कपडे धोने का काम, मम्मी के साथ part 5

मैने कुछ नही कहा और अपने काम में लगा रह। तभी मां ने सब्जी काटना बंध कर दिया, और उठ कर खडी हो गई और बोली,
“खाना बना देती हुं, तु तब तक छत पर बिछावन लगा दे। बडी गरमी है आज तो, ईस्त्री छोड कल सुबह उठ के कर लेना।”

मैने ने कहा,
“बस थोडा-सा और करदुं, फिर बाकी तो कल ही करुन्गा।”

मैं ईस्त्री करने में लग गया और, रसोई घर से फिर खट-पट की आवाजें आने लगी। यानी की मां ने खाना बनाना शुरु कर दिया था। मैने जल्दी-से कुछ कपडों को ईस्त्री की, फिर अंगीठी बुझाई और अपने तौलिये से पसिना पोंछता हुआ बाहर निकाल आया। हेन्डपम्प के ठंडे पानी से अपने मुंह-हाथो को धोने के बाद, मैने बिछावन लिया और छत पर चल गया। और दिन तो तीन लोगो का बिछावन लगता था, पर आज तो दो का ही लगाना था। मैने वहीं जमीन पर पहले चटाई बिछाई, और फिर दो लोगो के लिये बिछावन लगा कर निचे आ गया। मां, अभी भी रसोई में ही थी। मैं भी रसोई-घर में घुस गया। मां ने साडी उतार दी थी, और अब वो केवल पेटिकोट और ब्लाउस में ही खाना बना रही थी। उसने अपने कंधे पर एक छोटा-सा तौलिया रख लिया था और उसी से अपने माथे का पसिना पोंछ रही थी। मैं जब वहां पहुंचा, तो मां सब्जी को कलछी से चला रही थी और दुसरी तरफ रोटियां भी सेक रही थी।

मैने कहा,
“कौन-सी सब्जी बना रही हो, केले या बैगन की ?”

मां ने कहा,
“खुद ही देख ले, कौन-सी है ?”

“खूश्बु तो बडी अच्छी आ रही है। ओह, लगता है दो-दो सब्जी बनी है।”

“खा के बताना, कैसी बनी है ?”

“ठीक है मां, बता और कुछ तो नही करना ?”
कहते-कहते मैं एकदम मां के पास आ के बैठ गया था। मां मोढे पर अपने पैरों को मोड के और अपने पेटिकोट को जांघो के बीच समेट कर बैठी थी। उसके बदन से पसिने की अजीब-सी खूश्बु आ रही थी। मेरा पुरा ध्यान उसकी जांघो पर ही चला गया था। मां ने मेरी ओर देखते हुए कहा,
“जरा खीरा काट के सलाड भी बना ले।”

“वाह मां, आज तो लगता है, तु सारी ठंडी चीजे ही खायेगी ?”

“हां, आज सारी गरमी उतार दुन्गी, मैं।”

“ठीक है मां, जल्दी-से खाना खा के छत पर चलते है, बडी अच्छी हवा चल रही है।”

मां ने जल्दी-से थाली निकली, सब्जीवाले चुल्हे को बंध कर दिया। अब बस एक-या दो रोटियां ही बची थी, उसने जल्दी-जल्दी हाथ चलाना शुरु कर दिया। मैने भी खीरा और टमाटर काट के सलाड बना लिया। मां ने रोटी बनाना खतम कर के कहा,
“चल, खाना निकाल देती हुं। बाहर आंगन में मोढे पर बैठ के खायेन्गे। ”

