छोटी बहन के साथ चुदाई part 10

फ़िर विभा ऊठ कर अपने कपडे पहनने लगी। जब वो बिस्तर से नीचे उतर कर खडी थी तब उसकी नजर बिस्तर पर गई और जहाँ लेट कर उसने अपनी सील तुडवाई थी वहाँ उसके कुँवारेपन का सुबूत, उसकी बूर से निकले खून का एक छोटा सा धब्बा बना हुआ था। उस लाल धब्बे को देखते हुए वो बोली, “भैया… आप बहुत गन्दे हैं, मुझे फ़ँसा कर मेरी इज्जत लूट लिए”। उसके चेहरे से दुख कम शरारत ज्यादा दिख रहा था सो मैंने कहा, “तो क्या हुआ…, आज न कल तुम्हारी इज्जत तो लूटती हीं, कोई बाहर का लौन्डा मेरे घर की इज्जत लूटे उससे तो अच्छा है कि मैंने तेरी इज्जत लूट ली, और फ़िर मैं भी तो तेरे लिए हीं बहनचोद बन गया”। विभा अब मुझे याद दिलाई, “आप तो भैया पहले से बहनचोद बने हुए थे, मैं तो एक ऐसी बहन थी जो आपको पवित्र रखे हुए थी… पर आपने मुझे भी बहका कर मेरे साथ भी कर लिया”। वो अब मुस्कुरा रही थी, तो मैंने कहा… “और अपनी प्यारी बहन को उसकी जवानी का मजा भी तो दिया… तुम्को मजा नहीं आया क्या?” वो अब खुल कर हँसते हुए बोली, “दर्द से मेरा को प्राण निकल रहा था और आप थे कि मुझे अपने नीचे दबा कर अपना जिद पूरा कर लिए। आपको दया नहीं आई… अपने बहन को ऐसे दबाते हुए?” मैंने अब कहा, “सौरी यार… पर लडकी को पहली बार अगर ऐसे नहीं दबाया तो वो पक्का नीचे से फ़िसल कर निकल जाएगी। अब दर्द नहीं होगा… सिर्फ़ मजा आएगा। चलो अब हम लोग थोडा घुम आते हैं फ़िर रात में जम कर चुदाई किया जाएगा एक-दूसरे का”। इसके बाद हम दोनों कमरे से निकल कर बाजार की तरफ़ घुमने चले गए। विभा की चाल थोडी धीमी हो गई थी, बेचारी अभी-अभी ताजा पहली बात चुदी थी। मैंने उसको सिर्फ़ एक घुटनों तक का फ़्रौक पहनने को कहा था। और वो भी मेरी बात मान कर सिर्फ़ एक फ़्रौक, बिना किसी ब्रा-पैन्टी के पहन कर मेरे साथ बाजार घुमने निकल गई थी। एक बार चुदा कर विभा भी थोडा खुल गई थी। मैंने उससे पूछा, “विभा अच्छा लगा चुदा कर…?” वो भड़क गई, “हट्ट… ऐसे सडक पर बात कर रहे हैं, कोई सुनागे तब?” मैंने कहा, “कोई नहीं सुनेगा… कौन हमारे आस-पास है…?”

फ़िर एक रिक्शा ले कर हम समुद्र की तरफ़ चल दिए। करीब ६ बज रहा था और अंधेरा होना शुरु हुआ था। समुद्र किनारे अब कम लोग थे… ज्यादातर नई जोड़ियाँ थी और सब हाथों में हाथ डाल बैठे थे और ठन्डी हवा का मजा ले रहे थे। कुछ छोकड़े चिप्स, शंख वगैरह बेच रहे थे। एक तरफ़ एक बडी सी झोपडी थी, जहाँ चाय बीक रहा था और हम उसी तरफ़ बढे… फ़िर जब हम उस झोपडे से आगे उसके पीछे की तरफ़ बढ़े तो एक लडका हमारे पास आया और बोला, “उधर नहीं जाना है… जाने का पैसा लगेगा”। हमें कुछ समझ नहीं आया, तो मैंने पूछा कि ऐसा क्यों भाई? तब उसने बताया, “ऊधर जोड़ा लोग प्यार करता है, ऊधर जाने का पैसा लगता है हम लोग उधर सब को नहीं जाने देते हैं”। उस छोखडे को अपनी बहन पर नजर घुमाते देख मैं सब समझ गया और फ़िर बोला, “कितना?” वो बोला, “२००”, जो मैंने फ़ट से दे दिया। अब वो बोला, “आठ बजे तक वापस आ जाना, हम लोग दुकान बन्द करके चले जाएंगे फ़िर पुलिस-उलिस का चक्कर खुद समझना”। मैं अनजाने ही एक मस्त मौका पा खुश हो गया था। मैंने विभा का हाथ अपने हाथ में लिया और फ़िर झोपडी के पीछे की तरफ़ चला गया। सामने बालू पर ४ जोड़ा पडा हुआ था। दो चुदाई शुरु कर चुके थे, जबकि दो अभी चुम्मा-चाटी में लगे थे। रोशनी कम हो चुकी थी, सो १० फ़ीट दूर से चेहरा दिख नहीं रहा था। चुद्वा रही लडकियाँ मस्ती से कराह रही थी। मैं भी उन्हीं लोगों की तरह बालू पर बैठ गया और विभा जो आँख फाड़े सब देख रही थी, उसको बैठने को कहा।

