दामाद हो तो ऐसा

मै सुजाता . मेरी शादी जब मै पन्द्रह साल कि थी तभी हुई. जब मै २० साल कि हुई तब मै २ बच्चो कि मा बनी थी. मेरा पती एक छोटी कंपनीमे क्लेर्क थे. बाद मे धीरे-धीरे उनकी प्रमोशन हुई और आज वो म्यनेजर बने है. आज मै मेरी उमर के ३५ साल मे एक दामाद कि सांस बनी हु. मेरी बेटी बडी है और बेटा छोटा है. बेटी के शादी को १ साल हुआ है और वो पेटसे है. शादी के बाद वो ३-४ बारहि मायके आई थी. वो और उसका पती मेरे गावसे काफी दूर रहते है. इसीकारण उनका ज्यादा आना-जाना नही हूआ. लेकिन हर एक बार उसने संभोग के दरमियान तकलीफ कि शिकायत मुझसे की. आमतौर लडकीया शुरू के कुछ दिन शिकायत करते है इसीलिये मैने उसपार ज्यादा ध्यान नाही दिया थामेरी बेटी मुझसे कुछ केहना चाहती थी पर मै हमेशा उसकी बात को टाल जाती थी. उसकी प्रोब्लेम क्या थी ये मैने जानना चाहिये था पर मुझसे गलती हुई. जब उसे सातवा महिना शुरू हो गया तभी मेरे पती कि फिरसे ट्रान्स्फर हुई और हमने घर शिफ्ट न करते हुए हमारे दामादजी को कुछ दिन के लिये बुला लिया. दामादजी को पत्नी से दूर रहकर काफी दिन हुए थे इसी लिये उन्होने भी ख़ुशी-ख़ुशी हमारा न्योता स्वीकार किया. पुरे रात का सफर तय करके दामाद जब ससुराल आये तो उनके स्वागत मे मैने कोई कमी नही रखी थी. मेरा बेटा कोलेज के लिये दुसरे गाव रहता है इसीकारण मुझे बहोत भागदौड करनी पडी पर बेटी के लिये किसी मा को ये ज्यादा नही लगता. . दामाद आनेके बाद तो जैसे जिंदगीहि बदल गयी थी. सुबह उनकी चाई फिर नाश्ता, सारा दिन उनकी तबियत खुश रखना मेरा कार्य बन गया था.
एक दिन ऐसेही सुबह दामाद- उनका नाम रवि है, रवीको चाई देने के बाद वो नहाने गया. उसने कहा वो आज बाथरूम कि खुलेमे नहायेंगे. मैने कहा ठीक है. मेरे पती और बेटाभी अक्सर खुले मे ही नहाते है. और मैने पानी खुले मे रखा. रवि नहाने लगा और मै किचेन चली गयी. किचेन से सामने नाहता हुआ रवि नजर आ रहा था. बदन पे सिर्फ कच्छी थी. शरीर बिल्कुल भरापुरा. वो नीचे बैठके नहा रहा था. उसका उपरका नंगा बदन देखके मेरे तन-मन मे कुछ-कुछ होणे लगा था. मै अपनेही मन को समझा रही थी. जो मेरे तन-मन मे हो रहा है वो गलत है. मेरा दमाद याने कि मेरे बेटी का पती. सब गालात था फिर भी बार बार नैन उसकी तरफ जा रहे थे. ध्यान उधरही जा रहा था. वो बदन पे साबुन मल रहा था. चेहरा – छाती -पेट -पीठ धीरे-धीरे उसने कच्चे मे हात डाला और रगड के साबुन लगा रहा था. पानी कि बालटी बीचमे होनेसे उसकी कच्छी ढंग से नही दिखती ठी पर वो मजा ले रहा है ये समझ मे आ रहा था. आखिर उसने पुरी बाल्टी अपने उपर ले ली और वो खडा हुआ. अनायास हि मेरी नजर उसके कछेपर गयी तो सामनेवाला पोर्शन बहोत हि आगे आया था- बहोत बडा दिख रहा था। उसने तोउलियेसे बदन पोछा और तोउलिया लंपटके कच्छा उतारने लगा. मन का विरोध ना मानते मै भी सब देखने लगी. उसने एक पैर निकाली और जैसेही दुसरे पैर से निकालने लगा अचानक टॉवेल उसके हाथ से छूटा और बाजूवाले बबुलके पेडमे अटक गया. मेरी नजर उसके हतियार पे गयी तो मै सुन्न हो गयी. इतना बडा हतियार मैने पहलीबार देखा था. वो हतियार मेरे जीवन मे आये सभी मर्दोमे सबसे बडा था. क्या बताऊ कितना प्यारा-सुंदर -फिर भी इतना बडा शायदहि होता है.

