प्रगति की कुंवारी गांड part 2

मास्टरजी,”प्रगति, तुम्हारा जन्मदिन कब है?”
“जी, २६ अगस्त को।”
“अच्छा, जन्मदिन कैसे मनाते हो ?”
“जी, कुछ ख़ास नहीं। मंदिर जाते हैं, पिताजी मिठाई लाते हैं। कभी कभी नए कपड़े भी मिल जाते हैं !”
मास्टरजी,”तुम यहाँ पर कितने सालों से हो ?”
यह सवालात करते वक़्त मास्टरजी अपने लंड से उसके योनिद्वार पर लगातार धीरे धीरे दस्तक दे रहे थे जिससे एक तो लंड कड़क रहे और दूसरा उनका निशाना न बिगड़े।
“जी, करीब पांच साल से।”
“तुम्हारे कितने भाई बहन हैं?”
“जी, हम तीन बहनें हैं। भाई कोई नहीं है!”
“ओह, तो भाई की कमी खलती होगी !”
“जी”
“कोई लड़का दोस्त है तुम्हारा ?”
“जी नहीं” प्रगति ने ज़ोर से कहा। मानो ऐसा होना गलत बात हो।
“इसमें कोई गलत बात क्या है। हर लड़की के जीवन में कोई न कोई लड़का तो होना ही चाहिए !”
“किसलिए ?”
“किस लिए क्या ? किस करने के लिए और क्या !! आज तुम्हें चुम्मी में मज़ा नहीं आया क्या ?”
“जी आया था !”
मास्टरजी ने अपने लंड के धक्कों का माप थोड़ा बढ़ाया।
“क्या तुम लड़की को ऐसी चुम्मी देना चाहोगी?”
“ना ना ..। कभी नहीं !”
“तो फिर लड़का होना चाहिए ना ?”
“जी”
“अगर कोई और नहीं है तो मुझे ही अपना दोस्त समझ लो, ठीक ?”
“जी ठीक”
उसके यह कहते ही मास्टरजी ने एक ज़ोरदार धक्का लगाया और उनका लंड इस बार प्रगति की झिल्ली के विरोध को पछाड़ते हुए काफी अन्दर चला गया।
प्रगति बातों में लगी थी और मास्टरजी की योजना नहीं जानती थी। इस अचानक आक्रमण से हक्की बक्की रह गई। उसकी योनि में एक तीव्र दर्द हुआ और उसको कुछ गर्म द्रव्य के बहने का अहसास हुआ। उसके मुँह से ज़ोर की चीख निकली और उसने मास्टरजी के हाथ ज़ोर से जकड़ लिए।
मास्टरजी थोड़ी देर रुके रहे। जब अचानक हुए दर्द का असर कुछ कम हुआ तो उन्होंने कहा,”मैंने कहा था थोड़ी पीड़ा होगी। बस अब नहीं होगी। यह दर्द तो तुम्हें कभी न कभी सहना ही था …। हर लड़की को सहना पड़ता है।”
प्रगति कुछ नहीं बोली।
मास्टरजी का काम अभी पूरा नहीं हुआ था उनका लंड पूरी तरह प्रगति में समावेश नहीं हुआ था। बड़े धीरज के साथ उन्होंने फिर से लंड की हरकत शुरू की। वे प्रगति के शरीर पर चुम्मियां भी बरसा रहे थे और उसके चूत मटर के चारों ओर उंगली से हल्का दबाव भी डाल रहे थे। प्रगति को दर्द हो रहा था और वह उसे सहन कर रही थी। जब कि दर्द उसकी योनि के अन्दर हो रहा था उसके बाक़ी जिस्म में एक नया सा सुख फैल रहा था। उसको योनि दर्द का मुआवज़ा बाक़ी जगह के सुख से मिल रहा था। धीरे धीरे उसका दर्द कम हुआ।
मास्टरजी,”अब कैसा लग रहा है ? तुम कहो तो बंद करुँ ?”
प्रगति ने आँखों और सिर के इशारे से बताया वह ठीक है।
मास्टरजी,”ठीक है। कभी भी दर्द सहन न हो तो मुझे बता देना। इसमें तुम्हें भी मज़ा आना चाहिए। ”
प्रगति,”जी बता दूंगी”
अब मास्टरजी ने जितना लंड अन्दर गया था उतनी दूरी के धक्के ही लगाने शुरू किये। प्रगति को कामोत्तेजित रखने के लिए उसके संवेदनशील अंगों को सहलाते रहे और उसकी खूबसूरती की प्रशंसा करते रहे। प्रगति धीरे धीरे उनके क्रिया-तंत्र से प्रभावित होने लगी और दर्द की अवहेलना करते हुए उनका साथ देने लगी।
प्रगति के उत्साह से मास्टरजी ने अपना ज़ोर बढ़ाया और अपने धक्कों में उन्नति लाते हुए प्रगति की योनि के और भीतर प्रवेश में जुट गए।
धैर्य और विश्वास के साथ हर नए धक्के में वे थोड़ी और प्रगति कर रहे थे। प्रगति भी उनकी इस सावधानी से खुश थी। उसे महसूस हो रहा था कि मास्टरजी उसका ध्यान अपनी खुशी की तुलना में ज़्यादा रख रहे हैं। उसके मन में मास्टरजी के प्रति प्यार उमड़ गया और उसने ऊपर उठकर उनके मुँह को चूम लिया। मास्टरजी इस पुरस्कार के प्रबल दावेदार थे। उन्होंने भी उसके होटों पर चुम्मी कर दी और दोनों मुस्करा दिए।

मास्टरजी ने अब अपना पौरुष दिखाना शुरू किया। अपने लंड से प्रगति के योनि दुर्ग पर निर्णायक फतह पाने के लिए उन्होंने युद्धघोष कर दिया। उनका दंड प्रगति की गुफा में अग्रसर हो रहा था। हर बार उनका लट्ठ पूरा बाहर आता और पूरे वेग से अन्दर प्रविष्ट होता। हर प्रहार में पिछली बार के मुकाबले ज़्यादा अन्दर जा रहा था। आम तौर पर तो इतनी देर में उनका लंड पूर्णतया घर कर गया होता पर प्रगति की नवेली चूत अत्यधिक तंग थी और मास्टरजी के लंड को नितांत घर्षण प्रदान कर रही थी। उनके आनंद की चरम सीमा नहीं थी। वे इस उन्माद का लम्बे समय तक उपभोग करना चाहते थे इसलिए उन्हें कोई जल्दी नहीं थी।

