परिवार नेहा का part 3

बड़े मामा ने मुझे अपनी शक्तिशाली बाँहों में उट्ठा कर अपनी गोद में बिठा लिया. कुछ ही क्षणों में उनका खुला मुंह मेरे खुले मूंह पर कस कर चपक गया. बड़े मामा की झीभ मेरे मूंह में सब तरफ हलचल मचा रही थी. मेरे मामा का थूक मेरे मुंह ने बह रहा था. मुझे अपने बड़े मामा का थूक सटकने में बहुत आनंद आया. उनके हाथ मेरे दोनों उरोज़ों को सताने में व्यस्त हो गये. मेरे गुदाज़*चूतड़ उनकी गोद में मचलने लगे.

‘बड़े मामा,आप कब तक मुझे ऐसे तरसाते रहेंगें?” मेरी कमज़ोर सी धीमी आवाज़ मेरे मुंह से मीठी सी शिकायत के साथ निकली.

“नेहा बेटा, जब आप हमें अपनी इच्छा के बारे में विश्वास दिला देंगें.” बड़े मामा ने ज़ोर से दोनों उरोज़ों को दबा कर मेरे नाक का चुम्बन ले लिया,”तब हम दोनों की यातना का समाधान हमारे पास है.”

“किस इच्छा का विश्वास चाहिए आपको?” मैं थोड़ा इठला के बोली. मैं अब बड़े मामा की वासना की शिकार हो चुकी थी. मैंने अब अपने आपको बड़े मामा के आगे सम्पर्पण करने का निर्णय ले लिया था.

“आप हमें बतायें, बेटा, हम किस इच्छा की बात कर रहें है?” बड़े मामा मेरे मुंह से खुले रूप से हम दोनों की कामवासना का विवरण सुनना चाहते थे.

मेरी शर्म के मारे आवाज़ ही नहीं निकली. बड़े मामा ने मेरे दोनों चूचियों को बहुत ज़ोर से मरोड़ दिया. मेरी हल्की सी चीख निकल गयी.

“नेहा बेटी, जब तक आप हमें नहीं बतायेंगें कि हम दोनों की इच्छा क्या हैं तब तक हम दोनों की यातना का कोई हल नहीं निकलेगा.” बड़े मामा ने मुझे बिलकुल निरस्त कर दिया.

मैं मारी आवाज़ में धीरे से बोली, “बड़े मामा आप हमें चोदना चाहतें हैं. आप हमारी चूत में अपना लंड डालना चाहतें हैं.”
बड़े मामा हल्के से हँसे, “नेहा बेटा, क्या आप यह सब नहीं करना चाहते?”

मेरे मस्तिष्क में तूफ़ान सा उठ चला, “बड़े मामा, हम भी आप से अपनी चूत मरवाना चाहते हैं. मुझे भी आपका लंड देखना है. मैं भी आपके लंड से अपनी चूत मरवाऊंगी.”

बड़े मामा ने मुझे अपनी बाँहों में भींच कर कार की सीट पर लिटा कर अपने नीचे दबा लिया. पूरे रास्ते बड़े मामा ने मुझे चूमा और मेरे दोनों उरोज़ों का बेदर्दी से मंथन किया.

“पर मामाजी हमें इस को करने का अ..अ… चोदने का मौका कैसे मिलेगा?” आखिर में मेरी वासना ने अगम्यागमन की सामाजिक-वर्जना के डर के ऊपर विजय पाली.

“नेहा बेटा, वो आप मुझ पर छोड़ दो. जब मैं आपको इशारा करूँ आप मेरी योजना को अपनी सहमती दे देना.” बड़े मामा ने मेरे उरोज़ों को मसलते और मेरे होठों को चूमते हुए मुझे विश्वाश दिया.

घर के नज़दीक पहुँच कर ही मामाजी ने मुझे अपनी सलवार-कुरता सँवारने दिया.

यदि कोई मेरी तरफ ध्यान दे रहा होता तो, कार में बड़े मामा ने मेरे साथ क्या किया, मेरा शर्म से लाल चेहरा उसकी सारी दास्तान बता रहा था.

उस सारा दिन मेरी हालत कामुकता से अभिभूत और व्याकुल रही. बड़े मामा ने मेरी हालत और खराब करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ा. उन्हें जब भी मुझे अकेले पाने का मौका मिलता वो मुझे अपनी शक्तिशाली बाँहों में जकड़ कर चुमते, मेरे दोनों चूतड़ों और उरोजों अपने मज़बूत बड़े-बड़े हाथों से दबा कर ज़ोरों से मसल देते थे.

अब मैं सारा दिन उनसे मिलने से घबराती थी और बेसब्री से उनसे मिलने की इच्छा से व्याकुल भी रहती थी.
शाम को खाने के ठीक बाद अंजू भाभी और नरेश भैया ने अपने शहर वापस जाने की तय्यारी की वजह से जल्दी खाने की मेज़ छोड़ने की क्षमा-प्रार्थना के बाद सुबह-सवेरे जल्दी प्रस्थान की योजना के लिए अपने कमरे की तरफ चल दिए.

बड़े मामा ने सारे परिवार को गोल्फ खेलने के लिए उत्साहित किया. नानाजी ने अपनी विशाल जागीर पर एक ‘१८ होल’ का ‘गोल्फ कोर्स’ के अलावा ४ तरण ताल, ३ टेनिस, ४ बैडमिंटन कोर्ट्स भी बनवाये थे.

सब लोगों को गोल्फ का विचार बहुत अच्छा लगा. सारे दो खिलाड़ियों की टीम बनाने में व्यस्त हो गए. मेरे पापा ने मेरी दादीजी के साथ जोड़ा बनाया. छोटे मामा ने मेरी मम्मी, अपनी छोटी बहन, के साथ टीम बनाई. मेरी बुआ, पापा की बड़ी बहन, अपने डैडी, मेरे दादाजी, के साथ जुड़ गयीं.

बड़े मामा जल्दी से मेरे पीछे आ कर खड़े हो गए और प्यार से मेरे कन्धों पर अपने भारी विशाल हाथ रख कर हम दोनों की जोड़ी की घोषणा कर दी. मेरा दिल बहुत ज़ोरों से धड़कने लगा. गोल्फ के खेल के लिए जोड़े बनाने की गहमा-गहमी के बाद बड़े मामा मेरे पास की कुर्सी पर बैठ गए.

थोड़ी देर में जब सब मीठा और चाय या कॉफ़ी का आनंद उठा रहें थे, नौकर ने आ कर बड़े मामा को उनके करीबी दोस्त शर्माजी के टेलीफ़ोन काल की सूचना दी. बड़े मामा ने मेरी दायीं जांघ को जोर से दबाया और मेरी तरफ प्यार से मुस्करा कर फ़ोन-कॉल लेने के लिए बाहर चल गए.

