कपडे धोने का काम, मम्मी के साथ part 3

और एक कातिल मुस्कुराहट छोडते हुए उठ कर खडी हो गई, और झाडियों की तरफ चल दी। मैं उसको झाडियों कि ओर जाते हुए देखता हुआ, वहीं पेड के नीचे बैठा रहा। झाडियां, जहां हम बैठे हुए थे, वहां से बस दस कदम की दूरी पर थी। दो-तीन कदम चलने के बाद मां पिछे कि ओर मुडी और बोली,
“बडी जोर से पेशाब आ रही थी, तुझे आ रही हो तो तु भी चल, तेरा औजार भी थोडा ढीला हो जायेगा। ऐसे बेशरमों की तरह से खडा किये हुए है।”

और फिर अपने निचले होंठ को हल्के-से काटते हुए आगे चल दी। मेरी कुछ समझ में ही नही आ रहा था कि मैं क्या करुं। मैं कुछ देर तक वैसे ही बैठा रहा। इस बीच मां झाडियों के पिछे जा चुकी थी। झाडियों की इस तरफ से जो भी झलक मुझे मिल रही, वो देख कर मुझे इतना तो पता चल ही गया था कि, मां अब बैठ चुकी है और शायद पेशाब भी कर रही है। मैने फिर थोडी हिम्मत दिखाई और उठ कर झाडियों की तरफ चल दिया। झाडियों के पास पहुंच कर नजारा कुछ साफ दिखने लगा था। मां आराम से अपनी साडी उठा कर बैठी हुई थी, और मुत रही थी ।

उसके इस अंदाज से बैठने के कारण, पिछे से उसकी गोरी-गोरी झांघे तो साफ दिख ही रही थी, साथ-साथ उसके मख्खन जैसे चुतडों का निचला भाग भी लगभग साफ-साफ दिखाई दे रहा था। ये देख कर तो मेरा लंड और भी बुरी तरह से अकडने लगा था। हालांकि उसकी झांघो और चुतडों की झलक देखने का ये पहला मौका नही था, पर आज, और दिनो से कुछ ज्यादा ही उत्तेजना हो रही थी। उसके पेशाब करने की अवाज तो आग में घी का काम कर रही थी। सु,,,उ,उ,उ,,सु,,,सु,उ,उ,उ, करते हुए, किसी औरत के मुतने की आवाज में पता नही क्या आकर्षण होता है, किशोर उमर के सारे लडकों को अपनी ओर खींच लेती है। मेरा तो बुरा हाल हो रखा था। तभी मैने देखा कि मां उठ कर खडी हो गई। जब वो पलटी तो मुझे देख कर मुस्कुराते हुए बोली,
“अरे, तु भी चला आया ? मैने तो तुझे पहले ही कहा था कि, तु भी हल्का हो ले।”

फिर आराम से अपने हाथों को साडी के उपर बुर पे रख कर, इस तरह से दबाते हुए खुजाने लगी जैसे, बुर पर लगी पेशाब को पोंछ रही हो और, मुस्कुराते हुए चल दी, जैसे कि कुछ हुआ ही नही। मैं एक पल को तो हैरान परेशान सा वहीं पर खडा रहा। फिर मैं भी झाडियों के पिछे चला गया और पेशाब करने लगा। बडी देर तक तो मेरे लंड से पेशाब ही नही निकला, फिर जब लंड कुछ ढीला पडा, तब जा के पेशाब निकलना शुरु हुआ। मैं पेशाब करने के बाद वापस, पेड के निचे चल पडा।

पेड के पास पहुंच कर मैने देखा मां बैठी हुई थी। मेरे पास आने पर बोली,
“आ बैठ, हल्का हो आया ?”,
कह कर मुस्कुराने लगी। मैं भी हल्के-हल्के मुस्कुराते, कुछ शरमाते हुए बोला,
“हां, हल्का हो आया।”

और बैठ गया। मेरे बैठने पर मां ने मेरी ठुड्डी पकड कर मेरा सिर उठा दिया और सीधा मेरी आंखो में झांकते हुए बोली,
“क्यों रे ?, उस समय जब मैं छु रही थी, तब तो बडा भोला बन रहा था। और जब मैं पेशाब करने गई थी, तो वहां पिछे खडा हो के क्या कर रहा था, शैतान !!”

