प्रगति की कुंवारी गांड part 3

आगे जाते वक़्त उनका सुपाड़ा प्रगति की ठोड़ी तक जाता। मास्टरजी के लौड़े में गर्माइश आ रही थी और वह सूजने लग रहा था। उन्होंने अपने आप को थोड़ा और ऊपर सरकाया जिससे आगे जाते वक़त अब उनका लंड प्रगति के होटों तक पहुँच रहा था। पर क्योंकि प्रगति का सिर सीधा था वह उसे मुँह में नहीं ले पा रही थी। उसने पास रखे तकिये को सिर के नीचे रख लिया और अगली बार जब लंड आगे को आया प्रगति के मुँह ने सुपाड़े को पकड़ लिया। प्रगति ऐसे मुस्कराई जैसे कोई खेल जीत लिया हो। मास्टरजी ने जब पीछे की तरफ लंड खींचा तो प्रगति ने आसानी से जाने नहीं दिया। मास्टरजी को यह खेल पसंद आया।
मर्दों को सेक्स के दौरान अगर कोई बात अच्छी लगती है तो उसका सीधा असर उनके लंड पर पड़ता है और वह और कड़क हो जाता है। ऐसा ही मास्टरजी के साथ भी हुआ। उनका लंड अब सम्भोग के लिए तैयार हो गया।
मास्टरजी ने नीचे सरक कर लंड को योनि मुख पर रखा और अन्दर की तरफ दबाने लगे। हालाँकि प्रगति की चूत सम्भोग की आकांक्षा में भीगी हुई थी फिर भी अभी वह सम्भोग के लिए नई सी ही थी, अतः लिंग प्रवेश आसान नहीं था। मास्टरजी धीरे धीरे जोर लगाते रहे और छोटे छोटे धक्के मारते रहे। प्रगति भी उनका साथ दे रही थी और लिंग प्रवेश के लिए आतुर थी। उन दोनों का संयुक्त प्रयास काम आया और धीरे धीरे लंड अन्दर बढ़ता गया।
कुछ देर में पूरा लंड अन्दर बाहर होने लगा। मास्टरजी को प्रगति की संकरी पर चिकनाई-युक्त चूत चोदने में बड़ा मज़ा आ रहा था। उनके लंड की छड़ को अच्छा घर्षण मिल रहा था और लंड के हर हिस्से को चूत की दीवारों से नर्म रगड़ मिल रही थी। जब लंड बाहर आता तो चूत मानो बंद हो जाती जब अन्दर जाता तो हर बार ऐसा लगता जैसे कोई विघ्न पार करके प्रवेश कर रहा है। इस अतिरिक्त घिसाव से मैथुन सुख में वृद्धि हो रही थी। मास्टरजी ने कुछ देर चोदने के बाद एक बार लंड पूरा अन्दर कर दिया और झुक कर प्रगति की पीठे के नीचे हाथ रख कर उसे उठा कर बिठा लिया और खुद अपने टांगें मोड़ कर पीछे हो कर पीठ के बल लेट गए।
अब प्रगति उनके ऊपर बैठी हुई थी, लंड उसके अन्दर था और उसके घुटने बिस्तर पर टिके हुए थे। मास्टरजी के संकेत देखते हुए उसने अपने कूल्हे ऊपर नीचे करके चुदवाना शुरू कर दिया। उसे ऐसा लग रहा था मानो वह चुदवा नहीं रही बल्कि मास्टरजी को चोद रही हो !! वह अपनी गति से और जितना मन कर रहा था उतना ऊपर नीचे हो रही थी। स्थिति उसके नियंत्रण में थी और यह सञ्चालन उसे अच्छा लग रहा था।
जब थोड़ा थक गई तो घुटने ऊपर करके अपने पांव के तलवे बिस्तर पर टिका दिए और उनके सहारे उठ्ठक-बैठक करने लगी। मास्टरजी का तना लंड जब अन्दर जाता तो उसे अपने शरीर में परिपूर्णता महसूस होती। जब बाहर आता तो अपने आप को अधूरी महसूस करती। मास्टरजी ने उसकी पीठ के पीछे हाथ रख कर उसे अपने सीने की तरफ खींच लिया जिससे उसके स्तन और जुल्फें उनके सीने को रिझाने और गुदगुदाने लगे। प्रगति की घुड़सवारी जारी थी। प्रगति जोश में आ रही थी और उसने अपनी गति और उछाल दोनों बढा दीं। कई बार ऐसे में लंड मुड़ सकता है और उसे चोट भी आ सकती है। इस बात का ध्यान रखते हुए उन्होंने प्रगति को रफ़्तार धीमे करना का इशारा किया और थोड़ी देर बाद रुकने को कहा।
प्रगति रुक गई और उनके लंड को पूरा अन्दर रखते हुए ऊपर ही बैठी रही। अब मास्टरजी ने एक बड़ी मजेदार बात की। उन्होंने प्रगति को बिना लंड बाहर निकाले लंड की धुरी पर घूमने को कहा। प्रगति को समझ नहीं आया कि क्या करना है, तो मास्टरजी ने उसका बायाँ पांव थोड़ी और बाईं तरफ सरकाया और उसके दाहिने पांव को पेट के ऊपर से लाते हुए बाएं पांव के करीब रख दिया। ऐसा करने से प्रगति लंड पर बैठी बैठी एक चौथाई बाईं ओर घूम गई। अब उन्होंने प्रगति को एक दो बार उठ्ठक-बैठक लगाने को कहा जिससे लंड शिथिल न हो जाये और एक बार फिर उसको बाईं ओर पांव सरकाते हुए लंड की धुरी पर घूमने को कहा। प्रगति ने अपने बायाँ पांव ध्यान से मास्टरजी की बाईं जांघ की बाएं ओर रख दिया और अपना दाहिना पांव उनकी दाहिने जांघ के दाहिनी ओर। इस अवस्था में उसकी पीठ मास्टरजी की तरफ हो गई और वह उल्टी घुड़सवारी करने लगी। मास्टरजी ने उसकी कमर पकड़ रखी थी और वे उसकी उठ्ठक-बैठक से ताल मिला कर अपनी कमर ऊपर नीचे कर थे। इस तरह दोनों ही चुदाई में में लग गए।
प्रगति की चूत को इस आसन में मास्टरजी का लंड एक नई दिशा में संपर्क कर रहा था। जिस जगह पर सुपाड़ा अब दबाव डाल रहा था वहां पहले नहीं डाल रहा था। प्रगति के लिए यह एक नई अनुभूति थी। मास्टरजी को भी इस आसन में ज्यादा घर्षण लग रही थी। प्रगति की चूत इस नए आभास के कारण और भीगी हो गई और लंड का यातायात आसान हो गया।मास्टरजी अब उठकर प्रगति के पीछे बैठ गए और अपनी टांगें मोड़ कर पीछे कर लीं। लंड को बाहर निकाले बिना प्रगति को आगे की ओर धकेल दिया और उसे हाथों और घुटने के बल कुतिया आसन में पहुंचा दिया। मास्टरजी खुद घुटनों के बल हो गए और कोई विराम दिए बिना पीछे से चोदना जारी रखा।

मास्टरजी ने प्रगति की कमर पकड़ रखी थी और आगे की ओर धक्का मारते वक़्त उसकी कमर को पीछे की तरफ खींच लेते थे। जिससे लंड बहुत गहराई तक अन्दर चला जाता। पीछे आते वक़्त लंड को लगभग पूरा बाहर आने देते और फिर पूरे जोर और जोश के साथ पूरा अन्दर घुसा देते। जब दोनों के बदन ज़ोर से टकराते तो एक ताली जैसी आवाज़ होती। दोनों को यह आवाज़ अच्छी लग रही थी। इस आवाज़ को कायम रखने के लिए दोनों ज़ोर ज़ोर से लय-ताल में एक दूसरे के बरखिलाफ वार कर रहे थे। एक थक जाता तो दूसरा चालू हो जाता।
थप थप थप की आवाज़ से कमरा गूंजने लगा और इस आवाज़ में प्रगति के करहाने की और मास्टरजी के चिल्लाने की आवाजें भी शामिल हो गईं। मास्टरजी को बहुत मज़ा आ रहा था। आम तौर पर तो इतनी कसी हुई चूत को चोदने में मास्टरजी 4-5 मिनट से ज्यादा नहीं लगा पाते थे, पर आज क्योंकि वे दो बार पहले ही वीर-गति को प्यारे हो चुके थे, उनका लंड विस्फोट के नजदीक नहीं था। एक कसी हुई चूत का घर्षण उसे उत्तेजित हालत में रखने में कामयाब हो रहा था। नतीजा यह था कि मास्टरजी करीब आधे घंटे से प्रगति को चोद रहे थे और लिंग महाराज अपनी ऐंठ छोड़ ही नहीं रहे थे।
उनका लंड ना ही शिथिल हो रहा था और ना ही फट रहा था, बस एक पिस्टन की तरह प्रगति के चूत रूपी सिलेंडर में एक स्टीम इंजन की तरह यातायात कर रहा था। प्रगति की उत्तेजना का सैलाब फूटने वाला हो रहा था। मास्टरजी उसकी मटर के पास उंगली जो घुमाने लगे थे। उसकी आवाजें असभ्य होती जा रहीं थीं और मास्टरजी को ज़ोर से चोदने के लिए प्रेरित कर रहीं थीं। आखिर प्रगति का बाँध टूट ही गया और वह कंपकंपाने लगी, उसने मास्टरजी का हाथ अपनी मटर से दूर हटा दिया और मास्टरजी के चोदने को भी विराम देना पड़ा। वह अनियंत्रित तरह से हिलने लगी थे और उसका जिस्म का हर हिस्सा संवेदना से ओत प्रोत हो गया था। कहीं भी स्पर्श करने से उसे अत्यधिक संवेदना का अहसास होता। मास्टरजी ने उसकी हालत का आदर करते हुए लंड बाहर निकाल लिया और एक तरफ बैठ कर उसका हाथ थाम लिया। थोड़ी देर में प्रगति होशोहवास में आ गई।
