पत्नी एक्सचेंज

जिस दिन मैंने अपने पति की जेब से वो कागज पकड़ा, मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। कम्यूटर का छपा कागज था। कोई ईमेल संदेश का प्रिंट।

“अरे! यह क्या है?” मैंने अपने लापरवाह पति की कमीज धोने के लिए उसकी जेब खाली करते समय उसे देखा। किसी मिस्टर विनय को संबोधित थी। कुछ संदिग्ध-सी लग रही थी, इसलिए पढ़ने लगी। अंग्रेजी मैं ज्यादा नहीं जानती फिर भी पढ़ते हुए उसमें से जो कुछ का आइडिया मिल रहा था वह किसी पहाड़ टूटकर गिरने से कम नहीं था। कितनी भयानक बात! आने दो शाम को! मैं न रो पाई, न कुछ स्पष्ट रूप से सोच पाई कि शाम को आएँगे तो क्या पूछूँगी।

मैं इतनी गुस्से में थी कि शाम को जब वे आए तो उनसे कुछ नहीं बोली सिवाय इसके कि, “ये लीजिए, आपकी कमीज में थी।”

चिट्ठी देख कर वो एकदम से सिटपिटा गए, कुछ कह नहीं पाए, मेरा चेहरा देखने लगे। शायद थाह ले रहे थे कि मैं उसे पढ़ चुकी हूँ या नहीं। उम्मीद कर रहे थे कि अंग्रेजी में होने के कारण मैंने छोड़ दिया होगा। मैं तरह-तरह के मनोभावों से गुजर रही थी। इतना सीधा-सादा सज्जन और विनम्र दिखने वाला मेरा पति यह कैसी हरकत कर रहा है? शादी के दस साल बाद! क्या करूँ? अगर किसी औरत के साथ चक्कर का मामला रहता तो हरगिज माफ नहीं करती। पर यहाँ मामला दूसरा था। दूसरी औरत तो थी मगर अपने पति के साथ। और इनका खुद का भी मामला अजीब था।

रात को मैंने इन्हें हाथ तक नहीं लगाने दिया, ये भी खिंचे रहे। मैं चाह रही थी कि ये मुझसे बोलें! बताएँ, क्या‍ बात है। मैं बीवी हूँ, मेरे प्रति जवाबदेही बनती है। मैं ज्यादा देर तक मन में क्षोभ दबा नहीं सकती, तो अगले दिन गुस्सा फूट पड़ा। ये बस सुनते रहे।

अंत में सिर्फ इतना बोले, “तुम्हें मेरे निजी कागजों को हाथ लगाने की क्या जरूरत थी? दूसरे की चिट्ठी नहीं पढ़नी चाहिए।”

मैं अवाक रह गई। अगले आने वाले झंझावातों के क्रम में धीरे धीरे वास्तविकता की और इनके सोच और व्यवहार की कड़ियाँ जुड़ीं, मैं लगभग सदमे में रही, फिर हैरानी में। हँसी भी आती यह आदमी इतना भुलक्कड़ और सीधा है कि अपनी चिट्ठी तक मुझसे नहीं छिपा सका और इसकी हिम्मत देखो, कितना बड़ा ख्वााब!

एक और शंका दिमाग में उठती – ईमेल का प्रिंट लेने और उसे घर लेकर आने की क्या जरूरत थी। वो तो ऐसे ही गुप्त और सुरक्षित रहता? कहीं इन्होंने जानबूझकर तो ऐसा नहीं किया? कि मुझे उनके इरादे का पता चल जाए और उन्हें मुझ से कहना नहीं पड़े? जितना सोचती उतना ही लगता कि यही सच है। ओह, कैसी चतुराई थी!!

“तुम क्या चाहते हो?”, “मुझे तुमसे यह उम्मींद नहीं थी”, “मैं सोच भी नहीं सकती”, “तुम ऐसी मेरी इतनी वफादारी, दिल से किए गए प्या्र का यही सिला दे रहे हो?”, “तुमने इतना बड़ा धक्काै दिया है कि जिंदगी भर नहीं भूल पाऊँगी?” मेरे ऐसे तानों, शिकायतों को सुनते और झेलते ये एक ही स्पष्टीकरण देते, “मैं तुम्हें धोखा देने की सोच भी नहीं सकता। तुम मेरी जिंदगी हो। अब क्या करूँ, मेरा मन ऐसा चाहता है। मैं छिप कर तो किसी औरत से संबंध नहीं बना रहा हूँ। मैं ऐसा चाहता ही नहीं। मैं तो तुम्हें चाहता हूँ।”

तिरस्काैर से मेरा मन भर जाता। प्यार और वफादारी का यह कैसा दावा है?

“जो करना हो वो मैं तुम्हें विश्वास में लेकर ही करना चाहता हूँ। तुम नहीं चाहती हो तो नहीं करूँगा।”

मैं जानती थी कि यह अंतिम बात सच नहीं थी। मैं तो नहीं ही चाहती थी, फिर ये यह काम क्योंं कर रहे थे?

“मेरी सारी कल्पना तुम्हींं में समाई हैं। तुम्हें छोड़कर मैं सोच भी नहीं पाता। यह धोखा नहीं है, तुम सोच कर देखो। छुप कर करता तो धोखा होता। मैं तो तुमको साथ लेकर चलना चाहता हूँ। आपस के विश्वास से हम कुछ भी कर सकते हैं। हम संस्कारों से बहुत बंधे होते हैं, इसीलिए खुले मन से देख नहीं पाते। गौर से सोचो तो यह एक बहुत बड़े विश्वास की बात भी हो सकती है कि दूसरा पुरुष तुम्हें एंजाय करे और मुझे तुम्हें खोने का डर नहीं हो। पति-पत्नी अगर आपस में सहमत हों तो कुछ भी कर सकते हैं। अगर मुझे भरोसा न हो तो क्या मैं तुम्हें। किसी दूसरे के साथ देख सकता हूँ?”

यह सब फुसलाने वाली बातें थीं, मु्झे किसी तरह तैयार कर लेने की। मुझे यह बात ही बरदाश्त से बाहर लगती थी। मैं सोच ही नहीं सकती कि कोई गैर मर्द मेरे शरीर को हाथ भी लगाए। वे औरतें और होंगी जो इधर उधर मुँह मारती हैं।

पर बड़ी से बड़ी बात सुनते-सुनते सहने योग्य हो जाती है। मैं अनिच्छा से सुन लेती थी। साफ तौर पर झगड़ नहीं पाती थी, ये इतना साफ तौर पर दबाव डालते ही नहीं थे। बस बीच-बीच में उसकी चर्चा छेड़ देना। उसमें आदेश नहीं रहता कि तुम ऐसा करो, बस ‘ऐसा हो सकता है’, ‘कोई जिद नहीं है, बस सोचकर देखो’, ‘बात ऐसी नही वैसी है’, वगैरह वगैरह। मैं देखती कि उच्च शिक्षित आदमी कैसे अपनी बुद्धि से भरमाने वाले तर्क गढ़ता है।

अपनी बातों को तर्क का आधार देते, “पति-पत्नी में कितना भी प्रेम हो, एक ही आदमी के साथ सेक्स धीरे धीरे एकरस हो ही जाता है। कितना भी प्रयोग कर ले, उसमें से रोमांच घट ही जाता है। ऐसा नहीं कि तुम मुझे नहीं अच्छी लगती हो या मैं तुम्हें अच्छां नहीं लगता। जरूर, बहुत अच्छे लगते हैं पर …”

“पर क्या ?” मन में सोचती कि सेक्सं अच्छा नहीं लगता तो क्या, दूसरे के पास चले जाएँगे? पर उस विनम्र आदमी की शालीनता मुझे भी मुखर होने से रोकती।

“कुछ नहीं…” अपने सामने दबते देखकर मुझे ढांढस मिलता, गर्व होता कि कि मेरा नैतिक पक्ष मजबूत है, मेरे अहम् को खुशी भी मिलती। पर औरत का दिल…. उन पर दया भी आती। अंदर से कितने परेशान हैं !

पुरुष ताकतवर है, तरह तरह से दबाव बनाता है। याचक बनना भी उनमें एक है। यही प्रस्तांव अगर मैं लेकर आती तो? कि मैं तुम्हाेरे साथ सोते सोते बोर हो गई हूँ, अब किसी दूसरे के साथ सोना चाहती हूँ, तो?

दिन, हफ्ते, महीने, वर्ष गुजरते गए। कभी-कभी बहुत दिनों तक उसकी बात नहीं करते। तसल्ली होने लगती कि ये सुधर गए हैं। लेकिन जल्दी ही भ्रम टूट जाता। धीरे-धीरे यह बात हमारी रतिक्रिया के प्रसंगों में रिसने लगी। मुझे चूमते हुए कहते, सोचो कि कोई दूसरा चूम रहा है। मेरे स्तनों, योनिप्रदेश से खेलते मुझे दूसरे पुरुष का ख्याल कराते। उस विनय नामक किसी दूसरी के पति का नाम लेते, जिससे इनका चिट्ठी संदेश वगैरह का लेना देना चल रहा था। अब उत्तेाजना तो हो ही जाती है, भले ही बुरा लगता हो। मैं डाँटती, उनसे बदन छुड़ा लेती, पर अंतत: उत्तेजना मुझे जीत लेती। बुरा लगता कि शरीर से इतनी लाचार क्यों हो जाती हूँ। कभी कभी उनकी बातों पर विश्वांस करने का जी करता। सचमुच इसमें कहाँ धोखा है। सब कुछ तो एक-दूसरे के सामने खुला है। और यह अकेले अकेले लेने का स्वार्थी सुख तो नहीं है, इसमें तो दोनों को सुख लेना है। पर दाम्पत्यव जीवन की पारस्पतरिक निष्ठा् इसमें कहाँ है? तर्क‍-वितर्क, परम्परा से मिले संस्कारों, सुख की लालसा, वर्जित को करने का रोमांच, कितने ही तरह के स्त्री -मन के भय, गृहस्थीे की आशंकाएँ आदि के बीच मैं डोलती रहती।

पता नहीं कब कैसे मेरे मन में ये अपनी इच्छा का बीज बोने में सफल हो गए। पता नहीं कब कैसे यह बात स्वीकार्य लगने लगी। बस एक ही इच्छाा समझ में आती। मुझे इनको सुखी देखना है। ये बार बार विवशता प्रकट करते, “अब क्या करूँ, मेरा मन ही ऐसा है। मैं औरों से अलग हूँ पर बेइमान या धोखेबाज नहीं। और मैं इसे गलत मान भी नहीं पाता। यह चीज हमारे बीच प्रेम को और बढ़ाएगी।!”

एक बार इन्होंने बढ़कर कह ही दिया, “मैं तुम्हें किसी दूसरे पुरुष की बाहों में कराहता, सिसकारियाँ भरता देखूँ तो मुझसे बढ़कर सुखी कौन होगा?”

मैं रूठने लगी। इन्होंने मजाक किया, ”मैं बतलाता हूँ कौन ज्यांदा सुखी होगा! वो होगी तुम!”