थोड़ी देर में बड़े मामा वापस आ कर मेरे पास कुर्सी पर बैठ गए. उनका हाथ मेजपोश के नीचे फिर से मेरी जांघ पर पहुँच गया.
“भई, मुझे आप सब से माफी मंगनी पड़ेगी. सुरेश [सुरेश शर्मा, बड़े मामा के बहुत करीबे दोस्त थे] के साथ मैंने मछ्ली पकड़ने का वादा किया था कुछ महीनों पहले जो मैं बिलकुल भूल गया. वो बेचारा सुबह झील के बंगले पर पहुँचाने वाला है. नम्रता भाभी [सुरेश अंकल की पत्नी] भी आ रहीं हैं.”

मेज़ से ‘आह नहीं’ , ‘सो सैड’ ‘नहीं आपको अपना वादा निभाना चाहिये’ की आवाजें उठीं.
बड़े मामा ने मेरी जांघ दबाई और बोले, “मेरी जोड़ी का खिलाड़ी तो बेचारी अकेली रह जायेगी,” फिर मामाजी ने मेरी तरफ मुड़ कर कहा, “नेहा बेटा, नम्रता भाभी आपकी काफी याद कर रहीं थीं. आप चाहो तो मेरे साथ झील की तरफ चल सकते हैं.”

मुझे अब सब समझ आ गया. मेरे चेहरा एक आनंद भरी मुस्कान से चमक गया,” हाँ! हाँ!, बिलकुल बड़े मामा. मुझे झील पर जाना बहुत अच्छा लगता है. मैं सुरेश अंकल और नम्रता आंटी से बड़ी दिनों से नहीं मिली हूँ. मम्मी क्या मैं कल बड़े मामा के साथ चली जाऊं?”

मैं भी बड़े मामा की योजना में पूरे उत्साह से सहयोग देने लगी.
मम्मी ने हंस कर कहा,”नेहा तुम और तुम्हारे बड़े मामा के बीच में पड़ने वाली मैं कौन होतीं हूँ ? ”

बड़े मामा ने मेरे बालों को प्यार से चूमा, “नेहा बेटा, हम लोग सुबह जल्दी निकलेंगे. वापसी या तो परसों अन्यथा उसके एक दिन बाद होगी. इस बात का सुरेश की बिज़नस एमरजेंसी पर निर्भर करता है. आप कम से कम तीन दिनों के कपड़े रख लो.”
मेरा गला रोमांच और उत्तेजना से बिलकुल सूख गया. मेरे आवाज़ नहीं निकल पा रही थी. मैंने चुपचाप मुस्करा के हामी में सिर हिला दिया.
बड़े मामाजी के साथ तीन दिन और दो रातों के ख़याल से मेरा सारा शरीर रोमांचित हो गया.

सब लोग शीघ्र ही फिर से वार्तालाप में व्यस्त हो गए। मामा का बड़ा भारी मर्दाना हाथ अभी भी मेरी मोटी गुदाज़ जांघ पर रखा हुआ था। उन्होंने मेरी जांघ को धीरे-धीरे मसलना शुरू कर दिया। मेरी साँस मानो गले में अटक गयी। मैंने घबरा के अपने परिवार ले सदस्यों के चेहरों की तरफ देखा। सब मामा और मेरे बीच होती रास-लीला से अनभिज्ञ थे।

मामा के जादू भरे हाथ ने मेरी छूट को रस से भर दिया। मुझे लगा की मेरा पेशाब निकलने वाला है। मैं शौचालय की तरफ के तरफ जाने के लए उठने लगी।
मामा जी ने धीरे से पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

“मामाजी मुझे सू-सू करने जाना है।” मैंने पेशाब के लिए बचपन के नाम का उपयोग किया।

बड़े मामा ने ने मेरे गाल पर चुम्मी दे कर मेरी कुर्सी को पीछे खींच कर मुझे जाने की जगह दे दी। मेरे परिवार में सब लोग मुझे प्यार से कभी भी चूम लेते थे। पर अब मेरे दिल में बड़े मामा से चुदवाने की वासना का चोर बैठ गया था। मेरा मुंह शर्म से लाल हो गया। मई जल्दी से अपने कमरे की तरफ चल पड़ी।
मैंने अपने कुर्ते को अपनी कमर के इर्द-गिर्द खींच लिया। मैं मुश्किल से अपनी सलवार के नाड़े को खोल कर कमोड के अपर बैठने वाली थी की बड़े मामा ने स्नानगृह में प्रविष्ट हो कर मेरे गले से आश्चर्य की घुट्टी घुट्टी चीख निकाल दी, “बड़े मामा आप यहाँ**क्या कर रहें है। किसी* को पता चल गया तो?”
मैं बड़े मामा के अनपेक्षित आगमन के प्रभाव से भूल गयी थी की मेरी सलवार खुली हुई थी।

“हम अपनी नेहा बेटी को पेशाब करते देखने के लिए आयें हैं,” बड़े मामा के चेहरे पर मासूमियत भरी मुस्कान थी।

“बड़े मामा आप भी कैसे …मुझे कितनी घबराहट हो रही है,” मेरा पेशाब करने की तीव्र इच्छा गायब हो गयी।

“बेटा, पेशाब करने में क्या घबराहट?” बड़े मामा ने मेरी उलझन को नाज़रंदाज़ कर दिया।

मैं भी उनकी शरारत भरे व्यवहार से मचल उठी, “आप कितने शैतान हैं, बड़े मामा?”

बड़े मामा अब तक फर्श पर बैठ गए थे। उन्होंने धीरे से मेरी सलवार मेरे हाथों से ले कर मेरी भरी-भरी टांगों को निवस्त्र कर दिया।

उन्होंने मेरी सलवार के अगले भाग को बड़े प्यार से सूंघा। मैं खिलखिला के हंस पड़ी।

“बड़े मामा हमें आपके सामने सू-सू करते हुए शर्म आएगी,” मेरा मुंह शर्म से लाल होने लगा।

“नेहा बेटी, यदि मेरे सामने में पेशाब करने से इतनी उलझन होती है तो मुझसे अपनी चूत कैसे चुदवाओगी?” बड़े मामा अब अश्लील शब्दों का इस्तेमाल कर मेरी वासना को भड़काने के विशेषज्ञ हो गए थे।

मेरी साँसे तेज़-तेज चलने लगीं। मेरे हृदय की धड़कन पूरे स्नानघर में गूंजने लगीं। बड़े मामा ने मेरी कच्छी के सामने गीले दाग को घूर कर देखा। उनकी उंगलियाँ मेरी कच्छी के कमरबंद में फँस गयीं। मैं अब अपने आप को निसहाय महसूस करने लगी। मुझे बचपन से बड़ों के ऊपर अपनी जिम्मेदारी छोड़ने की आदत की वजह से मुझे बड़े मामा की हर इच्छा स्वीकार थी।

बड़े मामा ने मेरी कच्छी उतार कर उसके गीली भाग को अपने मुंह पर रख कर एक गहरी सांस ले कर प्यार से सूंघा। मैं ना चाहते हुए भी मुस्करा उठी और मेरी चूत फिर से रस से भर गयी।

“बड़े मामा, आप कितने गंदे हैं। मेरी गंदी कच्छी को क्यों सूंघ रहे हैं?” मैंने इठला कर बड़े मामा की ओर प्यार से देखा। उनके मेरी कच्छी को सूंघने से मेरी योनि में एक तूफ़ान सा भर उठा।