उसको पहली बार लंड के घर्षण से चरमोत्कर्ष की प्राप्ति हुई थी जो बहुत कम लड़कियों को नसीब होती है। आम तौर पर मर्द जल्दी ही पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है और स्त्री अधूरी प्यास के साथ रह जाती है। कुछ लोग तो लड़की को बाद में उंगली से चरम आनंद का स्वाद चखा देते हैं पर कई स्वार्थी आदमी ऐसा नहीं करते। ऐसे लोगों के साथ लड़कियों को ज्यादा मज़ा नहीं आता और मौका पाने पर वे उन्हें छोड़ कर कोई निस्वार्थी आदमी को ढूंढ लेती हैं। आदमियों को चाहिए कि अपना मज़ा लूटने के बाद यकीन करें कि लड़की भी निहाल हुई है या नहीं। अगर नहीं, तो उसे हाथ से मैथुन करके चरम सीमा तक ले जाना चाहिए।
जब तक प्रगति होश में आई, लंड जनाब कुछ नतमस्तक हो गए थे। प्रगति ने लंड को फिर से सुलगाने के लिए अपने मुँह का प्रयोग किया और जीभ के कुशल इस्तेमाल से उसे शीघ्र ही उजागर कर दिया। प्रगति लंड में शक्ति फूँक कर मास्टरजी की तरफ देखने लगी कि उन्हें कौन सा आसन चाहिए। मास्टरजी ने निर्णायक राउंड के लिए सबसे आरामदेह आसन चुना और प्रगति को पीठ के बल लेटने का आदेश दिया और स्वयं उसके ऊपर दंड पेलने के लिए आ गए। उन्होंने निर्णय किया कि वे इसी आसन में उसे तब तक चोदते रहेंगे जब तक अपने फव्वारे पर काबू रहता है। अब वे आसन नहीं बदलेंगे।
इस निश्चय के साथ वे सरल स्वभाव से प्रगति को चोदने लगे। हालाँकि उनकी गति धीमी थी पर वार गहरा था। हर बार पूरा अन्दर बाहर कर रहे थे। हर आगे के स्ट्रोक में प्रगति के किसी न किसी अंग को चूम रहे थे। प्रगति को इस तरह का प्यार बहुत अच्छा लग रहा था और वह आत्मविभोर हो रही थी। मास्टरजी लगे रहे जैसे एक लम्बी रेस का घोड़ा हो। प्रगति को उनका लगातार प्रहार फिर से उत्तेजना की ओर ले जा रहा था और वह अप्रत्याशित रूप से उनका साथ देने लगी। मास्टरजी को इस सहयोग से प्रोत्साहन मिला और उन्होंने अपने वार लम्बे रखते हुए उनकी गति तेज़ की।
तेज़ गति से चोदने में मज़ा तो बहुत आता है पर जल्दी स्खलन का अंदेशा भी बढ़ जाता है। मास्टरजी इस चुदाई को लम्बा खींचना चाहते थे सो उन्होंने अपने आप को आगे करते हुए अपना सीना प्रगति की छाती पर रख दिया और अपनी टांगें सीधी करते हुए अपना पेट भी प्रगति के पेट से सटा दिया। उन्होंने अपना वज़न अपने घुटनों और कोहनियों पर ले रखा था। अब उनका लंड चोदते समय आगे-पीछे न होते हुए ऊपर-नीचे हो रहा था। इस आसन को थोड़ा बदलते हुए, मास्टरजी ने अपने आप को करीब 3-4 इंच प्रगति के सिर की तरफ सरकाया। ऐसा करने से मास्टरजी का लंड चूत के मुख से 1-2 इंच आगे हो गया। इस स्थिति में चुदाई से लंड एक कीले की तरह ऊपर-नीचे की चाल चल रहा था और योनि-मुख के ऊपरी हिस्से पर घर्षण कर रहा था। प्रगति का योनि मटर उस जगह के नज़दीक था और लंड का आवागमन महसूस कर रहा था।
कहते हैं योनि-मटर स्त्री के गुप्तांगों का सबसे मर्म और संवेदनशील अंग होता है। इसके ज़रा से स्पर्श से उसमें काम वासना का पुरज़ोर प्रवाह होने लगता है। यह इतना मार्मिक होता है कि इसे सीधा नहीं छूना चाहिए बल्कि इसके आस पास के इलाके को सहलाना चाहिए। सीधा छूना लड़की के लिए असहाय हो सकता है। पर उसके आस पास के सहलाने से लड़की को असीम सुख मिलता है।

कहते हैं योनि-मटर स्त्री के गुप्तांगों का सबसे मर्म और संवेदनशील अंग होता है। इसके ज़रा से स्पर्श से उसमें काम वासना का पुरज़ोर प्रवाह होने लगता है। यह इतना मार्मिक होता है कि इसे सीधा नहीं छूना चाहिए बल्कि इसके आस पास के इलाके को सहलाना चाहिए। सीधा छूना लड़की के लिए असहाय हो सकता है। पर उसके आस पास के सहलाने से लड़की को असीम सुख मिलता है।
मास्टरजी ने अपने आसन में छोटा सा परिवर्तन इसीलिये किया था जिससे लंड का योनि प्रवेश ऊपर-नीचे की दिशा में हो और उनके लंड का मूठ योनि-मटर के छोर या किनारे से संपर्क करे। कहते हैं सम्भोग के दौरान उंगली से इस मटर दाने के आस पास सहलाने से लड़की को अत्यंत ख़ुशी मिलती है। पर अगर यह काम उंगली के बजाय लंड से किया जाये तो लड़की की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं होता। लंड से मटर का संपर्क बनाने के लिए मास्टरजी द्वारा लिया गया आसन एकदम उपयुक्त था।
इस उपयुक्त आसन का लाभ उन्हें मिल गया क्योंकि जैसे ही उन्होंने चुदाई शुरू की और उनका मूठ मटर को रिझाने लगा, प्रगति में कामुकता ने ऊंची छलाँग लगाई ! उसके अंग-प्रत्यंग में ऊर्जा आ गई और वह पूरी तरह जागृत हो गई। वह अपने आप को हिला डुला कर योनि मटर को लंड घर्षण के और पास लाने का प्रयत्न करने लगी। जब मटर से मूठ छुल जाता तो एक सुख की चीत्कार निकल जाती और योनि में विद्युतीकरण हो जाता। प्रगति इस नए अनुभव से आनंदित थी और उसका रोम रोम सम्भोग से प्रभावित था। वह उचक उचक कर सम्भोग में सहयोग कर रही थी और ऊपर उठ उठ कर मास्टरजी के माथे को चूम रही थी। ऐसा करने से उसके स्तन मास्टरजी के चेहरे को छेड़ रहे थे। मास्टरजी भी मौका मिलने पर उसकी चूचियां मुँह में ले लेते थे।
प्रगति के उन्माद को देख कर मास्टरजी के भीतर विस्फोट के प्राथमिक संकेत उपजने लगे। मास्टरजी अब असमंजस में पड़ गए। विस्फोट के संकेतों का ध्यान करके चुदाई में ढील दें जिससे और देर तक सम्भोग कर सकें या फिर इन उपजते संकेतों को नज़रंदाज़ करके चुदाई जारी रखें और चरमोत्कर्ष की प्राप्ति करें। वे दुविधा में थे क्योंकि उनका लंड नियंत्रण में था और वे सम्भोग की अवधि अपनी मर्जी से तय कर सकते थे। आम तौर पर इस तरह का निर्णय नहीं लेना पड़ता क्योंकि लंड इतनी देर तक संयम में नहीं रहता। असमंजस दूर करने के लिए उन्होंने प्रगति की नीयत जाननी चाही और उसकी तरफ देखा।
प्रगति तो अपनी दुनिया में खोई हुई थी। आँखें मूंदी हुई, साँसें तेज़, स्तन उभरे हुए और चूचियां तनी हुईं वह आत्मविभोर सी किसी और दुनिया में थी। यदा कदा उसके गर्भ से असीम आनंद की चीत्कार निकल रही थी। उसका बदन मास्टरजी की चुदाई की लय में उठ-बैठ रहा था। वह स्वप्नलोक में विचर रही थी। मास्टरजी ने ऐसे में उसे जागृत करना उचित नहीं समझा और सम्भोग समापन का निर्णय लिया जिससे जब वे चरम बिंदु पर पहुंचें उनकी प्रगति भी उधर ही हो।
मास्टरजी ने अपने आपको काम वासना की पराकाष्ठा तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया। सम्भोग में यह सबसे आसान कार्य होता है। कोई भी आदमी क्लाइमैक्स तक आसानी से पहुँच जाता है। मर्दानगी तो इसे विलंबित करने में होती है !!!