मैने अपनी ठुड्डी पर से मां का हाथ हटाते हुए, फिर अपने सिर को निचे झुका लिया और हकलाते हुए बोला,
“ओह मां, तुम् भी ना,,,,,,”

“मैने क्या किया ?”,
मां ने हल्की-सी चपत मेरे गाल पर लगाई और पुछा।

“मां, तुमने खुद ही तो कहा था, हल्का होना है तो, आ जाओ।”

इस पर मां ने मेरे गालों को हल्के-से खींचते हुए कहा,
“अच्छा बेटा, मैने हल्का होने के लिये कहा था, पर तु तो वहां हल्का होने की जगह भारी हो रहा था। मुझे पेशाब करते हुए घुर-घुर कर देखने के लिये तो मैने नही कहा था तुम्हे, फिर तु क्यों घुर-घुर कर मजे लुट रहा था ?”

“हाय, मैं कहां मजा लुट रहा था, कैसी बाते कर रही हो मां ?’

“ओह हो, शैतान अब तो बडा भोला बन रहा है।’,
कह कर हल्के-से मेरी झांघो को दबा दिया।

“हाये, क्या कर रही हो,,,?”

पर उसने छोडा नही और मेरी आंखो में झांखते हुए फिर धीरे-से अपना हाथ मेरे लंड पर रख दिया और फुसफुसाते हुए पुछा,
“फिर से दबाउं ?”

मेरी तो हालत उसके हाथ के छुने भर से फिर से खराब होने लगी। मेरी समझ में एकदम नही आ रहा था कि क्या करुं। कुछ जवाब देते हुए भी नही बन रहा था कि क्या जवाब दुं। तभी वो हल्का-सा आगे की ओर सरकी और झुकी। आगे झुकते ही उसका आंचल उसके ब्लाउस पर से सरक गया। पर उसने कोई प्रयास नही किया उसको ठीक करने का। अब तो मेरी हालत और खराब हो रही थी। मेरी आंखो के सामने उसकी नारीयल के जैसी सख्त चुचियां जीनको सपने में देख कर, मैने ना जाने कितनी बार अपना माल गीराया था, और जीसको दुर से देख कर ही तडपता रहता था, नुमाया थी। भले ही चुचियां अभी भी ब्लाउस में ही कैद थी, परंतु उनके भारीपन और सख्ती का अंदाज उनके उपर से ही लगाया जा सकता था। ब्लाउस के उपरी भाग से उसकी चुचियों के बीच की खाई का उपरी गोरा-गोरा हिस्सा नजर आ रहा था।

हालांकि, चुचियों को बहुत बडा तो नही कहा जा सकता, पर उतनी बडी तो थी ही, जितनी एक स्वस्थ शरीर की मालकिन की हो सकती है। मेरा मतलब है कि इतनी बडी जीतनी कि आप के हाथों में ना आये, पर इतनी बडी भी नही की आप को दो-दो हाथो से पकडनी पडे, और फिर भी आपके हाथ ना आये। एकदम किसी भाले की तरह नुकिली लग रही थी, और सामने की ओर निकली हुई थी। मेरी आंखे तो हटाये नही हट रही थी। तभी मां ने अपने हाथों को मेरे लंड पर थोडा जोर से दबाते हुए पुछा,
“बोलना, और दबाउं क्या ?”

“हाये,,,,,,मां, छोडो ना।”

उसने जोर से मेरे लंड को मुठ्ठी में भर लिया।

“हाये मां, छोडो बहुत गुद-गुदी होती है।”

“तो होने दे ना, तु खाली बोल दबाउं या नही ?”

“हाये दबाओ मां, मसलो।”

“अब आया ना, रस्ते पर।”

“हाये मां, तुम्हारे हाथों में तो जादु है।”

“जादु हाथों में है या,,,,,,!!!, या फिर इसमे है,,,,??”
(अपने ब्लाउस की तरफ इशारा कर के पुछा।)

“हाये मां, तुम तो बस,,,,,?!!”

“शरमाता क्यों है ?,बोलना क्या अच्छा लग रहा है,,?”

“हाय मम्मी,, मैं क्या बोलुं ?”