मैने दोनो परोसी हुई थालीयां उठाई, और आंगन में आ गया । मां वहीं आंगन में, एक कोने पर अपना हाथ-मुंह धोने लगी। फिर अपने छोटे तौलिये से पोंछते हुए, मेरे सामने रखे मोढे पर आ के बैठ गई। हम दोनो ने खाना सुरु कर दिया। मेरी नजरें मां को उपर से नीचे तक घुर रही थी। मां ने फिर से अपने पेटिकोट को अपने घुटनो के बीच में समेट लिया था और इस बार शायद पेटिकोट कुछ ज्यादा ही उपर उठा दिया था। चुचियां, एकदम मेरे सामने तन के खडी-खडी दिख रही थी। बिना ब्रा के भी मां की चुचियां ऐसी तनी रहती थी, जैसे की दोनो तरफ दो नारियल लगा दिये गये हो। इतनी उमर बीत जाने के बाद भी थोडा-सा भी ढलकाव नही था। जांघे, बिना किसी रोयें के, एकदम चिकनी, गोरी और मांसल थी। पेट पर उमर के साथ थोडा-सा मोटापा आ गया था। जिसके कारण पेट में एक-दो फोल्ड पडने लगे थे, जो देखने में और ज्यादा सुंदर लगते थे। आज पेटिकोट भी नाभी के नीचे बांधा गया था। इस कारण से उसकी गहरी गोल नाभी भी नजार आ रही थी। थोडी देर बैठने के बाद ही मां को पसिना आने लगा, और उसकी गरदन से पसिना लुढक कर उसके ब्लाउस के बीचवाली घाटी में उतरता जा रह था। वहां से, वो पसिना लुढक कर उसके पेट पर भी एक लकीर बना रहा था, और धीरे-धीरे उसकी गहरी नाभी में जमा हो रहा था। मैं इन सब चीजो को बडे गौर से देख रहा था। मां ने जब मुझे ऐसे घुरते हुए देखा तो हसते हुए बोली,
“चुप-चाप ध्यान लगा के खाना खा, समझा !!!!”

और फिर अपने छोटेवाले तौलिये से अपना पसिना पोंछने लगी। मैं खाना खाने लगा और बोला,
“मां, सब्जी तो बहुत ही अच्छी बनी है।”

“चल तुझे पसंद आयी, यही बहुत बडी बात है मेरे लिये। नही तो आज-कल के लडको को घर का कुछ भी पसंद ही नही आता।”

“नही मां, ऐसी बात नही है। मुझे तो घर का ‘माल’ ही पसंद है।”
ये, माल शब्द मैने बडे धीमे स्वर में कहा था कि, कहीं मां ना सुन ले। मां को लगा की शायद मैने बोला है, घर की दाल। इसलिये वो बोली,
“मैं जानती हुं, मेरा बेटा बहुत समझदार है, और वो घर के दाल-चावल से काम चला सकता है। उसको बाहर के ‘मालपुए’ (एक प्रकार की खानेवाली चीज, जोकि मैदे और चीनी की सहायता से बनाई जाती है, और फुली हुए पांव की तरह से दिखती है।) से कोई मतलब नही है।”

मां ने मालपुआ शब्द पर शायद ज्यादा ही जोर दिया था, और मैने इस शब्द को पकड लिया। मैने कहा,
“पर मां, तुझे मालपुआ बनाये काफि दिन हो गये। कल मालपुआ बना, ना ?”

“मालपुआ तुझे बहुत अच्छा लगता है, मुझे पता है। मगर इधर इतना टाईम कहां मिलता था, जो मालपुआ बना सकु ? पर अब मुझे लगता है, तुझे मालपुआ खिलाना ही पडेगा।”

मैने ने कहा,
“जल्दी खिलाना, मां।”
और हाथ धोने के लिये उठ गया।

मां भी हाथ धोने के लिये उठ गई। हाथ-मुंहा धोने के बाद, मां फिर रसोई में चली गई, और बिखरे पडे सामानो को संभालने लगी। मैने कहा,
“छोडोना मां, चलो सोने जल्दी से। यहां बहुत गरमी लग रही है।”

“तु जा ना, मैं अभी आती। रसोई-घर गंदा छोडना अच्छी बात नही है।”