“जाओ…!” मैंने गुस्से‍ में भरकर इनकी बाँहों को छुड़ाने के लिए जोर लगा दिया। पर इन्हों ने मुझे जकड़े रखा। इनका लिंग मेरी योनि के आसपास ही घूम रहा था, उसे इन्हों ने अंदर भेजते हुए कहा, “मेरा तो पाँच ही इंच का है, उसका तो पूरा …” मैंने उनके मुँह पर मुँह जमा कर बोलने से रोकना चाहा पर… “… सात इंच का है” कहते हुए वे आवेश में आ गए। धक्केँ पर धक्के लगाते उन्होंने जोड़ा, “… पूरा अंदर तक मार करेगा!” और फिर वे अंधाधुंध धक्के लगाते हुए स्खलित हो गए। मैं इनके इस हमले से बौरा गई। जैसे तेज नशे वाली कोई गैस दिमाग में घुसी और मुझे बेकाबू कर गई।

‘ओह…’ से तुरंत ‘आ..ऽ..ऽ..ऽ..ऽ..ह’ का सफर! मेरे अंदर भरते इनके गर्म लावे के साथ ही मैं भी किसी मशीनगन की तरह छूट पड़ी। मैंने जाना कि शरीर की अपनी मांग होती है, वह किसी नैतिकता, संस्कार, तर्क कुतर्क की नहीं सुनता। उत्तेजना के तप्त क्षणों में उसका एक ही लक्ष्य होता है– चरम सुख।

धीरे धीरे यह बात टालने की सीमा से आगे बढ़ती गई। लगने लगा कि यह चीज कभी किसी न किसी रूप में आना ही चाहती है। बस मैं बच रही हूँ। लेकिन पता नहीं कब तक। इनकी बातों में इसरार बढ़ रहा था। बिस्तर पर हमारी प्रणयक्रीड़ा में मुझे चूमते, मेरे बालों को सहलाते, मेरे स्तनों से खेलते हुए, पेट पर चूमते हुए, बाँहों, कमर से बढ़ते अंतत: योनि की विभाजक रेखा को जीभ से टटोलते, चूमते हुए बार बार ‘कोई और कर रहा है!’ की याद दिलाते। खास कर योनि और जीभ का संगम, जो मुझे बहुत ही प्रिय है, उस वक्त तो उनकी किसी बात का विरोध मैं कर ही नहीं पाती। बस उनके जीभ पर सवार वो जिधर ले जाते जाते मैं चलती चली जाती। उस संधि रेखा पर एक चुम्बन और ‘कितना स्वादिष्ट ’ के साथ ‘वो तो इसकी गंध से ही मदहोश हो जाएगा !’ की प्रशंसा, या फिर जीभ से अंदर की एक गहरी चाट लेकर ‘कितना भाग्यशाली होगा वो!’

मैं सचमुच उस वक्त किसी बिना चेहरे वाले ‘उस’ की कल्पना कर उत्तेजित हो जाती। वो मेरे नितम्बों की थरथराहटों, भगनासा के बिन्दु के तनाव से भाँप जाते। अंकुर को जीभ की नोक से चोट देकर कहते, ‘तुम्हें इस वक्तर दो और चाहिए जो (चूचुकों को पकड़ कर) इनका ध्यान रख सके। मैं उन दोनों को यहाँ पर लगा दूँगा।’

बाप रे… तीनों जगहों पर एक साथ! मैं तो मर ही जाऊँगी! मैं स्वयं के बारे में सोचती थी – कैसे शुरू में सोच में भी भयावह लगने वाली बात धीरे धीरे सहने योग्य हो गई थी। अब तो उसके जिक्र से मेरी उत्तेोजना में संकोच भी घट गया था। इसकी चर्चा जैसे जैसे बढ़ती जा रही थी मुझे दूसरी चिंता सताने लगी थी। क्या होगा अगर इन्होंने एक बार यह सुख ले लिया। क्या हमारे स्वयं के बीच दरार नहीं पड़ जाएगी? बार-बार करने की इच्छा नहीं होगी? लत नहीं लग जाएगी? अपने पर भी कभी संदेह होता कि कहीं मैं ही इसे न चाहने लगूँ। मैंने एक दिन इनसे झगड़े में कह भी दिया, “देख लेना, एक बार हिचक टूट गई तो कहीं मैं तुम से आगे ना बढ़ जाऊँ!”

उन्होंने डरने के बजाए उस बात को तुरन्त लपक लिया, “वो मेरे लिए बेहद खुशी का दिन होगा। तुम खुद चाहो, यह तो मैं कब से चाहता हूँ!”

अब मैं विरोध कम ही कर रही थी। बीच-बीच में कुछ इस तरह की बात हो जाती मानों हम यह करने वाले हों और आगे उसमें क्या क्या कैसे कैसे करेंगे इस पर विचार कर रहे हों। पर मैं अभी भी संदेह और अनिश्चय में थी। गृहस्थी दाम्पत्य -स्नेह पर टिकी रहती है, कहीं उसमें दरार न पड़ जाए। पति-पत्नी अगर शरीर से ही वफादार न रहे तो फिर कौन सी चीज उन्हें अलग होने से रोक सकती है?

एक दिन हमने एक ब्लू फिल्म देखी जिसमें पत्नियों प्रेमिकाओं की धड़ल्ले से अदला-बदली दिखाई जा रही थी। सारी क्रिया के दौरान और उसके बाद जोड़े बेहद खुश दिख रहे थे। उसमें सेक्स कर रहे मर्दों के बड़े बड़े लिंग देख कर इनके कथन ‘उसका तो सात इंच का है’ की याद आ रही थी। संजय के औसत साइज के पांच इंच की अपेक्षा उस सात इंच के लिंग की कल्पना को दृश्य रूप में घमासान करते देखकर मैं बेहद गर्म हो गई थी। मैंने जीवन में पति के सिवा किसी और का नहीं देखा था। यह वर्जित दृश्य मुझे हिला गया था। उस रात हमारे बीच बेहद गर्म क्रीड़ा चली। फिल्म के खत्म होने से पहले ही मैं आतुर हो गई थी। मेरी साँसें गर्म और तेज हो गई थीं जबकि संजय खोए से उस दृश्य को देख रहे थे, संभवत: कल्पना में उन औरतों की जगह पर मुझे रखते हुए।

मैंने उन्हें खींच कर अपने से लगा लिया था। संभोग क्रिया के शुरू होते न होते मैं उनके चुम्बनों से ही मंद-मंद स्खलित होना शुरू हो गई थी। लिंग-प्रवेश के कुछ क्षणों के बाद तो मेरे सीत्कारों और कराहटों से कमरा गूंज रहा था और मैं खुद को रोकने की कोशिश कर रही थी कि आवाज बाहर न चली जाए। सुन कर उनका उत्साह दुगुना हो गया था। उस रात हम तीन बार संभोगरत हुए। संजय ने कटाक्ष भी किया कि, “कहती तो हो कि तुम यह नहीं चाहती हो और फिल्म देख कर ही इतनी उत्तेजित हो गई हो!”

उस रात के बाद मैंने प्रकट में आने का फैसला कर लिया। संजय को कह दिया, ‘सिर्फ एक बार! वह भी सिर्फ तुम्हारी खातिर, केवल आजमाने के लिए। मैं इन चीजों में नहीं पड़ना चाहती।’

मेरे स्वर में स्वीकृति की अपेक्षा चेतावनी थी। उस दिन के बाद से वे जोर-शोर से विनय-विद्या के साथ-साथ किसी और उपयुक्त दम्प्तति के तलाश में जुट गए। फेसबुक, एडल्ट फ्रेंडफाइ… न जाने कौन कौन सी साइटें। उन दंपतियों से होने वाली बातों की चर्चा सुनकर मेरा चेहरा तन जाता। वे मेरा डर और चिंता दूर करने की कोशिश करते, “मेरी कई दंपतियों से बात होती है। वे कहते हैं वे इस तजुर्बे के बाद बेहद खुश हैं। उनके सेक्स जीवन में नया उत्साह आ गया है। जिनका तजुर्बा अच्छां नहीं रहा उनमें ज्याददातर अच्छाक युगल नहीं मिलने के कारण असंतुष्ट हैं!”

मेरे एक बड़े डर कि ‘उनको दूसरी औरत के साथ देख कर मुझे ईर्ष्या नहीं होगी?’ के उत्तर में वे कहते ‘जिनमें आपस में ईर्ष्या होती है वे इस जीवन शैली में ज्यादा देर नहीं ठहरते। इसको एक समस्या बनने देने से पहले ही बाहर निकल जाते हैं। ऐसा हम भी कर सकते हैं।’

मैं चेताती, ‘समस्या बने न बने, सिर्फ एक बार… बस।’

उसी दंपति विनय-विद्या से सबसे ज्यादा बातें चैटिंग वगैरह हो रही थी। सब कुछ से तसल्ली होने के बाद उन्होंने उनसे मेरी बात कराई। औरत कुछ संकोची सी लगी पर पुरुष परिपक्व तरीके से संकोचहीन।

मैं कम ही बोली, उसी ने ज्यादा बात की, थोड़े बड़प्पन के भाव के साथ। मुझे वह ‘तुम’ कह कर बुला रहा था। मुझे यह अच्छा लगा। मैं चाहती थी कि वही पहल करने वाला आदमी हो। मैं तो संकोच में रहूँगी। उसकी पत्नी से बात करते समय संजय अपेक्षाकृत संयमित थे। शायद मेरी मौजूदगी के कारण। मैंने सोचा अगली बार से उनकी बातचीत के दौरान मैं वहाँ से हट जाऊँगी।

उनकी तस्वीरें अच्छी थीं। विनय अपनी पत्नी की अपेक्षा देखने में चुस्ती और स्मार्ट था और उससे काफी लम्बा भी। मैं अपनी लंबाई और बेहतर रंग-रूप के कारण उसके लिए विद्या से कहीं बेहतर जोड़ीदार दिख रही थी। संजय ने इस बात को लेकर मुझे छेड़ा भी, ‘क्या बात है भई, तुम्हारा लक तो मेरे से बढ़िया है!’

मिलने के प्रश्न पर मैं चाहती थी पहले दोनों दंपति किसी सार्वजनिक जगह में मिलकर फ्री हो लें। विनय को कोई एतराज नहीं था पर उन्होंने जोड़ा, “पब्लिक प्लेस में क्यों ? हमारे घर ही आ जाइये। हम यहीं पर ‘सिर्फ दोस्त के रूप में’ मिल लेंगे!”

‘सिर्फ दोस्त के रूप में’ को वह थोड़ा अलग से हँस कर बोला। मुझे स्वयं अपना विश्वास डोलता हुआ लगा– क्या‍ वास्तव में मिलना केवल फ्रेंडली रहेगा? उससे आगे की संभावनाएँ डराने लगीं… उसके ढूंढते होंठ… मेरे शरीर को घेरती उसकी बाँहें… स्त्नों पर से ब्रा को खींचतीं परायी उंगलियां… उसके हाथों नंगी होती हुई मैं… उसकी नजरों से बचने के लिए उसके ही बदन में छिपती मैं… मेरे पर छाता हुआ वो… बेबसी से खुलती मेरी टाँगे… उसका मुझ में प्रवेश… आश्चर्य हुआ, क्या सचमुच ऐसा हो सकता है? संभावना से ही मेरे रोएँ खड़े हो गए।

तय हुआ आगामी शनिवार की शाम उनके घर पर। हमने कह दिया कि हम सिर्फ मिलने आ रहे हैं, इस से आगे का कोई वादा नहीं है। सिर्फ दोस्ताना मुलाकात!