“क्यों क्या अच्छा लग रहा है,,,?, अरे, अब बोल भी दे शरमाता क्यों है,,?”

“हाये मुम्मी दोनो अच्छे लग रहे है।”

“क्या, ये दोनो ? ”
(अपने ब्लाउस की तरफ इशारा कर के पुछा)

“हां, और तुम्हारा दबाना भी।”

“तो फिर शरमा क्यों रहा था, बोलने में ? ऐसे तो हर रोज घुर-घुर कर मेरे अनारो को देखता रहता है।”

फिर मां ने बडे आराम से मेरे पुरे लंड को मुठ्ठी के अंदर कैद कर हल्के-हल्के अपना हाथ चलाना शुरु कर दिया।

“तु तो पुरा जवान हो गया है, रे!”

“हाये मां,,,,”

“हाये, हाये, क्या कर रहा है। पुरा सांढ की तरह से जवान हो गया है तु तो। अब तो बरदाश्त भी नही होता होगा, कैसे करता है,,,?”

“क्या मां,,,,?”

“वही बरदाश्त, और क्या ? तुझे तो अब छेद (होल) चाहिये। समझा, छेद मतलब ?”

“नही मां, नही समझा,,”

“क्या उल्लु लडका है रे, तु ? छेद मतलब नही समझता,,,,?!!”

मैने नाटक करते हुए कहा,
“नही मां, नही समझता।”

इस पर मां हल्के-हल्के मुस्कुराने लगी और बोली,
“चल समझ जायेगा, अभी तो ये बता कि कभी इसको (लंड की तरफ इशारा करते हुए) मसल-मसल के माल गीराया है ?”

“माल मतलब,,,!? क्या होता है, मां,,,?”

“अरे उल्लु, कभी इसमे से पानी गीराया है, या नही ?”

“हाय, वो तो मैं हर-रोज गीराता हुं। सुबह-शाम दिनभर में चार-पांच बार। कभी ज्यादा पानी पी लिया तो ज्यादा बार हो जाता है।”

“हाये, दिनभर में चार-पांच बार ? और पानी पीने से तेरा ज्यादा बार निकलता है ? कही तु पेशाब करने की बात तो नही कर रहा ?”

“हां मां, वही तो मैं तो दिनभर में चार-पांच बार पेशाब करने जाता हुं।”

इस पर मां ने मेरे लंड को छोड कर, हल्के-से मेरे गाल पर एक झापड लगाई और बोली,
“उल्लु का उल्लु ही रह गया, क्या तु ?”

फिर बोली
“ठहर जा, अभी तुझे दिखाती हुं, माल कैसे निकल जाता है ?”

फिर वो अपने हाथों को तेजी से मेरे लंड पर चलाने लगी। मारे गुद-गुदी और सनसनी के मेरा तो बुरा हाल हो रखा था। समझ में नही आ रहा था क्या करुं। दिल कर रहा था की हाथ को आगे बढा कर मां की दोनो चुचियों को कस के पकड लुं, और खूब जोर-जोर से दबाउं। पर सोच रहा था कि कहीं बुरा ना मान जाये। इस चक्कर में मैने कराहते हुए सहारा लेने के लिये, सामने बैठी मां के कंधे पर अपने दोनो हाथ रख दिये। वो उस पर तो कुछ नही बोली, पर अपनी नजरे उपर कर के मेरी ओर देख कर मुस्कुराते हुए बोली,
“क्यों मजा आ रहा है की, नही,,,?”

“हाये मां, मजे की तो बस पुछो मत। बहुत मजा आ रहा है।”

मैं बोला। इस पर मां ने अपना हाथ और तेजी से चलाना शुरु कर दिया और बोली,
“साले, हरामी कहीं के !!! मैं जब नहाती हुं, तब घुर-घुर के मुझे देखता रहता है। मैं जब सो रही थी, तो मेरे चुंचे दबा रहा था, और अभी मजे से मुठ मरवा रहा है। कमीने, तेरे को शरम नही आती ?”

