छिनाल भाभी part 2

पूरी तरह से अपनी कामेच्छा को योनि द्वारा निकाल कर हम दोनों कजिन्स ने अपने कपडे , बिस्तर ठीक किये , पदच्युत हुई अपमान से दुखी रजाई रानी को ससम्मान उनके सिंहासन पर लाकर ओढ़ लिया। मेरा अनुभव रहा है कामी से कामी मनुष्य वीर्य और रज स्खलन के तुरंत पश्चात १ २ क्षण तक काम से घृणा करता है, १ २ क्षण। किसी व्यर्थता का अहसास होता है उसे, एक बार दो लड़के बात कर थे ,कुछ दिन पहले ,मलाड मार्केट बम्बई में , सब्ज़ी ले रही थी , ओवर हर्ड हुआ ” यार , पानी ना निकले तबतक कुतिया भी कैटरीना कैफ लगती है और पानी निकल जाने के बाद कैटरीना कैफ भी कुतिया लगती है ”
सच कहा था।
खैर, दीदी मेरी ओर मुड कर देख मुस्कुराई, प्रत्युत्तर मुस्कान दी।
बोली अब सो जाओ, बाकी बात कल करेंगे।
“हम्म ”
सुबह सुबह जाड़े में धम धम आवाज़ से दरवाज़ा पीटने की आवाज़ आई, बड़ी मुश्किल से आँख खोली, दीदी उठकर दरवाज़ा खोल चुकी थी,मौसी कमरे में घुस कर रज़ाई खिंच ली, ” बहुत सुताई हो गई, उठ अब , घर में मेहमान आवा हैन अऊर इहाँ सुताई होवत हैन . ५ बज गए ”
” ५ बजे कोई उठता है क्या?”
आलस्य तोड़ कर मन ही मन मौसी को कोसते उठी, आधे घंटे में रसोई पहुँच गयी , और धम्म से पीढ़ी पर बैठ गयी, दीदी , मम्मी और मौसी काम में लगे थे। मम्मी गुस्से में बोली” प्रीति , हाथ बटा संध्या का ”
मन में सोचा रात को बटाया तो था , सोच आते ही होंटों पर मुस्कराहट आ गयी मेरे , दीदी की ओर देखा वो भी मुस्कुरा कर आता गूँथ रही थी।
” कस खींस निपोरत हऊ दुनो धिया “( क्यों दोनों लडकियां मुस्कुरा रही हो ?) मौसी ने हाथ नचाकर कहा ” हाथ चलावा ”
यह सुनकर मैं और दीदी दोनों साथ हंस पड़ी। क्यों, आप लोग जानते ही हैं ना?

सुबह दोपहर नाश्ता खाना , बैठक से निवृत्त होकर मेरे ससुर जी दीदी के ससुर दोनों शाम को निकल गए, बस अड्डे तक छोड़ने पापा मौसा और वरुण भईया साथ में गये.
शाम को मौसी ने दरबार जुटाया और घोषणा की कि संध्या के गवने में पिरितिया क बियाह अवर बिदाई एक साथ हो।

रात आई ,दीदी और मैं सोने गए फिर, फिर बातें करने लगें, आज बाते करते सो गए, कुल मिला कर दीदी ने ताकीद दी कि अपनी बुर संभाल कर रखना , सील सुहागरात में ही टूटे, विजय सर और उस मुस्टंडे सुहेल से अपनी मैना बचा कर रखना।

आज स्कुल जाना था, आज मैं अंदर से कुछ बदल चुकी थी, थोड़ा अंजाना अहसास था।
स्कुल में सबीहा और गीता दोनों मिले, क्लास तक खबर पहुंच चुकी थी वाया मम्मी एंड मौसी इन मार्किट विथ हमारी क्लास टीचर श्रीमती कुसुम सिंह।
मैडम हिंदी पढ़ाती थीं, जो थोड़ाबहुत हिंदी का ज्ञान है ,उन्हीके बदौलत है , उन्होंने हमेशा क्लास को हिंदी के उच्च कोटि साहित्य को पढ़ने प्रेरित किया था.
धर्मवीर भारती की गुनाहों का देवता की वो फैन थी, और मुझे भी बना चुकी थीं।
इतर साहित्यिक किताबें जैसे मस्तराम, मुसाफिर, करमचंद, दफा ३०२ ,जवानी का खेल, साठ बरस का जवान , तू झुक मैं डालूं ,मुरझाई कली ,भांग की पकौड़ी, होली में खोली, एक साथ सब आओ, प्यासी भाभी और आगरा, खरी बावरी प्रेस ,मेरठ कचोरी गली बनारस , यहां सब की प्रकाशित भी आसनी से १० से १२ की कक्षाओं में वितरित हुआ करती थीं।
सब विजय तिवारी सर जैसे युवा अध्यापकों एवं सहपाठिनियों के बॉय फ्रेंड्स लोगों की मेहरबानियाँ थिं.
सबीहा और गीता ने श्री सतीश पाण्डेयके फोटो मांग की, मैंने घर पर दिखाने का वादा किया।
दिन भर क्लास में लड़कियों ने छेड़ छेड़ कर मेरा जीना मुहाल कर दिया।
” क्यों रवीना, अक्षय कुमारजी हैं या अमरीश पूरी?”
” अरे नहीं शक्ति कपूर या गुलशन ग्रोवर”
गीता और सबीहा एक सच्चे भांति मेरा बचाव कर रही थीं।
कई लडकियां क्लास में सिंदूर लगाकर आती थीं क्युकी शादी शुदा थीं , ,गवना बाकी था। मेरे आतंरिक सर्वेक्षण और विश्वसनीय सूत्रों सबीहा और गीता के अनुसार हमारी ही क्लास की ६० लड़कियों में से कम से कम २५ अपनी योनि में कम से कम एक बार लिंग को प्रविष्ट करवाईं थीं.
सबीहा और गीता जैसी ४ ५ और थीं जिन्होंने कसम खाई थी कि मात्र ४ दिन छोड़ कर हर महीने में कम से कम २० से २५ बार सफ़ेद स्याही से बुर धोनी है।
सबीहा के चाचा और अम्मी का किस्सा सुनाने बेचैन हुई जा रही थी, मैं गीता को।
स्कुल छुट्ते वक़्त सबीहा ने कहा ” दोनों शाम को घर आओ, कोई नही है आज, ”
गीता खुश हो गई, बोली सर को बोल दूँ आने को, सबीहा ने
हामी दी।
यद्यपि दीदी ने मना किया था किन्तु एक बार चुदाई दृश्य देखने और खुद वर्जित फल की खुशबु लेने के पश्चात मन मचल रहा था, लाइव चुदाई देखने के लिए,
तो तैयार हो गयी मैं भी

घर पहुंची तो संध्या दीदी मौसा मौसी भी तैयारी में थे जाने की। संध्या दीदी एकांत में लेकर धीरे से बोली ” कुछ किताब मुझे दे दे ”
मैं मुस्कुरा कर कमरे में गयी और दरवाज़ा बंद करके सारी किताबें उनके सामने पलंग पर रख दीं।
उन्होंने एक रंगीन चित्र वाली और २ कहानी वाली किताबें छुपा कर रख लीं और मुझे बाहों में भर लिया और कसकर दबा दिया। ऐसा हम बहने हमेशा करती थीं जब भी एक दूसरे से बिदाई का समय आता था किन्तु इस बार इस आलिंगन में बहनों वातसल्य नहीं कामुकता थी। मेरे होंठ खुद ब खुद दीदी के होंठो पर पहुँच गए ,दीदी जैसे इसी की प्रतीक्षा में थीं ,दोनों हथेलियों से मेरे गालों को पकड़ कर मेरे निचले होंठों को ज़ोर होंठों में दबा के चूसने लगीं।
मेरी मदहोशी में आँखें मुंदने लगीं , और मेरा बायां हाथ उनके दाईं चूची को ऊपर से पकड़ कर मसलने लगा, और दायाँ हाथ उनके टांगों के बीच सलवार के ऊपर से ही उनकी पेंटी के किनारे को हटाकर सीधे उनकी बिना बाल की सुंदर योनि के बाहरी दीवारों पर रगड़ने लगी।
गीलेपन का एहसास होने लगा ,तभी उन्होंने भी अपना हाथ मेरी यूनिफॉर्म के शर्ट पर रख कर मेरी चूची मसलना शुरू दीं और मुझे पलंग पर बिठा कर मेरा स्कर्ट उठा दी , अब मेरी पेंटी मेरी बालों से भरी योनि को छुपा रही थीं, दीदी ने बिना पेंटी हटाये निचे से कर एक ऊँगली मेरी कामरस से भीगी योनि पर ले गयीं और सीधे भगनासा को कुरेदने लगीं।
सारे होश ओ हवास खोने लगे थे हम दोनों, तभी मौसी की आवाज़ आयी ” ए संध्या,,,,,,,,”
दीदी हड़बड़ी में उठ गयीं , जैसे सुबह ६ बजे का अलार्म बजे और उसे बंद करके ५ मिनट की नींद लें, फिर स्कुल जाने के लिए कोई चिल्लाये और वो ५ मिनट की नींद टूट जाए ऐसा महसूस हुआ।
दीदी ने जल्दी से दरवाज़ा खोल दिया , तबतक मम्मी आ गयीं, और जल्दी चलने के लिए कहने लगीं।
दीदी का गोरा मुंह, मांग में सिंदूरी रंग का सिंदूर और पीले कलर कढ़ाईदार कुर्ता और सलवार , और इस छोटे से टीजर के बाद उनका चेहरा पूरा लाल हो गया था जैसे लगा कि शरीर का सारा खून उनके गालों में था, गज़ब की खूबसूरत लग रही थी वो उस समय, आज भी वो बहुत सुन्दर हैं।
इस टीज़र से वैसे मेरे भी कान गर्म चुके थे.
“प्रीति, चल, रास्ते में तुझे कुछ बात बतानी है ”
बहार निकले मौसी मम्मी के गले लिप्ट कर दहाड़ें मार मार रोने लगीं , छोटी ंबहन खूब ज़ोर से हंसने लगी उनकी रुलाई देखकर, मम्मी ने डांटा तो संध्या दीदी बोलीं ” उसे क्यों डांट रही हो मौसी? मम्मी हर तीसरे महीने तो मिलती है ऐसे ही रोती हैं, अभी बस में बैठते ही, एक सेकण्ड में बड़बड़ाने लगेंगी ”
सुनते ही मौसा जी समेत सभी ठहाका मारकर हंस पड़े.
” चल लखनऊ पहुंचा जाए तब तोहका बताईं ” मौसी चिढ कर बोली.
बहार आये, देखा पाठक आंटी खडी थीं, अमितवा साथ ही था। मौसाजी बोले” भाई साहब, आप दूकान पर ही रुकें वैसे भी अरुण वरुण हैं नहीं , हम लोग बस अड्डे तक ऑटो रिजर्व करके जाएंगे ”
ना नुकुर के बाद यही फाइनल हो गया। संध्या दीदी अड्डे तक साथ ले जाने की ज़िद करने लगीं। मैं अकेले वापस कैसे आती ?
पाठक आंटी बोली” अमितवा तू चल जा , छोड़ आ ”
बिल्ली को मलाई की रखवाली का ज़िम्मा !
कुत्ता तो तैयार ही बैठा था , बोला” मैं बाइक ले के जाता हूँ ऑटो रिजर्व करवा के आता हूँ और ऑटो के पीछे पीछे बाइक से जाऊँगा और आते वक़्त प्रीति को साथ ले आऊंगा। ”
सब सहमत हुए, मै ज्यादा चिंतित नहीं थी क्युकी मुझे अमितवा की औकात पता थी ।
थोड़ी देर में ऑटो आया , सब बैठ गए, बस अड्डे पहुँच कर सामन बस गया, बस छूटने में आधा घंटा बाकी था, दीदी बोलीं” याद रखना , जो कहा है,और ज़रा जंगल झाडी की सफाई कर लिया कर ”
मैं समझी नहीं फिर बोली ” धत्त दीदी आप भी ”
मैंने नोट किया अमितवा ज्यादा स्मार्टनेस दिखा रहा था ,मौसा और मौसी को इम्प्रेस कर रहा था।
बस छूटने का समय हुआ सब बैठ कर चल दिए, अश्रुपूरित नैनों से दीदी ने खिड़की से हाथ हिलाया, मुझे भी आंसू आ गए।
अमित ने बाइक मोड़ी और इशारा किया , जाड़े की वजह से से अन्धेरा हो चला था और मैंने भी स्वेटर पहना था ,कपड़े कर सलवार और कुर्ता पहना था.
” कुछ खाना है?”
” सीधे बाइक शुरू करो और मुझे सबीहा छोडो ” मैंने डांटने के अंदाज़ में कहा.
वो मुस्कुराया और मैं बाइक पर बैठ गयी।