मेरी शादी के समय,जैसा मैंने बताया मेरी उम्र सिर्फ १५ साल थी। स्त्री-पुरुष सम्बधो के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं थी। किंतु स्कूल में बाकी लडकिया बाते करती थी वो सुनने में आती थी। दसवी की परीक्षा होते-होते मेरी शादी हो गयी। सेक्स के मामले में मेरे पती शुरू-शुरू में काफी उत्तेजीत होते थे। रोज रातको हमारा सम्भोग होता था। मेरे दोनों प्रेग्नन्सी के दरमियान भी हमारा सेक्स रेग्युलर था। मेरे शादी के बाद मेरा पतीके अलावा किसी और से संबध आने का चांस बिलकुल नहीं था। वैसे भी शादी से पहेले भी कम उम्र की वजह से ये संभाव्यता कभी नहीं थी।
मेरी दूसरी डिलिवेरी के बाद मेरे पति की पहली प्रमोशन हो गयी थी इसीलिए मै रेस्ट के लिए मायके में थी। उसी समय मेरा स्कूल का साथी, हमारे पंडितजी का बेटा कोलेज को छुट्टी लगनेसे गाव आया था। स्कूल में था तब वो साथवाले लड़कोके मुकाबले बहोत छोटा लगता था इसीलिए मै उसे छोटू नामसे बुलाती थी। जब मैंने उसे छोटू कहकर बार-बार पुकारा तो वो चिढने लगा। मुझसे कहने लगा, सुजाता मै अब छोटा नहीं हु, बड़ा हो गया हु। मैंने कहा , कैसे साबित करोगे की तुम अब छोटे नहीं हो। थोड़ी देर सोचने के बाद वो बोला , वक्त आनेपर मै दिखा दूंगा की मै कितना बड़ा हुआ हु। इतना कहके वो चला गया। कुछ दिन बाद मेरे बेटे को बुखार आया था, उस समय मुझे छोटू ने बहोत मदद की। चार दिन बाद जब सब ठीक ठाक हुआ तबतक मै छोटू के काफी करीब आ चुकी थी। हर दिन तीन-चार बार हम लोग मिलते थे।
एक एक दिन हमें एक-दुसरे के करीब लानेवाला दिन होता था। ऐसेमें एक दिन हम दोनों बाहर घुमने गए थे के अचानक बारिश आई। हम दोनों भीग गए थे। मेरा पूरा बदन काप रहा था। छोटू मुझे घुर के देख रहा था। उसकी नजर में वासना साफ़ दिख रही थी। बार-बार वो मेरे छाती को देखता था। हवा सर्द थी। मुझे ठण्ड लग रही थी। वो मेरे करीब आया और अपने आगोश में मुझे लिया। शर्म तो आ रही थी पर समय ऐसा था की मै ना चाहते हुए भी उसके करीब जानेपर मजबूर हो रही थी। धीरे धीरे सब सीमाए टूटने लगी थी। उसका हात मेरे बदन पे फिरने लगा और बारिश में भी पिघलने लगी। जैसे ही उसने मेरे नितम्बो पर अपना हात घुमाना शुरू किया मै अन्दर ही अन्दर गरम होने लगी।पुरुष का स्पर्श मेरे बदन पे काफी दिनों बाद हो रहा था। उसका हात अब मेरा ब्लाउज पे था। कब मेरा ब्लाउज मेरे बदन से अलग हुआ इसका पता ही नहीं चला। मेरी साड़ी और बाकी कपडे सब मेरे बदन से अलग हुए थे। मै पूरी तरह नग्न उसके सामने खड़ी थी और वो मुझे आँखे फाड़ के देख रहा था। उसे खुदपर कंट्रोल करना मुश्किल हुआ था। उसने भी अपने सारे कपडे उतारे और वो नंगा हुआ। पानीसे उसका बदन चमक रहा था। उसका तना हुआ लंड मुझे सलामी दे रहा था। जैसेही उसने अपने कपडे उतारे मुझे शर्म आने लगी।