छिनाल भाभी

मैं प्रीती, एक भोलीभाली लड़की, बनारस में पली बढ़ी, शादी करके मुंबई आई, हज़्ज़रों सपने आँखों में लिए, एक सीधी साधी लड़की, जो पति को सबकुछ मानती थी, धीरे धीरे किस तरह एक पतिता बनी?
आज पति सतीश, एक मोबाईल की दूकान का मालिक, सुबह ९ बजे घर से निकल के रात को १० बजे घर वापस आना, यह आज १५ साल से रूटीन है.
आज कम से कम ३०से ४० पर पुरुषों जिसमे बूढ़े ,जवान, किशोर, पडोसी, अजनबी, वॉचमैन,दूधवाला,सब्जीवाला, डॉक्टर, साधू, पंडित, दूकान का नौकर, मजदूर, नंदोई का भाई, नंदोई, ननद के ससुर, बहन का ससुर, बेटों का क्रिकेट कोच शामिल हैं, सबके लिंग से अपनी योनि का मर्दन करवा चुकी हुँ. ऐसी तो ना थी मैं? कैसे कब क्यों हो गई? अब कोई ग्लानि या पछतावा नहीं है.
जानना चाहेंगे आप, मन हल्का करने के लिए सब बताना चाहती हूँ, दोनों बेटे भी सतीश अर्थात मेरे पति के नहीं है, सब पंडितजी और तांत्रिक बाबा की कृपा है।
लेकिन सतीश को आजतक पता नहीं चला,
झूठ नहीं कहूँगी लेकिन असल में मेरा नाम प्रीती नहीं है, उससे मिलता जुलता है, पति का नाम भी सतीश नहीं है, लेकिन आप सब समझ सकेनेग की नाम छुपाना पड़ता अहै, हाँ सरनेम पांडे है मेरा , शादी से पहले दुबे थी।

एकदम छिनार हो गए अब मैं, शुरुआत करती हूँ.

बनारस में पली बढ़ी, पाण्डेपुर में ही हमारा दो मंज़िला मकान है, ऊपर किर्रायेदार रहते हैं परिवार के साथ ,नीचे पिताजी की दूकान और हमारे ४ कमरे, माँ, दो भाई, एक छोटी बहन, दादी और चाचा चाची उनके बच्चे पुश्तैनी मकान में रहकर गाँव की खेती बाड़ी संभालते हैं, अब गाँव का नाम पता मत पूछना , मकान भी पाण्डेपुर में नहीं है , थोड़े अगल बगल में ही है, अब एकदम पूरी पहचान नहीं बता सकती, क्या पता कोई जान पहचान वाला पढ़ ले, सतीश मतलब मेरे पतिदेव ही कभी पढ़ लें तो?
हाँ स्कुल वहीँ है, ??? निकेतन विद्या मन्दिर. खैर , पढ़ने लिखने में सदाहरण थी, ना बहुत अच्छी ना बहुत खराब . सुंदर थी, आकर्षक , १२ क्लास तक उम्र १७ साल में आराम से पहुँच गई, दोनों भाई बड़े थे, डिग्री कॉलेज जाते थे उस वक़्त, मैं जवान हो रही थी, भगवान की दया से रंग मेरा बहुत गोरा है, कद ५ फिट २ इंच, इस समय, क्लास १२ में लगभग इससे १ इंच कम रहा होगा, दुबली पतली सी थी मै, अब तो गदरा गई हूँ, अब चलती हूँ तो कबूतरों को टाइट ब्रा में ना रखूं तो ना जाने कितने शिुकारी बाज़ झपट्टा मार लें,
मुंबई की सड़कों पर शाम को सब्जी लेने जाओ तो कम से कम ३ ४ कड़क हाथ चूतड़ ज़रूर दबा देते हैं, कम से कम एक बार और नहीं तो एक कुहनी चूची पे भी कोई ना कोई लगा ही देता है, हमारे देश में नारी की यही कहानी है, थोड़ी बड़ी हुई नहीं कि रास्ता चलना हराम, पति तो सुहागरात में क्या छुएगा उससे पहले इतनी बार सड़कों पर गलियो में चूची और चूतड़ पर कई हाथ पड़ चुके होते हैं, मन करता है ऐसी मशीन लगा के चलें लडकियां कि कोई छुए तो तगड़ा करंट लगे और ठरकी वहीँ करंट से मर जाएं.
खैर स्कुल लड़कियों का था, जवानी तो फूटी ही थी, मन में सपने उमंगें आते ही थे, फ़िल्में, गीत सबकी चर्चा सहेलियीं से होती थीं, १९९४ की बात है, मेरा फेवरेट नया नया फिल्मों में आया अक्षय कुमार था, ऐसे ही पति के सपने देखने लगी थी मैं, जो लंबा हो, घने लम्बे बाल हों, चौडी छाती ही, और मुझे पहाड़ों में लेकर वादा रहा सनम, होंगे जुड़ा ना हम गाये, और कभी रोमांटिक सेक्स का मुद हो तो मुझे पानी की टंकी में उठा कर गिराये और गाये टिप टिप बरसा पानी ,(मेरी शकल रवीना टंडन से काफी मिलती है, ऐसा सभी कहते हैं)
कई सहेलियों के बॉयफ्रेंड बन चुके थे, चुप चुप के चिट्ठीबाजी होती थी, मेरे भी पीछे कुछ आवारा मंडराने लगे, मन ही मन अच्छा लगता था लेकिन दिल तो मैं अक्षय कुमार को दे चुकी थी, ये पता था अक्षय कुमार मेरे नसीब में नहीं है लेकिन कम से कम उसका कोई डुप्लीकेट तो मिले. रही सही कसर सहेलियों ने रवीना कहकर निकाल दी थी और मेरा दिमाग सातवें आसमान पे था, लगता था बनारस के ये पान गुटका चबाने वाले और दुपहिए पे घूमने वाले ओल्ड फैशन के कपडे पहन कर मन्द्रणाने वाले मेरे दिल में नहीं बस सकते,
एक बार हमारे किरायेदार के बेटे जो कि सेकंड ईयर डिग्री में था जिसका नाम अमित पाठक था, उसने बड़ी हिमंत से मुझे रास्ते में रोका और कहा प्रीति मैं तुम्हे बहुत चाहता हूँ ,बचपन से ही तुमसे प्यार करता हूँ, तुम कहो तो तुम्हारे लिए दुनिया छोड़ दूँ, मुझे बड़ी घबराहट हुई , लेकिन मैंने हिम्मत बाँध कर कहा कि ज्यादा बकैती करोगे तो दुनिया नहीं मकान ज़रूर छुड़वा देंगे, वह डर कर चला गया, उसके एबाद कई दिनों तक मेरे सामने आता तो नज़रें नीची कर लेता, ये मुझपर ज़िंदगी में किसिस ने पहला प्रोपज था.
ज़ारी ……..

हाँ जी, आ गई अपना अपडेट लेकर. अमित ने मुझे प्रोपज किया लेकिन मैंने भाव नहीं दिया, बेचारा बहुत घबरा गया, कई दिन तक उसे देखके लगता था कि डर के मारे आत्महत्या ना कर ले. मेरी सबसे पक्की सहेलियां थीं साबिहा और गीता। सबीहा के पिताजी खाड़ी के देश में काम ,करते थे , उसके ३ बहनें और एक छोटा भाई था. वो घर में सबसे बड़ी थी। गीता के पिताजी की लेडिज कपड़ों की दूकान थी जिसमें औरतों लड़कियों के सलवार सूट के कपडे, ब्रा पेंटी, इत्यादि बिकते थे. उसके भी एक छोटा भाई था कुणाल ,जो सबीहा के भाई हसन के साथ कक्षा ४ में पढता था.
हम तीनों सहेलियों की आपस में बहुत बनती थी, कभी से कुछ नहीं छिपाती थीं हम तीनों.
सबीहा अपने सगे चाचा जो कि लगभग २५ साल का था, फंसी थी, और बाद में पता चला कि उसका चाचा सुहेल उसकी माँ को भी छानता था.
गीता हमारे ही कन्या विद्यालय में साइंस पढ़ाने वाले नवजवान मास्टर, विजय त्तिवारी उम्र तक्सीबन २५ साल , जो २ साल पहले ज्वाइन हुआ था उससे फंसी थी और कई बार मैं और सबीहा कमरे के बाहर पहरा देते थे स्कुल में जिसके फलस्वरूप परीक्षा में हमें कभी कोई तकलीफ नहीं हुई. वैसे और भी बहुत सी सहेलियां थीं जिनाक ज़िक्र समय आने पे करूंगी.