बाइक की पिछली सीट पर मैं बैठ गयी। अमितवा बोला” मेरा कंधा पकड़ लो”
” तुम चुपचाप बाइक चलाओ , और धीरे से, मुझे कुछ पकड़ने की ज़रूरत नहीं है” मैंने उसे झिड़कते हुए कहा।
उसने बाइक शुरू कर दी, और धीरे धीरे चलाने लगा, ठंड का मौसम था ,मैंने स्वेटर पहना था ,लेकिन बाइक चलने की वजह से थोदी ठंडी फिर भी लग रही थी, तकरीबन २ कि मी बाद वो बोला “अगर तुम्हे एतराज़ ना हो तो मैं चाय पि लूँ ”
“देखो, मुझे सबीहा के यहां छोड़ दो बाद में जो मन आये पि लो , नहीं तो मैं ऑटो लेकर चली जाती हूँ ” मैंने धमकाया।
लेकिन उसने अचानक बाइक रोक दी और थोड़ा कड़क होकर कहा ” एक मिनट रुको “और एक खोमचे की ओर बढ़ने लगा. वहाँ २-३ लड़के खड़े थे, उनसे हाथ मिलाने लगा, उसमें से कुछ मेरिओर देखकर फिर उसकी तरफ देखते और हंस हंस कर बातेकर रहे थे, मुझे बहुत गुस्सा आया, वहीँ एक रिक्शा वाला चाय पीकर अपनी रिक्शा निकाल रहा था, मैं झट से उसपर बैठ गयी और बोली “पाण्डेपुर”
रिक्शे वाले ने रिक्शा चला दी, मैं मुड़ कर देखि अभी भी अमितवा वहीँ खड़ा था, शायद उसने मुझे नहीं देखा जाते हुए। उसके एक दोस्त ने उसे इशारा किया तब वो चौंक कर पीछे मुडा और आवाज़ लगाई ” ऐ प्रीति”
मैंने मुड़कर देखा और रहने दो के अंदाज़ में हाथ उठा दिया और आगे की ओर देखने लगी।
कुछ देर बाद सबीहा केघर के बहार रिक्शा पहुंच चुकी थी, रिक्शे वाले को पैसे दिए और सबीहा के घरके दरवाजे पर दस्तक दी, दरवाज़ा गीता ने खोला , मुझे देख कर मुस्कुराई और मेरे अंदर आते ही दरवाज़ा बंद कर दी। हम दोनों अंदर आये, उसी कमरे में गए जहां सबीहा की अम्मी की चुदाई सुहेल चाचा के साथ देखि थी।
सबीहा वहीँ बैठ के मस्तराम की किताब हाथ में ली थी ,मैं बोली ” क्या सबीहा, आज कहाँ गए सब लोग?”
” अरे ,अम्मी और हुसेन गए हैं खाला के यहां, रात को लेट आएंगे, घर में कुछ मसला है वहाँ ” उसके वाक्य पूरा करते ही दरवाज़े पे देखा तो लुंगी और बनियाइन पहने हुए उसका चाचा सुहेल खड़ा था और मुसकराया, मैं झट से पलंग से खड़ी हो गयी और सबीहा को प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगी.
” अम्मी को छोड़ के आ रहे हैं चाचा”
” फिर हमें क्यों बुलाया ?”
“मेरी जान , विजय सर भी आ रहे हैं, गप्पे लड़ाएंगे बैठकर और क्या?” गीता बोलि. ” मैं कवाब में हड्डी बनकर क्या करुँगी” कहकर मै जाने लगी।
सबीहा बोल” अरे क्या यार रवीना, तुम भी एकदम से ? बैठो चली जाना, घबराओ मत तुम महफूज़ रहोगी ?” कहकर हंस पड़ी, उसकी हंसी में गीता ने साथ दिया , सुहेल चाचा आकर पलंग पे बैठ गया और सबीहा के कंधे पे हाथ रख कर मेरी ओर देखकर गंभीर मुद्रा में बोला” क्यों तुम घबड़ा जाती हो? हम क्या शिकारी बाज़ हैं जो चिड़िया को खा जाएंगे?” और सबीहा किताब ले लि. मैं सचमुच कबूतर की तरह हो गई थी , धक्क से मेरा दिल रुक गया. सुहेल में इस समय पूरा गुलशन ग्रोवर दिखने लगा। अभी कुछ देर पहले जो अमितवा को मैं दुत्कार कर आई थी , सुहेल के सामने मेरी घिग्गी सी बंधने लगी। संध्या दीदी की बात मुझे मान लेनी चाहिए थी ,गीता मेरी मनोस्थति समझ गयी, मेरे कंधे पे हाथ रख कर बोली”
घबरा मत रवीना, तू पागल है क्या? हम तेरे साथ कुछ गलत होने देंगे क्या कभी?”
पता नहीं ये दिलासा भरे शब्द सुनकर मेरे अंदर का भय आंसू बनकर अचानक आँखों से गिरने लगा, और मैं गीता के कंधे पे सर रखकर हिचकियाँ लेकर रोने लगी, सबीहा भी उठ खड़ी हुई ” अरे पगली, डरती क्यों है तू? क्या तू हमपर भरोसा नहीं करती? ”
सुहेल चाचा इस बार थोड़े चिरौरी के स्वर में बोला” क्या प्रीति , बच्चों जैसे रोती हो? हम कोई खा थोड़ी ना जाएंगे?”
गीता ने मुझे पानी का ग्लास दिया और पिने को कहा, मै दो घूंट पानी पी और ग्लास रख दी।
तभी दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई, अबकी सबीहा बहार गयी और कुछ देर में विजय सर आये, वो मुझे देख कर मुस्कुराये और बोले” क्या बात है प्रीति? आप यहां?”
यद्यपि विजय सर पेलाई धकाई का प्रोग्राम करने आये थे, लेकिन भगवन कसम कभी भी मुझसे उनसे डर नहीं ंलगा था, कई बार हमने कमरे के बाहर पहरा ,दिया था , और उन्हें देख कर मुझे एक सुरक्षा का भाव मन में आया और मैं बोली” गीता आज बहुत बेचैन थी बोली, पंडित हो मेरी शादी में मंतर पढ़वा दो ” सुनकर सब हंसने लगे.
माहौल थोड़ा हल्का हो गया, फिर भी मैं खुद को वहाँ पर एक अञ्चहा मेहमान महसूस कर रही थी, मैंः बोली” चलो यार हम जाते हैं, तुम लोग एन्जॉय करो”
विजय सर बोले” अरे चली जाना, बैठ तो लो, मंतर ही पढ़ दो कम से कम ”
सबकी ज़िद पर मैं बैठ गयी, फिर बातें होने लगी , मुझे ये पता चल रहा था ,कि सुहेल चाचा मुझे घूर रहा है लेकिन विजय सर की वजह से मुझे डर नहीं लग रहा था.
अचानक बातों ने स्कुल में श्रीमती भावना गुप्ता नामकी भूगोल टीचर के अवैध सम्बन्ध जो कि श्री ललितप्रसाद कुशवाहा अंग्रेजी शिक्षक के साथ थे, वहाँ मोड़ ले लिया। विजय सर ने बताया कि भावना टीचर के पति को सब पता है,लेकिन वो साला नामर्द है, बीवी की कमाई खाता है इसलिए चुप बैठा रहता है.
सुहेल बोला तो ” साला मउगा ,अपनी तश्तरी में कुशवाहा की मलाई पोंछ के खाता है क्या?” और हंसने लगा. मुझे इन सब बातों से कुछ कुछ उत्तेजना होने लगी थी, यद्यपि मैं दिलखा रही थी कि मुझे अच्छा नहीं लग रहा.
” अरे नहीं, साला वो मउगवा तो मुठिया मारता होगा ” तिवारी सर ने फुसफुसा कर कहा और फिर दोनों पुरुष खिल खिला कर हंस पड़े।
” अरे नहीं असली मर्द ही मुठिया मारता है , सुना नहीं क्या चूत चोदे चुतिया , गांड मारे फ़क़ीर , मर्द वही जो मुठिया मारे, कह गए शाह फ़क़ीर” कहकर सुहेल हमक हमक कर हंसने लगा और सबके साथ मुझे भी हंसी छूट प डी, मैंने अपने दोनों हाथों से अपने मुंह को छुपा कर हंसने लगी .
“एक हमऊ सुनाते हैं , मारो सरका रहो निधड़का , ना होए लड़की ना होए लड़का ” विजय सर ने नहले पे देहला मारा . सबकी ज़ोरदार हंसी छूट पडी ,, मैंने अपने हथेलियों से पुरे चेहरे को धक लिया और हंसने लगी।
आँख खोली तो देखा बेशरम सुहेल ज़ोर ज़ोर से अपनी भतीजी यानी सबीहा की चूचियाँ मसल रहा है, सबीहा दोनों हथेलियों को पलनग पर टिका कर अपनी गर्दन पीछे की ओर झुका दी थी, सबीहा की कमज़ोरी उसकी चूचियाँ थी, जब भी सुहेल उसकी चूचियाँ दबा डेटा था वो चुदवाने के लिए तैयार हो जाती थी ये बात हमें पता थी।
अब भला विजय सर कौन सा पीछे रहते , उन्होंने गीता को पकड़ कर उसके होंठो को चाटना शुरू कर दिया, गीता भी आँखें मूंदे अपना एक हाथ सर के गार्डन के पीछे रख दी, मेरी स्थिति ऐसी हो गई थी कि मैं उठ भी नही पा रही थी और बैठ भी नहीं पा रही थी, द्वंद्व शुरू हो गया, रुकूँ या जाऊं? गीता ने मेरी ओर आँख खोल कर देखा और मुहे बहार जाने का इशारा किया, मैं उठ कर दरवाज़े के बाहर चली गयी और किवाड़ बंद कर दी
” प्रीति, थोड़ी देर वहीँ रुक” सबीहा की आवाज़ आये, मैं गुलामों की तरह मालिक का आदेश पाकर वहीँ थम गयी.
कुछ सेकण्ड में सबीहा बहार आये, बोली” तुझे देखना हो तो यहीं खिड़की से देख लेना और जाने लगना तो खंखार देना, मैं बहार आके दरवाज़ा बंदर से बंद कर लुंगी ” मेरी हाँ या ना का इंतज़ार किये बिना अंदर जाके दरवज़ा लगा दिया, अब मेरे सामने दो रास्ते थे यातो ख ड़ी होकर साक्षात मस्तराम की किताबों के पात्रो का समूह चोदन देखूं, या खंखार कर चली जाऊं।
मन हमेशा वर्जित कार्यों में अधिक रूचि लेता है,मन की विडंबना
फिर बढ़ चला तलातुमे—तूफाने— आरजू
हालांकि डूब कर अभी उबरा नहीं हूं मैं.
फिर दीदी याद आई ,मम्मी पप्पा भैया बहन, हमारे होने वाले श्री अनिल कपूर जी, ” ये गलत है, ये सब पाप है , तेरा सब कुछ सतीश पाण्डेय का है”
बाहर दरवाज़े की ओर कदम बढ़ने लगे, तभी अंदर से फिर आवाज़ आई
पी लोगे तो ऐ शेख जरा गर्म रहोगे
ठंडा ही न कर दें कहीं जन्नत की हवाएं
” चलो देखने में क्या जाता है?” और मैं ओट ले कर खड़ी हो गयी।