मास्टरजी को इस आसान काम को पूरा करने में कोई कठिनाई नहीं हुई और वे शीघ्र ही वीर्य-पतन के कगार पर आ गए। उनके शरीर का हाल भी अब प्रगति के बदन सा होने लगा। मांस-पेशियाँ जकड़ने लगीं, साँसें तेज़ और मुँह से ऊह आह की आवाजें निकलने लगीं। जब उन्हें स्खलन बिल्कुल निकट लगने लगा तो एक आख़री बार उन्होंने अपना भाला योनि से पूरा बाहर निकाला, एक-दो क्षण बाहर रखा और फिर पूरे ज़ोर से प्रगति की बंद होती गुफा में मूठ तक घोंप दिया। उनके बदन की गहराइयों से एक मादक चिंघाड़ निकली और वे एक निर्जीव शव की तरह प्रगति के शरीर पर लुढ़क गए। उनका चेहरा प्रगति के स्तनों को तकिया बना चुका था और उनका लंड प्रगति के गर्भ में वीर्य-प्रपात छोड़ रहा था। वीर्य प्रपात के झटके मास्टरजी के शरीर को झंझोड़ रहे थे।
हर लड़की को मर्द का स्खलन तृप्ति प्रदान करता है। एक तो इससे उसके गर्भ में सर्जन की क्रिया शुरू होती है और दूसरे, कुछ देर के लिए ही सही, मर्दानगी का पतन होते देखती है। वह कैसा निस्सहाय और कमज़ोर हो जाता है !! प्रगति कृतज्ञता पूर्ण हाथों से मास्टरजी के सिर और पीठ पर हाथ फेर रही थी। उसने अपनी टांगें ऊपर उठा लीं थीं जिससे वीर्य बाहर न जाए और उसकी चूतचूत ने लंड को जकड़ कर रखा था और उसके वीर्य की आख़री बूँद अपने अन्दर निचोड़ रही थी। जब लंड में देने लायक कुछ नहीं बचा तो लालची चूत ने अपनी पकड़ ढीली की और निर्जीव लिंग को बाहर निकाल दिया !! मास्टरजी मूर्छित से पड़े हुए थे। लंड के निष्कासित होने से उन्हें होश आया और वे मम्मों का रस पान करने लगे। धन्यवाद के रूप में उन्होंने प्रगति के मुँह को चूम लिया और उसके बदन को सहलाने लगे।
वे सम्भोग उपरांत सुख का सेवन कर ही रहे थे कि अचानक दरवाज़े की घंटी ने उनकी शांति भंग कर दी। घंटी ऐसे बज रही थी मानो बजाने वाला क्रोध में हो। प्रगति और मास्टरजी झटके से उठ गए। चिंता और घबराहट से दोनों एक दूसरे को देखने लगे। फिर प्रगति अपने कपड़े उठाकर गुसलखाने की तरफ भाग गई और मास्टरजी जल्दी जल्दी कपड़े पहन कर दरवाज़े पर आये दुश्मन का सामना करने चल पड़े।
दरवाज़े पर अंजलि और उसके पिताजी को देख कर मास्टरजी के होश उड़ गए।
” प्रगति को क्या पढ़ा रहे हो ? ” पिताजी ने गुस्से में पूछा।
” जी, क्या हो गया ? ” मास्टरजी ने सवाल का जवाब सवाल से देते हुए अपने आप को संभाला।
” प्रगति कहाँ है ? ”
” जी, अन्दर है !”
” अन्दर क्या कर रही है ? ”
” जी पढ़ने आई थी !”
” उसकी पढ़ाई हो गई। उसे बुलाओ !” कहते हुए पिताजी ने प्रगति को आवाज़ दी।
प्रगति भीगी बिल्ली की भांति आई और नज़रें झुकाए मास्टरजी के पास आ कर खड़ी हो गई।
” घर चलो !” पिताजी ने आदेश दिया। और मास्टरजी की तरफ देख कर चेतावनी दी,” यह तो बच्ची है पर तुम तो समझदार हो। एक जवान लड़की को इस तरह अकेले में पढ़ाते हो ! लोग क्या कहेंगे ?”
मास्टरजी को राहत मिली कि मामला इतना संगीन नहीं है जितना वे सोच रहे थे।
मास्टरजी के जवाब का इंतज़ार किये बगैर पिताजी ने कह दिया,” अब से इस घर में पढ़ाई नहीं होगी। या तो हमारे घर में या स्कूल में, समझे ?”
यह कहते हुए पिताजी दोनों लड़कियों को लेकर अपने घर रवाना हो गए। प्रगति ने जाते जाते एक आख़री बार मास्टरजी की तरफ मायूस आँखों से देखा और फिर पैर पटकती हुई अपने घर को चल दी।

प्रगति के पिताजी को मास्टरजी की नीयत पर शक हो चला था। वर्ना वे सिर्फ प्रगति को अकेले में अपने घर में पढाने के लिए क्यों बुलाते। उन्हें यह भी समझ आ गया कि प्रगति शरीर से अब जवान हो चली थी पर मन अभी भी बच्चों जैसा था। इस लड़कपन की उम्र में अक्सर लड़कियाँ भटक जाती हैं क्योंकि उनके शरीर में जो भौतिक और रासायनिक बदलाव आ रहे होते हैं, उनके चलते वे आसानी से लुभाई जा सकती हैं। उन्हें अपने जिस्म की ज़रूरतें का अहसास होने लगता है और वे समझ नहीं पाती कि उन्हें क्या करना चाहिए। उनके मन में माँ-बाप के दिए दिशा -निर्देश, समाज के लगाये बंधनों और संसकारों की बंदिश एक तरफ रोक रही होती है तो दूसरी तरफ उनके शरीर में उपज रही नई उमंगों और तरंगों का ज्वार-भाटा उन्हें तामसिकता की तरफ खींच रहा होता है। वे इस दुविधा में फँसी रहती हैं कि उनके लिए क्या उचित है और क्या नहीं।
प्रगति के पिताजी ने इसी में भलाई समझी कि उन्हें यह गाँव छोड़ कर कहीं और चले जाना चाहिए जहाँ प्रगति और मास्टरजी का मेल न हो सके और प्रगति नए सिरे से अपना जीवन शुरू कर सके। वे चाहते थे कि प्रगति पढ़-लिख कर इस काबिल बन जाए कि वह अपना और अपने परिवार का ध्यान रख सके। उन्होंने निश्चय कर लिया कि इस गाँव को छोड़ने का समय आ गया है। भाग्यवश, उनके एक मित्र का हैदराबाद से सन्देशा आ गया कि वहाँ एक सरकारी अफसर को एक ऐसे परिवार की ज़रुरत है जो उसके घर का काम, बच्चे की देख-रेख, बगीचे का ध्यान और ड्राईवर का काम, सभी कुछ कर सके। इसके एवज़ में वह परिवार को घर के अलावा, बच्चों के स्कूल का दाखिला, स्कूल का खर्चा और अच्छी तनख्वाह देने को तैयार है। उसे बस एक ईमानदार और संस्कारी परिवार की ज़रुरत है।
यह सन्देशा पा कर प्रगति के पिताजी खुश हो गए और उन्होंने अपने मित्र को अपनी तरफ से हामी भर दी। कुछ दिनों बाद वहाँ से भी मंजूरी आ गई और जैसे ही स्कूलों की छुट्टी शुरू हुई, प्रगति अपने परिवार सहित हैदराबाद रवाना हो गई। जाते वक़्त वह मास्टरजी से बहुत मिलना चाहती थी पर पिताजी ने उस पर कड़ा अंकुश लगा रखा था। सो बेचारी मन मसोस कर रह गई और एक अनजान शहर की तरफ चल पड़ी। उधर मास्टरजी भी एक आखरी बार प्यारी प्रगति से हम-बदन होना चाहते थे पर उनकी कोई तरकीब काम नहीं आई और वे भी अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाए। न जाने उन्हें प्रगति जैसी कोई और लड़की मिलेगी या नहीं। उन्होंने अपनी खोज शुरू कर दी।
प्रगति ने हैदराबाद में जब अपना नया घर देखा तो वह ख़ुशी से फूली नहीं समाई। उसने सपने में भी एक ऐसे घर की कल्पना नहीं की थी। उसके सभी घर वाले भी बहुत खुश थे। घर एक बहुत बड़ी कॉलोनी में था जो कि सिर्फ वरिष्ठ सरकारी अफसरों के लिए थी। कॉलोनी में सभी ज़रुरत की सहूलियतें मौजूद थीं- दूकानें, पोस्ट-ऑफिस, डिस्पेंसरी, बैंक, खेल के मैदान, झूले वगैरह। बहुत सारे बच्चे खेल रहे थे, वातावरण ख़ुशी से चहक रहा था।
जिस अफसर के घर में उन्हें रहना था उसका नाम शालीन था। उसके साथ उसकी पत्नी मयूरी और एक आठ साल का बेटा आकाश रहता था। घर बहुत सुन्दर था और हर तरह की ज़रूरतों के सामान से लैस था। उनके नौकरों का घर भी अच्छा था और उसमें एक कमरा, रसोई और बाथरूम था। शालीन ने उनके कमरे में रंगीन टीवी लगवा दिया था और बच्चों की पढ़ाई के लिए मेज़-कुर्सी का अलग से प्रबंध था। इस कारण कमरा थोड़ा छोटा लग रहा था।
शालीन ने प्रगति के पिताजी को कह दिया था कि अगर उनको जगह कम लगे तो बच्चे उनके घर में सो सकते हैं। प्रगति के पिताजी शालीन के इस मानविक रुख से बहुत प्रभावित हुए और आभार भरी नज़रों से उन्हें धन्यवाद के अलावा कुछ नहीं दे सके।

शालीन ने प्रगति के पिताजी को कह दिया था कि अगर उनको जगह कम लगे तो बच्चे उनके घर में सो सकते हैं। प्रगति के पिताजी शालीन के इस मानविक रुख से बहुत प्रभावित हुए और आभार भरी नज़रों से उन्हें धन्यवाद के अलावा कुछ नहीं दे सके।