छोटू मेरे करीब आके मेरे वक्ष को सहलाने लगा। निचे झुकके वो मेरे वक्ष को मुह में लेकर चूसने लगा साथ-साथ वो मेरे नितम्बोको सहलाने लगा। छोटू काफी अनुभवी खिलाडी जैसे बर्ताव कर रहा था। कभी मेरे ओंठ तो कभी वक्ष मुह में लेके चूसता था। उसका काम एक रिदम में चल रहा था के अचानक वो मेरे नाभी से होकर मेरे योनि पे अपना मुह रगड़ने लगा। मै एकदम सिहरसी गयी। मेरा मन अपना आपा खो रहा था। धीरे-धीरे मई उसकी बाहों में समाने लगी थी। मेरी योनि को काफी समयसे वो चूस रहा था। मै आनंदलोक में विहार कर रही थी की वो हाथ में अपना लंड लेके घुटनेपे बैठा और मेरे पैर अलग करके उसने मेरे योनिमें अपना लंड डालना प्रारंभ किया। काफी अरसे के बाद मेरी योनिमे लंड का प्रवेश हो रहा था। थोड़ी तकलीफ जरुर हुई पर छोटू बड़े आरामसे चोद रहा था। उसका लंड मेरे पति के मुकाबले काफी जवान था। उसमे गर्मी ज्यादा थी। तनाव ज्यादा था। साइज भी बड़ा था। दो बच्चोंको को जन्म दे चुकी मेरी योनि काफी दिनोसे प्यासी थी। छोटू का चोदना मुझे बहोत अच्छा लगा। मै भी उसे नीचेसे साथ देने लगी। मेरी योनि के अन्दर सभी तरफ टच करता हुआ मुझे आनंद मिल रहा था। कितना समय वो मुझे चोद रहा था इसका पता ही नहीं चला। मेरे जीवनमें चुदाई का ऐसा सुख मुझे शायद पहलीबार मिल रहा था। चुदवाते-चुदवाते मै थक जा रही थी की अचानक छोटू का स्पीड बढ़ा। वो जोर-जोर से चोदने लगा। करीब ५/७ मिनट जोर से चोदने के बाद वो निहाल हुआ। उसका पानी छुट गया। वो मेरे बदन पे गिरकर अपनी सांस कंट्रोल करने लगा।
मेरे जीवन में पति के आलावा पहली बार किसी मर्द का प्रवेश हुआ था। मै बाद में सोचने लगी की क्या ये मैंने पाप किया? ये गलत था ? किसे पता। लेकिन उस समय तो मैंने काफी एन्जॉय किया ये सही।

एक पल में मै मेरी जिंदगीका का एक खुशनुमा- सुहाना अतीत का सफ़र तय करके आई। सामने देखा तो रवि- मेरा दामाद तौलिया लपेटके मेरी बेटीके बेडरूम की तरफ जा रहा था। मेरे मनमें उसे थोडा सतानेका आयडिया आया। मै फुर्तीसे कपडे सुखाने की डोरी की तरफ भागी। मैंने रवि की कच्छी और बनियन निकाली। कल धोई थी, अब तक पूरी सुखी थी। मैंने वो बाथरूम में आजके धोनेके कपड़ोमें डाल दी। फिर चुपकेसे दिवारकी छेदसे देखने लगी। बेटी बिस्तरपे बैठी थी और रवि उसके सामने टॉवल खोलके खड़ा था। कमरेका दरवाजा बंद था। बेटी उसके हतियार से खेल रही थी। यह दृश्य मुझे काफी नजदिकिसे दिख रहा था। रवि का इतना बड़ा औजार बेटी अन्दर कैसे लेती थी यही सवाल मेरे मन में बार-बार आ रहा था। उसे तकलीफ तो जरुर हुई होगी। मुझे याद आया जब वो मायके आती थी तब वो मुझे कुछ बतानेकी कोशिश कर रही थी। शायद यही बात वो कहना चाहती थी। रवि उसे मुह में लेने के लिए जिद कर रहा था और वो ना कर रही थी।