हाँ तो ये दोनों मुझे खूब उकसाती थीं कि तू भी किसी की होजा रवीना, अक्षय जब आएगा तब आयेगा. लेकिन मैं अपने पथ से डगमगाती नहीं थी। ऐसा नहीं था कि मेरी इच्छा नहीं होती थी खासकर के जब विजय सर गीता को मस्तराम की किताबें देतें पढ़ने के लिए और गीता हमें देतीँ. घर में अपने कमरे में रात को छुप कर चुदाई पेलाई लंड बुर ये सब पढ़ कर दिमाग भन्ना जाता लेकिन किसी तरह मन पे काबू कर लेते। सबीहा अक्सर कर्मचन्द नामक अश्लील साप्ताहिक पत्रिका लाती जो उसे उसका चाचा देता, उसमें सचित्र कहानियां होती थीं चुदाई की, मुझे मन ही मन पता था कि सबीहा का चचा मेरी सील तोड़ना ,चाहता था, लेकिन मैं काफी चालाक थी और सब अक्षय कुमार जी की कृपा थी। और मैंने स्टारडस्ट नामक मेग्जीन में रवीना का इंटरव्यू पढ़ा था जिसमें उसने कहा था कि मेरा कौमार्य मेरे पति को मेरी ओर से भेंट होगा और मैं चूँकि रवीना को आदर्श मानती थी और उस वक़्त ये हवा थी कि वो अक्षय से शादी करेगी तो मैं भी मन ही मन में संकल्प ले चुकी थी कि मेरी बुर का उद्घाटन भी मेरा पति जो अक्षय कुमार जैसा दीखता होगा वही करेगा.
बनारस में जाड़ा बहुत गज़ब का पड़ता है, गर्मी में तो पसीना से आदमी नहा जाता है. जाड़े का टाइम था , दिसम्बर का महीना , १० दिसम्बर १९९४, मैं रज़ाई में शाम को जाके घुस गई, बड़ी ठण्ड लग रही थी, तभी बहार दूकान के यहां कुछ आवाज़ें आने लगि.
सुनने की कोशिश की तो पता चला की मौसी मौसा और उनकी बेटी संध्या आई है, लखनऊ से. मैं रज़ाई से कूद पड़ी, संध्या मेरी हमउम्र थी पढ़ाई छोड़ चुकी थी, ईसि साल उसकी शादी हुई थी, गौना बाकी था.
ज़ारी …..

मैं राजइआ से कूद कर बाहर की ओर भागी, सामने मौसी दिखीं घर में गलियारे में , मैंने लपक कर उनके पाँव छू लिए, वो मुझे उठा कर गले से लगा ली और मेरे गाल चुम के अपनी उँगलियों को बाँध के मेरी ठुड्डी पर रख कर बोली ” ई प्रीति त सयान होत जात है, अबके जीजा से कहवाके संध्या के गवने में इनहु क बियाह हो जाय ” मैं शर्मा कर बोली ” धत्त मौसी, आप बड़ी गन्दी हैं. ” वो हंसने लगी और आगे की ओर चल दी , पीछे संध्या दीदी थि. संध्या दीदी की उम्र इस वक़्त २० साल की थी, गोरा रंग, चमकदार चेहरा, जैसे खून गाल से चु पड़े कभी भी, मैंने झुक कर उनके पाँव छ्ये , उन्होंने भी उठाकर मुझे गले लगा लिया, और चुम लिया गालों को, मौसा मौसी की ईकलौती संतान थी , बड़े लाड प्यार से पाली थी, मौसा जी लखनऊ में बिजली विभाग में इंस्पेक्टर थे, मैंने पूछा मौसा जी कहाँ हैं, वो बोली बाहर बरामदे में ही बैठे हैं मौसी मौसा के साथ. मैं बोली पाँव छु आउ, बहार गई तो तख़्त पर मौसा जी माताजी भाई बैठे थे, मौसा जी से मैं ज्यादा बात नहीं करती थी, उन्होंने हाल चाल पूछा, मैंने भी बता अंदर आ गई.
संध्या दीदी का हाथ पकड़ कर खिंच कर अपने कमरे की तरफ ले गई , तबतक आवाज़ आई ” अरे पिरीती , मौसाजी के तनो चाह तो पीया दे ” मौसाजी की आवाज़ आई ” नहीं दीदी , अब सिदे खाना खाएंगे” मैं सुनकर संध्या दीदी को अपने कमरे में ले गई, इस बीच मौसी जी बाथरूम में चली गई थीं.
मैं संध्या दीदी को पलंग पर धक्का दिया और कहा” दीदी, जीजा की कोई चिठ्ठी आती है या नहीं छुप के?” ओ बोली धत्त।
मैंने अचानक आने का प्रोग्राम पूछा तो बोली सस्पेंस है कल खुलेगा.
यूँही बातों में रात हो गई, में बड़ी काम चोर थी, मान और मौसी वना बना के सबको खिला पिला एके सोने भेज दिया, संध्या दीदी ज़ाहिर है मेरे साथ सोने वाले थीँ , मैं बिस्तर पर लेट गई और संध्या दीदी दिवार में बानी अलमारी की और बढ़ कर मनोरमा गृहशोभा सरिता ढूंढने लगी, तभी अचानका धम्म से एक किताब गिर पड़ी, मैंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन संध्या दीदी ने उठाई तो हाथ में मस्तराम की किताब! हे भगवान, मैं किताबी आज ही आधा पढ़ के वहीँ छुपा दी थी, मेरे कमरे में कोई आता भी नहीं था, वो पैन पलटने लगी, मेरी तरफ देख के पुछि ये ?मैं घबरा गई, संमझ में अनहि आया दूँ, दर के मारे मेरा चेहरा सुख गया, बड़ी मुश्किल से थूक को हलक से निचे उतार के कहा, ” क्या दीदी?” वो बोलीं ” ये गन्दी किताब” मैंने अनजान बनते हुए कहा” दीदी, मुझे नहीं पता, हो सकता है गृहशोभा आज ही मैंने रद्दी वाले से ली थी उसमें आ गया हो.” वो किताब लेकर मेरे बगल में बैठ गई और पैन पलटने लगी और बोली “सच कह रही है तू?” मैंने तुरंत जवाब दिया” कसम से दीदी ” और रुआंसी हो गई , वो बोलीं कोई बात नहीं,चल देखें तो इसमे?” बीच के पन्नों में ४-५ रंगीन चित्र होते थें, जिसमें अँगरेज़ औरत मर्द की चुदाई की तस्वीरें हुआ करती थीं, वो गौर से देखने लगी , पहली तस्वीर में एक औरत के मुंह में लण्ड था किसी नीग्रो का और वो एक गोर के लण्ड को अपनी बुर में घुसाये हुए थी और गोरे की सिर्फ गोलियां दिख रही थीं, दूसरे पन्ने पर एक औरत कुतिया की तरह घुटनों पे और कुहनियों के बल झुकी थी और एक गोरा आदमी उसके पीछे से उसकी बुर में लण्ड घुसाये हुवा था, उसका अाधा लण्ड बाहर दिख रहा था, तीसरी तस्वीर में एक जवान लड़की एक दूसरी जवान लड़की के होंठ को अपने होंठ में दबा के चूस रही थी और दोनों एक दूसरे की बुर में एक ऊँगली डाली थी और एक दूसरे की चूची ज़ोर से दबाई थीं, दीदी ने कहानी के लिए पहला पन्ना पलटा। कहानी का शीर्षक था ” मास्टर ने सील तोड़ी” अब धीरे धीरे मैं भी नार्मल होने लगी और साथ में कहानी पढ़ने लगी, (कहानि मैं वैसे पहले ही पढ़ चुकी थी), जैसे जैस एकहणै में चुदाई वर्णन होने लगा दीदी की साँसो की आवाज़ आने लगी, दीदी बिस्तर पर लेट गई और रज़ाई ओढ़ ली, दीदी ने मैक्सी पहना था और मैंने शर्ट और स्कर्ट , उसने मुझे कहा तुम भी आजो रजाई में, फिर हम दोनों साथ में पढ़ने लगीं , रज़ाई मजे , मैं दीदी के कंधे पे झुकी थी जिससे पढ़ सकूँ, लेकिन पढ़ते पढ़ते ना जाने कब दीदी का हाथ मेरे स्कर्ट के अंदर जाँघों पर फिरने लगा, मैं समझ नहीं पा रही थी क्या करूँ, तभी दीदी ने मेरा हाथ लेकर अपनी मेक्सी के ऊपर ही अपनी चूची पर रखवा दिया, और मेरी और देख कर बोली ” प्रीति, दबाओ ” मैं भी धीरे धीरे संकोच छोड़ दी और दीदी की दायीं चूची , मेक्सी के ऊपर से धीरे धीरे सहलाने लगी, तभी दीदी का हाथ मेरे बुर के किनारे पहुँच गया, मैंने पैंटी पहनी थी, उन्होंने पेंटी के किनारे से मेरी बुर के उभरे हुए बाहरी भाग को ऊँगली से सहलाना शुरू कर दिया।