उधर प्रगति भी मास्टरजी के धैर्य युक्त रवैये से संतुष्ट थी और सम्भोग का आनंद उठा रही थे। अनायास ही उसके मुँह से किलकारियां निकलने लगीं। कभी कराहती कभी आहें भरती तो कभी कूकती। उसके इस संगीत से मास्टरजी का आत्मविश्वास बढ़ रहा था और वे अपने मैथुन वेग में विविधता ला रहे थे। चार पांच छोटे वार के बाद एक दो लम्बे वार करते जिनमें उनका लंड योनि से पूरा बाहर आ कर फिर से पूरा अन्दर जाता था। वार की गति में भी बदलाव लाते …। कभी धीरे धीरे और कभी तेज़ तेज़।

इस परिवर्तन भरे क्रम से प्रगति की उत्सुकता बढ़ रही थी। उसे यह नहीं पता चल रहा था कि आगे कैसा वार होगा !! मास्टरजी का आत्म नियंत्रण अब अपनी सीमा के समीप पहुँच रहा था। बहुत देर से वे अपने आप को संभाले हुए थे। वे अपने स्खलन के पहले प्रगति को चरमोत्कर्ष तक पहुँचाना चाहते थे। इस लक्ष्य से उन्होंने प्रगति की भग-शिश्न (योनि मटर) को सुलगाना शुरू किया। कहते हैं यह भाग लड़की के शरीर का इतना संवेदनशील हिस्सा है कि इसको कभी पकड़ना, मसलना या सहलाना नहीं चाहिए। सिर्फ इसके इर्द गिर्द उंगली से लड़की को छेड़ना चाहिए। उसकी कामुकता को भड़काना चाहिए । अगर सीधे सीधे उसकी मटर को छुएंगे तो वह शायद सह नहीं पाए और उसकी कामाग्नि भड़कने के बजाय बुझने लगे….

मास्टरजी को यह सब पता था। वे सुनियोजित तरीके से प्रगति की वासना रूपी आग में मटर की छेड़छाड़ से मानो घी डाल रहे थे। प्रगति घी पड़ते ही प्रज्वलित हो गई और नागिन की तरह मास्टरजी के बीन रूपी लंड के सामने डोलने लगी। उसके मुँह से अद्भुत आवाजें आने लगीं। उसने अपनी टांगों से मास्टरजी की कमर को घेर लिया और उनके लिंग-योनि यातायात को और प्रघाढ़ बनाने में मदद करने लगी। उसने अपनी मुंदी आँखें खोल लीं और मास्टरजी को आदर और प्यार के प्रभावशाली मिश्रण से देखने लगी। मास्टरजी की आँखें आसमान की तरफ थीं और वे भुजंगासन में प्रगति को चोद रहे थे। उनकी साँसें तेज़ हो रहीं थीं। माथे पर पसीने की कुछ बूँदें छलक आईं थीं। वे एक निश्चित लय और ताल के साथ निरंतर ऊपर नीचे हो रहे थे। प्रगति उन्हें देख कर आत्म विभोर हो रही थी। उसे मास्टरजी पर अपना वशीकरण साफ़ दिख रहा था। उसने फिर से आँखें मूँद लीं और मास्टरजी की लय से लय मिला कर धक्कम पेल करने लगी।

अब उसके शरीर में एक तूफ़ान उत्पन्न होने लगा। उसे लगा मानो पूरा शरीर संवेदना से भर गया है। वह भौतिक सुख की सीढ़ीयों पर ऊपर को चली जा रही थी। उसमें उन्माद का नशा पनपने लगा। उसे लगा वह बेहोश हो जायेगी। मास्टरजी अपनी लय में लगे हुए थे। प्रगति का चैतन्य शरीर मोक्ष प्राप्ति की तरफ बढ़ रहा था।

फिर अचानक उसके गर्भ की गहराई में एक विस्फोट सा हुआ और वह थरथरा गई उसका जिस्म अकड़ कर उठा और धम्म से बिस्तर पर गिर गया। वह मूर्छित सी पड़ गई। उसकी योनि से एक धारा सी फूटी जिसने मास्टरजी के लंड को नहला दिया। उनका गीला लंड

और भी चपल हो गया और चूत के अन्दर बाहर आसानी से फिसलने लगा। प्रगति के कामोन्माद को देख कर मास्टरजी का नियंत्रण भी टूट गया और उन्होंने एक संपूर्ण वार के साथ अपनी मोक्ष प्राप्ति कर ली। उनकी तृप्त आत्मा से एक सुखद चीत्कार निकली जिसने प्रगति की योगनिद्रा को भंग कर दिया। उनके लिंग से एक गाढ़ा, दमदार और ओजस्वी वीर्य प्रपात छूटा जो उन्होंने प्रगति के पेट और वक्ष स्थल पर उंडेल दिया। फिर थक कर खुद भी उस पर गिर गए।

प्रगति ने उनको अपनी बाँहों में भर लिया। प्रगति और मास्टरजी के शरीर उनके वीर्य रूपी गौंद से मानो चिपक से गए और वे न जाने कब तक यूँ ही लेटे रहे।

एक युग के बाद दोनों उठने को हुए तो पता चला की वीर्य गौंद से वे वाकई चिपक गए हैं। अलग होने की कोशिश में मास्टरजी के सीने के बाल खिंच रहे थे और कुछ टूट कर प्रगति के वक्ष पर लिस गए थे। प्रगति को अचानक शर्म सी आने लगी और वह अपने आप को छुड़ा कर अपने कपड़े लेकर गुसलखाने की ओर भाग गई। वह नहा कर बाहर आई तो मास्टरजी ने उसको एक बार फिर से आलिंगनबद्ध कर लिया और कृतज्ञ नज़रों से शुक्रिया देने लगे। प्रगति ने उनका गाल चूम कर उनका धन्यवाद किया और घर जाने के लिए निकलने लगी।

मास्टरजी ने उसे पिछ्वाड़े से बाहर जाने का रास्ता बताया। वह जाने ही वाली थी कि उसे याद आया और बोली,”मास्टरजी, आप अंजलि को कोई मिठाई देने वाले थे। उस समय तो वह जल्दी में थी। कहो तो मैं ले जाऊं। मेरी बहनें खुश हो जायेंगी !”