ऊपर से संयत, अंदर से शंकित, उत्तेजित, मैं उस दिन के लिए तैयार होने लगी। संजय आफिस चले जाते तो मैं ब्यूटी पार्लर जाती – भौहों की थ्रेडिंग, चेहरे का फेशियल, हाथों-पांवों का मैनीक्योर, पैडीक्योर, हाथ-पांवों के रोओं की वैक्सिंग, बालों की पर्मिंग…। गृहिणी होने के बावजूद मैं किसी वर्किंग लेडी से कम आधुनिक या स्मांर्ट नहीं दिखना चाहती थी। मैं संजय से कुछ छिपाती नहीं थी पर उनके सामने यह कराने में शर्म महसूस होती। बगलों के बाल पूरी तरह साफ करा लेने के बाद योनिप्रदेश के उभार पर बाल रखूँ या नहीं इस पर कुछ दुविधा में रही। संजय पूरी तरह रोमरहित साफ सुथरा योनिप्रदेश चाहते थे जबकि मेरी पसंद हल्की-सी फुलझड़ी शैली की थी जो होंठों के चीरे के ठीक ऊपर से निकलती हो। मैंने अपनी सुनी।

मैंने संजय की भी जिद करके फेशियल कराई। उनके असमय पकने लगे बालों में खुद हिना लगाई। मेरा पति किसी से कम नहीं दिखना चाहिए। संजय कुछ छरहरे हैं। उनकी पाँच फीट दस इंच की लम्बाई में छरहरापन ही निखरता है। मैं पाँच फीट चार इंच लम्बी, न ज्यादा मोटी, न पतली, बिल्कुूल सही जगहों पर सही अनुपात में भरी : 36-26-37, स्त्रीत्व् को बहुत मोहक अंदाज से उभारने वाली मांसलता के साथ सुंदर शरीर।

पर जैसे-जैसे समय नजदीक आता जा रहा था अब तक गौण रहा मेरे अंदर का वह भय सबसे प्रबल होता जा रहा था- वह आदमी मुझे बिना कपड़ों के, नंगी देखेगा, सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते थे, लेकिन साथ ही मैं उत्तेजित भी थी।

शनिवार की शाम… संजय बेहद उत्साहित थे, मैं भयभीत पर उत्तेजित भी! जब मैं बाथरूम से तौलिये में लिपटी निकली तभी से संजय मेरे इर्द गिर्द मंडरा रहे थे- ‘ओह क्या महक है। आज तुम्हारे बदन से कोई अलग ही खुशबू निकल रही है।’

मैंने कहीं बायलोजी की कक्षा में पढ़ा तो था कि कामोत्सुक स्त्री के शरीर से कोई विशेष उत्तेैजक गंध निकलती थी पर पता नहीं वह सच है या गलत।

क्या पहनूँ? इस बात पर सहमत थी कि मौके के लिए थोड़ा ‘सेक्सी’ ड्रेस पहनना उपयुक्त होगा। संजय ने अपने लिए मेरी पसंद की इनफार्मल टी शर्ट और जीन्स चुनी थी। अफसोस, लड़कों के पास कोई सेक्सीे ड्रेस नहीं होता! खैर, वे इसमें स्मार्ट दिखते हैं।

मेरे लिए पारदर्शी तो नहीं पर किंचित जालीदार ब्रा – पीच और सुनहले के बीच के रंग की। पीठ पर उसकी स्ट्रैप लगाते हुए सामने आइने में अपने तने स्तनों और जाली के बीच से आभास देती गोलाई को देखकर मैं पुन: सिहर गई। कैसे आ सकूंगी इस रूप में उसके सामने! बहुत सुंदर, बहुत उत्तेजक लग रही थी मैं। लेकिन ये उसके सामने कैसे लाऊँगी। फिर सोचा आज तो कुछ होना ही नहीं है! मन के भय, शर्म और रोमांच को दबाते हुए मैंने चौड़े और गहरे गले की स्लीवलेस ब्लाउज पहनी, कंधे पर बाहर की तरफ पतली पट्टियाँ – ब्लाेउज क्या थी, वह ब्रा का ही थोड़ा परिवर्द्धित रूप थी। उसमें स्तंनों की गहरी घाटी और कंधे के खुले हिस्सों का उत्ते‍जक सौंदर्य खुलकर प्रकट हो रहा था। उसका प्रभाव बढ़ाते हुए मैंने गले में मोतियों का हार पहना, कानों में उनसे मैच करते इयरिंग्स।

मुझे संजय पर गुस्सा भी आ रहा था कि यह सब किसी और के लिए कर रही हूँ। वे उत्साहित के होने के साथ कुछ डरे से भी लग रहे थे। फिर भी वे माहौल हल्का रखने की कोशिश में थे। मेरी ब्रा से मैचिंग जालीदार पैंटी उठा कर उन्होंने पूछा, “इसको पहनने की जरूरत है क्या?”

मैंने कहा, “तुम चाहो तो वापस आ कर उतार देना!”

पीच कलर का ही साया, और उसके ऊपर शिफ़ॉन की अर्द्धपारदर्शी साड़ी– जिसे मैंने नाभि से कुछ ज्यादा ही नीचे बांधी थी, कलाइयों में सुनहरी चूड़ियाँ, एड़ियों में पायल और थोड़ी हाई हील की डिजाइनदार सैंडल। मैं किसी ऋषि का तपभंग करने आई गरिमापूर्ण उत्ते़जक अप्सरा सी लग रही थी।

हम ड्राइव करके विनय और विद्या के घर पहुँच गए। घर सुंदर था, आसपास शांति थी। न्यू टाउन अभी नयी बन रही पॉश कॉलोनी थी। घनी आबादी से थोड़ा हट कर, खुला-खुला शांत इलाका। दोनों दरवाजे पर ही मिले। ‘हाइ’ के बाद दोनों मर्दों ने अपनी स्त्रियों का परिचय कराया और हमने बढ़ कर मुस्कुूराते हुए एक-दूसरे से हाथ मिलाए। मुझे याद है कैसे विद्या से हाथ मिलाते वक्त संजय के चहरे पर चौड़ी मुस्कान फैल गई थी। वे हमें अपने लिविंग रूम में ले गए। घर अंदर से सुरुचिपूर्ण तरीके से सज्जित था।

“कैसे हैं आप लोग! कोई दिक्कत तो नहीं हुई आने में”

कुछ हिचक के बाद बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। बातें घर के बारे में, काम के बारे में, ताजा समाचारों के बारे में… विनय ही बात करने में लीड ले रहे थे। बीच में कभी व्यक्तिरगत बातों की ओर उतर जाते। एक सावधान खेल, स्वाभाविकता का रूप लिए हुए…

“बहुत दिन से बात हो रही थी, आज हम लोग मिल ही लिए!”

“इसका श्रेय इनको अधिक जाता है।” संजय ने मेरी ओर इशारा किया।

“हमें खुशी है ये आईं!” मैं बात को अपने पर केन्द्रित होते शर्माने लगी। विनय ने ठहाका लगाया, “आप आए बहार आई!”

विद्या जूस, नाश्ता वगैरा ला रही थी। मैंने उसे टोका, ”तकल्लुफ मत कीजिए !”

बातें स्वाुभाविक और अनौपचारिक हो रही थीं। विनय की बातों में आकर्षक आत्मयविश्वास था। बल्कि पुरुष होने के गर्व की हल्की सी छाया, जो शिष्टााचार के पर्दे में छुपी बुरी नहीं लग रही थी। वह मेरी स्त्री की अनिश्चित मनःस्थिति को थोड़ा इत्मिनान दे रही थी। उसके साथ अकेले होना पड़ा तो मैं अपने को उस पर छोड़ सकूँगी।

विनय ने हमें अपना घर दिखाया। उसने इसे खुद ही डिजाइन किया था। घुमाते हुए वह मेरे साथ हो गया था। विद्या संजय के साथ थी। मैं देख रही थी वह भी मेरी तरह शरमा-घबरा रही है! इस बात से मुझे राहत मिली।

बेडरूम की सजावट में सुरुचिपूर्ण सुंदरता के साथ उत्तेजकता का मिश्रण था। दीवारों पर कुछ अर्द्धनग्न स्त्रियों के कलात्मंक पेंटिंग। बड़ा सा पलंग। विनय ने मेरा ध्यान पलंग के सामने की दीवार में लगे एक बड़े आइने की ओर खींचा, ”यहाँ पर एक यही चीज सिर्फ मेरी च्वाेइस है। विद्या तो अभी भी ऐतराज करती है।”

“धत्त…” कहती हुई विद्या लजाई।

“और यह नहीं?” विद्या ने लकड़ी के एक कैबिनेट की ओर इशारा किया।

“इसमें क्या है?” मैं उत्सुक हो उठी।

“सीक्रेट चीज! वैसे आपके काम की भी हो सकती है, अगर…”

मैंने दिखाने की जिद की।

“देखेंगी तो लेना पड़ेगा, सोच लीजिए।”

मैं समझ गई, “रहने दीजिए !” हमने उन्हें बता दिया था कि हम ड्रिंक नहीं करते।

लिविंग रूम में लौटे तो विनय इस बार सोफे पर मेरे साथ ही बैठे। उन्होने चर्चा छेड़ दी कि इस ‘साथियों के विनिमय’ के बारे में मैं क्या सोचती हूँ। मैं तब तक इतनी सहज हो चुकी थी कि कह सकूँ कि मैं तैयार तो हूँ पर थोड़ा डर है मन में। यह कहना अच्छाै नहीं लगा कि मैं यह संजय की इच्छा से कर रही हूँ। लगा जैसे यह अपने को बरी करने की कोशिश होगी।

“यह स्वाभाविक है!” विनय ने कहा, ”पहले पहल ऐसा लगता ही है।”

मैंने देखा सामने सोफे पर संजय और विद्या मद्धम स्वर में बात कर रहे थे। उनके सिर नजदीक थे। मैंने स्वीकार किया कि संजय तो तैयार दिखते हैं पर उन्हें विद्या के साथ करते देख पता नहीं मुझे कैसा लगेगा।

विनय ने पूछा कि क्या मैंने कभी संजय के अलावा किसी अन्य पुरुष के साथ सेक्स किया है – शादी से पहले या शादी के बाद?