कुछ ही दिनों में प्रगति का परिवार और शालीन का परिवार एक दूसरे को अच्छे लगने लगे और उनमें एक दूसरे के प्रति परस्पर आदर का भाव पनप गया। मयूरी भी प्रगति के सभी घरवालों के साथ प्यार से पेश आती और उनको अपने नए घर को बसाने में हर तरह की मदद करती। आकाश भी प्रगति और उसकी दोनों बहनों, अंजलि और दीप्ति, के साथ घुल-मिल गया था और उन्हें अपने खिलौनों से खेलने देता था।
प्रगति के सभी घरवाले हैदराबाद आने के निर्णय से खुश थे और वे कोई ऐसी हरकत नहीं करना चाहते थे जिससे शालीन के परिवार का कोई भी सदस्य उनसे नाखुश हो। प्रगति की माँ घर का सारा काम बड़ी उत्सुकता से करती, उसके पिताजी बगीचे का ध्यान रखते और बाहर का कोई भी काम ख़ुशी और तत्परता से करते। प्रगति, अपनी बहनों के साथ मिलकर घर के छोटे-मोटे कामों में हाथ बटाती और फुर्सत होने पर आकाश के साथ खेलती।
समय अच्छा बीत रहा था।
धीरे धीरे दिन बीतते गए और मौसम ने करवट बदली। सर्दियों के दिन आने लगे। मयूरी ने उनके लिए गरम कपड़ों का इंतजाम किया। अपने और शालीन के पुराने कपडे प्रगति के माँ-बाप को दिए और आकाश के पुराने कपड़े अंजलि और दीप्ति के काम आये। प्रगति के लायक गरम कपड़े नहीं थे सो मयूरी ने उसे अपने घर में रहने की इजाज़त दे दी क्योंकि वहाँ हीटर लगा हुआ था।
अब प्रगति लगभग पूरा समय शालीन के घर में ही रहने लगी। सिर्फ खाना खाने और स्कूल जाते वक़्त वह घर से बाहर निकलती। मयूरी को प्रगति के घर में रहने से काफ़ी आराम हो गया था। वह उसके सारे काम कर देती और मयूरी को ठाठ से रहने देती।
आकाश को भी अपनी नई “दीदी” से लगाव हो गया था और वे दोनों काफ़ी समय एक साथ गुज़ारने लगे थे।
एक दिन शालीन दफ्तर से देर से घर आया। उसे दफ्तर का कुछ ज़रूरी काम और भी करना था। सबके सोने का समय हो गया था सो उसने खाना खाने के बाद मयूरी और आकाश को सोने को कह दिया और वह पढ़ाई के कमरे में चला गया। उसे नहीं पता था वहाँ ज़मीन पर प्रगति सोई हुई थी। खैर, उसे सोता छोड़ कर वह अपने लैपटॉप पर काम करने लगा। जहाँ वह बैठा था, वहाँ से प्रगति सोती हुई साफ़ दिखाई दे रही थी।
यौवन की दहलीज पर पाँव रख चुकी एक खुश लड़की जिस तरह चिंता-मुक्त स्थिति में सोती है वैसे ही प्रगति शालीन से कोई एक गज दूर सो रही थी। उसके पाँव शालीन की तरफ थे और उसने अपने दाईं ओर करवट ले रखी थी जिस कारण उसकी पीठ शालीन की तरफ थी।
ठण्ड बढ़ रही थी सो शालीन ने उठ कर प्रगति को कम्बल उढ़ा दिया और हीटर चालू कर दिया। ऐसा करने से प्रगति ने नींद ही नींद में करवट ली और वह सीधी हो कर सोने लगी। शायद वह कोई अच्छा सपना देख रही होगी क्योंकि उसके अधरों पर हलकी सी मुस्कान खेल रही थी और उसके स्तन साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। शालीन का ध्यान अपने काम से हठ कर प्रगति के स्तनों पर टिक गया।
शालीन अपने नाम-स्वरुप एक शांत स्वभाव का आदमी था जो अपने व्यवसाय में बहुत सफल और उन्नत था। उसके दफ्तर में सभी उसे भविष्य का प्रबन्ध-निदेशक समझते थे। वह हृदय से कृपालु और उदार प्रवर्ति का इंसान था तथा सभी वर्गों के लोगों के प्रति उसमें आदर भाव व्याप्त था।
वैसे वह करीब चालीस वर्ष का था लेकिन दिखने में कोई भी उसे तीस-बत्तीस का समझ सकता था। खेल-कूद में रूचि, नियमित रूप से व्यायाम और हलके आहार के कारण उसने अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट रखा हुआ था। उसके चेहरे पर सदैव एक हलकी मुस्कान और आत्मविश्वास झलकता था। वह एक आदर्श पति और पिता था जिसका सारा संसार मयूरी और आकाश के चारों तरफ घूमता था। उनके लिए वह अपने दफ्तर से भी झगड़ा मोल ले सकता था।

शालीन ने कुरता-पायजामा और ऊपर से गरम शॉल ले रखा था। प्रगति ने मयूरी की एक पुरानी ड्रेस पहनी हुई थी जो उसके लिए काफ़ी ढीली थी। ठण्ड से बचने के लिए, उसने नीचे एक बनियान पहन रखी थी। शालीन की नज़रें यह नहीं जान पा रहीं थीं कि उसने चड्डी पहनी है या नहीं।
धीरे धीरे शालीन को प्रगति के अपने नजदीक होने का अहसास होने लगा और उसका ध्यान दफ्तर के काम से बिलकुल हट गया। वह एक-टक प्रगति को देखता रहा और उसके रूप को सराहने लगा। उसके अधखुले होटों से सफ़ेद दांतों की झलक, उसकी साँसों की सरसराहट और उसके साथ उसके वक्ष की मंद-मंद हरकत शालीन को विचलित कर रही थी। उसका मन डोल रहा था और शादी के बाद से पहली बार उसे किसी पराई लड़की को देख कर काम-वासना की अनुभूति हो रही थी।
अचानक हीटर की गर्मी के कारण, प्रगति ने सोते सोते ही अपनी टांगों से कम्बल को दूर कर दिया और एक गहरी सांस लेकर सोने लगी। शालीन को मानो करंट लग गया। प्रगति की टांगें उस ढीली ड्रेस में से घुटनों तक बाहर झाँक रहीं थीं। उसके स्तन सिर्फ बनियान के कारण छुपे हुए थे।
शालीन का शरीर अंगड़ाई लेने लगा और उसका मन तामसिकता की रेखा के पास आ गया। उसे भी गर्मी सी लगने लगी और उसने अपना शॉल उतार दिया। उसको पायजामे में अपने लिंग के वज़न का अहसास होने लगा।
उसने यकायक उठकर हीटर का रुख प्रगति से दूर कर दिया और उसके पास रखी चटाई पर बैठ गया। कांपते हाथों से उसने प्रगति के कम्बल को उठा कर उढ़ाने की कोशिश की पर कम्बल प्रगति की टांगों में फंसा हुआ था। उसे छुड़ाने की कोशिश में प्रगति की आँख खुल गई और अपने पास शालीन को देख कर वह अचंभित हो गई और फिर शरमा गई।
शालीन भी घबरा सा गया पर अपने आप को सँभालते हुए बोला,”तुम्हें उढ़ा रहा था … ठण्ड लग जायेगी .. ”
प्रगति कुछ नहीं बोली, पर उसका हाव-भाव बहुत कुछ कह गया। एक तो उसने कोई आपत्ति या संकोच नहीं जताया और दूसरे उसने शालीन को शर्मिंदा या कसूरवार महसूस नहीं होने दिया। उसे मास्टरजी के साथ बिठाये पल याद आ गए और उसके चेहरे पर शर्म, उत्सुकता और ख़ुशी का एक अद्भुत मिश्रण छा गया। उस चेहरे को देख कर शालीन की घबराहट दूर हुई और उसने मन ही मन चैन की सांस ली। उसे डर था कि कहीं प्रगति चिल्ला ना दे।
“तो फिर उढ़ा दीजिये !” प्रगति ने आखिर कह ही दिया और आँखें मूँद लीं।
शालीन ने उसे कम्बल से उढ़ा दिया। वह उठने ही वाला था कि प्रगति ने करवट बदली और उसकी पीठ और चूतड़ फिर से उघड़ गए। शालीन ने हिम्मत करके कम्बल को प्रगति के जिस्म से ढीला किया और दोबारा उढ़ा कर कम्बल को उसके शरीर के नीचे दबाने लगा जिससे वह फिर से ना उघड़े। ऐसा करते वक़्त उसके हाथों और उँगलियों ने पहली बार प्रगति के शरीर का स्पर्श किया और उसको यह बहुत ही कामोत्तेजक लगा।
शायद प्रगति को भी शालीन का स्पर्श अच्छा लगा। उसने एक ठंडी सांस ली और सोने का नाटक करने लगी।
शालीन अपने दफ्तर के काम से पूरी तरह विरक्त हो चुका था। उसका दिमाग सिर्फ प्रगति के मांसल शरीर और अपने मन में उपज रहे कामुक विचारों पर केन्द्रित था। अचानक उसमें प्रगति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की लालसा जागने लगी और वह काम-वासना के लोभ में लिप्त होने लगा।
जब आदमी काम-वासना में लिप्त हो जाता है तो उसका विवेक सात्विक विचारों का त्याग कर देता है और उसे सिर्फ एक ही लक्ष्य दिखता है …. अपनी कामाग्नि बुझाने का !