अब मेरा शरीर कांपने लगा, क्युकी आज तक मेरे अलावा किसी और का स्पर्श मेरी योनि के आसपास तक नहीं हुआ था, ऐसा महसूस शायद सभी को अपने जीवन में ज़रूर हुआ होगं भले ही वो एक स्त्री का स्पर्श था किन्तु मेरे पास कोई शब्द नहीं है उस फीलिंग को शब्दों में बताने के लिए, इसे ही कहा गया है गूंगे केरी सरकारा, खाइ और मुसकाय। ऐसा सभी के साथ हुआ ही होगा. मैं एकदम से ना जाने किस दुनिया की सैर में पहुंच गई, तभी दीदी ने ऊँगली पेंटी के किनारों से आगे बढ़ाते हुए सीधे सीधे गरम तवे पर रख दिया, हीटर चल रहा था, रज़ाई की गर्मी और सबसे बड़ी बुर में से निकल रही गर्मी, ना जाने पसीना था या बुर से चूता हुआ कामरस, ऊँगली फिसल कर मेरी अक्षुण्ण बुर के मुख्य द्वार पर आ गई, दीदी उसे अपनी ऊँगली से कुरोदने लगीं। मेरी टांगें अपने आप खुल गयी जैसे ऑटोमेटिक दरवाजे के सामने खड़े भर रहने से दरवाज़ा खुल जाता है. अब दीदी की चारों उंगलियां मेरी पेंटी के अंदर थी, और मैंने जोश में आँखें बंद ही बंद उनकी चूची कसकर दबा दी, नतीजे में दीदी ने एक सिसकारी ली और मेरी बुर को मसल दिया, मेरे होंठ मारे स्वर्गिक आनंद के आह की आवाज़ के साथ खुल गए,दीदी ने तुरंत मेरे निचले होंठों को अपने दोनों होठो के बीच दबा लिया, मुझे तुरंत मस्तराम की किताब में चुम्बन ले रही दोनों लेस्बियन याद आ गई और मैंने अब दीदी के मेक्सी में हाथ दाल दिया ऊपर से और सीधे चूची के निप्पल को दो उंग्लियोंज के बीच में ले कर मसलने लगि. और ना जाने कैसे किस अदृश्य ताकत के इशारे पर अपना चूतड़ उठा कर दीदी का हाथ पकड़ कर अपनी पेंटी के उप्र इलास्टिक पे ले गई दीदी समझ गई कि प्रीति को अब पेंटी बोझ लग रही है, दीदी ने उसे सरका दिया, थोड़े एडजेस्टमेंट के बाद पेंटी मेरे झान्नँघों घुटनों से होते हुए एड़ियों तक पहुँच गयी, मैंने पाँव में पाँव फंसा कर पेंटी को खिंच कर यूँ फेंक दिया जैसे सड़क पर किसि के पैर में कोई कचरा लग जाए और वो पैर झटक दे. इस बीच दीदी ने चुम्बन की गति बढ़ा दी, कस कस कर मेरे निचले होंठ को चूसे जा रही थी,मेरा और दीदी का मुंह सलाइवा से भर गया, जिसका आदान प्रदान मुख से होने लगा, ऐसा लगने लगा कि दीदी चुम्बन में एक्सपर्ट है, ( अक्षय जी ने बाद में ऐसा ही चुम्बन ममता कुलकर्णी का सबसे बड़ा खिलाड़ी मूवी में लिया था) फिर अचानक दीदी ने अपनी जीभ मेरे मुंह में दाल दी, मैं समझ गई कि इसे चूसना है, और चूसने लगी, इस बीच दीदी का हाथ अब मेरे बुर की पूरी सैर कर ,बुर के छेद पर दीदी ऊँगली घिस रही थी, और तभी मेरा हाथ खुद बी खुद दीदी के मैक्सी के बीच उनकी टांगों के बीच पहुँच गया, स्पर्श करते ही पहला अहसास हुआ कि बुर पर बाल नहीं हैं, दीदी ने शायद आज ही शेव किया था जबकि मेरे बुर के झांट चंद्रप्रभा जंगल(बनारस के नजदीक का जंगल) की तरह बढे हुए थें, आज तक कभी रेज़र नहीं ,लगा था,
दीदी की बुर की चिकनाई जबरदस्त लग रही थी, बुर पूरी तरह गिल्ली हो चुकी थी, मेरी एक ऊँगली भी उन्हीं की उंगली का अनुसरण करते हुए उनकी बुर के छेड़ को घिसने लगी,

मेरी ऊँगली दीदी की बुर के कामरस से चिपछिपा रही थी, वहीँ दीदी ने जोश में आकर मेरे निचले होंठ को अपने दांतों से पकड़ कर जोर स एकांत लिया, मैं दर्द भरे आनंद से सिसक उठी और मेरी नाख़ून तक की ऊँगली दीदी के बुर के छेद में सरक गई , अचानक दीदी को जाने क्या हुआ, उन्होंने मेरा हाथ रोक लिया होंठ छोड़ दिए, और अपना हाथ भी मेरी बुर से हटा लिया, और मेरे हातो को अपनी चूची से भी हटा दिया. मैं कुछ समझ नहीं पाई मुझसे कोई गलती हुई थी क्या? फिर वो एक किनारे सरक कर अपनी मेक्सी ठीक की और अपनी चूचियों को फिर से मैक्सी में डाल दी , मैंने भी उनका अनुसरण करते हुए पलंग के निचे झुक कर अपनी पेंटी उठा ली और पहनने लगी, दीदी ने टोका” तुम पेंटी पहन कर सोती हो क्या?” मैंने बस सर हाँ में हिला दिया. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझसे कोई भूल हुई थी क्या ? मेरी परिस्थति उस बालक के समान हो गई थी जिसे प्यार से गोदी में खिलाते खिलाते कोई अचानक एक थप्पड़ मार दे, उस बालक को कुछ समझ नहीं आता कि क्या त्रुटि की मैंने? खैर मेरी हिम्मत माहि हो रही थी दीदी को पूछने की, मैं भी बिस्तर पर आ कर लेट गई और रजाई ओढ़ ली, दीदी कुछ नहीं बोल रही थीं, अचानक उन्हेोने किताब उठाई और कहा ” प्रीति, ये किताब तुम कहाँ से मिली? देख झूठ मत बोलना. ” मैं खामोश रही , फिर सर झुका कर बोली” मेरी सहेली ने दिया ” ” उसको कहाँ से मिली?” ” उसको हमारे सर ने दिया” ” क्या? सर ने? अरे, मतलब इतनी बड़ी उम्र का शिक्षक ऐसी हरकतें करता है? मैं बता दूँ मौसी को?” मैं डर से काँप गई, सर उठा कर दीदी की और यादेख कर याचना भरे स्वर में कहा ” नहीं दीदी, प्लीज , मैं मर जाऊॅंगी, ऐसा मत कर्ण.” ” सच सच बता, तूने किसी के सतह सेक्स किया है?” ” नहीं दीदी , मम्मी की कसम, कभी नहीं, लेकिन मेरी सहेलियों ने किया है,” और मैं साड़ी बातें दीदी को बताती कहली गई, सबीहा के चाचा और विजय सर के साथ सबीहा और के सम्बन्ध.
दीदी बोली” तुम लोग पागल हो क्या? कभी कुछ हो गया ऑटो पता है कितनी बदनामी होगी? ज़हर खाके मर जाना पड़ेगा.”
” सॉरी दीदी , मैं सच कहती हूँ मैंने कभी भी ऐसा कुछ नहीं किया न यही करुँगी, तुम्हें वचन देती हूँ, मम्मी की कसम” यह कहते ही मैं दीदी से लिपट कर रोने लगि.
दीदी ने मुझे चुप कराया और माहौल को हल्का बनाने के उद्देश्य से बोली ” चल कोई बात नहीं, अच्छा बता तुझे अच्छा लगा”
” धत्त दीदी ”
” अरे इसमें क्या है, देख मुझे तो अच्छा लगा.”
” फिर आपने रोक क्यों दिया?” मैंने बड़ी ही धीमी आवाज़ में सर झुका कर कहा.
दीदी हंस पड़ी और कही ” अरे ऐसे ही, मुझे भी नहीं पता. वैसे ये सही तो नहीं है लेकिन पता नहीं क्या हो गया था मुझे? अच्छा ये बता तू बाल नहीं बनाती?’
” क्या दीदी , देखो बनाया तो है, कहा के अपने सर के बाल पर हाथ घुमाया।
दीदी खिलखिला के हंस पड़ी” आरी पागल, मैं निचे तेरे जंगल उग आया हूँ उसकी बात कर रही हुँ.”
” धत्त!”
” अच्छा छोड़ , ये बता तुझे कोई पसंद है?”
” नहीं दीदी , मैं तो सिर्फ शादी के बाद ही ये करुँगी, लेकिन दीदी मुझे आपके साथ बहुत अच्छा लगा” बड़े ही धमे स्वर में मैंने कहा. ” मुझे भी , चल एक बार फिर से हो जाए?”
मैं कुछ ना बोली, दीदी मुझे देखती रही फिर आगे बढ़कर मेरे होंठ अपने होंठो के बीच दबा लिए और ज़ोर से दबा के छोड़ दी और फिर हैट गई, बोली बस इतना हि.”
मैंने पूछा” अच्छा दीदी, ये बताओ अचानक कैसे प्रोग्राम बना?”
