उठा कर मेरा साथ देने लगी।

थोड़ी देर रगड़ने के बाद मैंने अपना गीला लिंग मुंड उसकी गुफा के मुहाने पर रखा और अंदर डालने के लिए जोर लगाया। उसके मुँह से फिर चीख निकली उसने पलट कर अपना मुँह तकिए में छुपा लिया। मैं आश्चर्य चकित रह गया कि यह आखिर क्या हुआ। मस्तराम की कहानियों के हिसाब से तो मुझे इसकी गुफा में प्रवेश कर जाना चाहिए था। अच्छा हुआ यहाँ कोई आता जाता नहीं वरना इसकी चीख मुझे संकट में डाल देती।

अचानक मेरे दिमाग को एक झटका लगा। मुझे अपनी छात्रावास की रैगिंग याद आ गई। जब हम सबको नंगा करके हमारे लिंग नापे गये थे और मुझे अपनी कक्षा के सबसे बड़े लंडधारक की उपाधि प्रदान की गई थी। अच्छा तो इसलिए मुझको सफलता नहीं मिल रही है। सुगन्धा ठहरी कच्ची कली और मैं ठहरा आठ इंच का लंडधारी। कहाँ से पहली बार में कामयाबी मिलती। अच्छा हुआ मैंने ज्यादा जोर नहीं लगाया।

मुझे याद आया कि मेरे सबसे छोटे चाचा कि पत्नी को सुहागरात के बाद अगले दिन अस्तपाल ले जाना पड़ा था। क्यों? यह बात घर की महिलाओं के अलावा किसी को नहीं पता थी। सुनने में आया था कि पुलिस केस होने वाला था मगर ले देकर रफ़ा दफ़ा किया गया। जरूर ये लंबा लिंग अनुवांशिक होता है और चाचा ने सुहागरात के दिन ज्यादा जोर लगा दिया होगा।

हे कामदेव, अच्छा हुआ मैंने खुद पर नियंत्रण रखा वरना आपके चक्कर में अर्थ का अनर्थ हो जाता।

मैं उठा और कमरे से सटी रसोई में जाकर एक कटोरी में थोड़ा सा सरसों का तेल ले आया। मैं सुगन्धा के पास गया और बोला,”सुगन्धा इस बार धीरे से करूँगा। प्लीज बेबी करने दो ना।”

इतना कहकर मैंने उसको कंधे से पकड़कर खींचा। उसने कोई विरोध नहीं किया। मैंने उसे चित लिटा दिया। मैंने तरजनी उँगली तेल में डुबोई और उसकी गीली गुफा में घुसा दी। एक दो बार अंदर बाहर करने से तेल गुफा की दीवारों पर अच्छी तरह फैल गया। फिर मैंने दो उँगलियाँ तेल में डुबोईं और अंदर डालकर तीन चार बार अंदर-बाहर किया।

गुफा का मुहाना अब ढीला हो चुका था। लेकिन इस बार मैं कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहता था। मैंने तीन उँगलियाँ तेल में डुबोईं और उसकी गुफा में घुसाने लगा। थोड़ी दिक्कत के बाद तीन उँगलियाँ अंदर चली गईं। मेरी टूटती हुई हिम्मत वापस लौटी। लिंग महाराज जो जम्हाई लेने लगे थे उन्होंने एक शानदार अंगड़ाई ली और सचेतन अवस्था में वापस लौटे।

मैंने अपने लिंग पर तेल लगाना शुरू किया। सुगन्धा ज्यादातर समय आँखें बंद करके मजा ले रही थी। उसके लिए भी यह सब नया अनुभव था इसलिए उसका हिचकिचाना और शर्माना स्वाभाविक था।

जब लिंग पर तेल अच्छी तरह लग गया तब मैंने लिंगमुंड पर थोड़ा सा तेल और लगाया। इस बार मैं कोई कमी नहीं छोड़ना चाहता था। फिर मैंने उसकी जाँघें अपनी जाँघों पर रखीं। एक हाथ से अपना लिंग पकड़ा और उसकी योनि के मुँह पर रख दिया। मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था। मैंने थोड़ा जोर लगाया और मुझे उसकी गुफा का मुहाना अपने लिंगमुंड पर कसता हुआ महसूस हुआ। मैंने थोड़ा जोर और लगाया।

सुगन्धा थोड़ा कसमसाई पर बोली कुछ नहीं। फिर मैंने कामदेव का नाम लेकर हल्का सा झटका दिया और इस बार लगा कि जैसे मेरे लिंगमुंड की खाल चिर गई हो। सुगन्धा के मुँह से भी कराह निकली मगर कामदेव की कॄपा से इस बार लिंगमुंड अंदर चला गया था। सुगन्धा ने अपनी कमर हिलाने की कोशिश की लेकिन मैंने उसकी जाँघें कसकर पकड़ रखी थीं। वो हिल नहीं पाई। एक दो बार और कोशिश करने के बाद वो ढीली पड़ गई। मैं प्रतीक्षा करता रहा। जब मुझे लगा कि अब यह मेरा लिंग बाहर निकालने की कोशिश नहीं करेगी तब मैंने उसकी जाँघें छोड़ दीं और लिंग पर दबाब बढ़ाया। मेरा लिंग थोड़ा और अंदर घुसा। क्या कसाव था, क्या आनन्द था।