शालीन ने थोड़ी और हिम्मत दिखाई और प्रगति को ऐसे छूने लगा मानो उसका कम्बल ठीक कर रहा हो।
प्रगति भी कहाँ सोई थी !! उसकी आँखें मूंदी हुई थीं पर उसका जिस्म पूरी तरह जगा हुआ था। आज कितने दिनों बाद किसी मर्द का हाथ उसके जिस्म को लगा था।
उसकी पुरानी यादें फिर से ताजा हो गईं और उसके जिस्म की सोई हुई प्यास फिर से जागने लगी। उसकी योनि तत्काल गीली हो गई और उसने अपनी टांगें भींच लीं। फिर यह सोच कर कि कहीं शालीन यह ना समझे कि उसे उससे डर लग रहा है और वह चला जाये, प्रगति ने अपनी टांगें ढीली करके थोड़ी खोल दीं।
हर इंसान को शारीरिक-संकेत पढ़ने आते हैं, तो शालीन को प्रगति की इस हरकत से बड़ा हौसला मिला और उसने उसके शरीर को निश्चिंत हो कर सहलाना शुरू कर दिया।
प्रगति सोने का नाटक अच्छी तरह से कर रही थी। भगवान ने लड़कियों को यह एक अच्छा सहारा दिया हुआ है। दुनिया भर की लड़कियाँ सोने का सहारा लेकर शारीरिक सुख का आनंद उठती हैं जिस से उनके मन में ग्लानि भाव भी नहीं रहता और वे पूरा मज़ा भी ले लेती हैं !!
प्रगति ने भी सोने का नाटक करते हुए करवट बदल ली और पीठ के बल लेट गई; इसके साथ ही उसने अपने पांव से अपने कम्बल को नीचे खिसका दिया जिससे उसका वक्ष-स्थल उघड़ गया और उसके उभरे हुए स्तन बनियान की बंदिश को चेतावनी देने लगे। शालीन को रिझाने के लिए उसने अपनी साँसें भी गहरी कर दीं जिससे उसका वक्ष और भी ऊपर-नीचे होने लगा।

शालीन ने भी अपनी तरफ से नाटक जारी रखा और ऐसा प्रतीत होने दिया मानो प्रगति के करवट बदलने का उसे अहसास नहीं हुआ है और वह पहले की तरह अपने हाथ चलाता रहा। तो, जहाँ उसके हाथ पहले उसके कंधे और कमर को सहला रहे थे, अचानक उसके स्तनों को सहलाने लगे।
प्रगति ने ज़रा सी भी आपत्ति नहीं दिखाई और गहरी नींद के बहाने शालीन के सहलाव का पुरजोर मज़ा लूटने लगी।
हालाँकि, शालीन के हाथ और प्रगति के स्तनों के बीच बनियान और ड्रेस का कपड़ा था फिर भी दोनों को बहुत मज़ा आ रहा था। शालीन ने उठ कर और दबे पांव जा कर कमरे का दरवाज़ा चुपके से बंद कर दिया और कमरे की बत्ती भी बुझा दी। अब कमरे में सिर्फ लैपटॉप की रौशनी थी। अँधेरा हो तो चोरी करने वालों की हिम्मत बढ़ जाती है। यहाँ भी यही हुआ।
प्रगति ने अँधेरा होते ही ढीली ड्रेस से अपनी टांगें उघाड़ लीं और बनियान को थोड़ा ऊपर कर लिया जिससे जब तक शालीन वापस आया, प्रगति का पेट और घुटने तक की टांगें उघड़ी हुई थीं और वह पहले की तरह गहरी नींद में सोई हुई थी !!
अब तक तो शालीन प्रगति को कपड़ों के ऊपर से ही सहला रहा था पर अब उसने उसके नंगे पेट को पहली बार छुआ। इस स्पर्श का करंट सीधा उसके लंड को लगा और वह अकड़ने लगा। शालीन समझ गया कि प्रगति सोने का सिर्फ बहाना कर रही है वर्ना वह कब की उठ गई होती। उसने प्रगति की इस स्वीकृति का अभिवादन करते हुए अपने हाथों के घुमाव का दायरा और बढ़ाया और रास्ते में आने वाले कपड़ों को भी हटाने लगा।
अब प्रगति भी समझ गई कि शालीन उसके शरीर को हासिल करना चाहता है। धीरे धीरे उन दोनों को प्रगति के सोने के नाटक को ख़त्म करना पड़ा। कब तक यह स्वांग चलता क्योंकि अब शालीन ने उसके स्तन नंगे कर दिए थे और उसकी ड्रेस भी लगभग कन्धों तक ऊपर पहुंचा दी थी।
जैसे ही शालीन के हाथ प्रगति के नग्न स्तनों को छुए प्रगति ने नींद खुलने का नाटक किया और शालीन की तरफ करवट बदल कर अपना मुँह उसकी गोदी में छुपा लिया। प्रगति को पता नहीं था कि गोदी में तो शालीन का अकड़ा हुआ लंड विराजमान था, फिर भी उसने अपना मुँह नहीं हटाया और उसके विराट लंड के समीप अपना चेहरा घुसा कर मानो फिर से सो गई।
शालीन का लंड पहले ही कड़क था अब प्रगति के मुँह को पास पाकर और उसकी गर्म साँसों से प्रभावित हो कर वह और भी विशालकाय हो रहा था। शालीन ने थोड़ा सरक कर अपने लंड को प्रगति के होटों के पास कर लिया और उसके पेट और नाभि को प्यार से सहलाने लगा।
अचानक, शालीन को बेडरूम की बत्ती जलने और आकाश के बाथरूम जाने की आवाज़ ने झंकझोर कर रख दिया। उसकी कामाग्नि एक ही क्षण में काफ़ूर हो गई और वह एक ही झटके में खड़ा हो गया और प्रगति ने भी अपने आपको संवार लिया। शालीन ने कमरे की बत्ती जला दी और दरवाज़ा चुप-चाप खोल दिया। उसका लिंग तो पूरा मुरझा ही गया था। उसने बाहर झाँक कर देखा कि मयूरी सोई हुई थी और आकाश बाथरूम से वापस आ रहा था।
“गुड नाईट, पापा !” आकाश ने सोई हुई आवाज़ में कहा और अपने बिस्तर पर जा कर सो गया।
“गुड नाईट, बेटा !” कहते हुए शालीन ने ठंडी सांस ली और भगवान का शुक्रिया अदा किया कि आकाश या मयूरी ने उसे प्रगति के साथ नहीं पकड़ा। उसने सोच लिया कि वह ऐसा ख़तरा अब नहीं उठाएगा और पूरी सूझ-बूझ और तैयारी के साथ ही अगला कदम उठाएगा। इस निश्चय के साथ उसने अपना लैपटॉप बंद किया और कमरे की बत्ती बुझा दी।
बाहर जाते वक़्त उसने एक बार प्यार से प्रगति के सर को छुआ और हलके से “गुड नाईट” कह दिया। प्रगति ने भी “गुड नाईट” फुसफुसाया और अपने आप को कम्बल में लपेट लिया। अब शालीन और प्रगति चोर हो चुके थे और उनमें एक गुप्त रिश्ते का बीज पनपने लगा था।

शालीन को रात को ठीक से नींद नहीं आई…। रह रह कर उसे प्रगति का चेहरा और बदन दिखाई देता ! उसे अपने संयम टूटने पर भी ग्लानि हो रही थी। वह एक भद्र पुरुष था और अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था। उसकी पत्नी भी उससे प्यार करती थी। उसका किसी और लड़की की ओर आकर्षित होना समझ नहीं आ रहा था।
शायद उसे मरदाना प्रवृति का ज्ञान नहीं था। पुरुष की प्रवृति उसे एक साथ कई यौन सम्बन्ध बनाने को आतुर करती है। उसका प्रजनन में जिम्मा सिर्फ अपना बीज डालने तक सीमित होता है। प्रकृति ने इसके बाद प्रजनन की सारी जिम्मेदारी नारी पर छोड़ दी है। इसीलिए नारी यौन सम्बन्धों को लेकर पुरुषों के मुकाबले अधिक गंभीर होती है। उसे अपने साथी चुनने में देर तो लगती है पर उसका चुनाव निर्णायक और दीर्घकालीन होता है। वह अक्सर अपने साथी के साथ अडिग सम्बन्ध कायम रखती है। इसका कारण प्रकृति के उस सिद्धांत पर निर्भर है जिसने नारी को मातृत्व के समस्त बोझ से लादा हुआ है। पुरुष का क्या है…..। किसी भी मादा के साथ सम्बन्ध बनाने को सदैव तत्पर रहता है ! यौन संबंधों में स्त्री-पुरुष के बीच यही एक बड़ा रूचि-विरोध है। मर्द को लगता है वह एक समय कितनी भी लड़कियों से प्यार कर सकता है और औरत को सिर्फ एक आदमी का प्यार पर्याप्त होता है।