” आरी कल सुबह का अिन्त्ज़ार कर, सब पता चल जाएगा”
“प्लीज़ दीदी बोलो ना”
” ठीक है, बताती हूँ, लेकिन तू मेरा नाम मत बताना, देख, तेरे जीजाजी हैं ना, उनकी बुआ के देवरानी का परिवार बम्बई रहता है, मेरी शादी में जब बारात आई थी, तो तेरे जीजा के फूफा के साथ उनके भाई भी आये थे, तभी उन्होंने तुझे देखा अतः और तू उन्ही बहुत अच्छी लगी थी, फिर वो बम्बई चले गये. अभी कुछ दिन पहले उन्होंने बम्बई से फोन करके शादी की एल्बम से तेरी फोटो मंगवाई, जो पापा ने भेज दी, तेरी फोटो उनके पुरे परिवार को खूब पसंद आई, उनकी एक लड़की है जिसकी शादी हो गई बम्बई में ही, उनका एक ही लड़का है सतीश, वैसे तो मेरा देवर लगा, उम्र अभी २० साल है, बमबई में, उनकी खुद की टी वि , रेडियो की दूकान है, बम्बई मालाड में, और बुआ जी के देवर का ब्याज का भी धंधा है, महीने की काम से काम ५०००० रुपिया आमदनी है, राज़ करेगी तू मेरी रानी, बम्बई में, तेरे तो भाग खुल गये.”
मैं दीदी की बातें सुनकर कुछ पल के लिए शून्य में खो हगै, मुझे समझने में समय लगा, फिर मैं समझी कि मेरे ब्याह की बात हो रही है, मैं समझ नहीं पा रही थी कि मैं क्या रिएक्शन दूँ? अपने आपको मैं अचानक बड़ी महसूस करने लगी, एक क्षण के भीतर मेरे मस्तिष्क में मेरे बचपन से लेकर आजतक की साड़ी घटनाएँ एक बिजली की तरह कौंध गयीं, क्या मैं सचमुच शादी के लायक हो गयी? यह सोच कर मैं लजा गयी लेकिन किस अनजाने एहसास से मेरी आँखे भर आईं और मैं सुबकने लगी। शायद बाबुल का घर , सखियों का साथ, ये आज़ादी अब बस कुछ दिनों का मेहमान थी , इस विचार ने मुझे कंपा दिया. मेरे मन में यह गीत बज उठा जो हम लोग कई शादियों में गाते थे ” कवन गरहनवा पापा लागे दुपहरिया, हे कवन गरहनवा भिनुसार जी
कवन गरहनवा पापा रउरा पर लागे कब दल उग्रिन होस जी”

“मिली लेहु मिली लेहु संग के सहेलिया, फिर
नाहीं होई मुलाकात।
सखिया -सलेहरा से मिली नाहीं पवलीं,
डोलिया में देल धकिआय।
सैंया के तलैया हम नित उठ देखलीं, बाबा के
तलैया छुटल जाय।”

दीदी ने मुझे पुचकार कर कहा” मुझे भी तो ऐसा ही महसूस मेरी शादी तय हुई थी, अब तो मैं दिन रत गौने का इंतज़ार करती हूँ,” मैं सुन कर हंस दी, दीदी ने कहा” फोटो देखेगी, बम्बई के बाबू की? ” मैंने शर्मा कर कर कहा” मुझे कोई इंट्रेस्ट नहीं है,” ” अच्छा जी, मन मन भावे,मुड़िया हिलावे” दीदी बोलीं” माल पूरा तैयार है और नखरे देखो” कहकर मेरे चूची ज़ोर से दबा दी. मैं चीख पड़ी और मैंने भी उत्तर में उनकी चूची दबा दी. वो बोली लगता है मुड़ बन रहा है?” ” धत्त दीदी, जाओ ना आप भी”
” रुक मै फोटो दिखाती हूँ बम्बई के बाबू की ” कहकर वो उठी और अपने बैग को खोलने लग गयीं। इस बीच मेरे मन में क्या क्या विचार आने लगे, कौन है वो, कैसा है वो? अभी २ मिनट पहले बाबुल के घर छूटने की बात से मेरी आँखें भीग आईं थीं ,अभी तुरंत मेरे मन में एक अजब सी गुदगदी शुरू हो गयी. हे चंचल मन तेरी चतुराई, पल में गम ऐ जुदाई , पल में मजा ऐ चुदाई !
खैर दीदी फोटो लेकर उठी और फोटो को उल्टा रख दिया मेरे सामने और कहा ले. मैंने कहा” मुझे नहीं देखना है ” दीदी ने मेरे कान पकडे और कहा” चल उठा और देख”
मन में तो हो रहा था देखूं लेकिन थोडा नखरा ना करें तो मज़ा कैसा?
ऐसे दिखाया मैंने कि जबरदस्ती देख रही हूँ और फोटो उठा लिया और आँखें बंद कर ली शर्म के मारे, दीदी बोली “आँखें धीरे धीर ेखोलिये, मिस प्रीति द्विवेदि. अब आपके सामने प्रस्तुत है वो इंसान जो आपके जीवन में लायेगा बहार. जो भरेगा आपकी मांग में सिंदूर और जिसके लंड खायेगी रोज़ आपकी बुर”
और दीदी दोनों जोर से खिलखिला कर हंस पढ़ी और मेरी आँखें खुल गयीं
हाथ में पोस्टकार्ड साइज़ का फोटो, कलर, सामने उस व्यक्ति का फोटो जिसके साथ मुझे ज़िंदगी भर साथ निभाना था. फोटो किसी स्टूडियो का था, सावधान की मुद्रा में खड़ा मेरा होने वाला पिया. मूंछे घनी घनी, फुल शर्ट पहने हुए , बैगी पेंट , आँखें छोटी छोटी, बाल छोटे, शकल गौर से देखि, अक्षय कुमार नहीं नहीं ये तो अनिल कपूर जैसा है”
थोड़ी ख़ुशी थोडा गम हुआ, ख़ुशी हर लड़की को उसके होनेवाली पति के फोटो को पहली बार देखकर होती है, रंग गोरा था, शरीर दुबला पतला, चेहरे पर मुस्कराहट नहीं जैसे एक अकडू पना ,गुरुर ,घमंड, रूखापन,दुःख इस बात का कि अक्षय कुमार जी नहीं मिले.
दीदी ने पूछा कैसे हैं?” मैंने कहा ” मुझे नहीं पता” ईसी तरह छेड़खानी में सारी रत बित गई और दोनों सो गयीं।
सुबह सब काम से फारिग होकर पूरा परिवार और मौसा जी मौसीजी संध्या दीदी एक साथ नाश्ते पर बैठे.
मौसीजी ने शुरू किया” दुबे, बात ई हौं के ,,,” और उन्होंने पूरी बात बताई शादी के लिए जो मुझे पहले से ही , लेकिन मैं अनजान बनते हुए देखने लगी और जब भैया माँ और पापा मेरी और देखे मैं भाग कर अपने रू म में जाकर बिस्तर पर गिरकर फुट फुट कर रोने लगि.
थोड़ी देर बाद मेरे कमरे में माँ पापा मौसी मौसा और दीदी आये, माँ ने मुझे उठाया , मैं तुरंत माँ के गले से लिपट कर फुट फुट कर रोने लगी, पिताजी और मौसाजी भी पलंग पर बैठ कर सर पर हाथ रख कर रोने लगे, मौसी और दीदी ने मुझे गले लगा लिया और सब रोने लगे, दरवाज़े पर भैया और छोटी बहन कंचन भी रो रही थीं, सबके हाथ छुड्डा कर मैं अपने पापा के पास भागी और उनकी गोद में लिपट कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी,कंचन और भैया भी अंदर आ गएँ हम सब एक दूसरे से लिपट कर खूब रोये, कुछ देर बाद सब हलके हुए.
मौसी ने कहा ” अभेन पांडे जी हमारे नंदोई जी के साथ तिजहर तक पहुँचेन वाला हैन , तुम सब बचेन एकदम से रेड़ी हो जा.”
सब अपने अपने काम में जुट गए, मैं मम्मी को बोली मुझे सबीहा के घर जाना है उसकी कॉपी देनी है, होमवर्क की , मम्मी बोली ” संध्या को लिवा जा साथे और तुरंते लवट ई या”
मैंने हाँ में सर हिलाया , वाइस ेमुझे शाम को जाना था किताब देने, क्युकी वो सुबह अपने बुआ के घर जानेवाली थी, और आज ११ दिसम्बर १९९४, दिन रविवार था, कल स्कुल में मैं तो नहीं जा पाऊँगी, मुझे पता अतः और तीज हर के बाद घर से भी नहीं निकल पाउंगी, तो सोचा कि अभी ही किताब दे आउन, घर पर उसकी माँ या उसका भाई होगा.