मास्टरजी एक ही दिन में तीन लड़कियों को खुश करने का मौका नहीं गवांना चाहते थे सो झट से बोले,”हाँ हाँ, क्यों नहीं। तुम पूरा डब्बा ही ले जाओ।” अब मुझे मिठाई की ज़रुरत नहीं रही। मेरी आत्मा तुम्हारे होंटों का रस पी कर हमेशा के लिए मीठी हो गई है।”

यह कहते हुए उन्होंने प्रगति को मिठाई का डब्बा पकड़ा दिया।

फिर उसकी आँखों में आँखें डाल कर बोले,”कल आओगी तो आज का मज़ा भूल जाओगी। कल एक विशेष पाठ पढ़ाना है तुम्हें। बोलो आओगी ना ? ”

“जी पूरी कोशिश करूंगी !” अब तो प्रगति को रति सुख का चस्का लग गया था। लड़कियों को ख़ास तौर से इस चस्के का नशा बहुत गहरा लगता है !!!

मास्टरजी ने पहले घर के बाहर जा कर मुआइना कर लिया कि कहीं कोई है तो नहीं और फिर प्रगति को घर जाने की आज्ञा दे दी।

प्रगति अपनी सूजी हुई योनि लिए अपने घर को चल दी।

किसी न किसी कारणवश मास्टरजी प्रगति से अगले 4-5 दिन नहीं मिल सके। प्रगति कोई न कोई बहाना करके उन्हें टाल रही थी। बाद में मास्टरजी को पता चला कि प्रगति को मासिक धर्म हो गया था। वे खुश हो गए। कामुकता के तैश में वे यह तो भूल ही गए थे कि उनकी इस हरकत से प्रगति गर्भ धारण कर सकती थी। इस परिणाम के महत्व को सोचकर उनके रोंगटे खड़े हो गए। वे ऐसी गलती कैसे कर बैठे। अपने आप को भाग्यशाली समझ रहे थे कि वे इतनी बड़ी भूल से होने वाले संकट से बच गए। उन्होंने तय किया ऐसा जोखिम वे दोबारा नहीं उठाएँगे।

उन्हें पता था कि आम तौर पर लड़की के मासिक धर्म शुरू होने से लगभग दस दिन पहले और लगभग दस दिन बाद तक का समय गर्भ धारण के लिए उपयुक्त नहीं होता। मतलब कि इस दौरान किये गए सम्भोग में लड़की के गर्भवती होने की सम्भावना कम होती है। कुछ लोग इसे सुरक्षित समय समझ कर बिना किसी सावधानी (कंडोम) के सम्भोग करना उचित समझते हैं। वैसे कई बार उनकी यह लापरवाही उन्हें महंगी पड़ती है और लड़की के गर्भ में अनचाहा बच्चा पनपने लगता है। अगर लड़की अविवाहित है तो उस पर अनेक सामाजिक दबाव पड़ जाते हैं जिससे उसके तन और मन दोनों पर दुष्प्रभाव होता है। एक गर्भवती के लिए ऐसे दुष्प्रभाव बहुत हानिकारक होते हैं। गर्भ धारण तो एक लड़की तथा उसके परिवार वालों के लिए सबसे ज्यादा खुशी का मौका होना चाहिए न कि समाज से आँखें चुराने का।

मास्टरजी ने भगवान का दुगना शुक्रिया अदा किया। एक तो उन्होंने प्रगति को गर्भवती नहीं बनाया दूसरे उन्हें प्रगति के मासिक धर्म की तारीख पता चल गई जिससे वे उसके साथ सुरक्षित सम्भोग के दिन जान गए। जिस दिन मासिक धर्म शुरू हुआ था उस दिन से दस दिन बाद तक प्रगति गर्भ से सुरक्षित थी। यानि अगले पांच दिन और।

यह सोच सोच कर मास्टरजी फूले नहीं समा रहे थे कि अगले पांच दिनों में वे प्रगति के साथ निश्चिन्तता के साथ मनमानी कर पाएंगे। आज प्रगति पांच दिनों के बाद आने वाली थी। यह सोचकर उनके मन में लड्डू फूट रहे थे और उनका लंड प्रत्याशित आनंद से फूल रहा था।

वहां प्रगति भी मास्टरजी से मिलने के लिए बेक़रार हो रही थी। उसके भोले भाले जवान जिस्म को एक नया नशा चढ़ गया था। जिन अनुभवों का उसके शरीर को अब तक बोध नहीं था वे उसके तन मन में खलबली मचा रहे थे। अचानक उसे सामान्य मनोरंजन की चीज़ों से कोई लगाव ही नहीं रहा। गुड्डे-गुडियां, आँख-मिचोली, ताश, उछल-कूद वगैरह जो अब तक उसे अच्छे लगते थे, मानो नीरस हो गए थे। उसे अपनी देह में नए नए प्रवाहों की अनुभूति होने लगी थी। उसकी इन्द्रियां उसे छेड़ती रहती थीं और उसका मन मास्टरजी के घर में गुज़रे क्षणों को याद करता रहता।

यद्यपि जीभ करीब आधा इंच ही अन्दर बाहर हो पा रही थी, प्रगति को संपूर्ण आनंद मिल रहा था। उसे क्या पता था कि योनि का बाहरी लगभग एक इंच का हिस्सा ही संवेदनशील होता है क्योंकि इस एक इंच के हिस्से में ही सारी धमनियां होती हैं जिनमें स्पर्श का अनुभव करने की शक्ति होती है। योनि के भीतर के हिस्से में ये धमनियां नहीं होतीं और उन हिस्सों में कोई चेतना नहीं होती। इसीलिये कहते हैं कि स्त्री को भौतिक सुख देने के लिए बड़े लिंग की ज़रुरत नहीं होती। एक इंच का लिंग ही काफी है। बहुत से मर्द व्यर्थ ही अपने लिंग के माप और आकार को लेकर चिंतित रहते हैं। माप और आकार से कहीं ज्यादा महत्व उसके उपयोग का होता है। किस तरह एक मर्द अपने लिंग से स्त्री को उत्तेजित करता है और उसको अपना प्यार दर्शाता है।

इस तथ्य का इससे बेहतर क्या प्रमाण हो सकता है कि हर लड़की जीभ से किये गए योनि स्पर्श से पूरी तरह उत्तेजित और तृप्त तथा संतुष्ट हो जाती है। जीभ का आकार और माप तो आम लिंग के मुक़ाबले बहुत छोटा होता है। बड़े लंड से मर्दों के स्वाभिमान को हवा मिलती हो पर ज़रूरी नहीं कि लड़की को भी ज्यादा सुख मिलता है।