विभा समझ गई थी कि अब उसको भी मैं चोदुंगा सो वो बैठते हुए बोली, “भैया… यहाँ पर अएसे सब के सामने मैं नहीं करवाऊँगी”। मैंने उसको पकडते हुए कहा, “चुम्मा-चाटी में क्या हर्ज है… वो सब तो करोगी न”, और मैंने उसको अपने से चिपटाते हुए चुमने लगा। वो शुरु में हिचकी फ़िर साथ देने लगी। मेरे लिए उसका ऐसे जल्दी से सहयोग करना एक शुभ संकेत था। मैंने देखा कि अब तीसरे जोड़े भी चुदाई की तैयारी करने लगे थे और उसकी लड़की बालू पर लेट गई थी। मैंने विभा से ध्यान हटा कर उनकी तरफ़ किया। एक और जोडा अब चुदाई में लग गया था और हम दोनों भाई-बहन सब देख रहे थे।

तभी मैंने देखा कि एक और जोडा जो वहीं बैठा चुम्मा-चाटी में लगा था, उसमें से लडका हमारी तरफ़ आया। विभा सकुचा कर मेरे से अलग हो कर बैठ गई। मैं भी थोडा घबडाया कि यह लडका अपनी माल को छोड कर क्यों आ रहा है। उसने हमारे पास आ कर हमें नमस्कार किया। वो २७-२८ साल का सांवला, दुबला-पतला लडका था। उसने अपना परिचय दिया कि उसका नाम संदीपन है, विशाखापट्टन में हीं बैंक में काम करता है और वो अपने बीवी, रुमी, के साथ पुरी घुमने आया है। उसने फ़िर हमसे हमारा परिचय पूछा तो मैंने अपने को पटना का रहने वाला, विभा को अपनी पत्नी बताया और कहा कि हमलोग भी यहाँ घुमने आए हैं। फ़िर उसने अपने आने का उद्देश्य बताया और फ़िर एक अजीब प्रस्ताव रखा। उसने कहा कि वो चाहता है कि वो अपनी बीवी को चुदते हुए देखे। वो दोनों यहाँ पिछले दो दिन से आ रहे हैं और यहाँ जोड़ों को चुदाई करते देखते हैं। अब उसका मन था कि वो अपनी बीवी को ऐसे ही देखे सो आज वो यहाँ किसी ऐसे जोड़े के लिए इंतजार में बैठा था जो शक्ल-सूरत से थोडा उत्तर-भारतीय लगे औए जिससे फ़िर उन दोनों के मुलाकात की संभवना न के बराबर हो। उसने जब मुझसे यहा कहा कि वो चाहता है कि मैं उसकी बीवी को चोदूँ तो मेरा दिमाग झन्ना गया। मैंने एक नजर विभा पर डाली तो वो बोला, “ओफ़-कोर्स… अगर भाभी जी परमिशन दें तब…”। विभा का चेहरा देखने लायक था। मुझे यह एक ऐसा मौका दिखा जो शायद मेरे जीवन में फ़िर न आए सो मैंने विभा से पूछा, “क्या बोलती हो?” पर वो तो चुप रही फ़िर सोंच कर बोली, “मुझे नहीं करना ऐसा कुछ…”। संदीपन तुरंत बोला, “नहीं.. नहीं भाभी जी, आप गलत समझ रही हैं… आपको कुछ नहीं करना बस मैं चाहता हूँ कि आपके मिस्टर एक बार रूमी के साथ सेक्स करें और मैं बैठ कर देखूँ। प्लीज भाभी जी, बस १५-२० मिनट लगेगा ज्यादा से ज्यादा”। वो चुप रही और नजर नीचे कर ली तो मैंने संदीपन से पूछा, “आपने अपनी वाईफ़ से पूछा है इस बार में, वो तैयार होंगी”। वो अब बोला, “हाँ… यहाँ से होटल जा कर हम जब सेक्स करते हैं तो खुब मजा आता, और जब बाद में मैंने उसको अपना इरादा बताया तो वो तुरंत रेडी हो गई”।

मैंने एक नजर अब उसकी बीवी पर डाली जो हम सब से करीब १० फ़ीट दूर बैठी थी और हमारी तरफ़ देख रही थी। दुबली-पतली से लम्बी लडकी दिखी वो, गहरे रंग का सलवार-सूट पहने… रोशनी कम होने से नाक-नक्श इतनी दूर से साफ़-साफ़ नहीं दिखे पर लगी ठीक-ठाक। मैंने हाँ कह दिया और मेरा जवाब सुनते हीं वो रूमी तो इशारा किया और वो तुरंत उठ कर हमारी तरफ़ आ गई। उसने अपनी बीवी से हमारा परिचय कराया और फ़िर अपनी भाषा में उसको कुछ बताया जो मैं समझ नहीं सका। उसकी बीवी ने अपना दुपट्टा उतार कर उसको दिया और वो उस दुपट्टे को वहीं