“बेटा, बहुत ही कम सौभाग्यशाली पिता को अपनी कुंवारी बेटी के चूतरस को सूंघने और चखने का सौभाग्य मिलता है। आप मेरी बेटी की तरह हो। मैं इस अवसर हाथ से जाने थोड़े ही दूंगा!” बड़े मामा ने मेरी कच्छी के गीले भाग को अपनी जीभ से चाट कर मुंह में भर लिया।

मैं वासना के ज्वार से कांप उठी।

बड़े मामा ने मेरी कच्छी को अपने कुर्ते की जेब में रख लिया।

“नेहा बेटा, मैं आपको पेशाब करते हुए देखने के लए बहुत ही उत्सुक हूँ।” बड़े मामा का मुंह मेरी गीली, रस से भरी चूत से थोड़ी ही दूर था।

मैं शर्म से लाल हो गयी। मुझे अपने बड़े मामा के सामने मूतने में बड़ी शर्म आ रही थी। बड़े मामा ने मेरे चूत को धीरे धीरे अपनी उँगलियों से सहलाना शुरू कर दिया। उनकी उंगली जैसे ही मेरे मूत्र-छिद्र पर पहुँची मेरा पेशाब करने की इच्छा फिर से तीव्र हो गयी।

“बड़े मामा, मेरा पेशाब लिकने वाला है,” मैं बिना जाने पहली बार सू-सू के जगह पेशाब शब्द का इस्तेमाल किया।

बड़े मामा ने फुसफुसा कर कहा, “बेटा, मैं आपके पेशाब की मीथी सुंगंधित धार का इंतज़ार कर रहा हूँ।”

मेरा मूत्राशय पूरा भरा हुआ था और अब मैं उसे बिलकुल भी रोक नहीं सकती थी।

मैंने अपने मूत्राशय को खोल दिया और मेरे छोटे से मुत्रछिद्र से एक झर्झर करती पेशाब की निकल पड़ी। मेरे सुनहरे गर्म पेशाब की गंध सस्नानगृह में फ़ैल गयी।

बड़े मामा का हाथ मेरे मूत्र की धार में था और पूरा मेरे पेशाब से भीग गया। बड़े मामा मेरी जांघें फैला कर मेरी मूतती हुई चूत को एकटक निहारने लगे। बड़े मामा ने अपना मेरे पेशाब से भीगे हाथ को प्यार से चाटा। मैं अब इतनी वासना की आंधी में उलझ गयी थी की मुझे बड़े मामा का मेरा पेशाब चाटना बुरा नहीं लगा। बड़े मामा ने अपना हाथ कई बार मेरे पेशाब में भिगो कर अपने मुंह से चाटा।

अंततः मेरे पेशाब की धार हल्की होने लगी। बड़े मामा ने गहरी सांस ले कर मेरे पेशाब की गंध को सूंघा। मैं हमेशा अपने पेट को कस कर जितना भी मूत्राशय में सू-सू बचा होता है उसे निकाल लेती हूँ। उस दिन मैंने जब अपने मूत्राशय को दबाया तो मेरी बचे हुए पेशाब की धार बड़ी ऊंची हो गयी और बड़े मामा के मुंह पर गिर पड़ी। बड़े मामा का मुंह मेरे पेशाब से भीग गया। बड़े मामा को बिलकुल भी बुरा नहीं लगा। आखिरकार मेरा मूत्राशय खाली हो गया। बड़े मामा ने बड़े प्यार से मेरी पेशाब से गीली चूत को चूम लिया।

“धत बड़े मामा, आप तो बहुत ही गंदे ….. ऊंह आप भी ना कैसी कैसी ….,” मैं शर्मा रही थी। मेरा दिल बड़े मामा की वासनामयी विचित्र इच्छायों से उत्तेजित हो कर तेज़ी से धक्-धक् कर रहा था।

“बेटा, आपका मूत्र तो अमृत की तरह मीठा और सुन्धित है। आज तो मैंने बस चखा है मैं तो दिल खोल कर अपनी बेटी का मूत्र्पान करने के दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ।” बड़े मामा ने प्यार से मेरी चूत को फिर से चूमा उन्होंने मेरी दोनों जांघें उठा कर अपने कन्धों पर रख ली। मैं कुछ भी न समझने के कारण बड़े मामा को सिर्फ प्यार से निहारती रही।

बड़े मामा मेरी पूरी खुली जांघों की बीच मेर्रे गीली चूत के ऊपर मुंह रख कर उसे ज़ोर* से चूमने लगे। मेरे गले से ऊंची सिसकारी निकल पड़ी।
“बड़े मामा … आह आप क्या कर रहें हैं?” मैं बड़ी मुश्किल से बोल पाई।

बड़े मामा ने मुझे नज़रंदाज़ कर मेरी कुंवारी छूट के गुलाबी अविकसित भगोष्ठों को अपनी जीभे से खोल कर मेरी चूत के संकरी दरार को जोर से अपनी जीभ से चाटने लगे।
“बड़े मामा, मेरी चूत जल रही है। ओह … आह … ओह .. बड़े मामा .. आ …आ … उन्न .. उन्न …अं।” मेरे गले से वासना भरी सिसकारी निकलने लगीं।

बड़े मामा ने मेरी चूत को अपनी खुरदुरी जीभ से चाटना शुरू कर दिया। उनकी जीभ मेरी चूत के निचले कोने से शुरू हो कर मेरे भग-शिश्न पर रुकती थी। उन्होंने कुछ ही क्षड़ों में मेरी चूत को वासना के अग्नि से प्रज्ज्वलित कर दिया।

मेरे दोनों हाथ स्वतः ही उनके घुंघराले घने बालों में समा गए। मैंने उनके घने बालों को मुठी में कस कर पकड़ लिया और उनका* मुंह अपनी चूत में दबाने लगी।
“बड़े मामा, मेरी चूत आह … आह … ओह .. कितना अच्छा लग रहा है, बड़े मामा आह ..ऊंह .. ऊंह ….आन्न्ह …आन्नंह ….और चाटिये प्लीज़।” मैं अब वासना की आग में जल रही थी और अनर्गल बोलने लगी।

बड़े मामा अपनी जीभ से अब मेरे सख्त अविकसित किशमिश के दाने के आकार के अति-संवेदनशील क्लिटोरिस को चाटने लगे। उनकी भारी खुरदुरी जीभ ने जैसे हे मेरे भग-शिश्न को जोर से चाटा मेरा रत-निष्पात शुरू हो गया।

“बड़े मामा मैं झड़ रही हूँ। आह .. आन्नंह ….ओह .. ओह … मा …मा ….. जी …ई … ई …. ऊउन्न्न्न्न्ह्ह्ह,” मैं जोर से चीख कर झड़ने लगी। मेरा प्रचुर रति-रस ने मेरी चूत से झरने की तरह बह कर बड़े मामा के मुंह को भर दिया। बड़े मामा मेरे चूत के रस को प्यार से पी कर मेरी कुंवारी चूत को फिर से चाटना शुरू कर दिया।

