कपडे धोने का काम, मम्मी के साथ part 2

पेटिकोट के नीचे गीरते ही, उसके साथ ही मां भी, हाये करते हुए तेजी के साथ नीचे बैठ गई। मैं आंखे फाड-फाड के देखते हुए, गुंगे की तरह वहीं पर खडा रह गया। मां नीचे बैठ कर अपने पेटिकोट को फिर से समेटती हुई बोली,
“ध्यान ही नही रहा। मैं, तुझे कुछ बोलना चाहती थी और ये पेटिकोट दांतो से छुट गया।”

मैं कुछ नही बोला। मां फिर से खडी हो गई और अपने ब्लाउस को पहनने लगी। फिर उसने अपने पेटिकोट को नीचे किया और बांध लिया। फिर साडी पहन कर वो वहीं बैठ के अपने भीगे पेटिकोट को साफ कर के तैयार हो गई। फिर हम दोनो खाना खाने लगे। खाना खाने के बाद हम वहीं पेड की छांव में बैठ कर आराम करने लगे। जगह सुम-सान थी। ठंडी हवा बह रही थी। मैं पेड के नीचे लेटे हुए, मां की तरफ घुमा तो वो भी मेरी तरफ घुमी। इस वक्त उसके चेहरे पर एक हलकी-सी मुस्कुराहट पसरी हुई थी। मैने पुछा,
“मां, क्यों हस रही हो ?”

तो वो बोली,
“मैं कहां हस रही हुं ?”

“झुठ मत बोलो, तुम मुस्कुरा रही हो।”

“क्या करुं ? अब हंसने पर भी कोइ रोक है, क्या ?”

“नही, मैं तो ऐसे ही पुछा रहा था। नही बताना है तो मत बताओ।”

“अरे, इतनी अच्छी ठंडी हवा बह रही है, चेहरे पर तो मुस्कान आयेगी ही।”

“हां, आज गरम ईस्त्री (वुमन) की सारी गरमी जो निकल जायेगी।”

“क्या मतलब, ईस्त्री (आयरन) की गरमी कैसे निकल जायेगी ? यहां पर तो कहीं ईस्त्री नही है।”

“अरे मां, तुम भी तो ईस्त्री (वुमन) हो, मेरा मतलब ईस्त्री माने औरत से था।”

“चल हट बदमाश, बडा शैतान हो गया है। मुझे क्या पता था की, तु ईस्त्री माने औरत की बात कर रहा है।”

“चलो, अब पता चल गया ना।”

“हां, चल गया। पर सच में यहां पेड की छांव में कितना अच्छा लग रहा है। ठंडी-ठंडी हवा चल रही है, और आज तो मैने पुरी हवा खायी है।”,
मां बोली।

“पुरी हवा खायी है, वो कैसे ?”

“मैं पुरी नन्गी जो हो गई थी।”,
फिर बोली,
“हाये, तुझे मुझे ऐसे नही देखना चाहिए था ?”

“क्यों नही देखना चाहिए था ?”

“अरे बेवकूफ, इतना भी नही समजता। एक मां को, उसके बेटे के सामने नंगा नही होना चाहिए था।”

“कहां नंगी हुई थी, तुम ? बस एक सेकन्ड के लिये तो तुम्हारा पेटिकोट नीचे गीर गया था।”
(हालांकि, वही एक सेकन्ड मुझे एक घन्टे के बराबर लग रहा था।)

“हां, फिर भी मुझे नंगा नही होना चाहिए था। कोई जानेगा तो क्या कहेगा कि, मैं अपने बेटे के सामने नन्गी हो गई थी।”

“कौन जानेगा ?, यहां पर तो कोई था भी नही। तु बेकार में क्यों परेशान हो रही है ?”

“अरे नही, फिर भी कोई जान गया तो।”,
फिर कुछ सोचती हुई बोली,
“अगर कोई नही जानेगा तो, क्या तु मुझे नंगा देखेगा ?”

मैं और मां दोनो एक दुसरे के आमने-सामने, एक सुखी चादर पर, सुम-सान जगह पर, पेड के नीचे एक-दुसरे की ओर मुंह कर के लेटे हुए थे। और मां की साडी उसके छाती पर से ढलक गई थी। मां के मुंह से ये बात सुन के मैं खामोश रह गया और मेरी सांसे तेज चलने लगी।

मां ने मेरी ओर देखाते हुए पुछा,
“क्या हुआ ?’

