पहली होली ससुराल में part 2

न दोनों को वहीं छोड़ के मैं गई किचेन में जहाँ होली के लिये गुझिया बन रही थी और मेरी सास, बड़ी ननद और जेठानी थी. गुझिया बनाने के साथ-साथ आज खूब खुल के मजाक, गालियाँ चल रही थी. बाहर से भी कबीरा गाने, गालियों की आवाज़ें, फागुनी बयार में घुल-घुल के आ रही थी.

ठण्डाई बनाने के लिये भांग रखी थी और कुछ बर्फी में डालने लिये.

मैंने कहा, हे कुछ गुझिया में भी डाल के बना देते है, लोगों को पता नही चलेगा. और फिर खूब मज़ा आएगा.”

मेरी ननद बोली, “हाँ, और फिर हम लोग वो आपको खिला के नंगे नचायेंगे…..”

मैं बोली, “मैं इतनी भी बेवकूफ नहीं हूँ, भांग वाली और बिना भांग वाली गुझिया अलग-अलग डिब्बे में रखेंगे.”
हम लोगों ने तीन डिब्बों में, एक में डबल डोज वाली, एक में नॉर्मल भांग की और तीसरे में बिना भांग वाली रखी. फिर मैं सब लोगों को खाना खाने के लिये बुलाने चल दी.

मेरा भाई भी उनके साथ बैठा था. साथ में बड़ी ननद के हसबैंड, मेरे नंदोई भी… उनकी बात सुन के मैं दरवाजे पे हीं एक मिनट के लिये ठिठक के रुक गई और उनकी बात सुनने लगी.

मेरे भाई को उन्होंने सटा के, ऑलमोस्ट अपने गोद में (खींच के गोद में हीं बैठा लिया). सामने नंदोई जी एक बोतल (दारू की) खोल रहे थे. मेरे भाई के गालों पे हाथ लगा के बोले,

“यार तेरा साला तो बड़ा मुलायम है..”

“और क्या एकदम मक्खन मलाई….” दूसरे गाल को प्यार से सहलाते वो बोले.

“गाल ऐसा है तो फिर गांड़ तो… क्यों साल्ले कभी मराई है क्या?” बोतल से सीधे घूंट लगाते मेरे नंदोई बोले और फिर बोतल ‘उनकी’ ओर बढ़ा दी.

मेरा भाई मचल गया और मुँह फुला के अपने जीजा से बोला, “देखिये जीजाजी, अगर ये ऐसी बात करेंगे तो….”

उन्होंने बोतल से दो बड़ी घूंट ली और बोतल नंदोई को लौटा के बोले,

“जीजा, ऐसे थोड़े हीं पूछते हैं.!! अभी कच्चा है, मैं पूछता हूँ…”

फिर मेरे भाई के गाल पे प्यार से एक चपत मार के बोले,

“अरे ये तेरे जीजा के भी जीजा हैं, मजाक तो करेंगे हीं…. क्या बुरा मानना? फिर होली का मौका है. तू लेकिन साफ-साफ बता, तू इत्ता गोरा चिकना है लौंडियों से भी ज्यादा नमकीन, तो मैं ये मान नहीं सकता कि तेरे पीछे लड़के ना पड़े हों! तेरे शहर में तो लोग कहते हैं कि अभी तक इसलिए बड़ी लाइन नहीं बनी कि लोग छोटी लाइन के शौक़ीन हैं.”

और उन्होंने बोतल नंदोई को दे दी.

ना नुकुर कर के उसने बताया कि कई लड़के उसके पीछे पड़े तो थे और कुछ हीं दिन पहले वो साईकिल से जब घर आ रहा था तो कुछ लड़कों ने उसे रोक लिया और जबरन स्कूल के सामने एक बांध है, उसके नीचे गन्ने के खेत में ले गए.

उन लोगों ने तो उसकी पैंट भी सरका के उसे झुका दिया था. लेकिन बगल से एक टीचर की आवाज सुनाई पड़ी तो वो लोग भागे.

