प्रगति की कुंवारी गांड

मास्टरजी ने जहाँ छोड़ा था वहीं से आगे मसाज शुरू किया। चादर को पाँव की तरफ से ऊपर लपेट कर प्रगति की जांघों तक उठा दिया और उसकी टांगें अच्छे से खोल दीं क्योंकि प्रगति अब नंगी थी, टांगें खुलने से उसे शर्म आ रही थी सो उसने अपनी टांगें थोड़ी सी बंद कर लीं। मास्टरजी ने कुछ नहीं कहा और पीछे से घुटनों और जांघों पर तेल लगाने लगे। उनके हाथ धीरे धीरे ऊपर की तरफ जाने लगे और चूतडों पर पहुँच गए। मास्टरजी प्रगति की टांगों के बीच वज्रासन में बैठ गए और प्रगति के घुटने से ऊपर की टांगों की मालिश करने लगे। चादर को उन्होंने उसकी पीठ तक उघाड़ दिया और वह उलटी, नंगी और असहाय उनके सामने लेटी हुई थी। मास्टरजी अपने जीवन में सिर्फ लड़कियां ही नहीं लड़कों का यौन शोषण भी कर चुके थे सो उन्हें गांड से बेहद प्यार था और उन्हें गांड मारने में मज़ा भी ज्यादा आता था। इस अवस्था में प्रगति की कुंवारी गांड को देख कर मास्टरजी की लार टपकने लगी। उनका मन कर रहा था इसी वक़्त वे प्रगति की गांड भेद दें पर अपने ही इरादे से मजबूर थे।
उनके हाथ प्रगति के चूतडों पर सरपट फिर रहे थे। रह रह कर उनकी उंगलियाँ चूतडों के पाट के बीच चली जातीं। जब ऐसा होता, प्रगति हिल हिल कर आपत्ति जताती। वज्रासन से थक कर मास्टरजी अपने घुटनों के बल बैठ गए और मालिश जारी रखी। उनकी उंगलियाँ प्रगति की योनि के द्वार तक दस्तक देने लगीं। ऐसे में भी प्रगति हिलडुल कर मनाही कर देती।
अब मास्टरजी ने प्रगति के ऊपर से पूरी चादर हटा दी और मालिश का वार पिंडलियों से लेकर पीठ और कन्धों तक करने लगे। जब वे आगे को जाते तो उनकी निकर प्रगति के चूतडों से छू जाती।
हालाँकि मास्टरजी एक बार लिंगराज को राहत दिला चुके थे और आम तौर पर उनका लंड एक दो घंटे के विश्राम के बाद ही दुबारा तैयार होता था, इसी विश्वास पर तो उन्होंने लंगोट उतार दी थी। पर आज आम हालात नहीं थे। लिंगराज के लिए कठिन समय था। उनके सामने एक अत्यंत कामुक और आकर्षक लड़की उनकी गिरफ्त में थी। वह नंगी और कई तरह से असहाय भी थी। उनके संयम की मानो परीक्षा हो रही थी। मन पर तो मास्टरजी ने काबू पा लिया पर तन का क्या करें। उनका लंड ताव में आ गया और उसके तैश के सामने बेचारी निकर का कपड़ा कमज़ोर पड़ रहा था। वह उसके बढ़ाव और उफ़ान को अपने में सीमित रखने में नाकामयाब हो रहा था। अतः मास्टरजी का लंड निकर को उठाता हुआ आसमान को सलामी दे रहा था। मास्टरजी के इरादों का विद्रोह करते हुए उन्हें मानो अंगूठा दिखा रहा था। यह तो अच्छा था कि प्रगति उलटी लेटी हुई थी वरना लिंगराज की यह हरकत उससे छिपी नहीं रह सकती थी। सावधानी बरतते बरतते भी उनकी लंड-युक्त निकर प्रगति की गांड को छूने लगी।
कुछ भी कहो, सामाजिक आपत्ति और विपदा एक बात है और प्रकृति के नियम और बात हैं। प्रगति या उसकी जगह कोई और लड़की, का सम्भोग के प्रति विरोध सामाजिक बंधनों के कारण होता है ना कि उसके तन-मन की आपत्ति के कारण। तन-मन से तो सबको सम्भोग का सुख अच्छा लगता है बशर्ते सम्भोग सम्मति के साथ किसी प्रियजन के साथ हो। यहाँ भी, हालाँकि प्रगति के संस्कार उसको ग्लानि का आभास करा रहे थे, पर मास्टरजी के लंड का उसके चूतड़ों पर हल्का हल्का स्पर्श, उसके शरीर को रोमांचित और मन को प्रफुल्लित कर रहा था। प्रगति की योनि से सहसा पानी बहने लगा।

मास्टरजी क्योंकि पीठ की मालिश में मग्न थे, प्रगति की योनि गीली होने का दृश्य नहीं देख पाए। उनकी नज़र पीठ की तरफ और ध्यान चूतड़ों से स्पर्श करती अपनी निकर पर था जिसके कारण उनका लिंग कठोर से कठोरतर होता जा रहा था। उन्हें याद नहीं आ रहा था कि इससे पहले उनका लंड इतनी जल्दी कब दुबारा सम्भोग के लिए तैयार हुआ हो !! उन्हें अपने आप पर गर्व होने लगा पर साथ ही चिंता भी होने लगी कि इस अवस्था से कैसे निपटें ? वे नहीं चाहते थे कि प्रगति को उनका विराट लंड दिख जाये। उन्हें डर था वह घबरा कर भाग न जाए। स्थिति पर काबू पाने के लिए वे प्रगति के ऊपर से हट गए और उसकी बगल में बैठ कर उसकी गर्दन और कन्धों को सहलाने लगे। उन्होंने प्रगति के निचले शरीर पर चादर भी उढ़ा थी। प्रगति के कामोत्तेजन को जैसे अचानक ब्रेक लग गया। उसे थोड़ा बुरा लगा पर राहत भी महसूस की। उसे अपने ऊपर गुस्सा भी आ रहा था कि अपने ऊपर संयम क्यों नहीं रख पा रही है। उसे लगा कि मास्टरजी क्या सोचेंगे अगर उन्हें पता लगा कि उसके शरीर में कैसी कशिश चल रही है। वे तो उसका इलाज करने में लगे हैं और वह किसी और प्रवाह में बह रही है !