मैने कोई जवाब नही दिया, और हलके से मुस्कुराते हुए उसकी छातियों की तरफ देखने लगा, जो उसकी तेज चलती सांसो के साथ उपर नीचे हो रही थी। वो मेरी तरफ देखते हुए बोली,

“क्या हुआ ?, मेरी बात का जवाब दे ना। अगर कोई जानेगा नही तो क्या तु मुझे नंगा देख लेगा ?”

इस पर मेरे मुंह से कुछ नही निकला, और मैने अपना सिर नीचे कर लिया. मां ने मेरी ठुड्डी पकड के उपर उठाते हुए, मेरी आंखो में झांखते हुए पुछा,
“क्या हुआ रे ?, बोलना, क्या तु मुझे नंगा देख लेगा, जैसे तुने आज देखा है ?”

मैने कहा,
“हाय मां, मैं क्या बोलुं ?”

मेरा तो गला सुख रहा था। मां ने मेरे हाथ को अपने हाथों में ले लिया और कहा,
“इसका मतलब तु मुझे नंगा नही देख सकता, है ना ?”

मेरे मुंह से निकल गया,
“हाये मां, छोडो ना।”,
मैं हकलाते हुए बोला,
“नही मां, ऐसा नही है।”

“तो फिर क्या है ? तु अपनी मां को नंगा देख लेगा क्या ?”

“हाये, मैं क्या कर सकता था ?, वो तो तुम्हरा पेटिकोट नीचे गीर गया, तब मुझे नंगा दिख गया। नही तो मैं कैसे देख पाता ?”

“वो तो मैं समझ गई, पर उस वक्त तुझे देख के मुझे ऐसा लगा, जैसे की तु मुझे घूर रहा है। ,,,,,,,,,,,,इसलिये पुछा।”

“हाये मां, ऐसा नही है। मैने तुम्हे बताया ना। तुम्हे बस ऐसा लगा होगा।”

“इसका मतलब, तुझे अच्छा नही लगा था ना।”

“हाये मां, छोडो.”,
मैं हाथ छुडाते हुए, अपने चेहरे को छुपाते हुए बोला।

मां ने मेरा हाथ नही छोडा और बोली,
“सच-सच बोल, शरमाता क्यों है ?”

मेरे मुंह से निकल गया,
“हां, अच्छा लगा था।”

इस पर मां ने मेरे हाथ को पकडा के, सीधे अपनी छाती पर रख दिया, और बोली,
“फिर से देखेगा मां को नंगा, बोल देखेगा ?”

मेरे मुंह से आवाज नही निकल पा रही थी। मैं बडी मुश्किल से अपने हाथों को उसकी नुकिली, गुदाज छातियों पर स्थिर रख पा रहा था। ऐसे में, मैं भला क्या जवाब देता। मेरे मुंह से एक कराहने की सी आवाज नीकली। मां ने मेरी ठुड्डी पकड कर, फिर से मेरे मुंह को उपर उठाया और बोली,
“क्या हुआ ? बोलना, शरमाता क्यों है ? जो बोलना है बोल।”

मैं कुछ नही बोला। थोडी देर तक उसकी चुचियों पर, ब्लाउस के उपर से ही हल्का-सा हाथ फेरा। फिर मैने हाथ खींच लिया। मां कुछ नही बोली, गौर से मुझे देखती रही। फिर पता नही, क्या सोच कर वो बोली,
“ठीक है, मैं सोती हुं यहीं पर। बडी अच्छी हवा चल रही है, तु कपडों को देखते रहेना, और जो सुख जाये उन्हे उठा लेना। ठीक है ?”