“तो तेरी कोरी है अभी? चल हम लोगों की किस्मत… कोरी मारने का मज़ा हीं और है.”

नंदोई बोले और अबकी बोतल उसके मुँह से लगा दिया. वो लगा छटपटाने….

उन्होंने उसके मुँह से बोतल हटाते हुए कहा,

“अरे जीजा अभी से क्यों इसको पिला रहे हैं?” (लेकिन मुझको लग गया था कि बोतल हटाने के पहले जिस तरह से उन्होंने झटका दिया था, दो-चार घूंट तो उसके मुँह में चला हीं गया.) और खुद पीने लगे.

“कोई बात नहीं…कल जब इसे पेलेंगे तो… पिलायेंगे.” संतोष कर नंदोई बोले.

“अरे डरता क्यों है?” दो घूंट ले उसके गाल पे हाथ फेरते वो बोले,

“तेरी बहना की भी तो कोरी थी, एकदम कसी… लेकिन मैंने छोड़ी क्या? पहले उँगली से जगह बनाई, फिर क्रीम लगा के, प्यार से सहला के, धीरे-धीरे… और एक बार जब सुपाड़ा घुस गया… वो चीखी, चिल्लाई लेकिन…. अब हर हफ्ते उसकी पीछे वाली… दो-तीन बार तो कम से कम..”

और उन्होंने उसको फिर से खींच के अपनी गोद में सेट करके बैठाया.

दरवाजे की फांक से साफ़ दिख रहा था. उनका पजामा जिस तरह से तना था… मैं समझ गई कि उन्होंने सेंटर करके सीधे वहीं लगा के बैठा लिया उसको.

वो थोड़ा कुनमुनाया, पर उनकी पकड़ कितनी तगड़ी थी, ये मुझसे अच्छा और कौन जानता था? उन्होंने बोतल अब नंदोई को बढ़ा दी…

“यार तेरी बीवी…मेरी सलहज का पिछवाड़ा..उसके गोल गोल गुदाज चूतड़ इतने मस्त हैं कि देख के खड़ा हो जाता है… और ऊपर से गदराई उभरी-उभरी चूचियाँ… बड़ा मज़ा आता होगा तुझे उसकी चूचि पकड़ के गांड़ मारने में..है ना?”

बोतल फिर नंदोई जी ने वापस कर दी. एक घूंट मुँह से लगा के ‘ये’ बोले,

“एकदम सही कहते हैं आप… उसके दोनों मम्मे बड़े कड़क हैं… बहोत मज़ा आता है उसकी गांड़ मारने में ”

“अरे बड़े किस्मत वाले हो साले जी तुम… बस एक बार मुझे मिल जाये ना… बस जीवन धन्य हो जाये…मज़ा आ जाये यार”

नंदोई जी ने बोतल उठा के कस के लंबी घूंट लगाई… अपनी तारीफ सुन के मैं भी खुश हो गई थी… मेरी चूत भी अब गीली हो रही थी.

“अरे तो इसमें क्या? कल होली भी है और रिश्ता भी.” बोतल अब उनके पास थी. मुझे भी कोई ऐतराज नहीं था. मेरा कोई सगा देवर था नही, फिर नंदोई जी भी बहुत रसीले थे.

“तेरे तो मज़े हैं यार….कल यहाँ होली और परसों ससुराल में…किस उम्र की है तेरी सालियाँ?” नंदोई जी अब पूरे रंग में थे.

‘इन्होंने’ बोला कि “बड़ी वाली दसवें में पढ़ती है है और दूसरी थोड़ी छोटी है…(मेरी छोटी ननद का नाम ले के बोले) …उसके बराबर होगी.”

“अरे तब तो चोदने लायक वो भी हो गई है.” हँस के नंदोई जी बोले.

“अरे उससे भी 4-5 महीने छोटी है…छुटकी.” मेरा भाई जल्दी से बोला.

अबतक ‘इन्होंने’ और नंदोई ने मिल के उसे ८-१० घूंट पिला हीं दिया था. वो भी अब शर्म-लिहाज खो चुका था.