मुझे तो जल्दी से मां के साथ सोने की हडबडी थी कि, कैसे मां से चिपक के उसके मांसल बदन का रस ले सकु। पर मां रसोई साफ करने में जुटी हुई थी। मैने भी रसोई का सामान संभालने में उसकी मदद करनी शुरु कर दी। कुछ ही देर में सारा सामान, जब ठीक-ठाक हो गया तो हम दोनो रसोई से बाहर आ गये। मां ने कहा,
“जा, दरवाजा बंध कर दे।”

मैं दौड कर गया और दरवाजा बंध कर आया। अभी ज्यादा देर तो नही हुई थी, रात के ९:३० ही बजे थे। पर गांव में तो ऐसे भी लोग जल्दी ही सो जाया करते है। हम दोनो मां-बेटे छत पर आके बिछावन पर लेट गये।

बिछावन पर मां भी, मेरे पास ही आ के लेट गई थी। मां के इतने पास लेटने भर से मेरे शरीर में, एक गुद-गुदी सी दौड गई। उसके बदन से उठनेवाली खूश्बु, मेरी सांसो में भरने लगी, और मैं बेकाबु होने लगा था। मेरा लंड धीरे-धीरे अपना सिर उठाने लगा था। तभी मां मेरी ओर करवट ले के घुमी और पुछा,
“बहुत थक गये होना ?”

“हां मां, जिस दिन नदी पर जाना होता है, उस दिन तो थकावट ज्यादा हो ही जाती है।”

“हां, बडी थकावट लग रही है, जैसे पुरा बदन टूट रह हो।”

“मैं दबा दुं, थोडी थकान दूर हो जायेगी।”

“नही रे, रहने दे तु, तु भी तो थक गया होगा।”

“नही मां उतना तो नही थका, कि तेरी सेवा ना कर सकु।”

मां के चेहरे पर एक मुस्कान फैल गई, और वो हसते हुए बोली,
“दिन में इतना कुछ हुआ था, उससे तो तेरी थकान और बढ गई होगी।”

“हाये, दिन में थकान बढने वाला तो कुछ नही हुआ था।”

इस पर मां थोडा-सा और मेरे पास सरक कर आई। मां के सरकने पर मैं भी थोडा-सा उसकी ओर सरका। हम दोनो की सांसे, अब आपस में टकराने लगी थी। मां ने अपने हाथो को हल्के से मेरी कमर पर रखा और धीरे धीरे अपने हाथो से मेरी कमर और जांघो को सहलाने लगी। मां की इस हरकत पर मेरे दिल की धडकन बढ गई, और लंड अब फुफकारने लगा था। मां ने हल्के-से मेरी जांघो को दबाया। मैने हिम्मत कर के हल्के-से अपने कांपते हुए हाथो को बढा के मां की कमर पर रख दिया। मां कुछ नही बोली, बस हल्का-सा मुस्कुरा भर दी। मेरी हिम्मत बढ गई और मैं अपने हाथो से मां की नंगी कमर को सहलाने लगा। मां ने केवल पेटिकोट और ब्लाउस पहन रखा था। उसके ब्लाउस के उपर के दो बटन खुले हुए थे। इतने पास से उसकी चुचियों की गहरी घाटी नजर आ रही थी और मन कर रह था जल्दी से जल्दी उन चुचियों को पकड लुं। पर किसी तरह से अपने आप को रोक रखा था। मां ने जब मुझे चुचियों को घुरते हुए देखा तो मुस्कुराते हुए बोली,
“क्या इरादा है तेरा ? शाम से ही घुरे जा रह है, खा जायेगा क्या ?”

“हाये, मां तुम भी क्या बात कर रही हो, मैं कहां घुर रह था ?”

“चल झुठे, मुझे क्या पता नही चलता ? रात में भी वही करेगा, क्या ?”

“क्या मां ?”