और फिर, मुंह घुमा कर, एक तरफ सो गई। मैं भी चुप-चाप वहीं आंखे खोले लेटा रहा। मां की चुचियां धीरे-धीरे उपर-नीचे हो रही थी। उसने अपना एक हाथ मोड कर, अपनी आंखो पर रखा हुआ था, और दुसरा हाथ अपनी बगल में रख कर सो रही थी। मैं चुप-चाप उसे सोता हुआ देखता रहा। थोडी देर में उसकी उठती-गीरती चुचियों का जादु मेरे उपर चल गया, और मेरा लंड खडा होने लगा। मेरा दिल कर रह था कि, काश मैं फिर से उन चुचियों को एक बार छु लुं। मैने अपने आप को गालियां भी नीकाली। क्या उल्लु का पठ्ठा हुं मैं भी। जो चीज आराम से छुने को मिल रही थी, तो उसे छुने की बजाये मैं हाथ हटा लिया। पर अब क्या हो सकता था। मैं चुप-चाप वैसे ही बैठा रहा। कुछ सोच भी नही पा रहा था। फिर मैने सोचा कि, जब उस वक्त मां ने खुद मेरा हाथ अपनी चुचियों पर रख दिया था, तो फिर अगर मैं खुद अपने मन से रखुं तो शायद डांटेगी नही, और फिर अगर डांटेगी तो बोल दुन्गा, तुम्ही ने तो मेरा हाथ उस वक्त पकड कर रखा था, तो अब मैं अपने आप से रख दिया। सोचा, शायद तुम बुरा नही मानोगी।

यही सब सोच कर मैने अपने हाथों को धीरे-से उसकी चुचियों पर ले जा के रख दिया, और हल्के-हल्के सहलाने लगा। मुझे गजब का मजा आ रहा था। मैने हल्के-से उसकी साडी को, पुरी तरह से उसके ब्लाउस पर से हटा दिया और फिर उसकी चुचियों को दबाया। ओओह, इतना गजब का मजा आया कि, बता नही सकता। एकदम गुदाज और सख्त चुचियां थी, मां की इस उमर में भी। मेरा तो लंड खडा हो गया, और मैने अपने एक हाथ को चुचियों पर रखे हुए, दुसरे हाथ से अपने लंड को मसलने लगा। जैसे-जैसे मेरी बेताबी बढ रही थी, वैसे-वैसे मेरे हाथ दोनो जगहों पर तेजी के साथ चल रहे थे। मुझे लगता है कि, मैने मां की चुचियों को कुछ ज्यादा ही जोर से दबा दिया था। शायद इसलिये मां की आंख खुल गई। और वो एकदम से हडबडाते उठ गई, और अपने आंचल को संभालते हुए, अपनी चुचियों को ढक लिया, और फिर मेरी तरफ देखती हुइ बोली,
“हाये, क्या कर रहा था तु ? हाय, मेरी तो आंख लग गई थी।”

मेरा एक हाथ अभी भी मेरे लंड पर था, और मेरे चेहरे का रंग उड गया था। मां ने मुझे गौर से एक पल के लिये देखा और सारा मांजरा समझ गई, और फिर अपने चेहरे पर हल्की-सी मुस्कुराहट बिखेरते हुए बोली,
“हाये, देखो तो सही !! क्या सही काम कर रहा था ये लडका। मेरा भी मसल रहा था, और उधर अपना भी मसल रहा था।”

फिर मां उठ कर सीधा खडी हो गई और बोली,
“अभी आती हुं।”,
कह कर मुस्कुराते हुए झाडियों कि तरफ बढ गई। झाडियों के पीछे से आ के, फिर अपने चुतडों को जमीन पर सटाये हुए ही, थोडा आगे सरकते हुए मेरे पास आई। उसके सरक कर आगे आने से उसकी साडी थोडी-सी उपर हो गई, और उसका आंचल उसकी गोद में गीर गया। पर उसको इसकी फिकर नही थी। वो अब एकदम से मेरे नजदीक आ गई थी और उसकी गरम सांसे मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थी।

वो एक पल के लिये ऐसे ही मुझे देखती रही, फिर मेरी ठुड्डी पकड कर मुझे उपर उठाते हुए, हल्के-से मुस्कुराते हुए धीरे से बोली,
“क्यों रे बदमाश, क्या कर रहा था ?, बोलना, क्या बदमाशी कर रहा था, अपनी मां के साथ ?”

फिर मेरे फूले-फूले गाल पकड कर हल्के-से मसल दिये। मेरे मुंह से तो आवाज ही नही नीकल रही थी। फिर उसने हल्के-से अपना एक हाथ मेरी जांघो पर रखा और सहलाते हुए बोली,
“हाये, कैसे खडा कर रख है, मुए ने ?”