“अरे हाँ…साले साहब से हीं पूछिये ना उनकी बहनों का हाल. इनसे अच्छा कौन बताएगा?” ‘ये’ बोले.

“बोल साल्ले… बड़ी वाली की चूचियाँ कितनी बड़ी हैं?”

“वो…वो उमर में मुझसे एक साल बड़ी है और उसकी…उसकी अच्छी है….थोड़ी..दीदी के इतनी तो नहीं… दीदी से थोड़ी छोटी….” हाथ के इशारे से उसने बताया.

मैं शर्मा गई…लेकिन अच्छा भी लगा सुन के कि मेरा ममेरा भाई मेरे उभारों पे नज़र रखता है.

“अरे तब तो बड़ा मज़ा आयेगा तुझे उसके जोबन दबा-दबा के रंग लगाने में…” नंदोई ‘इनसे’ बोले और फिर मेरे भाई से पूछा, “और छुटकी की?”

“वो उसकी…उसकी अभी…” नंदोई बेताब हो रहे थे. वो बोले, “अरे साफ-साफ बता, उसकी चूचियाँ अभी आयी हैं कि नहीं?”

छुटकी

“आयीं तो है बस अभी….. लेकिन उभर रही हैं… छोटी है बहुत….” वो बेचारा बोला.

“अरे उसी में तो असली मज़ा है…चूचियाँ उठान में…मींजने में, पकड़ के पेलने में… चूतड़ कैसे हैं?”

“चूतड़ तो दोनों सालियों के बड़े सेक्सी हैं… बड़ी के उभरे-उभरे और छुटकी के कमसिन लौण्डों जैसे… मैंने पहले तय कर लिया है कि होली में अगर दोनों साल्लियों की कच-कचा के गांड़ ना मारी.”

“हे तुम जब होली से लौट के आओगे तो अपनी एक साली को साथ ले आना…उसी छुटकी को…फिर यहाँ तो रंग पंचमी को और जबरदस्त होली होती है. उसमें जम के होली खेलेंगे साल्ली के साथ.”

आधी से ज्यादा बोतल खाली हो गई थी और दोनों नशे के सुरूर में थे. थोड़ा बहुत मेरे भाई को भी चढ़ चुकी थी.
“एकदम जीजा… ये अच्छा आइडिया दिया आपने. बड़ी वाली का तो बोर्ड का इम्तिहान है, लेकिन छुटकी तो अभी 9वीं में है. पंद्रह दिन के लिये ले आयेंगे उसको.”

“अभी वो छोटी है.” वो फिर जैसे किसी रिकार्ड की सुई अटक गई हो बोला.

“अरे क्या छोटी-छोटी लगा रखी है? उस कच्ची कली की कसी फुद्दी को पूरा भोंसड़ा बना के पंद्रह दिन बाद भेजेंगे यहाँ से, चाहे तो तुम फ्रॉक उठा के खुद देख लेना.” बोतल मेज पे रखते ‘ये’ बोले.

“और क्या… जो अभी शर्मा रही होगी ना…जब जायेगी तो मुँह से फूल की जगह गालियाँ झड़ेंगी, रंडी को भी मात कर देगी वो साल्ली….” नंदोई बोले.

मैं समझ गई कि अब ज्यादा चढ़ गई है दोनों को, फिर उन लोगों की बातें सुन के मेरा भी मन करने लगा था. मैं अंदर गई और बोली, “चलिए खाने के लिये देर हो रही है!”

नंदोई उसके गाल पे हाथ फेर के बोले, “अरे इतना मस्त भोजन तो हमारे
पास हीं है.”

वो तीनों खाना खा रहे थे लेकिन खाने के साथ-साथ… ननदों ने जम के मेरे भाई को गालियां सुनाई, खास कर छोटी ननद ने. मैंने भी नंदोई को नहीं बख्शा और खाना परसने के साथ में जान-बूझ के उनके सामने आँचल ढुलका देती…कभी कस के झुक के दोनों जोबन लो कट चोली से… नंदोई की हालत खराब थी.