अपने ऊपर प्रगति को शर्म आने लगी और मन ही मन मास्टरजी का धन्यवाद किया कि वे उसके ऊपर से उठ गए और उसको ढक दिया। अब उन्हें प्रगति की योनि की अवस्था का पता नहीं चलेगा, जो कि सम्भोग के लिए तत्पर हो रही थी।
थोड़ी देर में मास्टरजी का लिंग मायूस हो कर सिकुड़ गया और प्रगति की योनि भी बुझ सी गई। दोनों को इससे राहत मिली। प्रगति नहीं चाहती थी कि मास्टरजी को उसकी कामोत्तेजना के बारे में पता चले। कहीं वे उसे बुरी और बदचलन लड़की न समझने लगें। उधर मास्टरजी नहीं चाहते थे कि प्रगति उनके लिंग के विराट रूप को देख ले। उन्हें डर था प्रगति डर के मारे भाग ही न जाए। वे प्रगति के साथ अपने रिश्ते को धीरे धीरे विकसित करना चाहते थे और एक लम्बा सम्बन्ध बनाना चाहते थे।
मास्टरजी को जब यकीन हो गया कि उनका लंड नियंत्रण में आ गया है और उनकी निकर के आकार को नहीं ललकार रहा तो वे उठ खड़े हुए और प्रगति को चित लेट जाने का आदेश दे कर कमरे से बाहर चले गए। प्रगति एक आज्ञाकारी शिष्या कि भांति चादर के नीचे ही करवट बदल कर सीधी हो गई। हालाँकि वह चादर के नीचे थी, फिर भी सहसा उसने अपने हाथों से अपने स्तन ढक लिए ताकि उसके वक्ष की रूपरेखा चादर पर न खिंचे।
वहां मास्टरजी ने गुसलखाने में जाकर अपने नटखट लंड को नियंत्रण में लाने के लिए एक बार फिर मामला हाथ में लिया और हस्त मैथुन करने लगे। वे दुबारा अपने आप को ऐसी स्थिति में नहीं लाना चाहते थे जहाँ उन्हें प्रगति से हाथ धोना पड़े। कुछ देर के प्रयास के बाद मास्टरजी का लंड एक बार फिर लावा उगलने लगा, पर इस बार पहले की भांति का ज्वालामुखी नहीं था। एक फुलझड़ी के मानिंद था। मास्टरजी को इस राहत से तसल्ली मिली और वे एक नए भरोसे के साथ प्रगति के पास आ गए। उनका लिंग एक भीगी बिल्ली की तरह असहाय सा निकर में लटक रहा था और गवाएँ हुए दो मौकों का अफ़सोस कर रहा था।

प्रगति के चित्त लेटने से एक समस्या यह खड़ी हुई कि अब दोनों एक दूसरे को देख सकते थे। पर दोनों ही एक दूसरे से आँख नहीं मिलाना चाहते थे क्योंकि दोनों के मन में ग्लानि भाव था।एक अजीब सी चुप्पी का वातावरण छा गया था। इतने में प्रगति ने अपने हाथ चादर से बाहर निकाल कर अपनी आँखों पर रख लिए और आँखें मूँद लीं। उसे शायद ज्यादा शर्म महसूस हो रही थी क्योंकि नंगी तो वह थी !!! उसकी इस हरकत से दो फायदे हुए। एक तो दोनों की आँखों का संपर्क टूट गया और दूसरे प्रगति के वक्ष स्थल से उसके हाथों का बचाव चला गया। प्रगति की साँसें उसकी छाती को ऊपर नीचे कर रहीं थीं जिस से उसके स्तनों के ऊपर रखी चादर ऊपर नीचे खिसक रही थी। इस चादर की रगड़ से उसकी चूचियों में गुदगुदी हो रही थी और वे उभर कर खड़ी हो गई थीं। उसके वक्ष की रूप रेखा अब चादर पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी। मास्टरजी को यह दृश्य बहुत अच्छा लगा।
मास्टरजी ने अपने काम पांव की तरफ से आरम्भ किया। वे प्रगति की छाती पर पड़ी चादर को नहीं छेड़ना चाहते थे। उन्होंने प्रगति के पांव से लेकर जांघों तक की चादर उघाड़ दी और तेल की मालिश करने लगे। तलवे तो पहले ही हो चुके थे फिर भी उन्होंने तलवों पर कुछ समय बिताया क्योंकि वे प्रगति को गुदगुदा कर उसकी उत्तेजना को कायम रखना चाहते थे। तलवों के विभिन्न हिस्सों का संपर्क शरीर के विभिन्न अंगों से होता है और सही जगह दबाव डालने से कामेच्छा जागृत होती है। इसी आशा में वे उसके तलवों का मसाज कर रहे थे। प्रगति को इसमें मज़ा आ रहा था। कुछ देर पहले उसकी कामुक भावनाओं पर लगा अंकुश मानो ढीला पड़ रहा था। मास्टरजी की उंगलियाँ उसके शरीर में फिर से बिजली का करंट डाल रही थीं।
धीरे धीरे मास्टरजी ने तलवों को छोड़ कर घुटनों के नीचे तक की टांगों को तेल लगाना शुरू किया। यह करने के लिए उन्होंने प्रगति के घुटने ऊपर की तरफ मोड़ दिए। चादर पहले ही जाँघों तक उघड़ी हुई थी। घुटने मोड़ने से प्रगति की योनि प्रत्यक्ष हो गई। प्रगति ने तुंरत अपनी टाँगें जोड़ लीं। पर इस से क्या होता है !? उसकी योनि तो फिर भी मास्टरजी को दिख रही थी हालाँकि उसके कपाट बिलकुल बंद थे। मास्टरजी ने खिसक कर अपने आप को प्रगति के और समीप कर लिया जिस से उनके हाथ प्रगति की जांघों तक पहुँच सकें।
प्रगति की साँसें और तेज़ हो गईं और उसने अपने दोनों हाथ अपनी आँखों पर और कस कर बांध लिए। मास्टरजी ने प्रगति के घुटनों से लेकर उसकी जांघों तक की मालिश शुरू की। वे उसकी जांघों की सब तरफ से मालिश कर रहे थे और उनके अंगूठे प्रगति की योनि के बहुत नज़दीक तक भ्रमण कर रहे थे। प्रगति को बहुत गुदगुदी हो रही थी और वह अपनी टाँगें इधर उधर हिलाने लगी। ऐसा करने से मास्टरजी के अंगूठों को और आज़ादी का मौका मिल गया और वे उसकी योनि के द्वार तक पहुँचने लगे। प्रगति ने शर्म से अपनी टांगें सीधी कर लीं और आधी सी करवट ले कर रुक गई। उसने अपनी टाँगें भी जोर से भींच लीं। मास्टरजी ने उसकी इस प्रतिक्रिया का सम्मान किया और कुछ देर तक कुछ नहीं किया। प्रगति की प्रतिक्रिया उसके कुंवारेपन और अच्छे संस्कारों का प्रतीक था और यह मास्टरजी को अच्छा लगा। उनकी नज़र में जो लड़की लज्जा नहीं करती उसके साथ सम्भोग में वह मज़ा नहीं आता। वे तो एक कमसिन, आकर्षक, गरीब, असहाय और कुंवारी लड़की का सेवन करने की तैयारी कर रहे थे और उन्हें लगता था वे मंजिल के काफी नज़दीक पहुँच गए हैं।