मास्टरजी ने जीभ से प्रगति को चोदना शुरू किया और बीच बीच में जीभ से उसके योनिद्वार के मुकुट पर स्थित मटर की भी परिक्रमा करने लगे। विविधता लाने के लिए वे कभी कभी योनि के बाहर दोनों तरफ की जांघों को चाट लेते थे। प्रगति के जननांग तरावट से ठंडक महसूस कर रहे थे। उसे बहुत मज़ा आ रहा था और वह अपनी चूत को मास्टरजी के मुख के पास रखने की कोशिश में रहती।

मास्टरजी की जीभ थकने लगी तो वे उठ गए और उन्होंने प्रगति को करवट लेने को कहा। प्रगति झट से अपने पेट पर लेट गई।

एक बार फिर मास्टरजी ने गीले तौलिये से प्रगति की पीठ, चूतड़ और जांघों के पिछले हिस्से को पौंछ कर साफ़ कर लिया। फिर प्रगति को उन्होंने इतना पीछे खींच लिया जिससे उसके घुटने ज़मीन पर टिक गए और पेट से आगे तक का हिस्सा बिस्तर पर रह गया। उसके चूतड़ों की ऊंचाई ठीक करने के लिए उसके पेट के नीचे एक तकिया रख दिया। एक छोटा स्टूल लेकर वे उसके चूतड़ों के पीछे पास आकर बैठ गए। हाथों से उसके चूतड़ों के गाल इस तरह अलग लिए कि उसकी गांड दिखाई देने लगी। फिर उन्होंने नीचे से उसकी योनि को चाटना शुरू किया और इस बार उनकी जीभ योनि से नीचे होते हुए चूतड़ों की दरार में आने लगी। कुछ समय बाद उनकी जीभ का भ्रमण योनि से लेकर दरार में होता हुआ उसकी गांड के छेद तक होने लगा। प्रगति को ऐसा अनुभव पहले नहीं हुआ था। मास्टरजी की जीभ का स्पर्श उसे मंत्रमुग्ध कर रहा था।

मास्टरजी की जीभ उसके गुप्तांगों में ऐसे फिर रही थी मानो कोई लिफाफे पर गौंद लगा रही हो। प्रगति का सुखद कराहना शुरू हो गया था। मास्टरजी की जीभ अब उसकी गांड के छेद पर केन्द्रित हो गई और उसके गोल गोल चक्कर लगाने लगी। एक दो बार उन्होंने जीभ को पैना कर के गांड के अन्दर डालने की कोशिश भी की पर प्रगति ने अपनी गांड को कस कर बंद किया हुआ था। वह सातवें आसमान पर थी। उसकी योनि से पानी छूटने लगा था और वह इस कदर उत्तेजित हो गई थी अपने ऊपर काबू पाना मुश्किल हो रहा था। लज्जा और संस्कार उसे बांधे हुए थे वरना वह कबकी मास्टरजी से चोदने के लिए कह देती।

मास्टरजी ने अपनी थकी हुई जीभ को आराम देते हुए अपने आप को प्रगति के तिलमिलाते शरीर से अलग किया और उसके पास आकर लेट गए। प्रगति एकदम उनके ऊपर आ कर लेट गई और उन पर चुम्मियों के बौछार कर दी। मास्टरजी उसकी गांड तक में जीभ डाल देंगे, प्रगति को बड़ा अचरज था।

वह उनका किस तरह धन्यवाद करे सोच नहीं पा रही थी ……। पर मास्टरजी को मालूम था !

उन्होंने उसके असमंजस को भांपते हुए उसे अपने पास बैठने का इशारा किया और पूछा,”बोलो, कैसा लगा?”

प्रगति के पास शब्द नहीं थे फिर भी बोली,”मैं स्वर्ग में थी !”

मास्टरजी,”कोई तकलीफ तो नहीं हुई ?”

प्रगति,”मुझे काहे की तकलीफ होती ?”

मास्टरजी,”अच्छा, तो क्या मुझे भी स्वर्ग का अनुभव करा दोगी ?”

“आप जो भी चाहोगे, करूंगी !” प्रगति ने स्पष्ट किया।

मास्टरजी की बांछें खिल गईं और वे मुस्करा दिए।

अब मास्टरजी के मज़े लूटने की बारी थी। उन्होंने प्रगति को तौलिये और बाल्टी की तरफ इशारा करते हुए बताया कि वह उन्हें वैसे ही पौंछ कर साफ़ करे जैसा उन्होंने उसे किया था। प्रगति फ़ुर्ती से उठी और तौलिया लेकर शुरू होने लगी पर पानी छूकर बोली,”मास्टरजी, यह तो ठंडा हो गया !”

मास्टरजी,”ओह, लाओ मैं गर्म पानी ले आता हूँ।”

प्रगति,”आप रुको, मैं ले आती हूँ !” कहते हुए वह गुसलखाने में चली गई और वहां से गर्म पानी ले आई। उसको इस तरह अपने घर में नंगी घूमते देख कर मास्टरजी को बहुत अच्छा लगा। उनका मन हो रहा था वह हमेशा उनके साथ रहे और इसी तरह घर में नंगी ही फिरती रहे। जब वह बालटी लेकर वापस आई और उसने मास्टरजी को उसे एकटक देखते हुए देखा तो उसे अपने नंगेपन का अहसास हुआ और वह यकायक शरमा गई। उसने अपना दुपट्टा अपने ऊपर ले लिया। मास्टरजी ने उसका दुपट्टा छीनते हुए कहा,”तुम तो मुझे स्वर्ग दिखाना चाहती थी फिर उसे छुपा क्यों रही हो? तुम बहुत अच्छी लग रही हो। मुझे देखने दो !!”