जब मैं हाथ धुलाने के लिये उन्हें ले गई तब मेरे चूतड़ कुछ ज्यादा हीं मटक रहे थे, मैं आगे-आगे और वो मेरे पीछे-पीछे… मुझे पता थी उनकी हालत. और जब वो झुके तो मैंने उनकी मांग में चुटकी से गुलाल सिंदूर की तरह डाल दिया और बोली, “सदा सुहागन रहो, बुरा ना मानो होली है.”

उन्होंने मुझे कस के भींच लिया. उनके हाथ सीधे मेरे आँचल के ऊपर से मेरे गदराए जोबन पे और उनका पजामा सीधे मेरे पीछे दरारों के बीच… मैं समझ गई कि उनका ‘खूंटा’ भी उनके साले से कम नहीं है. मैं किसी तरह छुड़ाते हुए बोली, “समझ गई मैं, जाइये ननद जी इंतज़ार कर रही होंगी. चलिए कल होली के दिन देख लूंगी आपकी ताकत भी, चाहे जैसे जितनी बार डालियेगा, पीछे नहीं भागूंगी.”

जब मैं किचेन में गई तो वहाँ मेरी ननद कड़ाही की कालिख निकाल रही थी और दूसरे हाथ में बिंदी और टिकुली थी.
मैंने पूछा तो बोली, “आपके भाई के श्रृंगार के लिये, लेकिन भाभी… उसे बताइयेगा नहीं! ये मेरे-उसके बीच की बात है.”
हँस के मैं बोली, “एकदम नहीं, लेकिन अगर कहीं पलट के उसने डाल दिया तो… ननद रानी बुरा मत मानना!”
वो हँस के बोली, “अरे भाभी, साल्ले की बात का क्या बुरा मानना? एकदम नहीं.. और फिर होली तो है हीं डालने-डलवाने का त्योहार. लेकिन आप भी समझ जाइये ये भी गाँव की होली है, वो भी हमारे गाँव की होली..यहाँ कोई भी ‘चीज़’ छोड़ी नहीं जाती होली में.”

उसकी बात पे मैं सोचती, मुस्कुराती कमरे में गई तो ‘ये’ तैयार बैठे थे.

रात भर रगड़ाई

उसकी बात पे मैं सोचती, मुस्कुराती कमरे में गई तो ‘ये’ तैयार बैठे थे.

बची-खुची बोतल भी ‘इन्होंने’ खाली कर दी थी. साड़ी उतारते-उतारते उन्होंने पलंग पर खींच लिया और चालू हो गए.

सारी रात चोदा ‘इन्होंने’ लेकिन मुझे झड़ने नही दिया.

जब से मैं आई थी ये पहली रात थी जब मैं झड़ नहीं पाई, वरना हर रात…कम से कम ५-६ बार.

इतनी चुदवासी कर दिया मुझे कि… वो कस-कस के मेरी पनियाई चूत चूसते और जैसे हीं मैं झड़ने के करीब होती, कचकचा के मेरी चूचियाँ काट लेते. दर्द से मैं बिलबिला पड़ती, मेरी चीख निकल उठती.

मेरे मन में आया भी कि बगल के कमरे में मेरा भाई लेटा है और वो मेरी हर चीख सुन रहा होगा.

पर तब तक उन्होंने निप्पल को भी कस के काट लिया, नाख़ून से नोच लिया. उनकी ये नोच-खसोट और काटना मुझे और मस्त कर देता था.

सब कुछ भूल के मैं फिर चीख पड़ी. मेरी चीखें उनको भी जोश से पागल बना देती थी.

एक बार में हीं उन्होंने बालिश्त भर लम्बा, लोहे की रॉड ऐसा सख्त लंड मेरी चूत में जड़ तक पेल दिया.
जैसे हीं वो मेरी बच्चेदानी से टकराया, मैं मस्ती से चिल्ला उठी, “हाँ राजा, हाँ चोद…चोद मुझे…ऐसे हीं…कस-कस के पेल दे अपना मूसल मेरी चूत में.”