मेरा तो होश ही उड गया। ये मां क्या बोल रही थी। पर मैने देखा की उसका एक हाथ अब भी पहले की तरह मेरे लंड को सहलाये जा रहा था। तभी मां, मेरे चेहरे के उडे हुए रंग को देख कर हसने लगी, और हसते हुए मेरे गाल पर एक थप्पड लगा दिया। मैने कभी भी इस से पहले मां को, ना तो ऐसे बोलते सुना था, ना ही इस तरह से बर्ताव करते हुए देखा था। इसलिये मुझे बडा आश्चर्य हो रहा था।

पर उसके हसते हुए थप्पड लगाने पर तो मुझे, और भी ज्यादा आश्चर्य हुआ की, आखिर ये चाहती क्या है। और मैने बोला की,
“माफ कर दो मां, अगर कोई गलती हो गई हो तो।”

इस पर मां ने मेरे गालों को हल्के सहलाते हुए कहा की,
“गलती तो तु कर बैठा है, बेटे। अब केवल गलती की सजा मिलेगी तुझे।”

मैने कहा,
“क्या गलती हो गई मेरे से, मां ?”

“सबसे बडी गलती तो ये है कि, तु खाली घुर-घुर के देखता है बस, करता-धरता तो कुछ है नही। खाली घुर-घुर के कितने दिन देखता रहेगा ?’

“क्या करुं मां ? मेरी तो कुछ समझ में नही आ रहा।’

“साले, बेवकूफ की औलाद, अरे करने के लिये इतना कुछ है, और तुझे समझ में ही नही आ रहा है।”

“क्या मां, बताओ ना ?”

“देख, अभी जैसे कि तेरा मन कर रहा है की, तु मेरे अनारो से खेले, उन्हे दबाये, मगर तु वो काम ना करके केवल मुझे घुरे जा रहा है। बोल तेरा मन कर रहा है, की नही, बोलना ?”

“हाये मां, मन तो मेरा बहुत कर रहा है।’

“तो फिर दबा ना। मैं जैसे तेरे औजार से खेल रही हुं, वैसे ही तु मेरे सामान से खेल। दबा, बेटा दबा।”

बस फिर क्या था मेरी तो बांछे खिल गई। मैने दोनो हथेलियों में दोनो चुंचो को थाम लिया, और हल्के-हल्के उन्हे दबाने लगा।, मां बोली,
“शाबाश,,,!!!! ऐसे ही दबा ले। जीतना दबाने का मन करे उतना दबा ले, कर ले मजे।”

फिर मैं पुरे जोश के साथ, हल्के हाथों से उसकी चुचियों को दबाने लगा। ऐसी मस्त-मस्त चुचियां पहली बार किसी ऐसे के हाथ लग जाये, जीसने पहले किसी चुंची को दबाना तो दूर, छुआ तक ना हो तो बंदा तो जन्नत में पहुंच ही जायेगा ना। मेरा भी वही हाल था, मैने हल्के हाथों से संभल-संभल के चुचियों को दबाये जा रहा था। उधर मां के हाथ तेजी से मेरे लंड पर चल रहे थे। तभी मां ने, जो अब तक काफी उत्तेजित हो चुकी थी, मेरे चेहरे की ओर देखते हुए कहा,
“क्यों, मजा आ रहा है ना। जोर से दबा मेरी चुचियों को बेटा, तभी पुरा मजा मिलेगा। मसलता जा,,,,देख अभी तेरा माल मैं कैसे निकालती हुं।”

मैने जोर से चुचियों को दबाना शुरु कर दिया था, मेरा मन कर रहा था की मैं मां का ब्लाउस खोल के चुचियों को नंगा करके उनको देखते हुए दबाउं। इसलिये मैने मां से पुछा,
“हाये मां, तेरा ब्लाउस खोल दुं ?”

इस पर वो मुस्कुराते हुए बोली,
“नही, अभी रहने दे। मैं जानती हुं की तेरा बहुत मन कर रहा होगा की तु मेरी नंगी चुचियों को देखे। मगर, अभी रहने दे।”

मैं बोला,
“ठीक है मां, पर मुझे लग रहा है की मेरे औजार से खुछ निकलने वाला है।”

इस पर मां बोली,
“कोई बात नही बेटा निकलने दे, तुझे मजा आ रहा है ना ?”