प्रगति,”आप रुको, मैं ले आती हूँ !” कहते हुए वह गुसलखाने में चली गई और वहां से गर्म पानी ले आई। उसको इस तरह अपने घर में नंगी घूमते देख कर मास्टरजी को बहुत अच्छा लगा। उनका मन हो रहा था वह हमेशा उनके साथ रहे और इसी तरह घर में नंगी ही फिरती रहे। जब वह बालटी लेकर वापस आई और उसने मास्टरजी को उसे एकटक देखते हुए देखा तो उसे अपने नंगेपन का अहसास हुआ और वह यकायक शरमा गई। उसने अपना दुपट्टा अपने ऊपर ले लिया। मास्टरजी ने उसका दुपट्टा छीनते हुए कहा,”तुम तो मुझे स्वर्ग दिखाना चाहती थी फिर उसे छुपा क्यों रही हो? तुम बहुत अच्छी लग रही हो। मुझे देखने दो !!”
प्रगति ने दुपट्टा अलग रख दिया और मास्टरजी को स्पंज बाथ देने लगी। मास्टरजी उसे बताते जा रहे थे कि शरीर पर कहाँ कहाँ तौलिया लगाना है और वह एक आज्ञाकारी शिष्या की तरह उनका कहना मान रही थी।
छाती, पेट और जाँघों का साफ़ करने के बाद मास्टरजी ने उसे उनका लंड और उसके आस पास का इलाका पोंछने को कहा। प्रगति को उनका लिंग पकड़ने में संकोच हो रहा था।
मास्टरजी,”क्यों क्या हुआ ? शर्म आ रही है ?”
प्रगति,”जी !”
मास्टरजी,”इसमें शर्म की क्या बात है ? लो अपने हाथ में लो और इसे भी साफ़ करो।”
प्रगति,”जी !”
प्रगति ने पोले हाथों से जब उनके लंड को अपने हाथों में लिया तो दोनों को एक करंट सा लगा। हाथ में आते ही उनका शिथिलाया हुआ सा लंड घना और ठोस होने लगा। प्रगति को उसके इस कायाकल्प की उम्मीद नहीं थी और वह अचरज में पड़ गई। उसके हाथों में उनका लंड बड़ा होने लगा और कठोर भी हो गया।
उसने धीरे धीरे, डरते डरते, उनके लिंग को गीले तौलिये से पौंछना शुरू कर दिया। मास्टरजी को उसका यह सहमा हुआ अंदाज़ बहुत अच्छा लग रहा था और साथ ही उसके नरम हाथों का लंड पर स्पर्श बड़ा आनंद दे रहा था। जब लंड और अन्डकोषों की सफाई हो गई तो उन्होंने प्रगति को तौलिया सुखाने का संकेत दिया और अपने पास बैठने को कहा। जब वह पास बैठ गई तो मास्टरजी बोले,”देखो प्रगति, जब एक लड़की को किसी आदमी से सच्चा प्यार होता है तो वह उसके लिए कुछ भी कर सकती है। है ना ?”
प्रगति,”जी हाँ !”
मास्टरजी,”क्या तुम मुझसे सच्चा प्यार करती हो ?”
प्रगति,”जी हाँ !”
मास्टरजी,” तो क्या तुम मेरी खुशी के किये कुछ भी करोगी ?”
प्रगति,” जी, बिल्कुल !”
मास्टरजी,”तो फिर मेरे लंड को अपने मुँह में लेकर चूसो !”
प्रगति को बड़ी हिचकिचाहट हो रही थी। उसे बदन के ये हिस्से गंदे लगते थे क्योंकि इनमें से मल-मूत्र निकलता था। वह धर्म-संकट में फँस गई थी। एक तरफ उसका असली संकोच और दूसरी तरफ मास्टरजी का उस पर अहसान जो उन्होंने उसकी चूत और गांड चूस कर किया था। अगर वे कर सकते हैं तो उसे भी कर लेना चाहिए। तर्क और बुद्धि का तो यही तकाज़ा था। उसने मन कड़ा करके अपने मुँह को मास्टरजी के लंड के पास ले आई पर उसे मुँह के अन्दर नहीं ले पाई। जैसे एक शाकाहारी किसी मांस के कौर को मुँह में नहीं ले पाता उसी प्रकार प्रगति भी विवश सी लग रही थी। मास्टरजी उसकी विपदा को समझ गए और बैठ गए। उनका लंड भी मुरझा गया था। उन्होंने पास में छुपाई हुई शहद की कटोरी निकाली और उसे अपने लिंग के आस पास पेट और जांघों पर लगा लिया।

फिर प्रगति से बोले,”शहद सेहत के लिए अच्छा होता है। इसे तो चाट सकती हो ना?”
प्रगति बिना उत्तर दिए झुक कर उनके पेट पर से शहद चाटने लगी। धीरे धीरे उसका मुँह उनके लिंग के करीब आता जा रहा था। मास्टरजी को यह बहुत ही उत्तेजक लग रहा था। उसके मुँह से होती गुदगुदी के आलावा उसके बालों की लटें मास्टरजी के पेट पर लोट कर उन्हें गुदगुदा रहीं थीं। जब प्रगति ने सारा शहद चाट लिया तो उन्होंने इस बार शहद अपने लंड की छड़ पर लगा दिया और प्रगति को देखने लगे। प्रगति ने उनके लंड की छड़ को चाटना शुरू किया। वह इस कला में अबोध थी और पर उसका निश्चय मास्टरजी को खुश करने का था सो जैसे बन पड़ रहा था अपनी जीभ से कर रही थी। मास्टरजी को प्रगति की अप्रशिक्षित विधि भी अच्छे लग रही थी क्योंकि उसमें सच्चा प्यार था। मास्टरजी उसको इशारों से बताते जा रहे थे कि किस तरह लंड की छड़ को ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर की तरफ चाटा जाता है। वे अपनी जीभ से अपनी बीच की उंगली पर नमूने के तौर पर क्रिया कर रहे थे और प्रगति उन्हें देख देख कर उनके लंड पर वही प्रक्रिया दोहरा रही थी।
आखिर में मास्टरजी ने शहद अपने लंड के सुपारे पर लगा दिया और थोड़ा बहुत छड़ पर भी मल लिया। प्रगति को थोड़ा सुस्ताने का मौका मिला और जब मास्टरजी दोबारा लेटे तो उसने पहली बार उनके लंड के सुपारे को अपने मुँह में लिया। मास्टरजी को उसके मुँह की गर्माइश बहुत अच्छी लगी और उनका लंड उत्तेजना से और भी फूल गया। प्रगति सुपारे पर लगे शहद को लौलीपॉप की तरह चूस रही थी। मास्टरजी संवेदना में छटपटाने लगे और उनका लिंग इधर उधर हिलने लगा। प्रगति उसको मुँह में रखने के लिए संघर्ष करने लगी और आखिरकार फतह पा ली। उसने उनके सुपारे को मुँह में ले ही लिया। अब मास्टरजी ने उसे लंड को मुँह के और अन्दर लेने का संकेत किया। सुपारा बहुत बड़ा था और प्रगति का मुँह छोटा लग रहा था पर प्रगति ने किसी तरह उसे मुँह में ले ही लिया। मास्टरजी ने अपने मुँह में अपनी उंगली डाल कर प्रगति को अगली क्रिया का प्रदर्शन किया। प्रगति उनके दर्शाए तरीके से उनके लंड को मुँह के अन्दर बाहर करने लगी।
कुछ देर में जैसे उसका मुँह उनके लंड के लायक खुल गया और वह लगभग पूरा लंड अन्दर-बाहर करने लगी। बस एक-डेढ़ इंच ही बाहर रह रहा था। मास्टरजी को अत्याधिक आनंद आ रहा था और वे कुछ कुछ आवाजें निकालने लगे थे।
प्रगति सांस लेने के लिए थोड़ा रुकी तो मास्टरजी उठ कर खड़े हो गए और प्रगति को अपने सामने घुटनों पर बैठने का आदेश दे दिया। अब उन्होंने प्रगति के मुख में लंड प्रवेश करते हुए उसके मुख को चोदने लगे। उन्होंने प्रगति का सर उसकी चोटी से पकड़ लिया और सम्भोग समान धक्के लगाने लगे। जब उनका लंड ज्यादा अन्दर चला जाता तो प्रगति का गला घुटने लगता और उसकी खांसी सी उठ जाती। मास्टरजी थोड़ा रुक कर फिर शुरू हो जाते। वे उसके मुँह और गले की धारण क्षमता बढ़ाना चाहते थे जिससे उनका पूरा लंड अन्दर जा सके। पर शायद यह संभव नहीं हो पा रहा था। कुछ तो प्रगति को अभ्यास नहीं था और कुछ उसे गला घुटने का डर भी था।
मास्टरजी ने आखिर प्रगति को बिस्तर पर सीधा (पीठ के बल) लेटने को कहा और उसके सिर को बिस्तर के किनारे से नीचे को लटका दिया। सिर के अलावा उसका पूरा शरीर बिस्तर पर था और उसका सिर पीछे की तरफ हो कर गर्दन से नीचे लटक रहा था। उन्होंने कुछ तकियों का सहारा लेकर उसके सिर की ऊंचाई को ठीक किया जिससे उसका मुँह उनके लंड के बराबर ऊपर हो गया।
अब मास्टरजी ने उसे निर्देश देने शुरू किये,”प्रगति, अपना मुँह पूरा खोलो!”
प्रगति ने मुँह खोल लिया।
“और खोलो !”
प्रगति ने जितना हो सकता था और खोल लिया।
“अब अपनी जीभ बाहर निकालो !”
प्रगति ने जीभ बाहर निकाल ली और दुर्गा माँ का सा रूप धारण कर लिया !!
“अब ऐसे ही रहना। मैं लंड अन्दर डालूँगा। घबराना नहीं !”
यह कहते हुए मास्टरजी लंड उसके मुँह में डालने लगे। प्रगति की जीभ अचानक उसके मुँह में अन्दर चली गई।
मास्टरजी,”प्रगति, जीभ बाहर रखने की कोशिश करो। मेरे लंड को जीभ बाहर रखते हुए ही मुँह में लेना है, समझ गई ?”
“जी मास्टरजी !”