थोड़े विराम के बाद उन्होंने प्रगति को करवट से सीधा किया और बिना टांगें मोड़े उसकी मालिश करने लगे। उन्हें शायद नहीं पता था कि प्रगति की योनि फिर से गीली हो चली थी और इसीलिए प्रगति ने इसे छुपाने की कोशिश की थी। प्रगति ने अपने होंट दांतों में दबा रखे थे और वह किसी तरह अपने आप को क़ाबू में रख रही थी जिससे उसके मुँह से कोई ऐसी आवाज़ न निकल जाए जिससे उसको मिल रहे असीम आनंद का भेद खुल जाए। मास्टरजी ने स्थिति का समझते हुए प्रगति की जांघों पर से ध्यान हटाया। उन्होंने उसके पेट पर से चादर को ऊपर लपेट दिया और उसके पतले पेट पर तेल लगाने लगे। प्रगति को लग रहा था मानो उसका पूरा शरीर ही कामाग्नि में लिप्त हो गया हो। मास्टरजी जहाँ भी हाथ लगायें उसे कामुकता का आभास हो। यह आभास उसकी योनि को तर बतर करने में कसर नहीं छोड़ रहा था और प्रगति को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे !! उसे लगा थोड़ी ही देर में उसकी योनि के नीचे बिछी चादर गीली हो जायेगी। मास्टरजी को शायद उसकी इस दशा का भ्रम था। कुछ तो वे उसकी योनि देख भी चुके थे और कुछ वे प्रगति के शारीरिक संकेत भी पढ़ रहे थे। उन्हें पुराने अनुभव काम आ रहे थे।

प्रगति के पेट पर हाथ फेरने में मास्टरजी को बहुत मज़ा आ रहा था। इतनी पतली कमर और नरम त्वचा उनके हाथों को सुख दे रही थी। वे नाभि में अंगूठे को घुमाते और पेट के पूरे इलाके का निरीक्षण करते। उनकी आँखों के सामने प्रगति की योनि के इर्द गिर्द थोड़े बहुत घुंघराले बाल थे जो योनि को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। प्रगति ने अपनी टाँगें कस कर जोड़ रखी थीं जिससे योनि ठीक से नहीं दिख रही थी पर फिर भी मास्टरजी की नज़रों के सामने थी और उनकी नज़रें वहां से नहीं हट रही थीं।
अब मास्टरजी ने प्रगति की छाती पर से चादर हटाते हुए उसके सिर पर डाल दी। अब वह कुछ नहीं देख सकती थी और उसके हाथ भी चादर के नीचे क़ैद हो गए थे। मास्टरजी को यह व्यवस्था अच्छी लगी। इसकी उन्होंने योजना नहीं बनाईं थी। यह स्वतः ही हो गया था। मास्टरजी को लगा भगवान् भी उसका साथ दे रहे हैं।
मास्टरजी ने पहली बार प्रगति के स्तनों को तसल्ली से देखा। यद्यपि वे इतने बड़े नहीं थे पर मनमोहक गोलनुमा आकार था और उनके उभार में एक आत्मविश्वास झलकता था। उनके शिखर पर कथ्थई रंग के सिंघासन पर गौरवमई चूचियां विराजमान थीं जो सिर उठाए आसमान को चुनौती दे रही थीं।
प्रगति की आँखें तो ढकी थीं पर उसे अहसास था कि मास्टरजी उसके नंगे शरीर को घूर रहे होंगे। यह सोच कर उसकी साँसें और तेज़ हो रही थीं उसका वक्ष स्थल खूब ज्वार भाटे ले रहा था। मास्टरजी का मन तो उन चूचियों को मूंह में लेकर चूसने का कर रहा था पर आज मानो उनके लिए व्रत का दिन था। तेल हाथों में लगाकर उन्होंने प्रगति के स्तनों को पहली बार छुआ। इस बार उन्हें बिजली का झटका सा लगा। इतने सुडौल, गठीले और नरम वक्ष उन्होंने अभी तक नहीं छुए थे। उनका स्पर्श पा कर स्तन और भी कड़क हो गए और चूचियां तन कर और कठोर हो गईं।
जब उनकी हथेली चूचियों पर से गुज़रती तो वे दबती नहीं बल्कि स्वाभिमान में उठी रहतीं। मास्टरजी को स्वर्ग का अनुभव हो रहा था। इसी दौरान उन्हें एक और अनुभव हुआ जिसने उन्हें चौंका दिया, उनका लिंग अपनी मायूसी त्याग कर फिर से अंगडाई लेने की चेष्टा कर रहा था। मास्टरजी को अत्यंत अचरज हुआ। उन्होंने सोचा था कि दो बार के विस्फोट के बाद कम से कम १२ घंटे तक तो वह शांत रहेगा। पर आज कुछ और ही बात थी। उन्हें अपनी मर्दानगी पर गरूर होने लगा। चिंता इसलिए नहीं हुई क्योंकि प्रगति का सिर ढका हुआ था और वह कुछ नहीं देख सकती थी। मास्टरजी ने अपने लिंग को निकर में ही ठीक से व्यवस्थित किया जिस से उसके विकास में कोई बाधा न आये।
जब तक प्रगति की आँखें बंद थीं उन्हें अपने लंड की उजड्ड हरकत से कोई आपत्ति नहीं थी। वे एक बार फिर प्रगति के पेट के ऊपर दोनों तरफ अपनी टांगें करके बैठ गए और उसकी नाभि से लेकर कन्धों तक मसाज करने लगे। इसमें उन्हें बहुत आनंद आ रहा था, खासकर जब उनके हाथ बोबों के ऊपर से जाते थे। कुछ देर बाद मास्टरजी ने अपने आप को खिसका कर नीचे की ओर कर लिया और उसके घुटनों के करीब आसन जमा लिया। अपना वज़न उन्होंने अपनी टांगों पर ही रखा जिससे प्रगति को थकान या तकलीफ़ न हो।
इधर प्रगति को यह आँख मिचोली का खेल भा रहा था। उसे पता नहीं चलता था कि आगे क्या होने वाला है। यह रहस्य उसके आनंद को बढ़ा रहा था। मास्टरजी के मसाज से उसकी योनि में तीव्र चंचलता पनप रही थी और वह किसी तरह योनि की कामना पूरी करना चाहती थी। पर लज्जा और मास्टरजी के डर से लाचार थी। उस भोली को यह समझ नहीं आ रहा था कि मास्टरजी से डरने की तो कोई बात ही नहीं है। वे तो खुद इसी इच्छा पूर्ति के प्रयास में लगे हैं। लज्जा का अब सवाल कहाँ उठता है? वह इस से ज्यादा नंगी थोड़े ही हो सकती है, भला ! पर उसका विवेक तो वासना के भंवर में नष्ट हो गया था।
मास्टरजी को अपना नया आसन बहुत लाभदायक लगा। यहाँ से वे पैरों को छोड़ कर प्रगति के पूरे जिस्म को निहार भी सकते थे और ज़रुरत पड़ने पर छू भी सकते थे। उन्होंने जानबूझ कर अभी तक प्रगति के चरम गुप्तांगों पर हाथ नहीं लगाया था। यह सुख वे अंत में लेना चाहते थे। अब वे प्रगति की योनि और गुदा का मसाज करने वाले थे। इस विचार के आने से उनके लंड में फिर से रक्त भरने लगा और वह तीसरी बार उदयमान होने लगा।

मास्टरजी ने मसाज की दो क्रियाएँ शुरू कीं। एक तो वे अपने हाथ प्रगति की जाँघों से लेकर ऊपर कन्धों तक ले जाते और वापस आने पर अपने अंगूठों से उसकी योनि के चारों तरफ मसाज करते। पहली बार जब उन्होंने ऐसा किया तो प्रगति उछल पड़ी। उसकी योनि को आज तक किसी और ने नहीं छुआ था। अचानक मास्टरजी के हाथ लगने से उसको न केवल अत्यंत गुदगुदी हुई, उसका संतुलन और संयम भी लड़खड़ा गया। उसके उछलने से हालाँकि उसके चेहरे से चादर नहीं हटी पर मास्टरजी का तना हुआ लंड ज़रूर उसकी योनि और नाभि को रगड़ गया। यद्यपि लंड निकर के अन्दर था फिर भी उसका संपर्क प्रगति को निश्चित रूप से पता चला होगा।
मास्टरजी ने प्रगति से पूछा,”क्या हुआ प्रगति? मुझ से कोई गलती हुई क्या ?” प्रगति ने जवाब दिया,”नहीं मास्टरजी, मैं चौंक गई थी। आप इलाज जारी रखिये !”