मैंने किताब उठाई और दीदी के सतह तैयार होकर निकल गई, सबीहा अक घर हमारे घर से तकरीबन ४०० मीटर की दुरी पर है, मैं उसके घर पहुंची, जालीदार किवाड़, बस ओंगठाया हुआ था,मैं बेधधक दरवाज़े को खोलकर दीदी का हाथ पकड़ के अंदर आ गयी, घर में घुसते ही दाहिने और का दुसरा कमरा जो सबीहा की मम्मी का था उसमें से हंसने की आवाज़ आ रही थी, मैं रुक गयी, कमरे के बाहर खिड़की थी जिसके पाट लगभग बंद थे लेकिन थोड़ी दरारें थीं, मैंने दीदी की और देखा वो मुस्कुराई और दोनों ने अपनी अपनी आँखें एक एक दरारों पर लगा दीं ,
अंदर का दृश्य: सबीहा की मम्मी पूरी नंगी खड़ी थी , बिस्तर पर उसके चाचा सुहेल जो २३ साल का था दोनों टांगें लटकाये दोनों हाथ सर के पीछे लगा आकर बिलकुल नंगा लेटा था, उसका लंड हमें साफ़ दिख ,रहा था , लंड की लम्बाई बहुत ज्यादा नही थी, लेकिन रंग एकदम काले नाग की तरह काला था, माँ की उम्र तक़रीबन ४० साल की थी, उनका रंग बहुत गोरा था, खूबसूरत थीं, ४० की उम्र की वजकह से पेट निकल आया था, लेकिन दोनों चूचियाँ एकदम टाइट लग रहीं थीं, हालाँकि साइज़ में काफी बड़ी थीं, लेकिन लटकी हुई नहीं थीं,
तभी सुहेल बोला” अब लेबु के बस देखते रेहबु?”
आंटी बोलीं” तोहके खाली मुहं पेलाई चाहे” कह कर वो घटने पर बैठ गए, लंड पकड़ कर कर कुछ देर देखती रही, यहां वहां गोल गोल घुमा के हंसने ;लगी, फिर धीरे से अपने होंठ खोल कर उसका सुपाड़ा होंठों में दबा लिया, हुसैन कच्चा सिस्करिओ लेने लगा”
और अंदर तक ले, गीला कर , थूक मुंह से गिरा”
आंटी ने अब लंड को पूरा मुंह में गप्प से ले लिया, सुहेल चाचा फिर आह आह करने लगा. और उठा कर बैठ गया, आंटी जी पकड़ कर खड़ा हो गया और अपनी कमर हिलाने लगा, उसका लंड आंटीजी के मुंह में घपाघप अंदर बहार हो रहा था, और वो बड़बड़ा रहा था” चूस भौजी,चूस, अपने देवर का लंड चूस, हाँ मोरी रानी, ऐसे चूस , रुक मत आ आ आ चुस्ती जा, तूने मुझे जीते जी जन्नत दिखा दी मेरी जान, मैं कभी शादी नहीं करूंगा, बस ज़िंदगी भर तुझे चोदूंगा , हाँ हाँ हाँ ऐसे ही, जीभ से दबा, आ आ आह।”
अचानक आंटी ने अपना मुंह हटा लिया औअर थूकने लगी, बोली” अब बस, आओ अब पेल लो जल्दी से और भी काम है”
कहा कर वो बिस्तर पर चढ़ गई और घुटनों और कुहनियों के बल आ गाई, उनका चेहरा अब खिड़की की ऒर था, पीछे से सुहेल चाचा आये और झुक कर आंटीजी की बुर को फैला कर देखने लगे फिर शायद उन्होंने उसमें अपना मुंह लगा ड़िया क्युकी हमें वो नहीं दिख रहे थे, अांतजी आँख बंद कर ली, अचानक सुहेल चाचा उठा कर घुटनों के बल पर बैठ गए और उन्होंने अपना लंड आंटीजी के बुर के मुहाने पर रख कर घिसना शुरू किया और बोले” कस लागत है ?” आंटी जी छिड़ कर बोली” डाल अंदर छिनार के जने, तेरी माँ का भोसड़ा, बकचोदी फेर कबहु करिहौ”
मई आंटीजी का ये रूप देख कर दांग थी, कितनी शराफत और नज़ाकत से पेश आती थीं, खैर इस बीच मेरी और दीदी की भी हालत ठीक नहीं थी, हम दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ ली थीं , फिर तभी हुसैन चाचा ने धक्का मारना शुरू किया और आगे दोनों हाथ बढ़ा कर चूचियाँ मसलने लगे, आंटीजी बस आँखें बंद की हुई थी, उनके चेहरे पे कोई भाव नहीं था, और सुहेल चाचा धकाधक पेलता जा रहा था, और बड़बड़ा रहा था” हाय हाय , क्या बूर है तेरी, क्या चुदवाती है तू, हाय हाय, मर गया, तेरे बुर को कुत्ते से चुदवाऊँ, तब तेरी खुजली मिटेगी, रंडी, साली, ले ल लौड़ा ले अपनी बुर में , ले ले ”
अब आंटी शायद जोश में आ गयीं, उन्होंने भी अपनी गांड आगे पीछे करना शुरू वो भी बोलने लगी: हाँ कुत्ते पेल, पेल. मुफत की बुर मिली है, पेल साले, भड़वे, तेरी माँ के भोसड़े में गदहे का लंड जाए,चोद साले, माधरचोद,चोद ,तेरा भाई माधरचोद मुठिया मार रहा होगा और तू उसकी बेगम चोद रहा है, चोद साले साले चोद , बना दे मेरी बुर का भतियान , बहुत खुजाती है साली, मार्के पेल ले, पेल साले, भडुए, अपनी बहन के दलाल पेल, रंडी की नाजायज औलाद पेल, मार धक्का, मार भोसड़ा बना दिया पेल पेल के, माधरचोद अपनी माँ को भी पेल लिया कर कभी, भडुए, गांडू, ,” ये सब सुनकर हुसैन चाचा जोश में आ के अपनी स्पीड ऐसे बढ़ा अडिये जैसे कोई अचानक तेज़ गति से साइकल चलाने लगे और वो भी धक्का मार मार के जवाब देने लगे” हां रे रंडी, तुझे चोदूँ रात रात भर, दिन भर, तुझे अपने दोस्तों से चुदवाऊँ, तुझे अपने बाप से चुदवाऊँ, सरे मोहल्ले सचुद्वऊं, ले रंडी ले सालो,ले मेरा बीज अपनी बुर में भर, मेर र र र रा आ आ आया आया आ या या ,,आ गया आ गया आह आह आह आह ” यह कह कर वो आंटी की पीठ पर गिर पड़े, और आंटी भी अब पेट के बल पर लेट गयी, उसके ऊपर सुहेल चाचा लेते हुए थे एकदम नंगे, दोनों की सांस धौंकनी की तरह चल रही थी। अब मेरी और दीदी की हालत खराब हो गयी, दीदी ने मुझे इशारा किया और हम दोनों बहार दीद मुझे देखकर हंसने लागिन. मैं ज़िंदगीमें पहली बार साक्षात चुदाई देखि, दीदी बोली, दरवाज़ा खटखटा, मैं कुण्डी पीटना शुरू किया, ” सबीहा ओ सबीहा” कुछ देर तक कोई आवाज़ नहीं आयी, अचानक आंटीजी बहार आइन दरवाज़ा खुला यही था औन्होने उसे खोला बोली अरे पिरिटी आओ बिटिया, सबीहा तो घरे नहीं है ”
मैं बोलो ” आंटी ये किताब दे दीजियेगा , कल मैं स्कुल नहीं आ रही”
” अरे ये बिटियासंध्या आई है तोहरे साथ,आव् बिटिया तोहरे बदे नाश्ता कर दू ”
” , चलते हैं कुछ काम है, नमस्ते” तभी पीछे से सुहेल चाचा लुंगी और बैंयां में आये और कहा” अरे प्रीति, आओ आओ, कहाँ जा आरही हो?”
मैंने नमस्ते कहा और वहाँ से चल दिए, छी कितना गंदा आदमी है ये, मेरी सहेली को धोखा दे रहा अहै, मैं रास्ते में ही संध्या दीदी को सब बता दिया.

रास्ते भर मैं सुहैल के बारे में दीदी को बताई क़ि ” वो मुझपर निगाह रखता है लेकिन मैं आजतक सबीहा को नहीं बताई क्युकी मुझे ऐसा लगता था क़ि वो उससे प्यार करता है और शायद मेरी ग़लतफ़हमी हो, सबीहा ने तो हमें यह तक कह दिया था कि वक़्त आनेपर वो सुहैल के साथ भाग कर अपना घर बसा लेगी। लेकिन अगर उसे ये बात पता अचली तो उसका क्या होगा दीदी ?”