“नहीं, कभी नहीं… यह पहली बार है।” बोलते ही मैं पछताई। अनजाने में मेरे मुख से आज ही सेक्सं होने की बात निकल गई थी। पर विनय ने उसका कोई लाभ नहीं उठाया।

“मुझे उम्मीद है कि आपको अच्छा लगेगा।” फिर थोड़ा ठहर कर, ”आजकल बहुत से लोग इसमें हैं। आज इंटरनेट के युग में संपर्क करना आसान हो गया है। सभी उम्र के सभी तरह के लोग यह कर रहे हैं।”

उन्होंने ‘स्विगिंग पार्टियों’ के बारे में बताया जहाँ सामूहिक रूप से लोग साथियों की अदला-बदली करते हैं। मैंने पूछना चाहा ‘आप गए हैं उस में?’ लेकिन अपनी जिज्ञासा को दबा गई।

विनय ने औरत-औरत के सेक्स की बात उठाई और पूछा कि मुझे कैसा लगता है यह?

“शुरू में जब मैंने इसे ब्लू फिल्मों में देखा था, उस समय आश्चर्य हुआ था।”

“अब?”

“अम्म्मे ‍, पता नहीं! कभी ऐसी बात नहीं हुई। पता नहीं कैसा लगेगा।”

मैं धीरे धीरे खुल रही थी। उनकी बातें आश्वस्त‍ कर रही थीं। विद्या ने बताया कि कई लोग अनुभवहीन लोगों के साथ ‘स्वैप’ नहीं करना चाहते, डरते हैं कि खराब अनुभव न हो। पर हम उन्हें अच्छे लग रहे थे।

अजीब लग रहा था कि मैं किसी दूसरे पुरुष के साथ बैठी सेक्स की व्यतक्तिकगत बातें कर रही थी जबकि मेरे सामने मेरा पति एक दूसरी औरत के साथ बैठा था। मैं अपने अंदर टटोल रही थी कि मुझे कोई र्इर्ष्याे महसूस हो रही है कि नहीं। शायद थोड़ी सी, पर दुखद नहीं …

विद्या उठ कर कुछ नाश्ता ले आई। मुझे लगा कि वाइन साथ में न होने का विनय-विद्या को जरूर अफसोस हो रहा होगा। शाम सुखद गुजर रही थी। विनय-विद्या बड़े अच्छेे से मेहमाननवाजी कर रहे थे। न इतना अधिक कि संकोच में पड़ जाऊँ, न ही इतना कम कि अपर्याप्त लगे।

आरंभिक संकोच और हिचक के बाद अब बातचीत की लय कायम हो गई थी। विनय मेरे करीब बैठे थे। बात करने में उनके साँसों की गंध भी मिल रही थी। एक बार शायद गलती से या जानबूझ कर उसने मेरे ही ग्लास से कोल्ड ड्रिंक पी लिया। तुरंत ही ‘सॉरी’ कहा। मुझे उनके जूठे ग्लास से पीने में अजीब कामुक सी अनुभूति हुई।

काफी देर हो चुकी थी। मैंने कहा, “अब चलना चाहिए।”

विनय ताज्जुब से बोले,”क्या कह रही हो? अभी तो हमने शाम एंजाय करना शुरू ही किया है। आज रात ठहर जाओ, सुबह चले जाना।”

विद्या ने भी जोर दिया, ”हाँ हाँ, आज नहीं जाना है। सुबह ही जाइयेगा।”

मैंने संजय की ओर देखा। उनकी जाने की कोई इच्छा नहीं थी। विद्या ने उनको एक हाथ से घेर लिया था।

“मैं… हम कपड़े नहीं लाए हैं।” मुझे अपना बहाना खुद कमजोर लगा।

“कपडों की जरूरत हो तो …” कह कर विनय रुके और फिर बोले, “… तुम विद्या की नाइटी पहन लेना और संजय मेरे कपड़े पहन लेंगे … अगर तुम दोनों को ऐतराज न हो …”

“नहीं, ऐतराज की क्याे बात है लेकिन …”

“ओह, कम ऑन…”

अब मैं क्या कह सकती थी।

विद्या मुझे शयनकक्ष में ले गई। उसके पास नाइटवियर्स का अच्छा संग्रह था। पर वे या तो बहुत छोटी थीं या पारदर्शी। उसने मेरे संकोच को देखते हुए मुझे पूरे बदन की नाइटी दी। पारदर्शी थी मगर टू पीस की दो तहों से थोड़ी धुंधलाहट आ जाती थी। अंदर की पोशाक कंधे पर पतले स्ट्रैप और स्तनों के आधे से भी नीचे जाकर शुरू होने वाली। इतनी हल्की और मुलायम कपड़े की थी कि लगा बदन में कुछ पहना ही नहीं। गले पर काफी नीचे तक जाली का सुंदर काम था, उसके अंदर ब्रा से नीचे मेरा पेट साफ दिख रहा था, पैंटी भी।

मेरी मर्यादा यह झीनी नाइटी नहीं बल्कि ब्रा और पैंटी बचा रहे थे नहीं तो चूचुक और योनि के होंठ तक दिखाई देते। मुझे बड़ी शर्म आ रही थी पर विद्या ने जिद की, ”बहुत सुंदर लग रही हो इस में, लगता है तुम्हारे लिए ही बनी है।”

सचमुच मैं सुंदर लग रही थी लेकिन अपने खुले बदन को देख कर कैसा तो लग रहा था। इस दृश्य का आनन्द दूसरा पुरुष उठाएगा यह सोचकर झुरझुरी आ रही थी।

विद्या अपने लिए भद्र कपड़े चुनने लगी। मैंने उसे रोका- मुझे फँसा कर खुद बचना चाहती हो? मैंने उसके लिए टू पीस का एक रात्रि वस्त्र चुना। हॉल्टर (नाभि तक आने वाली) जैसी टॉप, नीचे घुटनों के ऊपर तक की पैंट। वह मुझसे अधिक खुली थी, पर अपनी झीनी नाइटी में उससे अधिक नंगी मैं ही महसूस कर रही थी। संजय का खयाल आया, विद्या का अर्धनग्न बदन देख कर उसे कैसा लगेगा! पर अपने पर गर्व भी हुआ क्योंकि मैं विद्या से निश्चित ही अधिक सुन्दर लग रही थी।

विनय और संजय पुराने दोस्तों की तरह साथ बैठे बात कर रहे थे। मुझे देख कर दोनों के चेहरे पर आनन्द-मिश्रित आश्चर्य उभरा लेकिन मैं असहज न हो जाऊँ यह सोच कर उन्होंने मेरी प्रशंसा करके मेरा उत्साह बढ़ाया। अपनी नंगी-सी अवस्था को लेकर मैं बहुत आत्म चैतन्य हो रही थी। इस स्थिीति में शिष्टाचार के शब्द भी मुझ पर कामुक असर कर रहे थे। ‘लवली’, ‘ब्यू‍टीफुल’ के बाद ‘वेरी सेक्सी’ सीधे भेदते हुए मुझ में घुस गए। फिर भी मैंने हिम्मत से उनकी तारीफ के लिए उन्हें ‘थैंक्यूं’ कहा।

विद्या ने कॉफी टेबल पर दो सुगंधित कैण्डल जला कर बल्ब बुझा दिए। कमरा एक धीमी मादक रोशनी से भर गया। विनय ने एक अंग्रेजी फिल्म लगा दी। मंद रोशनी में उसका संगीत खुशबू की तरह फैलने लगा।

मन में खीझ हुई, क्या हिन्दी में कुछ नहीं है! इस शाम के लिए भी क्या अंग्रेजी की ही जरूरत है? विद्या संजय के पास जा कर बैठ गई थी। कम रोशनी ने उन्हें और नजदीक होने की सुविधा दे दी थी। दोनों की आँखें टीवी के पर्दे पर लेकिन हाथ एक-दूसरे के हाथों में थे। संजय विद्या से सटा हुआ था।

‘करने दो जो कर रहे हैं …!’ मैंने उन दोनों की ओर से ध्यान हटा लिया। मैं धड़कते दिल से इंतजार कर रही थी अगले कदम का। विनय मेरे पास बैठे थे।

कोई हल्की यौनोत्तेजक फिल्म थी। एकदम से ब्लूे फिल्म नहीं जिसमें सीधा यांत्रिक संभोग चालू हो जाता है। नायक-नायिका के प्यार के दृश्य, समुद्र तट पर, पार्क में, कॉलेज हॉस्टल में, कमरे में…। किसी बात पर दोनों में झगड़ा हुआ और नायिका की तीखी चिल्लाहट का जवाब देने के क्रम में अचानक नायक का मूड बदला और उसने उसके चेहरे को दबोच कर उसे चूमना शुरू कर दिया।

विनय का बायाँ हाथ मेरी कमर के पीछे रेंग गया। मैं सिमटी, थोड़ा दूसरी तरफ झुक गई। ना नहीं जताना चाहती थी पर वैसा हो ही गया। उनका हाथ वैसे ही रहा। मैं भी वैसे ही दूसरी ओर झुकी रही। सोच रही थी सही किया या गलत।

नायक भावावेश में नायिका को चूम रहा था। नायिका ने पहले तो विरोध किया मगर धीरे-धीरे जवाब देने लगी। अब दोनों बदहवास से एक-दूसरे को चूम, सहला, भींच रहे थे। लड़की के धड़ से टॉप जा चुका था। उसके बदन से ब्रा झटके से हट कर हवा में उछली और लड़का उसके वक्षस्थल पर झुक गया। लड़की अपना पेड़ू उसके पेड़ू में रगड़ने लगी। पार्श्वे संगीत में उनकी सिसकारियाँ गूंजने लगीं।

कमरे का झुटपुटा अंधेरा …, सामने सोफे पर एक परायी औरत से सटे संजय …, एक यौनोत्तेजित पराए पुरुष के साथ स्वयं मै …! मैं अपने घुटने को खुजलाने के लिए नीचे झुकी और मेरा बांया उभार विनय के हाथ मे आ गया। मैंने महसूस किया कि वह हाथ पहले थोड़ा ढीला पड़ा और फिर कस गया…

उस आधे अँधेरे में मैं शर्म से लाल हो गई। शर्म से मेरी कान की लवें गरम होने लगी। पूरी रोशनी में उनसे बात करना और बात थी। अब मंद रोशनी में एक दम से… और उनका हाथ…! मैं स्क्रीन की ओर देख रही थी और वे मेरे चेहरे, मेरे कंधों को… मेरे कानों में सीटी-सी बजने लगी।

टीवी पर्दे पर लड़का-लड़की आलिंगन में बंध गए थे। दोनों का काम-विह्वल चुम्बन जारी था। लड़की के नीचे के वस्त्र उतर चुके थे और लड़का उसकी नंगी जाँघों को सहला रहा था।

इधर विनय मेरे वक्षस्थल को सहला रहे थे। मैं ‘क्या करूँ’ की जड़ता में थी। दिल धड़क रहा था। मैं इंतजार में थी… क्या यहीं पर…? उन दोनों के सामने…?