यह कह कर वह फिर से लेट गई इस बार उसकी टांगें अपने आप थोड़ी खुल गई थीं। मास्टरजी बहुत खुश हुए। उन्हें पता था कि प्रगति पर काम वासना ने कब्ज़ा कर लिया है। वह अब उनके हाथों की कठपुतली बन कर रह गई है।
अब मास्टरजी निश्चिंत हो कर प्रगति की नाभि से लेकर उसकी योनि तक का मसाज करने लगे। उन्होंने धीरे धीरे योनि के बाहरी होटों को सहलाना शुरू किया और फिर अंदरूनी छोटे होंट सहलाने लगे। योनि का गीलापन उनको मसाज में मदद कर रहा था। प्रगति की देह किसी लहर की तरह झूमने लगी थी। थोड़ी थोड़ी देर में उसकी काया सिहर उठती और उसका जिस्म डोल जाता। अब मास्टरजी ने अपनी एक उंगली प्रगति की चूत में थोड़ी सी सरकाई। प्रगति के मुँह से एक आह निकल गई। वह कुछ भी आवाज़ नहीं निकालना चाहती थी फिर भी निकल गई। मास्टरजी योनिद्वार पर और उसके आधा इंच अन्दर तक मसाज करने लगे। प्रगति एक नियमित ढंग से ऊपर नीचे होने लगी। प्रकृति अपनी लीला दिखा रही थी। काम वासना के सामने किसी की नहीं चलती तो प्रगति तो निरी अबोध बालिका थी।
मास्टरजी अब एक उंगली लगभग पूरी अन्दर बाहर करने लगे। उनकी उंगली किसी हद तक ही अन्दर जा रही थी। प्रगति के कुंवारेपन का सबूत, उसकी झिल्ली, उंगली के प्रवेश का विरोध कर रही थी। मास्टरजी को इस अहसास से अत्यधिक संतोष हुआ। अगर प्रगति कुंवारी नहीं होती तो मास्टरजी को ज़रूर दुःख होता। अब तो उनके हर्ष की सीमा नहीं थी। वे एक कुंवारी योनि का उदघाटन करेंगे इस ख्याल से उनके लंड ने एक ज़ोरदार सलामी दी और जा कर मास्टरजी के पेट से सट गया।
मास्टरजी ने हाथ बढा कर सोफे पर से एक तकिया खींच लिया और प्रगति के चूतड़ों के नीचे रख दिया। इस से प्रगति की गांड भी अब मास्टरजी के अधीन हो गई। उन्होंने दोनों हाथों में तेल लगाकर एक हाथ से चूतड़ों पर मालिश शुरू की तथा दूसरे से उसकी चूत की। वे इस बात का ध्यान रख रहे थे कि उनकी उंगली से गलती से प्रगति की झिल्ली न भिद जाए। यह सौभाग्य तो वे अपने लंड को देना चाहते थे। इसलिए चूत की मालिश बहुत कोमलता से कर रहे थे। उन्होंने अपनी उंगलियाँ हौले हौले योनि के ऊपर स्थित मटर के पास ले गए जो कि स्त्री की कामाग्नि का सबसे संवेदनशील अंग होता है। उसे छूते ही प्रगति के मुँह से एक मादक चीख निकल गई। उसका अंग प्रत्यंग हिल गया और योनि में से २-३ बूँद द्रव्य रिस गया।
मास्टरजी ने उसके योनि-रस में उंगलियाँ भिगो लीं और उन गीली उँगलियों से उसकी गांड के छेद की परिक्रमा करने लगे। एक हाथ उनका मटर के दाने के आस पास घूम रहा था। प्रगति आनंद के हिल्लोरे ले रही थी। अब उसकी देह समुद्र की मौजों की तरह लहरें ले रही थी उसका ध्यान इस दुनिया से हट कर मानो ईश्वर में लीन हो गया था। अब उसे किसी की परवाह नहीं थी। वह बेशर्मी से मास्टरजी का सहयोग करने लगी थी और निडर हो कर आवाजें भी निकाल रही थी। उसकी योनि में सम्भोग की तीव्र ज्वाला भड़क उठी थी। उसका तड़पता शरीर भरपूर शक्ति के साथ मास्टरजी की उंगली को चूत में डलवाने के प्रयास में लगा था। और अगर मास्टरजी सावधान नहीं होते तो प्रगति मास्टरजी की उंगली से ही अपने कुंवारेपन को लुटवाने में कामयाब हो जाती।
मास्टरजी ने अवसर का लाभ उठाते हुए एक गीली उंगली प्रगति की गांड के छेद में दबा दी। जैसे ही उन्होंने दबाव डाला उनके दरवाज़े की घंटी बज गई। वे एकदम चौंक गए। उन्हें लगा उनके दरवाज़े की घंटी का बटन प्रगति की गांड में कैसे आ गया !! उधर प्रगति भी हड़बड़ा कर उठ गई और अपने कपड़े ढूँढने लगी। उसे अचानक शर्म सी आने लगी। मास्टरजी ने उसे इशारे से दूसरे कमरे में जाने को कहा और खुद कपड़े पहनते हुए कमरे को सँवारने लगे। इस दौरान उनका लंड भी मुरझा गया था जो कि अच्छा हुआ। जब कमरा ठीक हो गया वे दरवाज़े की तरफ जाने लगे पर कुछ सोचकर रुक गए और प्रगति के पास जा कर उसे पीछे के दरवाज़े से निकाल कर घर जाने को कह दिया। उन्होंने उसके कान में कल फिर इसी समय आने को भी कह दिया। प्रगति ने सर हिला कर हामी भर दी और चुपचाप घर को चल दी।
वे नहीं जानते थे कौन आया है और कितनी देर रुकेगा।

मास्टरजी के घर से चोरों की तरह निकल कर घर जाते समय प्रगति का दिल जोरों से धड़क रहा था। उसके मन में ग्लानि-भाव था। साथ ही साथ उसे ऐसा लग रहा था मानो उसने कोई चीज़ हासिल कर ली हो। मास्टरजी को वशीभूत करने का उसे गर्व सा हो रहा था। अपने जिस्म के कई अंगों का अहसास उसे नए सिरे से होने लगा था। उसे नहीं पता था कि उसका शरीर उसे इतना सुख दे सकता है। पर मन में चोर होने के कारण वह वह भयभीत सी घर की ओर जल्दी जल्दी कदमों से जा रही थी।
जैसे किसी भूखे भेड़िये के मुँह से शिकार चुरा लिया हो, मास्टरजी गुस्से और निराशा से भरे हुए दरवाज़े की तरफ बढ़े। उन्होंने सोच लिया था जो भी होगा, उसकी ख़ैर नहीं है।
“अरे भई, भरी दोपहरी में कौन आया है?” मास्टरजी चिल्लाये।
जवाब का इंतज़ार किये बिना उन्होंने दरवाजा खोल दिया और अनचाहे महमान का अनादर सहित स्वागत करने को तैयार हो गए। पर दरवाज़े पर प्रगति की छोटी बहन अंजलि को देखते ही उनका गुस्सा और चिड़चिड़ापन काफूर हो गया। अंजलि हांफ रही थी।
“अरे बेटा, तुम? कैसे आना हुआ?”
