छोटी बहन के साथ चुदाई part 5

अभी १०:३० हो रहा था और उसने कहा कि वो करीब १२ बजे अपने गाँड़ में डलवाएगी। मैं बोला कि फ़िर अभी से १२ बजे तक मैं क्या करुँगा? गुड्डी खिलखिला कर हँसी और बोली, “इतनी सारी लौन्डिया है और तुम को कुछ समझ नहीं आ रहा, भोंदूँ कहीं के….”, तभी आशी बोली, “दीदी, क्या एक बार आगे वाले में भी घुसाएँगे भैया क्या?” गुड्डी बोली, “मैं तो अब सिर्फ़ गाँड़ मरवाउँगी….अब यह तो यही जाने या फ़िर तुम लोग में से कोई चुदा लो। वियाग्रा का असर तो करीब ११:३० से शुरु होगा और तब करीब एक घन्टे तो लन्ड टन्टनाया रहेगा मेरे लिए।” मैंने स्वीटी की तरफ़ देख कर इशारा किया और तब स्वीटी भी मेरा मन भांप कर बोली, “आशी अगर तुमको इतना मन है तो अपना चुदा लो आज एक बार….।” आशी यह सुन कर घबड़ा गई, “नहीं…नहीं…, पहले कभी की नहीं हूँ, कहीं मम्मी जान गई तो…।” मैं देख रहा था कि ताशी सब चुप-चाप सुन रही है। मैंने अब उसको ही कहा, “ताशी, तुम तो पहले की हो यह सब, तो आज एक बार जल्दी से मेरे साथ सेक्स कर लो, देखो यह बच्ची बेचारी भी देख लेगी सब और समझ भी लेगी।” मेरी बात सुन कर ताशी तो ना… ना… करने लगी पर बाकी तीनों लड़कियों ने मेरा साथ दिया और ताशी के ना… ना… करते हुए भी मैं अपनी जगह से उठा और फ़िर ताशी के चेहरे को अपने हाथों में ले कर उसके होठ चुमते हुए उसके ना… ना… का राग हीं बन्द कर दिया। ५ सेकेण्ड में हीं ताशी भी मुझे होठ चुमने में सहयोग करने लगी। मैंने अब उसके बगल में बैठते हुए उसको अपनी गोदी में खींच लिया। ताशी एक बार मुझसे छुटने की कोशिश की, “कभी ऐसे किसी के सामने नहीं की हूँ…. मुझे शर्म आ रही है, मैं नहीं करुँगी अभी।” मैंने और फ़िर बाकी सब ने उसको समझाना शुरु किया। मैं उसके बदन पर हाथ घुमा रहा था और इधर-उधर चेहरे पर चुमता जा रहा था। उसका बदन गर्म होने लगा था।

मैं उसके सामने खड़ा हो गया और फ़िर स्वीटी, जो ताशी के ठीक बगल में बैठी थी, से बोला “स्वीटी अब तुम जरा ताशी के हाथ में मेरा लन्ड पकड़ाओ न” और मैं अपने शर्ट का बटन खोलने लगा। स्वीटी आगे बढ़ी और मेरे जीन्स-पैन्ट की जिप खोल कर मेरे आधा फ़नफ़नाए हुए लन्ड को बाहर खींच ली। इतनी देर में मैं अपने कपड़े उतार चुका था सो जीन्स-पैन्ट के बटन को खोलते हुए उसको नीचे करके अपने बदन से निकाल कर पूरा नंगा खड़ा हो गया। मेरा लन्ड अभी आधा ही ठनका था और लाल सुपाड़े की झलक मिलने लगी थी। छोटी बहन आशी के मुँह से निकला, “माय गौड…”, मैं पूछा – “कभी देखी हो आशी मर्दाना लन्ड….।” उसके चेहरे पर आश्चर्य था। मैंने उसको कहा, “आओ पकड़ कर देखो इसको…” और मैं अब उसकी तरफ़ बढ़ कर उसका हाथ पकड़ कर अपने लन्ड पर रख दिया और फ़िर जब वो लन्ड को अपनी मुट्ठी में लपेट ली तब मैंने उसके मुट्ठी के उपर अपने हाथ से मुट्ठी बना कर उसके हाथ को अपने लन्ड पर हल्के-हल्के चलाया। मेरे लन्ड के सामने की चमड़ी अब पीछे खिसक गई और मेरा लाल सुपाड़ा चमक उठा। धीरे-धीरे लन्ड खड़ा होने लगा था, वो अब करीब ७” हो गया था। ताशी सब देख रही थी। मैंने अब आशी को कहा, “मुँह में लोगी? देखो एक बार मुँह में ले कर”…. और मैंने अपना लन्ड उसके चेहरे की तरफ़ कर दिया। वो न में सर हिलाने लगी तो मैंने भी उसको बच्ची जान जिद नहीं किया और फ़िर एक बार अपना ध्यान उसकी बड़ी बहन ताशी की तरफ़ किया। अब मैंने ताशी को पकड़ कर खड़ा कर लिया और फ़िर उसको बाहों में भींच कर जोर-जोर से चुमने लगा। मेरा खड़ा लन्ड उसकी पेट में चुभ रहा था। ताशी एक भूरे रंग के प्रिन्टेड सूती सेमी-पटियाला सलवार-सूट पहने थी। उसको भी शायद मन होने लगा था चुदाने का। वो अब मेरा साथ दे रही थी। मैंने अब पहली बार उसकी चूचियों को पकड़ा और फ़िर उसके चेहरे से अपना ध्यान हटा कर उसकी चुचियों पर लगा दिया। उसके हाथ को मैंने अपने हाथ से पकड़ कर अपने लन्ड पर रख दिया और वो भी मेरा इशारा समझ कर अब लन्ड सहलाने लगी थी। मैंने उसके पीठ की तरफ़ हाथ ले जा कर उसके कुर्ते की जिप खोल दी और फ़िर उसका कुर्ता उतार दिया। सफ़ेद ब्रा में उसके भरी हुई छाती मेरे सामने इतरा रही थी। दोनों बड़ी-बड़ी चूची सामने में एक दुसरे से चिपकी हुई थीं और उसका ब्रा जो शायद थोड़ा पहले का था, बड़ी मुश्किल से उसकी ३६ साईज की चुचियों को सम्भाले हुए था। मैंने उसकी सलवार की डोरी खींची और फ़िर उसका सलवार भी निकाल दिया। नीले रंग के पैन्टी में उसकी बूर की कल्पना से मैं अब पूरी तरह से गर्मा गया था। मैंने बिना देर किए उसकी पैन्टी भी नीचे सरारी और उसकी बिना झाँटों वाली चिकनी बूर मेरे सामने थी। करीब एक सप्ताह पहले झाँट साफ़ की होगी सो अब हल्का सा आभास हो रहा था झाँट का। उसकी बूर की चमड़ी काली थी।