और ‘ये’ भी मेरी चूचियाँ मसलते हुए बोलने लगे, “ले ले रानी ले. बहुत प्यासी है तेरी चूत ना… घोंट मेरा लौड़ा!”

मेरी सिसकियाँ भी बगल वाले कमरे में सुनाई पड़ रही होंगी, इसका मुझे पूरा अंदाजा था, लेकिन उस समय तो बस यही मन कर रहा था कि ‘वो’ चोद-चोद कर के बस झाड़ दें… मेरी चूत.

जैसे हीं मैं झड़ने के कगार पर पहुँची, उन्होंने लंड निकाल लिया.

मैं चिल्लाती रही, “राजा बस एक बार मुझे झाड़ दो, बस एक मिनट…”

लेकिन आज उनके सिर पर दूसरा हीं भूत सवार हो गया. उन्होंने मुझे निहुरा के कुतिया ऐसा बना दिया और बोले, “चल साल्ली पहले गांड़ मरा…”

एक धक्के में हीं आधा लंड अंदर… “ओह्ह…ओह..फटी…फट गई..मेरी गांड़.” मैं चीखी कस के.

पर उन्होंने मेरे मस्त चूतड़ों पे दो हाथ कस के जमाए और बोले, “यार, क्या मस्त गांड़ है तेरी.” साथ-साथ पूछा, “होली में चल तो रहा हूँ ससुराल पर ये बोल कि साल्लियां चुदवाएंगी कि नहीं?”

मैं चूतड़ मटकाते हुए बोली, “अरे साल्लियां हैं तेरी, ना माने तो जबर्दस्ती चोद देना.”

खुश होके जब उन्होंने अगला धक्का दिया तो पूरा लंड गांड़ के अंदर. ‘वो’ मजे में मेरी क्लिट सहलाते हुए मेरी गांड़ मारने लगे. अब मुझे भी मस्ती चढ़ने लगी. मैं सिसकियां भरती बोलने लगी,

“हे मुझे उंगली से हीं झाड़ दो….ओह्ह्ह…ओह्ह…मज़ा आ रहा है …ओह्ह्ह…”

उन्होंने कस के क्लिट को पिंच करते हुए पूछा, “हे पर बोल पहले तेरी बहनों की गांड़ भी मारूंगा, मंजूर?”

“हाँ…हाँ…ओओह्ह्ह…ओ…हा…अआ…जो चाहो…. बोला तो….. तेरी साल्लियाँ हैं जो चाहो करो….जैसे चाहो करो.”

पर अबकी फिर जैसे मैं कगार पे पँहुची उन्होंने हाथ हटा लिया. इसी तरह सारी रात ७-८ बार मुझे कगार पे पँहुचा के वो रोक देते… मेरी देह में कंपन चालू हो जाता लेकिन फिर वो कच-कचा के काट लेते.

झड़े वो जरूर लेकिन वो भी सिर्फ दो बार, पहली बार मेरी गांड़ में जब लंड ने झड़ना शुरू किया तो उसे निकाल के सीधे मेरी चूचि, चेहरे और बालों पे… बोले, “अपनी पिचकारी से होली खेल रहा हूँ.”

और दूसरी बार एकदम सुबह मेरी गांड़ में.

जब मेरी ननद दरवाजा खटखटा रही थी. उस समय तक रात भर के बाद उनका लंड पत्थर की तरह सख्त हो चुका था. झुका के कुतिया की तरह कर के पहले तो उन्होंने अपना लंड मेरी गांड़ में…

खूब अच्छी तरह फैला के, कस के पेल दिया. फिर जब वो जड़ तक अंदर तक घुस गया तो मेरे दोनों पैर सिकोड़ के, अच्छी तरह चिपका के, खचाखच.. खचाखच पेलना शुरू कर दिया.