खैर, शालीन की रात उधेड़बुन में ही निकल गई। सुबह दफ्तर जाते वक़्त मयूरी से आँखें नहीं मिला पा रहा था। वह फिर से किशोरावस्था में जा पहुंचा था जहाँ उसे उलझन, व्याकुलता और लज्जा का आभास हो रहा था। वह भौतिकता और आध्यात्मिकता के अंतर्द्वंद्व में फँस गया था। जब भी पुरुष पर ऐसी उलझन आई है देखा गया है कि अक्सर भौतिकता की ही विजय हुई है। काम, क्रोध, मोह और ईर्ष्या पर तो केवल साधू ही काबू पा सकते हैं। शालीन को यह निश्चित हो गया कि वह एक सामान्य पुरुष है, कोई साधू या देवता नहीं। उसका मस्तिष्क प्रगति की कामुक काया की छवि नहीं मिटा पाया और उसके जिस्म को हासिल करने की तीव्र लालसा को पूरा करने की ओर प्रेरित हो गया। कहते हैं यौनाकर्षण दुनिया की सबसे ताक़तवर शक्ति होती है। इसे हराना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है।
दफ्तर में भी शालीन का मन अपने काम में नहीं लग रहा था। दोस्तों की बातचीत, चुटकुले या दफ्तरी उथल-पुथल से परे वह अपने आप में गुम था। उसका दिमाग ऐसी तरकीब जुटाने में लगा था जिससे वह प्रगति के साथ यौन संसर्ग कर सके और किसी को पता ना चले। जब मन में किसी लक्ष्य को पाने की तीव्र इच्छा होती है, तो दिमाग उसका हल निकाल ही लेता है; खासतौर से अगर वह इच्छा जिस्म के निचले हिस्सों से सम्बंधित हो। ऐसा ही हुआ और शालीन को एक उपाय सूझ गया।
घर लौटते समय वह बिजली के सामान की दूकान से कुछ सामान ले आया और एक कारीगर को भी साथ ले लिया। घर पहुँच कर सामान्य तरीके से मयूरी को बताया कि बिजली की बचत और उससे सुरक्षा के लिए वह नया फ्यूज़ बॉक्स लगवा रहा है जिससे बिजली की बचत भी होगी और आग लगने का खतरा भी नहीं रहेगा। मयूरी को कोई आपत्ति नहीं हुई और कारीगर ने अपना काम शुरू किया। शालीन ने उसे निर्देश दिया कि वह किस तरह से कमरों में बिजली और पॉवर के कनेक्शन चाहता है। हर कमरे के लिए बिजली का अलग और पॉवर का अलग स्विच नए फ्यूज़ बॉक्स में लगवा दिया। जिस से घर में जहाँ चाहें बिजली या पॉवर या दोनों को चालू या बंद कर सकते हैं।
यह होने के बाद, उसने सर्दी का आश्रय लेते हुए पूरे घर में कालीन या दरी बिछवाने का आदेश दे दिया। वह चाहता था कि रात को उसके चलने-फिरने की आहट ना हो। जिस कमरे में प्रगति सोती थी उसकी अलमारी में उसने टॉर्च, कुछ तौलिये, चादरें, के वाय जेली की ट्यूब, अपने कुर्ते-पजामे और प्रगति के लिए लूंगी और कुर्ती छुपा कर रख दीं। उसने यकीन किया कि मयूरी के बेडरूम में कोई टॉर्च, मोमबत्ती या माचिस नहीं है। जो थीं उसने छुपा दीं जिससे आसानी से मिल ना सकें। उसने सोच लिया था कि रात को, सबके सोने के बाद, वह प्रगति के कमरे को छोड़ बाकी सारे कमरों की लाइट फ़्यूज़ बॉक्स से बंद कर देगा। जिससे जब वह प्रगति के कमरे में हो और अगर रात को मयूरी या उसके बेटे की आँख खुले तो वे घर में उजाला ना कर पायें। वह चाहता था कि वे उसको मदद के लिए पुकारें और वह अँधेरे अँधेरे में वापस अपने बेडरूम पहुँच सके। इससे वह प्रगति के साथ रंगे हाथों नहीं पकड़ा जायेगा।
सब तैयारी होने के बाद शालीन बेसब्री से रात का इंतज़ार करने लगा। इस दौरान एक दो बार उसको प्रगति घर में दिखाई दी पर उसने उसके साथ आँखें चार नहीं कीं। उसकी अन्तरात्मा उसको कुरेद रही थी पर उसके तन-मन में लड्डू फूट रहे थे। खाना खाकर और थोड़ी देर टीवी देखकर सब सोने लगे। कुछ ही देर में घर में सन्नाटा सा छा गया और सबके सोने की आवाजें आने लगीं।
शालीन को इसी का इंतज़ार था। जब उसे यकीन हो गया मयूरी और आकाश सो गए हैं, वह चुपचाप उठा और अपनी सुनियोजित योजना को अंजाम देने लगा। उसे पता था एक बार आँख लग जाने के बाद मयूरी गहरी नींद सोती है और ज्यादातर सुबह ही जागती है। आकाश कभी कभी रात को सुसु के लिए उठता है पर वह भी 3-4 घंटे के बाद। शालीन निश्चिंत हो कर फ्यूज़ बॉक्स की ओर गया और प्रगति के कमरे के आलावा बाकी सभी कमरों की बिजली के स्विच बंद कर दिए। इससे घर में घुप अँधेरा हो गया पर कमरों के हीटर और फ्रीज वगैरह चलते रहे। अब सोने वालों की आँख अगर खुल भी गई तो वे कुछ देख नहीं पाएंगे और जल्दी से हिल-डुल नहीं पाएंगे।
अब उसने मयूरी और आकाश के बेडरूम का दरवाज़ा भेड़ दिया और प्रगति के कमरे में आ गया। कमरा बंद करके उसने बाथरूम की बत्ती जला ली और उसका दरवाज़ा भी लगभग बंद कर दिया जिससे दरवाज़े की दरार से कमरे को रोशनी मिलती रहे। इतनी रोशनी उसके लिए काफी थी। उसे प्रगति का सोता (या सोने का नाटक करता) शरीर साफ़ दिख रहा था।
वह प्रगति के पास आ कर बैठ गया और इस बार बिना हिचक के उसके ऊपर से कम्बल हटा दिया। उसे यह जान कर ख़ुशी हुई की प्रगति ने घुटने तक पहुँचने वाली फ्रॉक पहन रखी थी और बनियान की जगह ब्रा थी। इस पोशाक में उसका काम आसान हो जायेगा। उसे प्रगति की समझदारी पर गर्व हुआ और वह समझ गया कि प्रगति भी शालीन के कल के दुस्साहस को ख़ुशी से स्वीकार कर चुकी है।

हीटर की गर्मी कमरे को गर्म किये हुई थी और प्रगति के समीपन ने शालीन को गर्म कर दिया था। शालीन ने अपने हाथ हीटर से गर्म करके प्रगति की टांगों पर फेरने शुरू किये। उसके तलवों का रगड़ कर गरम किया और पांव की उँगलियों को मसला। फिर ऊपर आते हुए घुटने से नीचे की टांगों को सहलाने लगा और बाद में घुटनों की मालिश की। प्रगति आराम से आँखें बंद किये लेटी हुई शालीन की हरकतों का मज़ा ले रही थी।
वैसे शालीन को यह तो पता चल गया था कि प्रगति उसके नटखट इरादों से वाक़िफ़ है पर यह नहीं जानता था कि वह उसके साथ किस हद तक जा सकता है। आखिर (उसकी नज़र में) वह एक नादान और अल्हड़ बालिका थी। उसे यह नहीं पता था कि प्रगति का कौमार्य लुट चुका है और वह यौन सुख से अपरिचित नहीं है। (कृपया अन्तर्वासना डॉट कॉंम पर “प्रगति का अतीत 1, 2, 3, 4 & 5” पढ़ें) वह तो उसके साथ ऐसे पेश आ रहा था मानो वह एक अबोध कन्या हो। वह उसके साथ जल्दबाजी करके उसको डराना नहीं चाहता था। वह उसकी कामुकता और यौन के प्रति उत्सुकता बढ़ाना चाहता था।
कुछ देर टांगें सहलाने के बाद उसने एक हाथ उसके सिर पर फेरना शुरू किया और दूसरे हाथ से घुटनों के ऊपर जाँघों के तरफ बढ़ने लगा। वह उसे गुदगुदा रहा था और पोले पोले हाथों से उसकी जाँघों के रोंगटे खड़े कर रहा था। प्रगति अब ज्यादा देर तक सोने का नाटक नहीं कर पाई क्योंकि उसकी गुदगुदी उसे हिलने-डुलने को मजबूर कर रही थी और उसके अंतर्मन से ऊह-आह निकलने को हो रही थी।
आखिर उसने आँखें खोल ही लीं और शालीन की तरफ झुकी झुकी नज़रों से देखते हुए अपनी आँखों पर अपनी कलाई का पर्दा डाल दिया। यह शालीन को इशारा था कि उसे कोई आपत्ति नहीं है और शालीन समझ गया।