फिर सीधा पजामे के उपर से मेरे खडे लंड (जो की मां के जगने से थोडा ढीला हो गया था, पर अब उसके हाथों का स्पर्श पा के फिर से खडा होने लगा था) पर उसने अपना हाथ रख दिया,
“उईइ मां, कैसे खडा कर रखा है ?, क्या कर रहा था रे, हाथ से मसल रहा था, क्या ? हाये बेटा, और मेरी इसको भी मसल रहा था ? तु तो अब लगता है, जवान हो गया है। तभी मैं कहुं कि, जैसे ही मेरा पेटिकोट नीचे गीरा, ये लडका मुझे घुर-घुर के क्यों देख रहा था ? हाये, इस लडके की तो अपनी मां के उपर ही बुरी नजर है।”

“हाये मां, गलती हो गई, माफ कर दो।”

“ओहो, अब बोल रहा है गलती हो गई, पर अगर मैं नही जगती तो, तु तो अपना पानी नीकाल के ही मानता ना ! मेरी छातियों को दबा दबा के !! उमम्म्,,,, बोल, नीकालता की नही, पानी ?”

“हाये मां, गलती हो गई।”

“वाह रे तेरी गलती, कमाल की गलती है। किसी का मसल दो, दबा दो, फिर बोलो की गलती हो गई। अपना मजा कर लो, दुसरे चाहे कैसे भी रहे।”,
कह कर मां ने मेरे लंड को कास् के दबाया, उसके कोमल हाथों का स्पर्श पा के मेरा लंड तो लोहा हो गया था, और गरम भी काफी हो गया था।

“हाये मां छोडो, क्या कर रही हो ?”

मां उसी तरह से मुस्कुराती हुई बोली,
“क्यों प्यारे, तुने मेरा दबाया तब, तो मैने नही बोला कि छोडो। अब क्यों बोल रहा है, तु ?”

मैने कहा,
“हाये, मां तु दबायेगी तो सच में मेरा पानी निकल जायेगा। हाये, छोडो ना मां।”

“क्यों, पानी निकालने के लिये ही तो तु दबा रहा था ना मेरी छातियां ? मैं अपने हाथ से निकाल देती हुं, तेरे गन्ने से तेरा रस। चल, जरा अपना गन्ना तो दिखा।”

“हाये मां, छोडो, मुझे शरम आती है।”

“अच्छा, अभी तो बडी शरम आ रही है, और हर रोज जो लुन्गी और पजामा हटा-हटा के, जब सफाई करता है तब,,,?, तब क्या मुझे दिखाई नही देता क्या ?, अभी बडी एक्टींग कर रहा है।”

“हाय, नही मां, तब की बात तो और है, फिर मुझे थोडे ही पता होता था की तुम देख रही हो।”

ओह, ओह, मेरे भोले राजा, बडा भोला बन रहा है, चल दिखा ना, देखुं कितना बडा और मोटा है, तेरा गन्ना ?

मैं कुछ बोल नही पा रहा था। मेरे मुंह से शब्द नही निकल पा रहे थे। और लग रहा था जैसे, मेरा पानी अब निकला की तब निकला। इस बीच मां ने मेरे पजामे का नाडा खोल दिया, और अंदर हाथ डाल के मेरे लंड को सीधा पकड लिया। मेरा लंड जो की केवल उसके छु ने के कारण से फुफकारने लगा था, अब उसके पकडने पर अपनी पुरी औकात पर आ गया और किसी मोटे लोहे की रोड की तरह एकदम तन कर उपर की तरफ मुंह उठाये खडा था। मां मेरे लंड को अपने हाथों में पकडने की पुरी कोशिश कर रही थी, पर मेरे लंड की मोटाई के कारण से वो उसे अपनी मुठ्ठी में, अच्छी तरह से कैद नही कर पा रही थी। उसने मेरे पजामे को वहीं खुले में, पेड के नीचे, मेरे लंड पर से हटा दिया।

“हाये मां, छोडो, कोई देख लेगा। ऐसे कपडे मत हटाओ।”

मगर मां शायद पुरे जोश में आ चुकी थी।

“चल, कोई नही देखता। फिर सामने बैठी हुं, किसी को नजर भी नही आयेगा। देखुं तो सही, मेरे बेटे का गन्ना आखिर, है कितना बडा ?”