बाद में मैंने रवि को बताया की उसके कपडे गिले है और उसे आज अन्दरसे कुछ पहने बिनही सिर्फ लुंगी पहनके दिनभर रहना पड़ेगा तो वो परेशान हो गया। मै खुश थी क्योंकी मुझे आज दिनमें और कई बार मजा मिल सकता था।खानेके बाद मैंने दोनोंको बेडरूम में जाकर आराम करनेको कहा। दोनों रूम में गए और मै गयी मेरे दिवार के छेद को आँख लगाने। दोनोंमें मस्ती शुरू हो गयी थी। रवि बेटी का गाऊन ऊपर करके उसके पेट को देख रहा था। मेरी बेटी बहोत गोरी है। पेट्से होनेसे उसके पेटकी हर एक नस हरे रंगमें साफ़ नजर आ रही थी। रवि का हाथ नीचे आया। वो बेटी के योनिसे खेल रहा था। गर्भावस्था के कारन योनिमुख थोडा था। एक हाथ योनिपर और दुसरे हाथ में खुदका लंड लेके वो बेटीसे बिनती कर रहा था पर वो मान नहीं रही थी। आखिर उसने अपना लंड मुहमें लेने के लिए कहा। मेरी बेटी ने इसकेलिए साफ़ मना किया। रवि बेचारा हाथसे लंडको मलने लगा। उसकी तकलीफ मेरे समझ में आ रही थी। मेरे लिए शायद ये मौका मिल रहा था।
रवि का लंड चूसनेके लिए कहना और बेटीका उससे मुकराना मुझे हमारे फिरसे बीते दिनों की याद दिला रहा था। हम लोग उस समय नागपुरमें थे। मेरे पति ऑफिसर थे। उन्हें बार-बार टूरपे जाना होता था। तब हम शर्माजी के मकानमें किरायेदार थे। शर्माजी ट्यूशन लेते थे और उनकी पत्नी स्टेट बैंक में थी। उनके भी दो बच्चे थे, हमारे बच्चोंके उमरके। बच्चे साथ-साथ खेलते थे और शर्माजीके क्लासमें पढ़ते थे। अच्छी फॅमिली मिलनेसे हम काफी खुश थे। वहीपर मेरा शर्माजीके साथ अफेअर हुआ।

शर्माजी का साथ मिलना मेरे लिए सौभाग्यकी बात थी।उस समय उन्होंने मुझे इतनी मदद की जिसका मुझे आजभी एहसास है। नागपुर हमारे लिए बिलकुल नया था। वहां जब हमलोग आये तब हमारी वहांपे कोई पहचान नहीं थी।ऐसेमे मेरे पतीकी मुलाकात शर्माजिसे हुई। अपने घरमे किरायेपर जगह दी। हमारे बच्चोको अपने बच्चोंके साथ स्कूलमे एडमिशन दिलवाया।हमारे बच्चे भी उनके साथही आते-जाते थे। बच्चोंके स्कूलके पेरेंट्स मिट में मुझे जाना पड़ता था। शुरुमे मै अकेली बससे जाती थी। मगर एक दिन स्कूल में पेरेंट्स मिट ख़तम होनेके बाद उन्होंने मुझसे कहा- भाभीजी दोनोंका मुकाम एक ही है , वैसेभी मै अकेला मोटर-साइकलपे जा रहा हूँ। आप भी आएँगी तो ज्यादा पेट्रोल जानेवाला नहीं है। जब मैंने लोग देखनेकी बात आगेकी तो उन्होंने कहा- जमाना बदल गया है , किसको फुर्सत है जो बाकी लोगोंको देखेगा। और वैसेभी मुझे यहाँ कौन जानता था। रही बात पति की ,तो वोतो टूर पे गए थे। मै उनके साथ गाडीपे पीछे बैठी।