“हां मां, मजा तो बहुत आ रहा है।”

“अभी क्या मजा आया है बेटे,,,? अभी तो और आयेगा, अभी तेरा माल निकाल ले फिर देख, मैं तुझे कैसे जन्नत की सैर कराती हुं,,,!!”

“हाये मां, ऐसा लगता है, जैसे मेरे में से कुछ निकलने वाला है।”

“हाय, निकल जायेगा।”

“तो निकलने दे, निकल जाने दे अपने माल को।”,
कह कर मां ने अपना हाथ और ज्यादा तेजी के साथ चलाना शुरु कर दिया।

मेरा पानी अब बस निकलने वाला ही था। मैने भी अपना हाथ अब तेजी के साथ मां के अनारो पर चलाना शुरु कर दिया था। मेरा दिल कर रह था उन प्यारी-प्यारी चुचियों को अपने मुंह में भर के चुसुं। लेकिन वो अभी संभव नही था। मुझे केवल चुचियों को दबा-दबा के ही संतोष करना था। ऐसा लग रहा था, जैसे कि मैं अभी सातवें आसमान पर उड रहा था। मैं भी खूब जोर-जोर सिसयाते हुए बोलने लगा,
“ओह मां, हां मां, और जोर से मसलो, और जोर से मुठ मारो, निकाल दो मेरा सारा पानी।”

पर तभी मुझे ऐसा लगा, जैसे कि मां ने लंड पर अपनी पकड ढीली कर दी है। लंड को छोड कर, मेरे अंडो को अपने हाथ से पकड के सहलाते हुए मां बोली,
“अब तुझे एक नया मजा चखाती हुं, ठहर जा।”

और फिर धीरे-धीरे मेरे लंड पर झुकने लगी। लंड को एक हाथ से पकडे हुए, वो पुरी तरह से मेरे लंड पर झुक गई, और अपने होंठो को खोल कर, मेरे लंड को अपने मुंह में भर लिया। मेरे मुंह से एक आह निकल गई। मुझे विश्वास नही हो रहा था की वो ये क्या कर रही है। मैं बोला,
“ओह मां, ये क्या कर रही हो ? हाय छोडना, बहुत गुद-गुदी हो रही है।”

मगर वो बोली,
“तो फिर मजे ले इस गुद-गुदी के। करने दे, तुझे अच्छा लगेगा।”

“हाये मां, क्या इसको मुंह में भी लिया जाता,,,,,,,,?”

“हां, मुंह में भी लिया जाता है, और दुसरी जगहो पर भी। अभी तु मुंह में डालने का मजा लुट।”,
कह कर तेजी के साथ मेरे लंड को चुसने लगी।

मेरी तो कुछ समझ में नही आ रहा था। गुद-गुदी और सनसनी के कारण मैं मजे के सातवें आसमान पर झुल रहा था। मां ने पहले मेरे लंड के सुपाडे को अपने मुंह में भरा और धीरे-धीरे चुसने लगी, और मेरी ओर बडे सेक्षी अंदाज में अपनी नजरों को उठा के बोली,
“कैसा लाल-लाल सुपाडा है रे, तेरा ?! एकदम पहाडी आलु के जैसा। लगता है अभी फट जायेगा। इतना लाल-लाल सुपाडा कुंवारे लडको का ही होता है।”

फिर वो और कस-कस के मेरे सुपाडे को अपने होंठो में भर-भर के चुसने लगी। नदी के किनारे, पेड की छांव में, मुझे ऐसा मजा मिल रहा था, जीसकी मैने आज-तक कल्पना तक नही की थी। मां, अब मेरे आधे-से अधिक लौडे को अपने मुंह में भर चुकी थी, और अपने होंठो को कस के मेरे लंड के चारो तरफ से दबाये हुए, धीरे-धीरे उपर सुपाडे तक लाती थी। फिर उसी तरह से सरकते हुए नीचे की तरफ ले जाती थी। उसको शायद इस बात का अच्छी तरह से एहसास था की, ये मेरा किसी औरत के साथ पहला संबंध है, और मैने आज तक किसी औरत के हाथो का स्पर्श अपने लंड पर नही महसुस किया है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, वो मेरे लंड को बीच-बीच में ढीला भी छोड देती थी, और मेरे अंडो को दबाने लगती थी।

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