बालू पर बिछा दिया। जब रूमी उस दुपट्टे पर बैठने लगी तो मैंने कहा, “आप तैयार हैं इसके लिए भाभी जी?” तो उसने मुस्कुराते हुए अपना सर हाँ में हिलाया। रूमी बहुत दुबली थी, करीब ५’७” लम्बी जिस वजह से और ज्यादा दुबली लग रही थी। उसकी चुचियाँ बहुत बडी थी उसकी बदन की चौडाई के हिसाब से। ३६ साईज की पर ब्रा का कप सबसे लार्ज उसको फ़िट होता होगा। विभा थोडा से करीब २ फ़ीट पीछे खिसक गई थी जब दुपट्टा बालू पर बिछाया गया था। संदीपन उसी दुपट्टे पर बैठ गया था। मैंने विभा को गाल पर हल्के से चुम्मा लिया और फ़िर उस दुपट्टे पर रूमी के पास आया। उसने अपनी बाँहें फ़ैलाई और मैंने भी जवाब में उसको अपने सीने से लगा कर उसके होठ चुमने लगा। वो खुब मस्त हो कर मेरे चुम्बन का जवाब दे रही थी। मैंने अब उसकी चुचियों पर अपने हाथ फ़ेरने शुरु किए तो वो मस्त हो कर और जोर-जोर से चुमने लगी। मैंने अब उसको अपने बदन से अलग किया और फ़िर उसके पीठ पर अपने हाथ ले जा कर कुर्ते का हुक खोलने लगा। छः हुक खुलने के बाद उसका कमर की चमड़ी मेरे हाथ से सटी। मैंने उसके कुर्ते को उसके बदन से अलग कर दिया। रूमी की बडी-बडी चुचियाँ सफ़ेद ब्रा में शान से सर उठाए खडी थी। मैंने उसके सपाट पेट पर हाथ फ़ेरते हुए अपने हाथ को उसके सलवार की डोरी को खोजा तो पाया कि उसकी सलवार में डोरी नहीं था बल्कि एलास्टीक था। मैंने उसकी सलवार को नीचे सरारा और उसने अपनी चुतड ऊपर उठा कर मुझे सहयोग किया। अगले कुछ पलों के बाद दुबली-पतली लम्बी रूमी चाँदनी रात में अपनी नंगी चूत के साथ मेरे सामने बैठी थी। उसने कोई पैन्टी नहीं पहना हुआ था।

मुझे दिखाते हुए उसने अपने जाँघ खोले तो मुझे उसकी चिकनी चूत दिखी। वो मुस्कुराते हुए अपने हाथ को पीछे ले जा कर अपने ब्रा का हुक खुद खोली और ब्रा को बदन से अलग करके अपने चुचियों को दो बार खुब प्यार से सहलाया। मैंने उसको फ़िर से अपनी तरफ़ खींचा और कहा, “मस्त बौडी है मेरी जान….”। मेरी बात सुनकर उसने एक बार मेरी विभा को देखा फ़िर बोला, “आपकी बीवी भी सुन्दर है…. पर ठीक है, सब को दूसरे की बीवी अपनी वाली से अच्छी लगती है। संदीपन से पूछिए तो वो कहेगा कि आपनी बीवी ज्यादा सुन्दर है”। मुझे उम्मीद नहीं थी कि रूमी ऐसे खुल कर मस्त बोलेगी। मुझे तो मजा आ गया। मैंने उसे धीरे से दुपट्टे पर सीधा सुला दिया और उसकी बडी-बड़ी चुचियों पर पिल गया। मैं उन दोनों फ़ुटबौल को अपने दोनों हाथों से मसल रहा था और वो मेरे जोर को देख कर बोली, “धीरे-धीरे…. दर्द होता है”। मैंने उससे पूछा, “इत्ती बड़ी-बडी ऐसे पतले २०” कमर पर ले कर चलती कैसे हो?” उसने कहा, “२० नहीं २३” कमर है मेरी अब… शादी के पहले २२” की थी… अब भगवान जब ऐसा दे दिए हैं तो हमलोग क्या कर सकते हैं”। मैं अब उसकी चुचियों को चुस रहा था और वो सित्कारी भर रही थी। मेरा लन्ड मेरे प्जीन्स में फ़नफ़नाया हुआ था। मैंने जब उसकी चूत को चुसने के लिए अपना मुँह नीचे किया तो वो बोली, “मुझे भी लौलीपौप दीजिए न भाई साहब…”। मैं तुरंत उठा और अपने कपडे झटपट खोल दिए और अपना लन्ड उसके मुँह के सामने कर दिया। वो अब मुझे सीधा लिटा दी और फ़िर मेरे ऊपर ऐसे चढ गई कि उसकी पीठ मेरे चेहरे की तरफ़ हो गई। फ़िर वो झुकी और मेरे लन्ड को अपने मुँह में डाल कर चुसने लगी। उसकी चिकनी चूत अब मेरे चेहरे के सामने थी। काली-पतली लम्बी फ़ाँक देख मैं समझ गया कि वो 69 के चक्कर में हैं सो मैं भी उसकी चूत को चुसने लगा। मैं बीच-बीच में उसकी चूत में अपनी एक ऊँगली घुसा देता था। करीब ३-४ मिनट की चुसाई-चटाई के बाद वो मेरे ऊपर से उठी। वो अब पूरा से गर्म थी। उसकी कराह ने मुझे उसका हाल बता दिया था।