शालीन ने ज्यादा समय बर्बाद ना करते हुए उसकी फ्रॉक को ऊपर की तरफ उठा दिया। प्रगति ने भी अपने कूल्हे ऊपर करके उसकी मदद की और फ्रॉक उसके स्तनों के ऊपर होकर गले तक आ गई। अब वह ब्रा और चड्डी में थी और उसने अपनी टांगें शर्म के कारण भींच लीं। शालीन ने उसकी टांगों को घुटनों से पकड़ कर अलग किया और आश्वासन के तौर पर उसके कन्धों को थपथपा दिया।
अब शालीन ने पोले पोले हाथों और उँगलियों से उसकी ब्रा के ऊपर से उसके मम्मों और पेट तथा जांघ के अंदरूनी हिस्सों को उकसाना शुरू किया। साथ ही उसने चड्डी के ऊपर से ही उसकी योनि के ऊपर भी हाथ फिराना शुरू कर दिया। दोनों को मज़ा आ रहा था और शायद दोनों ही प्रगति की ब्रा और चड्डी से जल्दी छुटकारा चाहते थे। दोनों उत्तेजित हो गए थे और उतावले और बेचैन भी। ऐसे में जब शालीन ने प्रगति को आधी करवट लिटा कर उसकी ब्रा के हुक ढीले किये तो मानो दोनों को राहत मिली। शालीन ने ब्रा एक तरफ रख दी और एक शर्मीली प्रगति को सीधा किया जो अपने हाथ आँखों पर से हटा कर अपने स्तनों पर ले आई थी। शालीन ने दृढ़ता के साथ उसके दोनों हाथ बगल में इस तरह कर दिए मानो उन्हें वहाँ से ना हिलाने का आदेश दे रहा हो। प्रगति इन मामलों में अब काफ़ी समझदार थी और उसने अपने हाथ परे कर लिए।
शालीन को प्रगति के यौवन भरे, मांसल, छरहरे और गदराये हुए स्तन बहुत मादक लगे। उनके अहंकारी चुचूक शालीन को निमंत्रित भी कर रहे थे और चुनौती भी दे रहे थे। शालीन ने कितने सालों से ऐसे मदभरे और कमसिन स्तन नहीं देखे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था पहले वह उन्हें छुए या मुँह में ले। उसने दुविधा दूर करते हुए, एक को मुँह में और एक को हाथ में ले लिया और सीधा स्वर्ग का अनुभव करने लगा।
वैसे अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुए होंगे पर इतने सुडौल, लचीले और उभरे हुए थे कि शालीन उन्हें छू और चूस कर फूला नहीं समा रहा था। एक भूखे बच्चे की तरह उसके चूचे चूसने लगा और दूसरे को अपनी हथेली से गोल गोल घुमाने लगा। एक स्तन पर कड़ा प्रहार और दूसरे पर कोमल स्पर्श का विरोधाभास प्रगति को विस्मय में डाल रहा था। शालीन ने आपे से बाहर हो कर जब उसकी चूची को काटने की कोशिश की तो प्रगति ने अनायास अपना स्तन उसके मुँह से निकाल लिया। साथ ही उसके मुँह से एक दर्द की ऊई.. निकल गई।
शालीन को जब अपनी करतूत का आभास हुआ तो उसने तत्काल प्रगति को हार्दिक संवेदना ज़ाहिर की और अपने कान पकड़ने का इशारा किया। प्रगति को मालूम था कि शालीन जान बूझ कर उसे दर्द नहीं पहुँचा रहा था पर यौन-वेग में ऐसा हो जाता है। तो उसने शालीन को कान पकड़ने से मना करते हुए सहज भाव से उसका सिर खींच कर अपने दूसरे स्तन के पास ले आई। शालीन ने प्रगति को आँखों ही आँखों में आभार प्रकट किया और आँखों के सामने परोसे हुए आकर्षक व्यंजन को भोगने लगा। जिस चूची को उसने यौनावेश में काट सा लिया था उसे प्यार से सहला कर मानो मना रहा था। प्रगति को शालीन का बर्ताव अच्छा लगा।
कुछ देर स्तनपान करने के बाद शालीन का चंचल मुँह अलग स्वाद की कामना करने लगा। उसने स्तन से मुँह उठा कर सीधा प्रगति के लरजते और रसीले होटों पर रख दिया। उसने यह नहीं सोचा था कि वह प्रगति का चुम्बन लेगा पर उसके मनमोहक आचरण को देखकर उससे रहा नहीं गया और उसने सच्चे प्यार की मोहर प्रगति के होटों पर लगा ही दी। प्रगति थोड़ी अचंभित तो हुई पर उससे ज्यादा उसे गौरव का अहसास हुआ। शालीन जैसे उच्च अधिकारी का चुम्बन उसके लिए बहुत मायने रखता था। शरीर को हाथ लगाना या सम्भोग करना लड़की को इतना मान नहीं देता जितना होटों पर दिया हुआ प्यारा चुम्बन। यह वासना और प्रेम में फ़र्क़ दर्शाता है।
अब शालीन ने प्रगति के कपड़े उतारने का अभियान जारी किया। प्रगति ने निर्विरोध उसका सहयोग किया और शीघ्र ही वह पूरी तरह निर्वस्त्र हो गई। शालीन के चुम्बन से मिले गौरव और उसके हाथों की हरकत से प्रगति का शरीर काफी रोमांचित हो चुका था और प्रमाण स्वरुप उसकी योनि काफी भीग गई थी। उधर प्रगति की नंगी काया को देख कर शालीन का लिंग अपनी शालीनता त्याग कर तामसिक रूप धारण करने लगा था। उसने अहतियात के तौर पर कमरे का दरवाज़ा अन्दर से बंद कर दिया और अपने कपड़े उतार कर प्रगति के पास आ गया।

प्रगति ने पहली बार शालीन का नग्न शरीर देखा और शरमा कर अपना मुँह फेर लिया। पर उसने छोटी सी झलक में ही शालीन के लिंग के आकार और उसके बाकी शरीर को देख लिया था। उसे यह देख कर अच्छा लगा कि शालीन अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखता होगा क्योंकि इतनी उम्र होने पर भी वह हृष्ट-पुष्ट था। उसके अंग तंदुरुस्त लग रहे थे, उसके सीने पर मुलायम बाल थे, पेट सपाट था और लिंग के आस-पास के बाल कतरे हुए थे। हालाँकि, वह कोई पहलवान या फिल्मी हीरो नहीं लग रहा था पर एक निरोग और स्वस्थ युवक समान ज़रूर नज़र आ रहा था। प्रगति उसको देख कर खुश हो गई। उसे ऐसा लगा शायद शालीन मास्टरजी के मुकाबले बहतर प्रेमी साबित होगा। (मास्टरजी के बारे में जानने के लिए “प्रगति का अतीत” कहानी पढ़िए) उसे ऐसा लगा मानो शालीन उसके साथ ज्यादा ज़ोरदार सम्भोग कर पायेगा।
शालीन ने प्रगति की योनि को छू कर देखा कि वह उसके साथ समागम के लिए पूरी तरह तैयार है। आम तौर पर वह सम्भोग के पहले ज्यादा से ज्यादा देर तक लड़की को उत्तेजित करने की क्रिया करता था पर आज उसके पास समय कम था। शालीन को पता था कि हर लड़की को यौन में उतना ही मज़ा आता है जितना कि मर्दों को। पर सदियों के सामाजिक बंधनों और संस्कारों की बंदिशों ने नारी-जाति को यौन आनंद का इज़हार करने पर पाबंदी सी लगा रखी है। उनको यह जताया जाता है कि यौन सुख का दिखावा सिर्फ बुरे आचरण की लड़कियाँ ही करती हैं। अच्छे संस्कारों वाली लड़कियाँ यौन ज्ञान से अपरिचित होती हैं और यौन सुख का आनंद वे बेधड़क नहीं ले सकतीं। यह हमारे समाज की मान्यताओं की विडम्बना है।
पर शालीन चाहता था कि वह जब किसी लड़की के साथ यौन करे तो उसको पूरा सुख दे और उसको मज़ा लेने का पूरा अधिकार हो। वह अपनी यौन-संगिनी की ख़ुशी की किलकारी सुनना चाहता था। उसने कहीं यह भी पढ़ा था कि लगभग हर लड़की यौन चरमोत्कर्ष (परम यौन आनन्द) को पाने की क्षमता रखती है बशर्ते उसे ठीक से उत्तेजित और उसके साथ धैर्य से सम्भोग किया जाये। आज वह इसी बात को आजमाना चाहता था। वह लिंग योनि सम्भोग के माध्यम से प्रगति को चरमोत्कर्ष प्राप्त करवाना चाहता था।
