गावं की लड़की

अब सबीहा के बर्दाश्त के बाहर की बात थी रुकना. विजय सर मेरी ओर देखे जा रहे थे मेरी हाँ या ना की प्रतीक्षा में , मैं भी ११० डिग्री पर आ चुकी थी, मैं word नहीं action में यकीन रखती हूँ। मैं उठ कर पीछे से सबीहा के दोनों मदमस्त झूलते हुए उरोज़ों को अपने हाथों से थाम कर मिसने लगी। अब इससे ज्यादा कोई “हाँ आगे बढ़ो” कैसे कह सकता है, फिर भी अनाड़ी बलमा विजय सर ने अपने होंठों को सबीहा के दांतों के चंगुल से हटाकर मुझे देख कर कामाग्नि में कांपते हुए कहा ” गीता , ये सही हो रहा है ना?” अब आप ही बताइये,भला जब फ्लाइट एक बार टेक ऑफ़ हो गयी तो जबतक कोई इमरजेंसी न हो तो क्यों वापस रनवे पर उतरे?
मुझे खीज भी बड़ी आई क्युकी आप सब जानते हैं कि जब कामयज्ञ हो रहा हो तो मात्र “बुर, लण्ड , गाण्ड, चूत, चूची, पेल, चोद, चूस, चाट ,काट, घुसा, फाड़ ,माधरचोद,रंडी,भडुए ,छिनाल ” इन मन्त्रों के अतिरिक्त और कोई भी मंत्र पूर्णतया वर्जित है, इससे कामयज्ञ की पवित्रता भंग होती है।
मैं कुछ कहूँ इससे पहले अग्निहोत्रन सबीहा ने झिड़कते हुए कहा ” अब क्या अपने हाथ से मेरी बुर फैला के तेरे लण्ड को घुसायेगी तब तुझे पता चलेगा कि सही हो रहा है या गलत? चुतिया कहीं का , पहली बार बुर चोदने आया है क्या?”
शायद यह वाक्य ३०-३० रुपये लेकर अपनी बुर में दिन में ३० ट्रक ड्राइवरों के लण्ड लेनेवाली हाईवे पर खड़ी रंडियों के मुंह से बहुत आम है, किन्तु एक १८ साल की लड़की जो अबतक सिर्फ अपने चाचा से ही चुदी हो,उसके मुंह से ये बात बड़ी अजीब सी लग सकती है, लेकिन जो सबीहा को जानते हैं उन्हें अच्छी तरह से पता है कि छिनार साम्राज्ञी सबीहा ना सिर्फ कामक्रीड़ा के समय ही बल्कि सड़क पर भी बनारसी मजनुओं की माँ बहन को खड़े खड़े अपनी जुबान से ही चोद देती थी।
तो विजय सर ने पंगा ले लिया, किससे? सबीहा से? जिसके प्रेममंदिर में धधक धधक कर कामयज्ञ की लपटें बाहर तक आकर ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा रही थी।
लेकिन विजय सर भी आखिर विजय सर ही थे, उन्होंने भी उसका जवाब बड़े शायराना अंदाज़ में दिया।
“तूने होंठों से छू कर लण्ड पे नशा कर दिया;
लंड की बात तो और थी रंडी तूने तो झांटों को भी खड़ा कर दिया।”
सबीहा ने पलट कर शेर मारा
“लंड तेरा बलवान है
माना बड़ा पहलवान है
पर ऐसी क्या कमजोरी है
जो कुछ पल का मेहमान है |

आधे घंटे की चुदाई में
क्या इतना थक जाएगा
आधे घंटे बाद दिन भर
खड़ा भी नहीं हो पाएगा |

तेरे लंड से ऐसी भी दुश्मन नहीं
कि आधे घंटे में कर दूं उसकी खाट खड़ी
चूसूंगी चुदवाउंगी निचोड़ूगी फ़ड़वाउंगी
मेरे भडुवे ,आधे घंटे में जगाकर फिर से चोदने लायक बनाउंगी |”

ग़ालिब और परवीन कैफ़ के मुशायरे चल रहे थे।
मैंने सोचा ये दोनों भी एक दूसरे से हार नहीं मानेंगे। मुझे ही बढ़ कर मामला सम्भालना होगा।
मामला क्या सम्भालना था , मैं सीधा झुककर विजय सर के भीगे हुए चूहे जो धीरे धीरे अब एक केले के आकार का हो चुका था घप्प से मुंह में भर कर चप्प चप्प करके चूसने लगी।
अपने थूक से उसे गिला आकर कर के एक हाथ से पकड़ कर गोल गोल घुमा घुमा कर चूसने लगी।
अभी भी ब्लीच अमोनिया की तेज़ गंध उनके लंड से आरही थी, लंड धीरे धीरे पूर्ण आकार में आ गया, गंगाधर अब शक्तिमान बन चुका था।
सुपाड़ा पथ्थर की तरह कडा हो गया , कड़क सुपाड़ा को चूसने का आनंद ही और है, मैं एक हाथ से लटक रहे अंडे दबा रही थी मुंह से घप घप लण्ड अंदर बाहर किये जा रही थी।
सबीहा ने अपने जीभ से मुझे चाटना शुरू कर दिया , मैं विजय सर का लण्ड घपाघप चूसे जा रही थी ,सबीहा जीभ से मेरी पीठ चाटते चाटते मेरे नितम्बो तक आगयी, और झुक कर मेरी रस से चु रही चमचम को दो ऊँगली से फैला कर अपनी गीली जीभ मेरी बुर के फांकों के मध्य में घुसा कर चाटने लगी।
उत्तेज़ना में मैं बोल भी नहीं सकती थी क्युकी मेरा मुंह तो चूसन क्रिया में व्यस्त था, और विजय सर ने मेरे सर को पकड़ दबा दिया था।
सबीहा द्वारा मेरी बुर चटाई का मुख्य उद्देश्य मात्र इतना था कि मैं अतिशीघ्र विजय सर के पथ्थर की तरह कड़े लण्ड को मुक्त कर दूँ और उसे सबीहा की धधक रही काममन्दिर में प्रविष्ट करवा के हवन सम्पूर्ण करवा दुं.
चतुर सबीहा का दांव बेकार नहीं गया मैंने उत्तेज़ना में शक्तिमान को मुक्ति दे दी और अब शक्तिमान आज़ाद था।
मैं जो कुतिया की तरह घुटनों पर थी, अपने इस आसान से हटकर चूतड़ के बल पर धम्म से बिस्तर पर गिर गयी।
और अपनी दोनों टांगों को फैला कर दोनों हाथों से पांवो के अंगूठों को पकड़ लिया।
अब मेरे गोरी गोरी बिना बाल की बुर फ़ैल गयी , उसके सारे छेद और गड्ढे बिलकुल स्पष्ट होकर सबीहा को दिखने लगे.
दरअसल ये मेरा एक दांव था, सबीहा समझ गयी की अगर मैंने इसे मुंह से चाटना शुरू नहीं किया तो ये विजय सर का लण्ड अपने बुर के लिए डिमांड करेगी जिसके लिए छिनार साम्राज्ञी सबीहा बिलकुल तैयार नहीं थी।
सबीहा मेरी बुर को फिर अपने दोनों हाथो से फैला कर फिर अपना मुंह उसमें घुसा कर बुर के बीच में जीभ रगड़ने लगी।
उसकी नाक मेरे भगनासा को रगड़ दे रही थी, कामरस छप छप बाह रहा था।
मैं उत्तेज़ना में सबीहा के सर को पकड़ ली.
” आह , सबीहा, चाट ले, बुर मेरी, मस्त चाट रही है तू। चटोरि. हाँ , पी ले ऐसे ही मेरी बुर. अ अ आ आ आ ओह ओह ओह… मर गयी, हाँ पी ना मेरी बुर , खूब चाट , चाट चाट के पानी निकाल दे मेरा, चाट चाट के मार डाल रे रण्डी मुझे, गांड में अपनी ऊँगली घुसा ना। …. आए आआआआअ आआआआ। ।अरे भडुए विजय छिनार के भतार। ……. चोद ना अब सबीहा रंडी की बुर को , क्या तेरा बाप आके चोदेगा उसे , माधरचोद ?”

मैं गाली गलौच में माहिर तो थी, अंदर गालिआं भरी तो थीं, लेकिन कभी खुले आम सबीहा की तरह गालियां नहीं देती थी।
कामयज्ञ के समय गालियां उत्तेजना बढ़ाने के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती हैं, जैसा कि सर्वविदित है कि उत्प्रेरक अभिक्रिया में भाग नहीं लेता, केवल क्रिया की गति को प्रभावित करता है। यदि सही उत्प्रेरक की मात्रा हो तो रासायनिक क्रिया का परिणाम अतिउत्तम होता है। गालियां और अश्लील शब्द कामक्रिया यज्ञ में मन्त्र का स्थान रखते हैं, यज्ञ में सिर्फ हवन सामग्री डालते रहो तो उसका कोई सुपरिणाम नहीं मिलता , सुफल यज्ञ हेतु लगातार मंत्रोच्चारण होते रहना चाहिए।
कई जोड़े सम्भोग में सहला चुम के धक्का धुक्की करके निढाल हो जाते हैं, और अपने मन में भीतर उमड़ रही भावनाओं को आँख बंद करके मात्र कल्पंना कर लेते हैं.
मन्त्र उच्चारण ना करने के कारण हो सकते हैं,
पहला:- आप ऐसी जगह पर यज्ञ कर रहे हैं जहां पर मंत्रोच्चारण करने में असुविधा है, जैसे घर में एक ही कमरा हो, लोग जाग रहे हों.
दूसरा:- यज्ञ में सम्मिलित लोगों को एक दूसरे के प्रति ना तो अधिक विश्वास हो ना ही प्रेम हो।
तीसरा:- लाज और भय हो कि यदि मैंने अपनी फेंटेसी उत्तेज़ना में बोल दी तो शायद मेरा सहभागी बाद में उस बात शंका में और जीवन में ज़हर घुल जाये.
चार:- स्त्री अग्निहोत्री घाघरा उठाकर टाँगे फैला कर हवन कुण्ड खोल देती हो, और पुरुष अग्निहोत्री धन धन धन करके यज्ञ में घी भर के निढाल हो जाता हो.
यह सभी उपरोक्त कारण,पहले को छोड़ के ,यह बताते हैं कि आपमें और आपके पार्टनर में परस्पर प्रेम और विश्वास की कमी है।
इससे ये होता है कि पुरुष वेश्याओं की ओर मुड़ता हैं जहां वह पूरी तरह से अपने मन में उमड़ रही फॅंटेसियों को बकबका कर अपने आपको हल्का महसूस करता है और स्त्री परपुरुषगामी होती है जहां वो सारी लज्जा मर्यादा छोड़ कर एकदम रंडी की तरह कामसुख लेती है.
वैसे भी शास्त्रो में कहा है:-
काव्येषु मंत्री, कर्मेषु दासीं
भोज्येषु माता, रमणेषु रम्भा
धर्मानुकूला क्षमया धरित्री
भार्य्या चा षड्गुण्यवती च दुर्लभा।

कार्य प्रसंग में मंत्री, गृहकार्य में दासी, भोजन कराते वक्त माता, रति प्रसंग में रंभा, धर्म में सानुकुल, क्षमा करने में धरित्री, इन छः गुणों से युक्त पत्नी मिलना दुर्लभ है ।
रति प्रसंग में रंभा या खुल के कहें तो चुद्वाते समय रंडी बन जाए ऐसी बीवी मिले जिसे तो वो मर्द कहीं और तांक झाँक भी ना करे , ऐसी स्त्री अपने पति को चुदाई में इतना सुख दे सकती है कि वो कल्पना में ही कैटरीना, करीना, एंजेलिना, सनी लिओना सभी को चोद चोद कर सभी की बुर का भोसड़ा बना कर रख सकता है । ऐसी स्त्रियों के पति ना तो कहीं और मुंह मारते हैं और ना ही बलात्कारी बनते हैं। और समाज में सही संतुलन बना रहता है, किन्तु यदि इतना सब स्त्री द्वारा देने के बाद भी अगर पुरुष दस जगह अपनी कामपिपासा शांत करे या राह चलते लोगों की चूची मिसे , चुतर दबा दे , इसका मतलब वो मर्द माधरचोद है, सिर्फ अपनी माँ के भोसड़े, जहां से वो निकला , में अपना पानी निकाले तब शांत रहेगा और समाज में ऐसे माधरचोद मर्दों का लण्ड काटकर प्रदर्शनी में लगा देना चाहिए।
खाई, बाते गाली की हो रही थीं, मैं गाली चुदाई के वक़्त भरपूर देती थी लेकिन फुसफुसा कर , क्युकि आज जीवन में पहली बार चुदाई नरम बिस्तर पर एकांत में करने मिल रही थी, इसके पहले स्कुल में लकड़ी के बेंच पर झुक कर, या लेट कर पीठ दुखा कर जल्दी जल्दी पेलवा लेती थी।
चुदाई और भोजन जितना धीरे धीरे आराम से हो, उतना ही स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक होता है।
मेरी गाली ने विजय सर, जो अपना लण्ड हाथ में लेकर सहला रहे थे, को जैसे नींद से जगा दिया, वो तुरंत सबीहा के बड़े बड़े चूतड़ों की ओर आकर अपने शक्तिमान को सबीहा की गुफा के द्वार पर आकर टिका दिए।
विजय सर को कुछ और करने की ज़रूरत नहीं पड़ी, मेरी बुर पीते पीते ही सबीहा ने शक्तिमान द्वारा अपनी तिलस्मी गुफा पर दी जा रही दस्तक को सुन लिया, और अपने चूतड़ खुद ही पीछे की ओर धकेल के आधे शक्तिमान को तिलस्मी गुफा में प्रवेश करवा दिया।

मैंने देखा कि विजय सर का सर मारे आनंद के छत की ओर उठ गया, माधरचोद कहीं का, मुझे तो घच घच करके चोदता ही था , आज बोनस में मिली बुर पाकर निहाल हो गया।
( प्यारे मित्रों मैं जानती हूँ कि अपडेट्स छोटे हैं ,लेकिन रोज़ रोज़ थोड़ा थोड़ा लेने का मज़ा है. एक साथ पूरा लेके क्या फायदा?थोड़ा थक भी जाती हूँ, हिंदी टाइपिंग की आदत नहीं है, इतना लिखने में ही १ घंटा लग जाता है, आशा है आप सभी का पूर्ण सहयोग मिलता रहेगा .)

आनंद की अत्याधिक मात्रा से विजय सर की आँखें मींच गयी थीं। बोनस में मिली बुर पाकर उनका लण्ड निहाल हो चुका था। उन्हें कहाँ ये उम्मीद थी कि एक बुर पर आज एक बुर फ्री मिलेगी?
सबीहा का मुंह मेरे काममन्दिर में धंसा हुआ था और एक अत्यंत निपुण चुदक्कड़ चटोरी की भाँती वो अपनी जीभ से लण्ड का सुख दे रही थी, उसकी चटाई में ही मुझे स्वार्गिक सुख का अनुभव हो रहा था. मेरे हाथ उसके सर पे कभी उसके गालों को सहला रहे थे।
” रंडी सबीहा, चाट ले मेरी बुर, मेरे यार से पेलवा रही है, मेरी बुर चाट , मेरा हक़ तुझे दे रही हूँ, चाट दबा के मेरी बुर. हाँ ऐसे ही, आ आ आ स स स्स्स्स्स्स्स। आह आह आह , मस्त चाट रही है रे तू तो बुर, चटोरी, कहाँ से सीखा रीईई ऐस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्से बुर चाटनाआआआआ। आह मर गयी मैं रंडी , साली पी मेरी बुर, मन कर रहा है तेरे मुंह में ही मूत दूँ ,,,आआआआआअ आआआआअ ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ” मेरी कमर मेरे मंत्रोच्चारण की गति का साथ दे रही थी,
सबीहा जितना मेरी बुर दबा कर पीती , मैं उसे उतनी ही ज़ोर से दबा देती , और अपनी बुर को उसके मुंह पर घिसने लगती, इस घिस्सा घिसाई में मेरे भगनासा पर उसकी नाक रगड़ जाती जिससे मेरा रतिरस और तेज़ी से सर्र सर्र से निकल कर पुरे मैदान को भीगा देता , उसका मुंह और नाक पूरी तरह से मेरे रतिरस से भीग कर छपछपा गया था.