“अन्दर आओ। सब ठीक तो है ना?” मास्टरजी चिंतित हुए। उन्हें डर था कहीं उनका भांडा तो नहीं फूट गया….
अंजलि ने हाँफते हाँफते कहा,”मास्टरजी, पिताजी अचानक घर जल्दी आ गए। दीदी को घर में ना पा कर गुस्सा हो रहे हैं।”
मास्टरजी,”फिर क्या हुआ?”
अंजलि,”मैंने कह दिया कि सहेली के साथ पढ़ने गई है, आती ही होगी।”
मास्टरजी,”फिर?”
अंजलि,”पिताजी ने पूछा कौन सहेली? तो मैंने कहा मास्टरजी ने कमज़ोर बच्चों के लिए ट्यूशन लगाई है वहीं गई है अपनी सहेलियों के साथ।”
अंजलि,”मैंने सोचा आपको बता दूं, हो सकता है पिताजी यहाँ पता करने आ जाएँ।”
मास्टरजी,”शाबाश बेटा, बहुत अच्छा किया !! तुम तो बहुत समझदार निकलीं। आओ तुम्हें मिठाई खिलाते हैं।” यह कहते हुए मास्टरजी अंजलि का हाथ खींच कर अन्दर ले जाने लगे।
अंजलि,”नहीं मास्टरजी, मिठाई अभी नहीं। मैं जल्दी में हूँ। दीदी कहाँ है?” अंजलि की नज़रें प्रगति को घर में ढूंढ रही थीं।
मास्टरजी,”वह तो अभी अभी घर गई है।”
अंजलि,” कब? मैंने तो रास्ते में नहीं देखा…”
मास्टरजी,”हो सकता है उसने कोई और रास्ता लिया हो। जाने दो। तुम जल्दी से एक लड्डू खा लो।”
मास्टरजी ने अंजलि से पूछा,”तुम चाहती हो ना कि दीदी के अच्छे नंबर आयें? हैं ना ?”
अंजलि,”हाँ मास्टरजी। क्यों? ”
मास्टरजी,”मैं तुम्हारी दीदी के लिए अलग से क्लास ले रहा हूँ। वह बहुत होनहार है। क्लास में फर्स्ट आएगी।”
अंजलि,”अच्छा?”
मास्टरजी,”हाँ। पर बाकी लोगों को पता चलेगा तो मुश्किल होगी, है ना ?”
अंजलि ने सिर हिला कर हामी भरी।
मास्टरजी,”तुम तो बहुत समझदार और प्यारी लड़की हो। घर में किसी को नहीं बताना कि दीदी यहाँ पर पढ़ने आती है। माँ और पिताजी को भी नहीं…. ठीक है?”
अंजलि ने फिर सिर हिला दिया…..
मास्टरजी,”और हाँ, प्रगति को बोलना कल 11 बजे ज़रूर आ जाये। ठीक है? भूलोगी तो नहीं, ना ?”
अंजलि,”ठीक है। बता दूँगी…। ”
मास्टरजी,”मेरी अच्छी बच्ची !! बाद में मैं तुम्हें भी अलग से पढ़ाया करूंगा।” यह कहते कहते मास्टरजी अपनी किस्मत पर रश्क कर रहे थे। प्रगति के बाद उन्हें अंजलि के साथ खिलवाड़ का मौक़ा मिलेगा, यह सोच कर उनका मन प्रफुल्लित हो रहा था।
मास्टरजी,”तुम जल्दी से एक लड्डू खा लो !”
“बाद में खाऊँगी” बोलते हुए वह दौड़ गई।

अगले दिन मास्टरजी 11 बजे का बेचैनी से इंतज़ार रहे थे। सुबह से ही उनका धैर्य कम हो रहा था। रह रह कर वे घड़ी की सूइयां देख रहे थे और उनकी धीमी चाल मास्टरजी को विचलित कर रही थी। स्कूल की छुट्टी थी इसीलिये उन्होंने अंजलि को ख़ास तौर से बोला था कि प्रगति को आने के लिए बता दे। कहीं वह छुट्टी समझ कर छुट्टी न कर दे।
वे जानते थे 10 से 4 बजे के बीच उसके माँ बाप दोनों ही काम पर होते हैं। और वे इस समय का पूरा पूरा लाभ उठाना चाहते थे। उन्होंने हल्का नाश्ता किया और पेट को हल्का ही रखा। इस बार उन्होंने तेल मालिश करने की और बाद में रति-क्रिया करने की ठीक से तैयारी कर ली। कमरे को साफ़ करके खूब सारी अगरबत्तियां जला दीं, ज़मीन पर गद्दा लगा कर एक साफ़ चादर उस पर बिछा दी। तेल को हल्का सा गर्म कर के दो कटोरियों में रख लिया। एक कटोरी सिरहाने की तरफ और एक पायदान की तरफ रख ली जिससे उसे सरकाना ना पड़े। साढ़े १० बजे वह नहा धो कर ताज़ा हो गए और साफ़ कुर्ता और लुंगी पहन ली। उन्होंने जान बूझ कर चड्डी नहीं पहनी।
उधर प्रगति को जब अंजलि ने मास्टरजी का संदेशा दिया तो वह खुश भी हुई और उसके हृदय में एक अजीब सी कूक भी उठी। उसे यह तो पता चल गया था कि मास्टरजी उसे क्या “पढ़ाने” वाले हैं। उसके गुप्तांगों में कल के अहसासों के स्मरण से एक बिजली सी लहर गई। उसने अपने हाव भाव पर काबू रखते हुए अंजलि को ऐसे दर्शाया मानो कोई ख़ास बात नहीं है। बोली,”ठीक है…. देखती हूँ …। अगर घर का काम पूरा हो गया तो चली जाऊंगी।”
अंजलि,” दीदी तुम काम की चिंता मत करो। छुटकी और मैं हैं ना …। हम सब संभाल लेंगे। तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो।”
उस बेचारी को क्या पता था कि प्रगति को “काम” की ही चिंता तो सता रही थी। छुटकी, जिसका नाम दीप्ति था, अंजलि से डेढ़ साल छोटी थी। तीनों बहनें मिल कर घर का काम संभालती थीं और माँ बाप रोज़गार जुटाने में रहते थे।
प्रगति,”तुम बाद में माँ बापू से शिकायत तो नहीं करोगे?”