ताशी के चेहरे से शर्म झलक रही थी। इस तरह सब के सामने नंगे होने का यह पहला अनुभव था। मेरा लन्ड टन्टनाया हुआ था सो मैंने ताशी को अपनी तरफ़ खींचा और इसी बीच में उसकी बूर का अपने हाथों से मुआयना किया कि उसकी बूर पनिआई है कि नहीं। शर्म और आने वाले समय की सोच ने उसकी बूर से पानी निकालना शुरु कर दिया था। मेरा काम आसान हो गया था। उसको लिटाते हुए मैंने लगातार उसकी चूचियों को चुसते चुमते हुए उसको और गरम करता रहा था और फ़िर अपने हाथों में थुक लगा कर उसकी बूर की चमड़ी और छेद दोनों को गिला कर दिया था। उसके मुँह से चुदास से भरी हुई सिसकी निकलनी शुरु हो गयी थी। मैंने अब उसको बिस्तर पे ठीक से लिटा दिया और ताशी अपना चेहरा उस तरफ़ घुमा ली थी जिस तरफ़ उसकी छोटी बहन नहीं बैठी थी। उसको इस तरह से नंगी लेट कर अपनी छोटी बहन से नजर मिलाने में शर्म लग रही थी। मैंने आराम से एक बार आशी को देखा जो बड़े चाव से सब देख रही थी और अपने जाँघों को भींच रही थी… मैं उसके जाँघों को ऐसे कसते हुए देख कर सब समझ गया… पर क्या कर सकता था अभी….बेचारी आशी। मेरी बहन स्वीटी ने मुझे देख कर आँख मारी। गुड्डी अभी टट्टी करके अपने गाँड़ को पूरी तरह से खाली करने गई हुई थी। मैं अब ताशी की जाँघो को खोल कर उसके खुली बूर पर अपना लन्ड सटा कर अपने घुटने के बल उसकी खुली जांघों के बीच में बैठ गया था। फ़िर ताशी के ऊपर झुकते हुए मैंने उसके कंधों को अपने चौड़े सीने से दबा कर एक तरह से उसको बिस्तर पर दबा दिया और फ़िर उसकी पतली कमर को दोनों हाथों से पकड़ कर अपने लन्ड को उसकी पनिआई हुई बूर में दबाने लगा। ताशी के मुँह सिसकी और कराह की मिलीजुली आवाज निकल रही थी और उसकी आँखे मस्ती से बन्द थी। मैंने लगातार प्रयास करके जल्दी ही अपना पूरा लन्ड ताशी की ठ्स्स बूर में घुसा दिया और फ़िर एक बार गहरी साँस खींची और फ़िर ताशी के कान में कहा, “भीतर घुस गया है ताशी पूरा लन… अब चुदने को तैयार हो जाओ…”। ताशी एक बार आँख खोली और मुझे देखी, फ़िर उसके अपने बाहों से मुझे कस कर भींच लिया और मैंने उसके बूर की चुदाई शुरु कर दी। गच्च…गच्च…खच्च…खच्च… फ़च्च… फ़च्च… उसकी पनिआई हुई बूर से एक मस्त गाना बजने लगा था। और तब मैंने आशी की तरफ़ देखा। वह पूरे मन से अपनी बहन की चुद रही बूर पर नजर गड़ाए हुए मेरे लन्ड का बहन की बूर में भीतर-बाहर होना देख रही थी।

मैंने उसको पुकारा, “देखी, कैसे बूर को चोदा जाता है…. तुम भी ऐसे ही चुदोगी लड़कों से।” मेरे आवाज से आशी का ध्यान टुटा। उसकी नजर मेरी नजर से मिली और उसका गाल शर्म से लाल हो गया था। तभी गुड्डी बाथरूम से बाहर आई, पूरी तरह से नंग-धड़ग और फ़िर मुस्कुराते हुए बिस्तर पर बैठ कर ताशी की चुचियों से खेलने लगी। जल्दी हीं वो ताशी के होठ को चुम रही थी और तब मैंने अपना बदन सीधा किया और फ़िर अपने पंजों पर बैठ कर ताशी के पेट को अपने हाथों से जकड़ कर जबर्दस्त तेजी से उसकी चुदाई शुरु कर दी। ताशी मस्ती से भर कर चीखना चाहती थी पर गुड्डी ने उसके मुँह को अपने मुँह से बन्द कर दिया था और ताशी की आवाज गूँअँअँ…गुँअँ… करके निकली। करीब पाँच मिनट के बाद, मैंने अपना लन्ड पूरा बाहर खींच लिया और तभी गुड्डी भी अपना चेहरा अलग की। ताशी ने एक कराह के साथ अपनी आँख खोली और हम सब की तरफ़ देखा। उसकी बूर से गिलापन बह चला था और वो मस्त हो चुकी थी। मैंने उसको पलटने का इशारा किया और तब गुड्डी ने उसको उलट कर पेट के बल कर दिया मैंने अपना लन्ड उसकी गाँड़ की छेद से लगाया तो वो बिदक गई और फ़िर से सीधा होने लगी और तब मैंने उसको दिलासा दिया, “डरो मत…., इसके लिए तो आज गुड्डी है, अभी तो बस मैं चेक कर रहा था कि कैसा लगेगा गाँड पर लन्ड…, तुम थोड़ा सा ऊपर उठाओ न कमर… तुमको कुतिया पोज में चोदना है।” वो समझ गई और फ़िर चौपाया की तरह झुक कर खड़ी हो गई और मैंने किसे कुत्ते की तरह उसके कंधों को जकड़ कर पीछे से उसकी बूर में लन्ड घुसा दिया और फ़िर आशी ती तरफ़ दे खा जो अब थोड़ा आगे खिसक आई थी और मैंने ताशी की धक्कम-पेल चुदाई शुरु कर दी। उसकी बूर से पूच्च्च…पूच्च्च… की आवाज निकलती तो कभी उसकी चुतड़ थप्प…थप्प..थप्प.. थप्प.. करती। वो एक बार फ़िर थड़थड़ाई और मुझे लग गया कि बेचारी झड़ गई है। वो अब थक कर निढ़ाल हो गई थी और अपना बदन मेरे से चुदने के लिए बिल्कुल ढीला थोड़ दी थी। मैं भी अब झड़ने वाला था, कि तभी ताशी से पूछा, “मेरा माल मुँह में लोगी ताशी?”। उसने नहीं में सिर हिलाया तब, गुड्डी तुरंत मेरे सामने मुँह खोल कर लेट गई।