मैं अब बिलकुल पागल हो गयी। मेरा कमसिन अविकसित शरीर इतनी तीव्र प्रचंड वासना को सम्भालने के लिए अत्यंत अपरिपक्व था। दूसरी और बड़े मामा सम्भोग के खेल में अत्यंत अनुभवी थे। मेरे शरीर को उन्होंने अपने प्रभुत्व में ले कर मेरी छूट को अपनी जीभ से एक बार फिर से गर्म कर दिया।
मेरी सीत्कारी बार बार स्नानगृह में गूँज रहीं थीं।

मैं सिसकते हुए बड़े मामा के सर को अपने जांघों के बीच में जोर से दबा रही थी। बड़े मामा ने मेरी जांघों को और ऊपर कर मेरे नितिम्बों को और खोल दिया। उनकी जीभ अचानक मेरे मलाशय के छिद्र पर पहुँच गयी। मेरी सांस बंद हो चली मुझे तो सपने में भी सोच नही आता की कोई किसी दुसरे के गुदा-छिद्र को चाटने की इच्छा कर सकता था।

बड़े मामा मेरे सामने संसर्ग के नए द्वार खोल रहे थे।

बड़े मामा ने अब अपनी जीभ की नोक से मेरी गुदा को करोदने लगे। मेरी गांड का छेद स्वतः फड़कने लगा। बड़े मामा ने थोड़ी देर ही में उसे चाट कर शिथिल कर दिया। अचानक उनकी जीभ की नोक मेरी गांड के छेड़ के अंदर प्रविष्ट हो गयी।

“बड़े मामा आप क्या कर रहें हैं? ओह .. ओह .. आन्न्ह … मेरी गा .. आंड … ओह … आन्न्न्ह्ह्ह …. ऒओन्न्न्न्ह्ह्ह्ह्ह।” मेरे जलते हुए शरीर पर अब बड़े मामा का पूरा अधिकार था। मैंने अपने आप को बड़े मामा के हाथों पर छोड़ दिया।

बड़े मामा की जीभ मेरी गांड के छेद से लेकर चूत के ऊपरी कोने तक चाटने लगी। हर बार उनकी खुरदुरी जीभ मेरे संवेदनशील भग-शिश्न को जोर से रगड़ देती थी। मैं एक बार फिर से झड़ने के द्वार पर खड़ी थी। मेरी चूत में एक विचित्र से दर्द उठ चला। उस दर्द ने एक अजीब सी जलन भी थी।

“बड़े मामा मुझे झाड़ दीजिये, ” मैं हलक फाड़ कर चीखी।

बड़े मामा ने तुरंत अपनी मोटी तर्जनी [इंडेक्स फिंगर] मेरी गांड में डाल केर मेरे जलते हुए भाग-शिश्न को अपने होंठों में कास कर पकड़ कर उसे झंझोंड़ने लगे। मैं चीख कर झड़ने लगी।

मेरा सारा शरीर अकड़ गया। मेरे पेट में दर्द भरी एंथन ने मेरी सांस रोक दी। मेरी चूत के बहुत भीतर एक नई दर्द भरी मरोड़ पैदा हो गयी थी।
मेरे कमसिन अपरिपक्व शरीर के अंदर उठे सारे दर्द एक जगह में मिल गए। वो जगह मेरी चूत थी।

मेरी ऊंची चीख से स्नानगृह की दीवारें गूँज उठीं। जब मेरा रत-निष्पति शुरू हुई तो मेरे सारे शरीर की मांस-पेशियाँ शिथिल पड़ गयीं। मेरा अकड़ा हुआ कमसिन शरीर बिलकुल ढीला हो कर बड़े मामा के ऊपर गिर गया। मेरे लम्बी साँसें मेरे सीने को जोर से ऊपर-नीचे कर रहीं थें।

मेरी चूत में से रस बह कर बड़े मामा के मुंह में समा गया। मुझे लगा जैसे मेरी चूत में कोई पानी की नली खुल गयी थी।

मुझे पता नहीं मैं कितनी देर तक गहरी साँसे लेती शिथिल बड़े मामा की बाँहों में पड़ी रही। जब ममुझे होश आया तो मैं मुकुर कर बड़े मामा से लिपट गयी। बड़े मामा ने मेरे मुस्कुराते हुए मुंह पैर मेरे रस से भीगा अपने मुंह को लगा दिया। मेरे होंठों ने उनके होंठो पे लगे मेरे मीठे-नमकीन*रति-रस को चखने लगे।
बड़ी देर तक बड़े मामा और मैं खुले मुंह से एक दुसरे के मुंह के अंदर का स्वाद अपनी जीभ से लेते रहे।

अंत मे बड़े मामा धीरे से मुझसे अलग हुए और खड़े हो गए। उनका सफ़ेद कुरता किसी तम्बू की तरह ऊंचा उठा हुआ था।
“बड़े मामा, आपके पजामे में कुछ है?” मैंने शर्माते हुए कहा।

बड़े मामा ने मेरा छोटा नाजुक हाथ लेकर उसे अपने पजामे के ऊपर रख दिया। मेरा हाथ थरथराते एक मोटे खम्बे के ऊपर लगा था।
“नेहा बेटा, इस लंड को छू कर देख लो। एक दिन में यह आपकी चूत के अंदर जाने वाला है,” बड़े मामा ने धीरे से कहा और मुड़ कर मेरे स्नानगृह से बहर चले गए।

मैं गहरे वासनामयी सोंचों में डूबी कमोड पर बैठी रही। तब मुझे पता नहीं था की पुरुष के लंड कितने बड़े होते थे। मनु भैया का लंड जितना भी दिखा था मुझे तो बहुत मोटा लगा था। अंजू भाभी ने तो बताया था की मेरे परिवार के पुरुषों के लंड बहुत विशाल थे। मैं सोच में पड़ गयी की अंजू भाभी को सबके लंडों के बारे में कैसे पता चला?

मेरे हाथ ने बड़े मामा के पजामे में छुपे उनके लिंग को छुआ था वो तो मुझे बहुत ही भारी और मोटा लगा था।
मैं अब घबराने लगी। पर मेरी बड़े मामा के अश्लील शब्दों से जागृत वासना में कैसी भी कमी नहीं हुई। मैं अब बेचैनी से बड़े मामा के साथ संसर्ग के सपने देखने लगी।

मैंने अपने शयन-कक्ष सुइट में पहुच कर जल्दी से बैग में कुछ कपड़े, जूते, अन्त्वस्त्र डाल लिए. मैं केवल लम्बी टी शर्ट पहन कर बिस्तर में रज़ाई के अंदर घुस गयी.
मुझे सारी रात ठीक से नींद नहीं आयी. मैं बिस्तर में उलट-पलट कर सोने के कोशिश कर रही थी, घड़ी में बारह बजे थे.मेरे शयन-कक्ष के दरवाज़े खोल कर अंजू भाभी जल्दी से मेरे बिस्तर में कूद कर रज़ाई में घुस कर मेरे से लिपट गयीं. अंजू भाभी ने सिर्फ एक झीना सा रेशम का साया पहना हुआ था.