सो मुनि मन की दुबिधा खाइ। (जिसने मन की दुविधा छोड़ दी वही असली मुनि है ) मन हमेशा दुविधा में है— यह करूं वह करूं! क्या करूं क्या न करूं! )
मन ने समझाया अरे पगली देखेगी ही ना सिर्फ , कुछ करेगी थोड़ी ना? और मन जीता मैं हारी। खड़ी हो गयी, पिछले ३ दिनों में मेरी ज़िंदगी में एक से एक बदलाव आ रहे थे। खिड़की की दरार में झाँका, सबीहा ने गीता को कहा रवीना खड़ी है वहीँ, गीता ने इशारा किया कोई बात नहीं, सुहेल चाचा अपने काम को पूरी तरह अंजाम देने के मुड में था, वो सबीहा कि चूचियों को उसके कुर्ते के उपर से ही काटने लगा, सबीहा आँखें बंद करके सुहेलचाचा के सर के पीछे पकड़ कर चुचियो पर दबाने लगि. दूसरी और विजय सर ने अपना एक हाथ गीता के कुरते में डाल कर उसकी चूचियों को जोर जोर से मिसने लगे, गीता आँखें खोल कर निर्भाव होकर खिड़की की तरफ देख रही थी, जैसे मुझे आमंत्रण दे रही हो कि आओ और तुम भी इस कामयज्ञ में अपनी आहुति देकर झूठी वर्जनाएं और मर्यादा तोड़कर उस आनंद का भोग करलो जिसे संसार सेक्स के नाम से जानता है, जिसके प्रहार से कोई नहीं बच पाया। जिससे ये प्रकृति चलती है, ये साँसे आती जाती हैं, सिर्फ और सिर्फ इसी काम रूपी ईंधन से.
मैं सम्मोहित सी खड़ी थी, मैंने अपने आपको मेरे मन के हवाले कर दिया। मन का सुभाव सब कोई करै। थोड़ा सा विवेक ने टोका, मन ने विवेक को डांटा और कहा ” मन में इच्छा के उत्त्पन्न होने से पतन नहीं होता ,पतन का कारण है इच्छा के साथ उसका मेल। ईसी मेल से मनुष्य अन्धकार में गिरकर अनेक विक्षेपों को जन्म देकर पतन के रास्ते पर चला जाता है, और प्रीति ऐसी नहीं है, क्या वो आजतक मस्तराम की किताबें पढ़कर भी बहकी? क्या उसे लड़के नहीं मिलते? प्रीति उस सीमा को जानती है, जहां से आगे मर्यादा का नाश है, तो हे विवेक तू सिर्फ जागा रह, जब तुझे लगे कि प्रीति उस सीमा पर आ गई है तब तू उसे बता देना, तबतक उसे नेत्रों द्वारा अपनी काम पिपासा की संतुष्टि करने दे.” विवेक मौन हो गया और मन ने आँखों को कहा” तुम अपने काम पर लगो”
अंदर का दृश्य अब कांति शाह की फिल्मों के ट्रेलर की तरह हो चला था , एक दो तीन , सबीहा पूरी नंगी , सुहेल की लुंगी गायब!
और सुहेल चाचा घुटनों पर बैठकर सीधे सीधे अपने अधरों और जीभ को सबीहा की कामरस से तरबतर बुर पर लगा कर यूँ रगड़ रहा था जैसे कोई बछड़ा गाय का दूध पी रहा हो, उसके दोनों हाथ सबीहा की चूचियों का यूँ मर्दन कर रहे थे जैसे मेरी मौसी भठूरे बनाने के लिए मैदा गूंथ रही थी।
उधर गीता का चेहरा खिड़की की ओर ही था , वस्त्र के नाम पर उसके शरीर पर गले में एक धागा था, दोनों चूचियाँ दो मजबूत हाथों से रगड़ाई जा रही थी, गीता का चेहरा अभी भी भावहीन था उसके दोनों पाँव पंजे पर थे और घुटने मुड़े थे, उसकी बिना बाल की बुर फ़ैल चुकी थी और उसका गीला चिपचिपा योनि छिद्र साफ साफ़ गुलाबी रंग लिए मुझे दिख रहा था, , वही सबीहा आनंद के सागर में गोटते लगाते हुए अपनी टांगों को फैला चूकी थी जिससे उसकी बुर पूरी तरह खुल कर सुहेल चाचा के मुंह के सामने थी, सुहेल चाचा ने खिड़की की ओर देखा ,अपना मुंह हाथ से पोंछा और खुली हुई बुर प् अपना मुंह रख दिया जैसे डिस्कवरी चैनल में लकड़बघ्घे मरे हुए हिरण के मांस में अपना मुंह घुसेड़ देते हैं, और उनके मुंह से शिकार का खून टपकता है, उसी भाँती सुहेल चाचा के मुंह से से सबीहा की बुर का पानी उसके थूक से मिश्रित होकर चु रहा था। चप्प चप्प की आवाज़ निकाल कर वो बुर चाट नहीं चूस चूस के पी रहा था, बहुत ही आक्रामक ढंग से, चार इंसान एक दूसरे के सामने निर्विघ्न भाव से चुदाई में जुटे थे, अवश्य ये पहली बार का सामूहिक चोदन नहीं था।
अभी मेरे लिए आश्चर्य खत्म नही हुआ था, विजय सर आगे की ओर आये उनका लंड बुरी तरह सख्त था, काफी मोटा, लम्बाई उतनी नही लग रही थी लेकिन मोटाई बहुत थी, काला भुजंग, बायोलॉजी के टीचर थे, गुप्तकेश साफ़ थे, सभी के, एक मैं ही थी झाड़ियां लेकर घूम रही थी।
वो पलंग पर बैठ गए और गीता अब घुटनों पर बैठ गयी, गीता के सर को पकड़ कर अपने लंड की ओर ले गए, गीता ने अब आँखें बंद कर लीं , और घप्प से उनका ऊपरी बैंगनी सुपाड़ा मुंह में भर लिया, अब सिस्कारियां विजय सर के मुंह से आनी शुरू हो गयीं वो अपनी कमर हिला हिला कर मुख मैथुन करने लगे, तभी आश्चर्य!
अचानक झुक कर उन्होंने सबीहा की एक चूची अपने मुंह में भर ली!!!!!
मैं सन्न रह गयी, यह मेरे लिए एक ज़बरदस्त धक्कदायक दृश्य था!
सामूहिक चुदाई देखकर मेरे दो जोबन सागर मंथन के समय के पर्वत की भांति डोल रहे थे , कामवासना नामक नाग की रस्सी में फंसकर ,कामेच्छा और मन, देव और असुर की भांति उस वासना रूपी रस्सी से मंथन कर रहे थे, परिणाम स्वरुप मेरे सागर रूपी योनि से अमृत रूपी कामरस झर झर के चुने लगा था , मैं मस्तराम की किताबों के पात्र को साक्षात देखकर अपनी गीली होती बुर में सनसनी महसूस करने लगी थी और अपने आप मेरे हाथ मेरी चूचियों पर पहुंचे थे किन्तु विजय सर का झुक कर सबीहा की चूची मुंह में भरना उर सबीहा का एक हाथ विजय सर के बालों में घूमना, यह देखकर मेरी दौड़ती हुई कामवासना पर आश्चर्य ने ब्रेक लगा दिया, मैं सन्न रह गयी !!!
सुहेल चाचा उठकर अपना लंड ज़ोर ज़ोर से हिलाने लगा और यह क्या उसने सीधे गीता को उसके चूतड़ से पकड़ कर उठाया अब गीता के झुक कर खड़ी थी और उसका मुंह विजय सर के उत्थित लंड को गले की जड़ तक घोंट रही थी ,एक हाथ से वो विजय सर की वीर्य से भरी गोलियां मसल रही थी और दूसरे हाथ से अपने बालों की लट जो बार बार गिरकर उसके और मुंह से लग रही थी, को बीच बीच में ठीक करने लगती थी,
सुहेल इस बीच गीता की बुर पर अपना खतना किया हुआ चिढ़ाती हुई जीभ जैसा मोटे सुपाड़े वाला लंड अपने एक हाथ से पकड़ कर बुर पर रख कर धीरे से कमर पर दबाव बनाते हुए दुसरा हाथ गीता के पीठ पर रख कर धक्का मारा, आधा लैंड गीता की बुर में फक्क की आवाज़ से घुस गया, ( लगता है अंग्रेजी का फक शब्द इसी आवाज़ से बना है), सुहेल कच्चा की चुदाई मैं देख ही चुकी थी, अब मैं भयंकर आश्चर्य की स्थति में थी। दो चार धक्के मारते मारते अचानक विजय सर उठ कर सबीहा की टांगों के बीच में ज़ोर ज़ोर से मुठियातेहुए पहुँच गए और सर्र से सीधा उसकी बुर में एक ही धक्के से घुसेड़ दिया, सबीहा ने लण्ड के स्वागत के लिए अपनी बुर की दोनों फांकोंं को अपने दोनों हाथों की दो दो उँगलियों और अंगूठों से फैला दिया था , जिससे लण्ड राजा बिना किसी रोकटोक के चिपचिपाती गीली बुर के अंदर पहुँच कर हालचाल ले लें, अब गालियोन का दौर शुरू हो गया.
” आह, तेरी चुद मार मार के भोसड़ा बना दूँ गीता, साली क्या बुर है तेरी, कुतिया की तरह पेलवा रही है,हाय तेरी बुर, वाह”
” हम्म हम्म हम्म हम्म आ आ स्स्स्स्स्स्स्स्स्स स्स्स्स्स्स चा चा ,,,,धी रे रे ,,,,आ आ दर्द हो रहा है प्लीज़्ज़ज़्ज़ज़ , हम्म हम्म स्स्स्स्स्स ” गीता के कंठ से दर्द मिश्रित सुखभरी सिस्कारिया आ रही थी।
” हाय मेरी जान , खिलाऊँ तुझे पान , पिला दे अपना दूध , चुदवा ले अपनी चुद ” सुहेल चाचा ने मुशायरे में शायरी मारी।
उधर विजय सर के होंठ सबीहा के होंठ में घुस चुके थे और चपड़ चापड़ की आवाज़ से दोनों एक दूसरे को चूमे जा रहे थे, विजय सर के चूतड़ उप्र निचे हो रहे लण्ड राजा बिना किसी कष्ट के घस घस के सबीहा की बुर में आजा रहे थे,उनकी चुदाई साइलेंट मूवी की तरह थी।
गीता ने अपने दोनोंज हाथअपने चूतड़ों की और ले जाकर पीछे से पानी बुर फैला दी, शायद उसे लंड लेने में दर्द हो रहा था, उसकी चूचियाँ लटक लटक कर झूले की तरह हिली जा रही थी।
उसने फिर खिड़की यानी मेरी ओर देखा ,मैं अभी तक स्तब्ध थी, अचानक सुहेल चाचा बोला” कुतिया बनके पेलवाई है हम लोगों से इतना , गांड कब मरवाएगी , बुर तुमलोगों की ढीली हो जा रही है, आज टाइट छेद चाहिए, इतना कहते ही उसने तेज़ी से अपना लण्ड गीता की बुर से खींच कर निकाला , बुर से लण्ड बहार निकलते ही गीलापन और वेक्यूम की वजह से जोर से फक्क की आवाज़ आयी, अब मुझे धक्का लगा कि गीता की गांड फटेगी क्या???
लेकिन अब जो होने जा रहा था वो बहुत कुछ बदल देने वाला था, सुहेल चाचा तेज़ी से दरवाज़े की ओर लपका , दरवाज़ा खोला और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे ज़ोर से घसीट के पलंडग पर फेंक दिया , इतनी तेज़ी से घटित हुआ कि मैं समझ ही नहीं पाई कि क्या हुआ?
” आज प्रीति क सील टूटे ” सुहेल लण्ड ज़ोर ज़ोर से हिला कर कांपते हुए स्वर में बोला
मरघट का सन्नाटा, गीता वैसे की वैसे ही रह गयी, विजय सर और सबीहा एक दूसरे से गुंथे हुए आश्चर्य से मुंह घुमा कर अचानक अंनपेक्षित हुए इस घटना को देख कर अवाक हो गए,
मेरी स्थति !!! एक क्षण के भीतर मम्मी ,पापा, भैया, संध्या दीदी ,बहन ,मेरे ससुर, पति सबका चेहरा सामने तेज़ी से घूम गया , कल के दैनिक जागरण में वाराणसी शहर के पृष्ठ में छपने वाली खबर मुझे अभी ही दिख गयी , “१२ वी में पढ़ने वाली प्रीति द्विवेदी के साथ सहेली के चाचा ने बलात्कार किया, प्रीति द्विवेदी हस्पताल में नाजुक स्थति में भर्ती, प्रीति द्विवेदी की माँ ने सदमें में जहर खाके आत्महत्या कर ली ,आरोपी सुहले कुरैशी फरार”
काजल की कोठरी में कैसूं ही सयानो जाय, एक लीक काजल की लागिहैं पै लागि जाय.
अब क्या होगा प्रीति?
अब विवेक ने मन पर थूका और कहा ” फंसा दिया ना नन्ही सी जान को? सारे सपने अरमान ,कुचलवा दिए ना? हो गयी तेरी पाशविकता शांत?
मिला है हुस्न ,तो इस हुस्न की हिफ़ाज़त कर,
संभल के चल तुझे सारा जहान देखता है”
मैं फिर से कबूतर की तरह अपने सामने बिल्ली को देखकर स्तब्धत्ता से सन्न हो गयी, एक क्षण वो एक क्षण आज भी मेरी स्मृति में अंकित है, बिलकुल साफ़ साफ़।
” मम्मीइइइइइइइइइइइइ ” , मन अपनी करनी से लज्जित हो गया, विवेक ने मन को दुत्कार कर बुद्धि का उपयोग करते हुए स्वाभाविक बचाव के लिए प्रतिक्रिया की और कंठ द्वारा चीख निकली।