मैं समझ गया और फ़िर १०-१२ धक्के के बाद, मैंने अपना लन्ड ताशी की बूर से निकाल कर गुड्डी मी मुंह में घुसा दिया और ५ सेकेन्ड के भीतर मेरा माल छुट गया और गुड्डी मेरे लन्ड को चूस कर सब अपने मुँह में भर ली। करीब एक चम्मच तो जरुर निकला था सफ़ेद-सफ़ेद लिस्लिसा माल। ताशी अब तक सीधा चित लेट गई थी और अपना बदन बिल्कुल ढीला छोड़ी हुई थी। गुड्डी अपना मुँह बन्द की और मेरे माल को मुँह में लिए हुए ही उठी और फ़िर मेरी बहन स्वीटी के पास जा कर उसके मुँह में मेरा थोड़ा सा माल टपका दी। स्वीटी मुस्कुराते हुए उसे निगल ली, और तब गुड्डी ने उसके बगल में बैठी ही आशी के तरफ़ चेहरा घुमाया। मेरा लन्ड एक ठनका मारा, साली गुड्डी…. हराम जादी, उस बच्ची को भी नहीं छोड़ेगी। आशी के चेहरे को पकड़ कर उसको इशारा से मुँह खोलने को कहा। आशी भी यह सब देख कर गरम थी सो मुँह खोल दी और गुड्डी उसके होठ से होठ सटा कर उसके मुँह में मेरा सफ़ेदा गिरा दी और फ़िर आशी को बोली, “निगल जाओ इस चीज को।” आशी बिना कुछ समझे उसे निगल गई। ताशी सब देखी और बोली, “छीः… ” हम सब हँसने लगे।
गुड्डी बोली, “तुम तो ताशी मेरा गाँड़ मराई देखने का कीमत अपना बूर चुदा कर चुकाई, और क्या आशी फ़ोकट में मेरा गाँड़ मराई देखती… उसको भी तो इसका कीमत चुकाना चाहिए… तो वह इसका कीमत लन्ड का माल खा कर चुकाई।” आशी सिटपिटा कर चुप ही रही… पर मैं हँस पड़ा।

मेरा लन्ड अब शायद वियाग्रा के असर में था, टन्टनाया हुआ… और तैयार। मेरे लन्ड को हल्के से एक चपत लगाई गुड्डी और मैं आह्ह… कर बैठा तो वो बोली, “मेरी गाँड़ फ़ाड़ोगे और मेरा एक थप्पड़ नहीं खाओगे… ऐसा कैसे होगा।” इसके बाद को थोड़ा और जोर से जल्दी-जल्दी ५ थप्पड़ गुड्डी ने मेरे फ़नफ़नाए हुए लन्ड को लगा दिए और मैं अब दर्द महसूस करके चिहुँक कर पीछे हटा। गुड्डी मुझे परेशानी में देख कर खिल्खिलाई और बोली, “आ जाओ अब… फ़ाड़ो मेरी गांड़”। मुझे गुस्सा आया और फ़िर अपने गुस्से पर काबू करते हुए मैने गुड्डी को बिस्तर पर खींचा, “साली… मादरचोद… रन्डी…”। गुड्डी अब स्वीटी से बोली, “जरा वो कन्डोंम ला दो”, फ़िर मुझसे बोली, “कन्डोम पहन कर गाँड़ मारना डीयर”। मैंने जब कंडोम अपनी बहन के हाथ से लिया तो वो बोली, “लाईए मैं पहना देती हूँ”, और फ़िर वो बडे प्यार से कंडोम को पैकेट से निकाल कर मेरे लन्ड पर पहनाने लगी। उसने कंडोम को पहले ही खोल दिया था, अनुभव हीन थी मेरी बहन। मैंने उसको बताया कि सही तरीके से लन्ड के ऊपर कंडोम कैसे चढ़ाते हैं और फ़िर गुड्डी को पास में खींचा। गुड्डी क्रीम को अपने गाँड़ की गुलाबी छेद पे मल रही थी और फ़िर धीरे-धीरे अपनी ऊँगली से अपने गाँड़ की छेद को गुदगुदा भी रही थी। मैं भी अब उसकी देखा-देखी उसकी गाँड़ को अपने ऊँगली से खोदने लगा। वो खिब सहयोग कर रही थी। जल्दी हीं उसका गाँड़ का छेद अब खुल गया और भीतर का हल्का गुलाबी हिस्सा झलकने लगा था, तब वो बिस्तर पकड़ कर निहुर कर सही पोज में आ गई और फ़िर मुझे बोली, “आ जाओ और धी-धीरे घुसाना… एक बार में नहीं होगा तो धीरे-धीरे दो-चार बार कोशिश करना, चला जाएगा भीतर…”। मैं अब पहली बार गाँड़ मारने के लिए तैयार हुआ और फ़िर उसकी गाँड़ की छेद पर लगा दिया और फ़िर भीतर दबाने लगा।