सबीहा मेरी बुर चाट रही थी तो मुझे मज़ा आ रहा था, विजय सर अपने शक्तिमान से सबीहा की तिलस्मी गुफा भेदन में लगे थे तो उन दोनों को स्वर्गिक सुख की प्राप्ति हो रही थी, यानि सामूहिक चोदन में सही तरह से बंटवारा करो और सब अपनी खुजली मिटाओ। सामूहिक चोदन में अगर तीन लोग आपस में अपना रोल समझ कर बाँट लें तो चुदाई का आनंद आ जाता है. वही हो रहा था।
सबीहा की हाइट हम तीनों सहेलियों में सबसे छोटी थी ,नाक नक्श में वो तीनों में साधारण थी।
रंग उसका गोरा बहुत था, हम तीनों सहेलियों का रंग वैसे बहुत गोरा है, लेकिन उसका सबसे ज्यादा और चमकदार ।
नाते कद की लड़की ,शरीर भरा पूरा था, चूचियाँ उसकी गज़ब की शेप में थी।
उसके चूतड़ का कसाव भी ज़बरदस्त था. उसी चूतड़ के निचे उसकी चमचम में इस समय विजय सर अपना हथोड़ा चला रहे थे,
अभी आधा ही लण्ड घुसा था , जितना सबीहा ने अपनी चूतड़ों को पीछे की और धकियाया था, यानि विजय सर ने अबतक अपने लण्ड को सबीहा की बुर के मुहाने पर रखने के अतिरिक्त किसी प्रकार की मेहनत नहीं की थी।
यहां तक की आलसी सैयां ने सबीहा की कातिलाना चूचियों तक को नहीं पकड़ा था ,दोनों बिचारी “अनअटेंडेड लगेज” की तरह झूल रही थीं।
सबीहा के बुर के गहराई में पूरा लण्ड घुसे बिना उसे कहाँ चैन आना था?
चूँकि उसका सर मैने दबा रखा था तो कुछ बोलभी नहीं पा रही थी और कुतिया पोजीशन में आखिर पीछे कितना धकियाती? मैं रेफरी की तरह इस रुकी हुई कुश्ती को समझ गयी और चीखी ” अरेेेे अपना लण्ड मार ना अंदर ,भडुवे,पेलना नहीं आता क्या तुझे? अब क्या सबीहा तुझे पटक कर चोदे? लण्ड तेरे पास है या उसके पास?”
ऐसी ऐसी शब्दावलियों का उपयोग मैं उस भीषण चुदाई के समय कर रही थी कि बाद में जब स्वसमीक्षा की तो खुद शर्म से टमाटर हो गयी।
अब इतना सुनने के बाद अगर कोई लण्डधारी अपनी कमर को कष्ट ना दे तो वो लण्ड सिर्फ शोपीस के लिए लगा के घूम रहा है, ये समझ लीजिए.
धन्न से एक ही झटके में विजय सर ने सबीहा की कमर को पकड़ कर शक्तिमान को सीधा तिलस्मी गुफा के अंतिम छोर पे पहुंचा दिया , बाहर बिचारे दो छोटे छोटे पहरेदार सबीहा के सफाचट बुर पर टकरा कर झटका खाकर झूल गए , अब ये दोनों बचुवे भी “अनअटेंडेड लगेज ” की श्रेणी में आ चुके थे।
इस धक्के के परिणाम स्वरुप सबीहा के मुंह से जोरदार आह निकल गयी , और उसका मुंह मेरे बुर से हट गया। उस हलवी लौड़े की ताकत को मेरी बुर जानती थी, जब चलता था तो चलता नहीं बुर को चलता कर देता था।
मैंने तुरंत सबीहा का मुंह पकड़ कर अपनी बुर पर लगा दिया और कहा” क्यों रे रंडी,छिनार, सुहेल की रखैल, कैसा लगा मेरा सैयां का लण्ड ? है ना तेरे भडुवे सुहेल से भी दमदार , एकदम खोका बम ? सोच मेरी बुर की ताकत, अब फड़वा इस मर्दाने लण्ड से अपनी झांट भर की भोसड़ी ”
गुस्से में या शरारत में सबीहा ने मेरी बुर की पुत्तियों को काट लिया , मैं चीख पड़ी ” मर गयी मैं, साली रंडी, चाट छिनार, काट मत , नहीं तो अभी तेरी बुर में लाल मिर्ची भरवा दूंगी”
उधर विजय सर ने लपक कर सी सी सी करते हुए सबीहा के झूलते हुए अनअटेंडेड लगेज को पकड़ कर उसे उसकी पेट की और खींचना शुरू कर दिया।
इस प्रकार वो अब सबीहा पर लगभग पूरी तरह से लद चुके थे जैसे वेताल राजा विक्रम पर लटकता था.
हमारी छोटी सी सबीहा और ऊपर लदे हुए ५ फिट १० इंच के श्री विजय त्रिपाठी ,मूल निवासी ग्राम मादरडीह (माधरचोद नहीं) ,जिला जौनपुर ,जिन्हे मिली आज दो दो बुर.
अब तो ओखली में मुसल चले धन धनाधन गीत होने वाला था।

बुर की पेलाई ,
जैसे चमचम की मलाई .
खानेवाला त्रिपाठी कुत्ता ,
देनेवाली सबीहा हलवाई।
जो करे चुदाई मारे ज़ोर की ठुकाई ,
वही ले मज़ा जो पेले दूजे की लुगाई।

अब विजय सर का चम्मच सबीहा के चमचम में पूरी तरह घुस चुका था। विजय सर ने धीरे से अपनी कमर पीछे की, उनका चम्मच तने के अंत तक बाहर आ गया, चम्मच का फुला हुआ चौड़ा हिस्सा उन्होंने चमचम में ही रहने दिया। चमचम से चाशनी टपक रही थी और पहले से भीगे चम्मच को और भी भीगा चुकी थी। दो अनअटेंडेंड लगेज जहां से चमचम में चाशनी मिलने वाली थी, चम्मच के निचे झूल रहे थे। अचानक विजय सर ने कसकर एक जोर की ठाप मारी , पूरा बेड हिल गया और सबीहा अप्रत्याशित झटके को संभाल नहीं पायी और आह करके मुझपर गिर गयी, अब उसका मुंह मेरी झलझल करती चूचियों पर आ गिरा. मेरी बुर पर उसकी बुर आ मिली।
बिलकुल चित्त थी। विजय सर का चम्मच पीछे से ही उसकी चमचम में घुस चुका था। और उसकी चमचम आगे से मेरे चमचम पे रगड़ रही थी।
विजय सर ने कुशल पहलवान की भाँती अपने प्रतिद्वंदी को जकड रखा था , और उसकी चूचियों को खिंच रहे थे . उन दोनों का भार मेरे शरीर पर था।
अब विजय सर ने कुचक कुचक करके धीरे धीरे सबीहा की बुर को पेलना शुरू किया. जितना वो अंदर बाहर करते उतना ही सबीहा की बुर मेरी बुर से रगड़ती , पता नहीं किस की चाशनी किस चमचम से निकल कर कहाँ जा आ रही थी।
मैंने सबीहा के मुंह को आराम नहीं देने की ठानी थी , उसके बालों को पकड़ कर अपनी दायीं चूची उसके मुंह में घुसा दी , और उसने अपने एक हाथ से मेरी बाईं चूची थाम कर मिसना शुरू कर दी।
मेरे बलमा जितना उसे फुचुक फुचुक चोदते उतना ही जोर से वो मेरी चूची मिसने लगती और चूची को पीने लगती।
कमरे में चाश्नियों के मिलन से छप छप और चम्मच के अंदर बाहर होने से फक फक की आवाज़ गूंजने लगी।
आनंद के अतिरेक में तीनों अग्निहोत्रियों की आंखे बंद हो चुकी थीं।
मैंने थोड़ा मजाक करने की सोची और मेरी टांगों को विजय सर के कमर पर लपेट कर उसे कैंची की तरह पूरी ताकत से जकड लिया। जिससे विजय सर के फुचुक फुचुक की गति बाधित होने लगी, सबीहा को खिज़ आ गयी। अपने मुंह से मेरी चूची निकाल कर डांट कर बोली ,
” रंडी , चोदने दे ना उसे, क्यों दबाई है, माधरचोद कहीं की?”
और ज़ोर से मेरी चूची को दबा के काट ली।
मैं चीख पड़ी ” छिनार कहीं की ये तेरे बाप ने सऊदी से भेजा है क्या काटने के लिए, कहीं कट गया तो क्या तेरी माँ मुझे नया लगा कर देगी?”
ये सुनकर सबीहा ने कुछ कहा नहीं सिर्फ मेरी चूची को जितना हो सकता मुंह में भर कर खिंच खिंच कर चभ चभ कर पीने लगी।
उधर विजय सर ने अपनी कमर पर लपेटे गए मेरे पांवों को चिकोट लिया.
मैं चीखी ” आह, माधरचोद, मार डालोगे तुम लोग चुदाई के चक्कर में मुझे? मुफ्त की बुर चोदने मिली है तो काट के फेंक दो मुझे ”
इस समय कौन आह उह सुनता है?
अब विजय सर ने ठान लिया कि जबतक चाशनी ना निकाल लें तबतक चम्मच से चमचम फेंटते रहेंगे।
उसी में उन्होंने अपनी कमर की स्पीड बढ़ा दी।
मंत्रोच्चार की बारी अब उनकी थी।
” आह आह आह,,,,मस्त बुर मिल गयी आज, आह ओह , मज़ा आ गया , मस्त मलाई बुर है, उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़ , क्या बुर है, लसलस बुर तेरी, मर गया रंडी साली, क्या चुदवाती है तू, आह मर गया , तेरी बुर का आज भोसड़ा बनाऊंगा , ले रंडी ले खा मेरा लण्ड खा ”
जितने तेज़ उनके धक्के लगते उतनी तेज़ी से सबिहा की बुर मेरी बुर से घिसती , सबीहा का भगनासा मेरे भग्नासे पे रगड़ खाता और हम दोनों थर थर कांपते।
साथ में उसकी बुर की गहराई में घुस चुका माधारडीह का माधरचोद विजय तिवारी का लण्ड धनं धनं पेले जा रहा था।
सबीहा डबल मज़्ज़ा लिए जा रही थी।
अचानक विजय सर स्स्सी शसि स्स्स्स्स्सी स्स्स्स्सी स्स्स्सी करने लगे. इसका मतलब चाशनी अब उनके झूलेडुले से निल कर चम्मच के चौड़ाई तक आ रही थी।
” आए आए रंडी, सबीहा, तेरी माँ का भोसड़ा,मेरा पानी आ रहा है , बोल रंडी भर दूँ अपना माल तेरी भोसड़ी में?”
सबीहा ने अपना मुंह से मेरी चूची को आज़ाद कर दिया और अब पुरे ज़ोर से दोनों चूचियों को मसलने लगी और तेज़ी से अपनी बुर भी मेरी बुर पर रगड़ने लगी।
” पेल ले राजा पेल, पेल मुझे , रहम मत कर, फाड़ा मेरी बुर को, आआआआ आआआ आआआ ,स्स्स्सस्स्स्स स्स्स्स्स्स्स ,ऊओफ्फ्फ्फ्फ्फ़ , ओह ओह , ,पेल मज़्ज़ाआ आ गया ,,,,,नशा आ रहा है, पेल पेल पेल, रुकना मत, उसीमें भर दे अपना , पेल के गाभिन कर दे ,भर दे अपनी मलाई , मेरी बुर में, रंडी हूँ मैं , चोदो मुझे सब मिलकर. भर दे माधरचोद, मैं झडी ईइइइइइइइइइइइइइ ”
छल्ल्ल छल छल , भर भर के सबीहा एगराम पानी का झरना फुट कर मेरी बुर पर तेज़ी से गिरने लगा, उधर विजय सर ” आआआआआआआ गयाआआआआ मैं भीइइइइइइइइइइइइइइइइइइइइइइइइइ”
उनके चम्मच से सारी चाशनी भर के चमचम में घुस गयी। करोड़ों शुक्राणु तैर कर सबीहा के गर्भाशय की ओर हल्ला मचाते हुए टूट पड़े, हमेशा की तरह।
लेकिन उन बेचारों को क्या मालुम था कि ये हमारे विजय बाबू बायोलॉजी के टीचर हैं और हम दोनों रंडियों को उनके दोनों भडुवे निर्बाध रूप से गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन कराते रहते हैं। तो वो बेचारे करोड़ों शुक्राणु फिर मायूस होकर नालो में बह या कपडे में चिपक जाने वाले थे ।
महायज्ञ सम्पन्न हुआ.
भर भर के घी सफल मंत्रोचचार के साथ हवन कुण्ड में भर दिया गया.
दोनों संतुष्ट अगिनहोत्री धम्म से बिस्तर पर गिरकर साँसे लेने लगे.
मैं अभी भी संतुष्ट नहीं हुई थी लेकिन, “मेरी बुर की खुजली कौन मिटाएगा, तुम दोनों तो गांड हिला के खतम हो गए?” मैं चिढ कर बोली।
” मैं पेलूँगा कुत्ती तुझे ”
धम्म से दरवाज़ा खुला।
…………………………………………