रस्तेमे मेरी कोशिश उनका स्पर्श टालनेकी थी। शायद ये बात उनके भी समझ में आई थी। वो थोडा संभलके बैठे। ट्राफिक और गड्ढे अपना काम कर रहे थे। जाने-अनजाने उनके पीठपर मेरी छाती रगड़ जाती थी। शर्माजी रंगमें आ रहे थे।थोडा सा चांस मिलनेपर ब्रेक लगते थे। दो मिनट के बाद मै भी फ्री हो गयी। खुद उनके पीठ पर मेरे बूब्स रगदने लगी।

रास्तेमे शर्माजी मुझपे बहोत मेहरबान थे। मेरे ना-ना बोलनेपरभी उन्होंने मुझे ज्यूस पिलाया। कहने लगे- भाभीजी नागपुर जैसा संत्रेका ज्युसे आपको पुरे भारतमे और कहीं मिलनेवाला नहीं। थोडा खट्टा- थोडा मिठा, एक बार चखोगी तो जिंदगीभर मांगोगी। मगर ये कहते समय वो मंद-मंद क्यों मुस्कुरा रहे थे यह मेरी समझ में तब नहीं आया।
हम वापस घर आये। शर्माजीकी ट्यूशन सिर्फ सुबह ६ से १ ० तक होती थी। इसीलिए वो दिनभर खाली रहते थे। मै भी दोनों बच्चोके स्कूल जानेके बाद खाली रहती थी। उन्होंने मुझे सुझाव दिया क्यों न मै उनके ट्यूशन का कुछ काम करू। मेरा भी टाइमपास हो जायेगा। मैंने भी उचित समझा और उनका काम बटाने लगी। ये सभी हमारे बीच नजदीकीया बढ़ाने में सहायक हुई। ऐसेमें एक दिन मिसेस शर्माजी बहोत खुशीसे नाचते हुई बैंक से घर आई। वो ऑफिसर का प्रमोशन पाने में कामयाब हुई थी। उसी शाम एक छोतीसी पार्टी उन्होंने घर पे दी। उनके ऑफिसके करीब बीस लोग आनेवाले थे। पार्टी अर्रंज करनेमें मैंने बहोत मदद की। रातको करीब दस बजे सभी गेस्ट गए। उसके बाद सब बाकि काम निपटाते हमें ग्यारह बज गए। सभी बच्चे सो गए थे। दोनों बच्चोको एक साथ ऊपर मेरे घर ले जाना मुझे कठिन था इस लिए शर्माजी मेरे साथ आये। बच्चोको बेडपर सुलाने के बाद वो निकल गए। जाते-जाते कह गए- भाभीजी आप की वजह से ये सभी इतना आसान हुआ वर्ना मेरी पत्नी को ये सब मुश्किल था। मैंने हसके हसीमेही इसका स्वीकार किया और उनसे पूछा- भैय्याजी, ऑफिसके लोगोमें एक नीला शर्ट पहना हुआ जो आदमी था वो कौन था। शर्माजी हसके बोले- यानेकी आपके भी समझमें आया। वो मिसेस शर्मा के पुराने और खास दोस्त है। इतना कहके वो चले गए। दुसरे दिन मैंने दोपहरमें फिरसे यही पूछा तब उन्होंने कहा मिसेस शर्मा और वो आदमी- कुमार बचपनके दोस्त है और शायद उन दोनोमे कुछ संबध भी है। मैंने सवाल किया आप ऐसे कैसे कह सकते है? तब उन्होंने बताया पिछले ६-७ सालोंसे शर्मा पति-पत्नी में सिर्फ समाजको दिखनेके संबध है। ये बात मेरे लिए एक धक्का था। पति -पत्नी एक घरमें रहकर भी अलग-अलग सोना कैसे मुमकिन है? खैर छोडो, वैसेभी हम मिया -बीबीमें भी कहा इतना शारीरिक प्रेम बचा था। मेरे पति तो महीने में एक-दो बारही मेरे करीब आते