एक बार फिर कोशिश की पर प्रगति की ज़ुबान एकाएक अन्दर चली जाती थी। पर वह खुद ही बोली,” मास्टरजी, ठहरिये !” और फिर एक लम्बी सांस लेने के बाद और अपने सिर को तकिये पर ठीक से रखने के बाद बोली,”चलो, इस बार देखते हैं क्या होता है !” और अपना मुँह चौड़ा खोल कर जीभ बाहर खींच कर तैयार हो गई। मास्टरजी ने अपना लंड फिर से उसके मुँह में डालने का प्रयत्न किया। इस बार लंड अन्दर चला गया और जीभ बाहर ही रही। जीभ के बाहर रहने से प्रगति के मुँह में लंड के लिए जगह बन गई और लगभग पूरा लंड अन्दर चला गया। मास्टरजी ने प्रगति के शरीर को थपथपा कर शाबाशी दी और पूछा “कैसा लग रहा है ?”
प्रगति कुछ कहने की स्थिति में नहीं थी। उसकी मानो बोलती बंद थी !!! अपने हाथ का अंगूठा ऊपर उठा कर “ओ के” का संकेत दे दिया। मास्टरजी ने धीरे धीरे उसके मुँह को चोदना शुरू किया। अब प्रगति का मुँह उसकी योनि का स्थान ले चुका था और योनि के सामान गीला और चिकना भी लग रहा था। पर जहाँ योनि सिर्फ एक गुफा रूपी छेद होती है, मुँह में खोलने-बंद करना की क्षमता व जीभ और दांत भी होते हैं जिनका अगर उपयुक्त इस्तेमाल किया जाए तो वह योनि से कहीं ज्यादा आनंद प्रदान कर सकता है।
जैसे जैसे प्रगति के मुँह को लंड के प्रवास का अभ्यास होता गया, वह घबराहट छोड़ कर सहज और निश्चिंत हो गया। उसका मुँह सरलता से लंड के व्यापक रूप को धारण करने लगा। मास्टरजी को जब ऐसा लगा कि प्रगति अब सहजता महसूस कर रही है, उन्होंने अपने वारों की लम्बाई बढ़ानी शुरू की। वे पूरा का पूरा लंड अन्दर बाहर करना चाहते थे। प्रगति को उनके लंड को पूरा ग्रहण करने में दिक्कत हो रही थी। कभी कभी उसका गला घुटने सा लगता और उसको उबकाई सी आ जाती। पर वह मास्टरजी की खुशी की खातिर अपनी विकलता को नज़रंदाज़ करते हुए उनका साथ दे रही थी। मास्टरजी लगातार बढ़ते हुए वार कर रहे थे और उनका लंड धीरे धीरे और ज्यादा अन्दर जाता जा रहा था। आखिर एक वार ऐसा आया जब उनका संपूर्ण लंड प्रगति के मुँह से होता हुआ गले में उतर गया। प्रगति का शरीर प्रतिक्रिया में लंड को उगलने लगा पर प्रगति ने पूरा बाहर नहीं निकलने दिया। उसने इशारे से मास्टरजी को चालू रहने को कहा। मास्टरजी ने सावधानी से फिर चोदना शुरू किया।
अब तो प्रगति का मुख शायद लंड का आदि हो गया था। प्रगति को गला घुटने या उबकाई की कठिनाई भी दूर हो गई। कहते हैं मानव शरीर किसी भी अवस्था का आदि बनाया जा सकता है। कुछ लोग बर्फीले इलाके में निर्वस्त्र रह लेते हैं; कुछ लोग ग्लास खा पाते हैं, कुछ लोग आग के अंगारों पर नंगे पांव चल लेते हैं। शरीर को जैसे ढालो, ढल जाता है। प्रगति का मुख और गला भी शायद उस ककड़ी-नुमा लंड के आकार में ढल गए थे। मास्टरजी का लंड बिना हिचक के पूरा अन्दर बाहर हो रहा था और थोड़ी थोड़ी देर में वे उसको प्रगति के गले तक में उतार के कुछ देर के लिए रुक जाते थे।
मास्टरजी प्रगति के धैर्य, सहनशक्ति और सहयोग की मन ही मन दाद दे रहे थे। उनकी खुशी परमोत्कर्ष पर पहुँचने वाली थी। उन्होंने अपने झटकों की गति बढ़ाई और जैसे ही उनके अन्दर का ज्वारभाटा विस्फोट करके बाहर आने को हुआ उन्होंने एक गहरा धक्का अन्दर को लगाया और अपने लंड को मूठ तक प्रगति के मुँह में गाड़ दिया। फिर उनके बहुत देर से नियंत्रित लावे का द्वार फूट कर खुल गया और न जाने कितनी पिचकारियाँ प्रगति के कंठ में छूट गईं।
मास्टरजी हांफ रहे थे और प्रगति एक नन्हे मुन्ने बच्चे की तरह मुँह से मास्टरजी का दूध उगल रही थी। मास्टरजी ने कुछ देर रुक कर अपना लंड बाहर निकाल लिया। प्रगति उसी अवस्था में लेटी रही और उनके वीर्य को निगल गई। मास्टरजी ने अपने लथपथ लिंग को प्रगति के मुँह के ऊपर लटकाते हुए कहा,”यह हमारे प्यार और परिश्रम का फल है। इसे व्यर्थ न जाने दो। ” प्रगति ने उनके लिंग को मुँह में लेकर चूस और चाट कर साफ़ कर दिया।
फिर दोनों उठ गए। मास्टरजी ने प्रगति को गले से लगा लिया और बहुत देर तक उसके साथ चिपटे रहे। फिर उसे गुसलखाने की तरफ ले जाते हुए बोले,”आज तुमने मुझे बहुत खुश किया। तुम कमाल की लड़की हो !”
“आपने भी तो मेरे लिए कितना कुछ किया !” प्रगति ने शरमाते हुए जवाब दिया।
“पर तुमने जो किया वह ज्यादा मुश्किल था !” मास्टरजी ने स्वीकार किया।
प्रगति खुश हो गई।
घड़ी में एक बज रहा था अभी उनके पास काफी समय शेष था।
वे दोनों नहाने के लिए चले गए।