“वही, जब मैं सो जाउन्गी तो अपना भी मसलेगा, और मेरी छातियों को भी दबायेगा।”

“हाय मां।”

“तुझे देख के तो यही लग रहा है कि, तु फिर से वही हरकत करने वाला है।”

“नही, मां।”

मेरे हाथ अब मां कि जांघो को सहला रहे थे।

“वैसे दिन में मजा आया था ?”,
पुछ कर, मां ने हल्के-से अपने हाथो को मेरी लुन्गी के उपर लंड पर रख दिया। मैने कहा,
“हाये मां, बहुत अच्छा लगा था।”

“फिर करने का मन कर रह है, क्या ?”

“हाये, मां।”

इस पर मां ने अपने हाथो का दबाव जरा-सा, मेरे लंड पर बढा दिया और हल्के हल्के दबाने लगी। मां के हाथो का स्पर्श पा के, मेरी तो हालत खराब होने लगी थी। ऐसा लगा रह था कि, अभी के अभी पानी निकल जायेगा। तभी मां बोली,
“जो काम, तु मेरे सोने के बाद करने वाला है, वो काम अभी कर ले। चोरी-चोरी करने से तो अच्छा है कि, तु मेरे सामने ही कर ले।”

मैं कुछ नही बोला और अपने कांपते हाथो को, हल्के-से मां की चुचियों पर रख दिया। मां ने अपने हाथो से मेरे हाथो को पकड कर, अपनी छातियों पर कस के दबाया और मेरी लुन्गी को आगे से उठा दिया और अब मेरे लंड को सीधे अपने हाथो से पकड लिया। मैने भी अपने हाथो का दबाव उसकी चुचियों पर बढा दिया।

मेरे अंदर की आग एकदम भडक उठी थी, और अब तो ऐसा लगा रह था कि, जैसे इन चुचियों को मुंह में ले कर चुस लुं। मैने हल्के-से अपनी गरदन को और आगे की ओर बढाया और अपने होठों को ठीक चुचियों के पास ले गया । मां शायद मेरे इरादे को समझ गई थी। उसने मेरे सिर के पिछे हाथ डाला और अपनी चुचियों को मेरे चेहरे से सटा दिया। हम दोनो अब एक-दुसरे की तेज चलती हुई सांसो को महसुस कर रहे थे। मैने अपने होठों से ब्लाउस के उपर से ही, मां की चुचियों को अपने मुंह में भर लिया और चुसने लगा। मेरा दुसरा हाथ कभी उसकी चुचियों को दबा रह था, कभी उसके मोटे-मोटे चुतडों को। मां ने भी अपना हाथ तेजी के साथ चलना शुरु कर दिया था, और मेरे मोटे लंड को अपने हाथ से मुठीया रही थी। मेरा मजा बढता जा रहा था, तभी मैने सोचा ऐसे करते-करते तो मां फिर मेरा निकाल देगी, और शायद फिर कुछ देखने भी न दे। जबकि मैं आज तो मां को पुरा नंगा करके, जी भर के उसके बदन को देखना चाहता था। इसलिये मैने मां के हाथो को पकड लिया और कहा,
“हाये मां, रुको।”

“क्यों, मजा नही आ रह है, क्या ? जो रोक रहा है।”

“हाये मां, मजा तो बहुत आ रह है, मगर ?”

“फिर क्या हुआ ?”

“फिर मां, मैं कुछ और करना चाहता हुं। ये तो दिन के जैसे ही हो जायेगा।”

इस पर मां मुस्कुराते हुए पुछा,
“तो तु और क्या करना चाहता है ? तेरा पानी तो ऐसे ही निकलेगा ना, और कैसे निकलेगा ?”

“हाय नही मां, पानी नही निकालना मुझे।”

“तो फिर क्या करना है ?”

“हाये मां, देखना है।”

“हाये, क्या देखना है, रे ?”