थे। दोनों, मै और शर्माजी एक ही दवाई के मरीज थे। लेकिन हमारे बीच शारीरिक संबध शुरू होने के लिए कारन बना नागपुर की ट्राफिक . हुआ ऐसे, एक दिन मै और शर्माजी उनके गाडीपे डबलसीट आ रहे थे। नागपुर के सीताबर्डी इलाकेमें ओवरब्रिज का निर्माण हो रहा था। रास्तेमे भीड़ बहोत थी,अचानक एक स्कूली बच्चा अपनी साईंकिल लेके पिछेसे आया और मेरे पैरसे टकराया। मुझे जोरसे लगा। मै चिल्लाई। शर्माजी तुरंत मुझे डॉक्टरके पास लेके गए। डॉक्टरने पेन किलर और तेल दिया। हम वापस घर आये।

घर वापस आने के बाद शर्माजीने मुझे मेरे घरकी सीढिया चढ़नेमें मदत की। पैर काफी दुख रहा था। एक-एक स्टेप उपर चढ़ना मुश्किल था। मेरा पूरा बदन शर्माजीने सम्हाला था। मेरी पीठ उनके छातीपे और नितंब उनके लैंडपे रगड़ रहे थे। उनके सहारेसे मै अपने घर आई। मुझे मेरे बेडरूम में बेडपे उन्होंने बिठाया और लेटनेकेलिए कहा। उनके सामने मुझे शर्म आ रही थी। मगर बोल ना सकी। मै लेट गयी। शर्माजीने मुझे दवाई दी और तेल की शीशी लेकर मेरे पैरकी तरफ बैठे। मैंने शर्मसे कहा- रहने दो, मै खुद लगा लुंगी। वो बोले- भाभीजी घुटनेके उप्पर और पीछे मार लगी है। आपका हाथ वहा पहुचेगा नहीं। गोली ली है साथमें तेल की मालिश होगी तो पैर जल्दी ठीक होगा। उन्होंने हाथमे तेल लेके मालिश शुरू की। उनका स्पर्श होतेही मेरे मनमें तरंग उठने लगे पैरका दर्द कम हो रहा था मगर मन की चाहत बढ़ रही थी। मनमें द्वंद्व चल रहा था। मन के विकारने जीत हासिल की और मैंने आँखे मूंद ली। शर्माजिका हाथ धीरे-धीरे मेरे जांघोकी तरफ जा रहा था। मैंने कोई विरोध नहीं दर्शाया। मेरा मौन उनके समझमे आया। हाथ ऊपर लेके वो मेरे निकरके ऊपरसे मेरी योनि सहला रहे थे। मुझसे कंट्रोल नहीं हुआ और मेरे मुहसे -आह निकली। उन्होंने मेरी निकर निकाली और मेरे योनिको किस किया। अपने जीभसे वो मेरी योनिको जैसे चोद रहे थे। एक तरफ मेरी योनि चूसते- चूसते उन्होंने मेरे कपडे निकाले और खुदकेभी कपडे उतारे। मेरे दोनों बूब्स सहलातेहुए वो ऊपर आये और अपने इशारोमे मुझे अपना लंड चूसनेको कहा। इससे पहेले मैंने कभी लंड चूसा नहीं था मगर उस वक्त मुझे क्या हुआ था पता नहीं। मैंने झटसे उनका लंड मुहमे लेके चूसने लगी। थोड़ी देर लंड चूसनेके बाद मुझसे रहा नहीं गया। मै अपनी गांड उठाके उन्हें इशारा करने लगी। शर्माजीने अपना लंड हाथमें लिया और उन्होंने धीरेसे मेरे चूतमें डाल दिया। फिर उन्होंने पहले स्लो और बादमें फ़ास्ट गाडी चलाई। मैभी नीचेसे उनका साथ दे रही थी। शर्माजी शानदार चुदाई कर रहे थे। काफी देर चोदके उन्होंने अपना पानी छोड़ा। दोनों एक- दुसरे के आगोशमें काफी देर पड़े रहे। फिर मैंने उठके चाय बनाई और हम बात करते रहे।