मैंने लिंग थोड़ा सा बाहर खींचा और फिर दबाव बढ़ाते हुये अंदर डाल दिया। धीरे धीरे मैं लिंग अंदर बाहर कर रहा था। लेकिन मैं लिंगमुंड को बाहर नहीं आने दे रहा था। क्या पता सुगन्धा दुबारा डलवाने से मना कर दे। लिंग और योनि पर अच्छी तरह लगा हुआ सरसों का तेल मेरे प्रथम संभोग में बहुत सहायता कर रहा था।

फिर मैंने लिंग अंदर बाहर करने की गति थोड़ा और बढ़ा दी। लिंग अभी भी पूरा नहीं घुसा था लेकिन अब सुगन्धा मेरे हर धक्के पर अपना नितंब उठा उठाकर मेरा साथ दे रही थी।

अब मैं आश्वस्त हो गया था कि लिंग निकल भी गया तो भी सुगन्धा दुबारा डालने से मना नहीं करेगी

अब मैं आश्वस्त हो गया था कि लिंग निकल भी गया तो भी सुगन्धा दुबारा डालने से मना नहीं करेगी। मैंने लिंग निकाला और मैं सुगन्धा के ऊपर लेट गया। लिंग मैंने हाथ से पकड़कर उसकी योनि के द्वार पर रखा और फिर से धक्का दिया सुगन्धा को थोड़ी सी दिक्कत इस बार भी हुई लेकिन वो सह गई। उसे भी अब पता चल गया था कि लिंग और योनि के मिलन से कितना आनन्द आता है। पहले धीरे धीरे फिर तेजी से मैं धक्के लगाने लगा।

धीरे धीरे मैं आनन्द के सागर में गहरे और गहरे उतरता जा रहा था। पता नहीं कैसे मेरे मुँह से ये शब्द निकलने लगे,”सुगन्धा, मेरी जान ! दो हफ़्ते कितना मुट्ठ मारा है मैंने तुम्हें याद कर करके। आज मैं तुम्हारी चूत फाड़ दूँगा रानी। आज अपना सारा वीर्य तुम्हारी चूत में डालूँगा मेरी जान। ओ सुगन्धा मेरी जान। पहले क्यूँ नहीं मिली मेरी जान। इतनी मस्त चूत अब तक किसलिए बचा के रखी थी रानी। फट गई न तेरी चूत, बता मेरी जान फट गई ना।”

सुगन्धा भी अपना नियंत्रण खो चुकी थी, वो बोली,”हाँ भैय्या, फट गई, आपने फाड़ दी मेरी चूत भैय्या।”

पता नहीं और कौन कौन से शब्द उस वक्त हम दोनों के मुँह निकले। हम दोनों ही होशोहवास में नहीं थे। मेरा लिंग उसकी गहराइयों में उतरता जा रहा था। जाँघों पर जाँघें पड़ने से धप धप की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। लिंग और योनि एक साथ फच फच का मधुर संगीत रच रहे थे।

थोड़ी देर बाद सुगन्धा ने मुझे पूरी ताकत से जकड़ लिया और उसका बदन सूखे पत्ते की तरह काँपने लगा। मैं धक्के पर धक्का मारे जा रहा था और कुछ ही पलों बाद मेरे भीतर का सारा लावा पिघल पिघलकर उसकी प्यासी धरती के गर्भ में गिरने लगा

दस मिनट तक हम दोनों ऐसे ही लेटे रहे। फिर मैं उसके ऊपर से नीचे उतरा। तेल की कटोरी बिस्तर पर लुढ़की पड़ी थी। चादर खराब हो चुकी थी।

वो उठी और बाथरूम गई।

मैं उसके हिलते हुए नितंबों को देख रहा था।

वो वापस आई और अपने कपड़े पहनने लगी, पहनते पहनते वो बोली,”लगता है मुझे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला मिल जाएगा।” मैंने पूछा,”क्यूँ?”

वो बोली,”चचेरी सही तो क्या हुआ बहन तो आपकी ही हूँ। जब आज आपको दाखिला मिल गया तो मुझे भी मिल ही जाएगा।”

एक बार फिर मेरे मुँह से बेसाख्ता हँसी निकल गई। इस लड़की का सेंस आफ़ ह्यूमर भी न, कमाल है।

वो फिर बोली,”और आप कितनी गंदी गंदी बातें कर रहे थे। शर्म नहीं आती आपको ऐसे गंदे गंदे शब्द मुँह से निकालते हुए।”

मैंने सोचा ये देहाती लड़कियाँ भी न, इनको करने में शर्म नहीं आती लेकिन बोलने में बड़ी शर्म आती है लेकिन मैंने कहा,”सारी बेबी आगे से नहीं कहूँगा।”

उस रात भी मैं करना चाह रहा था लेकिन वो बोली कि उसकी योनि में दर्द हो रहा है तो मुझे हस्तमैथुन करके काम चलाना पड़ा।

प्रवेश परीक्षा के परिणाम घोषित हुए तो उसका दाखिला सचमुच हो गया था।

आखिर बहन तो मेरी ही है चचेरी सही तो क्या हुआ, सोचकर मैं हँस पड़ा।

चलो अब तो वो यहीं रहेगी इलाहाबाद में, छुट्टी के दिन बुला लिया करूँगा।

पाठकों की राय लेखक के लिए अमृत का कार्य करती है। मेरी कहानियाँ प्रवेश परीक्षा आपको कैसी लगीं मुझे जरूर बतायें। कुछ बदलाव चाहिये तो वो भी सुझा सकते हैं।

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