मैंने उसको पूरी तरह से उठने ना दिया और उसको जल्दी से पकड कर झुकाया तो वो अपने चारों हाथ-पैर के सहारे वहीं झुक गई और मैं अब उसके ऊपर चढ गया। पीछे से जब मैंने उसकी खुली हुई चूत में अपना लन्ड घुसाया तो वो सिसकार रोक न सकी। मैं अब मस्त हो कर रूमी को चोद रहा था। उसकी पीठ पर झुक कर मैं उसके बडे-बड़े गेन्दों को भी सहला रहा था। उसका पति संदीपन बगल में बैठ कर सब देख रहा था। विभा भी चुप-चाप हम दोनों की चुदाई देख रही थी। वो चरम-सुख पा कर अब थोडा शान्त होने लगी थी और मैं अभी भी जोश में था तो उसने अपने को मेरे नीचे से निकाल लिया और फ़िर मुझे लिटा कर मेरे ऊपर चढ़ गई। उसने अपने हाथ से मेरा लन्ड पकड कर अपनी चूत में घुसाया और फ़िर ऊछल-ऊछल कर मुझे चोदने लगी। इस तरह से मुझे उसके गेंदों का ऊछाल देखने का भरपूर मौका मिल रहा था। तभी संदीपन ने कहा, “रूमी लेट जाओ, मैं आता हूँ अब”। रूमी अपने चूत में मेरा लन्ड फ़ँसाए हुए हीं मेरे ऊपर लेट गई। उसकी चुचियाँ मेरे सीने से लगी थी। अब संदीपन फ़टाक से ्कमर के नीचे नंगा हो कर आया और उसकी गाँड़ चाटने लगा। हम दोनों को अब थोडा आराम करने का मौका मिल गया था सो हम जोर-जोर से साँस लेने लगे थे। जल्दी हीं संदीपन उठा और उसकी गाँड़ में अपना लन्ड डाल दिया फ़िर उसने ऊअप्र से धक्के लगाने शुरु किए। अब रूमी की चूत में मेरा लन्ड था और उसकी गाँड में उसके पति का। हम दोनों के लन्ड उसकी दोनों छेदों की चुदाई करने लगे थे। बेचारी अब कभी-कभी दर्द से कराह देती थी। मैं भी अपने लन्ड पर संदीपन के लन्ड का दबाव महसूस कर लेता था जब वो धक्का देता। हम दोनों के लन्ड के बीच रूमी के बदन की एक पतली झील्ली ही तो थी। संदीपन जल्द हीं उसकी गाँड में झड गया और हट गया। तब मैंने रूमी तो पलट कर सीधा लिटा दिया और उसके ऊपर से उसकी चुदाई करने लगा। मैं अब उसको चुमते हुए चोद रहा था। वो अब तक दो बार झड़ कर थक कर निढ़ाल हो गई थी और अपना बदन बिल्कुल ढीला छोड दिया था जैसे बेजान हो गई हो। मैंने उसके पैरों को अपने कंधों पर चढा लिया और फ़िर उसकी चूचियों को जोर-जोर से मसल्ते हुए तेज धक्के लगाने शुरु कर दिए। चुचियों के मसलने से वो दर्द से बिलबिला गई थी पर मैं अब झडने के कागार पर था सो रुकने का नाम नहीं ले रहा था… घच्च घच्च घच्च घच्च थप-थप-थप… और मैं झड गया। मेरा सारा माल उसकी चूत में भर गया था। मैं अब उसके ऊपर से हटा तो वो बेचारी दर्द से कराहते हुए पलट गई और एक-दो बार अपने जाँघ सिकोड कर थोड़ा तसल्ली की। फ़िर उसने अपने हाथों से आँसू पोंछते हुए कहा, “कितना जोर से दबा दिए थे मेरी छाती को, लगा कि प्राण निकल जाएगा… छीः”। मैंने उसको सौरी बोला, और अब जब होश में आकर सब तरफ़ देखा तो पाया कि एक और जोडा पास में खडा हो कर हम सब को देख रहा है। उस जोडे के लडके ने मेरे और संदीपन से हाथ मिलाया और लडकी रूमी और विभा से गला मिली। फ़िर वो लोग चले गए। उस समय अब सिर्फ़ हम सब ही बचे थे। मैंने घड़ी देखी तो पौने आठ बज गया था। विभा को अब यहाँ चोदने का समय नहीं था और मैं भी थक गया था। रूमी अपना कपडा पहन चुकी थी। सो हम सब एक-दूसरे से विदा ले कर अपने-अपने रास्ते निकल गए।