इसके बाद जब तक हम नागपुरमें थे तब तक हमारा रिश्ता रहा। बाद में हम नागपुर छोडके चले गए , साथमे शर्माजिका साथ भी गया। पर शर्माजीने लंड चूसने का स्किल सिखाया वो लाजवाब था। शायद येही स्किल मुझे मेरे दामाद-रवि के करीब ले जा सकती है इसका अंदाजा मुझे आ गया था।

आज का दिन मेरे दामाद रवि के लिए अबतक तो अच्छा नहीं था। एक तो उसे दिनभर बिना चड्डीके सिर्फ लुंगीपे रहना पड़ा और मेरी बेटी- उसकी पत्नीने दोपहरमें उसको मजा देनेसे इंकार किया। उसके लिए एक बात अच्छी हुई थी। वो कहे तो उसकी सांस उसके बड़े लंडपे फ़िदा हुई थी मगर रविको इस बात का पता नहीं था। मेरी चाहत उसे कैसे बताऊ ये मेरी समझमें नहीं आ रहा था। शामके चाय के वक्त मेरी बैटरी चार्ज हुई। मै झटसे तैयार हुई। पिली साडी-पिला ब्लाउज अंदरसे काली ब्रा पहनी। मेरा ये ब्लाउज पीठपे काफी -काफी खुला था। पीठपे सिर्फ एक छोटीसी पट्टी थी। कपडा काफी पतला था। ब्रा सीधी नजर में आती थी। बालोको चमेलीका दो बूंद तेल लगाके बस एक बो लगाकर खुला छोड़ा। साडीभी नाभिसे नीची पहनी। मुझे मालूम था ऐसे रुपमे मै रविको बड़े आरामसे पटा सकती हु। पल्लू दोनों कंधेपे लेके मै बेटीके बेडरूम गयी और रविको मेरे साथ बाजार चलनेके लिए कहा। चड्डी न होनेसे वो ना कर रहा था मगर मैंने बेटी से कहकर उसे तैयार किया। जीन्स और टी-शर्ट में रवि बहोत स्मार्ट लग रहा था। मैंने मेरी स्कूटी निकाली। पेट्रोल कॉक चालू किये बिना मैंने गाड़ी बाहर लायी। मेरे अनुमानके मुताबिक मेरी बेटी बाय करने दरवाजे पहुंची थी और रविभी मेरे और उसके दरमियान फासला रखके बैठा था। हमने बेटीको बाय करके गाड़ी रास्तेपे थोड़ी आगे ली तभी पेट्रोल बंद होनेसे गाड़ी बंद पड़ी। मै गाडीसे उतरी। रविभी उतरा। कॉक ओन करके मैंने गाड़ी चालू की और गाड़ीपे बैठ गयी। मैंने रविको आरामसे बैठनेको कहा। वो रिलैक्स हुआ तो मैभी पीछे सरक गयी। मेरे नितम्ब अपनेआप उसके दोनों पैरोके बीच आ गए। और रस्तेकी ट्राफिक और बार-बार ब्रेक लगाकर मै उसके लंडको मेरी गांडसे टच कर रही थी। जवान लंड था और न जाने कितने दिनसे उसे सेक्स मिला नहीं था – टच होतेही लंड अपनेआप सलामी देने लगा। रवीने थोडा पीछे हटनेकी कोशिश की तो मै उसपे चिल्लाई- अरे बाबा थोडा स्थिर बैठो। हिलो मत। और मैंने उसके दोनों हाथ अपने कमरपे रखवाया। मेरे कमरपे हाथ रखतेही वो चुप हो गया। मै समझ गयी वो एन्जॉय कर रहा है।बीचमे उसने अपना लंड एडजस्ट किया। अब उसका लंड मेरे दोनों चुतड के बीच फसा था। इस बात से ना-समझ हु ऐसे दिखाके मै गाड़ी चलाने लगी। अब वो मेरे बहोत करीब था।