“अंजू भाभी, आप को तो सुबह जाने की तय्यारी करनी थी,” मैं भी अंजू भाभी के साथ ज़ोर से लिपट गयी.
अंजू भाभी ने मुझे पलट कर पीठ पर सीधा लिटा दिया और मेरे ऊपर लेट गयीं. उन्होंने ने मेरे होठों पर अपने गरम कोमल होंठ रख कर धीरे से फुसफुसाईं,”मेरी प्यारी और अत्यंत सुंदर नन्दरानी, तुम्हे प्यार से विदा किये बिना तो मैं नहीं जा सकती थी.”

अंजू भाभी ने अपने जीभ से मेरे होंठों को खोलकर मेरे मूंह में अपनी जीभ डाल कर मेरे मसूड़ों को प्यार से सहलाया.उनका मीठा थूक मेरे मूंह में बह रहा था. मैंने भी अपनी जीभ उनकी जीभ से भिड़ा दी.

अंजू भाभी ने मेरी टीशर्ट ऊपर कर मेरे फड़कते हुए मोटे पर अभी भी पूर्ण तरह से अविकसित स्तनों को उज्जागर कर दिया। उनका हाथ मेरे दोनों उरोजों को बारी बारी से लगा। मेरी सिसकारी भाभी के मुंह में समा गयी। उन्होंने मेरा एक स्तन अपने हाथ से मसलना शुरू कर दिया औए अपनी जीभ ज़ोर से मेरे मुंह में घुसेड़ने लगीं।
मेरी चूत मेरे रस से भर गयी और मेरा रस चूत से बहार निकल कर मेरी जांघों को भिगोना लगा।

अंजू भाभी के काफी लम्बे चुम्बन से मेरी सांस कामोन्माद से रुक-रुक कर आ रही थी. अंजू भाभी ने अंत में मुझे मुक्त कर दिया. मैंने भाभी की मीठी लार निगल कर नटखटपने से कहा, “आज क्या बात है, अप्सरा से भी सुंदर मेरी भाभी इस वक़्त नरेश भैया से नहीं चुद रहीं?” मैंने अपनी छोटी सी किशोर-उम्र में पहली बार अश्लील शब्द का उपयोग किया.

अंजू भाभी खिलखिला कर हंसी और मुझे जोर से चूमने के बाद बोलीं, “मेरी छोटी सी, गुड़िया जैसी प्यारी नन्द. आपके भैया मेरी चूत और गांड दोनों मारने के बाद सो गएँ हैं. मैंने उनसे तुम्हारे बारे में पूछ लिया है. तुम्हारे भैया ने सन्देश भेजा है की जब तुम्हारा मन चाहे वो अत्यंत खुशी से तुम्हारी चुदाई के लए तैयार हैं. मैं तुम्हे यह अकेले में बताना चाहती थी. तुम बस हमें फ़ोन कर देना. तुम्हारे भैया और मैं कुछ भी बहाना बना कर तुम्हे अपने पास बुला लेंगे.”

मेरी चूत बिलकुल गीली हो गयी. मैंने भाभी को प्यार से चूमा, “अंजू भाभी, क्या मैं आपकी ताज़ी चुदी हुई चूत और गांड देख सकती हूँ?” मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं अब कामेच्छा से इतनी प्रभावित हो चुकी थी कि अब मुझे भाभी से इस तरह की बातें करते हुए कोई शर्म नहीं आ रही थी.

भाभी ने हंसते हुए अपना साया ऊपर किया और दोनों घुटने मेरे सिर के दोनों तरफ रख कर अपनी घने घुंघराले झांटों से भरी सुगन्धित चूत को मेरे मूंह के ठीक ऊपर रख दिया. भाभी ने अपने हाथों से अपनी यौनी के फ़लकों को खोल कर मेरे सामने अपनी चूत का गुलाबी प्रवेश-मार्ग मेरे सामने कर दिया, “नेहा, यदी चाहो तो अपनी जीभ से अपने भैया के वीर्य का स्वाद चख सकती हो.”

भाभी की चूत की नैसर्गिक सुगंध से मेरे होश गुम हो गए.
मेरी जीभ अपनी मर्ज़ी से भाभी की चूत के प्रवेश को धीरे से चाटने लगी. मुझे भाभी की चूत से तेज़, तीखा-मीठा स्वाद मिला. भाभी ने नीचे की तरफ ज़ोर लगाया मानो पखाना करना करना चाहतीं हों. उनकी खुशबू भरी चूत से धीरे-धीरे सफ़ेद, चिपचिपा लसदार पदार्थ बह कर मेरी जीभ पर ढलक गया. मैंने जल्दी से अपना मूंह बंद कर लिया. मेरे नरेश भैया का वीर्य, भाभी के रति-रस से मिलकर विचित्र पर मदहोश करने वाले स्वाद से मेरा मूंह भर गया.

भाभी बोलीं, “नेहा मैं तुम्हरे भैया के वीर्य के स्वाद की दासी बन चुकी हूँ. मैं कोशिश करती हूँ शायद मेरी गांड में से भी थोड़ा सा निकल जाये.”
इससे पहले कि मैं कुछ भी बोल पाऊँ भाभी कि कोमल हल्की-भूरी गांड का छोटा सा छेद मेरे खुले मूंह पर था. भाभी ने अपने दोनों नाज़ुक छोटे-छोटे हाथों से अपने भारी, मुलायम, गुदाज़ नितिम्बों को फैला दिया. भाभी बड़ी सी सांस भर कर ज़ोर से अपनी गांड का छेद खोलने की कोशिश करने लगीं. उनकी गांड का छल्ला धीरे-धीरे खुलने लगा. मुझे उनके गांड के भीतर की सुगंध से मदहोशी होने लगी. कुछ देर में ही भैया का लसलसा वीर्य की एक छोटी सी धार भाभी की गांड से बह कर मेरे मूंह में गिर पडी. इस बार भैया के वीर्य में भाभी की गांड का स्वाद शामिल था. मैंने लोभी की तरह भैया का वीर्य सटक लिया.

अंजू भाभी की गांड का छल्ला मेरे मुंह के ऊपर खुल-बंद हो रहा था। उनकी गांड के अंदर की गुलाबी परत जब भाभी जोर लगा कर अपनी गांड खोलती थीं तो मुझे दिखने लगती थी। मेरे बिना सोचे समझे और किये मेरी जीभ स्वतः मेरे मुंह से निकल भाभी की गांड के फूले छल्ले को चूमने लगी अंजू भाभी की सितकारी निकल गयी, “आह, नेहा, तुमने …… आह, …. नेहा फिर से मेरी गांड को अपनी जीभ से चाटो।”

मैं गर्व से फूल गयी। मेरी जीभ ने अंजू भाभी को आनंद दिया इस बात से मैं उत्तेजित हो गयी। मैंने दोनों हाथों से भाभी के फूले बड़े मुलायम चौड़े चूतड़ पकड़ कर उनकी गांड को अपने मुंह के पास खींच लिया। मेरी जीभ ने उनके गांड के छिद्र को चाटना शुरू कर दिया।
अंजू भाभी की सिस्कारियां अब ऊंची होने लगीं।