बाहर ही खाना खा कर हम होटल आ गए। विभा कपडे बदलते हुए रूमी के बारे में बात कर रही थी कि कैसी गंदी थी वो। मैंने कहा, “मस्त थी… गंदी मत कहो उसको”। वो मुझे देख कर मुँह बिचकाई और चुप हो गई। आज मैं भी थक गया था और विभा भी सो तय हुआ कि आज का कसर कल निकालेंगे। वो समझ गयी कि अब कल तक के लिए वोह बच गयी है। सो थोडा निश्चिन्त हुई और बिस्तर पर सोने के लिए आई और मेरी गोदी में सिमट गई। मैंने प्यार से जब उसका माथा चूमा तब वो बोली, “भैया, आप भी बहुत गन्दे हैं… कैसे आप रूमा को चोद रहे थे? क्या सोच कर उसको ऐसे खुले में हम सब के सामने चोदे?” मैंने भी उसको प्यार से सहलाते हुए कहा, “देखो बहना… यह लन्ड और चूत के रिश्ते में कोई चीज नहीं होती है। जब उसका पति खुद बोला उसको चोदने के लिए तो मैं क्यों न कहता। वैसे भी रूमा जवान थी… माल थी… और चुदाने को तैयार भी थी”। अब वो बोली, “मतलब… अगर कल को कोई आया और बोला कि वो मेरे साथ … करेगा, तब आप उसको भी हाँ कह देंगे?” मैं उसका इरादा समझ गया और बोला, “अरे नहीं मेरी रानी बहना…, तू तो स्पेशल है मेरे लिए। कोई साला आँख भी उठाया तो उसका आँख निकाल देंगे…” मैंने उसको पुचकारा तो उसको तसल्ली हुई और फ़िर वो अपना चेहरा मेरे सीने से चिपका दी। मैंने अब उसको चिढाने के लिए कहा, “तुम्हारी प्यारी चूत तो सिर्फ़ मेरे लिए है बहना रानी… अभी तो उसको कम से कम साल भर चोदुँगा फ़िर एक साला हस्बैंड ला दुँगा जिससे फ़िर खुले-आम चुदाना”। वो सब समझी और बोली, “जैसे आप तो अभी सब छुप के कर रहे हैं… जब से किशनगंज से निकले हैं तब से लगातार मुझे बीवी बनाए हुए हैं… आपको शर्म नहीं आती, कैसे सब को कह देते हैं कि मैं आपकी बीवी हूँ और कितायदारे के यहाँ कैसे बोल दिए कि आप बिना शादी किए मुझे साथ लाए हैं और मेरे घरवाले साथ भेजे हैं… छी:”। मैंने हँसते हुए कहा, “अरे तो मजा आया ना… कैसे सब तुमको मौड समझ कर बीहेव कर रहे थे”। वो मुंह बनाते हुए बोली, “सब मुझे बेशर्म समझ रहे होंगे… कैसी लडकी है बिना शादी किए एक लडके के साथ घुम रही है और इसके घर वाले भी वैसे हीं बेशर्म है जो इसको ऐसे भेज देते हैं”। मैंने कहा, “अरे तो फ़िर इसमें गलत क्या है… बेशर्म तो तुम हो ही… अपने भैया से चुदाती हो, और तुम्हारे घर वाले ही सब साले ठरकी हैं हीं, तुम्हारी बहन ट्रेन में अपने भैया से चुदाती है और तुम दो महीना भाई का लन्ड चुसके मजा लेने के बाद एक होटल में भाई से चुदवाने में मजा लेती हो… अब तो सिर्फ़ तुम्हारा रंडी बनना बाकी है… बोल न मेरी बहना, बनेगी एक टौप की रंडी”। वो मेरा आशय समझ गई, और फ़िर मेरी नजर से नजर मिलाकर बोली, “अब क्या बचा है, इतना दिन से अपना इज्जत बचा कर रखे हुए थे, पर आप न मुझे फ़ँसा हीं लिए”, और मेरे होठ चूम ली। मैंने भी उसको चूमा और कहा, “अभी रंडी कहाँ बनी हो मेरी जान… उसके लिए तुमको बेशर्म हो कर सब के सामने चुदाना होगा… तब जा कर रंडी की डीग्री मिलेगी मेरी बहना को… बोल न विभा, कब रंडी बनेगी?” वो चुप रही तो मैंने कहा, “कल से शुरुआत कर दो तो किशनगन्ज लौटने से पहले रंडी की डीग्री मिल जाएगी तुमको, अभी कुछ समय तो हमलोग पुरी में हैं हीं, और यहाँ मौका भी है”। वो करवट बदलते हुए बोली, “अब सोइए, आप अपनी मनमानी किए बिना छोडिएगा थोडे न… कल मेरा काँन्ख का बाल साफ़ कर दीजिएगा, स्लीवलेस पहनने में कैसा गन्दा लगता है, कल अंकल की नजर बार-बार मेरे काँख की तरफ़ जाती थी, जब मैं अपना हाथ उठा कर बाल चेहरे से हटाती थी, अब कल नाश्ते में सुबह उनके घर ही जाना है और और आप सब कपड़ा हीं मेरा स्लीवलेस रखवा दिए हैं।” मैंने भी उसकी पीटः से चिपकते हुए कहा, “अरे तो बढीया है न उस बुढे की लाईफ़ में थोडा रंग तो आया”। फ़िर हम वैसे ही चिपक कर सो गए।