तीन बार के बाद मेरा सुपाड़ा भीतर घुस गया। गुड्डी लगातार पूछ रही थी कि कितना गया भीतर। उसे दर्द हो रहा था पर वो सब बर्दास्त कर रही थी। जब मैंने सुपाड़ा भीतर जाने की बात बताई तो बोली, ठीक है अब बिना बाहर खींचे लगातार भीतर दबाओ गाँड़ में…मुझे जोर से पकड़ना और छोड़ना मत अब। बाकी तीनों लड़कियाँ वहीं पास में बैठ कर सब देख रही थी पर सारा ध्यान अभी गुड्डी की गाँड़ पर था। मैंने गुड्डी मे बताए अनुसार ही ताकत लगा कर अपना लन्ड भीतर घुसाने लगा और गुड्डी दर्द से बिलबिला गई थी। अपनी कमर हिलाई जैसे वो आजाद होना चाहती हो। पर मैंने तो उसको जोर से पकड़ लिया था, जैसा उसने कहा था और बिना गुड्डी की परवाह किए पूरी ताकत से अपना लन्ड उसकी टाईट गाँड़ में पेल दिया। जब आधा से ज्यादा भीतर चला गया तब गुड्डी बोली, “अब रुक जाओ… बाप रे… बहुत फ़ैल गया है दर्द हो रहा है अब… प्लीज अब और नहीं मेरी गाँड़ फ़ट जाएगी।” मैंने उसको बताया कि करीब ६” भीतर चला गया है और अब करीब २” हीं बाहर है तो वो अपना हाथ पीछे करके मेरे लन्ड को छु कर देखी कि कितना भीतर गया है और फ़िर बोली, “अब ऐसे ही आगे-पीछे करके मेरी गाँड़ मारो… बाकी अपने भीतर चला जाएगा”। मैं अब जैसा उसने कहा था, गुड्डी की गाँड़ मारने लगा… और फ़िर देखते देखते मुझे लगा कि उसका गाँड़ थोड़ा खुल गया हो और फ़िर धीरे-धीरे उसकी गाँड़ मेरा सारा लन्ड खा गई। करीब ५ मिनट गाँड़ मराने के बाद वो मुझे लन्ड बाहर निकालने को बोली, और फ़िर आराम से गुड्डी उठी और मुझे बिठा कर मेरी गोद में बैठ गई… गाँड़ में इस बार उसने खुद भी मेरा लन्ड घुसा लिया था। मुसकी गाँड़ अब खुल गई थी। मेरे सीने से उसकी पीठ लगी हुई थी और सामने से अपनी बूर खोल कर वो मेरे घुटनो पर अपने पैर टिकाए बैठ कर बोली, “कोई आ कर मेरी बूर में ऊँगली करो न हरामजादियों… सब सामने बैठ कर देख रही हो।” ताशी और आशी दोनों बहने अब गुड्डी की बदन को सहलाने लगे थी और तभी वो उन सब को हटा कर ऊपर से मुझे चोदने लगी, बल्कि ऐसे कहिए कि मेरे लन्ड से अपना गाँड़ मराने लगी। यह सब सोच अब मुझे दिमाग से गरम करने लगा और जल्द हीं मेरा पानी छूटा…. मेरे कन्डोम ने उस पानी को कैन कर लिया और गुड्डी भी सब समझ कर उठी और मेरा कन्डोम एक झटके से खींच कर एक तरफ़ फ़ेंक दिया और फ़िर बिस्तर पर फ़ैल कर अपने हाथ से अपना गाँड़ खोल कर बोली, “आओ हरामी, एक बार और मार लो मेरी गाँड़ बिना कन्डोम के…”। मैं भी तुरन्त उसके ऊपर चढ़ कर उसकी गाँड़ में लन्ड घुसा दिया। अब उसका गाँड़ पूरी तरह से खुल गया था…. खुब मन से इस बार मैंने उसकी गाँड़ मारी करीब १० मिनट तक और फ़िर उसकी गाँड़ में हीं झड़ गया। अब तक मैं बहुत थक गया था, बल्कि हम दोनों तक गये थे सो हम एक तरफ़ हो निढ़ाल पड़े रहे और लम्बी-लम्बी साँसे लेते हुए अपनी थकान मिटाने का प्रयास करने लगे।

करीब ५ मिनट बाद हम दोनों उठे, गुड्डी अब नहाने के लिए बाथरूम में चली गयी और हम सब लोग अपने कपड़े वगैरह ठीक करने लगे। ताशी और आशी दोनों की साँस भी अब ठीक हो गई थी। घड़ी में अब करीब १ बज गया था और मेरे ट्रेन के लिए अब निकलने का समय भी नजदीक हो गया था। मैंने ताशी, आशी से उनका पता और नम्बर लिया और फ़िर उन दोनों को उनके होठों पर चुम्मी ले कर विदा किया। उन दोनों के मम्मी-पापा आ गए थे। गुड्डी जब नहा धो कर बाहर आई तो मैं तैयार होने चला गया। फ़िर हम सब एक साथ ताशी के कमरे में गए और फ़िर उस पूरे परिवार से विदा लिया। ताशी के मम्मी-पापा ने मुझे कहा भी कि कभी अगर आना हुआ तो उनके घर भी मैं जरुर आउँ… और मैंने उन दोनों बहनों की तरफ़ देखते हुए कहा, “जरुर…” और फ़िर उन्हें नमस्ते कह कर बाहर आ गया। फ़िर मैं स्वीटी और गुड्डी के साथ होटल छोड़ कर बाहर आ गया और फ़िर साथ हीं स्टेशन के लिए चल दिए। दोनों लड़कियाँ मुझे ट्रेन में बिठा कर वापस अपने कौलेज लौट गईं। मैंने उन दोनों को गले से लगा कर विदा किया, और तब स्वीटी मेरे कान में बोली, “अब आपको पता चलेगा…. बहुत मस्ती किए हैं यहाँ…. वैसे वहाँ भी विभा दी तो हैं हीं, पर वो मेरे जैसे नहीं है… बहुर शर्मिली है, कुछ गड़बड़ मत कर लीजिएगा…”। मैंने हल्के से उसके गाल पर थपकी दी और फ़िर उन दोनों को विदा कर दिया।
ट्रेन समय से खुल गई, और अब मैं अपनी सीट पर लेटा पिचले कुछ दिनों के घटनाओं के बारे में सोचने लगा। सब कुछ एक सपना जैसा लग रहा था।