” देख प्रिती वही होगा जो ,लेकिन तू इन सब झमेले में मत पड़ना , अगर सबीहा को पता चले तो खुद से, तेरा नाम बदनाम ना हो, और हाँ अब तू सबीहा के घर जाना छोड़ दे. और वो कौन तुम्हारा मास्टर है, वो पहरेदारी और कबूतर बनना बंद कर दे, आज तेरी शादी की बात हो रही है, लड़की जात एक शीशे की तरह होती है, जो एकबार उसपर बदनामी का खरोंच लग गया तो उसे उसके घर वाले ही उठाकर कचरे में फेंक देते हैं, क्युकी कहते हैं न कि टूटे हुए शीशे में शकल नहीं देखनी चाहिए उम्र कम हो जाती है, मर्दों पर यह बात लागू नहीं होती, कुछेक मर्दों को छोड़ कर ९० पर्सेंट मर्द सिर्फ सेक्स के भूखे होते हैं, प्यार भावना और सेक्स में उन्हें अंतर नहीं लगता, औरत प्यार पाने के लिए सेक्स करती है, मर्द सेक्स पाने के लिए प्यार करते हैं, मर्द को सब माफ़ है क्योकि दुनिया में मर्दों का राज़ है तो उन्ही का चलता है, और जिसकी लाठी उसकी भैंस, और मर्द तो अपनी लाठी टांगों के बीच लटका कर भैंस ढूंढते ही रहते हैं ” कहकर हम दोनों ज़ोर से खिलखिला कर हंस पड़ी।
घर आ गया, मौसी ने कहा “अब जल्दी पिरितिया के जाके तैयार कर दे संध्या ”
घर पर अरुण भैया और वरुण भैया बहार से मिठाई , नाश्ता वैगेरा लाने में जुटे थे, कंचन माँ और ऊपर हमारे किरायेदार पाठक आंटी यानी अमित की मां के साथ रसोई में थी, मौसी जी कूद कूद के बरामदे से कभी आँगन,कभी इस कमरे कभी उस कमरे में परिक्रमा कर रही थीं, लग रहा था जैसे आज ही मेरी शादी हो रही है, मौसा जी और पिताजी दूकान पे बैठे थे , अमितवा और उसके पापा पाठक अंकल भी मेरी दूकान पे ही बैठे थे, घर में आते समय अमित मेरी और देख के नज़र झुका लिया, मुझे बड़ी हंसी आई उसकी हालत देख के क्युकी उसे भी पता चल गया मेरे देखने वाले आ रहे थे।
धीरे धीरे शाम के ५ बज गए, मैं साडी पहनकर अपने कमरे में संध्या दीदी के साथ बैठी थी, बाहर हलचल हुई, मैं समझ गई वो लोग आ गए,
दिल धक धक राजधानी की तरह चलने लगा, दिसमबर की ठंडी में बिना हीटर के पसीना निकलने लगा।
संध्या दीदी मेरे पास ही बैठी रहीं, बहार की हलचल हंसी ठिठोली की चल गया कि लोग हैं. कुछ देर बाद मौसी आई बोली ” चल संध्या पिरितिया के लीवा चल ” मौसी के हाथ में नाश्ते की ट्रे थी जो पाठक जी के घर से ,आई थी ,जिसमे दुनिया भर के नमकीन मिठाई, चाय भर दी थी मौसी ने.
मैं उठी औअर संध्या दीदी के साथ जाने लगी, संध्या दीदी मुझे पकड़ कर चलने लगी, मेरे सर पर माथे तक पल्ला था, घर के पिछवाड़े हमारी गाय जहां बांधते थे वहीँ बैठक लगी थी, अलाव ,जला था , भाग्य से बिजली आजकल १२ घंटे रहती थी तो एक बल्ब जल रहा था, वैसे समय तकरीबन साढ़े ५ लेकिन जाड़े में ५ बजे तक सूर्य देवत्ता अपनी किरण को लेकर चले जाते हैं.
मैंने ट्रे रखा तो मौसी बोली ” बिटिया सबके गोड़ लाग ले ” मैं बिना देखे पाँव छूने लगी, संध्या दीदी के फूफा ससुर और मेरे होने वाले ससुर बैठे थे, संध्या दीदी ने सबके पाँव छुएं, मुझे बैठने को कहा , मैं कांपती संंकुचाती कुर्सी पर बैठी, दोनों हथेलियों को कसकर आपस में बांधा था मैंने, सर झुकाये हुए, तभी मेरे होने वाले ससुर उठे और मेरे सर पर हाथ रख कर बोले ” आज से ये हमारी हुई, और मेरे हथेलियों पर एक डिब्बी और एक नारियल एक ५०० का नोट रख दिए,
तभी हमारी गाय रम्भाई, मैंने कनखियों से उसकी ओर देखा, मौसी बोल पड़ीं ” केतना बढियां सगुन हो गएन , गौमाता के भी इ रिसता नगद लागत हैन। ”
मैं वहीँ बैठी रही, यहां वहाँ की बातें चलती रहीं, इस बीच मैंने सारी चीज़ें संध्या दीदी को दे दी, कंचन मेरी गोदी में आ आकर बैठ गयी,
मेरे होने वाले ससुर ने कहा “भाग्य है, खरवांस लगने के पहले ही सब बात तय हो गई”
जैसे मास्टरजी क्लास में पूछते हैं” आया समझ में?” सभी बच्चे एक साथ गला फाड़ के कहते हैं ” हाँ” वैसे ही सबने एक साथ हाँ की हुंकार भरी
फिर मेरे मौसा बोले, संधया अब तुम लोग जाओ कमरे में.
मैं दीदी और कंचन मेरे कमरे में आ गयीं, कंचन डिब्बा खोलनमे की ज़िद करने लग गईं , मैं बिस्तर पर लेट चुकी थी, तभी मौसी और माँ भी आ गयीं, और डिब्बा दीदी से लेकर खोलीं, उसमें से एक सोने की चेन निकली , दोनों तारीफ़ करने लगी मेरे भाग्य की।
दुनिया भर का खान बना , मैंने आटा तक नहीं छुआ था लेकिन मौसी ने सारे खाने पकवानों का कुशल रसोइया मुझे घोषित कर दिया, मेरे ससुर के सामने.
ईसी तरह खान पान होकर सब सो गए, वो लोग आज रात रुकने वाले थे।
मैं और दीदी फिर रजाई में घुस कर सो गए, आज मैंने स्कर्ट नहीं वही साडी पहनी थि. दीदी से बनात करते करते बात सुहैल पर आ गई।
” कुत्ता साला कमीना , शर्म नहीं आती उसे” मैं बोली
” अरे ये सेक्स का नशा यही अहै, देख ना आंटी को भी, इस उम्र में ये रंग, अच्छा सबीहा भी सेक्स की है क्या ?”
” हाँ”
” और गीता ?”
“हाँ”
“तूने गीता और तेरे सर का सेक्स देखा है क्या?”
” नहीं ” अब मैं संध्या दीदी से पूरी खुल चुकी थी ” लेकिन हम लोग दरवाज़े पे पहरा देते थे”
” तो पहली बार तूने असली चुदाई देखि”
“धत्त दीदी , आप भी कैसे शब्द बोल आरही हैं”
“अरे मेरी लाजव न्ती, जब मस्तराम की किताब पढ़ती है, उसमें कौन सा श्लोक लिखा रहता है?”
“दीदी आप बड़ी बेशरम हो”
अच्चाह और किताब है क्या” कह कर मेरी चूची सहलाने लगी ब्लाउज़ के उप्र से
“हम्म ”
“दिखा” हमारे मुंह एक दूसरे के इतना करीब आ गए थे कि साँसे एक दूसरे के नथुनों से टकरा रही थिं.
मैं उठी और चाभी से अलमारी खोली उसमें बड़े जतन से छुपा कर रखी गई ६ -७ किताबों को निकाल कर पलंग पर लेट गयी.
एक रंगीन चित्र वाली किताब दीदी ने उठाई, वही चुदाई के भीषण चित्र।
दीदी पेट के बल पर लेट गई और गौर से चित्रों के देखने लगी फिर, मेरी और देख कर मेरे होंठों पर होंठ लगा कर निचे के होंठों को चूसने लगि.
मेरा हाथ दीदी के ब्लैउज़ पर गया, उन्होंने भी साडी पहनी थि.
दीदी होंठ ऐसे चबाने लगी जैसे कोई बछड़ा गाय का थन पीए.
पता ही नहीं चला कब मुझसे दीदी के ब्लाउज़ के हुक खुल गए, और दीदी की काली रंग की ब्रा पर मेरे हाथ दौड़ने लगे.
इस बीच मुझे यह भी होश नहीं रहा कि दीदी ने मेरे कबूतरों को कबका पिंजरे से आजाद कर दिया अतः, मेरी लाल रंग की ब्रा अब मेरी दूध की तरह गोरी चूचियों के ऊपर थी और ब्लाउज़ का आगे के चारों हुक खुल कर ब्लाउज़ खुली किताब के पन्नों की तरह हो गए थे।
दीदी ने होंठ चूसना छोड़ कर मेरी बायीं चूची के कड़क छोटे भूरे किसमिस को अपने दांतों में दबा लिया. और जीभ के अगर भाग से कुरोदने लगीं , दूसरी हाथ की अंग;ली से दायें चूची के क्सिमिस को सहलाने लगीं।
अब मैंने दीदी के सर के पीछे अपना हाथ रखकर अपनी चूचि पर उनके मुंह का दबाव बढ़ा दिया.