और मेरा लंड देखते ही, आश्चर्य से उसका मुंह खुला का खुला रह गया। एकदम से चौंकती हुई बोली,
“हाये दैय्या,,,!! ये क्या ,,,,??? इतना मोटा, और इतना लम्बा ! ये कैसे हो गया रे, तेरे बाप का तो बित्ते भर का भी नही है, और यहां तु बेलन के जैसा ले के घुम रहा है।”

“ओह मां, मेरी इसमे क्या गलती है। ये तो शुरु में पहले छोटा-सा था, पर अब अचानक इतना बडा हो गया है, तो मैं क्या करुं ?”

“गलती तो तेरी ही है, जो तुने इतना बडा जुगाड होते हुए भी, अभी तक मुझे पता नही चलने दिया। वैसे जब मैने देखा था नहाते वक्त, तब तो इतना बडा नही दिख रहा था रे,,,,?”

“हाये मां, वो,,, वो,,,,”
मैं हकलाते हुए बोला,
“वो इसलिये, क्योंकि उस समय ये उतना खडा नही रहा होगा। अभी ये पुरा खडा हो गया है।”

“ओह, ओह, तो अभी क्यों खडा कर लिया इतना बडा ?, कैसे खडा हो गया अभी तेरा ?”

अब मैं क्या बोलता कि कैसे खडा हो गया। ये तो बोल नही सकता था कि, मां तेरे कारण खडा हो गया है मेरा। मैने सकपकाते हुए कहा,
“अरे, वो ऐसे ही खडा हो गया है। तुम छोडो, अभी ठीक हो जायेगा।”

“ऐसे कैसे खडा हो जाता है तेरा ?”,
मां ने पुछा, और मेरी आंखो में देख कर, अपने रसीले होठों का एक कोना दबा के मुसकाने लगी ।

“अरे, तुमने पकड रखा है ना, इसलिये खडा हो गया है मेरा। क्या करुं मैं ?, हाये छोड दो ना।”

मैं किसी भी तरह से, मां का हाथ अपने लंड पर से हटा देना चाहता था। मुझे ऐसा लग रहा था कि, मां के कोमल हाथों का स्पर्श पा के कहीं मेरा पानी निकल ना जाये। फिर मां ने केवल पकडा तो हुआ नही था। वो धीरे-धीरे मेरे लंड को सहला भी, और बार-बार अपने अंगुठे से मेरे चिकने सुपाडे को छु भी रही थी।

“अच्छा, अब सारा दोष मेरा हो गया, और खुद जो इतनी देर से मेरी छातियां पकड के मसल रहा था और दबा रहा था, उसका कुछ नही ?”

“चल मान लिया गलती हो गई, पर सजा तो इसकी तुझे देनी पडेगी, मेरा तुने मसला है, मैं भी तेरा मसल देती हुं।”,
कह कर मां अपने हाथो को थोडा तेज चलाने लगी और मेरे लंड का मुठ मारते हुए, मेरे लंड की मुंडी को अंगुठे से थोडी तेजी के साथ घीसने लगी। मेरी हालत एकदम खराब हो रही थी। गुदगुदाहत और सनसनी के मारे मेरे मुंह से कोई आवाज नही निकल पा रही थी। ऐसा लग रहा था, जैसे कि, मेरा पानी अब निकला की तब निकला। पर मां को मैं रोक भी नही पा रहा था। मैने सिसयाते हुए कहा,
“ओह मां, हाये निकल जायेगा, मेरा निकल जायेगा।”

इस पर मां और जोर से हाथ चलाते हुए अपनी नजर उपर करके, मेरी तरफ देखते हुए बोली,
“क्या निकल जायेगा ?”

“ओह, ओह, छोडोना, तुम जानती हो, क्या निकल जायेगा,,,? क्यों परेशान कर रही हो ?”

“मैं कहां परेशान कर रही हुं ? तु खुद परेशान हो रहा है।”

“क्यों, मैं क्यों भला खुद को परेशान करुन्गा ? तुम तो खुद ही जबरदस्ती, पता नही क्यों मेरा मसले जा रही हो ?”

“अच्छा, जरा ये तो बता, शुरुआत किसने कि थी मसलने की ?”,
कह कर मां मुस्कुराने लगी।

मुझे तो जैसे सांप सुंघ गया था। मैं भला क्या जवाब देता। कुछ समझ में ही नही आ रहा था कि क्या करुं, क्या ना करुं ? उपर से मजा इतना आ रहा था कि जान निकली जा रही थी। तभी मां ने अचानक मेरा लंड छोड दिया और बोली,
“अभी आती हुं।”

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