मास्टरजी और प्रगति गुसलखाने में गए और मास्टरजी ने उसको नहलाना शुरू किया। बालों को गीला करके शैंपू किया और फिर उसके बदन पर साबुन लगा कर उसके अंग अंग को मलने लगे। मास्टरजी के हाथों को उसका साबुन से सना मांसल जिस्म बहुत अच्छा लग रहा था। उनके हाथ फिसल फिसल कर उसके शरीर पर घूम रहे थे और उसके स्तनों और चूतड़ों पर विशेष दिलचस्पी दिखा रहे थे। उन्होंने उसको अपने बाजू ऊपर उठाने को कहा और उसकी काखों और कमर पर साबुन मलने लगे। फिर उन्होंने उसे घुमा कर उसकी पीठ अपनी तरफ कर ली और पीठ, चूतड़ और टांगों पर हाथ चलाने लगे।
प्रगति को मज़ा आ रहा था। मास्टरजी ने नीचे बैठ कर उसकी टांगें धोनी शुरू कीं और फिर साबुन के हाथों से योनि को विशुद्ध करने लगे। प्रगति को अब ज्यादा गुलगुली होने लगी और उसने अपनी टांगें बंद कर लीं। मास्टरजी का हाथ उसकी टांगों के बीच ही जकड़ा गया। वे जकड़ी हुई टांगों के बीच अपनी हथेली सहलाने लगे। दोनों को मज़ा आ रहा था। मास्टरजी का लंड उत्सुक होने लगा। प्रगति की योनि भी मचलने लगी !!!!
मास्टरजी ने प्रगति को शावर से नहला दिया और अब खुद नहाने लगे। प्रगति ने उनसे साबुन ले लिया और उनको नहलाने लगी। पूरे बदन पर साबुन लगाकर रगड़ कर साफ़ करने लगी पर उनके लिंग को शर्म के मारे नहीं छुआ। मास्टरजी व्याकुल हो गए और उसके हाथों को अपने लिंग पर ले जाकर छोड़ दिया। उनका लिंग शिथिलता और कड़कपन के बीच की अवस्था में था।
यह वह अवस्था होती है जिसमें पुरुष को लंड चुसवाने में सबसे ज्यादा मज़ा आता है क्योंकि उसका पूरा लंड आसानी से लड़की के मुँह में चला जाता है। लड़की को भी लंड की यह अवस्था अच्छे लगती है क्योंकि एक तो मुँह में पूरा ले पाती है दूसरे जब लंड उसके मुँह में बड़ा होने लगता है तो एक अजीब सा ख़ुशी का अहसास होता है। उसे लगता है मानो वह अपने मुँह से लिंग में स्फूर्ति और शक्ति डाल रही है। मानो किसी मूर्छित इंसान में प्राण डाल रही हो। उसे अपनी इस योग्यता पर नाज़ होता है और वह अपने आप को शक्तिदायक और जीवनदायक समझने लगती है।
एक तरह से यह सच भी है। एक लड़की (या औरत) कितनी आसानी से आदमी में निश्चय, संकल्प, शक्ति, वीरता और पौरुष जैसे गुणों का जनन कर देती है, वह उसके लिए प्रेरणा स्रोत बन जाती है और उसकी ख़ातिर वह कोई भी मुकाम हासिल करने को तैयार हो जाता है और सफल भी होता है। शायद इसीलिये स्त्री को शक्ति का रूप माना जाता है। आदमी भले ही अपना लंड खड़ा ना कर सके, औरत उसका लंड झट से खड़ा करवा सकती है। इससे बढ़ कर और क्या शक्ति हो सकती है।
खैर, मास्टरजी ने लंड को प्रगति के मुँह की तरफ पहुँचाया और प्रगति को निहारने लगे। उनकी आँखों से अनुरोध बरस रहा था। प्रगति समझदार थी और उसने आधे गदराये हुए लंड को मुँह के हवाले कर दिया। मास्टरजी का अधमरा लंड लचीला, छोटा और नर्म था सो प्रगति को पूरा लंड मुँह में लेने में कठिनाई नहीं हुई।
मास्टरजी का लंड, जैसे सपेरे का नाग टोकरी में लोटा होता है, प्रगति के मुँह में आसीन हो गया। जब प्रगति ने उसको जीभ से सहलाना और मसलना शुरू किया तो जैसे नाग की टोकरी का ढक्कन खोल दिया हो, मास्टरजी का लंड उठने लगा और अपने लचीलेपन, छुटपन और नम्रता को छोड़ कर कठोर और विराट रूप धारण करने लगा। प्रगति को उसके मुँह में अंगडाई लेता हुआ और लिंग से लंड बनता हुआ मर्दाना अंग बहुत अच्छा लग रहा था। उसने मुँह से उसे चोदना शुरू किया। मास्टरजी भी यही चाहते थे। नहाने के बाद वे प्रगति के साथ एक लम्बा सम्भोग करना चाहते थे। इसके लिए उनके लंड का एक और बार परमोत्तेजित होना मददगार साबित होना था। ऐसा होने के बाद उनका लंड आसानी से अगला विस्फोट नहीं करेगा और वे जितनी देर चाहें प्रगति को तरह तरह के आसनों में चोद सकेंगे।