घर आए हुए मुझे एक महीना होने को आया। बार-बार मुझे अपने उन दिनों की याद आ रही थी जब मैंने खुला खेल फ़र्रुखाबादी खेला था। हर दो-चार दिन पर स्वीटी से फ़ोन से बात करता और हर बार अपने उन सुनहरे दिनों की याद जरुर दिलाता। वो भी हँसती और मुझे थोड़ा धैर्य रखने को बोलती, कहती कि जब छुट्टियों में आएगी तो वो सब कसर पुरा कर देगी। ऐसे में ही एक दिन गुड्डी से बात हुई और उसने पहली बार मुझे अपनी मँझली बहन विभा को फ़ँसाने को कहा। उस दिन के पहले मुझे भी कभी-कभी यह विचार आता था पर विभा का छुईमुई रुप मुझे उस दिशा में बढ़ने से रोक देता था। स्वीटी ने बताया भी था कि विभा का स्वभाव थोड़ा अलग है और वो शादी के पहले अपनी बूर में ऊँगली भी करने से हिचकती है और स्वीटी को भी वो हमेशा मना करती रहती जब भी स्वीटी अपने प्राईवेट पार्ट्स से कभी खेलती। आज गुड्डी ने मेरे उसी आग को हवा दे दी थी और मैं भी सोचने लगा कि अगर एक बार विभा को जवान बदन क सही मजा मिल जाए तो शायद वो भी खुल जाए। गुड्डी ने इसी दिशा में मुझे आगे बढ़ाया और मुझे विश्वास दिला दिया कि मुझे कुछ करना चाहिए। वो खुद भी पहले यह सब खराब मानती थी पर जब एक बार सेक्स का मजा मिला तो जैसे उसको अब नशा सा हो गया था। मुझे लगा कि गुड्डी ठीक बोल रही है और मैं अब विभा के बारे में सोचने लगा और तय किया कि अब घर पर थोड़ा सेक्सी महौल बनाउँगा तो शायद कुछ बात बने।

उस शाम मैंने खाना-वाना खाने के बाद अपने कमरे में कम्प्युटर पर एक ब्लू-फ़िल्म लगा ली। मैं ब्लू-फ़िल्म पहले भी देखता था पर तब हेड-फ़ोन लगा कर देखता था और आज मैंने स्पीकर औन कर दिया था और आवाज भी थोड़ी तेज कर दी थी। विभा अपने कमरे में कुछ पढ़-लिख रही थी पर मैं चाहता था कि उसको पता चले कि मैं ब्लू-फ़िल्म देख रहा हूँ। एक विदेशी फ़िल्म थी जिसमें दो लड़कियाँ दो लड़कों के साथ सेक्स कर रही थी एक ही रुम में। लन्ड चुसाई का सीन था और हल्के हल्के से सेक्सी आवाजें शुरु हो गई थी। जल्दी हीं दोनों की चुदाई शुरु हो जाती और मुझे पता था कि तब जो सेक्सी आवाजे निकलेगीं वो विभा के कानों तक जरुर जाएँगी। अचानक मुझे थोड़ी शर्म लगी और मैंने कमरा बन्द कर दिया पर आवाज वैसे ही तेज रहने दी। मैंने उस फ़िल्म को देखते हुए दो बार मुठ मारी, पर विभा का कोई रिएक्शन नहीं हुआ। मुझे लग गया कि विभा को मैं शायद ना चोद पाउँ। अगली सुबह नास्ते के तेबुल पर विभा बोली, “कल भैया, क्या कौन फ़िल्म देख रहे थे आप कि सिर्फ़ हल्ला ही हो रहा था और सिर्फ़ “आह आह… और फ़क मी फ़क मी” ही डायलौग था। मुझे नहीं लगा कि विभा सब जान-बुझ कर पूछ रही है, वो मासूम सी दिख रही थी यह सब पुछते हुए। मैंने थोड़ा सोच कर उत्तर दिया, “एक ब्लू-फ़िल्म थी, बहुत दिन बाद ऐसा फ़िल्म देखने का कल मन हो गया था सो लगा लिया था”। वो फ़िर बोली, “उसमें डायलौग था ही नहीं तो कहानी क्या होगा, क्या मजा आएगा फ़िर ऐसी फ़िल्म में?” मैं समझ गया कि विभा को कुछ आईडिया नहीं है। मैं हैरान था कि आज के समय में भी बी०ए० की लड़की को ब्लू-फ़िल्म का कोई आईडिया नहीं है। मैंने फ़िर नजर नीची करके कहा कि ब्लू-फ़िल्म में कहनी नहीं देखा जाता है, सीन देखा जाता है। उसमें कलाकार को सिर्फ़ अच्छे से सेक्सी सीन देना होता है।” मेरे शब्द विभा के भोलेपन के आगे थोड़े शर्माए हुए थे। विभा फ़िर बोली, “तो एक घन्टा तक सिर्फ़ एक ही सीन देखते रह गए, बहुत धैर्य है भैया आपमें। हम तो पाँच मिनट में ऊब जाते हैं एक तरह का सीन देखते-देखते।”

मैंने अब उससे नजर मिलाई और पूछा, “तुम देखी हो ब्लू-फ़िल्म?” वो आराम से बोली, “हाँ सेक्सी फ़िल्म तो कुछ देखी हूँ, पर ऐसा कुछ नहीं देखी कि एक घन्टा तक सिर्फ़ एक डायलौग – फ़क मी, ही चलता रहे।” मुझे लगा कि वो शायद साधारण वाली फ़िल्म के सेक्स सीन की बात कर रही है सो मैंने थोड़ा पक्का होने के लिए पूछा, “तुम्हें पता है कि ’फ़क’ का हिन्दी में मतलब क्या होता है?” वो नौर्मल तरीके से बोली, “सुनते हैं इधर-ऊधर पर सही मतलब शायद नहीं मालुम… क्या होता है मतलब?” मैं थोड़ा हिचका फ़िर सोचा कि आज रिस्क ले लेता हूँ और फ़िर मैंने कहा, “अंग्रेजी के ’फ़क’ का मतलब है चोदना। ब्लू-फ़िल्म में लड़का-लड़की एक दुसरे को चोदते हैं। कोई कहानी उसमें नहीं होती है, सिर्फ़ सेक्स सीन होता है और ब्लू-फ़िल्म देखने वाले उसी सीन को देखते हैं”। मेरी नजर विभा के चेहरे पर लगी थी कि उसका क्या रिएक्शन है यह सब जान कर। उसने बुरा सा चेहरा बनाया और कहा, “यानि कि आप कल गन्दी फ़िल्म देख रहे थे….. आप ऐसी फ़िल्म देखते हैं?” अब मैं घबड़ाया और बोला, “नहीं पर कल बहुत मन कर गया था इसीलिए… सौरी अब नहीं देखुँगा।” अब विभा बोली, “नहीं… आप देखिए अगर आपको अच्छा लगता है।” उसके चेहरे से थोड़ी नाराजगी झलकी। मैंने उसकी खुशामद करते हुए कहा, “नहीं विभा, मुझे नहीं पता था कि तुमको इतना बुरा लग जाएगा। वो तो आज दोपहर में एक एमएमएस देख लिया था विनीत के फ़ोन में आज थोड़ा मन कर गया।” वो अब बोली, “विनीत भैया अपने फ़ोन में यही सब रखते हैं? ऐसे तो बहुत पत्नी-भक्त बने रहते हैं। भाभी मिलेंगी तो हम बताएंगे उनको यह सब।” मैंने अब असल धमाका किया, “उसी भाभी की तो थी वो एमएमएस… विनीत बनाया था जब वो मूली से खेल रही थी।” अब विभा शौक्ड थी…. थोड़ी देर बाद बोली, “कैसे वो बनवा ली ऐसी गन्दी क्लीप? वो लगती तो नहीं है जरा भी ऐसी?”