लौड़ा चोदे भोसडा, बिना तेल लगाय

जिसको पीना लण्ड का पानी हो जल्दी से आ जाय।

पेल पेल कर फाड़ दे , ऐसा लण्ड प्रचंड

कांपे जिससे बुर ,ऐसा दे उसे दण्ड।

मेरी आँखे अभी भी चरमोतकर्ष पर ना पहुँचने की वजह से बंद थी ,मेरा एक हाथ खुद की चूची को मसल रहा था , दुसरा हाथ, बुर के भगनासा पे सहला रहा था।
मैंने आवाज़ तो सुनी, लेकिन इससे पहले आँखें खोलूं और सम्भलूँ, अपने शरीर पर मैंने धड़ाम से एक पुरुष के शरीर को गिरते हुए महसूस किया , और फच्च से बिना किसी पूर्व चेतावनी के मेरी मदनरस से नहा चुकी बुर के छेद में आधा से अधिक लंड घुस चुका था।
सोते हुए और लापरवाह प्रहरी की करनी का फल सीमा की चौकी को भुगतना पड़ता है, मेरी चौकी में बन्दुक की संगीन घुस चुकी थी, और मुझे पता भी नहीं चला कि आक्रमण किस सैनिक द्वारा हुआ है?
मेरी चौकी पर इस अचानक हुए हमले के कारण मेरे मुंह से हच्च से आवाज़ निकल गयी।
लण्ड को बुर तो मिला जिससे बुर में मच रही खुजली को थोड़ी शान्ति मिली लेकिन , मन में स्वाभाविक प्रश्न उठा ” ये कौन चित्रकार है, सॉरी , ये किसने किया बुर पे प्रहार है?”
आँखे खुलीं तो देख भी ना पायी क्युकी जिस सैनिक ने मेरी चुनिया बुर में बन्दुक की संगीन घुसा दी थी वो मेरे कंधे में अपना मुंह गडा कर मेरे कन्धों को काटने लगा था।
मुझे गुदगुदी भी होने लगी थी , जो भी आक्रमणकारी था बड़ा कुशल चुदक्कड़ था। गीले खेत में बड़ी आसानी से धान की रोपाई हो जाती है , और मेरे खेत में तो बाढ़ आ चुकी था, तो बड़ी आसानी से धान रोपाई हो गयी।
फिर भी पता तो चले कौन है जो सीधा निशाना लगाकर खेत में झंडा गाड़ चुका था?
ये सब मात्र एक से दो सेकण्ड में हुआ , विजय सर की आवाज़ आयी ” सुहेल? ये क्या है?”
ओह्ह्ह , ये मियाँ सुहेल हैं जो अपना खतना किया हुआ लण्ड मेरी बुर में घुसा चुके थे।
” क्यों तिवारी, अभी मेरे माल को धनाधन पेल रहा था तब सोचा क्या? अब मैं भी बदला लूंगा, जैसे मैं चुपचाप जलते हुए देख रहा था ,तू भी देख या आके मज़ा ले, सबीहा साली रंडी, मेरे सामने दूसरे से पेलवाती है? अब चल उसका लण्ड फिर से खड़ा कर और उसे तैयार कर नहीं तो अभी यहां तेरी गांड में मिर्ची भर दूंगा”
अब सुहेल अपने दोनों हथेलियों के बल पर था और एक झटके में उसने अपना पूरा लण्ड मेरी बुर के जड़ तक घुसा दिया।
अब मैं उसे स्पष्ट देख पा रही थी और वो मुझे , बड़े प्यार से उसने आँख मारी और मुस्कुरा दिया।
मैं कोई जवाब नहीं दे पायी और विजय सर का रिएक्शन देखने अपना मुंह उन दोनों की ओर घुमा दी।
सबीहा बोली” अब जाने दो सर, अब क्या पर्दा रह गया है,”
ये कह कर वो विजय सर के गीले लटकते चूहे को पकड़ कर सहलाने लगी।
और विजय सर के सर को झुका कर उनके मुंह में मेरी चूची पकड़ कर डाल दी।
अभी अभी विजय सर दो बार अपने मदनरस चाशनी को अपने चम्मच से टपका चुके थे।
तो ढीले ढाले ललुआ को प्रचंड कामदण्ड बनने के लिए कुछ विशेष इलाज़ की आवश्यकता थी , सबीहा खिलाडी थी , उसने झुक कर ललुआ को अपने मुंह में दबा लिया और उसके निचे झूलते हुए गुलाबजामुनो को दबाने लगी।
इधर सुहेल झम झम करके बिना कुण्ड़ी खड़काए सीधा अंदर घुस चुका था. हथेलियों पर उसने अपने शरीर का वजन डाल दिया था और उसका पूरा प्रचंड कामदण्ड मेरी बुर में अंदर बाहर अंदर बाहर हो रहा था। मेरी चूची विजय सर चप्प चप्प करके पिने लगे , वहीँ सबीहा सर के उथ्तित हो रहे लण्ड को गपागप चूस रही थी। अब सबीहा और सुहेल के बीच जैसे कम्पिटिशन शुरू हो गया कि सबीहा का मुंह तेज़ चलेगा या सुहेल कीसावित्री एक 18 साल की गाओं की लड़की है जिसका बाप बहुत पहले ही मर चुका था और एक मा और एक छोटा भाई घर मे था. ग़रीबी के चलते मा दूसरों के घरों मे बर्तन झाड़ू करती और किसी तरह से अपना और बचों का पेट भर लेती. आख़िर ग़रीबी तो सबसे बड़ा पाप है,,, यही उसके मन मे आता और कभी -2 बड़बड़ाती .. गाओं का माहौल भी कोई बहुत अच्छा नही था और इसी के चलते सावित्री बेटी की पड़ाई केवल आठवीं दर्ज़े तक हो सकी. अवारों और गुन्दो की कमी नहीं थी. बस इज़्ज़त बची रहे एसी बात की चिंता सावित्री की मा सीता को सताती थी. क्योंकि सीता जो 38 साल की हो चुकी थी करीब दस साल पहले ही विधवा हो चुकी थी….. ज़िम्मेदारियाँ और परेशानियो के बीच किसी तरह जीवन की गाड़ी चलती रहे यही रात दिन सोचती और अपने तकदीर को कोस्ती. सावित्री के सयाने होने से ये मुश्किले और बढ़ती लग रही थी क्योंकि उसका छोटा एक ही बेटा केवल बारह साल का ही था क्या करता कैसे कमाता… केवल सीता को ही सब कुछ करना पड़ता. गाओं मे औरतों का जीवन काफ़ी डरावना होता जा रहा था क्योंकि आए दिन कोई ना कोई शरारत और छेड़ छाड़ हो जाता.. एसी लिए तो सावित्री को आठवीं के बाद आगे पढ़ाना मुनासिब नहीं समझा. सीता जो कुछ करती काफ़ी सोच समझ कर.. लोग बहुत गंदे हो गये हैं ” यही उसके मन मे आता. कभी सोचती आख़िर क्यों लोग इतने गंदे और खराब होते जा रहें है.. एक शराब की दुकान भी गाओं के नुक्कड़ पर खुल कर तो आग मे घी का काम कर रही है. क्या लड़के क्या बूढ़े सब के सब दारू पी कर मस्त हो जाते हैं और गंदी गलियाँ और अश्लील हरकत लड़ाई झगड़ा सब कुछ शुरू हो जाता.. वैसे भी दारू की दुकान अवारों का बहुत बढ़ियाँ अड्डा हो गया था. रोज़ कोई ना कोई नयी बात हो ही जाती बस देर इसी बात की रहती कि दारू किसी तरह गले के नीचे उतर जाए…फिर क्या कहना गालिया और गंदी बातों का सिलसिला शुरू होता की ख़त्म होने का नाम ही नही लेता . चार साल पहले सावित्री ने आठवीं दर्ज़े के बाद स्कूल छोड़ दिया .. वो भी मा के कहने पर क्योंकि गाओं मे आवारा और गुन्दो की नज़र सावित्री के उपर पड़ने का डर था. ए भी बात बहुत हद तक सही थी. ऐसा कुछ नही था कि सीता अपने लड़की को पढ़ाना नहीं चाहती पर क्या करे डर इस बात का था कि कहीं कोई उनहोनी हो ना जाए. चार साल हो गये तबसे सावित्री केवल घर का काम करती और इधेर उधेर नही जाती. कुछ औरतों ने सीता को सलाह भी दिया कि सावित्री को भी कहीं किसी के घर झाड़ू बर्तन के काम पे लगा दे पर सीता दुनिया के सच्चाई से भली भाँति वाकिफ़ थी. वह खुद दूसरों के यहाँ काम करती तो मर्दो के रुख़ से परिचित थी.. ये बात उसके बेटी सावित्री के साथ हो यह उसे पसंद नहीं थी. मुहल्ले की कुछ औरतें कभी पीठ पीछे ताने भी मारती ” राजकुमारी बना के रखी है लगता है कभी बाहर की दुनिया ही नही देखेगी…बस इसी की एक लड़की है और किसी की तो लड़की ही नहीं है..” धन्नो जो 44 वर्ष की पड़ोस मे रहने वाली तपाक से बोल देती.. धन्नो चाची कुछ मूहफट किस्म की औरत थी और सीता के करीब ही रहने के वजह से सबकुछ जानती भी थी. अट्ठारह साल होते होते सावित्री का शरीर काफ़ी बदल चुका था , वह अब एक जवान लड़की थी, माहवारी तो 15 वर्ष की थी तभी से आना शुरू हो गया था. वह भी शरीर और मर्द के बारे मे अपने सहेलिओं और पड़ोसिओं से काफ़ी कुछ जान चुकी थी. वैसे भी जिस गाँव का माहौल इतना गंदा हो और जिस मुहल्ले मे रोज झगड़े होते हों तो बच्चे और लड़कियाँ तो गालिओं से बहुत कुछ समझने लगते हैं. धन्नो चाची के बारे मे भी सावित्री की कुछ सहेलियाँ बताती हैं को वो कई लोगो से फासी है. वैसे धन्नो चाची की बातें सावित्री को भी बड़ा मज़ेदार लगता. वो मौका मिलते ही सुनना चाहती. धन्नो चाची किसी से भी नही डरती और आए दिन किसी ना किसी से लड़ाई कर लेती. एक दिन सावित्री को देख बोल ही पड़ी ” क्या रे तेरे को तो तेरी मा ने क़ैद कर के रख दिया है. थोड़ा बाहर भी निकल के देख, घर मे पड़े पड़े तेरा दीमाग सुस्त हो जाएगा; मा से क्यो इतना डरती है ” सावित्री ने अपने शर्मीले स्वभाव के चलते कुछ जबाब देने के बजाय चुप रह एक हल्की मुस्कुराहट और सर झुका लेना ही सही समझा. वह अपने मा को बहुत मानती और मा भी अपनी ज़िम्मेदारीओं को पूरी तरीके से निर्वहन करती. वाश्तव मे सावित्री का चरित्र मा सीता के ही वजह से एस गंदे माहौल मे भी सुरच्छित था. सावित्री एक सामानया कद काठी की शरीर से भरी पूरी मांसल नितंबो और भारी भारी छातियो और काले घने बाल रंग गेहुआन और चहेरे पर कुछ मुहाँसे थे. दिखने मे गदराई जवान लड़की लगती. सोलह साल मे शरीर के उन अंगो पर जहाँ रोएँ उगे थे अब वहाँ काफ़ी काले बात उग आए थे. सावित्री का शरीर सामान्य कद 5’2 ” का लेकिन चौड़ा और मांसल होने के वजह से चूतड़ काफ़ी बड़ा बड़ा लगता था.

एक दम अपनी मा सीता की तरह. घर पर पहले तो फ्रॉक पहनती लेकिन जबसे जंघे मांसल और जवानी चढ़ने लगी मा ने सलवार समीज़ ला कर दे दिया. दुपट्टा के हटने पर सावित्री के दोनो चुचियाँ काफ़ी गोल गोल और कसे कसे दिखते जो पड़ोसिओं के मूह मे पानी लाने के लिए काफ़ी था ये बात सच थी की इन अनारों को अभी तक किसी ने हाथ नही लगाया था. लेकिन खिली जवानी कब तक छुपी रहेगी , शरीर के पूरे विकास के बाद अब सावित्री के मन का भी विकास होने लगा. जहाँ मा का आदेश की घर के बाहर ना जाना और इधेर उधर ना घूमना सही लगता वहीं धन्नो चाची की बात की घर मे पड़े पड़े दीमाग सुस्त हो जाएगा ” कुछ ज़्यादा सही लगने लगा. फिर भी वो अपने मा की बातों पर ज़्यादा गौर करती सीता के मन मे सावित्री के शादी की बात आने लगी और अपने कुछ रिश्तेदारों से चर्चा भी करती, आख़िर एस ग़रीबी मैं कैसे लड़की की शादी हो पाएगी. जो भी कमाई मज़दूरी करने से होती वह खाने और पहनने मैं ही ख़त्म हो जाता. सीता को तो नीद ही नही आती चिंता के मारे इधेर छोटे लड़के कालू की भी पढ़ाई करानी थी रिश्तेदारों से कोई आशा की किरण ना मिलने से सीता और परेशान रहने लगी रात दिन यही सोचती कि आख़िर कौन है जो मदद कर सकता है सीता कुछ क़र्ज़ लेने के बारे मे सोचती तो उस अयाश मंगतराम का चेहरा याद आता जो गाओं का पैसे वाला सूदखोर बुद्धा था और अपने गंदी हरक़त के लिए प्रषिध्ह था तभी उसे याद आया कि जब उसके पति की मौत हुई थी तब पति का एक पुराना दोस्त आया था जिसका नाम सुरतलाल था, वह पैसे वाला था और उसके सोने चाँदी की दुकान थी और जात का सुनार था उसका घर सीता के गाओं से कुछ 50 मील दूर एक छोटे शहर मे था, बहुत पहले सीता अपने पति के साथ उसकी दुकान पर गयी थी जो एक बड़े मंदिर के पास थी सीता की आँखे चमक गयी की हो सकता है सुरतलाल से कुछ क़र्ज़ मिल जाए जो वह धीरे धीरे चुकता कर देगी