यह सम्भोग की अवधि बढ़ाने का एक सरल उपाय है। पहले एक बार हस्त-मैथुन करके लावा उगल दो और उसके बाद लंड चुसवा कर उसे खड़ा करवाओ और फिर सम्भोग करो। इससे मर्द को तीन तरह का सुख (हस्त-मैथुन, मुख-मैथुन और सम्भोग) भी मिलता है और वह देर तक चुदाई भी कर सकता है। प्रगति की मदद के तौर पर उन्होंने उसके मुँह में धक्कम-पेल शुरू कर दी और थोड़ी ही देर में वे उसके मुँह में बरसने लगे। बरसने से पहले उन्होंने आख़री धक्का ऐसा लगाया कि उनका लंड प्रगति के कंठ में गहराई तक चला गया। अब तो प्रगति को उनकी इस करतूत का पूर्वानुमान सा था। जब तक उनका लंड हिचकियाँ भर रहा था प्रगति ने उसे मुँह में ही पकड़े रखा और उसको पूरा निचोड़ कर ही बाहर आने दिया। मास्टरजी को प्रगति पर बहुत मान होने लगा था। उसकी सेक्स प्रक्रियाओं में निपुणता का सारा श्रेय वे अपने आप को दे रहे थे। मास्टरजी ने एक बार फिर प्रगति पर पानी डाल कर उसे ताजा कर दिया और खुद भी नहा लिए।
मास्टरजी और प्रगति नहाने के बाद बाहर आये तो दोनों को भूख लग रही थी। मास्टरजी ने प्रगति को अपना एक साफ़ कुर्ता पहनने को दे दिया। कुर्ता उसके लिए काफी ढीला था और कन्धों से नीचे ढलक रहा था। आस्तीन भी काफी बड़ी थीं। आस्तीन को तो ऊपर चढ़ा लिया पर कन्धों से ढलकता हुआ कुर्ता पहन कर वह बहुत कामुक लग रही थी। गीले बाल और कुर्ते के नीचे नंगी होने से उसके आकर्षण में चार चाँद लग गए थे…..।
मास्टरजी ने उसको गले लगा कर प्यार किया और खाने की मेज़ पर ले गए। मास्टरजी ने सिर्फ लुंगी पहन रखी थी। दोनों ने खाना खाया। मास्टरजी ने हलके खाने का बंदोबस्त किया था जिससे खाने के बाद भारीपन और आलस्य न महसूस हो और वे अपने जिस्म की प्यास अच्छे से बुझा सकें। उन्होंने प्रगति को भी हल्का खाना खाने का सुझाव दिया और वह उनकी बात मान रही थी। खाने के बाद दोनों बिस्तर पर लेट गए और थोड़ी देर विश्राम किया। विश्राम के वक़्त मास्टरजी पोले पोले हाथों से प्रगति के पेट और पीठ को नाखूनों से खुरच रहे थे। वे प्रगति को और अपने आपको थोड़ा बहुत उत्तेजित ही रखना चाहते थे।
कुर्ते के ऊपर से मास्टरजी की नुकीली उँगलियाँ उसके बदन में सरसराहट पैदा कर रही थीं। उसे बड़ा अच्छा लग रहा था। उसने भी मास्टरजी के बदन पर हाथ चलाने शुरू कर दिए। मास्टरजी प्यार से उसके बालों में हाथ फेरने लगे और बिल्कुल हल्के हाथ उसके वक्ष पर चलाने लगे। धीरे धीरे कुर्ते में से प्रगति का बदन उघड़ने लगा और कुर्ता उसकी गर्दन के पास इकठ्ठा हो गया। नीचे से तो वैसे ही नंगी थी।
मास्टरजी ने उसे सीधा लिटा दिया। उसकी टाँगें थोड़ी खोल दीं और घुटने उठा कर मोड़ दिए। उसके सिर के नीचे से तकिया हटा कर उसको बिस्तर पर सपाट कर दिया। अब वह बिस्तर पर लेटी हुई छत को देख रही थी। मास्टरजी ने लुंगी उतारी और अपने आपको चोदने की हालत में ले आये। उनका लंड अभी शिथिल ही था। पर उन्होंने उस लटके हुए लिंग के साथ ही प्रगति की चूत के द्वार के ऊपर और उसके इर्द गिर्द अपना सुपाड़ा घुमाने लगे। अपना वज़न अपने हाथों पर रखा हुआ था, उनका मुँह प्रगति के मम्मों के ऊपर और उनका निचला हिस्सा दंड लगाने की हालत में इस तरह था कि वे लंड से नाभि से लेकर जाँघों तक छू सकते थे।
इस अवस्था में लंड उसके निचले भाग से रगड़ रहे थे और मुँह से मम्मों को एक-एक करके चूस रहे थे। थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने घुटने बिस्तर पर टिका दिए और हाथों और घुटनों के बल आगे बढ़ते हुए अपने उभरते लिंग को मम्मों के बीच में लगा दिया। फिर अपने हाथों से दोनों मम्मों का लिंग के दोनों तरफ जोड़ दिया। अब उनका लिंग मम्मों के बीच में था और उन्होंने मम्मों को चोदने जैसी हरकत शुरू की। रास्ते में कुर्ते की रुकावट हो रही थी सो मास्टरजी ने उसका सिर उठाकर कुर्ता गले में से निकाल दिया। अब वह पूरी नंगी थी।

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