अंजलि,”हम उन्हें बताएँगे भी नहीं कि तुम मास्टरजी के पास पढ़ने गई हो। हमें मालूम है बापू नाराज़ होंगे…। यह हमारा राज़ रहेगा, ठीक है !!”
प्रगति को अपना मार्ग साफ़ होता दिखा। बोली,”ठीक है, अगर तुम कहती हो तो चली जाती हूँ। ”
“पर तुम्हें भी हमारा एक काम करना होगा……” अंजलि ने पासा फेंका।
“क्या ?”
“मास्टरजी मुझे मिठाई देने वाले थे पर पिताजी के डर से मैंने नहीं ली। वापस आते वक़्त उन से मिठाई लेती आना।”
“ओह, बस इतनी सी बात…..। ठीक है, ले आऊँगी।” तुम ज़रा घर को और माँ बापू को संभाल लेना।”
दोनों बहनों ने साज़िश सी रच ली। छुटकी को कुछ नहीं मालूम था। दोनों ने उसे अँधेरे में रखना ही उचित समझा। बहुत बातूनी थी और उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता था।
प्रगति अब तैयारी में लग गई। घर का ज़रूरी काम जल्दी से निपटाने के बाद नहाने गई। उसके मन में संगीत फूट रहा था। वह नहाते वक़्त गाने गुनगुना रही थी। अपने जिस्म और गुप्तांगों को अच्छे से रगड़ कर साफ़ किया, बाल धोये और फिर साफ़ कपड़े पहने। उसे मालूम था मालिश होने वाली है सो चोली और चड्डी के ऊपर एक ढीला ब्लाऊज और स्कर्ट पहन ली। अहतियात के तौर पर स्कूल का बस्ता भी साथ ले लिया जब कि वह जानती थी इसकी कोई आवश्यकता नहीं होगी।
ठीक पौने ग्यारह बजे वह मास्टरजी के घर के लिए चल दी।

प्रगति सुनिश्चित समय पर मास्टरजी के घर पहुँच गई। वे उसकी राह तो बाट ही रहे थे सो वह घंटी बजाती उसके पहले ही उन्होंने दरवाजा खोल दिया। एक किशोर लड़के की भांति, जो कि पहली बार किसी लड़की को मिल रहा हो, मास्टरजी ने फ़ुर्ती से प्रगति को बांह से पकड़ कर घर के अन्दर खींच लिया। दरवाजा बंद करने से पहले उन्होंने बाहर इधर उधर झाँक के यकीन किया कि किसी ने उसे अन्दर आते हुए तो नहीं देखा। जब कोई नहीं दिखा तो उन्होंने राहत की सांस ली। अब उन्होंने घर के दरवाज़े पर बाहर से ताला लगा दिया और पिछले दरवाज़े से अन्दर आ गए। उसे भी उन्होंने कुंडी लगा दी और घर के सारे खिड़की दरवाजों के परदे बंद कर लिए।
प्रगति को उन्होंने पानी पिलाया और सोफे पर बैठेने का इशारा करते हुए रसोई में चले गए। अब तक दोनों में कोई बातचीत नहीं हुई थे। दोनों के मन में रहस्य, चोरी, कामुकता और डर का एक विचित्र मिश्रण हिंडोले ले रहा था। मास्टरजी तो बिलकुल बच्चे बन गए थे। प्रगति के चेहरे पर फिर भी एक शालीनता और आत्मविश्वास झलक रहा था। कल के मुकाबले आज वह मानसिक रूप से ज्यादा तैयार थी। उसके मन में डर कम और उत्सुकता ज़्यादा थी।
मास्टरजी रसोई से शरबत के दो ग्लास ले कर आये और प्रगति की तरफ एक ग्लास बढ़ाते हुए दूसरे ग्लास से खुद घूँट लेने लगे। प्रगति ने ग्लास ले लिया। गर्मी में चलकर आने में उसे प्यास भी लग गई थी। शरबत ख़त्म हो गया। दोनों ने कोई बातचीत नहीं की। दोनों को शायद बोलने के लिए कुछ सूझ नहीं रहा था। दोनों के मन में आगे जो होने वाला है उसकी शंकाएँ सर्वोपरि थीं।
मास्टरजी ने अंततः चुप्पी तोड़ी,”कैसी हो ?”
प्रगति सिर नीचा कर के चुप रही।
“मालिश के लिए तैयार हो?”
प्रगति कुछ नहीं बोली।
“मैं थोड़ी देर में आता हूँ, तुम मालिश के लिए तैयार होकर लेट जाओ।” यह कहकर मास्टरजी बाथरूम में चले गए।
प्रगति ने अपने कपड़े उतार कर सोफे पर करीने से रख दिए और चड्डी और चोली पहने ज़मीन पर गद्दे पर लेट गई और चादर से अपने आप को ढक लिया। अपने दोनों हाथ चादर के बाहर निकाल कर दोनों तरफ रख लिए।
मास्टरजी, वापस आये तो बोले,” अरे तुम तो सीधी लेटी हो !! चलो उल्टी हो जाओ।”
प्रगति चादर के अन्दर ही अन्दर पलटने की नाकाम कोशिश करने लगी तो मास्टरजी ने बोला,”प्रगति, अब मुझसे क्या शर्माना। चलो जल्दी से पलट जाओ।”
प्रगति ने चादर एक तरफ करके करवट ले ली और उल्टी लेट गई। लेट कर चादर ऊपर लेने का प्रयास करने लगी तो मास्टरजी ने चादर परे करते हुए कहा,”अब इसकी कोई ज़रुरत नहीं है। ”
“और इनकी भी कोई ज़रुरत नहीं है।” कहते हुए उन्होंने प्रगति की चड्डी नीचे खींच दी और टांगें उठा कर अलग कर दी। फिर चोली का हुक खोल कर प्रगति के पेट के नीचे हाथ डाल कर उसे ऊपर उठा लिया और चोली खींच कर हटा दी। अब प्रगति बिलकुल नंगी हो गई थी। हालाँकि वह उल्टी लेटी हुई थी, उसने अपने हाथों से अपनी आँखें बंद कर लीं उसके नितम्बों की मांसपेशियाँ स्वतः ही कस गईं।
मास्टरजी को प्रगति की यही अदाएं लुभाती थीं। उन्होंने उसकी पीठ और सिर पर हाथ फेर कर उसका हौसला बढ़ाया और उसकी मालिश करने में जुट गए।
गर्म तेल की मालिश से प्रगति को बहुत चैन मिल रहा था। कल के मुकाबले आज मास्टरजी ज़्यादा निश्चिंत हो कर हाथ चला रहे थे। उन्हें प्रगति के भयभीत हो कर भाग जाने का डर नहीं था क्योंकि आज तो वह सब कुछ जानते हुए भी अपने आप उनके घर आई थी। मतलब, उसे भी इस में मज़ा आ रहा होगा। मास्टरजी ने सही अनुमान लगाया।