मैंने उनकी फड़कती हुई गांड के छेड़ में अपनी जीभ की नोक अंदर डालने कोशिश शुरू कर दी। मेरी महनत का मुझे शीघ्र ही इनाम मिल गया। भाभी ने कराह कर अपनी गांड को ज़ोर लगा कर खोलनी की कोशिश की और मेरी तैयार जीभ उनकी गांड के अंदर समा गयी। मुझे उनकी गांड की मादक सुगंध तो पहले ही लुभा गयी थी अब उनकी गांड के अंदर का विचित्र स्वाद भी मुझे लुभाने लगा।

भाभी ने अपनी गांड धीरे धीरे मेरी जीभ के ऊपर रगड़ना शुरू कर दिया।
उनकी हर सिसकारी मुझे प्रोत्साहन दे रही थी। थोड़ी देर में अंजू भाभी करह आकर घुटी घुटी आवाज़ में बोलीं, “नेहा अब मेरी चूत चाटो। मुझे अपने मीठे मुंह से चूस कर झाड़ दो।”

भाभी के आदेश ने मुझे और भी उत्तेजित कर दिया। भाभी ने अपने चूतड़ हिला कर अपनी गीले घुंघराले रेशमी झांटों से ढकी योनी को मेरे मुंह के ऊपर सटा दिया। मैंने नादानी में उनकी सुगन्धित प्यारी चूत को अपने मुंह में भर कर कस कर चूम लिया। भाभी के गले से धीमी सी चीख निकल पड़ी। पहले तो मुझे लगा कि मैंने अपनी प्यारी सुंदर भाभी की चूत को चोट पहुंचा दी थी। पर जल्दी ही भाभी ने धीरे से कहा, ” नेहा, तुम तो बहुत अच्छी चूत चूस रही हो। और ज़ोर से मेरी चूत चूसो। मेरी छूट को काट खाओ।

मैंने हिम्मत कर उनके मोटे, मुलायम ढीले लटके हुए गुलाबी भगोष्ठों को अपने मुंह में भर पहले तो धीरे धीरे से चूसा फिर भाभी की सिस्कारियां सुन कर मेरा साहस बड़ गया और मैंने भाभी के दोनों मोटे मुलायम भागोश्थों को अपने होंठों में दबा कर ज़ोर से चूसना शुरू कर दिया।
अंजू भाभी की सिस्कारियां अब कराहट में बदल गयीं, “आह .. ने .. एहा …ऐसे ही चूसो। और ज़ोर से नेहा। और ज़ोर चूस कर दर्द करो।मैं जल्दी से झड़ने वाली हूँ।”

अंजू भाभी की गांड का छल्ला मेरे मुंह के ऊपर खुल-बंद हो रहा था। उनकी गांड के अंदर की गुलाबी परत जब भाभी जोर लगा कर अपनी गांड खोलती थीं तो मुझे दिखने लगती थी। मेरे बिना सोचे समझे और किये मेरी जीभ स्वतः मेरे मुंह से निकल भाभी की गांड के फूले छल्ले को चूमने लगी अंजू भाभी की सितकारी निकल गयी, “आह, नेहा, तुमने …… आह, …. नेहा फिर से मेरी गांड को अपनी जीभ से चाटो।”

मैं गर्व से फूल गयी। मेरी जीभ ने अंजू भाभी को आनंद दिया इस बात से मैं उत्तेजित हो गयी। मैंने दोनों हाथों से भाभी के फूले बड़े मुलायम चौड़े चूतड़ पकड़ कर उनकी गांड को अपने मुंह के पास खींच लिया। मेरी जीभ ने उनके गांड के छिद्र को चाटना शुरू कर दिया।
अंजू भाभी की सिस्कारियां अब ऊंची होने लगीं।
मैंने उनकी फड़कती हुई गांड के छेड़ में अपनी जीभ की नोक अंदर डालने कोशिश शुरू कर दी। मेरी महनत का मुझे शीघ्र ही इनाम मिल गया। भाभी ने कराह कर अपनी गांड को ज़ोर लगा कर खोलनी की कोशिश की और मेरी तैयार जीभ उनकी गांड के अंदर समा गयी। मुझे उनकी गांड की मादक सुगंध तो पहले ही लुभा गयी थी अब उनकी गांड के अंदर का विचित्र स्वाद भी मुझे लुभाने लगा।

भाभी ने अपनी गांड धीरे धीरे मेरी जीभ के ऊपर रगड़ना शुरू कर दिया।
उनकी हर सिसकारी मुझे प्रोत्साहन दे रही थी। थोड़ी देर में अंजू भाभी करह आकर घुटी घुटी आवाज़ में बोलीं, “नेहा अब मेरी चूत चाटो। मुझे अपने मीठे मुंह से चूस कर झाड़ दो।”

भाभी के आदेश ने मुझे और भी उत्तेजित कर दिया। भाभी ने अपने चूतड़ हिला कर अपनी गीले घुंघराले रेशमी झांटों से ढकी योनी को मेरे मुंह के ऊपर सटा दिया। मैंने नादानी में उनकी सुगन्धित प्यारी चूत को अपने मुंह में भर कर कस कर चूम लिया। भाभी के गले से धीमी सी चीख निकल पड़ी। पहले तो मुझे लगा कि मैंने अपनी प्यारी सुंदर भाभी की चूत को चोट पहुंचा दी थी। पर जल्दी ही भाभी ने धीरे से कहा, ” नेहा, तुम तो बहुत अच्छी चूत चूस रही हो। और ज़ोर से मेरी चूत चूसो। मेरी छूट को काट खाओ।

मैंने हिम्मत कर उनके मोटे, मुलायम ढीले लटके हुए गुलाबी भगोष्ठों को अपने मुंह में भर पहले तो धीरे धीरे से चूसा फिर भाभी की सिस्कारियां सुन कर मेरा साहस बड़ गया और मैंने भाभी के दोनों मोटे मुलायम भागोश्थों को अपने होंठों में दबा कर ज़ोर से चूसना शुरू कर दिया।
अंजू भाभी की सिस्कारियां अब कराहट में बदल गयीं, “आह .. ने .. एहा …ऐसे ही चूसो। और ज़ोर से नेहा। और ज़ोर चूस कर दर्द करो।मैं जल्दी से झड़ने वाली हूँ
मैं अब भाभी की वासना की आग में शामिल हो गयी। मैंने अपनी पहले एक उंगली उनकी गांड में डाली फिर उनकी कसी हुई गांड में एक और उंगली डाल दी। मैं उसी समय उनके भगोष्ठों को अपने दांतों में हलके से भींच कर अपने मुंह के अंदर खींचने लगी।

अंजू भाभी का सारा शरीर कांपने लगा। उनकी ऊंची चीख कमरे में गूँज उठी। उन्होंने अपने गांड मेरी उंगलीयों पर और अपनी चूत मेरे मुंह पर कास कर दबा दी। मेरी सांस भाभी के भारी चूतडों के नीचे दबकर घुट रही थी। पर भाभी का तड़पता शरीर चरमोत्कर्ष के लिए उत्सुक था। उनकी चूत ने अचानक मेरे मुंह में मीठा रस की मानो नाली खोल दी।