पछ्तावा ही पछ्तावा है!
मन धधकता लावा है!
जब-तब चट-चट करते अंगारों का
मर्मान्तक धावा है!

तालाब किनारे पानी पी रही किसी हिरणी को तालाब के अंदर से झपट्टा मारकर जैसे कोई मगरमच्छ पकड़ ले और उस हिरणी की जो दशा हो जाए ,वही दशा थी मेरी। चीख ली मैं पूरी ताकत से।
सुहेल, पाशविकता का प्रतीक, ने अपनी हथेली से मेरे मुंह को दबा दिया।
” प्रीति, हम तोका बोलत हैन , आज तोहार सील टूटे त टूटे, चाहे कुच्छ हो जाए , चामे क थैली घिस्से से तोहार ज़िंदगी खत्म नाही हो जाए ,आज नाही तो काल ई होबे करी ,एस्स बढ़िया है चुपचाप अपनों मजा लेव और सबके दे , । “(प्रीति, मैं तुझे समझा रहा हूँ ,आज तेरी सील टूटनी ही है,चाहे जो हो जाए , चमड़े की थैली घिसने से तेरी ज़िंदगी खत्म नहीं हो जायेगी, आज नहीं तो कल ये हो गा ही, इससे अच्छा है कि चुपचाप खुद भी मजा ले और सबको दे, ) सुहेल चाचा की आवाज़ में बर्फ जैसे ठंडे पन ने उसकी धमकी को और भयानक बना दिया। मैं अपने मुंह पर हुए उसके हाथ के दबाव से उसकी मंशा को समझ रही थी कि अगर आज उसे मेरा शरीर भोगने नहीं मिला वो आज हत्या भी कर सकता है ।
मेरी आँखें लाचारी में भीग आईं, सुहेल की आँखों में बहते कामाग्नि के पिघलते लावा की ओर मैं और देख ना पायी और आँखों की पुतलियाँ विजय सर और सबीहा की ऒर घूम गयीं जो अभी तक एक दूसरे से लिपटे हुए थे।
” छोड़ सुहेल , हाथ हटा ” गीता ने सुहेल की बांह पकड़ कर खींचा और मेरा मुंह आज़ाद हो गया.
“साली रंडी ” सुहेल ने गीता को एक तमाचा खिंच कर मारा , इस अप्रत्याशित हमले से गीता सन्न हो गयी ,तभी विजय सर उसी अवस्था में उठे और सुहेल की बनियान का कॉलर पकड़ कर ज़ोर से खिंच कर उसे धक्का दे दिया। सुहेल मरियल सा दुबला पतला था, धड़ाम से गिर पड़ा , ” तेरी माँ का माधरचोद ,मेरे पे हाथ उठता है ” सुहेल गाली बकते हुए उठने लगा ,विजय सर ने एक लात खिंच कर उसके पेट पर जमा दी.
वो फिर चित्त हो गया। तभी सबीहा उठी उसी निर्वस्त्र दशा में और सुहेल के पास जाकर घुटने मोड़ कर बैठ गयी और रोते रोते बोली ” तुमने मेरी ज़िंदगी खराब की, मेरे साथ ज़बरदस्ती की, मुझे चुप कराने के लिए मुझसे शादी का वादा किया ,तुम्हारे प्यार में तुम्हारी हर बात मानी , इस पाप में विजय सर और गीता को भी शामिल किया और वो भी अंधे हो गए , तुमने और विजय सर ने वादा किया था कि तुम दोनों हम दोनों से ही शादी करोगे और आपस में हम लोग एक साथ खुश रहेंगे, हमारा प्यार जिस्मानी नहीं है, तुम दोनों ने वादा किया था, ये प्रीति कैसी भी है लेकिन आज तक इसने किसी भी लड़के को भाव नहीं दिया, इसको हमपर इतना भरोसा है कि हमारी हमराज़ है, आजतक बाहर की दुनिया में किसीको भनक तक नहीं लगने दी, और हम दोनों कैसी भी हैं , इस गरीब का भरोसा हम नहीं टूटने देंगे ,समझे?”
तबतक गीता ने अपने कपड़े पहन लिए थे और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे गले से लगा लिया, मैं फुट फुट कर रोने लगी।