कल रात की अधूरी चुदाई शायद आज पूरी होगी

प्रीती ,में एक अख़बार में उप संपादक हु ,और संपादन करना शोक भी हे और काम भी। मेने अपनी ज़िंदगी में बहुत साहित्य पढा , एक बार xossip पर कहानिया पढना शुरू किया तो सब भूल गयी.लगा की ये भी ज़िंदगी हे ,मुझे ये कहानिया पढ़ कर बड़ा सुकून मिलता,मेरी अभी शादी भी नही हुई और नहीं कभी सेक्स किया ,लेकिन इन कहानियो को पढने के बाद एक राह सी मिल गयी की अपने को कैसे खुद से ‘संतुष्ट’ किया जा सकता हे।
जतिन की एक छोटी सी भूल मेरे द्वारा पढने वाली पहली कहानी थी,वो कहानी मुझे अब तक याद हे उसे पढने के बाद कितनी बार मेने अपने को चरम सुख की दिशा में पाया मुझे खुद को धयान नही ,लगा की इस फोरम पर इससे अच्छी कहानी कोई नही लिख सकता।
लेकिन बाद में त्रिवेणी की ‘भैया का ख्याल रखूंगी में ‘ ने फिर मुझे अचम्भित कर दिया। मेने मस्तराम से लेकर सभी किस्म का लुगदी साहित्य जुटाया और पढा मुझे ये कहने में संकोच नही हे की यहाँ कई प्रतिभावान लेखक हे जो सेक्स को अच्छी तरह से प्रतिभाषित कर सकते हे।
मेने सेक्स तो नही किया लेकिन कई रिश्तो में अवैध सेक्स को देखा ,पहले तो में उसे गलत मानती रही लेकिन अब सोचती हु की कोई न कोई तो बात होती हे जो औरत आदमी ऎसे रिश्तो को बनाता हे।
मेने तुम्हारी ये कहानी पढ़ना शुरू की तो इंट्रो देखकर मुझे लगा की तुमने भी कोई चालू सी कहानी लिख दी हे जिसमे तुम सबके साथ अपने सेक्स की कहानी लिखोगी ,लेकिन में गलत साबित हुई।
तुमने जो लिखा हे वो अतुलनीय हे मेने तुम्हारी कुछ लाइन्स को बड़े संभल कर अपने दिल में रखा हे में कुछ बता रही हु
-सबके लिंग से अपनी योनि का मर्दन करवा चुकी हुँ. ऐसी तो ना थी मैं? कैसे कब क्यों हो गई? अब कोई ग्लानि या पछतावा नहीं है.
– अब चलती हूँ तो कबूतरों को टाइट ब्रा में ना रखूं तो ना जाने कितने शिुकारी बाज़ झपट्टा मार लें,
मुंबई की सड़कों पर शाम को सब्जी लेने जाओ तो कम से कम ३ ४ कड़क हाथ चूतड़ ज़रूर दबा देते हैं, कम से कम एक बार और नहीं तो एक कुहनी चूची पे भी कोई ना कोई लगा ही देता है, हमारे देश में नारी की यही कहानी है, थोड़ी बड़ी हुई नहीं कि रास्ता चलना हराम, पति तो सुहागरात में क्या छुएगा उससे पहले इतनी बार सड़कों पर गलियो में चूची और चूतड़ पर कई हाथ पड़ चुके होते हैं, मन करता है ऐसी मशीन लगा के चलें लडकियां कि कोई छुए तो तगड़ा करंट लगे और ठरकी वहीँ करंट से मर जाएं.
-और ना जाने कैसे किस अदृश्य ताकत के इशारे पर अपना चूतड़ उठा कर दीदी का हाथ पकड़ कर अपनी पेंटी के उप्र इलास्टिक पे ले गई दीदी समझ गई कि प्रीति को अब पेंटी बोझ लग रही है, दीदी ने उसे सरका दिया, थोड़े एडजेस्टमेंट के बाद पेंटी मेरे झान्नँघों घुटनों से होते हुए एड़ियों तक पहुँच गयी, मैंने पाँव में पाँव फंसा कर पेंटी को खिंच कर यूँ फेंक दिया जैसे सड़क पर किसि के पैर में कोई कचरा लग जाए और वो पैर झटक दे
-मिली लेहु मिली लेहु संग के सहेलिया, फिर
नाहीं होई मुलाकात।
सखिया -सलेहरा से मिली नाहीं पवलीं,
डोलिया में देल धकिआय।
सैंया के तलैया हम नित उठ देखलीं, बाबा के
तलैया छुटल जाय।”
-हाँ कुत्ते पेल, पेल. मुफत की बुर मिली है, पेल साले, भड़वे, तेरी माँ के भोसड़े में गदहे का लंड जाए,चोद साले, माधरचोद,चोद ,तेरा भाई माधरचोद मुठिया मार रहा होगा और तू उसकी बेगम चोद रहा है, चोद साले साले चोद , बना दे मेरी बुर का भतियान , बहुत खुजाती है साली, मार्के पेल ले, पेल साले, भडुए, अपनी बहन के दलाल पेल, रंडी की नाजायज औलाद पेल, मार धक्का, मार भोसड़ा बना दिया पेल पेल के, माधरचोद अपनी माँ को भी पेल लिया कर कभी, भडुए, गांडू, ,”
-हां रे रंडी, तुझे चोदूँ रात रात भर, दिन भर, तुझे अपने दोस्तों से चुदवाऊँ, तुझे अपने बाप से चुदवाऊँ, सरे मोहल्ले सचुद्वऊं, ले रंडी ले सालो,ले मेरा बीज अपनी बुर में भर,
-लड़की जात एक शीशे की तरह होती है, जो एकबार उसपर बदनामी का खरोंच लग गया तो उसे उसके घर वाले ही उठाकर कचरे में फेंक देते हैं, क्युकी कहते हैं न कि टूटे हुए शीशे में शकल नहीं देखनी चाहिए उम्र कम हो जाती है, मर्दों पर यह बात लागू नहीं होती, कुछेक मर्दों को छोड़ कर ९० पर्सेंट मर्द सिर्फ सेक्स के भूखे होते हैं, प्यार भावना और सेक्स में उन्हें अंतर नहीं लगता, औरत प्यार पाने के लिए सेक्स करती है, मर्द सेक्स पाने के लिए प्यार करते हैं, मर्द को सब माफ़ है क्योकि दुनिया में मर्दों का राज़ है तो उन्ही का चलता है, और जिसकी लाठी उसकी भैंस, और मर्द तो अपनी लाठी टांगों के बीच लटका कर भैंस ढूंढते ही रहते हैं
बहुत खूब प्रीति अगर तुम छिनार हो तो में भी तुम्हारी जैसी ही बनना चाहूंगी ,सही में आज बहुत मन ख़राब हो रहा हे मेरा

दीदी ने अबी मेरी किसमिस छोड़ कर अपना मुंह खोल लिया और मुंह के अंदर जितनी चूची आ सकती थी लील गयीं। दूसरा हाथ फिर मेरी बुर पर पहुँच गया , बुर के बालों में दीदी की उंगलियां हलके हलके गोल गोल घूमने लगी, ऐसा एहसास हुआ कि शब्दों में वर्णन करना असंभव है। मेरे मुंह से एक आह निकली और मेरी गर्दन छत की और उठ गयी. आँखें बंद, ना जाने कौन से लोक में विचरण करने लगी थी मैं। मन विचारशून्य! शरीर में उठने वाली तरंग ने मस्तिष्क को मौन कर दिया था, अब शरीर और हृदय का सीधा संपर्क हो चुका था। बिचौलिया मस्तिष्क जब चुप हो जाता है तभी मनुष्य के शरीर और हृदय का तारतम्य बैठता है और शायद उसी अवस्था को अ मन कहते हैं.
दीदी उठ कर अब मेरे शरीर पर लेट गयीं, मेरी चूचियाँ ऐसे ही खुलीं थीं, मैंने आँखे खोलीं, दीदी ने मेरी आँखों में देखा, मेरे दोनों हाथ उनके ब्रा पर पहुंचे और मैंने उन्हें दुकान के शटर की भाँती उठा दिया, ब्रा के उठते ही दीदी की गोरी गोरी चूचियाँ जेली की तरह हिलने लगीं। बहुत खूबसूिरत चूचियाँ थीं दीदी की, बनावट जबरदस्त थी, माध्यम साइज़, रंग गोरा, नीली नसें, (बाद में बम्बई में जब पहली बार रत्नागिरी हापुस आम देखा तब उन्हें देखते ही दीदी की वो चूचियाँ याद आईं) माध्यम आकार की, सुडौल , दीदी और मेरी हाइट सामान है, उन्हेोने मेरी आँखों में देखते हुए अपनी चूचियों के निप्पल मेरी चूचियों के निप्पल पर सटा दिए, शाम को दीदी कैसे मुझे उपदेश दे रही थीं, लेकिन इस समय एक कुशल खिलाड़ी की भांति वर्जित काम मदिरा का रसपान कर रही थीं।
कामवासना सोचें तो कितनी छोटी चीज़ है लेकिन देखा जाए तो ब्रह्माण्ड के कण कण में काम ही काम है, सर्वत्र व्याप्त, अग्नि की भाँति , इसलिए हमारी असली संस्कृति में कामवासना की अनदेखी नहीं की गयी है, काम वासना को जीवन का अभिन्न अंग स्वीकार करते हुए खजुराहो जैसे अमर शिल्प और कामसूत्र जैसे अमर ग्रंथों की रचना की गयी है, ब्रह्मचर्य का उपदेश देने वाले साधू मुल्ला पादरियों को काम की देवी के आगे नाक रगड़ते सभी ने देखा है.