विनय के होंठ कुछ फुसफुसाते हुए मेरे कान के ऊपर मँडरा रहे थे। शर्म और उत्तेजना के कारण मैं कुछ सुन या समझ नहीं पा रही थी। बालों में उनकी गर्म साँस भर रही थी… अचानक विनय उठ खड़े हुए और उन्होंने मुझे अपने साथ आने का इशारा किया।

मैं ठिठकी। कमरे के एकांत में उनके साथ अकेले होने के ख्याल से डर लगा। मैंने सहारे के लिए पति की ओर देखा … वे दूसरी स्त्री में खोये हुए लगे। क्या करूँ? मेरे अंदर उत्पन्न हुई गरमाहट मुझे तटस्थता की स्थिति से आगे बढ़ने के लिए ठेल रही थी। विनय ने मेरा हाथ खींचा…

किनारे पर रहने की सुविधा खत्मे हो गई थी, अब धारा में उतरना ही था। फिल्म में नायक-नायिका की प्रणय-लीला आगे बढ़ रही थी … मैंने मन ही मन उन अभिनेताओं को विदा कहा। दिल कड़ा कर के उठ खड़ी हुई। संजय विद्या में मग्न थे। उन्हे पता भी नहीं चला होगा कि उनकी पत्नी वहाँ से जा चुकी है।

शयनकक्ष के दरवाजे पर फिर एक भय और सिहरन… पर कमर में लिपटी विनय की बाँह मुझे आग्रह से ठेलती अंदर ले आई। मेरी पायल की छन-छन मेरी चेतना पर तबले की तरह चोट कर रही थी। पाँव के नीचे नर्म गलीचे के स्पर्श ने मुझे होश दिलाया कि मैं कहाँ और किसलिए थी। मैं पलंग के सामने थी। पैंताने की तरफ दीवार पर बड़ा-सा आइना कमरे को प्रतिबिम्बि्त कर रहा था। रोमांटिक वतावरण था। दीवारों पर की अर्द्धनगन स्त्री छवियाँ मानो मुझे अपने में मिलने के लिए बुला रही थीं।

मैंने अपने पैरों के पीछे पैरों का स्पर्श महसूस किया … मैं पीछे घूमी। विनय के होंठ सीधे मेरे होंठों के आगे आ गए। बचने के लिए मैं पीछे झुकी लेकिन पीछे मेरे पैर पलंग से सट गए। उनके होंठ स्वत: मुझसे जुड़ गए। जब उनके होंठ अलग हुए तो मैंने देखा दरवाजा खुला था और संजय-विद्या के पाँव नजर आ रहे थे। शायद वे दोनों भी एक-दूसरे को चूम रहे थे। क्या संजय भी चुंबन में डूब गए होंगे? क्या विद्या मेरी तरह विनय के बारे में सोच रही होगी? पता नहीं। मैंने उनकी तरफ से ख्याल हटा लिया।

विनय पुन: चुंबन के लिए झुके। इस बार मन से संकोच को परे ठेलते हुए मैंने उसे स्वीकार कर लिया। एक लम्बा और भावपूर्ण चुंबन। मैंने खुद को उसमें डूबने दिया। उनके होंठ मेरे होंठों और अगल बगल को रगड़ रहे थे। उनकी जीभ मेरे मुँह के अंदर उतरी। मैंने अपनी जीभ से उसे टटोल कर उत्तर दिया। मेरी साँसें तेज हो गईं।

पतले कपड़े के ऊपर उनके हाथों का स्पर्श बहुत साफ महसूस हो रहा था। जब वे स्तनों पर उतरे तो मैं सब कुछ भूल जाने को विवश हो गई। मैंने उन्हें अपनी बाँहों से रोकना चाहा लेकिन मुझे प्राप्त हो रहा अनुभव इतना सुखद था कि बाँहें शीघ्र शिथिल हो गईं। ब्रा के अंदर चूचुक मुड़ मुड़ कर रगड़ खा रहे थे। मेरे स्तन हमेशा से संवेदनशील रहे हैं और उनको थोड़ा सा भी छेडना मुझे उत्तेजित कर देता है। मेरे स्तन विद्या से बड़े थे और विनय के बड़े हाथों में निश्चय ही वह अधिक मांसलता से समा रहे होंगे। मुझे अपने बेहतर होने की खुशी हुई। मुझे भी उनकी संजय से बड़ी हथेलियाँ बहुत आनन्दित कर रही थीं। उनमें रुखाई नहीं थी – कोमलता के साथ एक आग्रह, मीठी-सी नहीं हटने की जिद।

मुझे लगा रात भर रुकने का निर्णय शायद गलत नहीं था। मन में ‘यह सब अच्छा नहीं है’ की जो कुछ भी चुभन थी वह कमजोर पड़ती जा रही था। मुझे याद आया कि हम चारों एक साथ बस एक दोस्ताना मुलाकात करने वाले थे। लेकिन मामला बहुत आगे बढ़ गया था। अब वापसी भला क्या होनी थी। मैंने चिंता छोड़ दी, जब इसमें हूँ तो एंजॉय करूँ।

विनय धीरे-धीरे पलंग पर मेरे साथ लंबे हो गए थे। वे मेरे होंठों को चूसते-चूसते उतर कर गले, गर्दन, कंधे पर चले आते लेकिन अंत में फिर जा कर होंठों पर जम जाते। उनका भावावेग देखकर मन गर्व और आनंद से भर रहा था। लग रहा था सही व्यक्ति के हाथ पड़ी हूँ। लेकिन औरत की जन्मजात लज्जा कहाँ छूटती है। जब वे मेरे स्तनों को छोड़ कर नीचे की ओर बढ़े तो मन सहम ही गया।

पर वे चतुर निकले, सीधे योनी-प्रदेश का रुख करने की बजाय वे हौले-हौले मेरे पैरों को सहला रहे थे। तलवों को, टखनों को, पिंडलियों को … विशेषकर घुटनों के अंदर की संवेदनशील जगह को। धीरे-धीरे नाइटी के अंदर भी हाथ ले जा रहे थे। देख रहे थे मैं विरोध करती हूँ कि नहीं। मैं लज्जा-प्रदर्शन की खातिर मामूली-सा प्रतिरोध कर रही थी। जब घूमते-घूमते उनकी उंगलियाँ अंदर पैंटी से टकराईं तो पुन: मेरी जाँघें कस गईं। मुझे लगा जरूर उन्होंने अंदर का गीलापन भांप लिया होगा। हाय, लाज से मैं मर गई।

उनके हाथ एक आग्रह और जिद के साथ मुझे कोंचते रहे। मेरे पाँव धीरे-धीरे खुल गए। … शायद संजय कहीं पास हों, काश वे आकर हमें रोक लें। मैंने उन्हें खोजा… ‘संजयऽऽ!’

विनय हँस कर बोले, “उसकी चिंता मत करो। अब तक उसने विद्या को पटा लिया होगा!”

‘पटा लिया होगा’ … यहाँ मैं भी तो ‘पट’ रही थी … कैसी विचित्र बात थी। अब तक मैंने इसे इस तरह नहीं देखा था।

विनय पैंटी के ऊपर से ही मेरा पेड़ू सहला रहे थे। मुझे शरम आ रही थी कि योनि कितनी गीली हो गई है पर इसके लिए जिम्मेदार भी तो विनय ही थे। उनके हाथ पैंटी में से छनकर आते रस को आसपास की सूखी त्वचा पर फैला रहे थे। धीरे धीरे जैसे पूरा शरीर ही संवेदनशील हुआ जा रहा था। कोई भी छुअन, कैसी भी रगड़ मुझे और उत्तेैजित कर देती थी।

जब उन्होंने उंगली को होंठों की लम्बाई में रख कर अंदर दबा कर सहलाया तो मैं एक छोटे चरम सुख तक पहुँच गई। मेरी सीत्कार को तो उन्होंने मेरे मुँह पर अपना मुँह रख कर दबा दिया पर मैं लगभग अपना होश खो बैठी थी।

“लक्ष्मी, तुम ठीक तो हो ना?” मेरी कुछ क्षणों की मूर्च्छा से उबरने के बाद उन्होंने पूछा। उन्होंने इस क्रिया के दौरान पहली बार मेरा नाम लिया था। उसमें अनुराग का आभास था।

“हाँ …” मैंने शर्माते हुए उत्तर दिया। मेरे जवाब से उनके मुँह पर मुसकान फैल गई। उन्होंँने मुझे प्यार से चूम लिया। मेरी आँखें संजय को खोजती एक क्षण के लिए व्यर्थ ही घूमीं और उन्होंने देख लिया।

“संजय?” वे हँसे। वे उठे और मुझे अपने साथ ले कर दरवाजे से बाहर आ गए। सोफे खाली थे। दूसरे बेडरूम से मद्धम कराहटों की आवाज आ रही थी… दरवाजा खुला ही था। पर्दे की आड़ से देखा… संजय का हाथ विद्या के अनावृत स्तनों पर था और सिर उस की उठी टांगों के बीच। उसके चूचुक बीच बीच में प्रकट होकर चमक जाते। अचानक जैसे विद्या ने जोर से ‘आऽऽऽऽऽह!’ की और एक आवेग में नितम्ब उठा दिए। शायद संजय के होंठों या जीभ ने अंदर की ‘सही’ जगह पर चोट कर दी थी।

मेरा पति… दूसरी औरत के साथ यौन आनन्द में डूबा… इसी का तो वह ख्वाब देख रहा था।… मुझे क्या उबारेगा… मेरे अंदर कुछ डूबने लगा। मैंने विनय का कंधा थाम लिया।

विनय फुसफुसाए, “अंदर चलें? सब मिल कर एक साथ…”

मैंने उन्हें पीछे खींच लिया। वे मुझे सहारा देते लाए और सम्हाल कर बड़े प्यार से पलंग पर लिटाया जैसे मैं कोई कीमती तोहफा हूँ। मैं देख रही थी किस प्रकार वे मेरी नाइटी के बटन खोल रहे थे। इसका विरोध करना बेमानी तो क्या, असभ्यता सी लगती। वे एक एक बटन खोलते, कपड़े को सस्पेंस पैदा करते हुए धीरे धीरे सरकाते, जैसे कोई रहस्य प्रकट होने वाला हो, फिर अचानक खुल गए हिस्से को को प्यार से चूमने लगते। मैं गुदगुदी और रोमांच से उछल जाती। उनका तरीका बड़ा ही मनमोहक था। वे नाभि के नीचे वाली बटन पर पहुँचे तो मैंने हाथों से दबा लिया हालांकि अंदर अभी पैंटी की सुरक्षा थी।

“मुझे अपनी कलाकृति नहीं दिखाओगी?”

“कौन सी कलाकृति?”

“वो… फुलझड़ी…”

“हाय राम…!!” मैं लाल हो गई। तो संजय ने उन्हें इसके बारे में बता दिया था।

“और क्या क्या बताया है संजय ने मेरे बारे में?”

“यही कि मैं तुम्हारे आर्ट का दूसरा प्रशंसक बनने वाला हूँ। देखने दो ना!”