अब बस हम दोनों भाई-बहन और अंकल घर पर थे। मैंने मौका ठीक समझा तो कहा, “अंकल अगर आप बूरा न माने तो एक बात कहूँ…”। मैं और विभा अंकल के सामने एक ही सोफ़ा पर बैठे हुए थे। जब अंकल ने मुझे प्रश्नवाचक नजरों से देखा तो मैंने बेशर्म की तरह कह दिया, “रात में तो हम लोग थक कर सो गए थे, फ़िर सुबह मौका मिला नहीं और कुछ दिन में हम लौट भी जाएंगे… तो क्या करीब आधा घन्टा हम दोनों अकेले एक कमरे में जा सकते हैं”… कहते हुए मैंने विभा की कमर के गिर्द अपने हाथ लपेट दिया। अंकल समझ कर मुस्कुराए और फ़िर कहा, “ठीक है, पर आंटी के आने के पहले बाहर आ जाना…”। मैंने कहा, “बस घडी देख कर आधा घन्टा से ज्यादा नहीं लगेगा”। वो मुस्कुराते हुए हमे अपने बेडरूम में ले गए और बोला, “इस कमरे से बाथरूम अटैच है तो सुविधा होगी बाद के लिए”। मैंने थैन्क-यू कहा और फ़िर विभा को कमरे में खींच लिया। मैंने दरवाजा वैसे हीं छोड दिया, पर अंकल थोडा सज्जन थे, वो टीवी खोल कर बैठ गए। विभा ने दरवाजे की तरफ़ इशारा किया तो मैंने कहा, “चल आ जल्दी से ऐसी ही न रंडी-गिरी की डीग्री मिलेगा तुमको”, और फ़टाफ़ट उसके कपडे उतार दिए। मेरा लन्ड तो कमरे में घुसते समय हीं लहराने लगा था सो मैंने उसको अंकल की बिस्तर पर लिटा कर उसकी झाँटों वाले चूत चाटने लगा, जल्दी हीं उसके मुँह से सिसकी निकलने लगी थी। मैंने फ़िर उसको सीधा लिटा कर चोदना शुरु कर दिया। थप्प-थप्प की आवाज होने लगी थी और मेरे धक्कों पर कभी-कभी विभा के मुँह से कराह निकल जाती… मुझे पक्का भरोसा था कि अंकल को हमारी चुदाई की आवाज सुनाई दे रही होगी। करीब ८ मिनट की धक्कमपेल चुदाई के बाद मैं उसकी चूत के भीतर हीं झड गया और मेरा सब माल उसकी बूर से बह निकला। मैंने अब अपने रुमाल से उसकी चूत पोछी, पर कुछ माल उसकी बूर में भीत्र ही रह गया। फ़िर जब हम कपडे पहनने लगे तो मैंने कहा, “ऐसे हीं बिना पैन्टी के ही जीन्स पहन लो, पैन्टी गन्दा हो जाएगा… अभी जब खडा हो कर चलोगी तो मेरा कुछ पानी तो तुम्हारे बूर से रिसेगा हीं बाहर”। विभा भी मेरा बात मान ली और फ़िर जीन्स सीधे पहन कर अपने पैन्टी को अपने जीन्स की जेब में ठुँस लिया। जब वो उठी तो मैंने देखा कि उसकी बूर का रज और मेरा वीर्य उस बिस्तर पर थोड़ा स लग गया था और करीब एक ईंच व्यास का गीला दाग बना दिया था। फ़िर हम बाहर आ गए, कुल करीब ३८ मिनट हमने लिया था।

अंकल हमे देख कर मुस्कुराए और कहा, “तुम दोनों का चेहरा देख कर लगता है बहुत मेहनत करना हुआ है जल्दी के चक्कर में”, फ़िर विभा को देखते हुए बोले, “इसका तो चेहरा लाल भभूका हो गया है जल्दी से पाने से चेहरा धो लो, वर्ना आंटी को सब समझ में आ जाएगा ऐसा चेहरा देख कर”। विभा तुरंत डायनिंग टेबूल के पास के वाश-बेसीन पर चली गई। हम दोनों मर्द एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराए। अंकल ने मुझे देख कर कहा, “बधाई हो…. मेरे बिस्तर पर लाल दाग तो नहीं लगा दिया”। मैंने कहा, “अरे नहीं अंकल, पहले से भी मेरे साथ सो रही है, ऐसी नहीं है… नहीं तो ऐसे शान्ति से सब होता कि रोना-चीखना भी होता”। मेरी बात सुनकर वो बुढा ठहाका लगा कर हँस पडा। विभा की कमर पर नजर गडाए हुए वो कहा, “इसकी पैन्ट कहाँ गई गुड्डू जी, कहीं बिना पैन्ट उतारे भीतर तो नहीं उसको ठेल दिए…”, अब फ़िर से हम दोनों का जोरदार