एक दिन समय निकाल कर सीता उस सुरतलाल के दुकान पर गयी तो निराशा ही हाथ लगी क्योंकि सुरतलाल को इस बात का यकीन नहीं था कि सीता उसका क़र्ज़ कैसे वापस करसकेगी….. सीता की परेशानियाँ और बढ़ती नज़र आ रही थी कभी इन उलज़हनो मे यह सोचती कि यदि सावित्री भी कुछ कम करे तो आमदनी बढ़ जाए और शादी के लिए पैसे भी बचा लिया जाए चौतरफ़ा समस्याओं से घिरता देख सीता ने लगभग हथियार डालना शुरू कर दिया.. अपनी ज़िद , सावित्री काम करने के बज़ाय घर मे ही सुरक्ष्हित रखेगी को वापस लेने लगी उसकी सोच मे सावित्री के शादी के लिए पैसे का इंतज़ाम ज़्यादा ज़रूरी लगने लगा. गाओं के मंगतराम से क़र्ज़ लेने का मतलब कि वह सूद भी ज़्यादा लेता और लोग यह भी सोचते की मंगतराम मज़ा भी लेता होगा, इज़्ज़त भी खराब होती सो अलग. सीता की एक सहेली लक्ष्मी ने एक सलाह दी कि “सावित्री को क्यो ना एक चूड़ी के दुकान पर काम करने के लिए लगा देती ” यह सुनकर की सावित्री गाओं के पास छोटे से कस्बे मे कॉसमेटिक चूड़ी लिपीसटिक की दुकान पर रहना होगा, गहरी सांस ली और सोचने लगी. सहेली उसकी सोच को समझते बोली ” अरी चिंता की कोई बात नही है वहाँ तो केवल औरतें ही तो आती हैं, बस चूड़ी, कंगन, और सौंदर्या का समान ही तो बेचना है मालिक के साथ, बहुत सारी लड़कियाँ तो ऐसे दुकान पर काम करती हैं ” इस बात को सुन कर सीता को संतुष्टि तो हुई पर पूछा ” मालिक कौन हैं दुकान का यानी सावित्री किसके साथ दुकान पर रहेगी” इस पर सहेली लक्ष्मी जो खुद एक सौंदर्या के दुकान पर काम कर चुकी थी और कुछ दुकानो के बारे मे जानती थी ने सीता की चिंता को महसूस करते कहा ” अरे सीता तू चिंता मत कर , दुकान पर चाहे जो कोई हो समान तो औरतों को ही बेचना है , बस सीधे घर आ जाना है, वैसे मैं एक बहुत अच्छे आदमी के सौंदर्या के दुकान पर सावित्री को रखवा दूँगी और वो है भोला पंडित की दुकान, वह बहुत शरीफ आदमी हैं , बस उनके साथ दुकान मे औरतों को समान बेचना है, उनकी उम्र भी 50 साल है बाप के समान हैं मैं उनको बहुत दीनो से जानती हूँ, इस कस्बे मे उनकी दुकान बहुत पुरानी है, वे शरीफ ना होते तो उनकी दुकान इतने दीनो तक चलती क्या?” सीता को भोला पंडित की बुढ़ापे की उम्र और पुराना दुकानदार होने से काफ़ी राहत महसूस कर, सोच रही थी कि उसकी बेटी सावित्री को कोई परेशानी नही होगी.
लक्ष्मी की राय सीता को पसंद आ गयी , आखिर कोई तो कोई रास्ता निकालना ही था क्योंकि सावित्री की शादी समय से करना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी. दुसरे दिन लक्ष्मी के साथ सावित्री भोला पंडित के सौंदर्य प्रसाधन के दुकान के लिए चली. कस्बे के एक संकरी गली में उनकी दुकान थी. दुकान एक लम्बे कमरे में थी जिसमे आगे दुकान और पिछले हिस्से में पंडित भोला रहते थे. उनका परिवार दुसरे गाँव में रहता था. लक्ष्मी ने सीता को भोला पंडित से परिचय कराया , स्वभाव से शर्मीली सीता ने सिर नीचे कर हल्की सी मुस्कराई. प्रणाम करने में भी लजा रही थी कारण भी था की वह एक गाँव की काफी शरीफ औरत थी और भोला पंडित से पहली बार मुलाकात हो रही थी. ” अरे कैसी हो लक्ष्मी , बहुत दिनों बाद दिखाई दी , मैंने बहुत ईन्तजार किया तुम्हारा , मेरी दुकान पर तुम्हारी बहुत जरूरत है भाई” भोला पंडित ने अपनी बड़ी बड़ी आँखों को नाचते हुए पूछा. ” अरे क्या करूँ पंडित जी मेरे ऊपर भी बहुत जिम्मेदारिया है उसी में उलझी रहती हूँ फुर्सत ही नहीं मिलती” लक्ष्मी ने सीता की ओर देखते मुस्कुराते हुए जवाबदिया “जिम्मेदारियो में तो सबकी जिंदगी है लक्ष्मी कम से कम खबर क्र देती , मैं तो तुम्हारे इस आश्वाशन पर की जल्दी मेरे दुकान पर काम करोगी मैंने किसी और लड़की या औरत को ढूंढा भी नहीं” भोला पंडित ने सीता की ओर देखते हुए लक्ष्मी से कुछ शिकायती लहजे में कहा, ” मुझे तो फुर्सत अभी नहीं है लेकिन आपके ही काम के लिए आई हूँ और मेरी जगह इनकी लड़की को रख लीजिये . ” सीता की ओर लक्ष्मी ने इशारा करते हुए कहा. भोला पंडित कुछ पल शांत रहे फिर पूछे “कौन लड़की है कहाँ , किस दुकान पर काम की है” शायद वह अनुभव जानना चाहते थे “अभी तो कही काम नहीं की है कहीं पर आपके दुकान की जिम्मेदारी बखूबी निभा लेगी ” लक्ष्मी ने जबाव दिया लेकिन भोला पंडित के चेहरे पर असंतुष्टि का भाव साफ झलक रहा था शायद वह चाहते थे की लक्ष्मी या कोई पहले से सौन्दर्य प्रसाधन की दुकान पर काम कर चुकी औरत या लड़की को ही रखें . भोला पंडित के रुख़ को देखकर सीता मे माथे पर सिलवटें पड़ गयीं. क्योंकि सीता काफ़ी उम्मीद के साथ आई थी कि उसकी लड़की दुकान पर काम करेगी तब आमदनी अच्छी होगी जो उसके शादी के लिए ज़रूरी था. सीता और लक्ष्मी दोनो की नज़रें भोला पंडित के चेहरे पर एक टक लगी रही कि अंतिम तौर पर क्या कहतें हैं. लक्ष्मी ने कुछ ज़ोर लगाया “पंडित जी लड़की काफ़ी होशियार और समझदार है आपके ग्राहको को समान बखूबी बेच लेगी , एक बार मौका तो दे कर देख लेने मैं क्या हर्ज़ है” पंडित जी माथे पर हाथ फेरते हुए सोचने लगे. एक लंबी सांस छोड़ने के बाद बोले “अरे लक्ष्मी मेरे ग्राहक को एक अनुभवी की ज़रूरत है जो चूड़ी, कंगन, बिंदिया के तमाम वरीटीएस को जानती हो और ग्राहको के नस को टटोलते हुए आराम से बेच सके, तुम्हारी लड़की तो एक दम अनाड़ी है ना, और तुम तो जानती हो कि आजकल समान बेचना कितना मुश्किल होता जा रहा है.” सीता चुपचाप एक तक दोनो के बीच के बातों को सुन रही थी. तभी भोला पंडित ने काफ़ी गंभीरता से बोले ” लक्ष्मी मुश्किल है मेरे लिए” सीता के मन मे एक निराशा की लहर दौर गयी. थोड़ी देर बाद कुछ और बातें हुई और भोला पंडित के ना तैयार होने की दशा मे दोनो वापस गाओं की ओर चल दी. रास्ते मे लक्ष्मी ने सीता से बोला “तुमने तो लड़की को ना तो पढ़ाया और ना ही कुछ सिखाया और बस घर मैं बैठाए ही रखा तो परेशानी तो होगी ही ना; कहीं पर भी जाओ तो लोग अनुभव या काम करने की हुनर के बारे मे तो पूछेनएगे ही ” सीता भी कुछ सोचती रही और रास्ते चलती रही, फिर बोली “अरे तुम तो जानती हो ना की गाओं का कितना गंदा माहौल है कि लड़की का बाहर निकलना ही मुश्किल है, हर जगह हरामी कमीने घूमते रहते हैं, और मेरे तो आगे और पीछे कोई भी नही है कि कल कुछ हो जाए ऐसा वैसा तो” लक्ष्मी फिर जबाव दी पर कुछ खीझ कर ” तुम तो बेवजह डरती रहती हो, अरे हर जगह का माहौल तो एसी तरह का है तो इसका यह मतलब तो नही कि लोग अपने काम धंधा छोड़ कर घर मे तेरी बेटी की तरह बैठ जाए. लोग चाहे जैसा हो बाहर निकले बगैर तो कम चलने वाला कहा है. सब लोग जैसे रहेंगे वैसा ही तो हमे भी रहना होगा; ” सीता कुछ चुपचाप ही थी और रास्ते पर पैदल चलती जा रही थी. लक्ष्मी कुछ और बोलना सुरू किया “देखो मेरे को मैं भी तो दुकान मैं नौकरी कर लेती इसका ये मतलब तो नही की मेरा कोई चरित्र ही नही या मैं ग़लत हूँ ; ऐसा कुछ नही है बस तुमहरे मन मे भ्रम है कि बाहर निकलते ही चरित्र ख़तम हो जाएगा” सीता ने अपना पच्छ को मजबूत करने की कोशिस मे तर्क दे डाला “तुम तो देखती हो ना की रास्ते मैं यदि ये दारूबाज़ लोफर, लफंगे मिलते हैं तो किस तरह से गंदी बोलियाँ बोलते है, आख़िर मेरी बेटी तो अभी बहुत कच्ची है क्या असर पड़ेगा उसपर” लक्ष्मी के पास भी एसका जबाव तैयार था “मर्दों का तो काम ही यही होता है कि औरत लड़की देखे तो सीटी मार देंगे या कोई छेड़छाड़ शरारत भरी अश्लील बात या बोली बोल देंगे; लेकिन वी बस एससे ज़्यादा और कुछ नही करते, ; और इन सबको को सुनना ही पड़ता है इस दुनिया मे सीता” आगे और बोली “इन बातों को सुन कर नज़रअंदाज कर के अपने काम मे लग जाना ही समझदारी है सीता, तुम तो बाहर कभी निकली नही एसीलिए तुम इतना डरती हो” सीता को ये बाते पसंद नही थी लेकिन एन बातों को मानना जैसे उसकी मज़बूरी दिखी और यही सोच कर सीता ने पलट कर जबाव देना उचित नहीं समझा सीता एक निराश, उदास, और परेशान मन से घर मे घुसी और सावित्री की ओर देखा तभी सावित्री ने जानना चाहा तब सीता ने बताया कि भोला पंडित काम जानने वाली लड़की को रखना चाहता है. वैसे सावित्री के मन मे सीखने की ललक बहुत पहले से ही थी पर मा के बंदिशो से वह सारी ललक और उमंग मर ही गयी थी.
सारी रात सीता को नीद नही आ रही थी वो यही सोचती कि आख़िर सावित्री को कहाँ और कैसे काम पर लगाया जाए. भोला पंडित की वो बात जिसमे उन्होने अनुभव और लक्ष्मी की बात जिसमे ‘सुनना ही पड़ता है और बिना बाहर निकले कुछ सीखना मुस्किल है’ मानो कान मे गूँज रहे थे और कह रहे थे कि सीता अब हिम्मत से काम लो . बेबस सीता के दुखी मन मे अचानक एक रास्ता दिखा पर कुछ मुस्किल ज़रूर था, वो ये की भोला पंडित लक्ष्मी को अपने यहाँ काम पर रखना चाहता था पर लक्ष्मी अभी तैयार नहीं थी और दूसरी बात की सावित्री को काम सीखना जो लक्ष्मी सिखा सकती थी. सीता अपने मन मे ये भी सोचती कि यदि पंडित पैसा कुछ काम भी दे तो चलेगा . बस कुछ दीनो मे सावित्री काम सिख लेगी तो कहीं पर काम करके पैसा कमा सकेगी. इसमे मुस्किल इस बात की थी कि लक्ष्मी को तैयार करना और भोला पंडित का राज़ी होना. यही सब सोचते अचानक नीद लगी तो सुबह हो गयी. सुबह सुबह ही वो लक्ष्मी के घर पर पहुँच अपनी बात को काफ़ी विनम्रता और मजबूरी को उजागर करते हुए कहा. शायद भगवान की कृपा ही थी कि लक्ष्मी तैयार हो गयी फिर क्या था दिन मे दोनो फिर भोला पंडित के दुकान पर पहुँचे. भोला पंडित जो लक्ष्मी को तो दुकान मे रखना चाहता था पर सावित्री को बहुत काम पैसे मे ही रखने के लिए राज़ी हुआ. सीता खुस इस बात से ज़्यादा थी कि सावित्री कुछ सीख लेगी , क्योंकि की पैसा तो भोला पंडित बहुत काम दे रहा था सावित्री को . “आख़िर भगवान ने सुन ही लिया” सीता लगभग खुश ही थी और रास्ते मे लक्ष्मी से कहा और लक्ष्मी का अपने उपर एहसान जताया
घर पहुँचने के बाद सीता ने सावित्री को इस बात की जानकारी दी की कल से लक्ष्मी के साथ भोला पंडित के दुकान पर जा कर कम करना है . सावित्री मन ही मन खुस थी , उसे ऐसे लगा की वह अब अपने माँ पर बहुत भर नहीं है उम्र १८ की पूरी हो चुकी थी शरीर से काफी विकसित, मांसल जांघ, गोल और चौड़े चुतड, गोल और अनार की तरह कसी चुचिया काफी आकर्षक लगती थी. सलवार समीज और चुचिया बड़ी आकार के होने के वजह से ब्रा भी पहनती और नीचे सूती की सस्ती वाली चड्डी पहनती जिसकी सीवन अक्सर उभाड जाता. सावित्री के पास कुल दो ब्रा और तीन चड्ढी थी एक लाल एक बैगनी और एक काली रंग की, सावित्री ने इन सबको एक मेले में से जा कर खरीदी धी. सावित्री के पास कपड़ो की संख्या कोई ज्यादा नहीं थी कारण गरीबी. जांघों काफी सुडौल और मोती होने के वजह से चड्डी , जो की एक ही साइज़ की थी, काफी कसी होती थी. रानो की मोटाई चड्ढी में कस उठती मानो थोडा और जोर लगे तो फट जाये. रानो का रंग कुछ गेहुआं था और जन्घो की पट्टी कुछ काले रंग लिए था लेकिन झांट के बाल काफी काले और मोटे थे. बुर की उभार एकदम गोल पावरोटी के तरह थी. कद भले ही कुछ छोटा था लेकिन शरीर काफी कसी होने के कारण दोनों रानो के बीच बुर एकदम खरबूज के फांक की तरह थी. कभी न चुदी होने के नाते बुर की दोनों फलके एकदम सटी थी रंग तो एकदम काला था . झांटो की सफाई न होने और काफी घने होने के कारण बुर के ऊपर किसी जंगल की तरह फ़ैल कर ढक रखे थे.

झांटो की सफाई न होने और काफी घने होने के कारण बुर के ऊपर किसी जंगल की तरह फ़ैल कर ढक रखे थे.
जब भी पेशाब करने बैठती तो पेशाब की धार झांटो को चीरता हुआ आता इस वजह से जब भी पेशाब कर के उठती झांटो में मूत के कुछ बूंद तो जरूर लग जाते जो चड्डी पहने पर चड्डी में लगजाते. गोल गोल चूतडों पर चड्ढी एकदम चिपक ही जाती और जब सावित्री को पेशाब करने के लिए सलवार के बाद चड्ढी सरकाना होता तो कमर के पास से उंगलिओं को चड्ढी के किनारे में फंसा कर चड्ढी को जब सरकाती तो लगता की कोई पतली परत चुतद पर से निकल रही है. चड्ढी सरकते ही चुतड को एक अजीब सी ठंढी हवा की अनुभूति होती. चड्ढी सरकने के बाद गोल गोल कसे हुए जांघो में जा कर लगभग फंस ही जाती, पेशाब करने के लिए सावधानी से बैठती जिससे चड्ढी पर ज्यादे खिंचाव न हो और जन्घो के बीच कुछ इतना जगह बन जाय की पेशाब की धार बुर से सीधे जमीन पर गिरे . कभी कभी थोडा भी बैठने में गड़बड़ी होती तो पेशाब की गर्म धार सीधे जमीन के बजाय नीचे पैर में फंसे सलवार पर गिरने लगती लिहाज़ा सावित्री को पेशाब तुरंत रोक कर चौड़े चुतड को हवा में उठा कर फिर से चड्ढी सलवार और जांघो को कुछ इतना फैलाना पड़ता की पेशाब पैर या सलवार पर न पडके सीधे जमीन पर गिरे. फिर भी सावित्री को मूतते समय मूत की धार को भी देखना पड़ता की दोनों पंजों के बीच खाली जगह पर गिरे. इसके साथ साथ सिर घुमा कर इर्द गिर्द भी नज़र रखनी पड़ती कि कहीं कोई देख न ले. खुले में पेशाब करने में गाँव कि औरतों को इस समस्या से जूझनापड़ता. सावित्री जब भी पेशाब करती तो अपने घर के दीवाल के पीछे एक खाली पतली गली जो कुछ आड़ कर देती और उधर किसी के आने जाने का भी डर न होता . माँ सीता के भी मुतने का वही स्थान था. और मूतने के वजह से वहां मूत का गंध हमेशा रहता. मूतने के बाद सावित्री सीधा कड़ी होती और पहले दोनों जांघों कि गोल मोटे रानो में फंसे चड्ढी को उंगलिओं के सहारे ऊपरचढ़ाती चड्ढी के पहले अगले भाग को ऊपर चड़ा कर झांटों के जंगल से ढके बुर को ढक लेती फिर एक एक करके दोनों मांसल गोल चूतडो पर चड्ढी को चढ़ाती. फिर भी सावित्री को यह महसूस होता की चड्ढी या तो छोटी है या उसका शरीर कुछ ज्यादा गदरा गया है. पहनने के बाद बड़ी मुश्किल से चुतड और झांटों से ढकी बुर चड्ढी में किसी तरीके से आ पाती , फिर भी ऐसा लगता की कभी भी चड्ढी फट जाएगी. बुर के ऊपर घनी और मोटे बालो वाली झांटे देखने से मालूम देती जैसे किसी साधू की घनी दाढ़ी है और चड्डी के अगले भाग जो झांटों के साथ साथ बुर की सटी फांको को , जो झांटो के नीचे भले ही छुपी थी पर फांको का बनावट और उभार इतना सुडौल और कसा था की झांटों के नीचे एक ढंग का उभार तैयार करती और कसी हुई सस्ती चड्डी को बड़ी मुस्किल से छुपाना पड़ता फिर भी दोनों फांको पर पूरी तरह चड्डी का फैलाव कम पड़ जाता , लिहाज़ा फांके तो किसी तरह ढँक जाती पर बुर के फांको पर उगे काले मोटे घने झांट के बाल चड्डी के अगल बगल से काफी बाहर निकल आते और उनके ढकने के जिम्मेदारी सलवार की हो जाती. इसका दूसरा कारण यह भी था की सावित्री एक गाँव की काफी सीधी साधी लड़की थी जो झांट के रख रखाव पर कोई ध्यान नहीं देती और शारीरिक रूप से गदराई और कसी होने के साथ साथ झांट के बाल कुछ ज्यादा ही लम्बे और घना होना भी था. सावित्री की दोनों चुचिया अपना पूरा आकार ले चुकी थी और ब्रेसरी में उनका रहना लगभग मुस्किल ही था, फिर भी दो ब्रेस्रियो में किसी तरह उन्हें सम्हाल कर रख लेती. जब भी ब्रेसरी को बंद करना पड़ता तो सावित्री को काफी दिक्कत होती. सावित्री ब्रा या ब्रेसरी को देहाती भाषा में “चुचिकस” कहती क्योंकि गाँव की कुछ औरते उसे इसी नाम से पुकारती वैसे इसका काम तो चुचिओ को कस के रखना ही था. बाह के कांख में बाल काफी उग आये थे झांट की तरह उनका भी ख्याल सावित्री नहीं रखती नतीजा यह की वे भी काफी संख्या में जमने से कांख में कुछ कुछ भरा भरा सा लगता. सावित्री जब भी चलती तो आगे चुचिया और पीछे चौड़ा चुतड खूब हिलोर मारते. सावित्री के गाँव में आवारों और उचक्कों की बाढ़ सी आई थी.