मैं हाथ दबाए रही। उन्होंने और नीचे के दो बटन खोल दिए। मैं देख रही थी कि अब वे जबरदस्ती करते हैं कि नहीं। लेकिन वे रुके, मेरी आँखों में एक क्षण देखा, फिर झुक कर मेरे हाथों को ऊपर से ही चूमने लगे। उससे बचने के लिए हाथ हटाए तो वे बटन खोल गए। इस बार उन्होंंने कोई सस्पेंस नहीं बनाया, झपट कर पैंटी के ऊपर ही जोर से मुँह जमा कर चूम लिया। मेरी कोशिश से उनका सिर अलग हुआ तो मैंने देखा वे अपने होंठों पर लगे मेरे रस को जीभ से चाट रहे थे।

उन दो क्षणों के छोटे से उत्‍तेजक संघर्ष में पराजित होना बहुत मीठा लगा। उन्होंने आत्मविश्वाास से नाइटी के पल्ले अलग कर दिए। नाइटी के दो खुले पल्लों पर अत्यंत सुंदर डिजाइनर ब्रा पैंटी में सुसज्जित मैं किसी महारानी की तरह लेटी थी। मैंने अपना सबसे सुंदर अंतर्वस्त्र चुना था। विनय की प्रशंसा-विस्मित आंखें मुझे गर्वित कर रही थीं।

विनय ने जब मेरी पैंटी उतारने की कोशिश की तो नारी-सुलभ लज्जावश मेरे हाथ उन्हें रोकने को बढे लेकिन साथ ही मेरे नितम्ब उनके खींचते हाथों को सुविधा देने के लिए उठ गए।

“ओह हो! क्या बात है!” मेरी ‘फुलझड़ी’ को देखकर वे चहक उठे।

मैंने योनि को छिपाने के लिए पाँव कस लिए। गोरी उभरी वेदी पर बालों का धब्बा काजल के लम्बे टीके सा दिख रहा था।

“लवली! लवली! वाकई खूबसूरत बना है। इसे तो जरूर खास ट्रीटमेंट चाहिए।” कतरे हुए बालों पर उनकी उंगली का खुर-खुर स्पर्श मुझे खुद नया लग रहा था। मैं उम्मीद कर रही थी अब वे मेरे पाँवों को फैलाएंगे। जब से उन्होंने पैंटी को चूमा था मन में योनि से उनके होंठों और जीभ के बेहद सुखद संगम की कल्पना जोर मार रही थी। मैं पाँव कसे थी लेकिन सोच रही थी उन्हें खोलने में ज्यादा मेहनत नहीं करवाऊँगी। पर वे मुझसे अलग हो गए, अपने कपड़े उतारने के लिये।

वे मुझे पहले काम-तत्पर बना कर और फिर इंतजार करा कर बड़े नफीस तरीके से यातना दे रहे थे। मेरी रुचि उनमें बढ़ती जा रही थी। उन के प्रकट होते बदन को ठीक से देखने के लिए मैं तकिए का सहारा ले कर बैठ गई, ‘फुलझड़ी’ हथेली से ढके रही। पहले कमीज गई, बनियान गई, मोजे गए, कमर की बेल्ट और फिर ओह… वो अत्यंत सेक्सी काली ब्रीफ। उसमें बने बड़े से उभार ने मेरे मन में संभावनाओं की लहर उठा दी। धीरज रख, लक्ष्मी … मैंने अपनी उत्सुकता को डाँटा।

बहुत अच्छे आकार में रखा था उन्होंने खुद को। चौड़ी छाती, माँसपेशीदार बाँहें, कंधे, पैर, पेट में चर्बी नहीं, पतली कमर, छाती पर मर्दाना खूबसूरती बढ़ाते थोड़े से बाल, सही परिमाण में, इतना अधिक नहीं कि जानवर-सा लगे, न इतना कम कि चॉकलेटी महसूस हो।

वे आ कर मेरी बगल में बैठ गए। यह देख कर मन में हँसी आई कि इतने आत्मपविश्वास भरे आदमी के चेहरे पर इस वक्त संकोच और शर्म का भाव था। मैंने उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया। वे धीरे धीरे नीचे सरकते हुए मुझसे लिपट गए।

ओहो, तो इनको स्वीट और भोला बनना भी आता है। पर वह चतुराई थी। वे मेरे खुले कंधों, गले, गर्दन को चूम रहे थे। इस बीच पीठ पीछे मेरी ब्रा की हुक उनके दक्ष हाथों फक से खुल गई। मैंने शिकायत में उनकी छाती पर हल्का-सा मुक्का मारा, वे मुझे और जोर से चूमने लगे। उन्होंने मुझे धीरे से उठाया और एक एक करके दोनों बाँहों से नाइटी और साथ में ब्रा भी निकाल दी। मैं बस बाँहों से ही स्तन ढक सकी।

काश मैं द्वन्द्वहीन होकर इस आनन्द का भोग करती। मन में पीढ़ियों से जमे संस्कार मानते कहाँ हैं। बस एक ही बात का दिलासा था कि संजय भी संभवत: इसी तरह आनंदमग्न होंगे। इस बार विनय के बड़े हाथों को अपने नग्न स्तनों पर महसूस किया। पूर्व की अपेक्षा यह कितना आनन्ददायी था। उनके हाथ में मेरा उरोज मनोनुकूल आकारों में ढल रहा था। वे उन्हें कुम्हार की मिट्टी की तरह गूंथ रहे थे। मेरे चूचुक सख्त हो गए थे और उनकी हथेली में चुभ रहे थे।

होंठ, ठुड्डी, गले के पर्दे, कंधे, कॉलर बोन… उनके होंठों का गीला सफर मेरी संवेदनशील नोंकों के नजदीक आ रहा था। प्रत्याशा में दोनों चुंचुक बेहद सख्त हो गए थे। मैं शर्म से विनय का सिर पकड़ कर रोक रही थी हालाँकि मेरे चूचुक उनके मुँह की गर्माहट का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। उनके होंठ नोंकों से बचा-बचा कर अगल-बगल ही खेल रहे थे। लुका-छिपी का यह खेल मुझे अधीर कर रहा था।

एक, दो, तीन… उन्होंने एक तने चूचुक को जीभ से छेड़ा़… एक क्षण का इंतजार… और… हठात् एकदम से मुँह में ले लिया। आऽऽऽह … लाज की दीवार फाँद कर एक आनन्द की किलकारी मेरे मुँह से निकल ही गई। वे उन्हें हौले हौले चूस रहे थे – बच्चे की तरह। बारी बारी से उन्हें कभी चूसते, कभी चूमते, कभी होंठों के बीच दबा कर खींचते। कुछ क्षणों की हिचक के बाद मैं भी उनके सिर पर हाथ फिरा रही थी। यह संवेदन अनजाना नहीं था पर आज इसकी तीव्रता नई थी। मैं सुख की हिलोरों में झूल रही थी। निरंतर लज्जा का रोमांच उसमें सनसनी घोल रहा था। एक परपुरुष मेरी देह के अंतरंग रहस्यों से परिचित हो रहा था जो सामान्य स्थिति में शिष्टता के दायरे से बाहर होता। मेरी देह की कसमसाहट उन्हे आगे बढ़ने के लिए हरी झण्डी दिखा रही थीं। उनका दाहिना हाथ मेरे निचले उभार को सहला रहा था। … अगर मेरे पति मुझे इस अवस्थां में देखते तो? रोंगटे खड़े हो गए। लेकिन केवल शर्म से नहीं बल्कि उस आह्लादकारी उत्तेजना से भी जो अचानक अभी अभी मेरे पेड़ू से आई थी। विनय का दायाँ हाथ मेरे ‘त्रिभुज’ को मसलता होंठों के अंदर छिपी भगनासा को सहला गया था।

मेरी जाँघें कसी न रह पाईं। मेरी मौन अनुमति से उन्होंने उन्हें फैला दिया और मेरी इस ‘स्वीकृति’ का चुम्बन से स्वागत किया। उनकी उंगलियों ने नीचे उतरकर गर्म गीले होंठों का जायजा लिया। मैं महसूस कर रही थी अपने द्रव को अंदर से निकलते हुए। उनकी उंगली चिपचिपा रही थी। एक बार उस गीलेपन को उन्होंने ऊपर ‘फुलझड़ी’ में पोंछ भी दिया।

अब उनका मुंह स्तनों को छोड़ कर नीचे उतरा। थोड़ी देर के लिए नाभि पर ठहर कर उसमें जीभ से गुदगुदी की। उन्होंने एक हाथ से मेरे बाएँ पैर को उठाया और उसे घुटने से मोड़ दिया। अंदरूनी जाँघों को सहलाते हुए वे बीच के होठों पर ठहर गये। दोनों उंगलियों से होठों को फैला दिया।

“हे भगवान!” मैंने सोचा, “संजय के पश्चात यह पहला व्यक्ति है जो मुझे इस तरह देख रहा है।” मुझे खुद पर शर्म आई। वे उंगलियों से होठों को छेड़ रहे थे जिस से मैं मचल रही थी। एक उंगली मेरे अंदर डूब गई। मेरी पीठ अकड़ी, पाँव फैले और नितम्ब हवा में उठने को हो गये। वे उंगली अंदर-बाहर करते रहे‌ – धीरे धीरे, नजाकत से, प्यार से, बीच-बीच में उसे वृत्ताकार सीधे-उलटे घुमाते। जब उनकी उंगली मेरी भगनासा सहलाती हुई गुजरी तो मेरी साँस निकल गई। मैं स्वयं को उस उंगली पर ठेलती रही ताकि उसे जितना ज्यादा हो सके अंदर ले सकूँ।

विनय ने वो उंगली बाहर निकाली और मुझे देखते हुए उसे धीरे-धीरे मुँह में डालकर चूस लिया। मैं शरम से गड़ गई। वे भी शर्माए हुए मुझे देख रहे थे। ऊन्होंने जीभ निकालकर अपने होंठों को चाट भी लिया। क्या योनि का द्रव इतना स्वादिष्ट होता है? मेरी गीली फाँक पर ठंडी हवा का स्पर्श महसूस हो रहा था। मैंने पुनः पैर सटा लिये। उन्होंने ठेलते हुए फिर दोनों पैरों को मोड़ कर फैला दिया। मैंने विरोध नहीं के बराबर किया। वे मेरी जांघों के बीच आ गए। जैसे जैसे वे मुझे विवश करते जा रहे थे मैं हारने के आनन्द से भरती जा रही थी।

लक्ष्य अब उनके सामने खुला था। ठंड लग रही योनि को विनय के गर्म होंठों का इंतजार था। भौंरा फूल के ऊपर मँडरा रहा था। वे झुके और ‘फुलझड़ी’ से उनकी साँस टकराई। मैं उत्कंठा से भर गई। अब उस स्वर्गिक स्पर्श का साक्षात्कार होने ही वाला था। आँखों की झिरी से देखा…. वे कैसी तो एक दुष्ट मुस्कान के साथ उसे देख रहे थे… वे झुके… और…. मैंने चुम्बनों की एक श्रृंखला ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर गुजरते महसूस की। मैंने किसी तरह अपने को ढीला किया मगर जब जीभ की नोक अंदर घुसी तो मैंने बिस्तर की चादर मुट्ठियों में भींच ली।