मगरमच्छ के मुंह में फंसी हिरणी को कोई फ़रिश्ता जानवर आकर मगरमच्छ को मारे और हिरणी कुद कर किनारे पर आजाये और उसे जो सुरक्षितता का अनुभव हो वही अनुभव मुझे हो रहा था।
मैं आँखे खोल नहीं पा रही थी, मेरे आंसुओं से गीता के कंधे भीग गये.
तब तक विजय सर और सबीहा का भी स्पर्श मुझे मेरे सर और पीठ पर महसूस हुआ, मैं सबीहा से लिपट कर और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी।
” चुप हो जा पागल, अब बस कर , चुप एकदम चुप ” सबीहा भी रो रही थी।
” सबीहा , आज मैं तुझे बता रही हूँ ये इतना निच है इसने चाची को भी फंसा लिया है, मैंने अपनी आँखों से देखा है ” मुझे लगा कि ये रहस्योद्घाटन सबीहा को हिला देगा, और एक नया भूचाल आ जाएगा ,किन्तु सबीहा ने रुंधे स्वर में कहा ” उसी ने तो अपनी वासना पूरी करने के लिए मुझे इसके हवाले किया, उसकी आग ठंडी होती रहे उसके बदले में इस सुहेल ने मेरे बदन की मांग की और उसने बिना कुछ सोचे समझे मुझे इसके आगे फेंक दिया , गीता को ये पता है ,विजय सर को ये पता है, अब तुझे भी पता चल गया, लेकिन हम तेरे साथ वो नहीं होने देंगे जो मेरी माँ ने मेरे साथ किया ”
ये मेरे लिए ज़ोरदार झटका था, मतलब सबीहा की तो ये हालत थी
दिल में है जो दर्द वो दर्द किसे बताएं! हंसते हुए ये ज़ख्म किसे दिखाएँ!

कहती है ये दुनिया हमे खुश नसीब! मगर इस नसीब की दास्ताँ किसे बताएं!

भर गया है जहर इतना आदमी में
आस्तीं के सांप की औकात क्या है

खून के रिश्ते भी बेमानी हुए हैं
सुर्खियाँ बाक़ी कहाँ हैं अब लहू में

मेरे मन मस्तिष्क में विचारों की श्रृंखला प्रारम्भ होने लगी
“कैसी दुनिया है ये? काम वासना का ज्वार जब आता है तो मान मर्यादा की सीमाएं तोड़ कर रख देता है।
“सबीहा , ऊफ़्फ़ किस ग़म में, दर्द में जी रही है ये? और कैसे हालत से समझौता करके? क्या ये दुनिया काम वासना की धुन पर इस तरह ता ता थैया करती है, थू इस काम वासना पर, खबरदार है , कसम है तुझे, कोई अश्लील साहित्य छुएगी भी नहीं तू ,मर जाना जो आज से अपनी शादी तक इस बारे में सोचा भी तो !” मन था मस्तिष्क था या हृदय ? कौन बोल रहा था? प्रतिज्ञा कौन लेता है? मन, मस्तिष्क या हृदय ?किसकी प्रतिज्ञा अक्षुण्ण रहती है?
मैंने आँखे खोली सबने कपडे पहन लिए थे, विजय सर का हाथ मेरे सर पर था , मैंने उनकी ओर बड़ी कृतज्ञता से देखा , उन्होंने आँखों ही आँखों में मुझे ढांढस बंधाया , मेरी नज़र नीचे की ओर गयी ,सुहेल अब अंडरवियर पहना था और उसके दोनों हाथ घुटनों पर थे, सर नीचे ज़मीं की तरफ.
फिर धीरे से उसने अपना सर उठाया और कहा” प्रीति, हमें माफ़ कर दे , हमसे गलती हो गयी। ” कहकर वो फिर ज़मीं ताकने लगा।
मैंने कोई जवाब नहीं दिया और सबीहा को कहा” अब मैं घर जाती हूँ ”
विजय सर “बोले चलो हम तुम्हे छोड़ आएं, चलो गीता ”
गीता ने शीशे में अपना मुंह देखा, बाल ठीक किये और कहा , चलो।
दरवाज़े तक सबीहा भी साथ आयी, हम दरवाज़े पर पहुंचे ही थे कि दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आयी.
विजय सर ने दरवाज़ा खोला, सामने अमितवा मुस्कुराता हुआ बाइक की चाभी अपनी ऊँगली में फंसा कर घुमा के मुझे देखने लगा।
” और तिवारी, सब ठीक? यहां कैसे ?” विजय सर को देखकर मुस्कुरा कर पूछा।
एक और झटका ???
जैसे रंग उड़ता है मेरे चेहरे का, हर तहय्युर पे,
और दिखता नहीं किसी को

“बस बाबा की कृपा है, तुम बताओ पाठक ? इधर कैसे?” विजय सर ने अमितवा की आँखों में आँखें डाल कर जवाब दिया।
” अरे ये प्रीति के मकान में ही तो हम रहते हैं , इनकी मौसी आई थीं , उन्हीं को छोड़ने गए थे साथ, वापसी में थोड़ा सोचे थोड़ा चाय पी लें तो ये मेडम रिक्शा लेकर चली आईं ! अब आकर गुलाबजामुन बंधवाया है,.इनकी अम्मा मंगवाई थीं , ये कही थीं कि सबीहा के घर जा रही हूँ, तो आ गया लेने। ”
” हम चले जाएंगे, तुम जाओ, हम आ जाएंगे ”
मैंने बडे आराम से बिना झिडके उसे उत्तर दिया , क्यूंकि मेरे मन में अब ये डर था कि कहीं इसे पता न लग गया हो अंदर चल रहे खेल के बारे में , तो मैं टोह ले रही थी।
” हम्म। तिवारी, बताये नहीं क्या कर रहे हो यहाँ मियां के घर ?” और गुटके में लिपे पुते हुए अपने पीले घिसे पथ्थरों को चिहार दिया।
” अरे ,ये सबीहा हमारी स्टूडेंट है, इसकी अम्मी बुलाई थी ट्यूशन की बात करने के लिए और खुद गायब हो गयी , बताओ , अब हमें भी देर हो रही है , चलो ”
अनुभवी ड्राइवर बड़े आराम से बिना हड़बड़ाहट के धुंध भरे मौसम में गाडी चला लेता है वैसे ही विजय सर ने बड़े आराम से स्थिति को सम्भाल लिया ।
मुझसे तो अवश्य गाडी ठुक जाती।
” चलो , हम भी चलते हैं ” तिवारी सर ने कहा।
“गीता और मैं साथ में जाएंगे , आप चिंता ना करें, ५ मिनट दुरी पर ही तो है घर , और वहाँ से ५ मिनट गीता का घर ”
” ठीक है ” विजय सर बाइक पे बैठ गए और कहे ” चलो तुम लोग हम पीछे पीछे आते हैं ”
सबिहा ने हमे बाय किया और मैं साथ चलने लगे।
” प्रीति , हमें माफ़ कर देना। हम लोगों की वजह से आज तुम पर पर बहुत गलत बीती। ”
” ठीक है गीता। कोई बात नहीं। तुम्ही लोगों ने तो बचा भी लिया। लेकिन ये बात आजतक तुमलोगों कभी बताई ही नहीं कि तुम लोग समूह में मतलब …” मैंने हिचकिचाते हुए पूछा।
” बताती हूँ ” गीता बोली ” सब विस्तार बताती हूँ ”
( गीता ने घटना का वर्णन मात्र ५ मिनट में घर पहुँचने तक पूरा कर दिया था मुझसे, जिसे अब मैं थोड़ा मस्तराम स्टाइल में कल्पना करके गीता की जुबानी लिखूंगी ताकि थोड़ा कहानी का मूड और माहौल भी बदल जाए और आप लोग भी थोड़ा एन्जॉय सकें। )