सावित्री के उम्र की लगभग सारी लडकिया किसी ना किसी से चुदती थी कोई साकपाक नहीं थी जिसे कुवारी कहा जा सके . ऐसा होगा भी क्यों नहीं क्योंकि गाँव में जैसे लगता को शरीफ कम और ऐयास, गुंडे, आवारे, लोफर, शराबी, नशेडी ज्यादे रहते तो लड़किओं का इनसे कहाँ तक बचाया जा सकता था. लड़किओं के घर वाले भी पूरी कोसिस करते की इन गंदे लोगो से उनकी लडकिया बची रहे पर चौबीसों घंटे उनपर पहरा देना भी तो संभव नहीं था, और जवानी चढ़ने की देरी भर थी कि आवारे उसके पीछे हाथ धो कर पद जाते. क्योंकि उनके पास कोई और काम तो था नहीं. इसके लिए लड़ाई झगडा गाली गलौज चाहे जो भी हो सब के लिए तैयार होते . नतीजा यही होते कि शरीफ से शरीफ लड़की भी गाँव में भागते बचते ज्यादा दिन तक नहीं रह पाती और किसी दिन किसी गली, खंडहर या बगीचे में, अँधेरे, दोपहर में किसी आवारे के नीचे दबी हुई स्थिति में आ ही जातीं बस क्या था बुर की सील टूटने कि देर भर रहती और एक दबी चीख में टूट भी जाती. और आवारे अपने लन्ड को खून से नहाई बुर में ऐसे दबाते जैसे कोई चाकू मांस में घुस रहा हो. लड़की पहले भले ही ना नुकुर करे पर इन चोदुओं की रगड़दार गहरी चोदाई के बाद ढेर सारा वीर्यपात जो लन्ड को जड़ तक चांप कर बुर की तह उड़ेल कर अपने को अनुभवी आवारा और चोदु साबित कर देते और लड़की भी आवारे लन्ड के स्वाद की शौक़ीन हो जातीं. फिर उन्हें भी ये गंदे लोगो के पास असीम मज़ा होने काअनुभव हो जाता . फिर ऐसी लड़की जयादा दिन तक शरीफ नहीं रह पाती और कुतिया की तरह घूम घूम कर चुदती रहती . घर वाले भी किसी हद तक डरा धमका कर सुधारने की कोशिस करते लेकिन जब लड़की को एक बार लन्ड का पानी चढ़ जाता तो उसका वापस सुधारना बहुत मुश्किल होता. और इन आवारों गुंडों से लड़ाई लेना घर वालों को मुनासिब नहीं था क्योंकि वे खतरनाक भी होते. लिहाज़ा लड़की की जल्दी से शादी कर ससुराल भेजना ही एक मात्र रास्ता दीखता और इस जल्दबाजी में लग भी जाते . शादी जल्दी से तय करना इतना आसान भी ना होता और तब तक लडकिया अपनी इच्छा से इन आवारो से चुदती पिटती रहती. आवारो के संपर्क में आने के वजह से इनका मनोबल काफी ऊँचा हो जाता और वे अपने शादी करने या ना करने और किससे करने के बारे में खुद सोचने और बात करने लगती. और घरवालो के लिए मुश्किल बढ़ जाती . एक बार लड़की आवारो के संपर्क में आई कि उनका हिम्मत यहाँ तक हो जाता कि माँ बाप और घरवालो से खुलकर झगडा करने में भी न हिचकिचाती. यदि मारपीट करने कि कोसिस कोई करे तो लड़की से भागजाने कि धमकी मिलती और चोदु आवारो द्वारा बदले का भी डर रहता. और कई मामलो में घरवाले यदि ज्यादे हिम्मत दिखाए तो घरवालो को ये गुंडे पीट भी देते क्योंकि वे लड़की के तरफ से रहते और कभी कभी लड़की को भगा ले जाते. सबकुछ देखते हुए घरवाले लडकियो और आवारो से ज्यादे पंगा ना लेना ही सही समझते और जल्द से जल्द शादी करके ससुराल भेजने के फिराक में रहते. ऐसे माहौल में घरवाले यह देखते कि लड़की समय बे समय किसी ना किसी बहाने घुमने निकल पड़ती जैसे दोपहर में शौच के लिए तो शाम को बाज़ार और अँधेरा होने के बाद करीब नौ दस बजे तक वापस आना और यही नहीं बल्कि अधि रात को भी उठकर कभी गली या किसी नजदीक बगीचे में जा कर चुद लेना. इनकी भनक घरवालो को खूब रहती पर शोरशराबा और इज्जत के डर से चुप रहते कि ज्याने दो हंगामा ना हो बस . यही कारन था कि लडकिया जो एक बार भी चुद जाती फिर सुधरने का नाम नहीं लेती. आवारो से चुदी पिटी लडकियो में निडरता और आत्मविश्वास ज्यादा ही रहता और इस स्वभाव कि लडकियो कि आपस में दोस्ती भी खूब होती और चुदाई में एक दुसरे कि मदद भी करती. गाँव में जो लडकिया ज्यादे दिनों से चुद रही है या जो छिनार स्वभाव कि औरते नयी चुदैल लडकियो के लिए प्रेरणा और मुसीबत में मार्गदर्शक के साथ साथ मुसीबत से उबरने का भी काम करती थी. जैसे कभी कभी कोई नई छोकरी चुद तो जाती किसी लेकिन गर्भनिरोधक का उपाय किये बगैर नतीजा गर्भ ठहर जाता. इस हालत में लड़की के घर वालो से पहले यही इन चुदैलो को पता चल जाता तो वे बगल के कसबे में चोरी से गर्भ गिरवा भी देती

ऐसे माहौल में घरवाले चाहे जितनी जल्दी शादी करते पर तब तक उनके लडकियो की बुरो को आवारे चोद चोद कर एक नया आकार के डालते जिसे बुर या चूत नहीं बल्कि भोसड़ा ही कह सकते है. यानि शादी का बाद लड़की की विदाई होती तो अपने ससुराल कुवारी बुर के जगह खूब चुदी पिटी भोसड़ा ही ले जाती और सुहागरात में उसका मर्द अपने दुल्हन के बुर या चुदैल के भोसड़ा में भले ही अंतर समझे या न समझे लड़की या दुल्हन उसके लन्ड की ताकत की तुलना अपने गाँव के आवारो के दमदार लंडों से खूब भली भाती कर लेती. जो लड़की गाँव में घुमघुम कर कई लंडो का स्वाद ले चुकी रहती है उसे अपने ससुराल में एक मर्द से भूख मिटता नज़र नहीं आता. वैसे भी आवारे जितनी जोश और ताकत से चोदते उतनी चुदाई की उमंग शादी के बाद पति में न मिलता. नतीजा अपने गाँव के आवारो के लंडो की याद और प्यास बनी रहती और ससुराल से अपने मायका वापस आने का मन करनेलगता. ऐसे माहौल में सावित्री का बचे रहना केवल उसकी माँ के समझदारी और चौकन्ना रहने के कारण था . सावित्री के बगल में ही एक पुरानी चुड़ैल धन्नो चाची का घर था जिसके यहाँ कुछ चोदु लोग आते जाते रहते , सावित्री की माँ सीता इस बात से सजग रहती और सावित्री को धन्नो चाची के घर न जाने और उससे बात न करने के लिए बहुत पहले ही चेतावनी दे डाली थी. सीता कभी कभी यही सोचती की इस गाँव में इज्जत से रह पाना कितना मुश्किल हो गया है. उसकी चिंता काफी जायज थी. सावित्री के जवान होने से उसकी चिंता का गहराना स्वाभाविक ही था. आमदनी बदने के लिए सावित्री को दुकान पर काम करने के लिए भेजना और गाँव के आवारो से बचाना एक नयी परेशानी थी. वैसे सुरुआत में लक्ष्मी के साथ ही दुकान पर जाना और काम करना था तो कुछ मन को तसल्ली थी कि चलो कोई उतना डर नहीं है कोई ऐसी वैसी बात होने की. भोला पंडित जो ५० साल के करीब थे उनपर सीता को कुछ विश्वास था की वह अधेड़ लड़की सावित्री के साथ कुछ गड़बड़ नहीं करेगे. दुसरे दिन सावित्री लक्ष्मी के साथ दुकान पर चल दी . पहला दिन होने के कारण वह अपनी सबसे अच्छी कपडे पहनी और लक्ष्मी के साथ चल दी , रात में माँ ने खूब समझाया था की बाहर बहुत समझदारी सेरहना चाहिए. दुसरे लोगो और मर्दों से कोई बात बेवजह नहीं करनी चाहिए. दोनों पैदल ही चल पड़ी. रास्ते में लक्ष्मी ने सावित्री से कहा की “तुम्हारी माँ बहुत डरती है कि तुम्हारे साथ कोई गलत बात न हो जाए, खैर डरने कि वजह भी कुछ हद तक सही है पर कोई अपना काम कैसे छोड़ दे.” इस पर सावित्री ने सहमती में सिर हिलाया. गाँव से कस्बे का रास्ता कोई दो किलोमीटर का था और ठीक बीच में एक खंडहर पड़ता जो अंग्रेजो के ज़माने का पुरानी हवेली की तरह थी जिसके छत तो कभी के गिर चुके थे पर जर्जर दीवाले सात आठ फुट तक की उचाई तक खड़ी थी. कई बीघे में फैले इस खंडहर आवारो को एक बहुत मजेदार जगह देता जहा वे नशा करते, जुआ खेलते, या लडकियो और औरतो की चुदाई भी करते. क्योंकि इस खंडहर में कोई ही शरीफ लोग नहीं जाते. हाँ ठीक रास्ते में पड़ने के वजह से इसकी दीवाल के आड़ में औरते पेशाब वगैरह कर लेती. फिर भी यह आवारो, नशेडियो, और ऐयाशो का मनपसंद अड्डा था. गाँव की शरीफ औरते इस खंडहर के पास से गुजरना अच्छा नहीं समझती लेकिन कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था कस्बे में या कही जाने के लिए. दोनों चलते चलते खंडहर के पास पहुँचने वाले थे की लक्ष्मी ने सावित्री को आगाह करने के अंदाज में कहा ” देखो आगे जो रास्ते से सटे खंडहर है इसमें कभी भूल कर मत जाना क्योंकि इसमें अक्सर गाँव के आवारे लोफ़र रहते हैं ” इस पर सावित्री के मन में जिज्ञासा उठी और पुछ बैठी “वे यहाँ क्या करते?” “अरे नशा और जुआ खेलते और क्या करेंगे ये नालायक , क्या करने लायक भी हैं ये समाज के कीड़े ” लक्ष्मी बोली. लक्ष्मी ने सावित्री को सचेत और समझदार बनाने के अंदाज में कहा” देखो ये गुंडे कभी कभी औरतो को अकेले देख कर गन्दी बाते भी बोलते हैं उनपर कभी ध्यान मत देना, और कुछ भी बोले तुम चुप चाप रास्ते पर चलना और उनके तरफ देखना भी मत, इसी में समझदारी है और इन के चक्कर में कैसे भी पड़ने लायक नहीं होते. ” कुछ रुक कर लक्ष्मी फिर बोली “बहुत डरने की बात नहीं है ये मर्दों की आदत होती है औरतो लडकियो को बोलना और छेड़ना, ” सावित्री इन बातो को सुनकर कुछ सहम सी गयी पर लक्ष्मी के साथ होने के वजह से डरने की कोई जरूरत नहीं समझी..आगे खंडहर आ गया और करीब सौ मीटर तक खंडहर की जर्जर दीवाले रास्ते से सटी थी. ऐसा लगता जैसे कोई जब चाहे रास्ते पर के आदमी को अंदर खंडहर में खींच ले तो बहर किसी को कुछ पता न चले , रास्ते पर से खंडहर के अंदर तक देख पाना मुस्किल था क्योंकि पुराने कमरों की दीवारे जगह जगह पर आड़ कर देती और खंडहर काफी अंदर तक था

दोनों जब खंडहर के पास से गुजर रहे थे तब एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था. खंडहर में कोई दिख नहीं रहा था वैसे सावित्री पहले भी कभी कभार बाज़ार जाती तो इसी रस्ते से लेकिन तब उसके साथ उसकी माँ और गाँव की कई औरते भी साथ होने से दर उतना नहीं लगता. इसबार वह केवल लक्ष्मी के साथ थी और कुछ समय बाद उसे अकेले भी आना जाना पड़ सकता था. जो सबसे अलग बात यह थी की वह अब भरपूर जवान हो चुकी थी और आवारो से उसके जवानी को खतरा भी था जो वह महसूस कर सकती थी. सावित्री अब यह अच्छी तरह जानती थी की यदि आवारे उसे या किसी औरत को इस सुनसान खंडहर में पा जाएँ तो क्या करेंगे. शायद यह बात मन में आते ही उसके बदन में अजीब सी सिहरन उठी जो वह कुछ महसूस तो कर सकती थी लेकिन समझ नहीं पा रही थी. शायद खंडहर की शांत और एकांत का सन्नाटा सावित्री के मन के भीतर कुछ अलग सी गुदगुदी कर रही थी जिसमे एक अजीब सा सनसनाहट और सिहरन थी और यह सब उसके जवान होने के वजह से ही थी. खंडहर के पास से गुजरते इन पलो में उसके मन में एक कल्पना उभरी की यदि कोई आवारा उसे इस खंडहर में अकेला पा जाये तो क्या होगा..इस कल्पना के दुसरे ही पल सावित्री के बदन में कुछ ऐसा झनझनाहट हुआ जो उसे लगा की पुरे बदन से उठ कर सनसनाता हुआ उसकी दोनों झांघो के बीच पहुँचगया हो खंडहर में से कुछ लोगो के बात करने की आवाज आ रही थी. सावित्री का ध्यान उन आवाजो के तरफ ही था. ऐसा लग रहा था कुछ लोग शराब पी रहे थे और बड़ी गन्दी बात कर रहे थे पार कोई कही दिख नहीं रहा था. अचानक उसमे से एक आदमी जो 3२ -3५ साल का था बाहर आया और दोनों को रास्ते पार जाते देखने लगा तभी अन्दर वाले ने उस आदमी से पुछा “कौन है” जबाब में आदमी ने तुरंत तो कुछ नहीं कहा पर कुछ पल बाद में धीरे से बोला ” दो मॉल जा रही है कस्बे में चुदने के लिए” उसके बाद सब खंडहर में हसने लगे. सावित्री के कान में तो जाने बम फट गया उस आदमी की बात सुनकर. चलते हुए खंडहर पार हो गया लक्ष्मी भी चुपचाप थी फिर बोली “देखो जब औरत घर से बाहर निकलती हैं तो बहुत कुछ बर्दाश्त करना पड़ता है. यह मर्दों की दुनिया है वे जो चाहे बोलते हैं और जो चाहे करते हैं. हम औरतो को तो उनसे बहुत परेशानी होती है पर उन्हें किसी से कोई परेशानी नहीं होती.” सावित्री कुछ न बोली पर खंडहर के पास उस आदमी की बात बार बार उसके दिमाग में गूंज रही थी “दो मॉल जा रही है कस्बे में चुदने के लिए” . तभी भोला पंडित की दुकान पर दोनों पहुँचीं . भोला पंडित पहली बार सावित्री को देखा तो उसकी चुचिया और चूतडो पर नज़र चिपक सी गई और सावित्री ने भोला पंडित का नमस्कार किया तो उन्होंने कुछ कहा नहीं बल्कि दोनों को दुकान के अंदर आने के लिए कहे. भोला पंडित ४४ साल के सामान्य कद के गोरे और कसरती शरीर के मालिक थे . उनके शरीर पर काफी बाल उगे थे . वे अक्सर धोती कुरता पहनते और अंदर एक निगोट पहनने की आदत थी. क्योंकि जवानी में वे पहलवानी भी करते थे. स्वाभाव से वे कुछ कड़े थे लेकिन औरतो को सामान बेचने के वजह से कुछ ऊपर से मीठापन दिखाते थे. दोनों दुकान में रखी बेंच पर बैठ गयीं. भोला पंडित ने एक सरसरी नजर से सावित्री को सर से पावं तक देखा और पुछा “क्या नाम है तेरा? ” सावित्री ने जबाव दिया “जी सावित्री ” लक्ष्मी सावित्री का मुह देख रही थी. उसके चेहरे पर मासूमियत और एक दबी हुई घबराहट साफ दिख रही थी. क्योंकि घर के बाहर पहली बार किसी मर्द से बात कर रही थी भोला पंडित ने दूसरा प्रश्न किया “kitne साल की हो गयी है” “जी अट्ठारह ” सावित्री ने जबाव में कहा. आगे फिर पुछा “कितने दिनों में दुकान सम्हालना सीख लेगी” “जी ” और इसके आगे सावित्री कुछ न बोली बल्कि बगल में बैठी लक्ष्मी का मुंह ताकने लगी तो लक्ष्मी ने सावित्री के घबराहट को समझते तपाक से बोली “पंडित जी अभी तो नयी है मई इसे बहुत जल्दी दुकान और सामानों के बारे में बता और सिखा दूंगी इसकी चिंता मेरे ऊपर छोड़ दीजिये ” “ठीक है पर जल्दी करना , और कब तक तुम मेरे दुकान पर रहोगी ” भोला पंडित ने लक्ष्मी से पुछा तो लक्ष्मी ने कुछ सोचने के बाद कहा “ज्यादे दिन तो नहीं पर जैसे ही सावित्री आपके दुकान की जिम्मेदारी सम्हालने लगेगी, क्योंकि मुझे कहीं और जाना है और फुर्सत एक दम नहीं है पंडित जी.” आगे बोली “यही कोई दस दिन क्योंकि इससे ज्यादा मैं आपकी दुकान नहीं सम्हाल पाऊँगी , मुझे कुछ अपना भी कम करना है इसलिए” ” ठीक है पर इसको दुकान के बारे में ठीक से बता देना” भोला पंडित सावित्री के तरफ देखते कहा.
सावित्री भोला पंडित के रूअब्दार कड़क मिज़ाज और तेवर को देखकेर कुछ डर सी जाती. क्योंकि वे कोई ज़्यादे बात चीत नही करते. और उनकी आवाज़ मोटी भी थी, बस दुकान पर आने वाली औरतो को समान बेचने के लालच से कुछ चेहरे पर मीठापन दीखाते.