मेरा मुंह भाभी के रति-रस से बार बार भर गया। मैंने जल्दी जल्दी उसे पीने लगी पर फिर भी भाभी की चूत से झड़ते रस ने मेरे मुंह को पूरा भिगो दिया।
भाभी का कम्पित शरीर बड़ी देर में संतुलित हुआ। उन्होंने लपक कर पलती ली और मुझे अपनी बाँहों में भर लिया, “नेहा, ऐसे तो मैं किसी और स्त्री के चूसने से कभी भी नहीं आयी। तुम्हारे मीठे मुंह में तो जादू है। अब मुझे अपनी सुंदर ननद का एहसान चुकाना होगा।”

उन्होंने ने अपना साया अतार कर फैंक दिया।
इससे पहले कि मैं समझ पाती अंजू भाभी फिर से पलट कर मेरे ऊपर लेट गयी। उन्होंने मेरी भरी गुदाज़ जांघों को मोड़ कर पूरा फैला दिया। मेरी गीली चूत पूरी खुल कर भाभी के सामने थी। मेरी टीशर्ट मेरे पेट के ऊपर इकठ्ठी हो गयी थी।

उनके मोटी मादक जांघों ने मेरे चेहरे को कस कर जकड़ कर एक बार फिर से मेरे मुंह के ऊपर अपनी मीठी रस भरी चूत को लगा दिया।
भाभी ने मेरी चूत को जोर से चूम कर अपनी जीभ से मेरे संकरी चूत के दरार को चाटने लगीं। एक रात में मेरी चूत दूसरी बार चूस रही थी।
मेरी सिसकारी भाभी की चूत के अंदर दफ़न हो गयी। मैंने भी ज़ोरों से भाभी की चूत के ऊपर अपने जीभ, होंठ और दांतों से आक्रमण कर दिया।
भाभी ने मेरी चूत को अपनी जीभ से चाट कर मेरे भग-शिश्न को रगड़ने लगीं। मेरी गांड स्वतः उनके मुंह के ऊपर मेरी चूत को दबाने लगीं।
मैंने भाभी का मोटा, तनतनाया हुआ भाग-शिश्न अपने मुंह में ले कर चूसते हुए अपने दो उंगलियाँ उनकी कोमल छूट में घुसेड़ दीं।

मैंने अपनी उँगलियों से भाभी की चूत मारते हुए उनके क्लिटोरिस को बेदर्दी सी चूसना, रगड़ना और कभी कभी हलके से काटना शुरू कर दिया।
भाभी मेरी चूत चाटते हुए मेरी तरह सिस्कारिया भर रहीं थी।
भाभी अपनी एक उंगली से मेरी गांड के छिद्र को सहलाने लगीं। मैं बिदक कर अपने चूतड़ बिस्तर से ऊपर उठा कर उनके मुंह में अपनी चूत घुसाने की कोशिश करने लगी।

मुझे पता नहीं कितनी देर तक हम ननद-भाभी एक दुसरे के साथ सैम-लैंगिक प्यार में डूबे रहे। अचानक मेरी चूत में ज़ोर से जलन होने लगी। मैं समझ गयी कि मैं अब जल्दी झड़ने वाली हूँ। मैंने भाभी के भाग-शिश्न को फिर से अपने होंठों से खींचना उमेठना शुरू कर उनकी चूत को अपनी उंगलियाँ से तेज़ी से मारने लगी।
भाभी और मैं लगभग एक साथ झड़ने लगीं। मारी चूत से मानों कि रस का झड़ना फुट उठा। भाभी की चूत ने एक बार फिर से इतना रस मेरे मुंह में निकाला कि मैं मुश्किल से बिना व्यर्थ किये पी पायी।

हम दोनों बहुत देर तक एक दुसरे की जांघों के बीच अपना मुंह दबा कर हांफती हुई साँसों को काबू में करने का प्रयास कर रहीं थीं।
आखिकार थकी हुई सी भाभी पलटीं और मुझे बाँहों में लेकर अनेकों बार चूमने लगीं। मैंने भी भाभी के चुम्बनों का जवाब अपने चुम्बनों से देना प्रारंभ कर दिया।
कुछ देर बाद भाभी मेरे ऊपर से फिसल कर मेरे साथ लेट गयीं और मेरे होंठों पर अनेकों चुम्बन दिए.

कुछ देर बाद मैंने भाभी के साथ हुए सैम-लैंगिक अगम्यागमन को नज़रंदाज़ करने के लिए शरारत से भाभी के दोनों निप्पलों को कास कर दबा दिया और नटखटपन से बोली, “अब तो मुझे भैया से चुवाना ही पड़ेगा. उनका ताज़ा मीठा-नमकीन वीर्य तो मुझे हमेशा के लिए याद रहेगा.”
मेरी भाभी ने मेरा चेहरा हाथों में ले कर धीरे से बोलीं,”नेहा, तुम्हारी स्वार्गिक सौन्दर्य के लए तो भगवान् भी लालची बन जायेंगे. नेहा, तुम्हें शायद पता न हो पर इस घर में सारे पुरुष तुम्हे प्यार से चोदने से पीछे नहीं हटेंगें. कभी तुमने अपने पापा को ध्यान से देखा है. उनके जैसा पुरुष तो किसी भी स्त्री का संयम भंग कर सकता है. मुझे तो पता नहीं कि तुम कैसे एक घर में रह कर भी उनसे चदवा कर उनकी दीवानी नहीं बन गयीं. मैं तो अबतक अपना कौमार्य उनको सम्पर्पित कर देती.”

अब मैं बिलकुल शर्म से तड़प उठी. ममेरे भई से चुदवाने की अश्लील बात एक तरफ थी पर अपने प्यारे पापा के साथ…[ऊफ पापा के साथ कौटुम्बिक-व्यभिचार…भगवान् नहीं..नहीं]… मेरा दिमाग पागल हो गया.
“भाभी प्लीज़ आप ऐसे नहीं बोलिए. मुझे बहुत शर्म और परेशानी हो रही है,”

भाभी ने प्यार से मुझे पकड़ के एक लम्बा सा चुम्बन दिया और मुझसे विदा ली, “नेहा, तुम कल बड़े बाबूजी [बड़े मामा] के साथ मछली पकड़ने जा रही हो। यह अच्छा मौक़ा है अपने बड़े मामा से अपनी कुंवारी चूत फड़वाने का। उन्हें पटाने में तुम्हें ज़्यादा मेहनत भी नहीं करनी होगी।”
मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। क्या अंजू भाभी को शक हो गया था की मेरे और बड़े मामा के बीच में कुछ चल रहा था?
मैंने बड़ी बहादुरी से अपना डर छुपा कर मुस्करा कर बोली, “भाभी, आप को कैसे पता की बड़े मामा को पटाने में कम मेहनत लगेगी? क्या अपने ससुरजी के साथ भी चुदाई की हुई है?”
मैंने देखा की कुछ क्षणों के लिए अंजू भाभी भाभी सकपका गयीं। पर वो मुझे बहुत परिपक्व थीं। उन्होंने संभल कर बात सम्भाल ली, “अरे, मेरी छोटी सी नन्द रानी तो बड़ी तड़ाके से बोलना सीख गयी है।”