“हाये मां, ये देखना है।”,
कह कर, मैने एक हाथ सीधा मां की बुर पर रख दिया।

“हाये बदमाश, ये कैसी तमन्ना पाल ली, तुने ?”

“हाय मां, बस एक बार दिखा दो, ना।”

“नही, ऐसा नही करते। मैने तुम्हे थोडी छुट क्या दे दी, तुम तो उसका फायदा उठाने लगे।”

“हाये मां, ऐसे क्यों कर रही हो तुम ? दिन में तो कितना अच्छे से बातें कर रही थी।”

“नही, मैं तेरी मां हुं, बेटा।”

“हाये मां, दिन में तो तुमने कितना अच्छा दिखाया भी था, थोडा बहुत ?”

“मैने कब दिखाया ? झुठ क्यों बोल रहा है ?”

“हाये मां, तुम जब पेशाब करने गई थी, तब तो दिखा रही थी।”

“हाये राम, कितना बदमाश है रे, तु ? मुझे पता भी नही लगा, और तु देख रहा था। हाय दैया, आज कल के लौंडो का सच में कोई भरोसा नही। कब अपनी मां पर बुरी नजर रखने लगे, पता ही नही चलता ?”

“हाय मां, ऐसा क्यों कह रही हो ? मुझे ऐसा लगा जैसे, तुम मुझे दिखा रही हो, इसलिये मैने देखा।”

“चल हट, मैं क्यों दिखाउन्गी ? कोई मां ऐसा करती है, क्या ?”

“हाय, मैने तो सोचा था कि, रात में पुरा देखुन्गा। ”

“ऐसी उल्टी-सीधी बातें मत सोचा कर, दिमाग खराब हो जायेगा।”

“हाय मां, ओह मां, दिखा दो ना, बस एक बार। खाली देख कर सो जाउन्गा।”

पर मां ने मेरे हाथो को झटक दिया, और उठकर खडी हो गई। अपने ब्लाउस को ठीक करने के बाद, छत के कोने की तरफ चल दी। छत का वो कोना घर के पिछवाडे की तरफ पडता था, और वहां पर एक नाली (मोरी) जैसा बना हुआ था, जिस से पानी बह कर सीधे नीचे बहनेवाली नाली में जा गीरता था। मां उसी नाली पर जा के बैठ गई। अपने पेटिकोट को उठा के पेशाब करने लगी। मेरी नजरें तो मां का पिछा कर ही रही थी। ये नजारा देख के तो मेरा मन और बहक गया । दिल में आ रहा था कि जल्दी से जाके, मां के पास बैठ के आगे झांख लुं, और उसकी पेशाब करती हुई चुत को कम से कम देख भर लुं। पर ऐसा ना हो सका। मां ने पेशाब कर लिया, फिर वो वैसे ही पेटिकोट को जांघो तक, एक हाथ से उठाये हुए मेरी तरफ घुम गई और अपनी बुर पर हाथ चलाने लगी, जैसे कि पेशाब पोंछ रही हो और फिर मेरे पास आ के बैठ गई। मैने मां के बैठने पर उसका हाथ पकड लिया और प्यार से सहलाते हुए बोला,
“हाय मां, बस एक बार दिखा दो ना, फिर कभी नही बोलुन्गा दिखने के लिये।”

“एक बार ना कह दिया तो तेरे को समझ में नही आता है, क्या ?”