रोजाना दोपहेर को वे एक या दो घंटे के लिए दुकान बंद कर खाना खा कर दुकान के पिछले हिस्से मे बने कमरे मे आराम करते. यह दुकान को ही दो भागो मे बाँट कर बना था जिसके बीच मे केवल एक दीवार थी और दुकान से इस कमरे मे आने के लिए एक छोटा सा दरवाजा था जिस पर एक परदा लटका रहता. अंदर एक चौकी थी और पिछले कोने मे शौचालय और स्नानघर भी था . यह कमरा दुकान के तुलना मे काफ़ी बड़ा था. कमरे मे एक चौकी थी जिसपर पर भोला पंडित सांड की तरह लेट गये और नीचे एक चटाई पर लक्ष्मी लेट कर आराम करने लगी, सावित्री को भी लेटने के लिए कहा पर पंडितजी की चौकी के ठीक सामने ही बिछी चटाई पर लेटने मे काफ़ी शर्म महसूस कर रही थी लक्ष्मी यह भाँप गयी कि सावित्री भोला पंडित से शर्मा रही है इस वजह से चटाई पर लेट नही रही है. लक्ष्मी ने चटाई उठाया और दुकान वाले हिस्से मे जिसमे की बाहर का दरवाजा बंद था, चली गयी. पीछे पीछे सावित्री भी आई और फिर दोनो एक ही चटाई पर लेट गये, लक्ष्मी तो थोड़ी देर के लिए सो गयी पर सावित्री लेट लेट दुकान की छत को निहारती रही और करीब दो घंटे बाद फिर सभी उठे और दुकान फिर से खुल गई. करीब दस ही दीनो मे लक्ष्मी ने सावित्री को बहुत कुछ बता और समझा दिया था आगे उसके पास समय और नही था कि वह सावित्री की सहयता करे. फिर सावित्री को अकेले ही आना पड़ा. पहले दिन आते समय खंडहेर के पास काफ़ी डर लगता मानो जैसे प्राण ही निकल जाए. कब कोई गुंडा खंडहेर मे खेन्च ले जाए कुछ पता नही था. लेकिन मजबूरी थी दुकान पर जाना. जब पहली बार खंडहेर के पास से गुज़री तो सन्नाटा था लेकिन संयोग से कोई आवारा से कोई अश्लील बातें सुनने को नही मिला. किसी तरह दुकान पर पहुँची और भोला पंडित को नमस्कार किया और वो रोज़ की तरह कुछ भी ना बोले और दुकान के अंदर आने का इशारा बस किया. खंडहेर के पास से गुज़रते हुए लग रहा डर मानो अभी भी सावित्री के मन मे था. आज वह दुकान मे भोला पंडित के साथ अकेली थी क्योंकि लक्ष्मी अब नही आने वाली थी. दस दिन तो केवल मा के कहने पर आई थी. यही सोच रही थी और दुकान मे एक तरफ भोला पंडित और दूसरी तरफ एक स्टूल पे सावित्री सलवार समीज़ मे बैठी थी.

दुकान एक पतली गली मे एकदम किनारे होने के वजह से भीड़ भाड़ बहुत कम होती और जो भी ग्राहक आते वो शाम के समय ही आते. दुकान के दूसरी तरफ एक उँची चहारदीवारी थी जिसके वजह से दुकान मे कही से कोई नही देख सकता था तबतक की वह दुकान के ठीक सामने ना हो. इस पतली गली मे यह अंतिम दुकान थी और इसके ठीक बगल वाली दुकान बहुत दीनो से बंद पड़ी थी. शायद यही बात स्टूल पर बैठी सावित्री के मन मे थी कि दुकान भी तो काफ़ी एकांत मे है, पंडित जी अपने कुर्सी पे बैठे बैठे अख़बार पढ़ रहे थे, करीब एक घंटा बीत गया लेकिन वो सावित्री से कुछ भी नही बोले. सावित्री को पता नही क्यो यह अक्चा नही लग रहा था. उनके कड़क और रोबीले मिज़ाज़ के वजह से उसके पास कहाँ इतनी हिम्मत थी कि भोला पंडित से कुछ बात की शुरुआत करे. दुकान मे एक अज़ीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, तभी भोला पंडित ने स्टूल पर नज़रे झुकाए बैठी सावित्री के तरफ देखा और बोला ” देखो एक कपड़ा स्नानघर मे है उसे धो कर अंदर ही फैला देना” मोटी आवाज़ मे आदेश सुनकर सावित्री लगभग हड़बड़ा सी गयी और उसके हलक के बस जी शब्द ही निकला और वह उठी और स्नानघर मे चल दी. स्नानघर मे पहुँच कर वह पीछे पलट कर देखी कि कहीं पंडित जी तो नही आ रहे क्योंकि सावित्री आज अकेले थी और दुकान भी सन्नाटे मे था और पंडित जी भी एक नये आदमी थे. फिर भी पंडित जी के उपर विश्वास था जैसा कि लक्ष्मी ने बताया था. सावित्री को लगा कि पंडित जी वहीं बैठे अख़बार पढ़ रहे हैं. फिर सावित्री ने स्नानघर मे कपड़े तलाशने लगी तो केवल फर्श पर एक सफेद रंग की लंगोट रखी थी जिसे पहलवान लोग पहनते हैं. यह भोला पंडित का ही था. सावित्री के मन मे अचानक एक घबराहट होने लगी क्योंकि वह किसी मर्द का लंगोट धोना ठीक नही लगता. स्नानघर के दरवाजे पर खड़ी हो कर यही सोच रही थी कि अचानक भोला पंडित की मोटी कड़क दार आवाज़ आई “कपड़ा मिला की नही” वे दुकान मे बैठे ही बोल रहे थे. सावित्री पूरी तरह से डर गयी और तुरंत बोली “जी मिला” सावित्री के पास इतनी हिम्मत नही थी कि भोला पंडित से यह कहे कि वह एक लड़की है और उनकी लंगोट को कैसे धो सकती है. आख़िर हाथ बढाई और लंगोट को ढोने के लिए जैसे ही पकड़ी उसे लगा जैसे ये लंगोट नही बल्कि कोई साँप है. फिर किसी तरह से लंगोट को धोने लगी. फिर जैसे ही लंगोट पर साबुन लगाने के लिए लंगोट को फैलाया उसे लगा कि उसमे कुछ काला काला लगा है फिर ध्यान से देख तो एकद्ूम सकपका कर रह गयी. यह काला कला कुछ और नही बल्कि झांट के बॉल थे जो भोला पंडित के ही थे.
कमर।
सुहेल ज़ोर ज़ोर के धक्के लगाने लगा, हर धक्के पे चीथड़े उड़ने लगे. मैं वैसे भी पूरी तरह से गरम थी ही , विजय सर मेरी चूचियों को दबा दबा के पिए जा रहे थे। इधर बुर में धनाधन लण्ड का निर्बाध आवागमन हो रहा था।
मैंने अपनी टांगें हवा में उठा ली जिससे सुहेल का लण्ड और अंदर तक घुस कर मेरी बुर को फाड़ डाले।
सुहेल मारे मज़े में बड़बड़ाना शुरू कर दिया ” हाय हाय तेरी बुर, साली , मस्त मस्त बुर तेरी, उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़ क्या बुर है, कितना पानी है तेरी बुर में, छपाछप तेरी बुर, लसालस तेरी बुर, मस्त मस्त बुर, साली रंडी छिनार , तेरे यार ने मेरा माल चोदा , मैं तेरी बुर का भोसड़ा बनाऊंगा , तुझे कुत्तों से चुदवाऊँगा , साली रंडी, तुझे रांड बाजार में बिठवा दूंगा, रोज़्ज़ ४० लण्ड से चुदवाना, तेरा भड़वा बनकर तेरी कमाई खाऊंगा , बोल रंडी बनेगी ना मेरी, छिनार, बोल साली , कुतिया , नहीं तो पेल पेल के गांड तक लण्ड घुसा दूंगा ”
” हाँ चोद ले साले, भड़वे, चोद , पेल ले मुझे, फाड़ ले मेरी बुर, ले ले मज़ा ज़िंदगी का, असली मज़ा यही चुदाई का पेलाई का, और कुछ नहीं, डालते रह , पेलते रह,पेलवा जिससे पेलवाना है,, बना ले मुझे रंडी, बिठा दे रंडीखाने में, अब तो मैं २-२ लण्ड से चुद गयी, अब क्या शर्म , मेरी गांड में भी घुसा, मेरे मुंह में भी घुसा, जहां चाहे पेलवा, जिससे चाहे पेलवा, कुत्ते से पेलवा , गधे से पेलवा, खूब पेलवा पेलवा के फाड़ दे मेरी बुर, खोल ले रंडीखाना, तेरी माँ को भी बिठा ले, तेरी बहन को भी बिठा ले, इस रंडी सबीहा को भी बिठा ले, सब मिल कर पेलवाएंगे,भड़वे ,इस भड़वे तिवारी माधरचोद को भी बिठा ले, तू भी गांड मरवाना, इसकी भी गांड मरवाना , खूब कमाई करना, पेल पेल, हां हां ऐसे ही, पेल ,आए आआआआआअ आआआआअ मै आआआआअ ग
गईइइइइइइइइइइइइइइइइइइइई , भर दे अपना मदनरस, भर दे अपना गंदा पानी मेरी बुर में , सुवर , भर दे तेरा गटर का नाली का पानी मेरी मेँ ,भर के पिल्ला पैदा करवा दे मेरी बुर से अपने जैसा जो अपनी माँ बहन चोदे और चुदवाये सबसे ,,,,,,आआआआह्ह्ह्ह्ह लेेेे, मैं तो गईइइइइइइइइइइइइइइइइइइइ ”
छल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल से जैसे मूत निकलता है ,ऐसे ही मेरी बुर से सारा रज भर भर के निकलने लगा।
इधर सुहेल भी ” आह अहा हा आआआआआ , ले ले ले ले , आआआआ रंडीईईईईईईईईईईईईईई , खल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ”
कहकर अपना नाली का गन्दा पानी छम्म छम्म करके मेरी बुर में सीधे बच्चेदानी तक भर के मुझपर धम्म से गिर गया।
उसके गिरने की वजह से विजय सर को मेरी चूची छोड़नी पड़ी और अब सबीहा उनके खड़े हो चुके प्रचंड कामदंड को ज़ोर ज़ोर से पिने लगि.
उनके हावभाव से वो भी पल दो पल के मेहमान थे , बिना किसी पूर्वसूचना के उनका भी मानसून खुल गया और सबीहा के सर को दबा कर सब कुछ उसके गले में उतार दिया। सबीहा गों गों करते हुए पूरा पानी पी गयी।
मेरी बुर से मेरा रज और सुहेल का गाढ़ा वीर्य मिश्रित होकर जाँघों पर बहने लगा और सबीहा के मुंह से विजय सर का वीर्य चुने लगा।

ये है चुदाई का जलवा,
गाजर शक्कर मेवा मिसरी का हलवा।
जो खाए वो बौराये,
जो ना खाए वो बौराये।
इति समूह चोदन , अध्याय १

इस घनघोर चुदाई यज्ञ के समापन उपरान्त मात्र श्वासों के चलने की और धड़कनों की आवाज़ शान्ति भंग कर रही थीं। चार जोड़ी आँखें संतुष्टि में बंद थीं। धीरे धीर दुनिया का होश आया और सब एक एक कर उठ कर वस्त्र धारण करने लगे। आखिर में कुछ बाते हुईं जिसमे ये तय हुआ कि यद्यपि शादी तो हमें करनी ही है और इस तरह का विश्वास से लबालब चुदाई समागम परस्पर प्रेम में बढ़ोतरी ही करेगा। विद्वान विजय सर ने इसे पश्चिम में वाइफ स्वेपिंग के रूप में प्रचलित परम्परा के नाम से अलंकृत किया। मैंने इस नाम का विरोध किया चूँकि अभी आधिकारिक रूप से विवाह नहीं हुआ था तो इसे कपल स्वेपिंग का नाम दिया जाए, जिसे सर्वसम्मति से ध्वनिमत द्वारा पारित कर लिया गया।
( अब यहां से गीता की जुबानी समाप्त हुई। )
” हम्म , तो ये बात है। देख गीता ,मुझे तो लगता है कि यह सब सबीहा और सुहेल ने पहले से ही सोच कर रचा होगा। ”
” बात तेरी सही है प्रीति , लेकिन अब इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता। जो हो गया सो हो गया। लेकिन ख़ुशी इस बात की है कि तुझपर आंच नहीं आयी। मैं बहुत शर्मिन्दा हूँ। ”
“ठीक है गीता। एक बार तेरा और विजय सर का शुक्रिया। ”
अब मेरा घर आ चुका था। विजय सर बाइक से पहुँच चुके थे। पीछे पीछे अमितवा भी गुलाबजामुन लेकर आ गया. उसकी निगाहों में अब पता नहीं क्यों मुझसे पहले जैसा भय नहीं झलक रहा था, वो मुझे बड़ी व्यंग्य भरी निगाहों से घूरते हुए घर में चला गया। मुझे डर लगने लगा था। मन में चोर जो था।
शायद विजय सर ने यह भांप लिया और कहा ” बेफालतू का टेंशन ना लो , किसी को कुछ नहीं पता। ”
और गीता की ओर देखकर बाइक स्टार्ट निकल लिए।
गीता ने मेरा हाथ अपने हाथ में पकड़ कर मुझे सांत्वना दी।
मैं उसे बाय करते हुए घर में चली आई.
दूकान पर पापा थे , उन्होंने आवाज़ दी ” प्रीति, बैठा आयी मौसी को?”
” जी पापा ”
“ठीक है, घर में जाओ और मम्मी को बोलकर मेरे लिए चाय भिजवा दो। ”
” जी ” कहकर मैं घर में आ गयी।
अंदर रसोई में अमितवा बैठकर घप्प घप्प दालमोठ और चाय का भोग लगा रहा था।
मम्मी को मैंने पापा का मेसेज दे दिया और अपने रूम में चली आयी।
और लेट गयी।
नींद आ गयी , काफी रात हो आयी।
माँ के उठाने पर उठी खाना खाने।
सारा परिवार साथ बैठकर खाने लगा, मेरी शादी की बात होने लगी।
मैंने कहा ” लेकिन मम्मी , भइया की भी शादी करवा दो ना , वो तो मुझसे बड़े हैं ना ? और मेरे जाने के बाद घर में तुम्हारा भी हाथ बंटाने के लिए कोई चाहिए ना ?”
” जैसे तू बड़ा काम करती है , चुप रह। ” भइया ने चिढ कर कहा ,” अभी मैं कम्पीटीशन की तैयारी कर रहा हूँ, कुछ बन जाऊं फिर शादी वादी ”
” और मैं कुछ नहीं बन सकती क्या? पापा , मैं कल से स्कुल नहीं जाउंगी , प्राइवेट करुँगी। मुझे पढ़ना है, भले आप शादी करवा दो ,लेकिन गौना ३ साल बाद ही होगा , और मुझे या तो साहित्य में एम ए करना है या फिर बायो में एम एस सी। ”
” बड़की साहित्यकार बनेगी, अब साइंस ली है फिर चेंज करेगी?” भइया ने चिढ़ाया।
” चुप रहो, जो मेरी बिटिया बोलेगी उसे करवाऊंगा” पापा ने बड़े दम्भ से कहा।
मैंने भैया को देख कर मुंह चिढाया.
फिर खा पी कर अपने कमरे में आ गयी।
नींद नहीं आ रही थी। पुरे दिन का घटनाक्रम आँखों के सामने नाचने लगा। कैसा गज़ब हो जाता ? कैसी हालत हो जाती मेरी, मेरे पापा मम्मी भइया का क्या हाल होता?
हे दुर्गा माँ , तूने मुझे बचा लिया।
मन में ठान भी लिया अब दोस्ती एकदम कम, घर में रहकर पढ़ाई करुँगी , घर के काम में पारंगत बनूँगी। अपने व्यक्तित्व को संवारूंगी। ऐसी पत्नी बहु और बेटी बनूँगी कि मेरे मायके और ससुराल में लोग गर्व करेंगे।
लेकिन दिल में बैचैनी थी। नारी स्वभाव था, किसे बोल कर अपना दिल हल्का करूँ ? संध्या दीदी ? लेकिन अभी तो वो लखनऊ नहीं पहुंची होंगी , कल करुँगी उनसे।
किससे बात करूँ ? तभी सामने देखा , हमारे होने वाले सैयां जी , सतीश पाण्डेय जी, अर्थात अनिल कपूर की फोटो मेज पर रखी थी।
मैंने उसे ही उठा लिया और उस तस्वीर को गौर से देखने लगी।
” तुम्ही से बता दूँ?” कहकर शर्मा गयी। और तस्वीर को अपने सीने से चिपका ली। फिर करवट बदल कर तस्वीर को देखा और धीरे से A K को चुम लिया।
तस्वीर में छोटी छोटी आँखों को देखने लगी और कल्पना करने लगी।
मैं और सतीश बर्फ से लदे वीरान पहाड़ में एक पेड़ के निचे हैं , मेरा सर उनके सीने में धंसा है , और उन्होंने अपने बाहुपाश में मुझे यूँ जकड कर रखा है जैसे कोई मुझे उनसे छीन ना ले, मैं भी उस मजबूत बाहों के बंधन में अपने आपको दुनिया की सबसे सुरक्षित स्थान में महसूस कर रही हूँ।
उन्होंने धीरे से मेरी ठुड्डी पर चार उंगलियां रखीं और मेरे चेहरे को उठाया , मेरी आँखें शर्म से बंद हैं ,
उन्होेने कान में फूंक मारी। इस बर्फीले मौसम में पहाड़ों के बीच मैं गर्म फूंक पाकर चिहुक उठी और उन्होंने मेरे कान के नीचे बालियों को दांत से पकड़ कर धीरे से काटा , मैं सिसक उठी। और कसकर उनके और नजदीक आ गयी। उन्होंने मेरे कान को ही धीरे धीरे चूसना शुरू कर दिया। मैं आँखें बंद कर इस बर्फीले तूफ़ान में गरम होने लगी। धीरे धीरे उन्होंने अपने मुंह से मेरे कान छोड़ कर मेरी बंद आँखों को चुम लिया।
मेरे माथे और गालों को चूमने के बाद अब उन्होंने अपने अधर मेंरे अधखुले लरजते अधरों पर टिका दिए।
उनकी बांहे मेरी पीठ को लपेटे हुए थीं।
हम ऐसे ही प्रतिमा की भाँती होंठों पर होंठों को रखे हुए एक दूसरे के आगोश में समाये थे।
जब उनके गरम श्वास मेरे नथुनों से टकराती तो सीधे मेरी नाभि तक गुदगुदी आ जाती , प्रत्युत्त्तर में मेरी गरम साँसे उनके नथुनों से टकराती।
साँसों का संगम ,
दो जिस्मों का समागम।
उठते बैठते उरोज़ों की हलचल ,
हिमाच्छादित जैसे विभ का कम्पन।
कभी स्थिर कभी डोलती ,
जैसे जलती हुई दिए की बाती।
प्रणय को तरसती निवरा,
मैथुन के लिए विचलित नर।
साँसों की गर्मी से दोनों के जज़्बात पिघलने लगे।
सतीश ने मेरे निचले होंठ को अपने दोनों होंठों में दबा लिया, और धीरे धीरे चुम्बन की क्रिया प्रारम्भ की।
बर्फीले हवाओं की सांय सांय और हम एक दूसरे से लिपटे युगल के श्वासों की सांय सांय में जैसे युद्ध छिड़ गया कि वो हवाएँ हमारे शरीरों को जमा देगी या ये गर्म साँसें हिमालय को पिघला देगी।