इसी आशय से उसने उत्सुकता से तपती प्रगति के नग्न बदन को अपने आलिंगन में जकड़ लिया और उसके होटों को चूमते हुए अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी। प्रगति ने भी शालीन को कस कर पकड़ लिया और उसके मुँह का अपनी जीभ से मुआयना करने लगी। समय की कमी होने के कारण शालीन ने जल्दी जल्दी उसके पूरे जिस्म पर हाथ फेरा और उसको पीठ के बल लिटाने लगा। पर प्रगति ने नीचे झुक कर उसके लिंग को अपने मुँह में ले लिया। शालीन इसके लिए तैयार नहीं था वह पहले से ही उत्तेजित था और ऊपर से प्रगति के आकस्मिक हमले से उसके नियंत्रण को झटका लगा। उसके लाख ना चाहने के बावज़ूद वह एक-दो मिनट में ही अपना संतुलन खो बैठा और प्रगति के मुँह से लिंग निकालने का प्रयत्न करने लगा, वह उसके मुँह में वीर्योत्पात नहीं करना चाहता था।
पर प्रगति का इरादा कुछ और ही था उसने उसके लिंगमुख को अपने होटों में इस तरह दबा लिया कि वह बाहर नहीं आ पाया। इससे शालीन की व्याकुलता और बढ़ गई और वह और भी जल्दी और वेग के साथ वीर गति को प्राप्त होने लगा। उसका करीब दो हफ्ते का संजोया हुआ रस प्रगति के मुँह में बरसने लगा। वीर्य की हर फुहार के साथ शालीन का शरीर झकझोर रहा था। कोई पांच-छः पिचकारियों के बाद शालीन और उसका लिंग शांत हुआ। शालीन के जीवन में पहली बार किसी ने उसका लिंग-पान किया था। वह उत्कर्ष के शिखर पर था और उसने कृतज्ञता से प्रगति को उठा कर उसके वीर्य से सने होटों को चूमते हुए अपने गले लगा लिया। वे कुछ देर तक ऐसे ही रहे और फिर पकड़ ढीली करके बिस्तर पर लेट गए।
शालीन को बरसों से यह कामना थी कि कोई उसके लिंग को चूसे पर पत्नी के अरुचि के कारण ऐसा नहीं हो पाया था। आज जब वह बिल्कुल इसके लिए तैयार नहीं था, प्रगति ने न केवल उसका लिंग मुँह में ले लिया, बल्कि उसका रस-पान भी कर लिया। तो शालीन को तो मानो स्वर्ग मिल गया था। अब तो प्रगति को तृप्त करने के लिए शालीन और भी दृड़ संकल्प हो गया। वह जल्दी से जल्दी अपने मर्दांग को दोबारा आवेश में लाना चाहता था जिससे वह प्रगति का ऋण तत्काल चुका सके। प्रगति मानो शालीन की मनोस्थिति भांप गई थी। उसने शालीन के भाले में जान डालने के उद्देश्य से उसको हाथों में ले लिया और हौले-हौले सहलाने लगी।
कुछ देर में उसने शालीन को पीठ के बल लिटा कर उसके ऊपर आसन जमा लिया अपने मुँह और जीभ से उसके निम्नान्गों को चाटने लगी। प्रगति की पीठ शालीन की तरफ थी जिससे जब वह झुकती तो उसकी गांड शालीन को दिखाई देती। कभी कभी उसकी जांघों के बीच से उसके डोलते हुए स्तन भी दिख जाते। प्रगति की मौखिक क्रिया और उसके मादक अंगों के दृश्य से शालीन के शिथिल लिंग को मूसल बनने में ज्यादा देर नहीं लगी। जैसे ही उसके लंड में जान आई उसने प्रगति को अपने ऊपर से हटा कर पीठ के बल लिटा दिया और स्वयं उसके ऊपर आ गया। वह अपने कड़कपन को खोना नहीं चाहता था। बिना समय गंवाए उसने प्रगति की योनि पंखुड़ियों को अपने लिंग-नोक से रगड़ना शुरू किया। साथ ही अपने मुँह से उसके कसे हुए दूधिया टीलों पर आक्रमण कर दिया। उसकी जीभ का सामना उसके स्तनों पर विराजमान अहंकारी चुचूकों से हुआ जो किसी के सामने नतमस्तक नहीं होना चाहती थीं। शालीन की जीभ चोंच-समान चूचियों के चारों तरफ लपलपाने लगी।

उधर नीचे उसका लंड-शीर्ष धीरे धीरे जोर लगाते हुए प्रगति के योनि कपाट खोलने की चेष्टा कर रहा था। प्रगति ने मदद करते हुए अपनी जांघें थोड़ी और खोल दीं। शालीन का सुपारा योनि की कोपलों के ऊपर हल्का-हल्का वार कर रहा था और बीच बीच में उसके योनि-मुकुट पर टपकी मार रहा था।
प्रगति की ओखली शालीन के मूसल के लिए बिलकुल तैयार थी। उसके निम्न होटों से रस फूट चुका था जिससे गुफ़ा का रास्ता चिकना हो गया था। शालीन के दंड का मुकुट भी इस रस में भीग गया था जिस से जब वह प्रगति की सुरंग पर हल्का वार करता तो फिसलन के कारण अन्दर जाने लगता। पर शालीन अभी प्रवेश नहीं करना चाहता था। उसका उद्देश्य प्रगति को परमोत्कर्ष तक ले जाने का था। वह शनैः शनैः उसको कामुकता के शिखर पर ले जाना चाहता था। इसके लिए आत्म-नियंत्रण और धीरज की ज़रुरत थी। उसने अपने मुँह का ध्यान स्तनों से हटा कर प्रगति के पेट पर केन्द्रित किया। रेशम से रोएँ से ढका सपाट पेट शालीन के गालों को जब लगा तो उसकी हलकी दाढ़ी से प्रगति को बहुत गुदगुदी हुई। उसने अपने आप को इधर उधर हिलाया जिससे शालीन के लंड का सुपारा अपने लक्ष्य से हटकर यहाँ वहां लगने लगा।
शालीन ने गुदगुदाना बंद किया और प्रगति को काबू में करके फिर से उसकी म्यान में अपनी तलवार की नोक डालने लगा। शालीन ने तय कर लिया था कि वह जल्दबाजी में लंड को पूरा नहीं घोंपेगा। वह लगातार करीब आधा या एक इंच तक चूत में लंड डाल कर उसे मानो छेड़ रहा था। प्रगति की लालसा बढ़ रही थी और वह सांप रूपी लंड को जल्दी से उसके बिल में पहुँचाना चाहती थी। उसने अपनी टांगें और खोल दीं और शालीन के छोटे प्रहारों का जवाब अपने कूल्हे उठा उठा कर देने लगी जिससे उसका लट्ठ ज्यादा अन्दर चला जाये। पर शालीन होशियार था। उसने प्रगति को अपने प्रयास में सफल नहीं होने दिया। बस एक इंच तक का प्रवेश करता रहा जिससे प्रगति की योनि व्याकुल से व्याकुलतर होती गई। प्रगति अब किसी तरह अपनी चूत को लंड से भरना चाहती थी। अब शालीन ने प्रगति का हाथ लाकर उसकी एक ऊँगली उसके योनि-मटर पर रख दी और उसको हलके से सहलाने का इशारा कर दिया। प्रगति अपनी कलिका को सहलाने लगी। इससे उसकी उत्तेजना और भी बढ़ गई और वह कसमसाने लगी।
अब शालीन ने ब्रह्मास्त्र छोड़ते हुए अपनी तर्जनी ऊँगली को मुँह में गीला करके प्रगति की गांड में डाल दी और धीरे धीरे उसे अन्दर-बाहर करने लगा। प्रगति को इसकी अपेक्षा नहीं थी और वह सिहर उठी। उसके शरीर में मादकता का तूफ़ान उठने लगा और उसके धैर्य का बाँध टूटने लगा। वह हर हालत में शालीन के लंड को मूठ तक अपने कुंए में डलवाना चाहती थी। उसने अपने कूल्हों का प्रहार बढ़ाया और अपनी आँखों से अपनी इच्छ्पूर्ति की मानो भीख सी मांगने लगी। शालीन को इसी मौक़े का इंतज़ार था। उसने अपनी बरछी को पूरा बाहर निकाला और फिर पूरे वेग से उसे जड़ तक प्रगति की व्याकुल चूत में घुसेड़ दिया। जैसे बरसों से तपते रेगिस्तान को बारिश की झड़ी मिल गई हो, प्रगति की योनि लंड को पूरा अन्दर पाकर मानो मोक्ष को प्राप्त हो गई। उसके पूरे जिस्म में एक मरोड़ सी आई और वह एक ही पल में चरमोत्कर्ष को न्यौछावर हो गई। करीब आधे मिनट तक उसका जिस्म उत्कर्ष शिखर से उत्पन्न झटकों का सामना करता रहा और फिर धीरे से आनंद के सागर में डूब गया।

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