मैंने अब थोड़ा खुल कर कहा, “असल में विभा, तुम को शायद पता नहीं है… एक बार अगर सेक्स का मजा मिल जाता है तो हर कोई और ज्यादा मजा के लिए कुछ भी कर लेता है। तुम अभी कुँवारी हो इसीलिए ऐसा कह रही हो…। इसमें गन्दा क्या है? वो अपने हस्बैन्ड को खुश करने के लिए क्लीप बनवा ली। तुम्हारा पति अगर तुम्हारी नंगी फ़ोटो लेना चाहेगा तो तुम भी खींचवा लोगी।” विभा भी बोली, “ठीक है यह सब… पर यह क्या कि विनीत भैया अपनी बीवी की फ़ोटो सब को दिखाते घुम रहे हैं?” मैं अब बोला, “सब को नहीं अपने सब्से अच्छे दोस्त को, और इसकी क्या गारन्टी है कि तुम्हारा पति तुम्हारी नंगी फ़ोटो अपने दोस्तों को नहीं दिखाएगा?” वो अब चुप हो गई थी। फ़िर हम दोनों ने नास्ता खत्म किया और जब मैं काम पर जाने लगा तब विभा मेरे कमरे में आ कर बोली, “आज जब मौका मिलेगा हम भी वो फ़िल्म देखेंगे, किस डायरेक्टरी में है? मैंने उसको बता दिया और खुश हुआ कि आज विभा शायद पहली बार असल वाली ब्लू-फ़िल्म देखेगी। उस डायरेक्टरी में करीब ६० अलग-अलग टाईप की ब्लू-फ़िल्म थी। वो एक खजाना था मेरी हार्ड-डिस्क पर। घर से जाते हुए मैं सोच रहा था कि आज तो विभा जरुर ब्लू-फ़िल्म देखेगी अकेले में और शाम को पता नहीं कैसे रिएक्ट करेगी। थोड़ा डर था दिल में, पर साथ हीं एक खुशी भी थी कि आज विभा को सेक्सी बनाने की दिशा में कुछ प्रगति तो हुई। मैंने तय कर लिया कि आज शाम में अगर वो इस बारे में चुप रही तो मैं खुद उसके साथ बात करते हुए इस विषय को उठाऊँगा। मैं अब खुश था। खैर आज का दिन खुब व्यस्त साबित हुआ और बिजनेस के लिहाज से अच्छा भी रहा। इसको मैंने अपने लिए एक शुभ शगुन माना। शाम को करीब ९ बजे मुझे फ़ुर्सत मिली और मैं घर की तरफ़ चल पड़ा।

पूरे रास्ते मेरे दिमाग पर विभा और ब्लू-फ़िल्म ही छाया रहा। ९:३० बजे घर में घुसते समय विभा ने सामान्य तरीके से पूछा कि नहाना है या खाना लगा दे। मैंने नहाने की बात कही, और वो तब बोली कि जल्दी कीजिए, हम खाना गर्म करने जा रहे हैं। उस दिन न चाहते हुए भी मुझे विभा को दिमाग में रख कर मूठ पड़नी पड़ी। शायद विभा के नाम पर आज पहली बार मूठ निकाल रहा था मैं। मैं आम तौर पर जब तक स्वीटी को नहीं चोदा था तब तक अपनी सबसे बड़ी बहन प्रभा के नाम की मूठ निकालता था फ़िर जब स्वीटी के साथ चुदाई का रिश्ता बन गया तब अक्सर उसके नाम की मूठ निकलता था। नहा कर जब मैं डिनर टेबुल पर आया तो विभा अपना और मेरा खाना परोस कर मेरा इंतजार कर रही थी। हम दोनों खाना खाने लगे। विभा के तरफ़ से कुछ ऐसा नहीं लगा कि वो आज पहली बार ब्लू-फ़िल्म देखी है। इधर-उधर की बाते होती रही और खाना लगभग खत्म होने को आया तब मैंने हीं पूछा, “आज देखी थी वो फ़िल्म तुम?” विभा ने हल्के से हूं कहा तो मैंने पूछा, “कैसा लगा?” अब वो बोली, “गन्दा”। मुझे अब समझ नहीं आया कि अब बात कैसे आगे बढ़े तो मैं चुप हो गया। अब विभा ने बात शुरु की, “इतना सारा फ़िल्म आप कहाँ से जमा कर लिए हैं भैया?” मैं बात के तार फ़िर से जोड़ते हुए कहा, “इधर-उधर से ले कर, क्यों? तुम सब देख ली?” विभा बोली, “सब एक दिन में देखा जा सकता है क्या? कई को थोड़ा-थोड़ा देखा…दस-बारह को। कुछ था हीं नहीं कहानी-वहानी तो क्या देखती?” मैंने तब कहा, “तुम किसी एक फ़िल्म को पूरा देखती तब मजा आता। कल किसी एक फ़िल्म को पूरा देखना एक बार। मेरे रहते देखोगी तो शायद लाज लगे।” वो बोली, “एक देखी न पूरा… बहुत गन्दा था। सब लड़के लग रहा था कि उस बेचारी लड़की को जान से मार देंगे। सब टीचर अपने हीं मजा के चक्कर में थे।” मुझे समझ में आ गया कि वो किस फ़िल्म की बात कर रही थी। एक फ़िल्म थी जिसमें ५ मर्दों ने मिल कर एक हाई-स्कूल की लड़की को क्लास-रुम में हीं चोदे थे। सब थे तो प्रोफ़ेशनल कलाकार पर फ़िल्म में टीचर बने हुए थे और लड़्की भी एक कमसीन, कम-उम्र लड़की थी जो हाई-स्कूल छात्रा के रोल में फ़िट थी। वो कलाकार लड़की एबलिन्डा थी।