सतीश के चुम्बन से मैं मदहोश होती जा रही थी।
मैं उस कालपनिक चुम्बन में ही अपने जीवन का सबसे बड़ा दैहिक सुख पा रही थी, आज हुए सारे अविचलित कर देने वाले घटनाक्रम को भूलने लगी थी।
कल्पना ही इतनी सुन्दर है तो यथार्थ कितना प्यारा होगा ?

इस कल्पना में भी कितनी सुखद अनुभूति थी। मैंने अपने कल्पना के अश्वों को और पंख प्रदान करने का निर्णय किया। मैं दिनभर हुई सारी बातों को भूलना चाहती थी और स्वयं काल्पनिक सेक्स का आनंद भी उठाना चाहती थी।
मैंने सतीश के चुमबन को अपने ऊपर हावी होने दिया। सतीश ने मेरे निचले होंठों को बड़े प्यार किन्तु दवाब से चुभलाना शुरू किया। मेरा ऊपरी होंठ उसकी घनी मूंछो को छू रहा था जिससे मुझे और उत्तेज़ना हो रही थी।
मैंने सतीश को और कसकर दबा लिया जैसे मैं कह रही हूँ कि मुझे इतनी ज़ोर से दबाओ कि मैं पारे की तरह तुममें मिल जाऊं और अपना अस्तित्व खो दूँ।
सतीश ने इसका उत्तर उसी तरह दिया जैसे किसी मर्द को देना चाहिए और कोई स्त्री जिसकी अपेक्षा रखती है। इतनी जोर से बाँहों में कसा कि एक पल के लिए मेरी सांस रुक गयी। मैंने आँखे खोलीं और सतीश की आँखों को देखा जो बंद थीं। मैं उसे अपने आपको चूमते देख रही थी, बंद आँखों में वो प्रेम की असीम गहराइयों में डूबा लग रहा था , अचानक उसने आँखे खोलीं और मैं शर्मा गयी , आँखों से ही उसने शरारती मुस्कान फेंकी और मैंने शर्म से आँखें बंद कर लीं।
उसने बंधन अब थोड़ा ढीला छोड़ दिया और एक हाथ से हलके हलके मेरे गाल को सहलाने लगा। मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मेरे शरीर में हजारों चींटियाँ रेंगने लगी हों। शरीर का रोम रोम खड़ा हो गया। मैं थर थर कांपने लगी। उसने चुम्बन की गति और बढ़ा दी। वैज्ञानिक कहते हैं एक फ्रेंच किस के समय तकरीबन ८ करोड़ बेक्टेरिया का आदान प्रदान एक दूसरे के मुंह में होता है. हमने इन सभी बक्टेरियाओं को स्थांनतरण की सुविधा प्रदान की।
अति पुजय्नीय महर्षि श्री वात्सायन ने तो चुम्बन पर ही एक पूरा अध्याय लिख डाला है। उसीमे से के श्लोक का अर्थ प्रस्तुत है :- जब पुरुष सम्पुट चुम्बन करते हुए स्त्री के तालु और दांतों में अपनी जीभ ज़ोर ज़ोर से रगड़ता है , उसे जिव्हा युद्ध कहते हैं। यह जिव्हा युद्ध अब प्रारम्भ हो चूका था।
सतीश ने अपनी जीभ को मेरे दांतों मेरे तालु और जीभ से रगड़ना शुरू कर दिया, मेरी उत्तेज़ना बढ़ती ही जा रही थी।
मैंने भी इस जिव्हा युद्ध में उत्तर देने के लिए अपने निचले होंटों को सतीश के दांतों के चंगुल से छुड़ा कर अपने होंठों के बीच सतीश के निचले होंठ को दबा लिया और ज़ोर ज़ोर से उसे चूसने लगी. ऐसा लग रहा था जैसे मैं मधुपान कर रही हूँ, जो मिठास प्रीतम के चुम्बन में हैं ,ऐसी मिठास शहद में भी न हो।
प्रेम में लिया हुआ चुम्बन वासना में किये गए चुम्बन से अधिक आनंददायी लगता है। किन्तु अक्सर वासना प्रेम का लिबास ओढ़ कर आती है।
साधारण जोड़ों में , जिसे हम प्रेम समझते हैं वो अंततोगत्वा वासना में रूपांतरित हो जाती है,किन्तु सच्चे ह्रदय के प्रेमी कामवासना को भी प्रेम का प्रसाद समझकर ग्रहण कर लेते हैं। और काम उनके प्रेम की नींव को और मज़बूत बना देती है।
बर्फीले तूफ़ान में गर्म साँसों से पिघलते हुए दो युवा।
अब सतीश के एक हाथ ने मेरी कमर को पकड़ लिया और दुसरा हाथ पीठ पर सहलाने लगा।
मैं धीरे धीरे प्रेम पथ से काम पथ की ओर मुड़ने लगी।
मैंने अपने पीठ कुछ यूँ घुमाई जिससे सतीश का हाथ थोड़ा सरक कर मेरे स्तनों के कोर तक आ पहुंचे।
उसकी हथेली अब मेरे जैकेट के किनारे स्तन के किनारे आ चुकी थी।
मेरे कड़े और किसी मर्द द्वारा अनछुए स्तन , ब्रा ,टीशर्ट ,जैकेट जैसे कई सतहों में किसी अनमोल खजाने की भांति छुपे हुए थे।
मैंने अपने आपको थोड़ा और आगे किया जिससे मेरे स्तन पर सतीश की हथेली का दवाब पड़े.
स्त्री का कामकेन्द्र उसका स्तन है। जिसे प्यार से सहलाने चुभलाने और अंत में चुदाई के वक़्त ज़ोर ज़ोर से दबाने पर वो ओर्गास्म या चरमोतकर्ष तक पहुँचती है।
स्त्री के शरीर में ढेर सारे ,काम केंद्र और बिंदु हैं पुरुषों की अपेक्षा।

स्त्री में होंठ, स्तन , कान , गर्दन , गला ,जांघें , नाभि ,पेडू , भगनासा ,योनि की बाहरी दीवारें, कूल्हे इत्यादि हैं। इसलिए एक स्त्री का कामक्रीड़ा में आसानी से संतुष्ट होना बहुत मुश्किल होता है , बिरले ही कोई पुरुष सही तरीके से इन सभी तारों को समयोजित रूप से छेड़कर उस सितार को “कामिनिराग ” साध पाता है जिससे स्त्री अंत में हंस के समान कंठ से एक मधुर ध्वनि निकालती है और निढाल हो जाती है।
पुरुषों का मुख्य काम केंद्र उनका लटकता खंजर और लटकती भटकती वीर्य से भरी गोलियां, किसी किसी में थोड़ा इधर उधर भी .
जिसे बड़ी आसानी से सहलाकर, हिलाकर,चूसकर,चुभलाकर ,दबाकर ,चूत की गहराइयों में घुसाकर पुरुष को पस्त किया जा सकता है
मैं सतीश की हथेलियों को अपने स्तन पर दवाब डालने के लिए मौन संकेत दे रही थी ,और उसके मज़बूत हाथों द्वारा अपने स्तन को मसले जाने की कल्पना से मेरे जाँघों के बीच की घाटियों में रिस रिस कर पानी आने लगा।
तभी सतीश ने अपना हाथ वहाँ से हटा लिया और अपने होंठों को मेरे होंठों से बहुत धीरे से प्रेमपूर्वक छुड़ा लिया और मेरी आँखों में देखने लगा।
मौन में ही उसने पूछ लिया कि क्या शादी के पहले यह सही है ?
मेरी लजाती हुई आँखों ने उसकी आँखों में देखा और शर्मा कर बंद हो गयीं ,मौन मेँ ही उत्तर मिल गया नहीं। और मैं शर्म से उसके सीने में धंस गयी।
” नाराज़ तो नहीं हो?”मैंने डरते हुए पूछा।
” नहीं तो , क्यों ?”
” मैंने ऐसा किया इसलिए” उसके सीने में सर छुपाते हुए मैंने अपराधबोध से कहा।
” पगली, इसमें नाराज़ क्या होना ? ये तो होना ही है , लेकिन हर चीज़ का समय होता है, अभी इंतज़ार करना है, हमारा मेल सिर्फ हमारा नहीं बल्कि हमारे संस्कारों, हमारे परिवारों और उनके विश्वास का भी है ना ?”
” हूँ ” मैं उसी मुद्रा में रही।
” तुम कितने महान हो सतीश , तुम्हारी जगह कोई और हो तो क्या क्या कर ले?”
वो हंसने लगा, ” क्या कर ले , बताओ?”
” धत्त , जाओ मैं नहीं बोलूंगी ” मैंने उसके सीने पे चिकोटी काटी।
” अच्छा ये बताओ, तुमने आज तक किसी के कभी पहले ,,, मेरा मतलब ?”
” क्या ? तुम ऐसा कैसे सोच सकते हो ?” कहकर मेरी आँखों से आंसू की धारा बह निकली।
वो मुझे सॉरी सॉरी बोलकर मुझे चुप कराने में लग गया।
थोड़ी देर बाद चुप हुई तो मैंने अपने सारे जीवन का चिट्ठा खोल ड़ाला। मस्तराम की किताबों से लेकर , संध्या दीदी , विजय सर ,सबीहा, गीता ,अमित और सुहेल कमीने का आज का काण्ड।
वो चुपचाप मेरी ओर देखता रहा। मैं उसकी ओर।
सतीश ने गर्व से मुस्कुरा के मुझे गले लगा लिया। मैं भी उसे सब कुछ बता कर निश्चिंतता से सो गयी , उसकी फोटो को सीने से लगाए। जैसे सारा बोझ मुझपर से उतर गया।

तुझको सोचा तो खो गईं आँखें
दिल का आईना हो गईं आँखें
कितना गहरा है इश्क़ का दरिया
उसकी तह में डुबो गईं आँखें
(नक्श लायलपुरी )

सर्दी के कारण सूर्य देव का आगमन थोड़ा विलम्ब से हुआ। मम्मी ने दरवाज़ा पीटा तो नींद खुली। हड़बड़ाहट में उठी तो देखा ,सतीश का फोटो मेरे अंगवस्त्र में फंसकर चीमुड गया है। उसे निकाल कर सही किया ,” हुज़ूर तस्वीर में से ही रात भर मेरे उरोज़ों पर सोये थे क्या ? तभी सोचूं क्यों ये बेशर्म कबूतर दर्द कर हैं ?” कहकर सतीश की तस्वीर को मैंने ज़ोर से चुम लिया।
दिन बीतने लगा।
मैंने दोपहर में जब सभी लोग आराम कर रहे थे , संध्या दीदी को फोन किया और डरते डरते सब बातें बतायीं। डांट तो खूब पड़ी लेकिन साथ में उन्होंने समझाया भी।
स्कुल जाना मैंने छोड़ दिया , भइया स्कुल जाकर सारी फॉरमैलिटी कर आये थे।
मैं खूब मन लगा कर पढ़ाई में जुट गयी।
घरवालों का पूरा सपोर्ट था। बीच बीच में सबीहा और गीता आती रहती थीं। लेकिन कभी उस घटना का ज़िक्र नहीं हुआ।
यूँ ही आम बातें स्कुल के बारे में , हंसी मजाक होता।
संध्या दीदी से फोन होती , वो भी अपने गौने को लेकर उत्साहित थीं। मई में गौना तय हो चुका था।
इस बीच खरवांस बाद फ़रवरी में पापा और भइया बम्बई गए संध्या दीदी के ससुर के साथ , पाण्डेय जी का घर दूकान देखने और उनकी सामाजिक स्थति जानने।
उनका फोन हमेशा आता रहता। मम्मी को सारी बाते पप्पा बताते रहते। मुझे बड़ी उत्सुकता होती कि मैं भी जानूँ लेकिन लाजवश कुछ नहीं पूछ पाती।
एक दिन संध्या दीदी से घुमा फिराकर मैं फोन पर पूछ रही थी कि मम्मी से पूछे।
तभी मौसी ने फोन ले लिया ” बड़ा बेकल होत हउ , रची चिंता ना करो गुड्डो , तोहार गवना आ बिआह एक्के साथे अबकी बरस हो जाए। ” और कहकर खी खीं सूर्पनखा की तरह हंसने लगीं .
मैंने शर्म के मारे फोन रख दिया।
कुछ दिनों में पापा और भैया बम्बई से आ गए।
अबतक मैं पढ़ाई के साथ साथ घरकाम में भी निपुण होने लगी थी।
रात को खाने के समय बाते होने लगीं। खूब तारीफें होने लगीं , बम्बई बहुत शानदार शहर है, पाण्डेय जी का मलाड में खुद का फ्लेट है , २ बेडरूम का,जिसकी कीमत कम से कम ६ लाख रुपये है। इलेक्ट्रॉनिक्स की दूकान है में मार्केट में, कम से कम २० लाख की दूकान है , (सन १९९६ में) ब्याज का धंधा अलग है , सतीश बी कॉम फर्स्ट ईयर में है ,अकेला सतीश ही है,बहुत गंभीर है सतीश , बहुत सज्जन परिवार है, प्रीति के भाग खुल गए इत्यादि।
मैं सुन सुन कर मन ही मन खुश होती ,अपने भाग्य पर इठलाती। कुंडली मिलान हो चुका था।
शादी की तारीख भी तय हो चुकी थी ,जनवरी में शादी होनी थी, उसके तीसरा साल लगते गौना।
संध्या दीदी का गौना मई में तय हुआ था , जिसमें “सभी” लोग आनेवाले थे।
इस बात को लेकर भी मैं बहुत उत्साहित थी, अपने आपको और सजाने संवारने में लग गयी थी।