पहले मेरे दोनों पैर फैले थे, उसके बीच में उनका पैर, और अब उन्होंने जबरन कस के अपने पैरों के बीच में मेरे पैर सिकोड़ रखे थे. मेरी कसी गांड़ और संकरी हो गई थी. मुक्के की तरह मोटा उनका लंड गांड़ में …

जब मेरी ननद ने दरवाजा खटखटाया, वो एकदम झड़ने के कगार पे थे और मैं भी. उनकी तीन उंगलियां मेरी बुर में और अंगूठा क्लिट पे रगड़ रहा था.

लेकिन खट-खट की आवाज के साथ उन्होंने मेरी बुर के रस में सनी अपनी उंगलियां निकाल के कस के मेरे मुँह में ठूंस दी. दूसरे हाथ से मेरी कमर उठा के सीधे मेरी गांड़ में झड़ने लगे.

उधर ननद बार-बार दरवाजा खटखटा रही थी और इधर ‘ये’ मेरी गांड़ में झड़ते जा रहे थे. मेरी गीली प्यासी चूत भी… बार-बार फुदक रही थी.

जब उन्होंने गांड़ से लंड निकाला तो गाढ़े थक्केदार वीर्य की धार, मेरे चूतड़ों से होते हुए मेरे जांघ पर भी..
पर इसकी परवाह किये बिना मैंने जल्दी से सिर्फ ब्लाउज पहना, साड़ी लपेटी और दरवाजा खोल दिया.

बाहर सारे लोग मेरी जेठानी, सास और दोनों ननदें… होली की तैयारी के साथ.

मजा पहली होली का, ससुराल में

अब तक आपने पढ़ा

“चल साल्ली पहले गांड़ मरा…”

एक धक्के में हीं आधा लंड अंदर… “ओह्ह…ओह..फटी…फट गई..मेरी गांड़.” मैं चीखी कस के.

पर उन्होंने मेरे मस्त चूतड़ों पे दो हाथ कस के जमाए और बोले, “यार, क्या मस्त गांड़ है तेरी.” साथ-साथ पूछा,

“होली में चल तो रहा हूँ ससुराल पर ये बोल कि साल्लियां चुदवाएंगी कि नहीं?”

मैं चूतड़ मटकाते हुए बोली, “अरे साल्लियां हैं तेरी, ना माने तो जबर्दस्ती चोद देना.”

खुश होके जब उन्होंने अगला धक्का दिया तो पूरा लंड गांड़ के अंदर. ‘वो’ मजे में मेरी क्लिट सहलाते हुए मेरी गांड़ मारने लगे. अब मुझे भी मस्ती चढ़ने लगी. मैं सिसकियां भरती बोलने लगी,

“हे मुझे उंगली से हीं झाड़ दो….ओह्ह्ह…ओह्ह…मज़ा आ रहा है …ओह्ह्ह…”

उन्होंने कस के क्लिट को पिंच करते हुए पूछा,

“हे पर बोल पहले तेरी बहनों की गांड़ भी मारूंगा, मंजूर?”
“हाँ…हाँ…ओओह्ह्ह…ओ…हा…अआ…जो चाहो…. बोला तो….. तेरी साल्लियाँ हैं जो चाहो करो….जैसे चाहो करो.”

पर अबकी फिर जैसे मैं कगार पे पँहुची उन्होंने हाथ हटा लिया. इसी तरह सारी रात ७-८ बार मुझे कगार पे पँहुचा के वो रोक देते… मेरी देह में कंपन चालू हो जाता लेकिन फिर वो कच-कचा के काट लेते.

झड़े वो जरूर लेकिन वो भी सिर्फ दो बार, पहली बार मेरी गांड़ में जब लंड ने झड़ना शुरू किया तो उसे निकाल के सीधे मेरी चूचि, चेहरे और बालों पे… बोले, “अपनी पिचकारी से होली खेल रहा हूँ.”