ठहाका लगा। मैंने कहा, “नहीं, उसकी जेब में है…. अभी पहनती तो गन्दा हो जाता न, सब भीतर ही था जब हम हटे थे”। वो समझ गया और बोला, “बहुत गजब का है वो पैन्ट भी”। तभी विभा अपना चेहरा तौलिया से पोछती हुई वहाँ आई तो मैंने उसको कहा, “डार्लिंग डीयर… जरा अपना पैन्टी अंकल को दिखाओ न, बेचारे के टाईम में ऐसा तो होता नहीं था”। विभा तो शर्म से लाल हो गई पर उसने बिना हिचके अपने जेब से उस छोटी सी लाल पैन्टी को जेब से निकाल कर अंकल के हाथ में दे दिया और उस ठरकी बुढे ने उस पन्टी को ऊलट-पुलट कर खुब प्यार से देखा और फ़िर कहा, “हमारी ऐसी किस्मत कहाँ थी कि ऐसी को लडकी की कमर से उतारते…, कभी फ़ोटो में भी किसी को ऐसी चीज में नहीं देखा”। मैंने तब कहा, “डार्लिंग एक बार अंकल को जल्दी से पहन कर दिखा ही दो, बेचारे को इतनी कीमत तो देनी ही चाहिए, आखिर हम उनका बिस्तर इस्तेमाल किए हैं”। विभा को अपना झाँट को ले कर कन्फ़्युजन था, पर मैंने अंकल को कह दिया, “अंकल असल में बेचारी अपना बाल साफ़ की नहीं है सो ऐसा खुले में पहनना चाह नहीं रही है, वो तो कमर पर ऐसी डोरी दिखाने के फ़ैशन के चक्कर में पहन ली थी”। अंकल को जब मौका मिल रहा था यह सब देखने का तो बोले, “अरे तो कोई बात नहीं है, मुझे तो यह पैन्ट देखना है कि कैसी लगती है बाकी चीज थोदे न देखना है”। उनकी मुस्कुराहट सब कह रही थी तो मैंने विभा को इशारा किया और वो अंकल के हाथ से पैन्टी ले कर फ़िर से कमरे की तरफ़ मुडी तो मैंने कहा, “इस पैन्टी को पहनने के लिए कहीं जाने की क्या जरुरत है, यही पहन लो… वैसे भी जैसे अंकल ने नोटीस किया ऐसे ही आंटी भी तुम्हें बिना पन्टी के देख कर बेचारे अंकल का जीना हराम कर देगी”। हम दोनों हँस पडे और विभा समझ गई कि मेरी इच्छा है कि वो वहीं हमारे सामने पैन्टी पहने। उसने फ़ट से अपने जीन्स की बट्न को खोल कर उसको उतार दिया और उसकी झांटों भरी चूत हम दोनों के सामने थी। मैं खुश था कि विभा मेरा कहा मान कर बेशर्म की तरह मेरा सहयोग कर रही थी। अंकल ने अपनी जेब से रुमाल निकाल कर कहा, “पोछ कर साफ़ कर लो फ़िर पहनना…”, विभा भी आराम से अंकल के रुमाल सफ़ेद रुमाल में अपनी चूत को पोछी और फ़िर अपने फ़ाँक को थोडा खोल कर भी साफ़ किया। रुमाल पर उसकी चूत का गीला पन अपना दाग बना दिया था। फ़िर उसने पैन्टी पहन ली। अंकल की नजर लगातार सिर्फ़ और सिर्फ़ उसकी बूर पर थी। विभा ने फ़िर जीन्स पहन लिया तब जा कर अंकल को होश आया। वो अब आराम से बैठे और कहा, “थैन्क यू”, उनकी साँस गर्म हो गई थी और वो रुमाल को ले कर अपने जेब में रख लिए। मैंने कहा, “अब यह रुमाल तो शायद नहीं धुलेगा…”। अंकल ने भी हँसते हुए कहा, “सही कह रहे हैं गुड्डू जी आप, अब यह बिल्कुल नहीं धुलेगा… आज जो हुआ वह रोज थोडे न होता है जिन्दगी में। यह आज का यादगार रहेगा”। हम हम दोनों हँस पडे और विभा मुस्कुरा दी। फ़िर हम बातें करने लगे। करीब १० मिनट बाद आंटी आ गयी और हम सब नाशता-वाश्ता करके करीब ११.३० में अंकल के साथ हीं उनकी गाड़ी से निकले, वो हमें होटल में ड्रौप करते हुए औफ़िस चले गये। विभा रूम में पहुंच कर नकली नाराजगी दिखा रही थी कि मैंने क्यों ऐसा व्यवहार किया था अंकल के सामने। फ़िर उसने कहा कि अब वो सोएगी, तो मैंने भी उसको परेशान नही किया और सोने दिया। वो बेड पर सो गई और मैंने टीवी खोल लिया। फ़िर आधे घन्टे बाद मैं भी अलग बिस्तर पर सो गया।