भैया और पापा को उन लोगों ने बम्बई खूब घुमाई थी , सो खूब सारी तस्वीरें भैया पापा सतीश की थीं।
रातें तस्वीर देखकर, तस्वीर से बातें कर प्यार कर के गुजारती।
सबीहा और गीता को भी तस्वीरें दिखाईं।

नज़र में ख़्वाब नए रात भर सजाते हुए
तमाम रात कटी तुमको गुनगुनाते हुए
तुम्हारी बात, तुम्हारे ख़याल में गुमसुम
सभी ने देख लिया हमको मुस्कराते हुए

अब मैं धीरे धीरे पुरे मनोयोग से अपने आपको तराशने में लग चुकी थी। बारहवीं की परीक्षा भी नजदिक आ चुकी थीं और धीरे धीरे मई का महीना भी।
पेपर्स हो गए, पूरी उम्मीद थी कि फर्स्ट क्लास ज़रूर आएगा।
१ हफ्ते बाद संध्या दीदी का गौना था।
आज शाम को बस से लखनऊ निकलना था। अमित की फेमिली साथ आ रही थी।
अमितवा २ -३ दिन में लखनऊ पहुँचने वाला था।
मुझे बहुत बेचैनी हो रही थी , पहली बार “उनका” दीदार होने वाला था।

नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं
क़रीब उनके आने के दिन आ रहे हैं
जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है
सब उनको सुनाने के दिन आ रहे हैं
अभी से दिल-ओ-जाँ सरे-राह रख दो
के लुटने लुटाने के दिन आ रहे हैं
टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती
निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं
सबा फिर हमें पूछती फिर रही है
चमन को सजाने के दिन आ रहे हैं
चलो “फ़ैज़” फिर से कहीं दिल लगायेँ
सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं

आखिर वो दिन भी आ पहुंचा। हम लोग लखनऊ आ गए। फिर वहाँ से सभी लोग मौसाजी के पैतृक गाँव, जो गोरखपुर में है , वहाँ पहुंचे।
बड़ा ही सुन्दर गाँव है। छोटा सा। आबादी मुश्किल से २०००। बड़े बड़े खेत खलिहान। गर्मी का मौसम था। भयंकर गर्मी में जान सांसत में पड़ जाती थी।
मर्द और लड़के तो अर्धनग्न रहकर घूम लेते थे, नदी में जाकर नहा आते थे।
औरतें तो बिचारी कोठरी में ही उमस झेलने को मजबूर।
धीरे धीरे रिश्तेदारों की भीड़ आने लगी, काम काज भी बढ़ने लगा।
मैं भी काम काज में हाथ बंटाने लगी। गौने के दो दिन पहले तक तो मौसाजी के घर में ६० के लगभग परानी जमा हो चुके थे।
मौसाजी के अन्य कई रिश्तेदार जिसमें बम्बई से मौसाजी के चचेरे भाई की बहु भी आई थी जिसका नाम नीमा था , सुन्दर गोरी भरी पूरी लम्बी, लम्बे बाल, बम्बई में ही पली बढ़ी थी, २ बच्चे भी थे। उनकी उम्र उस समय ३५ के लगभग थी। उनकी लव मैरिज हुई थी , मौसाजी के चचेरे भाई के बेटे केतन से .
वो मूलतः मारवाड़ी थी. वैसे बड़ी घमंडी थी। यु पी में रहने वालों को बहुत तुच्छ समझती थी। जबसे मिली थी तबसे बम्बई की बढाई और यु पी की बुराई।
संध्या दीदी ने में पहले ही बता दिया था।
उनकी सास की उनसे ज़रा भी नहीं बनती थी। वैसे वो सिर्फ १२ तक पढ़ी थी लेकिन चोंचले इंजीनियर के दिखाती थी।
एक रात बातों बातों में बोलने लगी कि यु पी की औरतें बेढंगी होती हैं ,मारवाड़ी औरतें ज्यादा सहूर सलीके वाली होती हैं। यु पी के मर्द नामर्द होते हैं और मारवाड़ी मर्द असली मर्द होते हैं।
संधया दीदी की चाची ने पट्ट से जवाब दे दिया ” अरे बहु ,फिर नामर्द ही क्यों पसंद आया ? और मारवाड़ी मर्दों की मर्दानगी आपको कैसे पता ?”
वो एकदम चुप हो गयी।
हमसब जोर जोर से हंसने लगे , उन्हें बहुत बुरा लगा।
साथ बैठी फुलवा नाइन बोली ” आव देखबू यु पी का हथियार , निच्वे से घुसी त सोझे मुह्वा फाड़ के निकली। बुझात बा केतन बाबू के घुसावे नाही देलू , खाली मुँहवे में डाल के झाड़ देलू। ई दुनो लइके मारवाड़ी क बूंदे से उपजल हैं का ? ”
यह सुनकर नीमा भाभी तमतमा गयी। लेकिन अब वो सबके मजाक का केंद्र बन चुकी थी।
लीला कहारन ने गीत छेड़ दिया
” आइल बाड़ी नीमा रानी चुदवा के
अपने धोबिया से अपन चूची मिसवा के।
बुर नाही भोसड़ा बा नीमा रानी क
धोबिया ना पेल पाया एतना मोट बुरिया
चढ़ा दिहले अपने गदहवा के ,
गदहा का लांण छुए पाताल के,
उहो हार गइल पेलत पेलत नीमा रानी के।
सारा टोला आइल पेले नीमा रानी के,
हार गईल पूरा टोला केहु ना पेल पाया नीमा रानी के.
पिहरे से आइल भइया नीमा रानी क ,
घच्च से पेल दिहलस बुरिया नीमा रानी क ,
नूनीये से पेल के नचा दिहलस नीमा रानी के ,
अपने भइया से पेलवा मगन बुर नीमा रानी क। ”

गीत के दौरान कोरस भी चल रहा था।
बेचारी नीमा भाभी मुंह टाक रही थी , उसे भोजपुरी समझ में आती थी , वो झेंप के रुआंसी हो गयी।
मैं सबको डांटने लगी।
और उन्हें चुप कराने लगि. इस घटना के बाद उनकी मुझसे जमने लगी।
उम्र में डिफ़रेंस बावजूद वो एक ही रात में वो मेरी बहुत अच्छी दोस्त बन गयी।
हम दोनों रात भर करने लगे, छत पर बैठकर।
मैं धीरे धीरे उनसे बम्बई के बारे में जानकारी हासिल करने लगी। उनकी बातें सुनकर मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।
अक्सर औरतों के पेट में कोई बात नहीं छुपती, मुझसे भी यही हुआ , मैंने भावावेश में उन्हें सब कुछ बता दिया। लेकिन संध्या दीदी का मेरे साथ सम्बन्ध हुआ वो नहीं बताया।
उन्होंने भी फिर मुझे बताया मैं हैरान रह गयी।
बहुत बड़ी चुदक्कड़ थी नीमा भाभी।
शादी के पहले से ही कम से कम ६ लण्ड ले चुकी थी।
यहां तक कि इस बार आते समय ट्रेन में भी सहयात्री से टॉयलेट में चुदवा चुकी थी।
यहां आकर २ दिन से चुदवाई नहीं थी तो बुर में भयंकर खुजली मची थी उनके , मुझे बोली ज़रा मेरी बुर में ऊँगली चला दे।
मैं शर्मा गयी और मैंने मना कर दिया।
यह सब छत पर ही रात में हो रहा था। सभी लोग सो रहे थे ,वो मुझे लेकर दिवार पर टेक लगा कर बैठ गयी। और अपनी साड़ी को घाघरे सहित पेट तक पलट दी और अपनी बुर की दोनों किनारों को फैला कर मुझे दिखाने लगि.
बुर पर हलके हलके बाल थे, जिससे लग रहा था ४-५ दिन पहले ही शेव की है।
बुर उनका बुरी तरह से फटा हुआ था , शायद इसे ही भोसड़ा कहते हैं.
” प्लीज़ , प्रीति ऊँगली डालो। ”
मैंने झिझकते हुए अपनी एक ऊँगली उनकी फैली हुई डाल दी।
” एक नहीं तीन डालो ”
मैंने उनका आदेश मानते हुए ३ ऊँगली घुसेड़ दी।
बुर इतनी गीली हो चुकी थी की लप्प से मेरी ३ उँगलियों को घोंट गयी।
” ज़ोर से ऊँगली चलाओं, तुरंत मैं झड़ जाउंगी ”
मैंने तेज़ी से ऊँगली चलानी शुरू की , उन्होंने अपना ब्लाउज़ खोल कर अपनी चूचियाँ बाहर निकाल दी और मुझे झुकाकर चूची मेरे मुंह में घुसेड़ दी।
मैं चूची पीने लगी और तेज़ी से उँगलियों को अंदर बाहर करने लगी।
मिनट भर में ही नीमा भाभी सिसकारी हुए आ आ आ कहते हुए गांड उठाकर छलल छलल करके झड़ने लगी। मेरा पूरा हाथ उनके बुर से निकले पानी से भीग गया।
मैंने बुर से ऊँगली और मुंह से चूची निकाल ली.
” थेंक्यु प्रीति , तुम जानती नहीं , एक दिन पानी न निकालूँ तो पागलपन हो जाता है, केतन के लण्ड में कोई दम नहीं है , इसलिए बाहर चुदवाती हूँ, देखना यहां भी कई लण्ड है जो मुझे चोद चुके हैं। चुदवाउंगी भी कल ”
कहकर हंस दी।
फिर हम बिस्तर वगेरा ठीक करके सो गए।

गौने को एक ही दिन बचा था। सब ओर भाग दौड़, हलवाई और दुनिया भर के लोग आ जा रहे थे। दुपहर तक नीमा भाभी का सास और पति केतन से ३ -४ बार झगड़ा हो चुका था।
एक तो मैंने सुना।
” तुझे २ दिन भी चैन नहीं आता है सेक्स के बिना ?एकदम पागल हो जाती है। ”
“मुझे यहां नरक में ला पटका , इतनी गर्मी में,और अपनी नामर्दी छुपा रहा है। ”
मैं सन्न हो गयी तू तड़ाक सुनकर और चुपके से खिसक ली। बाप रे।
दुपहर तक अमितवा भी आ चुका था। और काम में हाथ बंटा रहा था , मुझसे बात करने की कोशिश भी की लेकिन मैंने हड़का दिया।
नीमा भाभी बोली “यही है अमित? अच्छा तो है , इसका सामान भी अच्छा होगा। तुझे ऐतराज़ ना हो तो मैं ट्राई मारूं ?”
“धत्त !” मैं बोली।
मेरे मन में तो एक चीज़ घूम रही थी, कब होंगे हमारे पांडे जी के दीदार? बाकी जिससे जिसको माँ चुदवाना हो मुझे क्या?
नीमा भाभी रह रह कर मजदूरों से मजाक कर रही थी।
” आज रात को मेरा जुगाड़ हो गया है ,प्रीति। छत पर ही गेम बजेगा ” कहकर वो रंडी की तरह हंसने लगी।
उनसे मैं काफी खुल चुकी थी।
मैंने कहा ” भाभी , छोडो ये सब बातें , बम्बई के बारे में बताओ ना ?”
” बम्बई या सतीश ?”
” दोनों के बारे में ” मैंने निर्ल्लज हो कर कहा।
” सतीश से मेरी अच्छी जमती है, उसको भी मैं अपने आटे में लेने वाली थी लेकिन तेरे से शादी तय हो गयी और मैंने तुझे देख लिया है और तू मेरी दोस्त बन गयी है इसलिए जा उसे झूठा नहीं करती ” एकदम टिपिकल बम्बइया स्टाइल में नीमा भाभी बोली।
” क्या भाभी आप भी ?”
” अरे , वैसे तो वो बहुत शर्मिला है लेकिन गुस्सैल भी बहुत है। बहुत बार मारा मारी कर चुका है एरिया में। लेकिन अभी तक कवला है.”
” कवला ? मतलब?”
” अरे येडी , कवला मतलब वर्जिन , जैसे तू सील पैक है। ”
” बाप रे , क्या भाषा है बम्बई की ?”
” सब सिख जायेगी तू , टेंशन मत ले ”
” अच्छा उसकी कोई गर्ल फ्रेंड है क्या ?” मैंने जासूसी के लहज़े में पूछा
” होगी भी तो क्या मेरेको बोलेगा ? किधर लेके अक्सा बीच नहीं तो बेंड स्टेण्ड, नेशनल पार्क पे दबा वबा के आता होगा ”
” क्या भाभी, आप क्या बोल रही हो , मुझे समझ नहीं आ रहा ”
” हा हा हा , अरे मस्ती कर रही हूँ , रात का वेट नहीं हो रहा , तेरेको मालुम है एक बार तो मैंने एक साथ ४ पुलिसवालों चुदवाया है। ”
“मुझे नहीं सुनना ,”मैं थोड़ा चिढ कर बोली।
” अरे सुन , अभी पिछले साल दिसम्बर में मेरा एक लवर मेरेको नेशनल पार्क जंगल में लेके मेरे को चोद रहा था , उसकी गाडी के पीछे की सीट में, तभी चार पुलिसवाले आये और हम लोगों को पकड़ लिया , उस चूतिये से पैसा भी लिया और मेरे को एकदम ओपन देख के माधरचोद लोगों लण्ड खड़ा हो गया। मेरे को बोले भाभी हमको चोदने दो। मैं मना कि तो बोले इसको बांटती है हमको डांटती है। मैं कुछ बोली नहीं खाली आँख बंद कर ली, उसके बाद भेन्चोद कौन चढ़ा, कौन उतरा , मालुम नहीं , मेरेको कोई फरक नहीं पड़ता , जहां ४ वहाँ चालीस। उसके बाद उस चूतिये लवर से मैंने कम से कम १०००० रूपये वसूले।देख प्रॉब्लम नहीं है मेरेको पैसे की लेकिन ऐसे ऊपर का पैसा मिलता है तो किसके बाप के पेट में दर्द होता है। ”
यह सब सुनकर मैं हैरान थी, ये तो सबीहा की माँ को फेल कर चुकी थी। अपनी चुदाई गाथा ऐसे बताती थी जैसे पानीपत का युद्ध जीत कर आयी हो।
केतन भइया बिचारा !
” लेकिन भाभी, अगर केतन भइया को कभी पता चला तो ?”
” अरे उसको मालुम है रे, वो भी कम है क्या ? आधा पैसा महीने में बार में रंडी लोग पे उड़ा डालता है। मेरे को एक बार उसने पकड़ा भी था ,लेकिन कुछ नहीं बिगाड़ सकता मेरा. खाली वार्निंग देके छोड़ दिया ”
कहकर फिर वो हंसने लगी।
” आज रात की सेटिंग है, नया लण्ड है, चेक करुँगी साला कवला है या दुनिया भर में अपनी माँ चुदा के आया है ” फिर हंसने लगी।
बाप रे , मेरे तो कान ही भनभना उठे।
धीरे धीरे शाम हो गयी।
गावं की लड़की
अचानक शोर होने लगा,गौने वाले आ गए।
इधर उधर भाग दौड़ शुरू हो गयी.
मैं भी बेचैन होकर उस पल इंतज़ार करने लगी, जब मेरे ह्रदय की वीना के तार को छेड़ने वाला संगीतकार पहली बार मिलेगा।
क्या होगी मेरी प्रतिक्रिया ? मैं तो ज्यास्ती भाव नहीं दूंगी , अरे ये तो मैं भी नीमा भाभी की भाषा सीख गयी।

ना पूछ जब से तेरा इंतज़ार कितना है
कि जिन दिनों से मुझे तेरा इंतज़ार नहीं
तेरा ही अक्स है उन अजनबी बहारों में
जो तेरे लब, तेरे बाज़ू, तेरा कनार नहीं
(फ़ैज़)

loading...

Leave a Reply