“आता तो है, मगर बस एक बार में क्या हो जायेगा ? ”

“देख, दिन में जो हो गया सो हो गया। मैने दिन में तेरा लंड भी मुठीया दिया था, कोई मां ऐसा नही करती। बस इससे आगे नही बढने दुन्गी।”

मां ने पहली बार गंदे शब्द का उपयोग किया था। उसके मुंह से लंड सुन के ऐसा लगा, जैसे अभी झड के गीर जायेगा। मैने फिर धीरे से हिम्मत कर के कहा,
“हाये मां, क्या हो जायेगा अगर एक बार मुझे दिखा देगी तो ? तुमने मेरा भी तो देखा है, अब अपना दिखा दो ना ।”

“तेरा देखा है, इसका क्या मतलब है ? तेरा तो मैं बचपन से देखते आ रही हुं। और रही बात चुंची दिखाने और पकडाने की, वो तो मैने तुझे करने ही दिया है ना, क्योंकि बचपन में तो तु इसे पकडता-चुसता ही था। पर चुत की बात और है, वो तो तुने होश में कभी नही देखी ना, फिर उसको क्यों दिखाउं ?”

मां अब खुल्लम-खुल्ला गन्दे शब्दो का उपयोग कर रही थी।

“हाये, जब इतना कुछ दिखा दिया है तो, उसे भी दिखा दो ना। ऐसा, कौन-सा काम हो जायेगा ?”

मां ने अब तक अपना पेटिकोट समेट कर जांघो के बीच रख लिया था और सोने के लिये लेट गई थी। मैने इस बार अपना हाथ उसकी जांघो पर रख दिया। मोटी-मोटी गुदाज जांघो का स्पर्श जानलेवा था। जांघो को हल्के-हल्के सहलाते हुए, मैं जैसे ही हाथ को उपर की तरफ ले जाने लगा, मां ने मेरा हाथ पकड लिया और बोली,
“ठहर, अगर तुझसे बरदास्त नही होता है तो ला, मैं फिर से तेरा लंड मुठीया देती हुं।”,
कह कर मेरे लंड को फिर से पकड कर मुठीयाने लगी, पर मैं नही माना और ‘एक बार, केवल एक बार’, बोल के जिद करता रहा। मां ने कहा,
“बडा जिद्दी हो गया रे, तु तो। तुझे जरा भी शरम नही आती, अपनी मां को चुत दिखाने को बोल रहा है। अब यहां छत पर कैसे दिखाउं ? अगल-बगल के लोग कहीं देख लेन्गे तो ? कल देख लियो।”

“हाये, कल नही अभी दिखा दे। चारो तरफ तो सब-कुछ सुम-सान है, फिर अभी भला कौन हमारी छत पर झांकेगा ?”

“छत पर नही, कल दिन में घर में दिखा दुन्गी, आराम से।”

तभी बारीश की बुंदे तेजी के साथ गीरने लगी। ऐसा लगा रहा था, मेरी तरह आसमान भी बुर नही दिखाये जाने पर रो पडा है। मां ने कहा,
“ओह, बारीश शुरु हो गई। चल, जल्दी से बिस्तर समेट ले। नीचे चल के सोयेन्गे।”

मैं भी झट-पट बिस्तर समेटने लगा, और हम दोनो जल्दी से नीचे की ओर भागे। नीचे पहुंच कर मां, अपने कमरे में घुस गई। मैं भी उसके के पिछे-पिछे उसके कमरे में पहुंच गया । मां ने खिडकी खोल दी, और लाईट जला दी। खिडकी से बडी अच्छी, ठंडी-ठंडी हवा आ रही थी। मां जैसे ही पलंग पर बैठी, मैं भी बैठ गया । और मां से बोला,
“हाय, अब दिखा दो ना। अब तो घर में आ गये है, हम लोग।”

इस पर मां मुस्कुराते हुए बोली,
“लगता है, आज तेरी किसमत बडी अच्छी है। आज तुझे मालपुआ खाने को तो नही, पर देखने को जुरुर मिल जायेगा।”

फिर मां ने अपना सिर पलंग पे टीका के, अपने दोनो पैर सामने फैला दिये और अपने निचले होंठो को चबाते हुए बोली,
“इधर आ, मेरे पैरो के बीच में, अभी तुझे दिखाती हुं। पर एक बात जान ले, तु। पहली बार देख रहा है, देखते ही तेरा पानी निकल जायेगा, समझा।”

फिर मां ने अपने हाथो से पेटिकोट के निचले भाग को पकडा और धीरे-धीरे उपर उठाने लगी। मेरी हिम्मत तो बढ ही चुकी थी, मैने धीरे-से मां से कहा,
“ओह मां, ऐसे नही।”

“तो फिर कैसे रे, कैसे देखेगा ?”