अब गीता की जुबानी
” प्रीति, सितम्बर में जब तू १ हफ्ते के लिए अपने गाँव गयी थी, उस समय की बात है। तब तक तो तुझे पता ही है कि हम सभी के रिश्ते क्या थे? ये जानते हुए भी कि मेरे और विजय सर के बीच सब कुछ हो गया है, तुम लोगों ने कोई बात लीक नहीं होने दी। एक दिन सबीहा ने मुझे और विजय सर को घर पर बुलाया क्युकी सबीहा की मम्मी और भाई बहन भी ३ दिन के लिए गाँव जा रहे थे , तो मैं उसके घर पहुंची , और उसकी मम्मी और बहनों को लेकर सुहेल स्टेशन गया था।
हम लोग इधर उधर की बातों में लगे थे कि विजय सर भी आ गये।
चाय नाश्ता हुआ। हंसी मजाक होने लगा, तुम्हे सबीहा की आदत तो पता ही है बोलने लगी “सर , आज तक मैंने स्कुल में आपकी खूब चौकीदारी की है, आज घर में भी कर देती हूँ,” कहकर वो बाहर चली गयी। और किवाड़ की कुण्डी लगा दी।
हम दोनों बहुत प्यासे थे सो विजय सर ने आव देखा ना ताव सीधे मेरे होंठों को अपने होंठो के बीच दबा कर लपालप चूसने लगे।
मैंने भी आज ही ” बाल धोये ” थे, ४ दिन की भूखी थी। हाथ मैंने सीधे डायनासोर पे रख दिया। डायनासोर ४ दिनों से जुरासिक पार्क में नहीं जा पाया था सो उसे जल्द ही उसके पिंजरे से निकालना ज़रूरी था , मैंने पिंजरे को बंद की हुई चेन खिंच दी तो आशा के विपरीत दुसरा पिंजरा गायब था , तो सीधा लपलपाता हुआ डायनासोर हाथ में आ गया।
“अंडरवियर नहीं पहने हैं क्या?” मैंने बहुत सेक्सी अंदाज में पूछा।
“नहीं मेरी जान , ४ दिन से साहब सिर्फ जमाखोरी कर रहे है , आज पता था कि साहब को घूमने जाना है सो क्यों बंधक बनाऊँ ?”
“मैं भी तो आज बहुत गर्म हो चुकी हूँ, आज मुझे ऐसे रगड़ना कि ४ दिन चल ना पाऊँ।
अगर असली मर्द हो तो आज मेरी दीवारों को अपने केमिस्ट्री लैब के सारे अमोनिया से इतना सींच देना कि मुझे अपनी किले की दीवारों से चुते हुए अमोनिया को सुखाने के लिए एक हफ्ते केयरफ्री पहन कर घूमना पड़े।”
“आअह्ह्ह्ह्ह्ह अह्ह्हह्ह गीता , ऐसी बात मत कर, ४ दिन से अंदर दूध जम गया है , गाढ़ी लस्सी बन गयी है, १ मिनट में नहीं निकला तो नसों को फाड़ कर बाहर निकल जायेगी लस्सी।”
मेरी बीच की ऊँगली डायनासोर के मुंह के छिद्र को कुरेद रही थी , जैसे विजय सर की उंगलियां मेरे जुरासिक पार्क के दरवाज़े पे घूमती हैं।
“गीता , ४ दिन की लस्सी है, ऊँगली से मत निकाल , पी ले मेरी रानी, ताज़ा माल तेरे लिए बचा कर रखा है, वर्ना नाली में बहा देता , इसकी कदर कर छिनार।”
“अरे , मेरे भड़वे , ऐसा मत कर , गला तर कर लूँ पहले फिर अपने राजा को आराम से जुरासिक पार्क जाउंगी।”
कहकर मैं पलंग पे बैठ गयी और लटकते खंजर के म्यान को ज़ोर से खिंच कर पीछे कर दिया ,
विजय सर ने दर्द से आह भरी और मेरे मुंह में ऊँगली घुसा दी, मैं ऊँगली ही चूसने लगी और उनकी आँखों से डायरेक्ट कॉन्टेक्ट कर लिया , उंगलियां मेरी अभी भी डायनासोर की बैंगनी मुंह पर चल रही थीं।
सम्भोग के समय जब आप अपने साथी की आँखों में आँखें डाल कर सभी प्रक्रियाएं करें तो सम्भोग का आनंद परमानंद में परिवर्तित होने लगता है , वही हो रहा था।
मेरे जीभ और गले में ऊँगली ने खुजलाहट बढ़ा दी,मैंने ऊँगली को काट लिया , विजय सर के मुंह से आह निकली और उन्होंने ऊँगली बाहर खिंच ली,
मैंने मौके पे चौका मारा और सीधे लपक कर बैंगनी मुंह वाले डायनासोर को दांतों के बीच दबा कर धीरे धीरे काटने काटने लगी।
आँखें अभी तक अपने जोड़ीदारों से ही बाते कर रहीं थीं।
विजय सर ने अपने पैंट का हुक खोल दिया और सर्र से पेंट एड़ियों तक गिर पड़ा।
मैने डायनासोर के अण्डों को पकड़ लिया जो बहुत भारी थे और झूल रहे थे, मुझे मालुम था लस्सी यहीं जमा है , मुंह इतना बड़ा कर लिया कि साहब पूरी तरह से अंदर आ गए , जब साहब की जड़ तक मुंह में आ गयी तो गेट बंद करके साहब को पुरे मुंह में कस कर दबा दिया और ढेर सारा थूक अपनी जीभ से निकाल कर उन्हें अंदर ही भिगो कर थूक से लबालब कर दिया।
एक हाथ अंडे मसलते जा रहे थे , दुसरा हाथ मेरा साहब को थामे था जिससे जब साहब मुंह से अंदर बाहर होते तो उन्हें सही ग्रिप मिलता रहे।
“स्स्स्स्स्स स्स्स्स्स्स आआआ आआआ.…… चुस्स्स्स्स्स्स्स्स्स,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, चुस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स
उम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म ,,,,,,,,,,,,,,,,,आआआआआअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्हाआआआ ” विजय सर सारे व्याकरण भूल कर ना जाने कौन सा राग गाने लगे?
“आहा आह ले ले हम्म्म। … कोई सीखे तुझसे ,, कोई सीखे चुस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ,,, आआआ आआअ।”
…मेरे हाथ और तेज़ी से अण्डों को मसलने लगे, विजय सर की कमर तेज़ी से हिलने लगी, मैं समझ गयी अब अंडे से लस्सी बाहर आएगी,
मुझे विजय सर का वीक पॉइंट पता था ,उनके पृष्टभाग के बीच दबा हुआ छोटा सा छेद .
मैंने साहब पर से हाथ हटा लिया और ऊँगली तुरंत पीछे ले जाकर सीधे बिना देखे अग्नि मिसाइल की तरह टारगेट को भेद दिया।
ऊँगली के घुसते ही , विजय सर चीख उठे, ” आआआआआअस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स आआआआआआआ क्य्य्याआआआआ कर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र दियाआआआआआआ। आ गया मैं , सम्भाल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल। ”
भरभर भरभर लस्सी अण्डों से निकल कर मुंह के अंदर जीभ पर तेज़ धार से गिरने लगी, अमोनिया ब्लीच की खुशबु मेरे मुंह में सलाइवा मिश्रित होने लगी,
मैं चप्प चप्प लस्सी पिने लगी और गले से उतार कर अपने गले की खुजली मिटाने लगी,
आज लस्सी की मात्रा इतनी थी कि अगर जमा करके बोतल में बंद करके रखती तो तवे पर एक अच्छा भला ऑमलेट सेंक लेती उससे।
मेरी ऊँगली पीछे घुसी थी और इधर अण्डों की मालिश चल रही थी,
विजय सर अब लगा कि पैरों पर खड़े नहीं हो पाएंगे और दाहिने ओर आकर धम्म से बिस्तर पर गिर पड़े। साहब अभी तक मेरे मुंह में ही कैद थे, उनका आकार सिकुड़ चुका था। अब साहब अपने अण्डों से भी छोटे हो गए थे।
उफ्फ्फ्फ़,,,,, क्या चुस्कीबाज़ हो तुम ?” आँखें बंद ही थीं विजय सर की।
मेरे मुंह में साहब अभी भी जकड़े हुए ,सलाइवा और लस्सी धीरे धीरे चु कर मेरे होंटों तक आ चुकी थीं।
फिर भी मैं आम की गुठली तरह उसे चुभलाते जा रही थी।
” अरी , अब बस भी कर , खा जायेगी क्या कवाब समझ कर ?” ही ही ही ही ,,,हंसने के साथ साथ सबीहा की आवाज़!!!!