मैंने विभा से कहा, “वो सब तो ऐक्टिंग है, वो जान क्यों लेंगे बेचारी का। लड़की को पाँच गुणा पैसा मिला होगा कम-से-कम उस फ़िल्म का।” विभा बोली, “हमको तो उसके दशा पर दया आ रहा था, बेचारी अन्तिम १२-१५ मिनट तो एक दम बेजान सी झेल रही थी सब चुप-चाप और उन लोगों को उसके इस दशा से कोई फ़र्क नहीं पर रहा था।” बेचारी के चेहरे पर दर्द झलक रहा था। मैं बोला, “तुम शुरु में हीं ऐसा फ़िल्म बेकार देखी। सीधा-सादा एक लड़का-एक लड़की वाला कोई फ़िल्म देखती तो प्यार दिखता। ऐसी फ़िल्म में खुब प्यार दिखता है कलाकार सब में।” विभा अब बरतन उठाते हुए बोली, “पता नहीं पर उस फ़िल्म में तो लगा कि बेचारी का बलात्कार हो रहा है।” वो किचेन में चली गई और मैं सोचता रह गया कि अब आगे क्या…? मैं अपने कमरे में आ गया और बिस्तर ठीक कर रहा था जब विभा कमरे में आई और बोली, “आप अब बताईए कि किसमें प्यार दिखेगा। अभी १०:३० बज रहा है, एक घन्टा के करीब तो अभी जग सकते हैं।” मैं भक्क…. विभा अब क्या मेरे साथ बैठ कर ब्लू-फ़िल्म देखेगी? मैंने दिल के लड्डू दिल में हीं फ़ोड़े और तुरन्त कंप्युटर औन कर दिया। मैंने जल्द हीं एक क्लीप चुनी हनीमून वाली। २५ मिनट की बहुत-सुन्दर क्लीप थी और दोनों कलाकार भी बहुत सुन्दर थे। क्लिप बिस्तर पर जोड़े की चुम्मा-चाटी से शुरु हुआ तो मैं कुर्सी से उठ गया और विभा को बोला कि तुम अब कुर्सी पर बैठ कर इस क्लीप को देखो, मैं बाहर टीवी देखता हूँ तब तक। विभा बिना कुछ बोले सामने की कुर्सी पर बैठ गई और अपने नजरें स्क्रीन पर लगा दी। मैंने वो क्लिप बहुत बार देखी थी। मैं बाहर निकल गया। मेरे कान कमरे की तरफ़ लगे हुए थे और मैं आवाज सुन सुन कर समझ रहा था कि अब क्या सीन चल रहा है। जब चुदाई अपने चरम पर था तो मैं विभा को देखने के लोभ को रोक नहीं पाया और अपने कमरे में चला गया। विभा अपलक स्क्रीन पर हो रही चुदाई को देख रही थी। मैंने विभा से पूछा, “यह फ़िल्म कैसा है? इसमें तो कुछ गन्दा नहीं है…. पति-पत्नी का सेक्स है और यह तो हर पति-पत्नी में होगा ही।”

विभा कुछ नहीं बोली, सिर्फ़ मेरे से एक बार नजर मिलाई और चेहरा फ़िर स्क्रीन की तरफ़ कर लिया। फ़िल्म खत्म हुआ तो क्लोज-अप में लड़की की चुदी हुई चूत दिखा जिसमें से उस लड़के का सफ़ेद माल निकल रहा था। जल्द हीं लड़की उस सफ़ेद माल को अपने चूत पर से काछ कर खा गई और फ़िर बाय के लिए अपने हाथ हिला कर कैमरे की तरफ़ फ़्लाईंग-किस कर दिया। विभा की साँस गहरी हो गई थी और वो बोली, “यह वाला बेहतर है भैया… वो तो बलात्कार था। टीचर-स्टूडेन्ट के बीच ऐसे फ़िल्म को बनाया काहे यह नहीं समझ में आता है। ये लोग हस्बेन्ड-वाईफ़ थे तो यह सब थोड़ा ठीक लग रहा था।” मैंने हँसते हुए कहा, “सब ऐक्टिंग हीं है। हर तरह का फ़िल्म बनता है, हर तरह के चाहने वाले लोग हैं दुनिया में… अभी ११ बजा है, तुम्हारे हिसाब से आधा घन्टा और है, कुछ और देखोगी विभा?” विभा अब मेरे से नजर मिला कर बोली, “आप यह सब फ़िल्म क्यों देखते हैं?” मुझे लगा कि अब थोड़ा खुल जाना चाहिए तो मैं अब बोला, “मजे के लिए… फ़िल्म देखते हुए मुठियाने का अपना मजा है”। वो शायद “मुठियाना” नहीं समझी तो मैं बोला, “हस्तमैथुन”… अगर अभी तुम यहा न होती तो मैं अभी हस्तमैथुन करता फ़िल्म देख कर। शरीर का तनाव निकल जाए तो नींद अच्छी आती है।” अब विभा थोड़ा अजीब नजर से मुझे देख रही थी फ़िर बोली, “आपको जो फ़िल्म पसन्द है एक लगा लीजिए।” मैंने लोहा गर्म देख कर चोट किया, “एक क्लीप से परिवार वाली…. आज तुम साथ हो तो उसी को चला देता हूँ। एक माँ अपने बेटे के साथ सेक्स करेगी और उसकी बेटी फ़िर अपने भाई से चुदेगी।” फ़िल्म शुरु हुई तो विभा बोली, “सब ऐक्टिंग कर रहा होगा कि तीनों एक परिवार का है।” मैंने कहा कि देखते रहो अंत में सब का सर्टिफ़िकेट दिखा कर सब साफ़ कर देगा कि ये तीनों माँ-बेटा-बेटी हैं। माँ अपने बेटे का लन्ड चुस रही थी और बेटी अपनी मम्मी का चूत चाट रही थी। मैं चाह रहा था कि बात-चीत चलती रहे सो मैंने विभा से कहा, “अभी सब तैयार हो रहा है।” जल्दी ही जब सब रेडी हो गए तो बेटी ने मम्मी को सहारा दे कर घुमा दिया और मम्मी अपने बेटे से खड़े लन्ड के सामने अपने हाथों और घुटनों के बल झुकी थी। उसके बेटे ने अपने ठनकते हुए लन्ड को पीछे से अपनी मम्मी की खुली चूत में घुसा दिया और धक्के देने लगा। जल्दी ही सेक्सी आवाजे स्पीकर से निकल कर मेरे रुम में भर गई। मैं बोला, “इस पोज को डौगी-पोज कहते हैं, किसी कुतिया की तरह लड़की को झुका कर पीछे से चोदा जाता है इस पोज में”।