उन्होंने झुक कर मेरी नाक की नोक को प्यार से काट कर मेरे खिलखिला कर हँसते हुए मुंह को उतने प्यार से ही चूम लिया, ” नेहा, मुझे बेटी पैदा करने का सौभाग्य हुआ तो मैं प्रार्थना करूंगी की वो तुम्हारे जितनी प्यारी और सुंदर हो।” उन्होंने मेरे मुंह पर से अपने मीठे होंठ लगा कर चूम लिया। मैं उनके प्यार से अभिभूत हो गयी।

अंजू भाभी ने मुझे मुक्त किया और द्वार की तरफ चल दीं। पर अंजू भाभी भी अंजू भाभी थीं। उन्होंने दरवाज़े के पास मुड़ कर मुझे मुस्करा कर देखा और मीठी सी आवाज़ में बोलीं, “नेहा, तुम्हारे बड़े मामा मेरे ससुर हैं और मैं उनके बेटे की अर्धांग्नी हूँ। मुझे अपने ससुर जी के सोचने के तरीके के बारे में काफी-कुछ पता है। सो मेरी बात भूलना नहीं। यदि बड़े मामा तुम्हारे इशारों को ना समझें तो तुम्हारे नरेश भैया तो तैयार हैं हीं।”

मेरा मन तो हुआ कि मैं अंजू भाभी को वापिस बुला कर सब बता दूं। हो सकता है की वो मुझे कुछ बड़े मामा से चुदवाने में मदद करने की कोई सलाह देदें। पर फिर मुझे तुरंत विचार आया कि बड़े मामा भी तो इस प्रसंग में शामिल हैं और उनकी आज्ञा के मुझे किसी को भी बताने का अधिकार नहीं है।
मैं इस उहापोह में पड़ी रही पर कुछ ही देर में मैंने अपने मस्तिष्क को समझा दिया। आखिरकार मैं निद्रादेवी की गोद में गिरकर गहरी नींद में शांति से सो गयी.

सुबह मैंने जल्दी से नहाने के बाद अपने बालों को खुला छोड़ दिया. मैंने सफ़ेद कॉटन की ब्रा और जांघिया चुनकर हलके गुलाबी रंग का कुरता और सफ़ेद सलवार पहनी. उसके ऊपर मैंने सफ़ेद झीनी सी चुन्नी गले पर लपेट ली. दुपट्टे के नीचे मेरे बड़े उरोज़ और भी उभरे हुए प्रतीत होते थे. मैंने अपने गोरे छोटे-छोटे पैरों पर हलके भूरे मुलायम चमड़े की फ्लैट हील की रोमन सैंडल डाल ली.

नौकर ने मेरा बैग बड़े मामा की मर्सिडीज़ ४x४ में रख दिया. मुझे पता था की इस गाड़ी में भी हमारे परिवार की दसियों गाड़ियों की तरह काले शीशे का एकांत या प्राइवेसी विभाजन था.

बाहर सब लोग नरेश भैया और अंजू भाभी को विदा करने के लिए इकट्ठा थे. नरेश भैया ने मुझे दूर से देखकर तेज़ी से मेरी तरफ आये और अपने बाँहों में भर लिया. भैया ने मुझे दोनों गालों पर चूमा और मेरे कान में धीरे से फुसफुसाए, “नेहा, भाभी ने मुझे सब समझा दिया है. मैं तुम्हारे फोने का बेसब्री से इंतज़ार करूंगा.” मैं शर्मा कर उनसे लिपट गयी.

अंजू भाभी भी नज़दीक आ कर मुझसे गले मिली और मेरे चुपके से मेरे नितिम्बों को दबा दिया.
भैया-भाभी के जाने के बाद बड़े मामा और मैं भी रवाना हो गए. पीछे हमारा परिवार एक दुसरे को गोल्फ में हराने की बातें में व्यस्त हो गया.

“नेहा बेटा, आप बहुत ही सुंदर लग रही हो,” बड़े मामा की प्रशंसा ने मुझे शर्म से लाल कर दिया.
बड़े मामा ने खाकी पतलून, आसमानी रंग की कमीज़ और गहरे नीले रंग का [नेवी ब्लू]कोट पहना था. वृहत्काय बड़े मामा अत्यंत हैंडसम और सुन्दर लग रहे थे.

“बड़े मामा आप ने ड्राईवर को क्यों नहीं लिया? हमें रास्ते में भी आपके साथ समय मिल जाता.” मैंने शर्मा कर बड़े मामा के साथ किसी पत्नी जैसे अंदाज़ शिकायत की.
बड़े मामा खूब ज़ोर से हंसें, “नेहा बेटा. आप भूल गए ड्राईवर होता तो वो भी बंगले में ही रहता. आप फ़िक्र नहीं करो, हम वहां पहुच कर आपकी सारी शिकायत मिटा देंगें.”

मैंने शर्म से अपना सिर झुका लिया. मैं अपने अक्षत-यौन को नष्ट करने के लिए कितनी बेशर्मी से बड़े मामा के साथ समरक्त-रतिसंयोग के लए उत्सुक थी.
बड़े मामा ने प्यार से मेरे खुले बालों को सहलाया.

बड़े मामा ने मुझे सारे रास्ते अपने मज़ाकों से हंसा-हंसा के मेरे पेट में दर्द कर दिया. हमने रास्ते में एक ढाबे में रुक कर नाश्ता किया. बड़े मामा को पता था कि मुझे सड़क के साथ के ढाबों में खाना खाना बहुत पसंद था. मुझे आलू के परांठे, अचार, अंडे के भुजिया किसी पांच सितारा होटल के खाने से भी अच्छी लगे. बड़े मामा मुझे लालचपने से खाते हुए पिताव्रत प्यारभरी आँखों से देखते रहे.

मैंने उनकी आँखों में भरे प्यार को अस्सानी से महसूस किया और उनका ध्यान बटाने के लिए बोली, “बड़े मामा, प्लीज़ थोडा खाइए ना. बेचारे ढाबे वाला समझेगा कि आपको उसका खाना अच्छा नहीं लगा.”
बड़े मामा ने धीरे से कहा,”नेहा बेटा, काश तुम मेरी बेटी होतीं. तुम्हारे जैसी बेटी पाने के लिए मैं दुनिया का हर धन त्याग देता.” जबसे मुझे याद है मेरे जन्म के बाद वो इस बात को कई बार कह चुके थे.

जब मनू भैया सिर्फ एक साल के थे तभी बड़ी मामी का देहांत हो गया था. उन्नीस साल तक मामा ने अपनी अर्धांग्नी की क्षति का दर्द सीने में छुपा कर अपने दोनों बेटों के लिए पूरा समय दे दिया.

मैंने अपना छोटा सा हाथ बड़े मामा के बड़े मज़बूत हाथ पर रखा, “बड़े मामा, आप मेरे पित-तुल्य हैं. मैं आपकी बेटी के तरह ही तो हूँ. इसका मतलब है कि आप मुझे अपनी बेटी नहीं समझते?”

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