पक्षियों के मधुर गीत भी तो काम का निमंत्रण है , वर्षा में मयूर का नृत्य भी तो काम का निमंत्रण है, पुष्पों का खिलना, परागण के लिए आमंत्रण नहीं तो और क्या है ? प्रकृति की इन खूबियों को सुंदरता मान कर मनुष्य पूजा क़रता है, कवितायें लिखता है, चित्रकार बनता है, इसमें काम उसे वासना के रूप में नहीं दीखता , किन्तु , काम जो यदि हृदय से हो तो प्रेम में रूपांतरित हो सकता है, संगीत बन सकता है, फूल की तरह खिल सकता है, पक्षियों की मधुर वाणी बन सकता है, बांसुरी के स्वर बन सकता है, मयूर की तरह नृत्य कर सकता है, किन्तु मनुष्य झूठे मस्तिष्क के जंजाल में फंसकर स्वयं के भीतर छिपे इसी काम की शक्ति को नहीं पहचान पाता , मनुष्य का मस्तिष्क उसे अपना अधीन बनाकर प्रेम रूपी काम को वासना की गन्दी नालियों में बहा देता है. मनुष्य के मस्तिष्क ने काम को समाज के बंधन मे बाँध दिया है, चाहे सही हो या गलत. प्रकृति में काम देव और रति ही स्वाभाविक देवी देवता हैं.क्रोध, अहंकार,मद,मोह,लोभ का कारण वासना है. करुणा ,आनंद ,शान्ति की जड़ प्रेम है. वासना और प्रेम दोनों काम की संताने हैं। दोनों का चरित्र भिन्न है. मस्तिष्क वासना का तो हृदय प्रेम का स्वामी है।
अगर देखा जाए तो स्तन या चुचियाँ ही मनुष्य का स्वाभाविक आकर्षण है, पैदा होते ही पहली चीज़ जो उसके मुंह लगति है वो स्तन ही तो हैं, उससे सुंदर संसार में कुछ नहीं, जीवनदायिनी।
अब कठोर चूचियों के दो जोड़े एक दूसरे से मिल चुके थे, मेरे दोनों अधर हलके से खुल गए जैसे नींद में सोते समय खुल जाते हैं, मेरी आँखे अध खुलीं थी, दीदी की आँखों में लाल लाल डोरे तैर रहे थे, जैसे किसी ने शराब पी ली हो. दीदी ने अपना मुंह मेरे कानों के पास ले गईं , उनकी गर्म साँसे कान में जाने लगी, उफ्फ्फ ,,,,
मेरे मुंह से सिसकारी निकलने लगी, दीदी के दोनों हाथ निचे की और बढे और मेरा घाघरा जो अबतक जांघ तक पहुँच चुका था उसे दीदी ने उपर कमर तक कर दिया, साथ ही अपने घाघरे को को भी कमर तक चढ़ा लिया, मुझे अपना चूतड़ एडजेस्ट ,करना पड़ा, मेरी टाँगे फ़ैल चुकीं थी जितना मैं फैला सकती थी, अब दीदी एक मर्द की भाँति मेरे टांगों के बीच मेथिन, उनकी बिना बाल की बुर, जो अभी तक मैंने देखि नहीं थी, मेरी बुर पर लग गई, सीस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ,,,,,, दोनों के मुंह से एक साथ सिसकारी निकलीं। दीदी का मुंह मेरे कान के पास था उनकी सिसकारी मेरे कान में गूंज के गुदगुदी करने लगि. मेरी कमर उठ गयी और मैंने अपनी बुर को दीदी के बुर से जोर से चिपका लिया, दीदी ने भी उत्तर में उतान ही कसाव किया, जैसे दो सांप मैंथुन में एक दूसरे से लिप्त जाते हैं, हम दोनों भी एक दूसरे के शर्रीर में गूथ गयीं थीं, मेरी टांगें उठकर दीदी की कमर को लिपत गयीं, अगर कोई एलियन (परग्रही प्राणी)जिसे सेक्स के बारे में न पता हो, हमें उस समय देखता तो अपने ग्रह पर जाकर यही कहता क़ि पृथ्वी नामक ग्रह पर एक प्रजाति है जिसके एक सर आगे और एक सर पीछे और चार टांगें और चार हाथ हैं. मेरे बुर के बाल यानी गुप्तकेश यानी झांटें बढे थे और दीदी क्लीन शेव, तो मेरे बाल दीदी की बुर पे गुदगुदी करने लगे, उस गुदगुदी से हंसी तो नहीं लेकिन दीदी के कंठ से एक पक्षी की तरह उन्ह उन्ह की आवाज़ निकलने लगी और उनकी कमर की गति में तेजी आगयी, इस बीच हमारी बुर के घर्षण में दोनों की भगनासा (क्लिटोरिस) एक दूसरे को चूमने लगी, पानी का झरना धीरे धीरे रिसने लगा, मैंने दीदी के सर पे हाथ रखा और उन्हें अपने गले की और ले गयी, दीदी जीभ निकाल कर मेरे गले गर्दन को चाटने लगीं , मेरे हाथ दीदी के चूतड़ों पर पहुंच कर उन की गांड के छिद्र पर पहुन्छ गए, जो अपनी पड़ोसन (बुर) के घर से आ रहे पानी की वजह से खुद गीली हो गयी थी, मेरी ऊँगली अपने आप उनके गांड के छिद्र में हलकी सी घुस गयीं, चिकनाई थी ही, दीदी चिहुंक गए और अचानक जोर जोर से कमर चलाने लगी, और जोश में मेरे होठों को फिर से अपने होटों के बीच लेकर ,चुभलाने लगि.
कभी मैं उन्हें जीभ देती, कभी वो जीभ देतीं, कभी वो चूसती ,कभी मैं, शरीर का एक एक अंग एक स्वचालित यंत्र की भाँती अपना काम खुद किये जा रहा था ,जैसे शरीर ने आज ठान ली थी क़ि वो मार्ग जो जन्म के बाद से बंद है वहाँ से कामवासना का लावा निकाल कर बोझ से मुक्ति ले लूंगा।
और बिलकुल हुआ यही, मेरी बुर भग्नासाओं के घर्षण में इतना उत्तेजित हो गयीं क़ि मस्तिष्क के हॉर्मोन्स को आदेश दे दिया क़ि जितना भी रज शरीर में संगृहीत हैं सब दक्षिण दिशा के अंतिम द्वार ( बुर) तक पहुँचाओ ,अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए मस्तिष्क ने सारे शरीर में जिन जिन कोशिकाओां में कामरस एकत्रित था सबको चिल्ला कर आदेश दिया, जाओ, सारे शरीर की कोशिकाओं ने फिर अपने स्वामी मस्तिष्क की आज्ञा का पालन किया और इस कदर किया क़ि शरीर अकड़ कर एक गठरी बन गया सभी कामरस लीटर के हिसाब से दक्षिण दिशा के द्वार ( बुर) के अंदर निकास द्वार तक पहुँच गए और एक घिस और और सीसीस्स्स्स्स्स्स्स सिस्स्स्स्स्स्स्स करते करते पिशाब की तरह झड झड़ झड़ झड़ झड़ बारिश होने लगी, मुझे मेरी बुर पर मेरे कामरस के साथ साथ दीदी के रजप्रवाह का एहसास भी हो गया, वो भी बुरी तरह से उत्तेजित होकर काँप रहीं थी, दोनों ने जितना बह सकता था बह जाने दिया, आखिरी बून्द तक।
रजाई भी हैरान थी क़ि मैं जो जाड़े में रानी की तरह पूजी जाती हूँ जमीं पर पलंग के निचे क्या कर रही हूँ?
तकिये चददर इस मिलन की वजह से ठंडी में भीग कर काँप रहे थे, दो सुंदर युवा कन्याएं जो टेक्निकली अभी तक वर्जिन थीं, एक दूसरे में लिप्त कर ऐसे साँसे ले रही थी, जैसे मैराथन जितने के बाद विजेता खिलाड़ी घुटनों हाथ रख कर विजय के एहसास में हो किन्तु थकान के कारण हांफने की वजह से ख़ुशी से कूद कर जश्न ना मना पा रहा हो।

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