विभा चुप-चाप सब देख रही थी, मैं जब कुछ बोलता तो वो एक बार मेरी तरफ़ सर करके मेरे से नजर मिला लेती। मैंने कहा, “अब जल्द हीं क्लोज-अप शौट आएगा इस माँ-बेटे का”, और वो शौट आ गया। माँ की चिकनी चूत में गच्च-गच्च करके बेटे का लन्ड घुस निकल रहा था। करीब ५ मिनट बाद मैं कहा, “विभा, तुमको मन नहीं करता हस्तमैथुन करने का… मेरा तो बहुत तन गया है”। विभा बोली, “आपको मन है तो आप कर लीजिए”। इअतना सुनने के बाद अब रुकने का सवाल ही नहीं था। विभा के कमरे में रहते मैंने अपना बरमुडा अपने कमर से नीचे सरार कर पैरों से अलग कर दिया और अपने फ़नफ़नाए हुए लन्ड को सहलाने लगा। कुछ सेकेन्ड बीता होगा की विभा मेरी तरफ़ सर घुमाई मेरे कड़े लन्ड को देखा और बोली, “कैसा काला है आपका… गन्दा सा…”, और मुस्कुराई। मैंने हँस कर कहा, “अभी तक गोरा लन्ड सब हीं दिखाए हैं इसीलिए मेरा काला लग रहा है तुमको”। मैंने अपने लन्ड से सुपाड़े को चमड़ी पीछे करके बाहर निकाला। मैं अब आराम से मुठियाने लगा था। तभी फ़िल्म में एक पार्ट खत्म हो गया और जब बेटे का निकलने को हुआ तो वो अपनी बहन को आगे बुलाया और उसकी मुँह में गिराया जिसको वो बहुत आराम से निगल गई। मैंने अब कहा, “अब इस बहन की बारी है अपने भाई से चुदाने का।” विभा अब बहुत हल्के से बोली, “कैसे कोई अपने घर-परिवार वालों के साथ यह सब कर सकता है…”। मैंने जवाब दिया, “सेक्स में बहुत आकर्षण होता है विभा, मैं कहा था न कि अगर एक बार यह मजा मिल जाए तो फ़िर काबू मुश्किल है…”। विभा अब अचानक पूछी, “आप करते हैं यह सब?” मैंने हाँ में सर हिलाया तो बोली, “किसके साथ?” मैंने कहा, “कोई भी जो मिल जाए…. जब तक शादी नहीं हुई तब तक तो कोई हो क्या फ़र्क पड़ता है… और शादी के बाद भी कौन जानता है क्या हो। शादी के बाद कोई ताला तो कहीं लगता नहीं है।” वो बोली, “सही बात कह रहे हैं आप… वैसे अभी सबसे हाल में किसके साथ किए यह सब।” मैंने थोड़ा सोचा फ़िर कहा, “कसम खाओ कि किसी को कहोगी नहीं तब बताउँगा”।

मेरे इस गजब के सीक्रेट में विभा की दिलचस्पी बढ़ी और उसने प्रोमिश किया तो मैं बिना किसी हिचक के कहा, “स्वीटी के साथ”। उसका चेहरा अब देखने वाला था…. “अपनी स्वीटी… ओह भगवान… यह कैसे…”। मैंने साफ़-साफ़ कह दिया कि ट्रेन में कैसे एक ही बर्थ पर सोते हुए मैंने स्वीटी को चोदा। विभा आँखें गोल-गोल करके बोली, “आप दोनों को लाज नहीं आया यह सब करते… वो भी ट्रेन में… बाप रे बाप। उतने दिन आप लोग होटल में थे… फ़िर तो… हे भगवान… कहीं बेचारी को बच्चा हो गया तो..?” मैंने अब उसको शान्त किया, “कुछ नहीं होगा… हम दोनों इतने बेवकुफ़ थोड़े हैं… बच्चा हो जाएगा… बेवकुफ़, अब कहीं किसी से कह मत देना कि हम दोनों भाई-बहन आपस में सेक्स करते हैं, लोग तुमको पागल समझेंगे।” फ़िर विभा बोली, “आप हमको ऊल्लू बना रहे हैं। झुठ बात सब…. भैया आप ऐसा सब अपनी बहन के लिए कैसे बोल सकते हैं?” मैंने अब सोचा कि अभी नहीं तो फ़िर कभी नहीं सो मैंने कहा, “हमारी क्लीप देखोगी? कोचीन के होटल रुम में बनाए थे।” कहते हुए मैंने अपने अलमारी से वो मेमोरी कार्ड निकाला जिसमें हमारी फ़िल्म थी। इसके बाद अब हमारी असल फ़िल्म औन हो गई। करीब एक घन्टे की क्लीप थी जिसमें मेरा, स्वीटी और गुड्डी का सेक्स का फ़िल्म था। विभा का अब बुरा हाल हो रहा था। कोई भी २० साल की जवान लड़की आखिर कब तक अपने पर काबू रख सकती है। लड़कियों में वैसे भी “काम” मर्दों से आठ-गुणा ज्यादा होता है (कामसुत्र में लिखा है)। मैंने अपना लन्ड झाड़ने के बाद विभा से कहा, “अब तुम भी ऊँगली कर लो नहीं तो नींद नहीं आएगी जितना चुदाई देख ली हो।” वो बोली कि वो कभी यह सब की नहीं है सो डर लग रहा है… तब मैंने कहा कि मैं उसकी मदद कर देता हूँ। ओ घबड़ा गई… नहींईईईई… कहीं बच्चा हो गया तो”। सोच कर हीं उसका मुँह सूख गया। मैंने उसको समझाया कि मैं चुदाई की बात नहीं कर रहा बल्कि हस्तमैथुन की बात कर रहा हूँ। वो सोच में डुबी हुई थी और मैंने मौका सही समझा।

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