थोड़ी देर के बाद मास्टरजी ने प्रगति के ऊपर घुड़सवारी सा आसन जमा लिया और अपना कुर्ता उतार दिया। अब वे सिर्फ लुंगी पहने हुए थे। लुंगी को उन्होंने घुटनों तक चढ़ा लिया था अपर उनका लिंग अभी भी लुंगी में छिपा था।
इस अवस्था में उन्होंने प्रगति के पिछले शरीर पर ऊपर से नीचे, यानि कन्धों से कूल्हों तक मालिश शुरू की। जब वे आगे की तरफ जाते तो जान बूझ कर अपनी लुंगी से ढके लिंग को प्रगति के चूतड़ों से छुला देते। कपड़े के छूने से प्रगति को जहाँ गुलगुली होती, मास्टरजी के लंड की रगड़ से उसे वहीं रोमांच भी होता। मास्टरजी को तो अच्छा लग ही रहा था, प्रगति को भी मज़ा आ रहा था। मास्टरजी ने अपने आसन को इस तरह तय किया कि जब वे आगे को हाथ ले जाएँ, उनका लंड प्रगति के चूतड़ों के बीच में, किसी हुक की मानिंद, लग जाये और उन्हें और आगे जाने से रोके। एक दो ऐसे वारों के बाद प्रगति ने अपनी टाँगें स्वयं थोड़ी खोल दीं जिससे उनका लंड अब प्रगति की गांड के छेद पर आकर रुकने लगा। जब ऐसा होता, प्रगति को सरसराहट सी होती और उसके रोंगटे से खड़े होने लगते। उधर मास्टरजी को प्रगति की इस व्यवस्था से बड़ा प्रोत्साहन मिला और उन्होंने जोश में आते हुए अपनी लुंगी उतार फेंकी।

अब वे दोनों पूरे नंगे थे। मास्टरजी ने प्रगति के हाथ उसकी आँखों पर से हटा कर बगल में कर दिए। अब वह एक तरफ से कुछ कुछ देख सकती थी। मास्टरजी ने अपने वार जारी रखे जिसके फलस्वरूप उनका लंड तन कर प्रबल और विशाल हो गया और प्रगति की गांड पर व्यापक प्रभाव डालने लगा।
मास्टरजी आपे से बाहर नहीं होना चाहते थे सो उन्होंने झट से अपने आप को नीचे की तरफ सरका लिया और प्रगति की टांगों पर ध्यान देने लगे। उनके हाथ प्रगति की जांघों के बीच की दरार में खजाने को टटोलने लगे। प्रगति से गुदगुदी सहन नहीं हो रही थी। वह हिलडुल कर बचाव करने लगी पर मास्टरजी के हाथों से बच नहीं पा रही थी। जब कुछ नहीं कर पाई तो करवट ले कर सीधी हो गई। अपनी टाँगें और आँखें बंद कर लीं और हाथों से स्तन ढक लिए। मास्टरजी इसी फिराक़ में थे। उन्होंने प्रगति के पेट, पर हाथ फेरते हुए प्रगति के हाथ उसके वक्ष से हटा दिए।
तेल लगा कर अब वे उसकी छाती की मालिश कर रहे थे। प्रगति के उरोज दमदार और मांसल लग रहे थे। उसकी चूचियां उठी हुई थीं और वह जल्दी जल्दी साँसें ले रही थी। मास्टरजी का लंड प्रगति की नाभि के ऊपर था और कभी कभी उनके लटके अंडकोष उसकी योनि के ऊपरी भाग को लग जाते। प्रगति बेचैन हो रही थी। उसमें वासना की अग्नि प्रज्वलित हो चुकी थी और उसकी योनि प्रकृति की अपार गुरुत्वाकर्षण ताक़त से मजबूर मास्टरजी के लिंग के लिए तृषित हो रही थी। सहसा उसकी योनि से द्रव्य पदार्थ रिसने लगा।
प्रगति की टांगें अपने आप खुल गईं और मास्टरजी के लिंग के अभिवादन को तत्पर हो गईं। मास्टरजी को समझ आ रहा था। पर वे जल्दी में नहीं थे। वे न केवल अपने लिए इस अनमोल अवसर को यादगार बनाना चाहते थे वे प्रगति के लिए भी उसके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षण को ज़्यादा से ज़्यादा आनंददायक बनाना चाहते थे। वे उसकी लालसा और बढ़ाना चाहते थे।
उन्होंने आगे खिसक कर प्रगति की आँखों पर पुच्ची की और फिर एक एक करके उसके चेहरे के हर हिस्से पर प्यार किया। जब तक उनके लब प्रगति के अधरों को लगे, प्रगति मचल उठी थी और उसने पहली बार कोई हरकत करते हुए मास्टरजी को अपनी बाँहों में ले लिया और ज़ोर से उनका चुम्बन कर लिया। जीवन में पहली बार उसने ऐसा किया था। ज़ाहिर था उसे इस कला में बहुत कुछ सीखना था।
मास्टरजी ने उसे चुम्बन सिखाने के लिए उसके मुँह में अपनी ज़ुबान डाली और उसके मुँह का निरीक्षण करने लगे। थोड़ी देर बाद, एक अच्छी शिष्या की तरह उसने भी अपनी जीभ मास्टरजी के मुख में डाल कर इधर उधर टटोलना शुरू किया। अब मास्टरजी प्रगति के ऊपर लेट गए थे और उनका सीना प्रगति के भरे और उभरे हुए उरोजों को दबा कर सपाट करने का बेकार प्रयत्न कर रहा था। प्रगति की चूचियां मास्टरजी के सीने में सींग मार रहीं थीं। मास्टरजी ने कुछ ही देर में प्रगति को चुम्बन कला में महारत दिला दी। अब वह जीभ चूसना, जीभ लड़ाना व मुँह के अन्दर के हिस्सों की जीभ से तहकीकात करने में निपुण लग रही थी।
मास्टरजी ने अगले पाठ की तरफ बढ़ते हुए अपने आप को नीचे सरका लिया और प्रगति के स्तनों को प्यार करने लगे। उसके बोबों की परिधि को अपनी जीभ से रेखांकित करके उन्होंने दोनों स्तनों के हर पहलू को अच्छे तरह से मुँह से तराशा। फिर जिस तरह कुत्ते का पिल्ला तश्तरी से दूध पीता है वे उसकी चूचियां लपलपाने लगे। गुदगुदी के कारण प्रगति लेटी लेटी उछलने लगी जिससे उसके स्तन मास्टरजी के मुँह से और भी टकराने लगे। थूक से बोबे गीले हो गए थे और इस ठंडक से उसे सिरहन सी हो रही थी।
अब मास्टरजी ने थोड़ा और नीचे की ओर रुख किया। उसके पेट और नाभि को चाटने लगे। प्रगति कसमसा रही थी और गुलगुली से बचने की कोशिश कर रही थी। कभी कभी अपने हाथों से उनके सिर को रोकने की चेष्टा भी करती थी पर मास्टरजी उसके हाथों को प्यार से अलग करके दबोच लेते थे।