करीब दो घन्टे बाद तीन बजे हम दोनों लगभग साथ साथ उठे। विभा ब जिद करने लगी कि अब मैं उसका बाल बना दूँ, वर्ना वो मेरे साथ कहीं नहीं जाएगी। मैंने भी रुम सर्विस को चाय का आर्डर करते हुए हाँ कह दिया और फ़िर मैंने बाल्टी में पानी गर्म करने को लगा दिया, कहा कि दो मिनट रेजर को पानी में उबाल देता हूँ, नया ब्लेड नहीं है अभी… तुम तब तक तैयार हो जाओ”। वो खुश हो कर बिस्तर से उठी और चट से अपने कपडे उतार कर नंगी हो गई। ऐसे उसको नंगी होते देख कर मुझे खुशी हुई, विभा सेक्स का खेल खेलने मे अब थोड़ा खुलने लगी थी। विभा आराम से नंगी बिस्तर पर अधलेटी हो कर अपने झाँटों से खेल रही थी। जैसे हीं मैं रेजर ले कर बाथरुम से बाहर आया कि दरवाजा नौक हुआ, “चाय”, बाहर से आवाज आई। विभा घबडागई तो मैंने चट दुसरे बिस्तर से चादर खींच कर उसपर उछाल दिया और फ़िर दरवाजे की तरफ़ बढा। जब मैंने दरवाजा खोला तो एक १८-२० साल का लडका चाय और बिस्किट की ट्रे लिए सामने खडा था। तब तक विभा चादर से अपने बदन को ढक चुकी थी, हडबडी में उसने चादर लम्बाई के बजाए चौडाई में ओढ ली थी सो उसके पैर लगभग घुटनों तक बाहर हो गए थे, जो उसकी मजबूरी थी वर्ना उसकी चुची उघड जाती। चाय जिस टेबुल पर रखा जाता वहाँ उसने अपने कपडे उतार कर रख दिए थे सो वेटर बिस्तर के बगल में रखे टेबुल के पास जा कर सकपका कर खडा हो गया। विभा अब थोडा संभलते हुए अपना एक हाथ चादर से बाहर निकाली और चादर को अपने गले से नीचे अपनी छाती तक कर लिया और फ़िर ठीक से काँख से चादर को दबा कर अपने एक हाथ को फ़ैला कर कपडे हटाने लगी। उसको अपने काँख के बाल को भी उस लडके की नजर से बचाना था। इसके लिए वो हाथ कम फ़ैलाई और थोडा सा उस दिशा में घुमना भी पड़ा था पर इससे चादर उसके बदन से खिसका और उसका पूरा पीठ और कमर नंगा हो गया। उस लडके की नजर विभा के बदन पर एक बार फ़िसली और उसका हाथ काँप गया। विभा अब फ़िर से हडबडा कर चादर पकडी और फ़िर अपने काँख की चिन्ता छोड कर वो किसी तरह से फ़िर से अपने बदन को ढकी और फ़िर टेबुल से कपडे हटाए तो वेटर चाय वहाँ रखा और फ़िर सकपकाते हुए सर नीचे किए हुए बाहर निकल गया। मैंने हँसते हुए कहा, “क्या से क्या हो जाता है”। वो भी अब चादर बदन से फ़ेंकते हुए बोली, “चाय के बारे में तो मैं भूल हीं गई थी, …. बेचारा क्या सोच रहा होगा”। मैंने कहा, “छोडो साले को… साला का दिन बन गया आज”। फ़िर विभा आराम से नंगी हीं चाय बनाई और फ़िर वैसे हीं मेरे सामने बैठ कर मेरे साथ चाय पीने लगी। मुझे याद आया, मेरी माँ कहती थी कि अगर एक बार लडकी की शादी हो जाते है तो उसमें आत्मविश्वास बढ जाता है, मुझे लगा वो कहना चाहती थी कि अगर लडकी चुदा कर अपना कुँवारापन खो देती है तो उसमें आत्मविश्वास आ जाता है। चाय पीने के बाद मैंने पहले उसकी काँख के बाल साफ़ किए और फ़िर उसकी चूत पर से झाँट को पहले कैंन्ची से काट कर छोटा कर दिया और फ़िर उसकी झाँट को साफ़ कर दिया। उसकी चिकनी चूत एकसम से बदल गई थी। पहले और अब उसकी चूत की शक्ल में कोई तुलना ही नहीं था। वो अब किसी बच्ची के चूत की तरह दिख रही थी साफ़, चिकनी और मुलायम। विभा इसके बाद उठी और नहाने चले गई। मैं भी साथ में हीं नहाने के लिए बाथरुम में घुस गया। नहाते हुए ही मैंने उसको कह दिया कि आज उसको फ़िर से मैं वहीं समूद्र किनारे बालू पर ले जाऊँगा। वो समझ गई और सलवार-सूट पहनते हुए बोली, दुपट्टा काम आएगा वहाँ बालू पर बैठने में। हम करीब ५ बजे कमरे से निकले।

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