और दूसरी बार एकदम सुबह मेरी गांड़ में. जब मेरी ननद दरवाजा खटखटा रही थी. उस समय तक रात भर के बाद उनका लंड पत्थर की तरह सख्त हो चुका था. झुका के कुतिया की तरह कर के पहले तो उन्होंने अपना लंड मेरी गांड़ में… खूब अच्छी तरह फैला के, कस के पेल दिया.

फिर जब वो जड़ तक अंदर तक घुस गया तो मेरे दोनों पैर सिकोड़ के, अच्छी तरह चिपका के, खचाखच.. खचाखच पेलना शुरू कर दिया.

पहले मेरे दोनों पैर फैले थे, उसके बीच में उनका पैर, और अब उन्होंने जबरन कस के अपने पैरों के बीच में मेरे पैर सिकोड़ रखे थे. मेरी कसी गांड़ और संकरी हो गई थी. मुक्के की तरह मोटा उनका लंड गांड़ में …

जब मेरी ननद ने दरवाजा खटखटाया, वो एकदम झड़ने के कगार पे थे और मैं भी. उनकी तीन उंगलियां मेरी बुर में और अंगूठा क्लिट पे रगड़ रहा था.

लेकिन खट-खट की आवाज के साथ उन्होंने मेरी बुर के रस में सनी अपनी उंगलियां निकाल के कस के मेरे मुँह में ठूंस दी. दूसरे हाथ से मेरी कमर उठा के सीधे मेरी गांड़ में झड़ने लगे.

उधर ननद बार-बार दरवाजा खटखटा रही थी और इधर ‘ये’ मेरी गांड़ में झड़ते जा रहे थे.

मेरी गीली प्यासी चूत भी… बार-बार फुदक रही थी. जब उन्होंने गांड़ से लंड निकाला तो गाढ़े थक्केदार वीर्य की धार, मेरे चूतड़ों से होते हुए मेरे जांघ पर भी..

पर इसकी परवाह किये बिना मैंने जल्दी से सिर्फ ब्लाउज पहना, साड़ी लपेटी और दरवाजा खोल दिया.

बाहर सारे लोग मेरी जेठानी, सास और दोनों ननदें… होली की तैयारी के साथ.

बाहर सारे लोग मेरी जेठानी, सास और दोनों ननदें… होली की तैयारी के साथ.

“अरे भाभी, ये आप सुबह-सुबह क्या कर… मेरा मतलब करवा रही थी? देखिये आपकी सास तैयार हैं.” बड़ी ननद बोली.
(मुझे कल हीं बता दिया गया था कि नई बहु की होली की शुरुआत सास के साथ होली खेल के होती है और इसमें शराफ़त की कोई जगह नहीं होती, दोनों खुल के खेलते हैं).

जेठानी ने मुझे रंग पकड़ाया. झुक के मैंने आदर से पहले उनके पैरों में रंग लगाने के लिये झुकी तो जेठानी जी बोलीं,
“अरे आज पैरों में नहीं, पैरों के बीच में रंग लगाने का दिन है.”

और यही नहीं उन्होंने सासू जी का साड़ी साया भी मेरी सहायता के लिये उठा दिया. मैं क्यों चूकती? मुझे मालूम था कि सासू जी को गुदगुदी लगती है. मैंने हल्के से गुदगुदी की तो उनके पैर पूरी तरह फ़ैल गए.

फिर क्या था? मेरे रंग लगे हाथ सीधे उनकी जांघ पे.

इस उम्र में भी (और उम्र भी क्या? 40 से कम की हीं रही होंगी), उनकी जांघें थोड़ी स्थूल तो थी लेकिन एकदम कड़ी और चिकनी. अब मेरा हाथ सीधे जांघों के बीच में…

मैं एक पल सहमी, लेकिन तब तक जेठानी जी ने चढ़ाया,

“अरे जरा अपने पति के जन्म-भूमि का तो स्पर्श कर लो.”