वे देख रहे थे कि मैं कितने तनाव में हूँ। मैं इतनी जोर-जोर कराह रही थी और नितंब उठा रही थी कि मुझे चाटने में उन्हें खासी मुश्किल हो रही होगी। अब उन्होंने मेरी जाँघों को अपनी शक्तिशाली बाहों की गिरफ्त में ले लिया। वे मेरी दरार में धीरे धीरे जीभ चलाते रहे। उनके फिसलते हुए होंठ कटाव के अंदर कोमल भाग में उतरे और भगनासा को गिरफ्तार कर लिया। मैं बिस्तर पर उछल गई। पर वे मेरे नितम्बों को जकड़ कर होंठों को अंदर गड़ाए रहे। इस एकबारगी हमले ने मेरी जान निकाल दी।

अंदर उनकी जीभ तेजी से अंदर-बाहर हो रही थी। यह एक नया तूफानी अनुभव था। मैं साँस भी ले नहीं पा रही थी। उनकी नाक मेरी भगनासा को रगड़ रही थी। ठुड्डी के रूखे बाल गुदा के आसपास गड़ रहे थे, जीभ योनि के अंदर लपलपा रही थी… ओ माँ… ओ माँ… ओ माँ… मैं मूर्छित हो गई। कुछ क्षण के लिये लगा मेरी साँस बंद हो गई है। वे रुक गये… मेरे लिये यह एक अद्भुत अनुभव था। मुझे उनके मुँह में स्खलित होना बहुत अच्छा लगा।

… वे अचानक उठे और चड्ढी को सामने से थामे तेजी से बाथरूम की ओर लपके। मैं समझ गई कि उत्तेजना ने उनकी भी छुट्टी कर दी थी। मुझे अपने ऊपर गर्व हुआ कि मैंने विनय जैसे परिष्कृत पुरुष को बिना कुछ किये ही स्खलित कर दिया। मैं आंख मूँद कर चरमोत्कर्ष-पश्चात के सुखद एहसास का आनन्द ले रही थी।

मुझे उनके लौटने का आभास तब हुआ जब उन्होंने मेरे संतुष्ट चेहरे को प्यार से चूमा। वे मेरे हाथ, पाँव, बाँहें, कंधे, पेट सहला रहे थे। एक संक्षिप्त सी मालिश ही शुरू कर दी उन्होंने। मेरी आँखें फिर मुंद गयीं। संजय…! मुझे मेरे पति का ख्याल आया …! क्या कर रहे होंगे वे? क्या उनके बिस्तर पर भी विद्या ऐसे ही निढाल पड़ी होगी? क्या वे उसे ऐसे ही प्यार कर रहे होंगे? मैंने अपने दिल को टटोला कि कहीं मुझे ईर्ष्या तो नहीं हो रही थी? लेकिन ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ!

आँखें खोली तो पाया विनय मुझे ही देख रहे थे – मेरे सिरहाने बैठे। मैंने शर्मा कर पुन: आँखें मूँद लीं। उन्होंने झुक कर मुझे चू्मा – लगा जैसे यह मेरे सफल स्खलन का पुरस्कार हो। मैंने उस चुम्बन को दिल के अंदर उतार लिया।

मैंने आंखें खोलीं। तौलिया सामने से थोडा खुला हुआ था। नजर एकदम से अंदर गई। शिथिल लिंग की अस्पष्ट झलक … “सात इंच … पूरा अंदर तक मार करेगा” … संजय की बात कान में गूँज गई। अभी सिकुड़ी अवस्था में कैसा लग रहा था वो? बच्चे सा – मानो कोई गलती कर के सजा के इंतजार में सिर झुकाए हुए हो … गलती तो उसने की ही थी – काम करने से पहले ही झड़ गया था। अच्छा भी लगा। दो बार चरमोत्कर्ष के बाद मैं थकी हुई थी। स्तऩ, चुंचुक, भगनासा आदि इतने संवेदनशील हो गए थे कि उनको छूना भी पीड़ाजनक था।

संजय की बात फिर मन में घूम गई, “पूरा अंदर तक मार करेगा!” हुँह …! पुरुषों का घमंड …! जैसे स्त्री लिंग की दया पर निर्भर हो! एक क्षण को लगा कि योनि-प्रवेश के समय उनका लिंग न उठ पाए तो मैं उनकी लज्जित-चिंतित अवस्‍था पर दया करूँ।

ओह …! कहाँ तो परपुरुष के स्पर्श की कल्पना भी भयावह लगती थी, कहाँ मैं उसके लिंग के बारे में सोच रही थी। किस अवस्था में पहुँच गई थी मैं!

उन्होंने कटोरी उठाई।

“क्या है?”

मुस्कुराते हुए उन्होंने उसमें उंगली डुबाकर मेरे मुँह पर लगा दी। ठंडा, मीठा, स्वादिष्ट चाकलेट। गाढ़ा। होंठों पर बचे हिस्से को मैंने जीभ निकाल कर चाट लिया।

“थकान उतारने का टानिक! पसंद आया?”

सचमुच इस वक्त की थकान में चाकलेट बहुत उपयुक्त लगा। चाकलेट मुझे यों भी बहुत पसंद था। मैंने और के लिए मुँह खोला। उन्होंने मेरी आखों पर हथेली रख दी, “अब इसका पूरा स्वाद लो।”

होंठों पर किसी गीली चीज का दबाव पड़ा। मैं समझ गई। योनि को मुख से आनन्दित करने के बाद इसके आने की स्वाभाविक अपेक्षा थी। मैंने उसे मुँह खोल कर ग्रहण दिया। चाकलेट में लिपटा लिंग। फिर भी उनकी यह हरकत मुझे हिमाकत जान पड़ी। एक स्त्री से प्रथम मिलन में लिंग चूसने की मांग … यद्यपि वे मेरी योनि को चूम-चाट चुके थे पर फिर भी …

उत्थित कठोर लिंग की अपेक्षा शिथिल कोमल लिंग को चूसना आसान होता है। मुँह के अंदर उसकी लचक मन में कौतुक जगाती है। एक बार स्खलित होने के बाद उसे अभी उठने की जल्दी नहीं थी। मैं उस पर लगे चा़कलेट को चूस रही थी। उसकी गर्दन तक के संवेदनशील क्षेत्र को जीभ से सहलाने रगड़ने में खास ध्यान दे रही थी। वह मेरे मुँह में थोड़ी उछल-कूद करने लगा था। मुझे एक बार फिर गर्व महसूस हुआ – उन पर होते अपने असर को देख कर … पर मिठास घटती जा रही थी और नमकीन स्वाद बढ़ रहा था। लिंग का आकार भी बढ़ रहा था। धीरे धीरे उसे मुँह में समाना मुश्किल हो गया। पति की अपेक्षा यह लम्बा ही नहीं, मोटा भी था। वे उसे मेरे मुँह में कुछ संकोच के साथ ठेल रहे थे।

यह पुरुष की सबसे असहाय अवस्था होती है। वह मुक्ति की याचना में गिड़गिड़ाता सा होता है और उसे वह सुख देने का सारा अधिकार स्त्री के हाथ में होता है। विनय तो दुर्बल हो कर बिस्तर पर गिर ही गए थे। मैं उनकी जांघों पर चढ़ गई। उनके विवश लिंग को मैंने अपने मुंह में पनाह दे दी। मैं कभी आक्रामक हो कर लिंग के गुलाबी अग्रभाग पर संभाल कर दाँत गड़ाती तो कभी उस पर जीभ फिसला कर चुभन के दर्द को आनन्द में परिवर्तित कर देती।

वे मेरा सिर पकड़ कर उसे अपने लिंग पर दबा रहे थे। उनका मुंड मेरे गले की कोमल त्वचा से टकरा रहा था। मैं उबकाई के आवेग को दबा जाती। अपने पति के साथ मुझे इस क्रिया का अच्छा अभ्यास था। पर यह उनसे काफी लम्बा था। रह-रह कर मेरे गले की गहराई में घुस जाता। मैं साँस रोक कर दम घुटने पर विजय पाती। जाने क्यों मुझे यकीन था कि विद्या के पास इतना हुनर नहीं होगा। विनय मेरी क्षमता पर विस्मित थे। सीत्कारों के बीच उनके बोल फूट रहे थे, “आह…! कितना अच्छा लग रहा है! यू आर एक्सलेंट़…  ओ माई गौड…”

उनका अंत नजदीक था। मुझे डर था कि दूसरे स्खलन के बाद वे संभोग करने लायक नहीं रहेंगे! लेकिन हमारे पास सारी रात थी। वे कमर उचका उचका कर अनुरोध कर रहे थे। मेरे सिर को पकड़े थे। क्या करूँ? उन्हें मुँह में ही प्राप्त कर लूँ? मुझे वीर्य का स्वाद अच्छा़ नहीं लगता था पर मैं अपने पति को यह सुख कई बार दे चुकी थी। लेकिन इन महाशय को? इनके लिंग को मैं इतने उत्साह और कुशलता से चूस रही थी … फिर उन्हे उनके सबसे बड़े आनन्द के समय बीच रास्ते छो़ड देना स्वार्थपूर्ण नहीं होगा? उन्होंने कितनी उदारता और उमंग से अपने मुँह से मुझे अपनी मंजिल तक पहुंचाया था। मैंने निर्णय कर लिया।

जब अचानक लिंग अत्यंत कठोर हो कर फड़का तो मैं तैयार थी। मैंने साँस रोक कर उसे कंठ के कोमल गद्दे में बैठा लिया। गर्म लावे की पहली लहर हलक के अंदर उतर गई। … एक और लहर! मैंने मुंह थोडा पीछे किया। हाथ से उसकी जड़ पकड़ कर उसे घर्षण की आवश्यक खुराक देने लगी। साथ ही शक्ति से प्रवाहित होते वीर्य को जल्दी-जल्दी निगलने लगी।

संजय का और इनका स्वाद एक जैसा ही था। क्या सारे मर्द एक जैसे होते हैं? इस ख्याल पर हँसी आई। मैंने मुँह में जमा हुई अंतिम बूंदों को गले के नीचे धकेला और जैसे उन्होंने किया था वैसे ही मैंने झुक कर उनके मुँह को चूम लिया। लो भाई, मेरा जवाबी इनाम भी हो गया। किसी का एहसान नहीं रखना चाहिए अपने ऊपर।

उनके चेहरे पर बेहद आनन्द और कृतज्ञता का भाव था। थोड़े लजाए हुए भी थे। सज्जन व्यक्ति थे। मेरा कुछ भी करना उन के लिये उपकार जैसा था जबकि उनका हर कार्य अपनी योग्यता साबित करने की कोशिश। मैंने तौलिए से उनके लिंग और आसपास के भीगे क्षेत्र को पोंछ दिया। उनके साथ उस समय पत्नी-सा व्येवहार करते हुए थोड़ी शर्म आई पर खुशी भी हुई …

अपनी नग्नता के प्रति चैतन्य  होकर मैंने चादर को अपने ऊपर खींच लिया। बाँह बढ़ा कर उन्होंने मुझे समेटा और खुद भी चादर के अंदर आ गए। मैं उनकी छाती से सट गई। दो स्खलनों के बाद उन्हें आराम की जरूरत थी। अब संभोग भला क्या होना था। पर उसकी जगह यह इत्मींनान भरी अंतरंगता, यह थकन-मिश्रित शांति एक अलग ही सुख दे रही थी। मैंने आँखें मूंद लीं। एक बार मन में आया कि जा कर संजय को देखूँ। पर फिर यह ख्याल दिल से निकाल दिया!