मैं एकदम से चौंक पड़ी और झट से मुंह से साहब निकल गए,कुछ क्षण पहले एक हृष्ट पुष्ट लपलपाता हुआ डायनासोर इस समय पानी में भीगी हुई चुहिआ की तरह से हो चूका था, विजय सर भी फुर्ती से बैठकर अपने साहब को छिपा लिए।
“सबीहा, ये क्या बदतमीजी है ?” मैंने गुस्से में सबीहा को डांटकर खा जाने वाली नज़रों से देखा।
” अरी मेरी जान , थोडा रियल देख लिया तो इतना क्यों ग़ुस्सा रही हो? ” ये कहते कहते उसने मेरे उभरे यौवन को दोनों हाथों से पकड़ लिया , जो अभी तक कैद थे।
मैं कुछ बोलूं या सोचूं उससे पहले उसने मेरे होंठो को अपने होंठों में दबा लिया और ज़ोर ज़ोर से चूसने लगी।
विजय सर के अलावा ज़िंदगी में पहली बार किसीने मेरे होंठों को चूसा था।
मेरे मुंह में वैसे ही विजय सर ने लस्सी भर के रखा था, जो वो खिंच खिंच कर पीने लगी, कबूतरी के चोंच से कैसे उसके बच्चे दूध चूसते हैं उसी तरह से।
उसकी जीभ मेरे मुंह के अंदर घुम कर एक अलग तरह की गुदगुदी दे रही थी , विजय सर ने अनगिनत बार मेरे अधरों का रसपान किया था जिसमें मुझे गज़ब संतुष्टि मिलती थी , किन्तु सबीहा ने जो होंठो को चूसा था मैं विजय सर के चुम्बन कला को भी भूल गयी।
उसके दोनों हाथ मेरे दोनों जोबनोँ का बेदर्दी से मर्दन कर रहे थे , उसकी जिव्हा मेरे मुंह के अंदर का भूगोल नाप रही थी, इतनी चुम्बन में पारंगत सबीहा को तो हॉलीवुड में होना चाहिए , इतने बड़े टैलेंट की ऐसी बर्बादी !
“सच है हमारे देश में प्रतिभाओं की कदर नहीं, विदेश में ही जाकर उन्हें सम्मान मिलता है. डॉक्टर हरगोविन्द खुराना को ही देख लो, भारत में सड़क पर सोते थे,अमेरिका जाकर नोबल प्राइज़ जीत लिए !” विजय सर की बायोलॉजी की क्लास में मशहूर जीववैज्ञानिक हरगोविन्द खुराना की प्रतिभा और उनके भारत में हुए बेकद्री का लैक्चर याद आ गया। धत्त , मन भी कहाँ से कहाँ और किस किस सन्दर्भ को कैसे कैसे जोड़ देता है.
हाँ तो , सबीहा जैसी ही किसी नारी के चुम्बन को देखकर ही शायद परमपूज्य महर्षि वात्स्यायन ने प्रवालमणि चुम्बन की व्याख्या की थी कि दन्तौष्ठसंयोगाभ्यासनिष्पादनात्प्रवालमणिसिद्धिः अर्थ- हर बार एक ही जगह को दांतों और होंठों से दबाने की क्रिया को प्रवालमणि कहते हैं।
सबीहा ने अपने दांतों से मेरी जीभ को पकड़ कर जो दबा दबा कर जो चूसना शुरू किया , मेरी ”प्रेम देवता की छतरी” जो मेरे हवन कुण्ड के ऊपरी भाग में स्थित नाक जैसी आकृति वाली होती है, ( जिसे आम बोलचाल की और बाबा मस्तराम की भाषा में भगनासा, चना, लहसुन , क्लिट ,मटर इत्यादि कहते हैं) फड़फड़ाने लगी ,और मेरे हवन कुण्ड को तैलीय आर्द्रता प्रदान करने वाली प्रेमसुधा प्रवाहित होने लगी।
अब मैं सुध बिसार चुकी थी कि विजय सर अपने ढीले हुए साहब को वहीँ लेकर बैठे हैं, मैं मात्र चुम्बन द्वारा ही स्वर्ग की सीढ़ी के दूसरे पायदान पर पहुंच चुकी थी.
मेरे हाथ इससे पहले अपने अपने सलवार के नाड़े तक पहुंचे और अपने हवन कुण्ड को मैं खुले में बाहर ले आउ , इससे पहले ही तेज़ी दिखाते हुए विजय सर के हाथों ने ये कार्य कर दिया और मेरी सलवार मेरी लाल पैंटी के साथ , जो आज ही मैंने अपनी दूकान में से उठा के लाइ थी, जमींदोज़ हो गयी।
मैं चुम्बन में मदहोश होते हुए सरक कर बिस्तर पर लेट गयी , और दोनों टांगें फैला दीं , जिससे हवन कुण्ड की उपलब्धिता यज्ञ हेतु आये ऋषि को हो जाए और वो हवन कुण्ड में जल रही अग्नि में मंत्रो सहित घी डालकर यज्ञ संपन्न कर देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करे और मुझे स्वर्ग तक पहुंचाए।
ऋषि कन्या सबीहा जो पूर्ण तन्मयता से यज्ञ के पहले की तैयारी चुम्बन द्वारा कर रही थी, अपनी ऊँगली हवन कुण्ड के बाहर स्थित प्रेम छतरी पर ले गयी, और जैसे कोई संगीतकार वीणा बजाने के पहले उसके तारों को छेड़ कर तैयारी करता है, वो भी मेरी प्रेम छतरी को तार की तरह बजाने लगी।
परिणामस्वरूप प्रेम देवता के आवास में खुजली पैदा होने लगी, हवन कुण्ड में अग्नि प्रज्वललन होने लगी, अग्नि प्रज्वल्लन हेतु तैलीय आर्द्रता अंदर से बरसने लगा.
ये तैलीय आर्द्र पदार्थ तरलता में काफी पतला होता है और यज्ञ के प्रारम्भ में यदि यह तैलीय आर्द्र पदार्थ ना निकले तो यज्ञ हेतु आये अग्निहोत्री ऋषियों को अन्य कृत्रिम तरल पदार्थ जैसे वेसलिन, तेल यहां तक कि थूक का भी उपयोग करना पड़ सकता है, अतएव कुशल अग्निहोत्री पहले यह सुनिश्चित करता है कि प्रेम की छतरी का स्पर्श एवं स्पंदन इस प्रकार किया जाय कि प्रेम देवता के आवास हवन कुण्ड में पर्याप्त मात्रा में प्रेमसुधा हो एवं यज्ञ की इति अपने घी द्वारा हो, तभी यज्ञ सफल माना जाता है।
अनाड़ी अग्निहोत्री यज्ञ करने हेतु शीघ्रता से तरल प्रेमसुधा के अभाव में ही अपने चर्मदण्ड से मंत्र बड़बड़ाते हुए यज्ञ सम्पन्न कर देते हैं, जिस कारण हवन कुण्ड प्रेम मंदिर में घी तो गिर जाता है किन्तु हवनकुंड प्रेमदेवता के आवास में स्थित देवता नाराज़ हो जाते है, और फिर किसी अन्य कुशल अग्निहोत्री ऋषि की तलाश करते हैं.
और सबीहा एक कुशल अग्निहोत्री ऋषि थी ही, जो ६४ कलाओं में निपुण थी और जिसने अब मुझे यज्ञ के लिए, जो मैं हमेशा मात्र ऋषि विजय जी द्वारा ही सम्पन्न करवाती थी , तैयार करवा दिया था, हवन कुण्ड प्रेम देवता का आवास प्रेमसुधा से लबालब चु रहा था।
यज्ञ प्रारम्भ करने के लिए चर्मदण्ड के प्रवेश की प्रतीक्षा में, मुंह में सबीहा की जीभ और प्रेम छतरी पर उसकी ऊँगली, तभी अचानक प्रेम आवास हवन कुण्ड पर लपलपाती जीभ विजय सर की !
मंत्र पाठ का प्रारम्भ होने जा रहा था।
मेरे दोनों हाथ स्वतः ही विजय सर के माथे पर पहुँच गए और उनके केशों को बड़े प्यार से सहलाते हुए सर के पीछे जाकर जोर से अपने हवनकुंड पर दबा दिया।
उनकी जीभ जो प्रेम देवता आवास द्वार को कुरेद कर प्रेमसुधा पान कर रही थी, अब आवास के अंदर प्रविष्ट हो गयी.
इस बीच सबीहा ने मेरे होंठो को मुक्त किया और साथ में मेरे टॉप को भी , नई लाल ब्रा को उठाया और कुचाग्र अर्थात निप्पल को फिर दांतों के बीच रख कर खिंचा.

अशोक वाजपेयी की कविता कुचाग्र की पंक्तियाँ याद आ गयीं :
रतिऋतु में
प्रेम के अरण्य में
कत्थई गुलाब
कसमसाकर सिर उठाते हैं,
पूछते हैं :
कहाँ है सुख, उसकी ओसधूप?

मेरे कथ्थइ गुलाब यानी मेरे कुचाग्र यानि निप्पल , सबीहा के मुंह में मसले जा रहे थे, बारी बारी से, एक पकड़ती मुंह में दुसरा ऊँगली से खींचती। दक्षिण दिशा अर्थात जाँघों के मध्य में विजय “सर” अपना सर प्रेम मंदिर की चौखट पर पटके जा रहे थे , उनकी लपलपाती जीभ कभी प्रेम देवता की छतरी को छेड़ती ,कभी प्रेम मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश कर जाती , प्रेमसुधा प्रेममंदिर से अविरल बहती जा रही थी , विजय सर ने दोनों हाथ पीछे मेरे मांसल खरबूजों पर रख कर उन्हें फैला दिया , जिससे उन खरबूजों के बीच स्थित लघु छिद्र भी अपने स्वाभाविक से बड़ा हो गया।
इस छिद्र जिसे गुदा द्वार कहते हैं , वैसे तो इसका असली उपयोग शरीर में जमा कचरे को बाहर निकालना है ,किन्तु यह काम क्रीड़ा में भी एक महत्वपूर्ण निभाता है, जैसे नायक यदि लिंग , नायिका योनी ,तो सह कलाकार स्तन और गुदा छिद्र हैं। अधर , गर्दन ,पेडू, इत्यादि शरीर के सारे अंगों का अपना अपना महत्त्व है इस प्रेम साधना अथवा सम्भोग में , विस्तार से जानने हेतु महर्षि अतिपूजयनीय श्री वात्सयायन द्वारा रचित कामसूत्र का पाठ करें।
मैंने तो कहीं ये भी पढ़ा है कि प्रख्यात व्यवहार शास्त्री डिज्माण्ड मोरिस के अनुसार कि पहले मानव जब पशुओं साथ ही रहता था तो सेक्स करने का एक तरिका था , जानवरों की भाँती झुक कर पीछे से।
इसलिए अतीत की नारी के नितम्ब यौनाकर्षण की अपनी भूमिका में इतने बड़े और भारी होते गये कि रति क्रीडा का मूल उद्देश्य, अर्थात लिंग का योनि में निर्बाध प्रवेश ही बाधित होने लगा ।
फिर मानव को चुम्बन ,स्तन मर्दन इत्यादि क्रियाएँ पीछे से करने में (जो पशु नहीं करते या बहुत नगण्य है उनके लिए , पशुओं में सेक्स प्रकृति द्वारा मात्र जनन प्रक्रिया साधन रही है जो आज भी है ) अड़चन होने लगी .
किन्तु मानव जैसे जैसे सभ्य होने लगा सेक्स प्रेम का विस्तृत रूप होने लगा, आँखों में आँखें , होंठों में होंठ , कथ्थइ गुलाब मर्दन इत्यादि के लिए मानव को सामने से यौन संसर्ग (फ्रंटल मिसनरी पॉजिशन ) का विकल्प चुनना पड़ा।
कालान्तर में नारी स्तनों ने नितम्बो को पदच्युत करके `सेक्स सिग्नल´ की भूमिका हथिया ली और तब कहीं जाकर नारी के नितम्बो के बढ़ते आकार पर प्रकृति द्वारा अंकुश लग सका।
किन्तु आज भी एक जैवीय स्मृति शेष के रूप में विश्व की कई आदिवासी संस्कृतियों, जोकि अभी तक पशुओं के बहुत निकट और स्वाभाविक जीवन जीते हैं , उन में नारी नितम्बों को बहुत उभार कर दिखाने की प्रथा है। अफ्रीका की बुशमैन आदिवासी औरतें अपने नितम्बों को एक विशेष पहनावे के जरिये बहुत उभार कर प्रदर्शित करती हैं।
खैर, मेरे नितम्ब ,जो वैसे भी आदिम युग के हिसाब से पुरुषों को आकृष्ट करने के लिए बढ़ते गए थे , ऐसे ही थे , जब कभी मैं किसी काम लिए कहीं भी झुकूं तो मुझे पता चलता था कि मैं देवताओं तक के तप को डिगा रही हूँ।
अपने प्रिय कवि अशोक वाजपेयी की एक छोटी सी कविता
जब
जब एक सुडौल गोरा नितम्ब
थोड़ा सा मुड़ता है
तो देवताओं को हिचकी आने लगती है ।
तो जनाब हमारे विजय सर ने जब उन फांकों को फैलाया और इस बार उनकी पृथ्वी मिसाइल सीधे टारगेट पे पहुँच कर प्रेम मंदिर से टपक रहे प्रेमसुधा के कारण गीलेपन का फायदा उठाते हुए नाख़ून पोरों तक घुस गयी। स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत मेरी कमर और उठ गयी , फलस्वरूप सर की जीभ प्रेम गृह में अपनी अधिकतम सीमा तक पहुँच गयी।
उपर मेरे कथ्थइ गुलाब मसले और पिए जा रहे थे सबीहा द्वारा , निचे के दोनों छिद्रों की कहानी तो आप पढ़ ही रहे हैं , यौन उत्*तेजना के समय योनि के भीतर व गुदाद्वार के पास की पेशियां सिकुड़ जाती हैं।
ये रुक-रुक कर फैलती और सिकुड़ती रहती है। जिससे काम क्रीड़ा में ये पूर्ण योगदान देने लगती हैं। धारक को ये पूर्ण संतुष्टि प्रदान करने का वचन देती हैं यदि इन्हें सही ढंग से सहलाया , चिकोटा, चाटा और प्रेम किया जाए तो।
मेरा सिर्फ मुंह बचा था। अब ऋषि कन्या सबीहा भी अपने वस्त्रों का परित्याग कर चुकी थी और उसके द्वारा हो रहे एहसानों को कम करने के लिए अब मैंने अपने अधरों से उसके लटक रहे कथ्थइ गुलाब को पकड़ लिया , और उसकी तरीका यानी निप्पल चूसना शुरू कर दिया।
सबीहा ने मंत्र पाठ शुरू कर दिया ” ओह्ह्ह , आह्ह , बर्दाश्त नहीं हो रहा , पी ले मेरी चूची ,आह आह आह कोई मुझे चोदो,,,,,, नहीं तो मैं मर जाउंगी। आह , आह , गीता रंडी ले पी मेरी चूची, काट काट , साली ,चुभला इसे, खिंच पी , रंडी चूसना नहीं जानती क्या , अभी अपने भतार का लंड पी गयी ,छिनार , चूची चुस्स्स्स्स्स्स्स्स मेरीइइइइइइइइइइइइइइइ ”
सबीहा एक बहुत ही गर्म प्रजाति की नवयुवती थी , अतिपूजयनीय महर्षि श्री वात्सायन के अनुसार मस्तक, गाल, पुरुष का सीना, नारी के स्तन, होंठ, मुख का भीतरी भाग, जिह्वा, दोनों जांघों के जोड़, बगल (कांख), नाभि आदि ऐसे केंद्र हैं, जहां चुंबन की बारंबारता से उत्तेजना बढ़ती है। और सबीहा के स्तन मेरे मुंह ,में थे। सबीहा वैसे भी अपने जींस के अनुसार (माँ ,चाचा ) ही यानि उसे जब सेक्स चाहिए तो चाहिए। नो वेटिंग। वो धीरे धीरे हौले हौले वालों में से नहीं थी।
सहलाना ,फोरप्ले इत्यादि में ज्यादा यकीन नहीं रखती थी।
उसके प्रेम मंदिर में प्रेमसुधा मात्र सोचने से ही बरसने लगती थी।
महाकवि कालिदास के अनुसार
जो काम के सताए हुए हैं, वे जैसे
चेतन के समीप वैसे ही अचेतन के समीप
भी, स्वभाव से दीन हो जाते हैं।
और उसके मंत्रोच्चार उसे स्वयं ही कामाग्नि में जलाने लगे थे. अब लग रहा था पहले उसके हवनकुंड प्रेम मंदिर में शांति पाठ करवाओ, मेरा भले ही बाद में , नहीं तो वो मार पीट पर उतर आएगी।