उंगलियां तब तक घुंघराली रेशमी झाँटों को छू चुकी थी. (ससुराल में कोई भी पैंटी नहीं पहनता था, यहाँ तक कि मैंने भी पहनना छोड़ दिया.). मुझे लगा कि कहीं मेरी सास बुरा ना मान जाये लेकिन वो तो और… खुद बोलीं,

“अरे स्पर्श क्या, दर्शन कर लो बहु.”

और पता नहीं उन्होंने कैसे खींचा कि मेरा सिर सीधे उनकी जांघों के बीच. मेरी नाक एक तेज तीखी गंध से भर गई. जैसे वो अभी-अभी … कर के आयी हों और उन्होंने… जब तक मैं सिर निकालने का प्रयास करती कस के पहले तो हाथों से पकड़ के फिर अपनी भारी-भारी जांघों से कस के दबोच लिया.

उनकी पकड़ उनके लड़के की पकड़ से कम नही थी. मेरे नथुनों में एक तेज महक भर गई और अब वो उसे मेरी नाक और होंठों से हल्के से रगड़ रही थीं.

हल्के से झुक के वो बोलीं, “दर्शन तो बाद में कराउंगी पर तब तक तुम स्वाद तो ले लो थोड़ा.”

जब मैं किसी तरह वहाँ से अपना सिर निकाल पाई तो वो तीखी गंध… अब एकदम मतवाली सी तेज, मेरा सिर घूम-सा रहा था. एक तो सारी रात जिस तरह उन्होंने तड़पाया था, बिना एक बार भी झड़ने दिये…

और ऊपर से ये. मेरा सिर बाहर निकलते हीं मेरी ननद ने मेरे होंठों पे एक चांदी का ग्लास लगा दिया… लबालब भरा, कुछ पीला-सा और होंठ लगते हीं एक तेज भभका सा मेरे नाक में भर गया.

“अरे पी ले, ये होली का खास शर्बत है तेरी सास का…. होली की सुबह का पहला प्रसाद…” ननद ने उसे ढकेलते हुए कहा. सास ने भी उसे पकड़ रखा था.

मेरे दिमाग में कल गुझिया बनाते समय होने वाली बातें आ गईं.

ननद मुझे चिढ़ा रही थी कि भाभी कल तो खारा शरबत पीना पड़ेगा, नमकीन तो आप है हीं, वो पी के आप और नमकीन हो जायेंगी.

सास ने चढ़ाया था, “अरे तो पी लेगी मेरी बहु…तेरे भाई की हर चीज़ सहती है तो ये तो होली की रसम है.”

जेठानी बोलीं, “ज्यादा मत बोलो, एक बार ये सीख लेगी तो तुम दोनों को भी नहीं छोड़ेगी.”
मेरे कुछ समझ में नही आ रहा था.

मैं बोली, “मैंने सुना है कि गाँव में गोबर से होली खेलते हैं…”

बड़ी ननद बोली, “अरे भाभी गोबर तो कुछ भी नहीं… हमारे गाँव में तो…”

सास ने इशारे से उसे चुप कराया और मुझसे बोलीं,

“अरे शादी में तुमने पंच गव्य तो पीया होगा. उसमें गोबर के साथ गो-मूत्र भी होता है.”

मैं बोली, “अरे गो-मूत्र तो कितनी आयुर्वेदिक दवाओ में पड़ता है, उसमें…”

तो मेरी बात काट के बड़ी ननद बोली कि

“अरे गो माता है तो सासू जी भी तो माता है और फिर इंसान तो जानवरों से ऊपर हीं…तो फिर उसका भी चखने में…”
मेरे ख्यालों में खो जाने से ये हुआ कि मेरा ध्यान हट गया और ननद ने जबरन ‘शरबत’ मेरे ओंठों से नीचे…

सासू जी ने भी जोर लगा रखा था और धीरे-धीरे कर के मैं पूरा डकार गई. मैंने बहुत दम लगाया लेकिन उन दोनों की पकड़ बड़ी तगड़ी थी. मेरे नथुनों में फिर से एक बार वही महक भर गई जो… जब मेरा सिर उनकी जांघों के बीच में था.

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