मेरे पीठसे उसकी नाक दो-तीन इंचकी दुरीपे थी। उसकी सास मेरे पीठपे महसूस होती थी। उसका हाथ, जो मेरे कमर पे था वो वायब्रेट हो रहा था। उसकी उंगलिया मचल रही थी। अचानक मैंने एक दुकान के सामने गाड़ी रुकवाई। उतरतेही मैंने देखा रवि के चेहरेपे नाखुशी दिख रही थी। थोडा सामान लेके हम फिर गाड़ीपे बैठ गए। फिरसे खेल शुरू हो गया। फिर मैंने एक दुकानसे सामान लेनेका बहाना बनाके खेल शुरू-बंद किया। आखिरमें सब्जी मार्किटसे सब्जी लेके हमारा खेल फिरसे शुरू हुआ। मार्केट में मैंने जाना- रवि मेरे बदनसे स्पर्श करनेका कोई मौका हाथसे जाने नहीं दे रहा था। सब्जी लेते समय जहा भीड़ होती थी वहा वो मुझे चिपकके साइडमें या मेरे पीछे रुकता था। केला लेते वक्त मैंने उसे सीधे कहा- मुझे तो बड़े केले पसंद है। बड़ा एक हो तो पेट भर जाता है छोटे दो-तीन एक साथ हो तो भी कम लगते है। बादमें उसने मुझे आइस-क्रीम के लिए पूछा तो मैंने कहा-मुझे चोकोबार पसंद है। चूसनेमें ज्यादा मजा आता है। रवि भी अब लाइनपे था- उसने कहा उसे कटोरी में आइसक्रीम लेके जीभसे कुदेरके खानेमें मजा आता है।
घर वापस आते समय मै थोड़ी हवामे थी। मेरा निशाना अचूक लगा था। अब बस मुझे इशारा करनेकी जरुरत थी। रवि तो नंगा होकर अपना बड़ा लंड हाथ में लेकर तैयार था। अब तो बस मुहूरत मुझेही निकालना था।

शामको जब मै खाना बनाने लगी तो मेरा दामाद मुझे किचेनमें मदद करनेके बहाने मेरे इर्दगिर्द रहने लगा। कई बार उसने मुझे टच किया। जब मै सब्जी काटने लगी तो वो मुझे चिपकके बैठा था। रोटी बनाते वक्त जनाब मेरे पिछेसे इतना चिपका था के मुझे लगा वो शायद मुझे वही चोदनेकी कोशिश करेगा। मैही डरके उसे बोली- रवि, मेरी बेटी यानेकी तेरी पत्नी घरमें है। वो अचानक आएगी तो क़यामत आएगी।ये सुनानेके बाद रवि थोडा सम्हाल के रहने लगा। खाना खाते वक्त मेरी बेटीने कहा भी- आज सांस और दामादमें कुछ ज्यादाही बाते चल रही है। रवि और थोडा सहम गया। उसके बाद उसने शांतिसे खाना खाया। बाद में थोडा गपशप करके हम सोने गए। रूम में जाते वक्त उसकी आंखोमे मुझे एक बिनती नजर आई। मगर मैंने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। मै उसे थोडा और तडपाना चाहती थी। इतने सस्तेमें अपनी सांस मिलती नहीं ये उसके समझमे आना जरुरी था।
रातको बेडपे मुझे नींद आना मुश्किल हो रहा था। रविकी कटोरिमे आइसक्रीम जीभसे कुदरने की बात मेरे दिमागमें घूम रही थी। बिलकुल इसी शब्दोमे इन्दोरमें मेरे योगा ग्रुपके साथी कपल नीता और निलेश चूत चुसनेकी बात करते थे। उन दोनोंनेही मुझे चूत चुसनेसे कितना मजा मिलता है इसकी जानकारी दी थी। क्या वो भी दिन थे। एक ही वक्त स्त्री और पुरुष दोनोसे सेक्स का मजा अलगही था।

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