वो तो ” कुण्डी मत खड़काओ राजा , सीधे अंदर आओ राजा ” की तर्ज़ पर ” ज्यादा मत सहलाओ राजा , सीधे अंदर घुसाओ राजा ” में यकीन करती थी।

अलग अलग पदार्थों का बोइलिंग पॉइंट अलग अलग होता है , जैसे पानी के लिये १०० डिग्री तो पारे के लिए ३५६ डिग्री, हम लोग पानी की श्रेणी में आते हैं, धीरे धीरे गर्म होते हैं १०० डिग्री तक पहुँचने के बाद।
किन्तु छिनार साम्राज्ञी सबीहा देवी Acetaldehyde (जोकि अल्कोहोल से भी २० गुना खतरनाक है ) की तरह २० डिग्री पर पूर्णतया गर्म हो जाती थी।
(खानदानी चुदक्कड़ का जींस जो ठहरा !)
गर्म होने के बाद उसे भाप बनने से रोक पाना असंभव था। वो लगभग १८ डिग्री तक पहुँच गयी थी। उसने मेरा एक हाथ ,जो विजय सर के सर को दबा रहा था , खिंच लिया और सीधे अपने हवन कुण्ड पर रख कर बोली” ऐ रंडी, इधर घिस ना। वो तो पी ही रहा है तेरी बुर। मेरी खुजली मिटा, भतियान चट्टी। घिस रांड इस बुर को। पी मेरी चूची और घीस मेरी बुर.”
मैंने अपनी तर्जनी और अंगूठे से उसके भगनासा को पकड़ कर सितार के तार की तरह खींचने और छोड़ने लगी, मध्यमा उसके अविरल बरस रहे प्रेमसुधा से भीग कर गप्प से प्रेम मंदिर के अंदर गर्भ गृह में पहुँच गया। उसके आगे अंदर एक पुंछ की तरह का टुकड़ा होता है , जो स्त्री के गर्भाशय और योनि के मध्य का सेतु होता है, उसी द्वार से पुरुष वीर्य में स्थित करोड़ों शुक्राणु अपनी पुंछ हिलाते हुए ,(जैसे धूमकेतु तेजी से अंतरिक्ष में भागते हुए सूर्य पिंड से टकरा कर उसी में समाहित हो जाता है ) तेज़ी से दौड़ लगा कर मिलन की प्रतिक्षा कर रहे अण्डों को चूमने और उनमें समाहित होकर एक नए जीवन में परिवर्तित होने की तैयारी करते है, करोड़ों में कोई एक पहुंचता है। मेरी मध्यमा वहाँ तक पहुँच कर उसे महसूस करने लगी। उसे छेड़ने लगी।
अब सबीहा के मंत्रोच्चार में गति आ गयी ” ऊओफ्फ्फ्फ्फ़,,,,,रंडी कहाँ छू दी रेएएएएएएएएएएएएएए,,,,,,मर गयीईईइ ,,,,,,,मुझे कोईइइइइइइ चोदोओओओओ,,,,,,मर जाउगी ,मर जाउंगी , घुसेड़ एक ऊँगली और अपनी रंडीईईईईई ,,,,,पूरी मुठ्ठी घुसेड्ड्ड्ड्ड्ड्ड्ड्ड्ड्, बर्दाश्त नहीईईईईई हो र र र र हाआआआआआ ,,,,,हाँ हाँ ऐसे ही,,,, तेरे पाँव पड़ती हूँ ,,,प्लीज़्ज़ज़्ज़ज़्ज़ ,,,ऐसे ही,,,,रुक्क्क मत्त्त्त्त्त हाँ , ऊँगली से चोद मेरी बुर,,,,,,मेरी प्यारीईईईई सहेलीिी , गीताआआ ,,,प्लीज़्ज़ज़्ज़ज़ ,,,तेरे रेरे पाँव पड़ती हूँ रे रे रे रे ,,, आह अहा आह आह आह “उसकी प्रेमसुधा की गरमहाट मेरी मध्यमा पर महसूस हो रही थी। मध्यमा अंदर बाहर हो रही थी।
सबीहा यानि Acetaldehyde १९.९ डिग्री पर पहुँच चुकी थी।
यद्यपि मैं भी प्रेमसुधा बरसा रही थी लेकिन अभी ९० डिग्री पर ही पहुंची थी , तो पानी थोड़ा कुनकुना था यानी होश था हल्का हल्का, उसी होश में यह कौंधा कि अरे विजय सर के सामने ये पूर्ण नग्न होकर अपनी नंगी जवानी दिखा रही है। और अभी अभी उनके डायनोसर ने मूषक रूप धारण किया है , कहीं जुरासिक पार्क २ (यानि सबीहा की सपाट गुन्दाज़ पाँव रोटी के समान उभरी बुर) देख कर मूषक “पुन: डायनोसर भव” न हो जाए ?
लेकिन अब तक बहुत देर हो चुकी थी। मैं भी मन में उभरे क्षणिक सौतिया डाह को भूल गयी क्युकिँ एक मिसाइल पीछे मेरे गुदा द्वार का भेदन कर रही थी और लपलपाती जीभ मेरे प्रेममंदिर से बरस रही प्रेमसुधा चूस पी चाट रही थी। यह डबल अटैक मुझे अब सारे रिश्ते नाते भूल कर पूर्ण रूप से मात्र कामसरिता में डूबने के लिए कह रहा था।
अचानक सबीहा ने पैंतरा बदला और तेज़ी से अपनी कमर और चूची खीच कर अपनी बुर को मेरी उँगलियों और चूची को मुंह से मुक्त करवाया , तेज़ी से कूद कर विजय सर के बाल को पकड़ कर होंठों से होंठ चिपका लिए, छप छप की आवाज़, मेरे बुर से बहे प्रेमसुधा और अब सबीहा और विजय सर के सलाइवा के मिश्रण से बन कर आने लगी।
सबीहा यानि Acetaldehyde २० डिग्री पार कर चुकी थी।
मैं भी किसी तरह १०० डिग्री पर आ गयी थी। मूषक दिख नहीं रहा था , लेकिन अवश्य ही उसके डायनासोर बनने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी थी।
विजय सर भी इस अचानक हुए आक्रमण से दर गए लेकिन उनके हृदय में अवश्य ही यह अंदेशा रहा ही होगा कि आज जुरासिक पार्क :- पार्ट २ में डायनोसर का प्रवेश होगा। इतने भी भोले ,,,हट , चुतिया नहीं थे वो।
विजय सर सबीहा के चुम्बन का उत्तर देने में डर रहे थे, भय भरी कातर दृष्टि से मुझे देखा , मुझे बड़ी हंसी सी आये, अब सौतिया डाह नहीं अब गैंगबैंग की इच्छा जागृत हो चुकी थी।

बेदार हुईं मेहर-ए-जवानी की शुआएँ
पड़ने लगीं आलम की उसी सिम्त निगाहें ।
ख़ाबीदा थे जज़बात बदलने लगे करवट
रु-ए शरर-ए तूर से हटने लगा घूँघट ।

बेदार :- जागी
मैहर:- इश्क़
शुआए :- चिंगारी
ख़ाबीदा :-सोए हुए
तूर :-ज्वालामुखी

आओ सब मिलकर चोदें , पेलें , चूसें और चटवाएं।
चुद्वायें और पेलवायें ,
भूल जाए सब रश्म ओ रिवाज़,
एक नया त्यौहार मनाएं।
एक ही नाता हो बस चूत और लण्ड का ,
बाकी सारे नाते अपनी अपनी माँ चुदायें।

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