“हाय मां, पुरा खोल के दिखाओ ना ?”

“पुरा खोल के से, तेरा क्या मतलब है ?”

“हाय, पुरे कपडे खोल के। मेरी बडी तमन्ना है कि, मैं तुम्हारे पुरे बदन को नंगा देखुं, बस एक बार।”

इतना सुनते ही मां ने आगे बढ के मेरे चेहरे को अपने हाथो में थाम लिया और हसते हुए बोली,
“वाह बेटा, अंगुली पकड के पुरा हाथ पकडने की सोच रहे हो, क्या ?”

“हाये मां, छोडो ना ये सब बात, बस एक बार दिखा दो। दिन में तुम कितने अच्छे से बातें कर रही थी, और अभी पता नही क्या हो गया है तुम्हे ? सारे रास्ते सोचता आ रहा था मैं कि, आज कुछ करने को मिलेगा और तुम हो कि,,,,,,,,,,,”

“अच्छा बेटा, अब सारा शरमाना भुल गया। दिन में तो बडा भोला बन रहा था, और ऐसे दिखा रहा था, जैसे कुछ जानता ही नही। पहले कभी किसी को किया है, क्या? या फिर दिन में झुठ बोल रहा था ?”

“हाये कसम से मां, कभी किसी को नही किया। करना तो दूर की बात है, कभी देखा या छुआ तक नही।”

“चल झुठे, दिन में तो देखा भी था और छुआ भी था।”

“हाय कहां मां, कहां देखा था ?”

“क्यों, दिन में मेरा तुने देखा नही था, क्या ? और छुआ भी था तुमने तो।”

“हाय, हां देखा था, पर पहली बार देखा था। इससे पहले किसी का नही देखा था। तुम पहली हो जिसका मैने देखा था।”

“अच्छा, इससे पहले तुझे कुछ पता नही था, क्या ?”

“नही मां, थोडा बहुत मालुम था।”

“क्या मालुम था ? जरा मैं भी तो सुनु।”,
कह कर मां ने मेरे लंड को फिर से अपने हाथो में पकड लिया और मुठीयाने लगी। इस पर मैं बोला,
“ओह छोड दो मां, ज्यादा करोगी तो अभी निकल जायेगा।”

“कोई बात नही, अभी निकाल ले। अगर पुरा खोल के दिखा दुन्गी, तो फिर तो तेरा देखते ही निकल जायेगा। पुरा खोलके देखना है ना, अभी ?”

इतना सुनए ही मेरा दिल तो बल्लीयों उछलने लगा। अभी तक तो मां नखरें कर रही थी, और अभी उसने अचानक ही, जो दिखाने की बात कर दी। मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे लंड से पानी निकल जायेगा।

“हाय मां, सच में दिखाओगी, ना ?”

“हां दिखाउन्गी मेरे राजा बेटा, जुरुर दिखाउन्गी। अब तो तु पुरा जवान हो गया है और, काम करने लायक भी हो गया है। अब तो तुझे ही दिखाना है, सब कुछ। और तेरे से अपना सारा काम करवाना है, मुझे।”

मां और तेजी के साथ मेरे लंड को मुठीया रही थी, और बार-बार मेरे लंड के सुपाडे को अपने अंगुठे से दबा भी रही थी। मां बोली,
“अभी जल्दी से तेरा निकाल देती हुं, फिर देख तुझे कितना मजा आयेगा। अभी तो तेरी ये हालत है कि, देखते ही झड जायेगा। एक पानी निकाल दे, फिर देख तुझे कितना मजा आता है।”

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