पीठ पर हल्की-हल्की  थपकी… हल्का-हल्का पलकों पर उतरता खुमार… पेट पर नन्हें लिंग का दबाव… स्तनों पर उनकी छाती के बालों का स्पर्श… मन को हल्केँ-हल्के  आनंदित करता उत्तेजनाहीन प्या‍र… मैंने खुद को खो जाने दिया।

उत्तेजनाहीन…? बस, थो़ड़ी देर के लिए। निर्वस्त्र हो कर परस्पर लिपटे दो युवा नग्न शरीरों को नींद का सौभाग्य कहाँ। बस थकान दूर होने का इंतज़ार। उतनी ही देर का विश्राम जो पुन: सक्रिय होने की ऊर्जा भर दे। फिर पुन: सहलाना, चुम्बन, आलिंगऩ, मर्दन … सिर्फ इस बार उनमें खोजने की बेकरारी कम थी और पा लेने का विश्वास अधिक! हम फिर गरम हो गए थे। एक बार फिर मेरी टांगें फैली थीं और वे उनके बीच में थे।

“प्रवेश की इजाज़त है?” मेरी नजर उनके तौलिए के उभार पर गडी थी। मैंने शरमाते हुए स्वीकृति में सिर हिलाया।

वे थोडा संकुचाते हुए बोले, “मेरी भाषा के लिये माफ करना पर मैं प्रार्थना करता हूं कि ये चुदाई तुम्हारे लिये यादगार हो।” शब्द मुझे अखरा यद्यपि उनका आशय अच्छा लगा। मेरा अपना संजय भी इस मामले में कम नहीं था – चुदाई का रसिया। अपने शब्द पर मैं चौंकी – हाय राम, मैं यह क्या  सोच गई। इस आदमी ने इतनी जल्दी मुझे प्रभावित कर दिया?

“कंडोम लगाने की जरूरत है?”

मैंने इंकार में सिर हिलाया।

“तो फिर एकदम रिलैक्स हो जाओ, नो टेंशन!”

उन्होंने तौलिया हटा दिया। वह सीधे मेरी दिशा में बंदूक की तरह तना था। अभी मैंने अपने मुँह में इसका करीब से परिचय प्राप्त किया था फिर भी इसे अपने अंदर लेने का खयाल मुझे डरा रहा था। मुझे फिर संजय की बात याद आ रही थी ‘सात इंच का …!’   ‘अंदर तक मार …!’  मैंने सोचा – विद्या का भाग्य अच्छा है क्योंकि उसे पांच इंच का ही लेना पड़ रहा है!

उन्होंने मेरी जांघों के बीच अपने को स्थित किया और लिंग को भगोष्ठों के बीच व्यवस्थित किया। मैंने पाँव और फैला दिए और थोड़ा सा नितम्बों को उठा दिया ताकि वे लक्ष्य को सीध में पा सकें। लिंग ने फिसल कर गुदा पर दस्तक दी, “कभी इसमें लिया है?”

“नहीं! कभी नहीं!”

“ठीक है!” उन्होंने उसे वहाँ से हटाकर योनिद्वार पर टिका दिया। मैं इंतजार कर रही थी…

“ओके, रिलैक्स!”

भगोष्ठ खिंच कर फैले … उनमे कहाँ सामर्थ्य था हठीले लिंग को रोकने का। सतीत्व की सब से पवित्र गली में एक परपुरुष की घुसपैठ। पातिव्रत्य का इतनी निष्ठा से सुरक्षित रखा गया किला टूट रहा था। मेरा समर्पित पत्नी मन पुकार उठा, “संजय, … मेरे स्वामी, तुमने कहाँ पहुँचा दिया मुझे।”

विनय लिंग को थोड़ा बाहर खींचते और फिर उसे थोड़ा और अंदर ठेल देते। अंदर की दीवारों में इतना खिंचाव पहले कभी नहीं महसूस हुआ था। कितना अच्छा लग रहा था, मैं एक साथ दु:ख और आनन्द से रो पड़ी। वे मेरे पाँवों को मजबूती से फैलाए थे। मेरी आँखें बेसुध हो गई थीं। मैं हल्के-हल्के कराहती उन्हें मुझ में और गहरे उतरने के लिए प्रेरित कर रही थी। थो़ड़ी देर लगी लेकिन वे अंतत: मुझ में पूरा उतर जाने में कामयाब हो गए।

वे झुके और मेरे गले और कंधे को चूमते हुए मेरे स्तनों को सहलाने लगे, चूचुकों को चुटकियों से मसलने लगे। मैं तीव्र उत्तेजना को किसी तरह सम्हाल रही थी। आनन्द में मेरा सिर अगल बगल घूम रहा था। उन्होंने अपनी कुहनियों को मेरे बगलों के नीचे जमाया और अपने विशाल लिंग से आहिस्ता आहिस्ता लम्बे धक्के देने लगे। वे उसे लगभग पूरा निकाल लेते फिर उसे अंदर भेज देते। जैसे-जैसे मैं उनके कसाव की अभ्यस्त हो रही थी, वे गति बढ़ाते जा रहे थे। उनके आघात शक्तिशाली हो चले थे। मैंने उन्हें कस लिया और नीचे से प्रतिघात करने लगी। मेरे अंदर फुलझड़ियाँ छूटने लगीं।

वे लाजवाब प्रेमी थे। आहऽऽऽऽह… आहऽऽऽऽह … आहऽऽऽऽह… सुख की बेहोश कर देने वाली तीव्रता में मैंने उनके कंधों में दाँत गड़ा दिए। उनके प्रहार अब और भी शक्तिशाली हो गये थे। धचाक, धचाक, धचाक… मानो योनी को तहस-नहस कर देना चाहते हों। मार वास्तव में अंदर तक हो रही थी पर अत्यंत आनंददायक! दो दो स्खलनों ने उन में टिके रहने की अपार क्षमता भर दी थी।

“आहऽऽऽऽह…!” अंततः उनका शरीर अकड़ा और अंतिम चरण का आरम्भ हो गया। लगा कि बिजलियाँ कड़क रही हैं और मेरे अंदर बरसात हो रही है। अंतिम क्षरण के सुख ने मेरी सारी ताकत निचोड़ ली। वे गुर्राते हुए मुझ पर गिरे और मैंने उन्हें अपनी बाहों में भींच लिया। फिर मैं होश खो बैठी।

जब हम सुख की पराकाष्ठा से उबरे तो उन्होंने मुझे बार बार चूम कर मेरी तारीफ की और धन्यवाद दिया, “लक्ष्मी, यू आर वंडरफुल! ऐसा मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया। तुम कमाल की हो।”

मुझे गर्व हुआ कि विद्या ने इतना मजा उन्हें कभी नहीं दिया होगा। मैंने खुद को बहुत श्रेष्ठ महसूस किया। मैंने बिस्तर से उतर कर खुद को आइने में देखा। चरम सुख से चमकता नग्ऩ शरीर, काम-वेदी़ घर्षण से लाल और जाँघों पर रिसता हुआ वीर्य। मैंने झुक कर ब्रा और पैंटी उठाई तो उन्होंने मेरी झुकी मुद्रा में मेरे पृष्ठ भाग के सौंदर्य का पान कर लिया। मैं बाथरूम में भाग गई।

रात की घड़िया संक्षिप्त हो चली थीं। नींद खुली तो विद्या चाय ले कर आ गई थी। उसने हमें गुड मार्निंग कहा। मुझे उस वक्त उसके पति के साथ चादर के अंदर नग्नप्राय लेटे बड़ी शर्म आई और अजीब सा लगा। … लेकिन विद्या के चेहरे पर किसी प्रकार की ईर्ष्या के बजाय खुशी थी। वह मेरी आँखों में आँखें डाल कर मुस्कुराई। मुझे उसके और संजय के बीच ‘क्या हुआ’ जानने की बहुत जिज्ञासा थी।

अगली रात संजय और मैं बिस्तर पर एक-दूसरे के अनुभव के बारे में पूछ रहे थे।

“कैसा लगा तुम्हें?” संजय ने पूछा।

“तुम बोलो? तुम्हारा बहुत मन था ना!” मैं व्यंग्य करने से खुद को रोक नहीं पायी हालाँकि मैंने स्वयं अभूतपूर्व आनन्द का अनुभव किया था।

“ठीक ही रहा।”

“ठीक ही क्यों?”

“सब कुछ हुआ तो सही पर उस में तुम्हारे जैसी उत्तेजना नहीं दिखी।”

“अच्छा! पर सुंदर तो थी वो।”

“हाँऽऽऽ, लेकिन पाँच इंच में शायद उसे भी मजा नहीं आया होगा।”

“तुम साइज की व्यर्थ चिन्ता करते हो। सुबह विद्या तो बहुत खुश दिख रही थी।” मैं उन्हें दिलासा दिया पर बात सच लग रही थी। मुझे विनय के बड़े आकार से गहरी पैठ और घर्षण का कितना आनन्द मिला था!

“अच्छा? तुम्हारा कैसा रहा?”

मैं खुल कर बोल नहीं पाई। बस ‘ठीक ही’ कह पाई।

“कुछ खास नहीं हुआ?”

“नहीं, बस वैसे ही…”

संजय की हँसी ने मुझे अनिश्चय में डाल दिया। क्या विनय ने इन्हें कुछ बताया है? या इन्होने कुछ देखा था?

“यह तो अभी भी इतनी गीली है …” उनकी उंगलियाँ मेरी योनि को टोह रही थीं, “… लगता है उसने तुम्हें काफी उत्तेजित किया होगा।”

विनय के संसर्ग की याद और संजय के स्पर्श ने मुझे सचमुच बहुत गीली कर दिया था। पर मैंने कहा, “शायद विद्या का भी यही हाल हो!”

“एक बात कहूँ?”

“बोलो?”

“पता नहीं क्यों मेरा एक चीज खाने का मन हो रहा है।”

“क्या?”

“चाकलेट!”

“चाकलेट?”

“हाँ, चाकलेट!”

“…”

“क्या तुमने हाल में खाई है?”

मैं अवाक! क्या कहूँ, “तुमको मालूम है?”

संजय ठठा कर हँस पड़े। मैं खिसिया कर उन्हें मारने लगी।

मेरे मुक्कों से बचते हुए वो बोले, “तुम्हे खानी हो तो बताना। मैं भी खिला सकता हूं।”

मैंने शर्मा कर उनकी छाती में मुंह छिपा लिया।

“तुम्हें खुश देख कर कितनी खुशी हुई बता नहीं सकता। बहुत मजा आया। विद्या भी बहुत अच्छी थी मगर तुम तुम ही हो।”

“तुम भी किसी से कम नहीं हो।” मैंने उन्हें आलिंगन में जकड़ लिया।

“विनय अगले सप्ताह यहाँ आने की कह रहा था …  विद्या के साथ! उन्हें बुला लूं क्या?”

अब आप ही बताइये मैं क्या उत्तर दूं?

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