अब उनका मुँह प्रगति की योनि के बहुत करीब आ गया था। उसकी योनि पानी के बाहर तड़पती मछली के होटों की तरह लपलपा रही थी। मास्टरजी ने अपनी जीभ से उसकी योनि के मुकुट मटर की परिक्रमा लगाई तो प्रगति एक फ़ुट उछल पड़ीं मानो घोड़ी दुलत्ती मार रही हो। मास्टरजी ने घोड़ी को वश में करने के लिए अपनी पकड़ मज़बूत की और जीभ से उसके भग-शिश्न को चाटने लगे। प्रगति पूरी ताक़त से अपने आप को मास्टरजी की गिरफ्त से छुटाने का प्रयास कर रही थी। मास्टरजी ने रहम करते हुए पकड़ ढीली की और अपने जीभ रूपी खोज उपकरण को प्रगति की योनि के ऊपर लगा दिया। प्रगति की दशा आसमान से गिरे खजूर में अटके सी हो रही थी।
उसका बदन छटपटा रहा था। उसकी उत्तेजना चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी।
मास्टरजी ने कुछ देर योनि से छेड़छाड़ के बाद अपनी जीभ योनि के अन्दर डाल दी। बस, प्रगति का संयम टूट गया और वह आनंद से कराहने लगी।
मास्टरजी जान बूझ कर उसकी योनि का रस पान करना चाहते थे जिससे बाद में वे प्रगति से अपने लिंग का मुखाभिगम आसानी से करवा पायें। जो सुख वे प्रगति को दे रहे हैं, सूद समेत वापस लेना चाहते थे।
प्रगति की योनि तो पहले से ही भीगी हुई थी, मास्टरजी की लार से और भी गीली हो गई। अब मास्टरजी को लगा कि वह घड़ी आ गई है जिसकी उन्हें इतनी देर से प्रतीक्षा थी।

मास्टरजी जान बूझ कर उसकी योनि का रस पान करना चाहते थे जिससे बाद में वे प्रगति से अपने लिंग का मुखाभिगम आसानी से करवा पायें। जो सुख वे प्रगति को दे रहे हैं, सूद समेत वापस लेना चाहते थे।
प्रगति की योनि तो पहले से ही भीगी हुई थी, मास्टरजी की लार से और भी गीली हो गई। अब मास्टरजी को लगा कि वह घड़ी आ गई है जिसकी उन्हें इतनी देर से प्रतीक्षा थी।
उन्होंने ने प्रगति से पूछा,”कैसा लग रहा है?”
प्रगति क्या कहती, चुप रही।
मास्टरजी,”भई चुप रहने से मुझे क्या पता चलेगा…। अच्छा, यह बताओ कोई तकलीफ तो नहीं हो रही?”
प्रगति,”जी नहीं !”
मास्टरजी,”चलो अच्छा है, तकलीफ नहीं हो रही। तो अच्छा लग रहा है या नहीं?”
प्रगति चुप रही और अपनी आँखें ढक लीं।
मास्टरजी,”तुम तो बहुत शरमा रही हो। शरमाने से काम नहीं चलेगा। मैं इतनी मेहनत कर रहा हूँ, यह तो बताओ कि मज़ा आ रहा है या नहीं?”
यह पूछते वक़्त मास्टरजी ने अपना लंड प्रगति की चूत से सटा दिया और हल्का हल्का हिलाने लगे। उनके हाथ प्रगति के पेट और उरोजों पर घूम रहे थे।
“जी, मज़ा आ रहा है।” प्रगति ने सच उगल दिया।
मास्टरजी,”तुम बहुत अच्छी लड़की हो। तुम चाहो तो इससे भी ज़्यादा मज़ा लूट सकती हो….। ”
प्रगति चुप रही पर उसका रोम रोम जो कह रहा था वह मास्टरजी को साफ़ सुनाई दे रहा था। फिर भी वे उसके मुँह से सुनना चाहते थे।
मास्टरजी,”क्या कहती हो?”
“जैसा आप ठीक समझें।” प्रगति ने लाज शर्म त्यागते हुए कह ही दिया।
मास्टरजी,”मैं तो इसे ठीक समझता ही हूँ पर तुम्हारी सहमति भी तो जरूरी है। बोलो और मज़े लेना चाहती हो?”
प्रगति ने हाँ मैं सिर हिला दिया।
मास्टरजी,”ऐसे नहीं। जो भी चाहती हो बोल कर बताओ !”
प्रगति,”जी, और मज़े लेना चाहती हूँ।”
मास्टरजी,” शाबाश। हो सकता है इसमें शुरू में थोड़ी पीड़ा हो। बोलो मंज़ूर है ?”
प्रगति,”जी मंज़ूर है।”
मास्टरजी ने अपना लंड प्रगति के योनि द्वार पर लगा ही रखा था। जैसे ही उसने अपनी मंजूरी दी, उन्होंने हल्का सा धक्का लगाया। चूंकि प्रगति की चूत पूरी तरह गीली थी और वह मानसिक व शारीरिक रूप से पूर्णतया उत्तेजित थी, मास्टरजी का औसत माप का लिंग उसकी तंग योनि में थोड़ा घुस गया। प्रगति के मुँह से एक हिचकी सी निकली और उसने पास रखे मास्टरजी के बाजुओं को कस कर पकड़ लिया।
मास्टरजी उसे कम से कम दर्द देकर उसका कुंवारापन लूटना चाहते थे। मास्टरजी ने आश्वासन के तौर पर लंड बाहर निकाला। प्रगति की पकड़ थोड़ी ढीली हुई और उसने एक लम्बी सांस छोड़ी। जैसे ही प्रगति ने सांस छोड़ी, मास्टरजी ने एक और वार किया। इस बार लंड थोड़ा और अन्दर गया पर प्रगति की कुंवारी योनि को नहीं भेद पाया। उसकी झिल्ली पहरेदार की तरह उनके लंड का रास्ता रोके खड़ी थी। प्रगति को इतना अचम्भा नहीं हुआ जितना पहली बार हुआ था फिर भी शायद वह वार के लिए तैयार नहीं थी। उसके मुँह से एक हल्की सी चीख निकल गई। मास्टरजी ने फिर से लंड बाहर निकाल लिया पर योनिद्वार पर ही रखा।
मास्टरजी ने उसके चूतड़ों को सहलाया और घुटनों पर पुच्ची की। हालाँकि वे उसे कम से कम दर्द देना चाहते थे पर वे जानते थे कि कुंवारेपन की झिल्ली कई बार कठोर होती है और आसानी से नहीं टूटती। शायद प्रगति की झिल्ली भी ऐसी ही थी। वे उसका ध्यान बँटा कर अचानक वार करना चाहते थे जिससे उसे कम से कम दर्द हो। जैसे डॉक्टर जब बच्चों को इंजेक्शन लगता है तो इधर उधर की बातों में लगा कर झट से सुई अन्दर कर देता है। नहीं तो बच्चे बहुत आनाकानी करते हैं और रोते हैं।

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